
कहावतें/लोकोक्तियाँ
अधिकतर कहावतों या लोकोक्तियों के पीछे छोटी या बड़ी, कोई-न-कोई घटना या कहानी होती है। यहाँ कुछ कहावतें प्रस्तुत हैं—
- अंधा क्या चाहे दो आँखें (अर्थ: इच्छित वस्तु की कामना)
वाक्य प्रयोग: भूखे व्यक्ति ने भोजन का आमंत्रण मिलने पर कहा—'अंधा क्या चाहे दो आँखें'।
- अंधी पीसे कुत्ते खाएँ (अर्थ: असावधानी के कारण अपना धन या जमा-पूँजी गँवा बैठना)
वाक्य प्रयोग: पिता कमाता-कमाता मर रहा है और साहबजादे मजे उड़ाते फिरते हैं। इसे कहते हैं—'अंधी पीसे कुत्ते खाएँ'।
- अंधे के हाथ बटेर लगी (अर्थ: अपात्र को बहुमूल्य चीज मिल जाना)
वाक्य प्रयोग: मोहन को नौकरी क्या मिली, मानो 'अंधे के हाथ बटेर लगी'।
- अंधेर नगरी चौपट राजा टके सेर भाजी टके सेर खाजा (अर्थ: चारों तरफ अन्याय एवं अव्यवस्था)
वाक्य प्रयोग: रास्ते में पड़ी लाश को देखकर मैंने पुलिस को इत्तला दी। खोज-बीन करने के बजाए पुलिस ने मुझे ही हाजत में बंद कर दिया। हद हो गई! 'अंधेर नगरी चौपट राजा'।
- अंधों में काना राजा (अर्थ: तुलना की दृष्टि से छोटी वस्तु भी बड़ी लगना)
वाक्य प्रयोग: रामपुर गाँव में किसी भी व्यक्ति के पास खेती के लिए एक इंच जमीन नहीं है, लेकिन सोनू के पास दो एकड़ जमीन है। सभी लोग उसे बहुत अमीर समझते हैं। सच ही है—'अंधों में काना राजा'।
- अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता (अर्थ: अकेला आदमी कठिन कार्य नहीं कर सकता)
वाक्य प्रयोग: माना आप समाज सुधारक हैं, लेकिन समाज की कुरीतियों को आप अकेले दूर नहीं कर सकते। कहा भी गया है—'अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता'।
- अक्ल बड़ी या भैंस (अर्थ: बल से बुद्धि बड़ी होती है)
वाक्य प्रयोग: गाड़ी को धक्का देते-देते हमलोग परेशान थे, गाड़ी स्टार्ट नहीं हुई। लेकिन, महेश ने जैसे ही गाड़ी के एक छोटे-से पार्ट को जरा-सा कसा, वैसे ही गाड़ी स्टार्ट हो गई। इसी को कहते हैं—'अक्ल बड़ी या भैंस'।
- टका बनिया देवे उधार (अर्थ: अपनी गरज पर दबना)
वाक्य प्रयोग: इस काम के लिए मुझे ज्यादा पैसे देने पड़ रहे हैं, क्योंकि यह काम सिर्फ वही कर सकता है। ठीक ही कहते हैं—'अटका बनिया देवे उधार'।
- अधजल गगरी छलकत जाए (अर्थ: ओछे व्यक्ति में अकड़ होती है)
वाक्य प्रयोग: मेरे गाँव का एक व्यक्ति है मैट्रिक फेल और बातें करता है लंबी-चौड़ी! कहावत सही है—'अधजल गगरी छलकत जाए'।
- अपनी करनी पार उतरनी (अर्थ: जैसा करोगे, वैसा पाओगे)
वाक्य प्रयोग: मैंने तुम्हें बार-बार कहा कि बुरी संगति में मत रहो, लेकिन तुम माने नहीं। देखो! तुमने स्वयं अपना सर्वनाश कर लिया। 'अपनी करनी पार उतरनी'।
- अपनी छाछ या अपने दही को कोई खट्टा नहीं कहता है (अर्थ: अपनी चीज सबको अच्छी लगती है)
वाक्य प्रयोग: बेचन साह की दुकान के लगभग सारे सामान मिलावटी या घटिया स्तर के हैं। लेकिन, देखो न! वह हमेशा उनकी प्रशंसा ही करता रहता है। सच है भाई! 'अपनी दही को कोई खट्टा नहीं कहता है'।
- अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत (अर्थ: अवसर बीत जाने पर पछताने से क्या लाभ)
वाक्य प्रयोग: जब पढ़ने का समय था, तो ध्यान दिया नहीं। अब कल से परीक्षा शुरू हो रही है। 'अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत'।
- अरहर की टट्टी गुजराती ताला (अर्थ: अत्यधिक सावधान होना / छोटी वस्तु की बड़ी सुरक्षा)
वाक्य प्रयोग: वह है तो बहुत निर्धन, फिर भी अपने घर की हमेशा रखवाली ही करता रहता है। सही कहा गया है—'अरहर की टट्टी गुजराती ताला'।
- आँख का अंधा गाँठ का पूरा (अर्थ: मूर्ख लेकिन धनवान)
वाक्य प्रयोग: वकीलों को पैसे की कमी कहाँ! समाज में 'आँख के अंधे गाँठ के पूरे' की कमी है क्या?
- आँख का अंधा नाम नयनसुख (अर्थ: गुण के विरुद्ध नाम)
वाक्य प्रयोग: देखो न! नाम है उसका शेर सिंह और एक कुत्ता भी भूँकने लगे तो घर से निकलता नहीं। सच ही कहा गया है—'आँख का अंधा नाम नयनसुख'।
- आए थे हरि-भजन को ओटन लगे कपास (अर्थ: बड़े काम को छोड़कर छोटे काम में लग जाना)
वाक्य प्रयोग: प्रोफेसर साहब के यहाँ यह सोचकर आया था कि आगे की पढ़ाई जारी रखूँगा। यहाँ तो दिन-रात बच्चों को पढ़ाने से ही छुट्टी नहीं मिलती है। 'आए थे हरि भजन को ओटन लगे कपास'।
- आग लगते झोपड़ा जो निकसे सो लाभ (अर्थ: नुकसान होते-होते जो भी बच सके वही बड़ा लाभ है)
वाक्य प्रयोग: घर के सारे कीमती सामान चोरी हो गए, पर चोर बरतन न ले जा सके। यह देखकर गृहस्वामी ने सोचा कि कम से कम बरतन तो बच गए, नहीं तो कल से पत्तों पर ही खाना पड़ता। कहा भी गया है कि 'आग लगते झोपड़ा जो निकसे सो लाभ'।
- आगे कुआँ पीछे खाई या इधर खाई उधर कुआँ (अर्थ: दोनों तरफ संकट, दुविधा की स्थिति)
वाक्य प्रयोग: पीछे कुत्ता और सामने पुलिस को देखकर चोर की स्थिति 'आगे कुआँ पीछे खाई' वाली हो गई।
- आगे नाथ न पीछे पगहा (अर्थ: दायित्व विहीन व्यक्ति)
वाक्य प्रयोग: मोहन के परिवार में कोई नहीं है। वह दिन-रात यहाँ-वहाँ भटकता रहता है। वह अपने में मस्त रहता है। सच ही है, 'आगे नाथ न पीछे पगहा'।
- आटे या गेहूँ के साथ घुन भी पिसता है (अर्थ: दोषी के साथ निर्दोष भी दंडित होता है)
वाक्य प्रयोग: मोहन तो निर्दोष है, लेकिन आज उसे अपराधी मित्र (सोहन) के साथ जेल की हवा खानी पड़ी। क्यों न हो, 'आटे के साथ घुन भी पिसता है'।
- आधा तीतर आधा बटेर (अर्थ: बेमेल चीजों का एक साथ रहना / अधूरा ज्ञान)
वाक्य प्रयोग: कभी तुम आई० ए० एस० की तैयारी करते हो, कभी फिल्म-एक्टिंग कोर्स। इस तरह 'आधा तीतर आधा बटेर' से कुछ भी हासिल नहीं होगा।
- आन के धन पर विक्रम राजा (अर्थ: पराई संपत्ति पाकर गर्व करना)
वाक्य प्रयोग: राधेश्याम को ससुराली धन क्या मिला, उसका दिमाग ही चढ़ गया। सच ही है, 'आन के धन पर विक्रम राजा'।
- आप भला तो जग भला (अर्थ: अच्छे आदमी के लिए सारी दुनिया अच्छी)
वाक्य प्रयोग: राम और श्याम दोनों एक ही वर्ग में पढ़ते हैं। राम का आजतक किसी…
- आप भला तो जग भला (अर्थ: अच्छे आदमी के लिए सारी दुनिया अच्छी)
वाक्य प्रयोग: …से झगड़ा नहीं हुआ, जबकि श्याम लगभग प्रतिदिन किसी-न-किसी से झगड़ लेता है और दोष अपने मित्रों पर मढ़ देता है, लेकिन सत्य यही है—'आप भला तो जग भला'।
- आ बैल मुझे मार (अर्थ: जान-बूझकर मुसीबत में पड़ना)
वाक्य प्रयोग: मैं उस दुष्ट को अपना मित्र बनाकर कोई संकट नहीं लेना चाहता। यह तो वही बात होगी कि 'आ बैल मुझे मार'।
- आम के आम गुठलियों के दाम (अर्थ: दूना फायदा उठाना)
वाक्य प्रयोग: विद्या अर्जन से ज्ञान की प्राप्ति के साथ-साथ अर्थोपार्जन भी होता है, अर्थात्—'आम के आम गुठलियों के दाम'।
- आम खाने से मतलब या पेड़ गिनने से (अर्थ: अपने काम पर ध्यान देना चाहिए)
वाक्य प्रयोग: मैं तुम्हें पैसे देता हूँ पढ़ने के लिए, अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। अब ये पैसे कहाँ से आते हैं, इसकी चिंता मत करो। 'आम खाने से मतलब या पेड़ गिनने से'।
- आसमान या ताड़ से गिरा खजूर पर अटका (अर्थ: एक संकट के बाद दूसरा संकट)
वाक्य प्रयोग: व्यापार में तो घाटा हो ही गया, अब महाजन भी दबाव दे रहे हैं। अब तो उसकी स्थिति 'तार से गिरा तो खजूर पर अटका'-जैसी हो गई है।
- इस हाथ दे उस हाथ ले (अर्थ: किसी काम का फल शीघ्र ही भोगना)
वाक्य प्रयोग: यदि आप दूसरों की इज्जत करते हैं, तो स्वयं भी इज्जत पाते हैं। ठीक ही है—'इस हाथ दे उस हाथ ले'।
- ईश्वर की माया कहीं धूप कहीं छाया (अर्थ: कहीं सुख और कहीं दुःख का होना)
वाक्य प्रयोग: किसी के पास महल है तो किसी के पास झोपड़ी। यही है—'ईश्वर की माया कहीं धूप कहीं छाया'।
- उतने पाँव पसारिए जितनी चादर होय या तेते पाँव पसारिए जेती लंबी सौर (अर्थ: अपनी शक्ति या सामर्थ्य के मुताबिक काम या व्यापार)
वाक्य प्रयोग: मेरे लिए तो मेरी मोटरसाइकिल ही पर्याप्त है, कार तो मैं चाहकर भी नहीं खरीद सकता, क्योंकि 'तेते पाँव पसारिए जेती लंबी सौर'।
- उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे (अर्थ: दोषी ही दोष बतलानेवाले पर बिगड़े)
वाक्य प्रयोग: क्रिकेट मैच में शून्य पर आउट होनेवाले खिलाड़ी ने अपने कप्तान को ही दोष देना शुरू कर दिया। इस पर कप्तान ने कहा—वाह यार! 'उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे'।
- ऊँची दुकान फीका पकवान (अर्थ: सिर्फ बाहरी चमक-दमक, भीतर खोखलापन)
वाक्य प्रयोग: आज हर नेता देश और समाज की तरक्की की बात करके चुनाव जीतता है, परंतु शासन में आते ही इसके विपरीत कार्य करने लगता है। इसी को कहते हैं—'ऊँची दुकान फीका पकवान'।
- ऊँट किस करवट बैठता है (अर्थ: निर्णय या निष्कर्ष की प्रतीक्षा होना)
वाक्य प्रयोग: चुनाव होने में अभी पंद्रह दिन शेष हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही अपनी जीत का दावा कर रहे हैं, देखना है 'ऊँट किस करवट बैठता है'।
- ऊँट के मुँह में जीरा (अर्थ: आवश्यकता अधिक लेकिन मिलना बहुत कम)
वाक्य प्रयोग: इस पेटू को दो समोसे से क्या होगा, ये तो इसके नाश्ते भर भी नहीं हैं। 'ऊँट के मुँह में जीरा'?
- उखली/ऊखल या ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डरना (अर्थ: कठिन कार्य में हाथ लगाकर विघ्न-बाधा की परवाह न करना)
वाक्य प्रयोग: अब हमने इस कार्य को पूरा करने का संकल्प ले ही लिया है, तो समस्याओं की क्या चिंता। 'ऊखल में सिर दिया तो मूसलों से क्या डरना'।
- एक अनार सौ बीमार (अर्थ: वस्तु कम, लेकिन माँग बहुत अधिक)
वाक्य प्रयोग: सरकारी सेवाओं में एक पद के लिए भी आज हजारों उम्मीदवार उपलब्ध रहते हैं। इसी को कहते हैं—'एक अनार सौ बीमार'।
- एक तो करेला आप तीता दूजा नीम चढ़ा या एक तो करेला कड़वा ऊपर से नीम चढ़ा (अर्थ: समरूप दुर्गुण स्वभाव के मेल से दुर्गुणों में वृद्धि होना)
वाक्य प्रयोग: शराब और जुए की लत तो उसे पहले से ही थी, जग्गू की संगत में चोरी भी करने लगा है। इसी को कहते हैं—'एक तो करेला आप तीता दूजा नीम चढ़ा'।
- एक तो चोरी ऊपर से सीनाजोरी / एक तो चोरी दूसरे सीनाजोरी (अर्थ: गलती करना, साथ ही रोब भी गाँठना)
वाक्य प्रयोग: एक तो बिजली का बिल गलत भेजते हैं और शिकायत करने पर लाइन काटने की धौंस जमाते हैं। सही कहा गया है—'एक तो चोरी दूसरे सीनाजोरी'।
- एक पंथ दो काज (अर्थ: एक साथ दो काम सधना)
वाक्य प्रयोग: बरात में दिल्ली जाऊँगा, तो निमंत्रण भी पूरा हो जाएगा और दिल्ली भी घूम लूँगा, इस तरह 'एक पंथ दो काज' हो जाएगा।
- एक म्यान में दो तलवारें नहीं रहतीं (अर्थ: सबल प्रतिद्वंद्वी एकसाथ नहीं हो सकते)
वाक्य प्रयोग: पक्ष और विपक्ष कभी भी एकसाथ नहीं हो सकते, क्योंकि 'एक म्यान में दो तलवारें' नहीं हो सकतीं।
- एक हाथ से ताली नहीं बजती (अर्थ: कोई बात एकतरफा नहीं होती है)
वाक्य प्रयोग: माना कि ज्यादा गलती उनकी ओर से हुई है, परंतु थोड़ी ही सही गलती आपकी भी है। 'एक हाथ से ताली नहीं बजती' है।
- ओछा या थोथा चना बाजे घना (अर्थ: बातें बहुत करना, पर कुछ नहीं जानना)
वाक्य प्रयोग: उसे आता तो कुछ नहीं, पर बातें ऐसी करता है जैसे, बहुत बड़ा विद्वान् हो। ठीक कहते हैं—'थोथा चना बाजे घना'।
- ओस चाटे प्यास नहीं बुझती या तृप्ति नहीं होती (अर्थ: जरूरत से कम होने पर काम नहीं चलता)
वाक्य प्रयोग: मुझे जरूरत है दस हजार रुपए की और आप मात्र पाँच सौ रुपए ही दे रहे हैं। सच है—'ओस चाटे प्यास नहीं बुझती'?
- कंधे पर छोरा गाँव में ढिंढोरा या काँख में लड़का गाँव गोहार या गोद में लड़का नगर (शहर) में ढिंढोरा (अर्थ: पास की वस्तु की खोज दूसरी जगह)
वाक्य प्रयोग: पुस्तक तो आपके मेज पर ही थी, नाहक आपने सारा कार्यालय छान मारा। यह तो वही बात हुई—'गोद में लड़का नगर में ढिंढोरा'।
- कड़वा-कड़वा थू मीठा-मीठा गप्प (अर्थ: अच्छी चीज लेना और बुरी चीजों को फेंक देना)
वाक्य प्रयोग: उसे जो पसंद है, सिर्फ वही खाएगा, क्योंकि उसे 'कड़वा-कड़वा थू मीठा-मीठा गप्प' की आदत है।
- कबिरा हाँडी काठ की चढ़े न बारंबार या काठ की हाँडी दूसरी बार या बार-बार नहीं चढ़ती (अर्थ: छल-कपट सदा नहीं चलता है)
वाक्य प्रयोग: एक बार तो आपने झूठ बोलकर पैसे ऐंठ लिए, अब पुनः पैसे माँगने आए हैं—'काठ की हाँडी दूसरी बार नहीं चढ़ती'।
- कभी गाड़ी पर नाव कभी नाव पर गाड़ी (अर्थ: परिस्थितिवश एक दूसरे पर निर्भर करना ही पड़ता है)
वाक्य प्रयोग: समय-समय की बात है। कभी वे सरकार में मंत्री थे, आज उन्हें विपक्षी दलों के साथ बैठना पड़ रहा है। सही है—'कभी गाड़ी पर नाव कभी नाव पर गाड़ी'।
- कहाँ राजा भोज कहाँ भोजवा या गंगू तेली (अर्थ: बहुत छोटे की तुलना बड़ों से नहीं होती है)
वाक्य प्रयोग: कहाँ तुम्हारा घटिया दरजा और कहाँ इतना बड़ा आदमी, क्यों तुम अपनी बड़ाई कर रहे हो? सही कहावत है—'कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली'।
- कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानुमति ने कुनबा जोड़ा (अर्थ: असंगत बेमेल वस्तुओं का मेल बैठाना, लेकिन मौलिकता का अभाव)
वाक्य प्रयोग: उनकी रचना तो 'कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा भानुमति ने कुनबा जोड़ा' के समान है।
- काँटे बोए बबूल के आम कहाँ से खाए या बोए पेड़ बबूल के आम कहाँ ते होय (अर्थ: बुरे काम का परिणाम बुरा ही होता है)
वाक्य प्रयोग: फर्जी डिगरी पर नौकरी पा ली, तो समझा कि सफल हो गया, परंतु भेद खुलते ही नौकरी चली गई और जेल की हवा भी खानी पड़ी। 'बोए पेड़ बबूल के आम कहाँ ते होय'।
- का बरखा (वर्षा) जब कृषि सुखाने (अर्थ: अवसर बीत जाने पर सहायता व्यर्थ होती है)
वाक्य प्रयोग: मैंने अपनी पुत्री की शादी के लिए आपसे अपने पैसे माँगे थे। परंतु, वे पैसे मुझे आप आज शादी के बाद दे रहे हैं—'का बरखा जब कृषि सुखाने'।
- काला अक्षर भैंस बराबर (अर्थ: निरक्षर/अनपढ़)
वाक्य प्रयोग: गाँव के सभी व्यक्ति पढ़ना लिखना जान गए हैं, पर बुधुआ तो अँगूठा ही लगाता है, क्योंकि उसके लिए तो अभी भी 'काला अक्षर भैंस बराबर' है।
- किस खेत की मूली (अर्थ: नगण्य व्यक्ति)
वाक्य प्रयोग: मैंने अच्छे-अच्छे को मैदान छोड़ते देखा है, तुम 'किस खेत की मूली हो'।
- किस मर्ज की दवा (अर्थ: किसी काम का नहीं)
वाक्य प्रयोग: आपसे यह काम भी नहीं हो पा रहा है, तो आप 'किस मर्ज की दवा' हैं।
- कोयले की दलाली में मुँह या हाथ काला (अर्थ: बुरे काम का बुरा परिणाम)
वाक्य प्रयोग: दुर्जनों की संगति में तो बदनामी ही होगी, 'कोयले की दलाली में मुँह काला' हो ही जाता है।
- कौआ चला हंस की चाल (अर्थ: छोटे या क्षुद्र व्यक्ति द्वारा बड़ों की नकल करना)
वाक्य प्रयोग: बड़े लोगों की तरह कपड़े वगैरह पहन लेने से ही कोई बड़ा व्यक्ति नहीं बन जाता। उसे देखकर तो लोग यही कहेंगे—'कौआ चला हंस की चाल'।
- खग जाने खग ही की भाषा (अर्थ: समान स्वभाववाले की बात समझना)
वाक्य प्रयोग: देखो, बदमाश बदमाश को और चालाक चालाक को पहचान ही लेता है। कहा भी गया है—'खग जाने खग ही की भाषा'।
- खरी मजूरी चोखा काम (अर्थ: समय पर पूरा दाम देने से काम अच्छा होता है)
वाक्य प्रयोग: निजी संस्थानों में कार्यानुसार वेतन दिया जाता है। अच्छा और ज्यादा कार्य के लिए अच्छा वेतन मिलता है। यहाँ तो सीधा नियम है—'खरी मजूरी चोखा काम'।
- खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे (अर्थ: असफलता या लज्जा के कारण किसी दूसरी चीज पर क्रोध प्रकट करना)
वाक्य प्रयोग: आज सबेरे-सबेरे बड़े साहब से डाँट सुनकर बड़े बाबू अपने अधीनस्थ कर्मचारियों पर दिनभर बेवजह झुँझलाते रहे। सही कहावत है—'खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे'।
- खेत खाए गदहा मार खाए जोलहा (अर्थ: गलती करे कोई और फल भुगते कोई)
वाक्य प्रयोग: गलती तो सोहन की थी, परंतु संदेह के आधार पर मोहन की खिंचाई हो गई। सच ही कहा है—'खेत खाए गदहा मार खाए जोलहा'।
- खोदा पहाड़ निकली चुहिया (अर्थ: प्रयत्न बड़ा, लेकिन लाभ छोटा)
वाक्य प्रयोग: बम होने की सूचना पर जब दारोगा जी पहुँचे, तो वहाँ उन्हें कपड़े-लत्ते से भरा एक लावारिस झोला मिला—'खोदा पहाड़ निकली चुहिया'।
- गरजे सो बरसे नहीं (अर्थ: डींग हाँकने से कुछ नहीं होता)
वाक्य प्रयोग: वह कहता था कि हिंदी विषय में मैं सर्वाधिक अंक प्राप्त करूँगा, परंतु हिंदी विषय में ही वह फेल हो गया। सही है—'गरजे सो बरसे नहीं'।
- गाँव या घर का जोगी जोगड़ा आन गाँव का सिद्ध (अर्थ: दूर के ढोल सुहावने या घर की मुरगी दाल बराबर, अपनों की उपेक्षा और बाहरवालों का सम्मान)
वाक्य प्रयोग: घर के वृद्धा का ध्यान किसी को नहीं है सभी आगंतुकों की आवभगत कर रहे हैं। अर्थात्, 'गाँव का जोगी जोगड़ा आन गाँव का सिद्ध'।
- गुड़ खाए गुलगुले से परहेज (अर्थ: झूठ के नखरे करना)
वाक्य प्रयोग: वे पान के साथ जर्दा फाँकते रहते हैं और सुरती न खाने की बात करते हैं। यह तो 'गुड़ खाए गुलगुले से परहेज'-जैसा है।
- गुरु गुड़ चेला चीनी (अर्थ: गुरु की अपेक्षा शिष्य की अधिक तरक्की होना)
वाक्य प्रयोग: मास्टर साहब बच्चों को पढ़ाते ही रह गए, परंतु उनके कितने शिष्य डॉक्टर और इंजीनियर बन गए, इसीलिए कहा गया है—'गुरु गुड़ चेला चीनी'।
- गोद में बैठकर दाढ़ी नोचना (अर्थ: अपने आश्रयदाता को ही नुकसान पहुँचाना)
वाक्य प्रयोग: उन्होंने तरस खाकर उसे अपने यहाँ नौकरी पर रख ली, परंतु वह उनके यहाँ ही चोरी करने लगा। इसे ही कहते हैं, 'गोद में बैठकर दाढ़ी नोचना'।
- घर आया कुत्ता भी निकाला नहीं जाता (अर्थ: घर आए किसी को भी आश्रय देना चाहिए)
वाक्य प्रयोग: वह अपनी गलती का एहसास करके पुनः वापस आ गया है, इसपर कुछ तो विचार कीजिए, क्योंकि 'घर आया कुत्ता भी निकाला नहीं जाता'।
- घर का भेदिया लंका ढाए (अर्थ: आपसी फूट से सर्वनाश हो जाना)
वाक्य प्रयोग: रावण के भाई विभीषण ने ही श्रीराम को लंका और रावण से संबद्ध भेद बताकर उनके विजयी होने में सहायता की थी। इसीलिए कहा गया है—'घर का भेदिया लंका ढाए'।
- घर की मुरगी दाल या साग बराबर (अर्थ: बाहर की चीजों की अपेक्षा घर की चीजों का महत्त्व नहीं होना)
वाक्य प्रयोग: घर में इतने सारे पकवान बने हैं, फिर भी तुम बाहर की चीजें ही खाना चाहते हो। मतलब कि 'घर की मुरगी दाल बराबर'।
- घी का लड्डू टेढ़ा भी भला (अर्थ: गुणवान वस्तु या व्यक्ति का रूप-रंग नहीं देखा जाता)
वाक्य प्रयोग: भगवान् कृष्ण साँवले थे, फिर भी गोपियाँ उनकी दीवानी थीं। सही है—'घी का लड्डू टेढ़ा भी भला'।
- चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए (अर्थ: महाकंजूस की जान भले ही चली जाए पर वह पैसा पल्ले से नहीं निकलने देता)
वाक्य प्रयोग: भले ही यह सेठ मर जाएगा, लेकिन दवा-दारू में पैसा खर्च नहीं करेगा। इसका तो वही हाल है—'चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए'।
- चार दिनों की चाँदनी फिर अँधेरी रात (अर्थ: अस्थायी सुख)
वाक्य प्रयोग: अभी बिजली है तो पंखे की हवा खा लो, मंत्री जी के जाते ही बिजली चली जाएगी—'चार दिनों की चाँदनी फिर अँधेरी रात'।
- चिराग तले अँधेरा (अर्थ: अपनी बुराई नहीं देखना)
वाक्य प्रयोग: मंत्री जी भ्रष्टाचार के विरुद्ध खूब भाषण करते हैं, परंतु बिना रिश्वत लिए किसी का भी काम नहीं करते हैं। यही है 'चिराग तले अँधेरा'।
- चोर की दाढ़ी में तिनका (अर्थ: अपराधी सदैव सशंकित रहता है)
वाक्य प्रयोग: गश्ती के दौरान संदिग्ध युवक को देखकर पुलिस ने उसे रोका, तो वह भागने लगा, पकड़े जाने पर उसकी पहचान एक कुख्यात अपराधी के रूप में हुई। सच ही है 'चोर की दाढ़ी में तिनका'।
- चोर के पाँव या पैर नहीं होते (अर्थ: डरपोक होना)
वाक्य प्रयोग: चोरी के बारे में पूछते ही उसका मुँह पीला पड़ गया। सही है—'चोर के पैर नहीं होते'।
- चोर-चोर मौसेरे भाई (अर्थ: एक-सा काम करनेवालों में बंधुओं-सा प्रेम होता है)
वाक्य प्रयोग: बड़े बाबू से किरानी की क्या शिकायत करूँ, ये दोनों 'चोर-चोर मौसेरे भाई' हैं।
- चौबे गए छब्बे बनने दूबे होके आए (अर्थ: लाभ के बदले हानि उठाना)
वाक्य प्रयोग: अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर राजेश फिल्मों में नायक बनने मुंबई चला गया, परंतु सफल न होने पर वह अब छोटा-मोटा काम करके अपनी जीविका चला रहा है। सच है—'चौबे गए छब्बे बनने दूबे होकर आए'।
- छछूँदर के सिर पर चमेली का तेल (अर्थ: नीच को सुंदर वस्तु की प्राप्ति)
वाक्य प्रयोग: आज जिस तरह से राजनीतिक दल अपराधियों और अशिक्षितों को महिमामंडित कर रहे हैं, इससे तो यह कहावत चरितार्थ होती है—'छछूँदर के सिर पर चमेली का तेल'।
- छलनी में डाल छाज में उड़ाना (अर्थ: बात का बतंगड़ बनाना)
वाक्य प्रयोग: छलनी में डाल छाज में उड़ाना तो कोई तुमसे सीखे। बात तो सिर्फ झगड़े का कारण जानने की थी, परंतु तुमने तो सारा इतिहास ही बता डाला।
- छाछ या दूध का जला मट्ठा भी फूँक-फूँककर पीता है (अर्थ: धोखा खाने के बाद आदमी सँभल जाता है)
वाक्य प्रयोग: पहले तो वह बराबर बेटिकट ही यात्रा किया करता था, परंतु एक बार पकड़े जाने पर उसे जुर्माना भरना पड़ा। तब से वह बिना टिकट प्लेटफॉर्म पर भी नहीं जाता। इसे कहते हैं, 'दूध का जला मट्ठा भी फूँक-फूँक कर पीता है'।
- जस दूल्हा तस बनी बराता (अर्थ: सभी एक जैसे)
वाक्य प्रयोग: जब सरकार के किसी विभाग का मंत्री ही भ्रष्ट हो, तो अधीनस्थ कर्मचारी भी वैसे ही हो जाएँगे, क्योंकि 'जस दूल्हा तस बनी बराता'।
- जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ (अर्थ: परिश्रम का फल सदैव अच्छा होता है)
वाक्य प्रयोग: दो दोस्तों ने एक साथ नौकरी करनी शुरू की थी। पहला ईमानदारी से कठिन परिश्रम करता रहा और दूसरा अनमने ढंग से अपना कार्य करता रहा। पहला व्यक्ति अपने कार्य में निपुण होकर तरक्की पा लिया, परंतु दूसरा जस का तस रहा। सच ही है, 'जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ'।
- जिसकी लाठी उसकी भैंस (अर्थ: बलवान की ही विजय होती है)
वाक्य प्रयोग: नेताजी धन-धान्य से संपन्न होने के साथ ही बाहुबली भी हैं, उनकी तो जीत निश्चित ही थी। कहा भी गया है, 'जिसकी लाठी उसकी भैंस'।
- जैसी करनी वैसी भरनी (अर्थ: कर्म के अनुसार फल भोगना)
वाक्य प्रयोग: वह जीवनभर अनुचित तरीकों से धन कमाता रहा, अंततः उसे जेल जाना पड़ा। सच कहा गया है—'जैसी करनी वैसी भरनी'।
- टेढ़ी उँगली किए बिना घी नहीं निकलता (अर्थ: सीधापन से काम नहीं चलता है)
वाक्य प्रयोग: पहले तो उनसे काफी मिन्नतें कीं, फिर भी उन्होंने अनसुनी कर दी, परंतु जब मंत्रीजी से फोन करवाया तो उन्होंने तुरंत काम कर दिया। ठीक ही कहा जाता है कि 'टेढ़ी उँगली किए बिना घी नहीं निकलता'।
- डूबते को तिनके का सहारा (अर्थ: असहाय के लिए थोड़ी सहायता भी बहुत होती है)
वाक्य प्रयोग: पैसे के अभाव में चंदू अपनी बीमारी का इलाज नहीं करवा रहा था, तरस खाकर शर्मा जी ने उसे कुछ रुपए देकर उसकी सहायता क्या कर दी, 'डूबते को तिनके का सहारा' मिल गया।
- ढाक के वही तीन पात (अर्थ: कोई अंतर न आना, सदैव एक-सा रहना)
वाक्य प्रयोग: इस शहर की यातायात व्यवस्था को दुरुस्त करने का काफी प्रयास किया गया, परंतु नतीजा—'ढाक के वही तीन पात'।
- तन पर नहीं लत्ता जा रहे कलकत्ता या तन पर नहीं लत्ता पान खाए अलबत्ता (अर्थ: झूठा दिखावा करना)
वाक्य प्रयोग: उसे आता तो कुछ नहीं, पर सदैव अपने पास मोटी-मोटी किताबें रखता है। सही है—'तन पर नहीं लत्ता पान खाए अलबत्ता'।
- तीन लोक से मथुरा न्यारी (अर्थ: सबसे पृथक् और अनोखा, जरूरत से ज्यादा प्रशंसा)
वाक्य प्रयोग: ऐतिहासिक धरोहरों में प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय का स्थान 'तीन लोक से मथुरा न्यारी'-जैसा है।
- तुम या तू डाल-डाल मैं पात-पात (अर्थ: नहले पर दहला, चालाकी का जवाब चालाकी)
वाक्य प्रयोग: अपराध की योजना बनाते समय ही पुलिस ने अपराधियों को दबोच लिया और कहा—'तू डाल-डाल मैं पात-पात'।
- दान की बछिया के दाँत नहीं देखे जाते (अर्थ: मुफ्त की वस्तु की व्यर्थ जाँच)
वाक्य प्रयोग: सरकार की ओर से मिली विद्यालय की इस पोशाक की जाँच क्या करूँ—'दान की बछिया के दाँत नहीं देखे जाते'।
- दीवारों के भी कान होते हैं (अर्थ: कोई भेद या रहस्य न खुले, अतः सावधान)
वाक्य प्रयोग: देखो, यह बात किसी और को न बताना, क्योंकि 'दीवारों के भी कान होते हैं'।
- दूर के ढोल सुहावने (अर्थ: अज्ञात और दूर की चीजें अच्छा लगना)
वाक्य प्रयोग: बड़े शहरों का आकर्षण तो सभी को रहता है, परंतु वहाँ के व्यस्त जीवन एवं कठिनाइयों से वे परिचित नहीं होते। सही कहा गया है—'दूर के ढोल सुहावने' होते हैं।
- देशी मुरगी विलायती बोल (अर्थ: बेमेल चीजों का मेल ठीक नहीं, अन्य की नकल में अपनी असलियत गँवाना)
वाक्य प्रयोग: तुम अपना रोब औरों पर दिखाने के लिए हमेशा अँगरेजी बोलते हो, परंतु तुम्हारी अँगरेजी बिलकुल अशुद्ध रहती है। लोग तो समझ ही जाते हैं कि 'देशी मुरगी विलायती बोल'।
- धोए जो सौ बार तौ काजर होए न सेत (अर्थ: दुर्गुणी व्यक्ति पर शिक्षा का प्रभाव नहीं पड़ता)
वाक्य प्रयोग: अरे, उस बदमाश को तुम क्या उपदेश दे रहे हो, उस पर कोई असर होनेवाला नहीं है, क्योंकि 'धोए जो सौ बार तौ काजर होए न सेत'।
- धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का (अर्थ: निकम्मा व्यक्ति, कहीं का न रहता)
वाक्य प्रयोग: अभी भी अपने पैरों पर खड़े हो जाओ, नहीं तो माँ-बाप के मरने के बाद तुम्हारी स्थिति हो जाएगी, 'धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का'।
- न ऊधो या ऊधो का लेना न माधो का देना (अर्थ: लटपट से अपने-आपको दूर रखना)
वाक्य प्रयोग: वह बहुत ही स्वस्थ विचारोंवाला व्यक्ति है। उसे 'न ऊधो का लेना न माधो का देना' है।
- न तन को कपड़ा न खाने या पेट को रोटी (अर्थ: अत्यंत निर्धन व्यक्ति)
वाक्य प्रयोग: रामलाल अपनी बेटी के ब्याह के बारे में कैसे सोचे? उसके पास तो, 'न तन को कपड़ा न खाने को रोटी' है।
- न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी (अर्थ: काम टालने के लिए साधन का बहाना)
वाक्य प्रयोग: एक लड़की ने अपनी प्रेमी से कहा कि यदि तुम मेरे लिए ताजमहल-जैसा स्मारक बनवा दोगे तभी मैं तुमसे शादी करूँगी। प्रेमी ने सोचा—'न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी'।
- न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी (अर्थ: न कारण होगा और न कार्य होगा)
वाक्य प्रयोग: यदि झगड़े का मूल कारण मैं ही हूँ, तो मैं यहाँ से चला जाता हूँ—'न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी'।
- नाच न जाने आँगन टेढ़ा (अर्थ: अपना दोष छिपाकर दूसरों की कमी बताना)
वाक्य प्रयोग: उसे गाना तो आता नहीं, कहता है गला खराब है। सच ही कहा है—'नाच न जाने आँगन टेढ़ा'।
- नीम-हकीम खतरे जान (अर्थ: अधकचरी विद्या दुःखदायी होती है)
वाक्य प्रयोग: इतनी मँहगी गाड़ी को उसने एक नौसिखिये मिस्त्री से दिखलाया, ताकि कम पैसे लगें; गाड़ी और खराब हो गई। यही है—'नीम हकीम खतरे जान'।
- नेकी और पूछ-पूछ (अर्थ: भलाई करने के लिए पूछने की आवश्यकता नहीं)
वाक्य प्रयोग: वह नौकरी पाने के लिए परेशान है, यदि आप उसकी नौकरी लगवा सकते हैं तो पूछने की क्या बात है—'नेकी और पूछ-पूछ'।
- नौ की लकड़ी नब्बे खर्च (अर्थ: लाभ कम और खर्च अधिक)
वाक्य प्रयोग: इस पुरानी गाड़ी को खरीद कर मैं बुरी तरह फँस गया हूँ, बराबर इसकी मरम्मत ही करानी पड़ती है, इस तरह तो यह 'नौ की लकड़ी नब्बे खर्च' वाली बात हो गई है।
- नौ दिन चले अढ़ाई कोस (अर्थ: अत्यधिक सुस्ती दिखाना)
वाक्य प्रयोग: सरकारी कार्यालयों में बाबुओं के काम 'नौ दिन चले अढ़ाई कोस' वाली गति से होते हैं।
- पढ़े फारसी बेचे तेल यह देखो किस्मत का खेल (अर्थ: भाग्य क्या न करा दे)
वाक्य प्रयोग: सोचा था कि बी० ए० पास करने के बाद कोई अच्छी नौकरी मिल जाएगी, परंतु आज ऑटो रिक्शा चलाना पड़ रहा है। सही है—'पढ़े फारसी बेचे तेल यह देखो किस्मत का खेल'।
- पाँचों उँगलियाँ घी में (अर्थ: लाभ ही लाभ)
वाक्य प्रयोग: उनका व्यापार तो चल निकला है। आजकल उनकी 'पाँचों उँगलियाँ घी में' हैं।
- बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद (अर्थ: मूर्ख व्यक्ति गुण की सही परख नहीं कर सकता)
वाक्य प्रयोग: रामू को एक सोने की अंगूठी मिली, उसे पीतल समझकर उसने सिर्फ दस रुपए में ही बेच दी। सच है—'बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद'।
- बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ छोटे मियाँ सुभान-अल्लाह (अर्थ: छोटों में बड़ों की अपेक्षा अधिक बुराई या कमी)
वाक्य प्रयोग: बड़ा भाई चोर तो छोटा भाई बहुत बड़ा अपराधी हो गया है। सही कहा गया है—'बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ छोटे मियाँ सुभान-अल्लाह'।
- बिल्ली के गले में घंटी (अर्थ: कठिन काम संपन्न करना)
वाक्य प्रयोग: आतंकियों के गढ़ में जाकर आतंकियों को मार गिराना 'बिल्ली के गले में घंटी' बाँधना ही तो है।
- बैल न कूदे कूदे तंगी (अर्थ: मालिक के बल पर नौकरों का साहस)
वाक्य प्रयोग: जग्गू जब से उस मंत्री जी के यहाँ काम करना शुरू किया है, वह स्वयं को भी बहुत शक्तिशाली समझने लगा है, किसी को कुछ समझता ही नहीं। सही है 'बैल न कूदे कूदे तंगी'।
- भई गति साँप-छछूँदर केरी (अर्थ: असमंजस में पड़ जाना)
वाक्य प्रयोग: अपने संबंधी के यहाँ शादी में जाता हूँ तो व्यापार में नुकसान हो जाएगा, यदि नहीं जाता हूँ तो संबंधों में कटुता आ जाएगी। अब मेरी स्थिति तो 'भई गति साँप-छछूँदर केरी' की हो गई है।
- भागते भूत की लँगोटी सही या भली (अर्थ: न से तो अच्छा जो मिल जाए वही काफी)
वाक्य प्रयोग: अरे! डूबे हुए पैसों में से आधे पैसे आज मिल गए। चलो 'भागते भूत की लँगोटी सही'।
- मन चंगा तो कठौती में गंगा (अर्थ: मन की शुद्धि ही भक्ति है)
वाक्य प्रयोग: मन यदि शुद्ध है, तो तीर्थों का पुण्य घर बैठे भी मिल सकता है, क्योंकि 'मन चंगा तो कठौती में गंगा'।
- मियाँ की दौड़ मसजिद तक (अर्थ: साधारण व्यक्ति का सीमित क्षेत्र में काम करना)
वाक्य प्रयोग: घर से स्कूल जाना और स्कूल से घर आना, यही तो मेरी दिनचर्या है। क्या करूँ—'मियाँ की दौड़ मसजिद तक'।
- रस्सी जल गई पर ऐंठन न गई (अर्थ: नाश हो जाने के बाद भी व्यक्ति की…)
वाक्य प्रयोग: सारी संपत्ति चली गई, परंतु आज भी वह अपने को किसी से कम नहीं समझता। सही है—'रस्सी जल गई पर ऐंठन न गई'।
- लूट में चरखा नफा (अर्थ: न पानेवाली स्थिति में कुछ भी मिल जाना)
वाक्य प्रयोग: उस कंपनी के बंपर इनामवाली योजना में मुझे एक टेबुल घड़ी मिली, चलो 'लूट में चरखा नफा' ही सही।
- सत्तर चूहे खाकर बिल्ली चली हज को (अर्थ: जीवन भर पाप कर्म और अंत में भक्ति का ढोंग)
वाक्य प्रयोग: उन्होंने जीवन भर गरीबों का शोषण और उनपर अत्याचार किया, अब गाँव में एक मंदिर बनवा रहे हैं। सच ही है, 'सत्तर चूहे खाकर बिल्ली चली हज को'।
- सब धान बाईस पसेरी (अर्थ: एक-सा या समान व्यवहार)
वाक्य प्रयोग: सोनू को अपनी शारीरिक शक्ति पर बहुत घमंड था। एक बार उसने एक बॉक्सर को भी ललकारा, बॉक्सर ने उसे मजा चखा दिया। सच है—'सब धान बाईस पसेरी' नहीं होता।
- साँप मरे न लाठी टूटे (अर्थ: बिना नुकसान के काम हो जाना)
वाक्य प्रयोग: 1971 ई० के युद्ध में भारत को कोई खास नुकसान तो नहीं हुआ, लेकिन पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए। यह वही कहावत हुई, 'साँप मरे न लाठी टूटे'।
- हथेली पर सरसों नहीं जमती (अर्थ: कोई कार्य झटपट नहीं हो सकता)
वाक्य प्रयोग: आज ही तो आपने कपड़े सिलने को दिए और आज ही माँग रहे हैं। जनाब! 'हथेली पर सरसों नहीं जमती'।
- हाथ कंगन को आरसी क्या (अर्थ: प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरूरत नहीं)
वाक्य प्रयोग: लड़का इसी शहर के बैंक में काम करता है। बैंक में जाकर उसे देख लो कि वह तुम्हारी लड़की के लायक है कि नहीं, 'हाथ कंगन को आरसी क्या'।
- हाथ सुमरनी बगल कतरनी (अर्थ: कपट व्यवहार)
वाक्य प्रयोग: आज के युग में कपटी मित्र अपना स्वार्थ साधने के लिए किसी का भी अहित कर 'हाथ सुमरनी बगल कतरनी' वाली कहावत को चरितार्थ करते हैं।
- हाथी चले बाजार कुत्ते भूँके हजार (अर्थ: काम करनेवाले या आगे बढ़नेवाले विरोध की परवाह नहीं करते)
वाक्य प्रयोग: सच्चे नेता अपने आदर्शों और सिद्धांतों के साथ समझौता नहीं करते, चाहे उनका कितना भी विरोध क्यों न हो। वे अपना कार्य करते रहते हैं, कहा भी गया है—'हाथी चले बाजार कुत्ता भूँके हजार'।
- हींग लगे न फिटकरी रंग भी चोखा होय (अर्थ: कम लागत और अच्छी चीज़)
वाक्य प्रयोग: तुम चीज अच्छी लेना चाहते हो और पैसे भी कम खर्च करना चाहते हो। ऐसा नहीं होता 'हींग लगे न फिटकरी रंग भी चोखा होय'।
- होनहार बिरवान के होत चिकने पात (अर्थ: महानता के लक्षण बचपन से दिखाई पड़ना)
वाक्य प्रयोग: 'गुप्त' जी छोटी आयु से ही कविता लिखने लगे थे, बाद में वे राष्ट्रकवि बने। सच ही है—'होनहार बिरवान के होत चिकने पात'।
🏁 निष्कर्ष (Conclusion)
निष्कर्षतः, हिंदी व्याकरण में लोकोक्तियाँ और कहावतें (Proverbs) लोक-अनुभवों का वह निचोड़ हैं जो हमारी भाषा को अधिक गंभीर और मारक बनाती हैं। यह विस्तृत Notes CBSE (Class 6-12), BSEB, और SCERT के बोर्ड विद्यार्थियों के साथ-साथ SSC जैसी प्रमुख competitive exam की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए बेहद मददगार साबित होंगे।
कहावतों के अर्थ और उनके अंतर्निहित संदेशों को समझकर आप परीक्षा में पूछे जाने वाले वस्तुनिष्ठ व व्याख्यात्मक प्रश्नों को आसानी से हल कर सकते हैं। यदि इस अध्याय से संबंधित आपका कोई भी प्रश्न या विचार हो, तो नीचे कमेंट बॉक्स में लिखना न भूलें। अपनी तैयारी को इसी तरह मजबूत बनाए रखें!
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