अध्याय 19: उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन (Excretory Products and their Elimination)
यह अध्याय मानव शरीर क्रिया विज्ञान (Human Physiology) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और वैचारिक (Conceptual) खंड है। हमारे शरीर की कोशिकाओं में होने वाली विभिन्न उपापचयी (Metabolic) क्रियाओं के फलस्वरूप कई हानिकारक अपशिष्ट पदार्थ (जैसे—अमोनिया, यूरिया, यूरिक अम्ल,
🗂️ 1. नाइट्रोजन अपशिष्टों के आधार पर जीवों का वर्गीकरण
प्राणियों द्वारा उत्सर्जित होने वाले मुख्य नाइट्रोजन अपशिष्ट अमोनिया, यूरिया और यूरिक अम्ल हैं। इनके आधार पर जीवों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:
① अमोनिया उत्सर्जी (अमोनोटेलिक / Ammonotelic)
- विशेषता: अमोनिया प्रकृति का सबसे विषैला (सबसे Toxic) नाइट्रोजन अपशिष्ट है। इसे शरीर से बाहर निकालने के लिए अत्यधिक भारी मात्रा में जल (Water) की आवश्यकता होती है। यह पानी में बहुत घुलनशील है और साधारण विसरण (Diffusion) द्वारा शरीर से बाहर निकल जाती है।
- उदाहरण: अधिकांश जलीय जंतु जैसे जलीय कीट, अस्थिल मछलियाँ (Bony fishes), और मेंढक का टैडपोल लार्वा।
② यूरिया उत्सर्जी (यूरियोटेलिक / Ureotelic) — मानव का समूह
- विशेषता: यूरिया अमोनिया की तुलना में बहुत कम विषैला होता है और इसे निकालने के लिए कम पानी की जरूरत होती है। यकृत (Liver) में अमोनिया को औरनिथिन चक्र (Ornithine cycle) द्वारा यूरिया में बदला जाता है, जिसे वृक्क (Kidneys) छानकर बाहर निकालते हैं।
- उदाहरण: स्तनधारी (मानव), वयस्क मेंढक (उभयचर), और समुद्री मछलियाँ (Cartilaginous fishes)।
③ यूरिक अम्ल उत्सर्जी (यूरिकोटेलिक / Uricotelic) — सबसे कम पानी
- विशेषता: यूरिक अम्ल सबसे कम विषैला होता है। इसे शरीर से बाहर निकालने के लिए पानी की मात्रा न के बराबर चाहिए होती है। ये जीव जल संरक्षण (Water conservation) के लिए यूरिक अम्ल का विसर्जन छोटी-छोटी गोलियों (Pellets) या पेस्ट के रूप में करते हैं।
- उदाहरण: पक्षी (Birds), सरीसृप (छिपकली, साँप), कीट, और स्थलीय घोंघे (Land snails)।
🔬 2. विभिन्न प्राणियों के उत्सर्जी अंग (Evolution of Excretory Organs)
जैसे-जैसे जीवों का विकास हुआ, उनके उत्सर्जी अंग भी सरल नलिकाओं से जटिल ग्रंथियों में बदल गए:
- ज्वाला कोशिकाएँ (प्रोटोनेफ्रिडिया / Flame Cells): चपटे कृमि (जैसे—Planaria), रोटिफेर और कुछ एनेलिड।
- नेफ्रिडिया (वृक्कक): केंचुआ (Earthworm) और अन्य एनेलिड।
- मैल्पीगी नलिकाएं (Malpighian Tubules): कीटों में (जैसे—तिलचट्टा / कॉकरोच)।
- एन्टीनल ग्रंथियाँ या हरित ग्रंथियाँ (Green Glands): क्रस्टेशियाई जंतुओं जैसे झींगा (Prawn) में।
- वृक्क (गुर्दे / Kidneys): मानव सहित सभी उच्च कशेरुकी (Vertebrates) प्राणियों में।
🫁 3. मानव उत्सर्जी तंत्र (Human Excretory System)
मानव उत्सर्जी तंत्र में मुख्य रूप से निम्नलिखित अंग शामिल होते हैं:
- एक जोड़ी वृक्क (गुर्दे / Kidneys): मुख्य अंग।
- एक जोड़ी मूत्रवाहिनियाँ (Ureters): नलिकाएं जो मूत्र को मूत्राशय तक ले जाती हैं।
- एक मूत्राशय (Urinary Bladder): जहाँ मूत्र अस्थायी रूप से संचित होता है।
- एक मूत्रमार्ग (Urethra): जिसके द्वारा मूत्र बाहर निकलता है।
📊 वृक्क (Kidney) की बाह्य व आंतरिक संरचना:
- स्थिति: ये उदर गुहा के पिछले भाग में रीढ़ की हड्डी (कशेरुक दंड) के दोनों ओर स्थित होते हैं। इनका आकार सेम के बीज (Bean-shaped) जैसा और रंग गहरा लाल-भूरा होता है। अंतिम वक्षीय और तीसरी कटि कशेरुका (T12 से L3) के बीच स्थित होते हैं। दाहिना वृक्क यकृत की उपस्थिति के कारण थोड़ा नीचे स्थित होता है।
- हैलम (Hilum): वृक्क के भीतरी अवतल सतह के मध्य में स्थित एक खांच (गड्ढा), जहाँ से मूत्रवाहिनी, रक्त वाहिकाएँ और तंत्रिकाएँ भीतर प्रवेश करती हैं।
- आन्तरिक संरचना (Two Regions): वृक्क के भीतर दो मुख्य भाग होते हैं:
- वल्कुट (कॉर्टेक्स / Cortex): सबसे बाहरी हल्के रंग का भाग।
- मध्यांश (मेडुला / Medulla): आंतरिक गहरे रंग का भाग, जो कई त्रिकोणीय शंकुओं—मध्यांश पिरामिड (Medullary Pyramids)—में बँटा होता है।
- 🚨 बरतीनी के स्तंभ (Columns of Bertini) — NEET का हॉट-शॉट प्रश्न: कॉर्टेक्स (वल्कुट) भाग जब बीच-बीच में मध्यांश पिरामिडों के बीच धंसकर खंभे जैसी संरचनाएं बनाता है, तो इन्हें बरतीनी के स्तंभ कहते हैं।
🧬 4. नेफ्रॉन: वृक्क की क्रियात्मक इकाई (Structure of Nephron)
प्रत्येक वृक्क में लगभग 10 लाख (1 Million) अत्यंत सूक्ष्म, कुंडलित नलिकाएं पाई जाती हैं, जिन्हें नेफ्रॉन या वृक्काणु (Nephron) कहते हैं। यह उत्सर्जन की मूल इकाई है।
📊 एक नेफ्रॉन के दो मुख्य भाग होते हैं:
① मैल्पीगी काय (Malpighian Body / Renal Corpuscle)
एक कड़ा छननी की तरह काम करता है, जो दो भागों से बना होता है:
- गुच्छ (ग्लोमेरुलस / Glomerulus): अभिवाही धमनी (Afferent arteriole) द्वारा लाए गए रक्त की केशिकाओं का एक सघन जाल (गुच्छा)।
- बोमन सम्पुट (Bowman's Capsule): ग्लोमेरुलस को घेरने वाली प्याले जैसी (Cup-shaped) दोहरी झिल्ली वाली संरचना। इसकी भीतरी दीवार पर विशेष कोशिकाएँ पाई जाती हैं जिन्हें पोडोसाइट (Podocytes) कहते हैं। इन कोशिकाओं के बीच सूक्ष्म छेद होते हैं, जिन्हें छानने वाले छिद्र (Filtration Slits) कहते हैं।
② वृक्क नलिका (Renal Tubule)
बोमन सम्पुट आगे बढ़कर एक लंबी नलिका बनता है, जिसके निम्नलिखित भाग हैं:
- समीपस्थ कुंडलित नलिका (PCT - Proximal Convoluted Tubule): बोमन कैप्सूल के ठीक पास का अत्यधिक कुंडलित भाग। इसकी आंतरिक दीवार पर ब्रश बॉर्डर सूक्ष्मअंकुर (Brush border microvilli) पाए जाते हैं, जो अवशोषण के लिए सतह का क्षेत्रफल कई गुना बढ़ा देते हैं।
- हेनले का लूप (Loop of Henle): यह U-आकार की संरचना है, जिसके दो भाग होते हैं—नीचे उतरने वाली अवरोही भुजा (Descending limb) और ऊपर चढ़ने वाली आरोही भुजा (Ascending limb)। यह मध्यांश (Medulla) भाग में धंसी होती है।
- दूरस्थ कुंडलित नलिका (DCT - Distal Convoluted Tubule): हेनले लूप के बाद का अत्यधिक कुंडलित भाग।
- संग्रहक नलिका (Collecting Duct): कई नेफ्रॉन की DCT नलिकाएं आकर एक बड़ी साझी नली में खुलती हैं, जिसे संग्रहक नलिका कहते हैं। यह मूत्र को रीनल पेल्विस तक पहुँचाती है।
📊 स्थिति के आधार पर नेफ्रॉन के दो प्रकार:
- वल्कुटीय नेफ्रॉन (Cortical Nephrons — 85%): इनका हेनले लूप बहुत छोटा होता है और मेडुला में बहुत कम धंसा होता है। इनमें वासा रेक्टा अनुपस्थित या अल्पविकसित होती है।
- सान्निध्य मध्यांश नेफ्रॉन (Juxtamedullary Nephrons — 15%): इनका हेनले लूप बहुत लंबा होता है और मेडुला में गहराई तक धंसा होता है। ये जल के संरक्षण (मूत्र को गाढ़ा करने) के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार होते हैं।
⏳ 5. मूत्र निर्माण की क्रियाविधि (Mechanism of Urine Formation)
मूत्र निर्माण की प्रक्रिया तीन मुख्य चरणों में पूरी होती है:
① परा-निस्यंदन / अतिसूक्ष्म छानना (Ultrafiltration) — चरण 1
- क्रियाविधि: ग्लोमेरुलस की केशिकाओं में रक्त का दाब अत्यधिक उच्च होता है क्योंकि लाने वाली नली (Afferent) चौड़ी और ले जाने वाली (Efferent) संकरी होती है। इस उच्च दाब के कारण रक्त की सभी चीजें (प्रोटीन और रक्त कोशिकाओं को छोड़कर) छनकर बोमन कैप्सूल की गुहा में आ जाती हैं। इस छने हुए तरल को ग्लोमेरुलर निस्यंद (Filtrate) कहते हैं।
- 🚨 GFR (ग्लोमेरुलर निस्यंदन दर): दोनों वृक्कों द्वारा प्रति मिनट छाने गए कुल तरल की मात्रा। एक स्वस्थ मनुष्य में GFR का मान
अर्थात् प्रतिदिन 180 लीटर होता है! - चौंकाने वाला सत्य: हमारा गुर्दा रोज 180 लीटर तरल छानता है, परंतु हम दिनभर में केवल 1.5 लीटर मूत्र ही विसर्जित करते हैं। इसका अर्थ है कि छने हुए तरल का
भाग वापस सोख लिया जाता है।
② चयनात्मक पुनः अवशोषण (Selective Reabsorption) — चरण 2
निस्यंद के मूल्यवान पदार्थों को शरीर से बाहर बहने से रोकने के लिए नलिकाओं द्वारा उन्हें दोबारा रक्त में सोख लिया जाता है:
- PCT क्षेत्र में — ⭐ अधिकतम अवशोषण: यहाँ छने हुए तरल के लगभग
विद्युत अपघट्यों और जल का, तथा ग्लूकोज व अमीनो अम्लों का सक्रिय रूप से पुनः अवशोषण कर लिया जाता है। - हेनले का लूप: यह जल और लवणों के संतुलन में मदद करता है। इसकी अवरोही (Descending) भुजा केवल जल के लिए पारगम्य होती है (नमक के लिए अप्रवेश्य), जिससे नीचे जाने पर मूत्र गाढ़ा होता जाता है। इसकी आरोही (Ascending) भुजा जल के लिए पूर्णतः अप्रवेश्य होती है, परंतु लवणों (NaCl) का सक्रिय/निष्क्रिय अवशोषण करती है, जिससे ऊपर जाने पर मूत्र दोबारा पतला होने लगता है।
- DCT क्षेत्र में: यहाँ शरीर की आवश्यकता के अनुसार सोडियम आयनों (
) और जल का सशर्त (Conditional) पुनः अवशोषण होता है, जो एल्डोस्टेरोन और ADH हार्मोन द्वारा नियंत्रित होता है।
③ नलिकाकीय स्रावण (Tubular Secretion) — चरण 3
परिशोधन क्रिया। छानने के बाद भी रक्त में बचे रह गए हानिकारक पदार्थों (जैसे—
📈 6. मूत्र को गाढ़ा करने की विधि: प्रतिधारा क्रियाविधि (Counter-Current Mechanism) — ⭐
स्तनधारियों (मानव) में पानी को बचाने के लिए अत्यधिक सांद्रित (गाढ़ा) मूत्र उत्पन्न करने की एक अनूठी क्षमता होती है, जो मध्यांश (Medulla) भाग में स्थित प्रतिधारा क्रियाविधि द्वारा संचालित होती है।
- प्रतिधारा (Counter-Current) का अर्थ: जब दो नलिकाओं में तरल का प्रवाह एक-दूसरे के विपरीत दिशा में हो। यह स्थिति दो जगह पाई जाती है:
- हेनले लूप की दोनों भुजाओं (अवरोही में नीचे, आरोही में ऊपर)।
- हेनले लूप के समांतर चलने वाली रक्त वाहिनी वासा रेक्टा (Vasa Recta) के दोनों धागों में।
- क्रियाविधि (Osmolarity Gradient): हेनले लूप और वासा रेक्टा की विपरीत गतियों के कारण वल्कुट (Cortex) से मध्यांश (Medulla) की गहराई की ओर जाने पर ऊतकों की परासरणीय सांद्रता (Osmolarity) लगातार
से बढ़कर (4 गुना) हो जाती है। - यह उच्च सांद्रता मुख्य रूप से दो पदार्थों—
(सोडियम क्लोराइड) और यूरिया (Urea) के चक्रण के कारण बनी रहती है। - 🚨 जल का खिंचाव: इस अत्यधिक गाढ़े और सांद्रित मेडुलरी ऊतक के कारण, जब मूत्र अंतिम चरण में संग्रहक नलिका (Collecting Duct) से गुजरता है, तो पानी परासरण के खिंचाव के कारण स्वतः ही बाहर निकलकर रक्त में सोख लिया जाता है।
- परिणाम: इस जादुई क्रियाविधि के कारण मानव शुरुआती निस्यंद की तुलना में लगभग 4 गुना अधिक सांद्रित (गाढ़ा) मूत्र उत्सर्जित करता है, जिससे पानी का ह्रास न्यूनतम होता है। [1]
🧠 7. वृक्क कार्यों का नियमन (Regulation of Kidney Function)
हमारे गुर्दे मनमर्जी से काम नहीं करते, उनके छानने की दर (GFR) को शरीर के तीन मुख्य फीडबैक तंत्रों द्वारा नियंत्रित किया जाता है:
① ADH (एंटी-डाययूरेटिक हार्मोन) / वैसोप्रेसिन तंत्र
- जब शरीर में पानी की कमी होती है (जैसे अत्यधिक पसीना आने पर), तो रक्त का परासरणी दबाव बढ़ता है। इससे मस्तिष्क की पिट्यूटरी ग्रंथि से ADH हार्मोन स्रावित होता है।
- कार्य: ADH सीधे DCT और संग्रहक नलिका पर कार्य करके जल के पुनः अवशोषण को अत्यधिक बढ़ा देता है, जिससे मूत्र की मात्रा घट जाती है और शरीर में पानी बच जाता है। (चाय, कॉफी या अल्कोहल पीने पर ADH का स्राव रुक जाता है, जिससे बार-बार मूत्र आता है, जिसे डाययूरिसिस कहते हैं)।
② RAAS तंत्र (रेनिन-एंजियोटेंसिन-एल्डोस्टेरोन तंत्र) — ⭐ Very Important
- जब शरीर में रक्तदाब या GFR घट जाता है, तो वृक्क के पास स्थित एक विशेष संवेदनशील क्षेत्र जिसे JGA (जक्सटा ग्लोमेरुलर उपकरण) कहते हैं, सक्रिय हो जाता है और रक्त में एक एंजाइम रेनिन (Renin) मुक्त करता है। [3]
- चक्र: रेनिन रक्त के प्लाज्मा प्रोटीन एंजियोटेंसिनोजेन को एंजियोटेंसिन-I और फिर एंजियोटेंसिन-II में बदल देता है। [4]
- एंजियोटेंसिन-II के दो मुख्य कार्य:
- यह एक शक्तिशाली रक्तवाहिका संकीर्णक (Vasoconstrictor) है, जो धमनियों को सिकोड़कर रक्तदाब और GFR को तुरंत बढ़ा देता है।
- यह एड्रिनल ग्रंथि को एल्डोस्टेरोन (Aldosterone) हार्मोन स्रावित करने के लिए प्रेरित करता है। एल्डोस्टेरोन DCT से
और जल के अवशोषण को बढ़ाता है, जिससे GFR वापस सामान्य हो जाता है। [5, 6, 7]
③ ANF (एट्रियल नेट्रीयूरेटिक कारक) — चेक काउंटर
- जब RAAS तंत्र के कारण रक्तदाब बहुत अधिक बढ़ जाता है, तो हमारे हृदय के अलिंद (Atria) की दीवार से ANF हार्मोन स्रावित होता है। यह रक्त वाहिकाओं को फैला देता है (Vasodilation) और रक्तदाब को घटाता है। यह RAAS तंत्र पर ब्रेक लगाने का कार्य (Negative Feedback) करता है। [8]
🧪 8. मूत्रण और अन्य उत्सर्जी अंग (Micturition)
- मूत्रण (Micturition): मूत्राशय में मूत्र भरने पर उसकी दीवारों के खिंचाव से केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (CNS) को सिगनल जाता है, जिससे मूत्राशय की पेशियों में संकुचन और अवरोधिनी (Sphincter) के शिथिलन से मूत्र बाहर त्याग दिया जाता है। इस प्रतिवर्ती क्रिया को मूत्रण प्रतिवर्त कहते हैं। [9, 10, 11]
- मूत्र के गुण: एक वयस्क मानव रोज 1 से 1.5 लीटर मूत्र विसर्जित करता है। यह हल्के पीले रंग का, जलीय, थोड़ी अम्लीय प्रकृति (
) का तरल है। इसमें प्रति दिन लगभग 25 - 30 ग्राम यूरिया बाहर निकाला जाता है। [12, 13, 14] - अन्य उत्सर्जी अंग:
- फेफड़े (Lungs): ये रोज भारी मात्रा में
(लगभग 18 लीटर प्रति घंटा) और जलवाष्प बाहर निकालते हैं। - यकृत (Liver): यह पित्त रस के माध्यम से बिलिरुबिन, बिलिवर्डिन, कोलेस्ट्रॉल और विकृत स्टेरॉयड हार्मोन को मल के साथ बाहर निकालता है।
- त्वचा (Skin): त्वचा की स्वेद ग्रंथियाँ (Sweat) पानी, नमक और थोड़ी मात्रा में यूरिया बाहर निकालती हैं (कूलिंग इफेक्ट)। त्वचा की तेलमय ग्रंथियाँ (Sebaceous) सीबम के माध्यम से स्टेरोल और हाइड्रोकार्बन बाहर निकालती हैं। [15, 16, 17, 18, 19]
- फेफड़े (Lungs): ये रोज भारी मात्रा में
🏥 9. उत्सर्जी तंत्र के विकार (Disorders)
- यूरिमिया (Uremia): जब वृक्क खराब होने के कारण रक्त में यूरिया की मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है, तो इस स्थिति को यूरिमिया कहते हैं। यह अत्यंत घातक है और इसके कारण गुर्दे पूरी तरह फेल हो सकते हैं। [20]
- 🚨 हीमोडायलिसिस (कृत्रिम गुर्दा / Haemodialysis): यूरिमिया के मरीजों के रक्त से अतिरिक्त यूरिया को कृत्रिम मशीन (डायलिसिस मशीन) द्वारा छानने की प्रक्रिया। मरीज की मुख्य धमनी से रक्त निकालकर उसमें हिपैरिन (रक्त स्कंदन रोधी) मिलाया जाता है और सेलोफेन नलिकाओं के जाल से गुजारा जाता है। मशीन के तरल का परासरणी दाब बिल्कुल प्लाज्मा जैसा होता, पर इसमें नाइट्रोजन अपशिष्ट नहीं होते, जिससे यूरिया विसरण द्वारा बाहर आ जाता है। साफ रक्त में एंटी-हिपैरिन मिलाकर वापस शिरा द्वारा मरीज के शरीर में डाल दिया जाता है। [21]
- वृक्क प्रत्यारोपण (Kidney Transplantation): गुर्दे पूरी तरह खराब होने पर किसी निकटतम संबंधी दाता (Donor) के स्वस्थ गुर्दे का शल्यक्रिया द्वारा प्रतिरोपण करना (अंग अस्वीकृति से बचने के लिए CMI का ध्यान रखा जाता है)।
- रीनल कैल्कुलाई (वृक्क पथरी / Renal Calculi): वृक्क के भीतर अघुलनशील क्रिस्टलीय लवणों (मुख्य रूप से कैल्शियम ऑक्सिलेट / Calcium Oxalate) के जमा हो जाने से बनी पथरी। [22]
- ग्लोमेरुलोनेफ्राइटिस: जीवाणु संक्रमण या सूजन के कारण ग्लोमेरुलस (गुच्छ) का क्षतिग्रस्त हो जाना, जिससे छानने की क्रिया बाधित होती है।
💡 Exam Points & Tips-Tricks (NEET / CUET / State Boards)
- 🚨 Excretion Type Summary: अस्थिल मछलियाँ व टैडपोल = अमोनिया उत्सर्जी; मानव व मेंढक = यूरिया उत्सर्जी; पक्षी, सरीसृप व कीट = यूरिक अम्ल उत्सर्जी। इसे सीधे रट लें, यह तालिका परीक्षाओं का मुख्य अंग है।
- Brush Border PCT: नेफ्रॉन के किस भाग में सबसे ज्यादा अवशोषण (
) होता है? PCT क्षेत्र में, क्योंकि इसके पास ब्रश बॉर्डर माइक्रोविलाई होती हैं। - Counter-Current Components: प्रतिधारा क्रियाविधि बनाने वाले दो मुख्य घटक हेनले लूप और वासा रेक्टा हैं, तथा सांद्रता बनाए रखने वाले दो मुख्य रसायन
और यूरिया हैं। - Heart Hormone for Kidney: हमारे दिल से निकलने वाला कौन सा हार्मोन किडनी के कार्यों (RAAS) को रोकता है? ANF (एट्रियल नेट्रीयूरेटिक कारक)। यह रक्तदाब को घटाता है।
- Kidney Stones Chemical Name: गुर्दे की पथरी रासायनिक रूप से कैल्शियम ऑक्सिलेट के क्रिस्टल होते हैं। [23, 24, 25, 26, 27]
📝 अध्याय का सारांश (Conclusion)
उत्सर्जी उत्पाद एवं उनका निष्कासन अध्याय हमें मानव शरीर के उस सूक्ष्म और परिष्कृत रीसाइक्लिंग व शोधन कारखाने (वृक्क) के दर्शन कराता है जो हमारे आंतरिक वातावरण को विषैले नाइट्रोजन कचरे से मुक्त रखता है। अमोनिया की तीव्र मारक क्षमता से बचकर यूरियोटेलिक (मानव) और यूरिकोटेलिक (पक्षी) बनने का उद्विकासीय सफर पानी को बचाने का सममित प्रयास है। 'बरतीनी के स्तंभों' (Columns of Bertini) से सजे वृक्क के भीतर लाखों नेफ्रॉन चौबीसों घंटे बिना रुके हमारे रक्त की सफाई करते हैं। बोमन कैप्सूल के पोडोसाइट छिद्रों से जब
हेनले लूप की अवरोही व आरोही भुजाओं और वासा रेक्टा के विपरीत प्रवाहों से जनमने वाली 'प्रतिधारा क्रियाविधि' (Counter-Current) मध्यांश ऊतक की सांद्रता को 4 गुना बढ़ाकर संग्रहक नलिका से पानी की अंतिम बूंद तक को निचोड़ लेती है, ताकि रेगिस्तान की शुष्कता में भी मानव का अस्तित्व बचा रहे। JGA कोशिकाओं से निकलने वाला 'रेनिन' एंजाइम जब RAAS चक्रव्यूह रचकर गिरते रक्तदाब को उठाता है, तो हृदय का ANF (एट्रियल नेट्रीयूरेटिक कारक) एक सजग ब्रेक की तरह संतुलन बहाल करता है। अंत में, कैल्शियम ऑक्सिलेट की कठोर 'रीनल कैल्कुलाई' (पथरी) की पीड़ा और यूरिमिया के जहर को 'हीमोडायलिसिस' की सेलोफेन नलिकाओं द्वारा साफ करने की वैज्ञानिक विधा यह सिद्ध करती है कि इन नन्हे नेफ्रॉनों का सुचारू रूप से चलना ही हमारे रक्त की शुद्धता और जीवन की वास्तविक धड़कन है। [28]
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