📝 हिंदी व्याकरण: संक्षेपण-लेखन (Precis Writing)
यह नोट्स BSTBPC (बिहार बोर्ड), NCERT, SCERT और विभिन्न राज्य स्तरीय पाठ्यपुस्तकों पर आधारित हैं। यह BSEB (Class 6-12), CBSE, CUET, SBTE, SSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यधिक उपयोगी हैं।

🎯 संक्षेपण क्या है? (What is Precis Writing?)
संक्षेपण (Precis) का अर्थ होता है - किसी विस्तृत विवरण, गद्य-खंड या निबंध के मुख्य विचारों को कम से कम शब्दों में संक्षिप्त करके लिखना।
- मूल मंत्र: गागर में सागर भरना (कम शब्दों में बड़ी बात कहना)।
- आकार: यह मूल गद्यांश का लगभग एक-तिहाई (1/3) भाग होता है।
- उद्देश्य: कम समय में किसी बड़े अनुच्छेद के मूल भाव को समझना।
🔍 संक्षेपण के मुख्य तत्व (Key Elements)
एक अच्छे संक्षेपण में निम्नलिखित गुण होने अनिवार्य हैं:
- पूर्णता (Completeness): मूल गद्यांश की कोई भी मुख्य बात छूटनी नहीं चाहिए।
- संक्षिप्तता (Brevity): फालतू की बातें, उदाहरण और दोहराव को हटा देना चाहिए।
- स्पष्टता (Clarity): भाषा सरल और अर्थ साफ होना चाहिए।
- शुद्धता (Accuracy): मूल लेखक के विचारों को तोड़-मरोड़ कर पेश नहीं करना चाहिए।
- प्रवाह (Flow): वाक्यों के बीच आपस में संबंध (क्रमबद्धता) होना चाहिए।
📐 संक्षेपण-लेखन के नियम (Rules for Writing)
💡 परीक्षा में पूरे अंक पाने के लिए इन चरणों का पालन करें:
चरण 1: मूल पाठ को पढ़ना
- गद्यांश को कम से कम 2 से 3 बार ध्यानपूर्वक पढ़ें।
- केंद्रीय भाव (Main Theme) को समझने का प्रयास करें।
चरण 2: महत्वपूर्ण बिंदुओं को रेखांकित करना
- पढ़ते समय मुख्य विचारों, वाक्यों और शब्दों को पेंसिल से अंडरलाइन (रेखांकित) कर लें।
- उदाहरण, मुहावरे, लोकोक्तियाँ और दोहराए गए वाक्यों को छोड़ दें।
चरण 3: शब्दों की गिनती
- मूल गद्यांश के कुल शब्दों की गिनती करें।
- कुल शब्द संख्या को 3 से भाग दें (कुल शब्द / 3) ताकि संक्षेपण की शब्द सीमा पता चल सके।
चरण 4: शीर्षक का चयन (Title Selection)
- गद्यांश का सबसे उपयुक्त और छोटा शीर्षक चुनें (अधिकतम 3-5 शब्द)।
- शीर्षक सामान्यतः गद्यांश की पहली या आखिरी पंक्तियों में छिपा होता है।
चरण 5: रफ ड्राफ्ट और अंतिम लेखन
- अपने शब्दों में अन्य पुरुष (Third Person - उसने, वे, उनका) में संक्षेपण लिखें।
- कभी भी "मैं", "हम" या "मेरे अनुसार" जैसे शब्दों का प्रयोग न करें।
💡 सुपर टिप्स और ट्रिक्स (Tips & Tricks for Exams)
⭐ परीक्षा में 100% स्कोर करने का फॉर्मूला:
- ❌ नो कॉपी-पेस्ट: मूल गद्यांश की लाइनों को सीधे-सीधे न उतारें। अपने शब्दों का प्रयोग करें।
- 🧠 सरल भाषा: कठिन और क्लिष्ट शब्दों के स्थान पर सरल पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग करें।
- ✍️ एकवचन/अन्य पुरुष: संक्षेपण हमेशा परोक्ष कथन (Indirect Speech) और अन्य पुरुष में लिखा जाना चाहिए।
- 📊 प्रारूप का ध्यान रखें: परीक्षा की कॉपी में अंत में मूल शब्द और संक्षेपण के शब्द अवश्य लिखें।
📝 परीक्षा के दृष्टिकोण से प्रारूप (Exam Format)
परीक्षा में उत्तर को इस प्रकार व्यवस्थित करें:
[उचित एवं संक्षिप्त शीर्षक]
------------------ संक्षेपण का मुख्य भाग ------------------
--------------------------------------------------------
* मूल गद्यांश के कुल शब्द = [संख्या]
* संक्षेपण के कुल शब्द = [संख्या] (मूल शब्द का लगभग 1/3)📖 व्यावहारिक उदाहरण (Example) - मूल गद्यांश (Original Passage):
संक्षेपण की प्रक्रिया:
- मूल शब्द: 104
- अपेक्षित शब्द (1/3): लगभग 35 शब्द
- मुख्य विचार: समय का महत्व, सफलता का आधार, छात्र जीवन में उपयोग।
आज के युग में समय का बहुत महत्व है। जो व्यक्ति समय का सदुपयोग करता है, उसे जीवन में सफलता अवश्य मिलती है। समय एक ऐसी संपत्ति है जो खो जाने पर दोबारा कभी वापस नहीं आती। इतिहास गवाह है कि जितने भी महान पुरुष हुए हैं, उन्होंने समय के एक-एक क्षण का मूल्य समझा। छात्र जीवन में तो समय का महत्व और भी बढ़ जाता है। जो विद्यार्थी आज का काम कल पर टालते हैं, वे परीक्षा में कभी अच्छे अंक नहीं ला पाते और जीवन भर पछताते हैं। इसलिए हमें समय को व्यर्थ नष्ट नहीं करना चाहिए और हर कार्य समय पर करने की आदत डालनी चाहिए।
(कुल शब्द: 104)
शीर्षक: समय का महत्व और सदुपयोग
समय अत्यंत मूल्यवान और अपूर्व संपत्ति है। जीवन की सफलता समय के सदुपयोग पर निर्भर करती है। विशेषकर छात्रों के लिए समय का एक-एक क्षण कीमती है। समय गँवाने वाले लोग जीवन भर पछताते हैं।
(कुल शब्द: 33)
- मूल गद्यांश के कुल शब्द: 104
- संक्षेपण के कुल शब्द: 33
संक्षेपण करें (BSEB Science PYQ) :
अंग्रेजी पढ़ना खराब नहीं है, पर अंग्रेजी पढ़कर अंग्रेज जो जाना खराब है। अंग्रेजी पढ़कर अपने देश को अपनी भाषा को, अपनी संस्कृति को भूल जाना खराब है यह बात मैं इसलिए कह रहा हूँ कि आज के अधिकतर अंग्रेजी पढ़े-लिखे सज्जन अपने देश की प्रत्येक चीज को हीन दृष्टि से देखते हैं। उसकी आलोचना करते हैं और उसे अपनाने में, अपनी मानहानि समझते हैं। पर्व को ही लीजिए। | पढ़े-लिखे लोग कहते हैं कि यह स्त्रियों का ढोंग है, यह पंडितों का पोंगा है। वे | कहते हैं, पर्व बेकार हैं, फिजुलखर्ची के साधन हैं।
- शीर्षक : भारतीय सभ्यता और संस्कृति
अपनी सभ्यता, संस्कृति, भाषा को गौण मानना और दूसरे का अन्धानुकरण करना सबसे बड़ी भूल है। यही कारण है कि आजकल अंग्रेजी पढ़े लिखे लोग अपनी संस्कृति को हेय दृष्टि से देखते हैं और दो शब्द अंग्रेजी बोलकर स्वयं की महानता सिद्ध करना चाहते हैं। यही भूल है।
- मूल गद्यांश के कुल शब्द:
- संक्षेपण के कुल शब्द:
डॉक्टर ग्रियर्सन ने कहा कि बुद्धदेव के बाद भारत में सबसे बड़े लोकनायक तुलसीदास थे। ये असाधारण प्रतिभा लेकर उत्पन्न हुए थे। जिस युग में इनका जन्म हुआ था, उस युग के समाज के सामने कोई ऊँचा आदर्श नहीं था। समाज के उच्च स्तर के लोग विलासिता के पंक में उसी तरह मग्न थे, जिस प्रकार कुछ वर्ष पूर्व सूरदास ने देखा था। निचले स्तर के पुरुष और स्त्री दरिद्र, अशिक्षित और रोगग्रस्त थे। बैरागी हजो जाना मामूली बात थी। जिसके घर की सम्पत्ति नष्ट हो गई या स्त्री मर गई, संसार में कोई आकर्षण नहीं रहा, वही चट संन्यासी हो गया।
- शीर्षक : लोकनायक तुलसीदास
डॉक्टर ग्रियर्सन के अनुसार तुलसीदास भारत के सबसे बड़े लोकनायक थे। ये असाधारण प्रतिभा सम्पन्न थे। इनके जन्म के समय समाज आदर्शहीन था। लोग विलासिता के पंक में फंसे हुए थे। घर-सम्पत्ति स्त्री से हीन व्यक्ति संन्यासी हो जाते थे।
- मूल गद्यांश के कुल शब्द:
- संक्षेपण के कुल शब्द:
अनुशासन की आवश्यकता छात्र-जीवन के लिए सबसे अधिक है। वे विवेक संगत श्रृंखला में बँधे रहने की आदत डालें। उनकी क्षमता बिखर कर नष्ट न होने पाए उनकी साधना के बादल चट्टान और बंजर पर न बरसें, उनकी लालसा कलंक से काले पड़े भौरे की लालसा-मात्र न बन जाए, इसके लिए छात्रों को व्यावहारिक जीवन में अनुशासन के नियमों का पालन करना परमावश्यक है। जीवन के हर क्षेत्र में अनुशासन की आवश्यकता पड़ती है। केवल विद्यालय में नहीं, वरन् परिवार एवं समाज में भी अनुशासन के नियमों का पालन करना चाहिए। उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि पूरी सृष्टि और पूरा ब्रह्माण्ड भी अनुशासन में बँधा है। जीवन में अनुशासन न हो तो हम आसानी से अराजकता का शिकार हो जाएँगे।
- शीर्षक : अनुशासन
अनुशासन जीवन में सफलता की कुंजी है। इसके अभाव में छात्रों का मानसिक एवं चारित्रिक विकास संभव नहीं। छात्रों को व्यावहारिक जीवन में अनुशासन के नियमों का पालन करना परमावश्यक है। जीवन के हर क्षेत्र में अनुशासन की जरूरत पड़ती है। पूरी सृष्टि ही अनुशासन में बँधी है।
- मूल गद्यांश के कुल शब्द:
- संक्षेपण के कुल शब्द:
युवा वर्ग का मस्तिष्क नई-नई बातों की ओर ज्यादा तेज दौड़ता है। उसमें अन्य वर्ग के व्यक्तियों से अधिक आवेश और शक्ति होती है। इस अवस्था में यदि सही शिक्षा और उचित मार्गदर्शन न मिले तो यही शक्ति और प्रेरणा निर्माण के स्थान पर विनाश की ओर ले जाती है। बिगड़ने और बनने की भी यही आयु होती है। दुर्भाग्य से हमारे देश में शिक्षा पद्धति उपाधि बाँटने का काम ही करती है, एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व वाला मनुष्य बनाना आज की शिक्षा पद्धति के लिए मुश्किल है।
- शीर्षक : आदर्श शिक्षा पद्धति का महत्त्व
आज के युवा-वर्ग का मस्तिष्क नयी-नयी बातों की ओर अधिक तेज दौड़ता है। इस अवस्था में युवाओं में सही शिक्षा और उचित मार्गदर्शन मिलना आवश्यक है। अच्छी शिक्षा पद्धति होने से युवाओं का व्यक्तित्व अच्छा बनता है।
- मूल गद्यांश के कुल शब्द:
- संक्षेपण के कुल शब्द:
हिन्दुस्तान में वर्ण व्यवस्था हजारों साल पुरानी है। इस व्यवस्था को आज के राजनीतिज्ञ चाहे जिस नजरिये से देखें, किन्तु पुराने जमाने में जितना प्यार, स्नेह तथा भाईचारा उच्च, मध्यम और निम्न जातियों के बीच था, उतना स्वाधीनता के बाद नहीं हो पाया। गाँधीजी यद्यपि जात-पांत, छुआछूत के उन्मूलन के सचेष्ट थे, किन्तु उनके उत्तराधिकारियों ने, खास तौर से विगत दो दशकों में, जातिगत वैमनस्य को बढ़ावा दिया और जातीय समीकरण के आधार पर सत्ता की दौड़ लगाई। अतः श्रम के विभाजन द्वारा एक-दूसरे के श्रम पर आश्रित रहने की प्रक्रिया और पारस्परिक प्रेम का जो वातावरण स्वतंत्रता से पूर्व और मुसलमानी जमाने में हिन्दुओं में था, वह अब चाहकर भी नहीं हो पा रहा है।
- शीर्षक : वर्ण व्यवस्था और भाईचारा
हिन्दुस्तान में वर्ण व्यवस्था हजारों साल पुराना है। स्वाधीनता से पहले आपसी भाईचारा था। स्वतंत्रता के बाद नेताओं ने जातिगत वैमनस्य को बढ़ावा देकर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकी। श्रम विभाजन के कारण आपसी सौमनस्य था। भाईचारा अब कम हो गया है।
- मूल गद्यांश के कुल शब्द:
- संक्षेपण के कुल शब्द:
शिष्टाचार अनुशासन का ही अधिक व्यावहारिक रूप है। शिष्टाचार का अर्थ शिष्ट आचरण होता है। यहाँ 'शिष्ट' का अर्थ 'अनुशासन' है। अतः जो अनुशासित होगा वह शिष्ट आचरण वाला भी होगा। अनुशासन किसी व्यवस्था के नियमों या मर्यादाओं में बँधकर चलने की माँग करते हैं और शिष्टाचार दूसरों से यथायोग्य भद्र व्यवहार की।
- शीर्षक : शिष्टाचार
शिष्यचार का अर्थ शिष्ट आचरण होता है। शिष्टाचार अनुशासन का ही व्यावहारिक रूप है। शिष्ट अनुशासित को कहते हैं।
- मूल गद्यांश के कुल शब्द:
- संक्षेपण के कुल शब्द:
सामाजिक हिंसा सिर्फ राजनीति में ही नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों में भी फैल रही है। इस सामाजिक हिंसा का महिलाएँ सीधे शिकार बनती हैं। साथ में हमारे समाज के तमाम कामगार, आदिवासी, छोटे किसान और मजदूर जगह-जगह इस हिंसा को सह रहे हैं। आज यह राजनीति के साथ-साथ राजनीति को मुख्यधारा में भी शामिल हो गई है, जो भविष्य के लिए अच्छा नहीं है।
- शीर्षक : सामाजिक हिंसा
सामाजिक हिंसा के शिकार सामाजिक संबंध, राजनीति, महिलाएँ, कामगार, आदिवासी, छोटे किसान और मजदूर हो रहे हैं। यह भविष्य के लिए अच्छा नहीं है।
- मूल गद्यांश के कुल शब्द:
- संक्षेपण के कुल शब्द:
जीवन का वास्तविक आनन्द मनुष्य को अपने श्रम से प्राप्त होता है। जो सुबह से शाम तक अपना खून-पसीना एक करते हुए कर्म के क्षेत्र में डटा रहता है। चिंताएँ उससे दूर भागती हैं। ऐसे व्यक्ति को व्यर्थ की बातें सोचने का अवसर ही नहीं मिलता। परिश्रमी व्यक्ति को किसी बात की कमी नहीं। उसे अपनी आशाओं पर विश्वास होता है। फिर वह किसी के सामने हाथ फैलाये क्यों ? वह जानता है कि उसके पास दो हाथ हैं जिनसे अपने भाग्य का निर्माण किया जा सकता है।
- शीर्षक : परिश्रम का लाभ
परिश्रम ही बल है। मनुष्य अपने भाग्य को परिश्रम करके ही बदल सकता है। परिश्रम से ही मनुष्य में वह उपलब्धि को प्राप्त कर सकता है। जो किसी और चीज से प्राप्त नहीं किया जा सकता है। परिश्रम करके ही मनुष्य अपने भाग्य का निर्माण कर सकता है।
- मूल गद्यांश के कुल शब्द:
- संक्षेपण के कुल शब्द:
ज्ञानी लोग प्रायः मौन साधना इसलिए किया करते हैं कि उनकी जिह्वा से कभी आवेश में या उत्तेजना में अचानक कोई ऐसा कुवाक्य न निकल जाए, जिससे संसार को मुँह दिखाने में शर्म मालूम पड़े और उस समय ज्ञान एवं विद्धत्ता के होते हुए भी हम अपने को सुखी न कर सकें। जितनी मौन साधना की जाएगी, उतनी ही अधिक वाणी को सद्गति प्राप्त होगी तथा आत्मा को विश्व-तोषिणी शांति मिलेगी। प्राचीन भारत के ऋषि-मुनि निर्जन विपिन में वर्षों तक मौन साधना करके आत्मा के लिए दृढ़ चरित्र और जिह्वा के लिए शीतल अमृत वाणी उपलब्ध करते थे।
- शीर्षक : ज्ञानियों की मौन साधना
ज्ञानी मौन साधक होते हैं। वे मौन रहकर आत्मा के लिए दृढ़ चरित्र और जिह्वा के लिए अमृत वाणी उपलब्ध कराने वाले होते हैं। ज्ञानी कुवाक्य निकालने से डरते हैं।
- मूल गद्यांश के कुल शब्द:
- संक्षेपण के कुल शब्द:
भारत को त्योहारों का देश कहा जाता है। भारतीय त्योहार मुख्य रूप से | फसलों के त्योहार हैं। इसका कारण है, भारत का कृषि प्रधान देश होना। लगभग | सभी त्योहार धर्मों से संबंधित हैं। भारत अनेक धर्मों का देश है। यहाँ हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख, पारसी, ईसाई और इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग रहते हैं। सभी धर्मों को मानने वालों को अपने-अपने धर्म पालन और त्योहार मनाने की स्वतंत्रता है। इसलिए धार्मिक त्योहार भी विविधता लिए हुए हैं। इनसे एक-दूसरे के धर्मों को जानकर अच्छे मनुष्य बनने का भाव जागृत होता है। दशहरा, दीपावली, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, रामनवमी, ईद, मुहर्रम, गुरु पर्व, क्रिसमस, महावीर जयंती आदि धार्मिक त्योहार हैं।
- शीर्षक : त्योहारों का देश भारत
भारत को त्योहारों का देश माना जाता है। यहाँ अनेक त्योहारों को बड़ी उत्साह के साथ मनाया जाता है। यहाँ सभी त्योहार धर्मों से संबंधित है। भारत में अनेक धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं। सभी को अपना धर्म का पालन और अपना त्योहार मनाने की स्वतंत्रता है। इसलिए भारत की विविधता का देश भी कहा जाता है। भारत ने दशहरा, दीपावली, ईद, गुरुपर्व, क्रिसमस इत्यादि धर्मों को बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है।
- मूल गद्यांश के कुल शब्द:
- संक्षेपण के कुल शब्द:
हमारे देश में, जो हाल-हाल तक गुलाम बना रहा, नागरिक स्वतंत्रता का मूल्य समझना जरा कठिन है। अभी हमारे देश की जनता का ध्यान रोटी, कपड़ा, मकान और रोजगार की ओर गया है। प्रायः लोग यह कहते सुनाई देते हैं कि हमें इससे मतलब नहीं कि इस देश में किसका शासन है, जनतंत्र है या तानाशाही, हमें तो रोटी चाहिए, रोजगार चाहिए, दवा चाहिए। इन आवश्यकताओं को कोई भी पूरा कर दे। जनता की यह मानसिक स्थिति ठीक नहीं। यदि जनता की सूझ-बूझ ऐसी ही रही, तो फिर स्वतंत्रता, जो असीम बलिदान देकर प्राप्त की गई है, मिट जाएगी।
- शीर्षक : नागरिक की मनोस्थिति
अभी हमारे देश की जनता का ध्यान रोटी, कपड़ा, मकान और रोजगार की ओर गया है। आज हमारे देश में किसका शासन है, जनतंत्र है या तानाशाही, हमें इससे मतलब नहीं। यदि जनता की सूझ-बूझ ऐसी हो रही, तो फिर स्वतंत्रता, जो असीम बलिदान देकर प्राप्त की गई है, मिट जाएगी।
- मूल गद्यांश के कुल शब्द:
- संक्षेपण के कुल शब्द:
विगत एक-दो दशकों से युवा वर्ग में अपव्यय की प्रवृत्ति बढ़ रही है। भोगवाद की ओर युवक अधिक प्रवृत्त हो रहे हैं। वे सुख-सुविधा की प्रत्येक वस्तु पा लेना चाहते हैं और अपनी आय और व्यय में तालमेल बिठाने की उन्हे चिंता नहीं है। धन-संग्रह न सही, कठिन समय के लिए कुछ बचाकर रखना भी वे नहीं चाहते। उन्हें लुभावने विज्ञापनों के माध्यम से लुभाकर उत्पादक व्यवसायी भरमाते हैं। परिणामस्वरूप आज का युवक मात्र उपभोक्ता बनकर रह गया है। अनेक कम्पनियाँ और बैंक क्रेडिट कार्ड देकर उनकी खरीद-शक्ति को बढ़ाने का दावा करती है, बाद में निर्ममता से रकम वसूलते हैं।
- शीर्षक : भोगवादी युवा
विगत एक-दो दशकों में युवा वर्ग में फैशनपरस्ती की प्रवृत्ति बढ़ रही है। प्रत्येक वस्तु की भोग का साधन समझने की ओर युवा की प्रवृत्त हो रहे हैं। युवा अपनी आय और व्यय में तालमेल बिठाने की उन्हें चिंता नहीं है। परिणामस्वरूप आज का युवक मात्र उपभोक्ता बनकर रह गया है।
- मूल गद्यांश के कुल शब्द:
- संक्षेपण के कुल शब्द:
कबीर, नानक और दादू अत्यन्त मुक्त आत्माएँ थीं, जिनका आध्यात्मिक क्षितिज अत्यधिक फैला हुआ था और जिसमें धर्मांधता की छूत या साम्प्रदायिकता के लिए कोई जगह नहीं थी। यह किसी भी युग के लिए सबसे अधिक महत्व की बात है। उन्होंने धार्मिक झगड़ों को शांत करने का प्रयास किया तथा हिन्दू, मुसलमान और अन्य सम्प्रदायों की एकता के लिए अपनी तरफ से भरपुर कोशिश की।
- शीर्षक : धर्मनिरपेक्षता
धर्मनिरपेक्षता का अर्थ किसी के धर्म का विरोध करना नहीं है, बल्कि सभी को अपने धार्मिक विश्वासों एवं मान्यताओं को पूरी आजादी से मानने की छूट देता है। कबीर, नानक और दादू अत्यन्त मुक्त आत्माएँ थीं जो धार्मिक झगड़ों को शांत करने का प्रयास किया तथा एकता का पाठ पढ़ाया।
- मूल गद्यांश के कुल शब्द:
- संक्षेपण के कुल शब्द:
ज्ञान का समस्त भण्डार पुस्तकों में रहता है। प्रत्येक व्यक्ति इनसे अपनी-अपनी रुचि के अनुसार ज्ञान प्राप्त कर सकता है। संगीत, नृत्य, चित्रकला, लघुकथा, कविता, कहानी, उपन्यास, विज्ञान, इतिहास, कम्प्यूटर आदि का ज्ञान इन पुस्तकों से ही प्राप्त किया जा सकता है। अपनी-अपनी रुचि के अनुसार बालक से वृद्ध तक पुस्तकें पढ़ सकते हैं। जितने मनुष्य हैं, उनकी अपनी-अपनी रुचि है। वे अपने-अपने क्षेत्रों का ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं। इतना विविधतापूर्ण ज्ञान और विविध जानकारियाँ केवल पुस्तकें ही दे सकती हैं।
- शीर्षक : पुस्तक : ज्ञान का भण्डार
पुस्तकों में ही समस्त ज्ञान का भण्डार पाया जाता है। पुस्तकों से अनेक विषयों का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। चाहे वह वृद्ध हो या बालक हर एक मनुष्य की अपनी-अपनी रुचियाँ होती है। उसी के अनुसार वह सम्बंधित पुस्तकों का अध्ययन करता है। इसलिए पुस्तकें ज्ञान का भण्डार होती है।
- मूल गद्यांश के कुल शब्द:
- संक्षेपण के कुल शब्द:
भारत के लिए लोक अदालत कोई अपरिचित नाम नहीं है। यहाँ पंचों के माध्यम से विवाद के निपटारे की व्यवस्था अत्यन्त प्राचीन है। यह हमारी संस्कृति की पहचान है, जिसे विश्व के समृद्ध से समृद्ध राष्ट्र भी हमारी गौरव-निधि मानते हैं। यहाँ पहले जब न्याय पंचायतें नहीं थीं तो गाँव के चौपाल पर विवादों का निपटारा होता था। धीरे-धीरे देश में अदालती प्रथा की शुरुआत हुई। निःसंदेह अदालती प्रथा ने देश में विधिवत् विधि शासन व्यवस्था की स्थापना की, किन्तु यह औपचारिकताओं में इतनी जकड़ गयी कि लोग वर्षों तक न्याय के लिए तरसने लगे और न्यायालयों के प्रति आम आदमी की आस्था डगमगाने लगी।
- शीर्षक : लोक अदालत
लोक अदालत भारत में एक प्राचीन निपटान प्रणाली जिसे सबसे अमीर देशों की सांस्कृतिक पहचान और गौरव माना जाता है। शुरुआत में गाँव की चौपाल में बसने वाली अदालत प्रणाली ने एक उचित कानूनी प्रणाली स्थापित की लेकिन यह बहुत औपचारिक हो गयी।
- मूल गद्यांश के कुल शब्द:
- संक्षेपण के कुल शब्द:
किसी भी राष्ट्र या जाति में संजीवनी शक्ति भरने वाला साहित्य ही है। साहित्य की महत्ता को पूरे विश्व ने मिलकर स्वीकारा है। साहित्य समाज का दर्पण होता है। एक सभ्य समाज की कल्पना साहित्य के बिना नहीं की जा सकती, क्योंकि समाज को राह दिखाने वाला, उसका मार्गदर्शक साहित्य ही है। अनेक विद्वानों ने यह स्वीकार किया है कि साहित्य के बिना मानव का जीवन अधूरा है। इसलिए साहित्य का अध्ययन सबके लिए आवश्यक है। जिस प्रकार भोजन हमारी शारीरिक जरूरतों की पूर्ति करता है ठीक उसी प्रकार साहित्य हमारी मानसिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।
- शीर्षक : साहित्य तथा ज्ञान का संरक्षण
किसी राष्ट्र या जाति में ज्ञान का संचरण करने वाला पूर्वजों द्वारा चिरसंचित | ज्ञान वैभव साहित्य है जो समाज को प्रतिबिंबित करता है और सभ्य समाज के लिए | मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है। शारीरिक और मानसिक दोनों आवश्यकताओं | की पूर्ति के लिए साहित्य का अध्ययन हर किसी के लिए आवश्यक है।
- मूल गद्यांश के कुल शब्द:
- संक्षेपण के कुल शब्द:
क्रोध शान्ति भंग करने वाला मनोविकार है। एक का क्रोध दूसरे में भी क्रोध का ही संचार करता है। जिसके प्रति क्रोध प्रदर्शन होता है, वह तत्काल अपमान का अनुभव करता है और इस दुःख पर उसकी त्योरी भी चढ़ जाती है। यह विचार करने वाले बहुत थोड़े निकलते हैं कि हम पर जो क्रोध प्रकट किया जा रहा है, वह उचित है या अनुचित। इसी से धर्म, नीति और शिष्टाचार तीनों में क्रोध के विरोध का उपदेश पाया जाता है। संत लोग तो खलों के दुर्वचन सहते ही हैं।
- शीर्षक : क्रोध
क्रोध एक मानसिक विकार है, जो न केवल व्यक्ति को अशांत करता है | बल्कि अन्य लोगों को भी प्रभावित करता है। क्रोध सोचने की शक्ति को कमजोर कर देता है। इसी कारण धर्म, राजनीति और नैतिकता सभी में क्रोध का विरोध किया गया है। विवेकशील व्यक्ति क्रोध को अनुचित मानते हैं और संयम को ही श्रेष्ठ मानते हैं।
- मूल गद्यांश के कुल शब्द:
- संक्षेपण के कुल शब्द:
मनुष्य सुख की खोज में आदिकाल से रहा है। इसी की प्राप्ति उसके जीवन का सदैव मुख्य उद्देश्य रहा है। दुःख से वह इतना घबराता है कि इस जीवन में ही नहीं आनेवाले जीवन के लिए भी ऐसी व्यवस्था करना चाहता है कि वहाँ भी वह सुख का उपभोग कर सके। जन्नत और स्वर्ग, मोक्ष और निर्वाण सब उसकी आकांक्षाओं की रचनाएँ हैं। सुख प्राप्ति के लिए ही हमने जीवन को निःसार और संसार को अनित्य कहा है।
- शीर्षक : सुख की खोज
मनुष्य प्रारंभ से ही सुख की खोज में लगा हुआ है, और यही उसके जीवन | का प्रमुख उद्देश्य है। सुख प्राप्त करने की लालसा में ही उसने जीवन को क्षणिक | और संसार को असत्य माना है, क्योंकि यह पूर्ण संतोष नहीं दे पाते।
- मूल गद्यांश के कुल शब्द:
- संक्षेपण के कुल शब्द:
व्यक्ति दो प्रकार के होते हैं। एक तो वे, जो विश्व में फैले हुए ज्ञान से तन्तु चुन लेते हैं। फिर अपने ही तन्तु-संग्रह से वे चकित हो उठते हैं और उसे विश्व के सामने रख देते हैं। दूसरे वे हैं, जो यत्नशील बाँसुरी वादक की तरह अस्फुट 'स्वरों से मधुर और कोमल संगीत बनाते हुए दुनिया के विचारों से एक विचार-समूह का निर्माण करते हैं। उनके विचारों की सम्पत्ति किसी प्रत्यक्ष व्यक्ति, घटना या दृश्य से या कल्पना की उड़ानों से जागृत होती है और उसे जमाने को सौंप देने में वे अपना ईमानदार कर्त्तव्य समझते हैं।
- शीर्षक : विचारकों के प्रकार
विश्व में दो तरह के विचारक होते हैं- पहले वे जो उपलब्ध ज्ञान का संग्रह | करते हैं, और दूसरे वे जो अनुभवों एवं कल्पनाओं से नए मौलिक विचारों का सृजन | कर उन्हें समाज को समर्पित करना अपना कर्तव्य समझते हैं।
- मूल गद्यांश के कुल शब्द:
- संक्षेपण के कुल शब्द:
साहित्योन्नति के साधनों में पुस्तकालयों का स्थान महत्त्वपूर्ण है। इनके द्वारा साहित्य के जीवन की रक्षा, पुष्टि और अभिवृद्धि होती है। पुस्तकालय सभ्यता के इतिहास का जीता-जागता गवाह है। इसी के बल पर वर्तमान भारत को अपने गौरवपूर्ण अतीत पर गर्व है। पुस्तकालय भारत के लिए कोई नयी वस्तु नहीं है। लिपि के आविष्कार से आज तक लोग निरन्तर पुस्तकों का संग्रह करते रहे हैं। आजकल साधारण स्थिति के पुस्तकालय में जितनी सम्पत्ति लगती है, उतनी उन दिनों कभी-कभी एक पुस्तक की तैयारी में लग जाया करती थी। चीन, फ्रांस आदि सुदूर स्थित देशों से झुण्ड के झुण्ड विद्यानुरागी लम्बी यात्राएँ करके भारत आया करते थे।
- शीर्षक : ज्ञान की विरासत : पुस्तकालय
पुस्तकालय. का महत्त्व पुस्तकालय साहित्य के संरक्षण और सभ्यता के विकास के आधार स्तंभ हैं। भारत में प्राचीन काल से ही ज्ञान-संग्रह की समृद्ध | परंपरा रही है, जिसने वैश्विक स्तर पर विद्वानों को सदैव आकर्षित किया है।
- मूल गद्यांश के कुल शब्द:
- संक्षेपण के कुल शब्द:
संक्षेपण करें (BSEB Arts PYQ) :
वर्तमान युग में जिस भीषणता के साथ जीवन-संघर्ष चल रहा है, उसमें वह व्यक्ति कभी भी विजयी नहीं हो सकता, जो चुपचाप बैठ कर अति दीर्घकाल तक सोचता-विचारता रहेगा। यहाँ तो वही टिक सकता है, जिसमें काफी स्फूर्ति है, जो दूसरों को ढकेलकर आगे बढ़ सकता है; नहीं तो जो उससे ताकतवर है उसे किनारे ढकेल देगा और आप आगे बढ़ जायेगा। अगर तुम इस जीवन में कुछ करना चाहते हो, अगर तुम्हें अपना जीवन सफल बनाना है तो तुम्हें प्रत्युत्पन्नमति होना चाहिए, अपने निर्णय पर दृढ़ रहना चाहिए और उस पर जमकर काम करना चाहिए। जिस व्यक्ति में ये गुण पाये जाते हैं, उसमें अन्य गुणों का समावेश भी रहता है।
- शीर्षक : जीवन संघर्ष
आज भीषण जीवन-संघर्ष चल रहा है। स्फूर्तिवान और ताकतवर लोग ही यहाँ टिक सकते हैं। जीवन में सफल होने के लिए प्रत्युत्पन्नतित्ववान दृढ़ एवं कर्मशील होना होगा। ऐसे गुण-सम्पन्न लोगों में अन्य गुण भी आ जाते हैं।
- अवतरण में आए कुल शब्द: 112
- प्रयुज्य शब्द: 37
- प्रयुक्त शब्द: 37
मित्र का कर्त्तव्य इस प्रकार बतलाया गया है-" उच्च और महान कार्यों में इस प्रकार सहायता देना, बढ़ावा देना और साहस दिलानी कि तुम अपनी निजी सामर्थ्य से बाहर काम कर जाओ।" यह कर्त्तव्य उसी से पूरा होगा जो दृढ़ चित्त और सत्य संकल्प का हो। इसमें हमें ऐसे ही मित्रों की खोज में रहना चाहिए जिनमें अधिक आत्मबल हो। हमें उसका पल्ला उसी तरह पकड़ना चाहिए, जिस तरह सुग्रीव ने राम का पल्ला पकड़ा था।
- शीर्षक : मित्र का कर्त्तव्य
मित्र का कर्त्तव्य है अपने मित्र की सहायता करना, बढ़ावा देना और साहस दिलाना। हमें भी आत्मबली मित्र की खोज करना होगा, जैसे सुग्रीव ने राम को खोजा।
- अवतरण में आए कुल शब्द: 76
- प्रयुज्य शब्द: 25
- प्रयुक्त शब्द: 28
राजनीतिक दाँव-पेंच के इस युग में चुनाव व्यवसाय बना है। चुनाव में 'मतदाताओं को ठगने एवं उनको मायाजाल में फँसाने के लिए रंग-बिरंगें वायदे किए जाते हैं। गरीबी हटाने, बेरोजगारी मिटाने, सड़क बनवाने, स्कूल खुलवाने, नौकरी दिलवाने आदि अनेक प्रकार के वायदे चुनाव के समय किए जाते हैं। गरीबी और बेरोजगारी को हटाने के लिए उद्योगों की स्थापना करनी होगी, नयी परियोजनाओं का संचालन करना होगा। शिक्षा को रोजगार से जोड़ना होगा, न कि केवल चुनावी वायदों का कोरे वाग्जाल फैलाकर मतदाता को फँसाकर रखने से गरीबी और बेरोजगारी हटेगी। चुनावी वायदों की रंगीन परिकल्पनाओं से मतदाता की आस्था धीरे-धीरे समाप्त होने लगेगी।
- शीर्षक : चुनावी वादे
राजनीतिक दाँव-पेंच के इस युग में चुनाव व्यवसाय बना है। झूठे सच्चे वायदे किए जाते हैं। गरीबी और बेरोजगारी मिटाने के लिए उद्योगों की स्थापना करनी होगी। शिक्षा को रोजगार से जोड़ना होगा। मतदाता की आस्था कायम रखनी होगी।
- अवतरण में आए कुल शब्द: 103
- प्रयुज्य शब्द: 35
- प्रयुक्त शब्द: 38
स्वतंत्रता अपने आप में निरपेक्ष नहीं है। एक सीमा पार कर जाने के बाद स्वतंत्रता स्वेच्छाचारिता और उच्छृंखलता में बदल जाती है, पर काले बाजार की अथवा लूटने की स्वतंत्रता नहीं है। हम एक पागल को मोटर चलाने की स्वतंत्रता नहीं दे सकते; जबकि एक सामान्य नागरिक जो मोटर चलाना जानता है, मोटर चलाने की आज्ञा प्राप्त करने में, कोई कठिनाई नहीं होती। हमको लाउडस्पीकर पर गाने की स्वतंत्रता है किन्तु हमारे गाने से हमारे पड़ोसी के सोने की स्वतंत्रता में हानि नहीं होनी चाहिए। जो स्वतंत्रता हमें प्राप्त है, वह दूसरे की स्वतंत्रता में बाधक नहीं होनी चाहिए। हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि हर स्वतंत्रता के साथ एक दायित्व का प्रश्न जुड़ा हुआ है।
- शीर्षक : स्वतंत्रता और स्वेच्छाचारिता
स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं होती। सीमा पार कर जाने पर स्वेच्छाचारिता और उच्छृंखलता में बदल जाती है। पागल को स्वतंत्रता नहीं दी जा सकती। लाउडस्पीकर धीरे बजाना होगा या नहीं बजाना होगा।
- अवतरण में आए कुल शब्द: 99
- प्रयुज्य शब्द: 33
- प्रयुक्त शब्द: 31
प्रत्येक मनुष्य के जीवन में उद्देश्य होना चाहिए। यदि तुम्हारा कोई उद्देश्य नहीं है तो तुम सफल न होगे। क्या करोगे इसको तुम्हें जानना आवश्यक है। उद्देश्यहीन मनुष्य बिना पतवार की नाव की तरह है। विभिन्न मनुष्यों के विभिन्न उद्देश्य होते हैं। बहुत लोग धन कमाना चाहते हैं। धन कमाना ही उनका उद्देश्य है। कुछ लोग आनंद उठाना चाहते हैं। कुछ लोग विद्या के लिए परेशान हैं। तुम्हारा उद्देश्य देश की सेवा करना होना चाहिए। तुम्हारा देश दरिद्र है। यहाँ के किसान सरल और पवित्र हैं। वे भूमि को अच्छा बनाकर अपनी मेहनत की अच्छी मजदूरी नहीं निकाल सकते, तुम उन्हें योग्य और सफल किसान बनाने का उद्योग करो।
- शीर्षक : हमारा उद्देश्य
प्रत्येक व्यक्ति कुछ-न-कुछ उद्देश्य लेकर श्रमशील हैं। कुछ धन कुछ विद्या तो कुछ सम्मान प्राप्त करने का उद्देश्य रखते हैं। किन्तु हमारा सर्वोत्तम उद्देश्य देश सेवा होना चाहिए।
- अवतरण में आए कुल शब्द: 109
- प्रयुज्य शब्द: 36
- प्रयुक्त शब्द: 30
ज्ञान का समस्त भण्डार पुस्तकों में रहता है। प्रत्येक व्यक्ति इनसे अपनी-अपनी रुचि के अनुसार ज्ञान प्राप्त कर सकता है। संगीत, नृत्य, चित्रकला, लघुकथा, कविता, कहानी, उपन्यास, विज्ञान, इतिहास, कम्प्यूटर आदि का ज्ञान इन पुस्तकों से ही प्राप्त किया जा सकता है। अपनी-अपनी रुचि के अनुसार बालक से वृद्ध तक पुस्तके पढ़ सकते हैं। जितने मनुष्य हैं, उनकी अपनी-अपनी रुचियाँ हैं। वे अपने-अपने क्षेत्रों का ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं। इतना विविधतापूर्ण ज्ञान और विविध जानकारियाँ केवल पुस्तकें ही दे सकती हैं।
- शीर्षक : पुस्तकों का महत्त्व
ज्ञान का समस्त भण्डार पुस्तकों में रहता है। प्रत्येक व्यक्ति इनसे अपनी-अपनी रुचि के अनुसार ज्ञान प्राप्त कर सकता है। विविधतापूर्ण ज्ञान और विविध जानकारियाँ केवल पुस्तकें ही दे सकती हैं।
- अवतरण में आए कुल शब्द: 82
- प्रयुज्य शब्द: 27
- प्रयुक्त शब्द: 31
जीवन में बहुत सी चीजें जरूरी हैं। मगर पानी सबसे ज्यादा जरूरी है। अन्न के बिना दो चार दिनों तक रहना संभव है, मगर पानी के बिना एक दिन गुजारना भी कठिन है। ऐसी हालत में हमारे देश में पीने के पानी की समस्या का बने रहना घोर लज्जा का विषय है। हमारी सरकार को चाहिए कि वह इस ओर तत्काल ध्यान दे। ऐसा नहीं करने से हम भारतीयों का जीवन पशु से भी बदतर हो जाएगा।
- शीर्षक : पानी की महत्ता
जीवन में पानी सबसे ज्यादा जरूरी है। अन्न के बिना हम जी सकते हैं। पर पानी के बिना जीना कठिन है। सरकार को देश में पानी की कमी की समस्या दूर करनी चाहिए।
- अवतरण में आए कुल शब्द: 77
- प्रयुज्य शब्द: 26
- प्रयुक्त शब्द: 33
मनुष्य का मन सदैव गतिशील रहता है। ऐसा होता है कि विरोधी शक्तियाँ उसे अपनी ओर खींचती हैं। जो मनुष्य मन की विपरीत परिस्थितियों में अपने को मजबूती से खड़ा नहीं रख सकते और उस धारा के साथ बह जाते हैं वे कभी अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर सकेंगे। उनके लिए तो यही कहना उचित होगा कि वे जीवित रहते हुए भी मुर्दे के समान हैं। मन की अवस्था तो सभी की पलटती है। जो व्यक्ति समय और परिस्थिति को समझ लेते हैं वे कभी धोखा नहीं खा सकते और कठिनाइयों के बीच भी अपना रास्ता खोज लेते हैं। दूसरी ओर कुछ ऐसे लोग भी मिलेंगे जो अपनी प्रतिकुल मनोदशा से त्रस्त होकर चुपचाप बैठ जाते हैं। उनका जीवन नारकीय बन जाता है।
- शीर्षक : विपरीत परिस्थितियाँ और मन
मनुष्य का मन सदैव गतिशील रहता है। विरोधी परिस्थितियाँ उसे चुनौती देती रहती हैं। जो इस लड़ाई में हार जाता है वह मुर्दे के समान है। जो समय और परिस्थिति को समझ लेते हैं वे धोखा नहीं खाते। वे अपना सही रास्ता खोज लेते हैं।
- अवतरण में आए कुल शब्द: 124
- प्रयुज्य शब्द: 41
- प्रयुक्त शब्द: 45
अंग्रेजी पढ़ना खराब नहीं है, पर अंग्रेजी पढ़कर अंग्रेज हो जाना खराब है। अंग्रेजी पढ़कर अपने देश को, अपनी भाषा को, अपनी संस्कृति को भूल जाना खराब है। यह बात मैं इसलिए कह रहा हूँ कि आज के अधिकतर अंग्रेजी पढ़े-लिखे सज्जन अपने देश के प्रत्येक व्यक्ति को हीन दृष्टि से देखते हैं, उसकी आलोचना करते हैं और उसे अपनाने में अपनी मानहानि समझते हैं। पर्व को ही लीजिए। पढ़े लिखे लोग कहते हैं कि यह स्त्रियों का ढोंग है। यह पंडितों का पोंगा है। वे कहते हैं, पर्व बेकार हैं। ये फिजूलखर्ची के साधन हैं।
- शीर्षक : अंग्रेजी शिक्षा का दुष्प्रभाव
अंग्रेजी पढ़ना खराब नहीं, किन्तु अंग्रेज बनकर अपनी सभ्यता-संस्कृति को भूल जाना, उसका अपमान करना खराब है। अंग्रेजी पढ़कर नई पीढ़ी दिशाहीन होकर अव्यवहारिक बन गई है। हमें विवेक के साथ चिंतन करते हुए निरर्थक बातों से बचना चाहिए।
- अवतरण में आए कुल शब्द: 95
- प्रयुज्य शब्द: 32
- प्रयुक्त शब्द: 40
डॉक्टर ग्रियर्सन के अनुसार-बुद्धदेव के भारत में सबसे बड़े लोकनायक तुलसीदास थे। वे असाधारण प्रतिभा लेकर उत्पन्न हुए थे। जिस युग में इनका जन्म हुआ था, उस युग के समाज के सामने कोई ऊँचा आदर्श नहीं था। समाज के उच्च स्तर के लोग विलासिता के पंक में उसी तरह मग्न थे, जिस प्रकार कुछ वर्ष पूर्व सूरदास ने देखा था। निचले स्तर के पुरुष और स्त्री दरिद्र, अशिक्षित और रोगग्रस्त थे। बैरागी हो जाना मामूली बात थी। जिसके घर की सम्पत्ति नष्ट हो गई या स्त्री मर गई, संसार में कोई आकर्षण नहीं रहा, वह तुरन्त संन्यासी हो गया।
- शीर्षक : तुलसी युग
डॉ० ग्रियर्सन के अनुसार बुद्ध के बाद तुलसीदास सबसे बड़े लोकनायक थे। उनके समय में आदर्श विहीन जनता भोग-रोग से पीड़ित थी। धनहीन और विधुर लोग तुरंत संन्यासी बन जाते थे।
- अवतरण में आए कुल शब्द: 100
- प्रयुज्य शब्द: 33
- प्रयुक्त शब्द: 32
पृथ्वी माता है, मैं उसका पुत्र हूँ। यही स्वराज्य की भावना है। जब प्रत्येक व्यक्ति, जिस पृथ्वी पर उसका जन्म हुआ है, उसे अपनी मातृभूमि समझने लगता है, तो उसका मन मातृभूमि से जुड़ जाता है। मातृभूमि उसके लिए देवता के समान है। जीवन में चाहे जैसा अनुभव हो, वह मातृभूमि से द्रोह की बात नहीं सोचता, मातृभूमि के प्रति जब यह भाव दृढ़ हो जाता है, तब वहीं से सच्ची राष्ट्रीय एकता का जन्म होता है। उस स्थिति में मातृभूमि पर बसने वाले नागरिकगण एक-दूसरे से सौदा करने या शर्त तय करने की बात नहीं सोचते, बल्कि मातृभूमि के प्रति अपने कर्त्तव्य की बात सोचते हैं।
- शीर्षक : मातृभूमि/राष्ट्रीय एकता
जब प्रत्येक व्यक्ति का मन मातृभूमि से जुड़ जाता है तब वह मातृभूमि से द्रोह की बात नहीं सोचता। वहीं से सच्ची राष्ट्रीय एकता का जन्म होता है। वे मातृभूमि के प्रति अपने कर्त्तव्य की बात सोचते हैं।
- अवतरण में आए कुल शब्द: 106
- प्रयुज्य शब्द: 35
- प्रयुक्त शब्द: 38
आज की भागदौड़ के इस युग में न केवल व्यापारी, वकील, अभिनेता, शिक्षक, चिकित्सक, इंजीनियर और प्रबंधक ही तनाव के शिकार हैं, बल्कि अपने कैरियर और परीक्षा से चिंतित छात्र-छात्राएँ भी कम तनावग्रस्त नहीं हैं। इसका बुरा प्रभाव उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है। कुछ लोग आर्थिक तंगी के कारण तनावग्रस्त हैं, तो कुछ सभी प्रकार की सुविधाओं से सम्पत्र होते हुए भी उन्हें बनाए रखने और निरन्तर बढ़ाने की भाग-दौड़ में तनावग्रस्त हैं। यह तनाव हृदय रोग, अल्सर, मधुमेह और दूसरी कई बीमारियों का कारण बन रहा है। तनाव और भागदौड़ के कारण व्यक्ति अपने खानपान तक की उपेक्षा करता है। गंभीर समस्याओं से जूझते हुए उसे इतना भी समय नहीं मिल पाता कि वह अपने घर-परिवार, संगे-संबंधियों के साथ फुरसत से बैठ सके।
- शीर्षक : तनावग्रस्तता
आधुनिक भागदौड़ मेरे इस युग में सभी तनाव के शिकार हैं। कोई अपने कैरियर का परीक्षा, आमदनी का स्त्रोत, कोई आर्थिक तंगी, सुविधाओं को बनाए रखना आदि किसी-न-किसी कारण से तनावग्रस्त हैं। यह तनाव विभिन्न रोगों का कारण है। इसके कारण लोग-भोजन, परिजन, मनोरंजन सबकी उपेक्षा करता है।
- अवतरण में आए कुल शब्द: 128
- प्रयुज्य शब्द: 43
- प्रयुक्त शब्द: 50
विगत एक-दो दशकों से युवा वर्ग में अपव्यय की प्रवृत्ति बढ़ रही है। भोगवाद की ओर युवक अधिक प्रवृत्त हो रहे हैं। वे सुख-सुविधा की प्रत्येक वस्तु पा लेना चाहते हैं और अपनी आय और व्यय में तालमेल बिठाने की उन्हें चिन्ता नहीं रहती है। धन-संग्रह न सही, कठिन समय के लिए कुछ बचाकर रखना भी वे नहीं चाहते। लुभावने विज्ञापनों के माध्यम से लुभाकर उत्पादक व्यवसायी उन्हें भरमाते हैं। परिणामस्वरूप आज का युवक मात्र उपभोक्ता बनकर रह गया है। अनेक कम्पनियाँ क्रेडिट कार्ड देकर उनकी खरीद-शक्ति को बढ़ाने का दावा करती हैं।
- शीर्षक : युवकों में बढ़ती उपभोक्ता-प्रकृ
युवा वर्ग में अपव्यय की प्रवृत्ति बढ़ रही है। भोगवाद उन्हें पसंद आ रहा है। युवक आय-व्यय में तालमेल बैठाना नहीं चाहते हैं। विज्ञापन, व्यवसायी और क्रेडिट कार्ड के चक्कर में युवक फँसे जा रहे हैं।
- अवतरण में आए कुल शब्द: 93
- प्रयुज्य शब्द: 31
- प्रयुक्त शब्द: 36
मनुष्य का सबसे प्रथम गुण साहस है। साहसी की प्रतिभा के सामने शोक, भय भाग जाते हैं। साहसी को संसार भी रास्ता दे देता है। मनुष्य में सब गुण हों-वह विद्वान हो, धनवान हो, शक्तिशाली हो, पर यदि उसमें साहस न हो तो वह अपने सद्गुणों का, अपनी योग्यताओं व अपनी शक्तियों का उपयोग नहीं कर सकता। साहस मनुष्य के व्यक्तित्व का नायक है। साहस व्यक्ति को निर्भय बनाता है और जहाँ निर्भयता होती है, वहाँ सफलता निश्चित है। निर्भयता से ही आत्मविश्वास जाग्रत होता है।
- शीर्षक : साहस की महत्ता
मनुष्य का सबसे प्रथम गुण साहस है। साहस के अभाव में विद्वता, धन-सम्पन्नता और शक्तिमानता महत्त्वहीन हो जाती है। शोकाकुलता और भयशीलता घेर लेती है। साहस मनुष्य के व्यक्तित्व का नायक है।
- अवतरण में आए कुल शब्द: 87
- प्रयुज्य शब्द: 29
- प्रयुक्त शब्द: 32
ज्ञानी लोग प्रायः मौन साधना इसलिए किया करते हैं कि उनकी जिह्वा से कभी आवेश में या उत्तेजना में अचानक कोई ऐसा कुवाक्य न निकल जाए, जिससे संसार को मुँह दिखाने में शर्म मालूम पड़े। जितनी मौन साधना की जाएगी, उतनी ही अधिक वाणी को सद्गति प्राप्त होगी तथा आत्मा को विश्व-तोषिणी शांति मिलेगी। प्राचीन भारत के ऋषि-मुनि निर्जन विपिन में वर्षों तक मौन-साधना करके आत्मा के लिए दृढ़ चरित्र और जिह्वा के लिए शीतल अमृत वाणी उपलब्ध करते थे।
- शीर्षक : मौन साधना
शीतल अमृत वाणी, उत्तेजना व कुवाक्य का निरोध और विश्वतोषिणी शांति के लिए ही ज्ञानी लोग मौन साधना करते हैं।
- अवतरण में आए कुल शब्द:
- प्रयुज्य शब्द:
- प्रयुक्त शब्द:
महानगरों में जो सभ्यता फैली है, वह छिछली और हृदयहीन है। लोगों के पारस्परिक मिलन के अवसर तो बहुत हो गए हैं, मगर इस मिलन में हार्दिकता नहीं होती, मानवीय संबंधों में घनिष्ठता नहीं आ पाती। दफ्तरों, ट्रामों, बसों, रेलों, सभाओं और संस्थानों में आदमी हर समय भीड़ में रहता है, मगर इस भीड़ के बीच वह अकेला होता है। मनुष्य के लिए मनुष्यत्व के भीतर पहले जो माया, ममता, सहानुभूति के भाव थे, वे अब लापता, लुप्त होते जा रहे हैं। देशों की पारस्परिक दूरी घट गई है, लेकिन आदमी और आदमी के बीच की दूरी बढ़ती जा रही है।
- शीर्षक : महानगरीय सभ्यता
महानगर की सभ्यता छिछली और हृदयहीन है। महानगरों में सर्वत्र भीड़ है, लेकिन व्यक्ति अकेला है। आदमी-आदमी के बीच दूरी बढ़ती जा रही है।
- अवतरण में आए कुल शब्द:
- प्रयुज्य शब्द:
- प्रयुक्त शब्द:
मनुष्य उत्सवप्रिय होते हैं। उत्सवों का एकमात्र उद्देश्य आनन्द-प्राप्ति है। मनुष्य अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए आजीवन प्रयत्न करता है। आवश्यकता की पूर्ति होने पर सभी सुख होता है। पर, उस सुख और उत्सव के आनंद में बड़ा अंतर है। आवश्यकता अभाव सूचित करती है। उससे यह प्रकट होता है कि हममें किसी बात की कमी है। मनुष्य-जीवन ही ऐसा है कि वह किसी भी अवस्था में यह अनुभव नहीं कर सकता कि अब उसके लिए कोई आवश्यकता नहीं रह गई है। एक के बाद दूसरी वस्तु की चिंता उसे सताती ही रहती है।
- शीर्षक : उत्सव और अभाव
मानव का एकमात्र उद्देश्य आनंद-प्राप्ति है। उस प्राप्ति हेतु उत्पन्न अभाव ही उसे उस ओर ले जाती है। उस सुख का आनंद पाकर मनुष्य आगे की चिन्ता में लग जाता है क्योंकि उसे उत्सव चाहिए होता है।
- अवतरण में आए कुल शब्द:
- प्रयुज्य शब्द:
- प्रयुक्त शब्द:
🎓 परीक्षा-विशेष बिंदु (Exam Points)
- BSEB/CBSE (Class 6-12): आमतौर पर यह प्रश्न 4 से 5 अंकों का पूछा जाता है, जिसमें 1 अंक शीर्षक के लिए और 3-4 अंक सही संक्षेपण के लिए होते हैं।
- प्रतियोगी परीक्षा (SSC, CUET, SBTE): यहाँ शब्द सीमा का कड़ाई से पालन देखा जाता है। तय सीमा से 5-10 शब्द आगे-पीछे होने पर अंक कट सकते हैं।
- व्याकरणिक शुद्धता: लिंग, वचन और कारक का तालमेल सही होना चाहिए।
📌 निष्कर्ष (Conclusion)
संक्षेपण-लेखन केवल एक परीक्षा का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह आपके विश्लेषण कौशल (Analytical Skills) और कम शब्दों में प्रभावी ढंग से बात रखने की कला को दर्शाता है। नियमित अभ्यास से इस कला में निपुणता हासिल की जा सकती है।
संक्षेपण-लेखन हिंदी व्याकरण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यावहारिक विषय है। यह कौशल न केवल BSEB, CBSE, और SBTE जैसी बोर्ड परीक्षाओं में अच्छे अंक दिलाने में मदद करता है, बल्कि SSC और CUET जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं (Competitive Exams) में भी सफलता की कुंजी है।
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