🧬 पादप प्रजनन एवं आनुवंशिकी (Plant Breeding & Genetics)
यह संकलित और डिजिटल नोट्स BSEB (Bihar Board), CUET, JET Agriculture, MHT CET, BPSC, UPSC, SSC, RRB एवं अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के नवीनतम पाठ्यक्रम के अनुसार सरल व आकर्षक शैली में तैयार किया गया है।
🎯 मुख्य विषय-सूची (Quick Navigator)
- अध्याय 1: मेंडल के आनुवंशिक नियम, सफलता व असफलता 👨ायने
- अध्याय 2: गुणात्मक एवं मात्रात्मक लक्षण (बहुकारक परिकल्पना) 📊
- अध्याय 3: पादप प्रजनन — इतिहास, उद्देश्य एवं उपलब्धियाँ 🌾
- अध्याय 4: संकर ओज (Heterosis) और अंतःप्रजनन ह्रास 💥
- अध्याय 5: फसल सुधार की प्रजनन विधियाँ (वरण, पुरःस्थापन) 🔄
- अध्याय 6: उत्परिवर्तन (Mutation) एवं बहुगुणिता (Polyploidy) ⚡
- अध्याय 7: पादप जैव प्रौद्योगिकी एवं आनुवंशिक अभियंत्रण 🔬
- अध्याय 8: पादप आनुवंशिक संसाधन (Germplasm) व संरक्षण 🎒
- अध्याय 9: बीज — गठन, श्रेणियाँ, प्रमाणीकरण व विमोचन 🏷️
- अध्याय 10: बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) एवं पेटेंट 📜
👨ायने अध्याय 1: मेंडल के आनुवंशिक नियम, सफलता व असफलता
1.1 परिचय एवं इतिहास
- जनक: ग्रेगर जोहान मेंडल (1822-1884) को आनुवंशिकी का जनक (Father of Genetics) कहा जाता है.
- शोधपत्र: इन्होंने मटर (Pisum sativum) पर प्रयोग कर 1865 में नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी ऑफ ब्रुन के समक्ष शोधपत्र प्रस्तुत किया.
- पुनः खोज: मेंडल के नियमों की पुनः खोज वर्ष 1900 में तीन वैज्ञानिकों ने स्वतंत्र रूप से की:
- ह्यूगो डी व्रीज (हॉलैंड)
- कार्ल कोरेंस (जर्मनी)
- एरिक वॉन शर्माक (ऑस्ट्रिया)
1.2 मेंडल की असफलता व सफलता के कारण (Exam Points)
- असफलता के कारण: गणित का अत्यधिक प्रयोग, जीन्स/गुणसूत्रों के ज्ञान का अभाव, डार्विन के विवादों में वैज्ञानिकों का व्यस्त होना तथा हॉकवीड (Hieracium) पौधे पर प्रयोग में असंगजनन (Apomixis) के कारण विपरीत परिणाम मिलना.
- सफलता के कारण: एक समय में सीमित लक्षणों का अध्ययन, सांख्यिकीय/गणितीय रिकॉर्ड रखना और मटर के पौधे में स्पष्ट 7 विपर्यासी (Contrasting) लक्षणों का मिलना.
1.3 मेंडल के नियम व शब्दावली
- विसंयोजन का नियम (Law of Segregation): इसे 'युग्मकों की शुद्धता का नियम' भी कहते हैं। युग्मक बनते समय एलील एक-दूसरे से अलग होकर पृथक युग्मकों में चले जाते हैं.
- एकसंकर संकरण (Monohybrid) अनुपात:
- लक्षणप्ररूपी (Phenotypic) अनुपात: 3 : 1
- जीनप्ररूपी (Genotypic) अनुपात: 1 : 2 : 1 (
)
- एकसंकर संकरण (Monohybrid) अनुपात:
- स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम (Law of Independent Assortment): जब दो या दो से अधिक लक्षणों की वंशागति का अध्ययन किया जाता है, तो एक लक्षण का विसंयोजन दूसरे से पूर्णतः स्वतंत्र होता है.
- द्विसंकर संकरण (Dihybrid) अनुपात: 9 : 3 : 3 : 1 (जैसे: गोल-पीले, गोल-हरे, झुर्रीदार-पीले, झुर्रीदार-हरे).
🔍 परीक्षार्थ संकरण (Test Cross): जब
संकर ( ) का संकरण उसके द्विअप्रभावी जनकों ( ) से कराया जाता है। स्वतंत्र अपव्यूहन में इसका अनुपात हमेशा 1 : 1 : 1 : 1 आता है.
📊 अध्याय 2: गुणात्मक एवं मात्रात्मक लक्षण (बहुकारक परिकल्पना)
2.1 लक्षणों में अंतर
| विशेषता | गुणात्मक लक्षण (Qualitative) | मात्रात्मक लक्षण (Quantitative) |
|---|---|---|
| विविधता | असतत् (Discontinuous) (उदा: लंबा या बौना) | सतत् (Continuous) (उदा: पौधों की उपज) |
| नियंत्रण | 1 या 2 प्रमुख जीन्स (Oligogenes) द्वारा | अनेक लघु जीन्स (Polygenes) द्वारा |
| वातावरण का प्रभाव | बहुत कम | अत्यधिक प्रभाव |
2.2 बहुकारक परिकल्पना (Multiple Factor Hypothesis) 🌾
- प्रतिपादक: निल्सन-एहले (1908) ने गेहूँ और जई के दानों के रंग पर अध्ययन कर इसे प्रस्तुत किया.
- सिद्धांत: मात्रात्मक लक्षण कई लघु एवं योगशील (Additive) प्रभाव वाले जीनों द्वारा नियंत्रित होते हैं.
- परिणाम: गेहूँ के दानों के रंग की वंशागति में द्विसंकर पीढ़ी में
का अनुपात वास्तव में 1 : 4 : 6 : 4 : 1 के रूप में बंटा होता है (गाढ़ा लाल से सफेद तक). - वंशागतित्व (Heritability): आनुवंशिक प्रसरण और लक्षणप्ररूपी प्रसरण के प्रतिशत अनुपात को कहते हैं। इसका मान अधिक होने पर वरण (Selection) अधिक प्रभावी होता है.
🌾 अध्याय 3: पादप प्रजनन — इतिहास, उद्देश्य एवं उपलब्धियाँ
3.1 परिभाषा व उद्देश्य
- परिभाषा: फसलों के जीनप्ररूप में मानव उपयोगी एवं आर्थिक लाभ के लिए असीमित परिवर्तन करने की कला और विज्ञान को पादप प्रजनन (Plant Breeding) कहते हैं.
- उद्देश्य: अधिक उपज, गुणवत्ता में सुधार, कीट व रोग रोधिता, प्रसुप्ति (Dormancy) नियंत्रण तथा अजैविक प्रतिबल रोधिता.
3.2 महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाएँ 📅
- 700 ई०पू०: बैबिलोन निवासियों द्वारा खजूर में कृत्रिम परागण.
- 1717: थॉमस फेयरचाइल्ड द्वारा प्रथम कृत्रिम संकर "फेयरचाइल्ड म्यूल" का निर्माण.
- 1903: जोहन्सेन द्वारा शुद्ध वंशक्रम सिद्धांत (Pureline Theory) का प्रतिपादन.
- 1905: पूसा, समस्तीपुर (बिहार) में इम्पीरियल कृषि अनुसंधान संस्थान (अब IARI, दिल्ली) की स्थापना.
- 1960: भारत के प्रथम कृषि विश्वविद्यालय (GBPUAT, पंतनगर) की स्थापना.
3.3 पादप प्रजनन की ऐतिहासिक उपलब्धियाँ 🏆
- गेहूँ की बौनी किस्में: डॉ. नॉर्मन बोरलॉग (मेक्सिको, CIMMYT) ने जापानी किस्म नारिन-10 (Norin-10) के बौनेपन के जीन का उपयोग कर बौनी किस्में बनाईं, जिससे हरित क्रांति संभव हुई.
- धान की बौनी किस्में: डी-जियो-वू-जेन (Dee-Geo-Woo-Gen) जीन का उपयोग कर विकसित IR-8 और ताइचुंग नेटिव-1 का 1966 में भारत में पुरःस्थापन किया गया.
- भारतीय गन्ने का उत्कृष्टीकरण (Nobilisation): कोयम्बटूर में प्रजनक बार्बर एवं वेंकटरमन ने पतले व कम शर्करा वाले उत्तर भारतीय गन्ने (सैकरम बारबेरी) का संकरण उष्णकटिबंधीय मोटे गन्ने (सैकरम ऑफिसिनेरम) से कराकर रोगरोधी व अधिक उपज देने वाली किस्में विकसित कीं.
- संकर कपास: विश्व में कपास की पहली संकर किस्म H-4 (Hybrid-4) का विकास भारत में 1970 में हुआ.
💥 अध्याय 4: संकर ओज (Heterosis) और अंतःप्रजनन ह्रास
4.1 अवधारणाएँ
- अंतःप्रजनन ह्रास (Inbreeding Depression): निकट संबंधी पौधों या स्वनिशेचन के कारण पौधों के ओज और उपज में होने वाली कमी.
- संकर ओज (Heterosis): दो असंबंधित शुद्ध वंशक्रमों के संकरण से प्राप्त
पीढ़ी का अपने दोनों जनकों से गुणों या उपज में उत्कृष्ट होना. शब्द 'हेटरोसिस' शल (Shull, 1914) द्वारा दिया गया।
4.2 संकर ओज के प्रकार व आकलन
- औसत संकर ओज: मध्यजनक (Mid-Parent) के औसत मान से तुलना.
- हेटरोबल्टियोसिस (Heterobeltiosis):
का अपने उत्कृष्ट जनक (Better Parent) से बेहतर होना. - उपयोगी/आर्थिक संकर ओज (Standard Heterosis): क्षेत्र की सबसे अच्छी प्रचलित व्यावसायिक किस्म (Check Variety) से तुलना। पादप प्रजनन में केवल इसी का आर्थिक महत्व है.
4.3 आनुवंशिक आधार की परिकल्पनाएँ
- प्रभाविता परिकल्पना (Dominance Hypothesis): डेवेनपोर्ट (1908) के अनुसार, संकर ओज प्रभावी जीन्स द्वारा अप्रभावी हानिकारक जीन्स के प्रभाव को ढक लेने के कारण होता है.
- अतिप्रभाविता परिकल्पना (Overdominance Hypothesis): ईस्ट एवं शल (1908) के अनुसार, विषमयुग्मज अवस्था (
) अपने दोनों समयुग्मजों ( व ) की तुलना में अधिक उत्कृष्ट होती है.
🔄 अध्याय 5: फसल सुधार की प्रजनन विधियाँ (वरण, पुरःस्थापन)
5.1 पादप पुरःस्थापन (Plant Introduction)
किसी पौधे की प्रजाति या किस्म को उसके मूल स्थान से नए क्षेत्र/देश में ले जाकर उगाना.
- प्राथमिक पुरःस्थापन: बिना किसी बदलाव या वरण के सीधे खेती के लिए जारी करना (उदा: गेहूँ में सोनारा 64, धान में IR-8).
- द्वितीयक पुरःस्थापन: स्थानीय किस्मों से संकरण या वरण के बाद जारी करना (उदा: कल्याण सोना, सोनालिका).
- अवगुण: इसके साथ अनजाने में खरपतवार (सत्यानाशी, गेहूँसा) व रोग (यूरोप से आलू की विलंब शीर्णता) भी भारत आ गए.
5.2 वरण (Selection)
किसी मिश्रित समष्टि में से उत्कृष्ट लक्षणों वाले पौधों को छाँटकर अगली पीढ़ी उगाना.
- समूह वरण (Mass Selection): उत्कृष्ट पौधों के बीजों को एक साथ मिलाकर मिश्रित बीज के रूप में नई किस्म तैयार करना. इसमें संतति परीक्षण नहीं होता.
- शुद्ध वंशक्रम वरण (Pureline Selection): एक समयुग्मज व स्वपरागित पौधे की एकल संतति से नई किस्म का विकास. इसे एकल पादप वरण भी कहते हैं। इसकी किस्में पूर्णतः एकरूप और आकर्षक होती हैं.
5.3 संकरण (Hybridization)
दो अलग-अलग जीनप्ररूपों वाले पौधों के बीच कृत्रिम मिलन (Mating).
- प्रकार: अंतरप्रभेदीय (एक ही प्रजाति की दो किस्में) तथा अंतरप्रजातीय (दो अलग प्रजातियां - दूरस्थ संकरण).
- चरण: योजना → जनक चयन → विपुंसन (Emasculation - चिमटी से पुंकेसर हटाना) → थैली लगाना (Bagging) → टैग लगाना → परागण → बीज संग्रहण.
⚡ अध्याय 6: उत्परिवर्तन (Mutation) एवं बहुगुणिता (Polyploidy)
6.1 उत्परिवर्तन (Mutation)
जीव के किसी लक्षण में होने वाले आकस्मिक एवं वंशागत परिवर्तन को उत्परिवर्तन कहते हैं.
- लक्षण: अधिकांश उत्परिवर्तन अप्रभावी (Recessive) और हानिकारक होते हैं। केवल
उत्परिवर्तन ही उपयोगी होते हैं. - उत्परिवर्तजन (Mutagens): उत्परिवर्तन पैदा करने वाले कारक.
- भौतिक: एक्स-किरण, गामा किरण (आयनकारी) और पराबैंगनी किरणें (अनायनकारी).
- रासायनिक: EMS (एथिलमिथेन सल्फोनेट), सोडियम एजाइड.
- उपलब्धि:
वह मात्रा है जिससे उपचारित आबादी की मृत्यु हो जाती है. - विकसित किस्में: गेहूँ की शरबती सोनारा, धान की जगन्नाथ, प्रभावती.
6.2 बहुगुणिता (Polyploidy)
कोशिका विभाजन में गड़बड़ी के कारण गुणसूत्रों की संख्या का सामान्य द्विगुणित (
- असुगुणिता (Aneuploid): सामान्य संख्या से एक या दो गुणसूत्र कम या अधिक होना (
). - सुगुणिता (Euploid): आधार संख्या का पूर्ण गुणनफल होना.
- स्वत्रिगुणित (Autotriploid): बीज रहित केला और तरबूज बनाने में उपयोगी.
- परबहुगुणित (Allopolyploid): दो भिन्न संजीनों (Genomes) का संयोजन। कृत्रिम रूप से मानव निर्मित पहली फसल ट्रिटिकेल (Triticale) और रेफैनोब्रेसिका इसके उदाहरण हैं.
🔬 अध्याय 7: पादप जैव प्रौद्योगिकी एवं आनुवंशिक अभियंत्रण
7.1 पात्रे तकनीक (In Vitro Techniques) / ऊतक संवर्धन
पौधों के अंगों, ऊतकों या कोशिकाओं को परखनलियों के भीतर कृत्रिम पोषक माध्यम पर संवर्धित करना. यह कोशिकाओं की पूर्णशक्तता (Totipotency - एक कोशिका से पूर्ण पौधा बनाने की क्षमता) पर आधारित है.
- भ्रूण संवर्धन: दूरस्थ संकरण में भ्रूण का उद्धार (Embryo Rescue) करने व बीजों की प्रसुप्ति (Dormancy) तोड़ने हेतु.
- मेरिस्टेम संवर्धन (शीर्ष विभज्योतक): पौधों को वाइरस-मुक्त (Virus-free) बनाने व तीव्र कायिक प्रवर्धन के लिए.
- परागकोश संवर्धन (Anther Culture): आनुवंशिक शुद्धता के लिए अगुणित (Haploid) पौधों के त्वरित विकास हेतु.
7.2 आनुवंशिक अभियंत्रण (Genetic Engineering)
लैंगिक प्रक्रिया के बिना, सीधे किसी बाहरी जीव (कवक, बैक्टीरिया या जंतु) के DNA/जीन को पौधे के क्रोमोसोम में स्थानांतरित करने की तकनीक.
- पराजीनी (Transgenic) पौधे: इस विधि से तैयार पौधों को ट्रांसजेनिक पौधे कहते हैं.
- उदाहरण: कीट रोधिता (Bt Cotton), वाइरस रोधिता, और टमाटर की फ्लेवर सेवर (Flavr Savr) किस्म (1990).
🎒 अध्याय 8: पादप आनुवंशिक संसाधन (Germplasm) व संरक्षण
8.1 जननद्रव्य (Germplasm)
किसी फसल प्रजाति और उसके जंगली संबंधियों में उपस्थित सभी जीनों के सभी विकल्पियों (Alleles) के कुल समूह को जननद्रव्य या आनुवंशिक संसाधन कहते हैं.
- NBPGR (राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो, नई दिल्ली): भारत में जननद्रव्य के संग्रह और अनुरक्षण की मुख्य राष्ट्रीय संस्था है.
- भारतीय राष्ट्रीय जीनबैंक: इसकी स्थापना 1997 में की गई। यहाँ बीजों को आधार संग्रह के रूप में
पर लंबी अवधि के लिए सुरक्षित रखा जाता है.
8.2 संरक्षण की युक्तियाँ (Conservation Methods)
- स्वस्थाने संरक्षण (In-situ): जननद्रव्य को उसके मूल प्राकृतिक आवास में ही संरक्षित करना (जैसे: राष्ट्रीय पार्क, बायोस्फीयर रिजर्व, जीन सैंक्चुअरी).
- बाह्यस्थाने संरक्षण (Ex-situ): प्राकृतिक आवास से दूर कृत्रिम रूप से संरक्षित करना (जैसे: बीज बैंक, पादप बैंक, DNA बैंक).
🏷️ अध्याय 9: बीज — गठन, श्रेणियाँ, प्रमाणीकरण व विमोचन
9.1 भारत में बीजों की चार प्रमुख श्रेणियाँ (Seed Generations)
बीज उत्पादन एक सतत् व चरणबद्ध प्रक्रिया है:
🥇 [ नाभिकीय बीज / Nucleus Seed ]
─── (100% शुद्ध, प्रजनक द्वारा स्वयं तैयार)
▼
🥈 [ प्रजनक बीज / Breeder Seed ]
─── (नाभिकीय बीज की संतति, पीला टैग 🟨)
▼
🥉 [ आधार बीज / Foundation Seed ]
─── (प्रजनक बीज की संतति, सफेद टैग ⬜)
▼
🏅 [ प्रमाणित बीज / Certified Seed ]
─── (आधार बीज से तैयार, नीला टैग 🟦 — किसानों को वितरित)🧠 Exam Hotspot: किसानों को व्यावसायिक खेती के लिए केवल प्रमाणित बीज (Certified Seed) ही उपलब्ध कराया जाता है.
9.2 भारतीय बीज अधिनियम (1966)
यह 2 अक्टूबर, 1969 से देश में लागू है. इसका मुख्य कार्य बीजों की न्यूनतम गुणवत्ता, अंकुरण प्रतिशत और भौतिक व आनुवंशिक शुद्धता सुनिश्चित करना है. बीजों के सफल उत्पादन के लिए दो किस्मों के बीच एक निश्चित दूरी रखी जाती है जिसे पार्थक्य दूरी (Isolation Distance) कहते हैं.
9.3 नई किस्मों का विमोचन (Release of Varieties)
किसी भी नए श्रेष्ठ प्रयोगात्मक विभेद को किस्म के रूप में विमोचित करने के लिए तीन स्तरों से गुजरना पड़ता है:
- मूल्यांकन परीक्षण: स्टेशन परीक्षण, बहुस्थानीय परीक्षण, शस्य विज्ञानीय परीक्षण, रोग-कीट रोधिता परीक्षण व मिनीकिट परीक्षण (किसानों के खेतों पर लोकप्रियता बढ़ाने हेतु).
- विमोचन का कार्य केन्द्रीय किस्म विमोचन समिति (SCSRV) द्वारा किया जाता है.
📜 अध्याय 10: बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) एवं पेटेंट
10.1 बौद्धिक संपदा अधिकार (Intellectual Property Rights)
मनुष्य द्वारा अपनी बुद्धि, कौशल और अन्वेषण से सृजित विचारों, अवधारणाओं, डिजाइनों या प्रक्रियाओं पर सरकार द्वारा दिया जाने वाला कानूनी एकाधिकार, जो दूसरों को उसकी नकल करने से रोकता है.
10.2 सुरक्षा के प्रमुख प्रकार
- व्यापार रहस्य (Trade Secret): किसी सूत्र या प्रक्रिया को पूरी तरह गुप्त रखना (जैसे: कोका-कोला का फॉर्मूला).
- पेटेंट (Patent): औद्योगिक रूप से उपयोगी किसी नवीन आविष्कार पर सरकार द्वारा दिया जाने वाला एकाधिकार प्रमाण-पत्र. इसकी शर्तें हैं: नवीनता (Novelty), आविष्कारिता और औद्योगिक उपयोगिता.
- कॉपीराइट (Copyright): बौद्धिक विचारों, पुस्तकों, ऑडियो-वीडियो कैसेट आदि की सुरक्षा के लिए। यह केवल उसकी प्रतिलिपि (Copy) बनाने से रोकता है, उसमें मौजूद विचारों के उपयोग को नहीं.
- पादप प्रजनक अधिकार (PBR): किसी नई विकसित फसल किस्म पर उसके प्रजनक को मिलने वाला व्यावसायिक एकाधिकार. इसकी अवधि 15-20 वर्ष होती है. भारत ने इसके लिए स्वयं की पद्धति विकसित की जिसे पादप किस्म सुरक्षा एवं कृषक विशेषाधिकार कहते हैं.
💡 सुपर परीक्षा हैक्स और टिप्स (Smart Exam Tricks)
- बीज टैग याद रखने की ट्रिक (Tag Colors): B-F-C → Y-W-B
- Breeder (प्रजनक) = Yellow (पीला)
- Foundation (आधार) = White (सफेद)
- Certified (प्रमाणित) = Blue (नीला)
- सोलम (Solum) और सोलेम (Solum): मृदा विज्ञान में 'सोलेम' शब्द का अर्थ फर्श है, लेकिन प्रोफाइल में संस्तर
को 'सोलम' कहते हैं. - UPOV (1991) की शर्तें: NDUS ट्रिक से याद रखें → Novelty (नवीनता), Distinctiveness (विविक्तकारिता), Uniformity (समरूपता), Stability (स्थायित्व).
- मेंडल के नियमों की पुनः खोज (1900): इसे HTC (ह्यूगो, त्शर्माक, कोरेंस) से याद रखें.
🎯 निष्कर्ष (Conclusion)
आधुनिक कृषि की धुरी पादप प्रजनन और आनुवंशिकी के सिद्धांतों पर टिकी है। मेंडल के मौलिक नियमों से शुरू होकर आज यह विज्ञान जैव प्रौद्योगिकी, जीनोम एडिटिंग और पराजीनी फसलों (Transgenics) तक विस्तृत हो चुका है। प्रतियोगी परीक्षाओं में आनुवंशिक शुद्धता के मानक, बीजों के विभिन्न टैग, उत्परिवर्तजन के उदाहरण और बौद्धिक संपदा अधिकारों के नियमों से सर्वाधिक वस्तुनिष्ठ प्रश्न पूछे जाते हैं।
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