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BSEB Class 11 Agriculture Chapter 6 Notes in Hindi

🥛 पशुपालन एवं दुग्ध उत्पादन (Animal Husbandry & Dairy) — सुपर नोट्स 🐄

यह व्यापक डिजिटल नोट्स BSEB (Bihar Board), CUET, JET Agriculture, MHT CET, BPSC, UPSC, SSC, RRB आदि परीक्षाओं के नवीनतम पैटर्न के अनुसार सरल, बोधगम्य और आकर्षक शैली में तैयार किया गया है।


🎯 मुख्य विषय-सूची (Quick Navigator)

  • अध्याय 1: पशुधन का महत्व, विकास कार्यक्रम एवं 'ऑपरेशन फ्लड' 📈
  • अध्याय 2: गाय और भैंस की प्रमुख नस्लें (देशी व विदेशी) 🐄
  • अध्याय 3: भेड़ और बकरी की प्रमुख नस्लें (देशी व विदेशी) 🐐🐑
  • अध्याय 4: कुक्कुट (मुर्गी पालन) की प्रमुख नस्लें 🐓
  • अध्याय 5: पशुओं एवं कुक्कुटों की आवास प्रणालियाँ 🏠
  • अध्याय 6: पशु पोषण एवं संतुलित आहार सिद्धांत 🌾
  • अध्याय 7: पशु चारा संरक्षण तकनीकें ('हे' एवं साइलेज) 🍂
  • अध्याय 8: पशु स्वास्थ्य — स्वस्थ/बीमार पशु की पहचान व शारीरिक मानक 🩺

📈 अध्याय 1: पशुधन का महत्व, विकास कार्यक्रम एवं 'ऑपरेशन फ्लड'

1.1 वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत (Exam Point) 📊

  • भारत में दुनिया की लगभग भैंस और गाय की आबादी है।
  • भारत वर्तमान में विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है।

1.2 श्वेत क्रांति और ऑपरेशन फ्लड (White Revolution) 🥛

  • ऑपरेशन फ्लड (Operation Flood): यह राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) का एक डेयरी विकास कार्यक्रम है, जिसके कारण भारत 1998 में संयुक्त राज्य अमेरिका को पछाड़कर दुनिया का शीर्ष दुग्ध उत्पादक बना।
  • जनक: इस ऐतिहासिक सफलता का श्रेय डॉ. वर्गीज कुरियन (Dr. Verghese Kurien) को जाता है (भारत के 'मिल्कमैन')।
  • प्रमुख उद्देश्य: दुग्ध उत्पादन बढ़ाना, ग्रामीण आय में वृद्धि और उपभोक्ताओं को उचित मूल्य पर दूध उपलब्ध कराना।
  • तीन चरण:
    • चरण-1 (1970-1980): 4 प्रमुख महानगरों (दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई) को 18 मिल्कशेड से जोड़ा गया और मदर डेयरियों की स्थापना की गई।
    • चरण-2 (1981-1985): मिल्कशेड बढ़ाकर 136 किए गए और आत्मनिर्भर प्रणाली विकसित की गई।
    • चरण-3 (1985-1996): बुनियादी ढांचे का विस्तार, कृत्रिम गर्भाधान और पशु स्वास्थ्य अनुसंधान पर जोर तथा महिला डेयरी सहकारी समितियों का गठन।

1.3 प्रमुख राष्ट्रीय एवं राजकीय योजनाएं 📜

  • स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना (SGSY): 1 अप्रैल, 1999 से शुरू। स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के माध्यम से ग्रामीण गरीबों को गाय, बकरी, और मुर्गी पालन हेतु वित्तीय सहायता।
  • प्रधानमंत्री रोजगार योजना: 18-35 वर्ष के शिक्षित बेरोजगार युवाओं (8वीं पास, वार्षिक आय ) को डेयरी इकाई व फीड/पनीर फैक्ट्री लगाने हेतु ₹2 लाख तक का ऋण व सब्सिडी।
  • गाय और भैंस प्रजनन के लिए राष्ट्रीय परियोजना: देशी नस्लों में अनुवांशिक (Genetic) सुधार द्वारा उनका संरक्षण व विकास करना (क्योंकि देशी नस्लों में उच्च तापमान सहनशीलता और रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है)।
  • समग्र गव्य विकास योजना: बिहार राज्य में दुग्ध उत्पादन, प्रसंस्करण (Processing), संरक्षण एवं विपणन को बढ़ावा देना।

🐄 अध्याय 2: गाय और भैंस की प्रमुख नस्लें

2.1 गाय की प्रमुख नस्लें (Cattle Breeds) 🐄

उपयोगिता के आधार पर भारतीय देशी गायों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है:

┌──────────────────────┴──────────────────────┐
▼                                             ▼
[ देशी नस्लें / Indigenous ]          [ विदेशी नस्लें / Exotic ]
┌────────────────────┼────────────────────┐                │
▼                    ▼                    ▼                ▼
[दुंढारू/Dairy]  [भारवाहन/Draught]  [द्विकाजी/Dual]  [उच्च दुग्ध उत्पादक]

साहीवाल          - अमृतमहल          - हरियाणा          - होल्सटीन फ्रीजियन
रेड सिन्धी       - बछौर (बिहार की)  - थारपारकर        - जर्सी
गिर              - डांगी             - कंकरेज          - ब्राउन स्विस
राठी             - हैलिकर           - देउनी           - आयरशायर

(A) देशी दुधारू नस्लें (Dairy Breeds):

  1. साहीवाल (Sahiwal): इसका अन्य नाम मोन्टगोमरी या लोला (ढीली त्वचा के कारण) है। यह देशी गायों में सबसे अधिक दूध देने वाली नस्ल है (औसत: 2326 किग्रा प्रति ब्यात)। इसका मूल स्थान पाकिस्तान का मोन्टगोमरी जिला है। त्वचा ढीली, शरीर भारी और रंग गहरा लाल या भूरा होता है।
  2. रेड सिन्धी (Red Sindhi): मूल स्थान पाकिस्तान का कराची। इसका रंग पूर्णतः लाल होता है और अयन पूर्ण विकसित होता है (औसत: 1840 किग्रा/ब्यात)।
  3. गिर (Gir): मूल स्थान गुजरात के गिर जंगल। इसके कान लंबे, लटके हुए और पत्ते की तरह मुड़े होते हैं। यह कम पोषण में भी अधिक दूध देने और उच्च रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

(B) देशी भारवाहन नस्लें (Draught Breeds):

  1. बछौर (Bachaur): विशेष रूप से बिहार के सीतामढ़ी, मधुबनी, दरभंगा और समस्तीपुर जिलों में पाई जाती है 🌟। इसके बैल खेती और भारवाहन के लिए बहुत मशहूर हैं। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह साधारण चारे और कम पोषण पर भी आसानी से जीवन निर्वाह कर लेती है। रंग उजला या धूसर (Grey) होता है।
  2. अमृतमहल (Amritmahal): मूल स्थान कर्नाटक। इसके बैल अत्यंत फुर्तीले और भारी बोझ ढोने के लिए प्रसिद्ध हैं।

(C) देशी द्विकाजी नस्लें (Dual Purpose Breeds):

  1. हरियाणा (Haryana): भारत की सबसे लोकप्रिय द्विकाजी नस्ल। इसके बैल शक्तिशाली भारवाहक होते हैं और गायें भी अच्छा दूध देती हैं (औसत: 1200 किग्रा/ब्यात)। मूल स्थान रोहतक, हिसार (हरियाणा)।
  2. थारपारकर (Tharparkar): मूल स्थान पाकिस्तान का थारपारकर जिला, भारत में राजस्थान की सीमा पर पाई जाती है। रंग उजला या धूसर, कूबड़ सुविकसित और दृढ़ होता है।

(D) प्रमुख विदेशी दुधारू नस्लें (Exotic Dairy Breeds):

  1. होल्सटीन फ्रीजीयन (Holstein Friesian): मूल स्थान नीदरलैंड (Holland)। यह विश्व में आकार में सबसे बड़ी और सर्वाधिक दूध देने वाली नस्ल है (6000-7000 किग्रा प्रति ब्यात)। इसका रंग अनियमित काला और सफेद (Black & White) होता है। इसके दूध में वसा () कम होती है।
  2. जर्सी (Jersey): मूल स्थान इंग्लैंड का जर्सी द्वीप। इसका रंग हल्का लाल या कत्थई होता है। इसमें होल्सटीन की तुलना में गर्मी सहन करने की क्षमता अधिक होती है। इसके दूध में वसा की मात्रा अधिक () होती है (औसत: 4500 किग्रा/ब्यात)।

2.2 भैंस की प्रमुख नस्लें (Buffalo Breeds) 🐃

भारत में कुल दुग्ध उत्पादन का लगभग भाग भैंसों से प्राप्त होता है। गुणसूत्रों (Chromosomes) के आधार पर ये दो प्रकार की होती हैं: रिवेराइन/जलीय (50 गुणसूत्र, दूध हेतु) तथा स्वाम्प/दलदली (48 गुणसूत्र, मांस व कृषि हेतु - असम व मणिपुर में)।

प्रमुख नस्लें:

  1. मुर्रा (Murrah): यह विश्व की सबसे अच्छी दुधारू भैंस की नस्ल है 👑। इसका रंग स्याह काला (Jet Black) होता है। इसके सींग छोटे, जलेबी की तरह अत्यधिक मुड़े हुए (सर्पिल) होते हैं। पूँछ का गुच्छा (Switch) उजला होता है (औसत: 1500-2500 किग्रा प्रति ब्यात)। मूल स्थान हरियाणा और पंजाब है।
  2. भदावरी (Bhadawari): मूल स्थान आगरा (UP) व ग्वालियर (MP)। इसके शरीर का रंग तांबे जैसा (Copper coloured) होता है। इसके दूध में वसा की मात्रा सर्वाधिक () पाई जाती है। इसके भैंसे भारी गर्मी सहन कर सकते हैं।
  3. जाफराबादी (Jaffarabadi): यह भारतीय भैंसों में सबसे भारी और विशालकाय नस्ल है। इसके सींग बहुत भारी होते हैं और गर्दन के दोनों ओर लटके रहते हैं।
  4. सूरती (Surti): मूल स्थान गुजरात के कैरा और बड़ौदा जिले। इसके सींग हँसिए के आकार के (Sickle shaped), लंबे और चौड़े होते हैं।

🐐🐑 अध्याय 3: भेड़ और बकरी की प्रमुख नस्लें

3.1 बकरी की प्रमुख नस्लें (Goat Breeds) — "गरीब की गाय" 🐐

बकरी को "गरीब की गाय" (Poor man's cow) कहा जाता है क्योंकि इसके पालन में कम खर्च आता है और यह बंजर भूमि में झाड़ियाँ व पत्तियाँ चरकर भी आसानी से पेट भर लेती है।

  1. ब्लैक बंगाल (Black Bengal): यह देशी बकरियों में एक बार में सबसे ज्यादा बच्चे (जुड़वां/तिड़वां) देने वाली नस्ल है 🌟। इसका मूल स्थान पश्चिम बंगाल है, परंतु यह बिहार और उड़ीसा में प्रचुरता से पाई जाती है। इसका रंग मुख्य रूप से काला होता है, दोनों लिंगों (नर-मादा) में दाढ़ी पाई जाती है और इसका मांस व चमड़ा उच्च गुणवत्ता का होता है।
  2. जमुनापारी (Jamunapari): यह दक्षिण-पूर्व एशिया की सबसे अच्छी और भारत की सबसे लंबी दुधारू नस्ल है। इसका मूल स्थान इटावा (UP) है। इसमें तोते जैसा मुख (रोमन नाक/Roman Nose) और लंबे लटके हुए नलीदार कान इसकी मुख्य पहचान हैं।
  3. बीटल (Beetal): पंजाब और हरियाणा में पाई जाने वाली भारी शरीर की दुधारू नस्ल (1.5-2.0 किग्रा दूध प्रतिदिन)। दिखने में जमुनापारी जैसी होती है परंतु आकार में थोड़ी छोटी होती है।
  4. चांगथांगी (Changthangi) व चेगू (Chegu): लद्दाख और हिमालय के ऊँचे क्षेत्रों (3000-5000 मीटर) में पाई जाने वाली नस्लें। इनसे विश्व प्रसिद्ध महीन और अत्यंत कीमती ऊन 'पशमीना' (Pashmina) प्राप्त होता है.

3.2 भेड़ की प्रमुख नस्लें (Sheep Breeds) 🐑

उपयोगिता के आधार पर इन्हें चार भागों में वर्गीकृत किया गया है:

  1. परिधान ऊन (Apparel Wool): उत्तम किस्म का ऊन देने वाली नस्लें। इसमें मेरीनो (Merino - मूल स्थान स्पेन) विश्व प्रसिद्ध है। भारत की हिसारडेल, कश्मीर मेरीनो, अविवस्त्र आदि नस्लें विदेशी मेरीनो के संकरण से ही विकसित की गई हैं।
  2. दरी ऊन (Carpet Wool): नाली, चोकला, पट्टनवाड़ी।
  3. मांस एवं दरी ऊन: शाहाबादी (Shahabadi - यह बिहार के बक्सर, भोजपुर, पटना, रोहतास और गया जिलों में पाई जाने वाली मुख्य देशी नस्ल है) 🌟। इसके नर-मादा दोनों सींग रहित होते हैं और ऊन अत्यंत मोटा होता है। अन्य नस्लें: मुजफ्फरनगरी, मालपुरा, गंजाम
  4. केवल मांस हेतु: नेल्लोर (Nellore - आंध्र प्रदेश)। इस भेड़ पर ऊन नहीं होता और दूर से देखने पर यह पूर्णतः बकरी जैसी लगती है। अन्य: मांड्या (कर्नाटक)

🐓 अध्याय 4: कुक्कुट (मुर्गी पालन) की प्रमुख नस्लें

4.1 देशी नस्लें (Indigenous Poultry Breeds):

  1. असील (Aseel): यह आंध्र प्रदेश, यूपी और राजस्थान में पाई जाती है। यह अपने झगड़ालूपन, फुर्तीलेपन और लड़ाकू स्वभाव के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इसे खेल पक्षी (Game Bird) के रूप में पाला जाता है। मुर्गियों में इसका आकार सबसे बड़ा और मजबूत होता है।
  2. कड़कनाथ (Kadaknath): इसे कालामासी भी कहा जाता है। यह मध्य प्रदेश के झाबुआ और धार जिलों में आदिवासियों द्वारा पाली जाती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका मांस, त्वचा, रक्त, कलगी और हड्डियाँ सब काले रंग की होती हैं 🟤, जो बहुत स्वादिष्ट और औषधीय गुणों से भरपूर होता है। इसके अंडे हल्के भूरे होते हैं।

4.2 विदेशी नस्लें (Exotic Poultry Breeds):

  1. मेडिटरेनियन वर्ग — व्हाइट लेगहॉर्न (White Leghorn): यह विश्व में सबसे ज्यादा अंडे देने वाली नस्ल है 🥚 (प्रति वर्ष लगभग 280-300 अंडे)। इसका शरीर हल्का और रंग पूर्णतः सफेद होता है।
  2. अमेरिकन वर्ग: प्लाइमाउथ रॉक, रोड आइलैंड रेड (RIR), न्यू हैम्पशायर। ये मांस और अंडे (द्विकाजी) दोनों के लिए अच्छी हैं। इनके अंडे भूरे रंग के होते हैं।
  3. एशियाटिक वर्ग: ब्रह्मा, कोचीन, लैंगशान। इनके पैर (Shank) पंखयुक्त होते हैं। परिपक्वता धीमी होती है और ये भारी शरीर वाली मांस उत्पादक नस्लें हैं।

🏠 अध्याय 5: पशुओं एवं कुक्कुटों की आवास प्रणालियाँ

उत्पादकता बढ़ाने के लिए पशुओं को विपरीत मौसम से बचाना और उन्हें अनुकूल तापमान श्रेणी (Comfort Zone) प्रदान करना आवश्यक है।

5.1 गाय एवं भैंसों की आवास प्रणालियाँ 🏘️

  1. पशुओं को बाँध कर रखने की प्रणाली (Conventional Barn System): पशुशाला पूर्णतः छतयुक्त और दीवारों से घिरी होती है। ठंड और पहाड़ी क्षेत्रों (हिमालय) के लिए उपयुक्त है। यह दो प्रकार की होती है:
    • मुँह से मुँह वाली विधि (Face-to-Face System): दोनों पंक्तियों के पशुओं का मुँह आमने-सामने होता है। लाभ: चारा देने में कम समय लगता है और सुविधा होती है। हानि: पशुओं में संक्रामक बीमारी फैलने का खतरा अधिक होता है।
    • पूँछ से पूँछ वाली विधि (Tail-to-Tail System): दोनों पंक्तियों के पशुओं की पीठ/पूँछ आमने-सामने होती है। लाभ: रोगों से बचाव होता है, पर्याप्त धूप व हवा मिलती है, और दूध दुहने व सफाई करने में अत्यधिक सुविधा होती है (यह सर्वोत्तम मानी जाती है) 🥇।
  2. पशुओं को खुला रखने की प्रणाली (Loose Housing System): इसमें पशुओं को केवल दूध निकालते समय या उपचार के समय ही बाँधा जाता है, बाकी समय वे बाड़े (Padock) में स्वतंत्र चरते हैं। भारतीय उष्णकटिबंधीय जलवायु के लिए इसे सबसे उपयुक्त माना गया है क्योंकि इसमें निर्माण लागत कम आती है और पशु तनावमुक्त रहता है।

5.2 कुक्कुटों (मुर्गियों) की आवास प्रणालियाँ 🐔

  1. डीप लिटर प्रणाली (Deep Litter System): इसमें फर्श पर पुआल, भूसा या मूँगफली के छिलके का 8-12 इंच गहरा बिछावन (Litter) बनाया जाता है। मुर्गियों की बीट बैक्टीरिया द्वारा अपघटित होकर 'बिल्ट-अप लिटर' बनाती है जो विटामिन से भरपूर होती है। साल के अंत में यह सर्वोत्तम खाद बनती है।
  2. बैटरी / पिंजरा प्रणाली (Cage/Battery System): मुर्गियों को धातु के जालीदार पिंजरों में रखा जाता है। इसमें सबसे कम जगह की आवश्यकता होती है। पिंजरे का फर्श आगे की ओर झुका होता है जिससे अंडा स्वतः लुढ़ककर बाहर आ जाता है। व्यावसायिक अंडा उत्पादन (Layers) के लिए यह आधुनिक समय की सबसे कुशल प्रणाली है

🌾 अध्याय 6: पशु पोषण एवं संतुलित आहार सिद्धांत

पशुपालन के कुल आवर्ती खर्च का से भाग केवल आहार (Feed) पर व्यय होता है

6.1 पाचन तंत्र के आधार पर पशुओं का वर्गीकरण

  1. रोमन्थि पशु (Ruminants): इनका आमाशय चार खंडों में विभक्त होता है:पाचन क्रिया रूमेन में सूक्ष्मजीवों द्वारा किण्वन (Fermentation) आधारित होती है, जिससे ये रेशे/भूसे/घास को आसानी से पचा लेते हैं। (उदा: गाय, भैंस, भेड़, बकरी)।
  2. गैर-रोमन्थि पशु (Non-ruminants): इनका आमाशय साधारण (एक खंड) होता है। ये रेशे को नहीं पचा सकते, इनका पाचन एंजाइमों द्वारा होता है। (उदा: मुर्गी, सूअर)।

6.2 पशु आहार का वर्गीकरण (Feed Classification) 📊

  1. रफेज / चारा (Roughage): इसमें रेशे (Crude Fiber) की मात्रा से अधिक होती है। यह मुख्य रूप से पेट भरने और ऊर्जा के लिए है।
    • सूखा चारा ( नमी): हे (Hay), भूसा, कड़वी।
    • हरा चारा ( नमी): बरसीम, ल्यूसर्न, सोयाबीन (दलहनी - प्रोटीन समृद्ध) और मक्का, जई, ज्वार, नेपियर घास (गैर-दलहनी)।
  2. कन्सन्ट्रेट / दाना (Concentrate): इसमें रेशे की मात्रा से कम होती है। यह अत्यधिक सुपाच्य और पोषक तत्वों से भरपूर होता है।
    • ऊर्जादायी: मक्का, जौ, ज्वार, चोकर, शीरा/छोआ (Molasses)।
    • प्रोटीनदायी ( प्रोटीन): वनस्पति स्रोत (मूँगफली, सरसों, तीसी की खल्ली) और पशु स्रोत (मछली चूर्ण, मीट मील, ब्लड मील)।

6.3 संतुलित आहार की गणना तालिका 🍽️

  • जीवन निर्वाह आहार (Maintenance Ration): एक वयस्क पशु को स्वस्थ रखने के लिए प्रतिदिन 4-6 किग्रा सूखा चारा और 1.5-2.0 किग्रा दाना मिश्रण आवश्यक है।
  • उत्पादन आहार (Production Ration): जीवन निर्वाह के अतिरिक्त, प्रति 2.5 किग्रा दूध पर गाय को 1 किग्रा दाना और प्रति 2.0 किग्रा दूध पर भैंस को 1 किग्रा दाना देना अनिवार्य है।
  • गर्भावस्था आहार: गाभिन गाय/भैंस को गर्भावस्था के अंतिम तीन महीनों में भ्रूण के विकास के लिए 1.25 से 1.5 किग्रा दाना मिश्रण अतिरिक्त देना चाहिए।

🍂 अध्याय 7: पशु चारा संरक्षण तकनीकें ('हे' एवं साइलेज)

जब चारे की उपलब्धता अधिक हो (जुलाई-अगस्त और मार्च), तब उसे संरक्षित कर कमी के दिनों (Lean Period - अक्टूबर-नवंबर और मई-जून) के लिए रखना चारा संरक्षण कहलाता है।

7.1 'हे' या कड़वी (Hay Making) 🍂

हरे चारे को उसकी पौष्टिकता और हरा रंग (कैरोटीन) बनाए रखते हुए सुखाना 'हे' कहलाता है।

  • नमी की मात्रा: इसमें नमी तक लाई जाती है। यदि नमी से अधिक रही, तो फफूंद लग जाएगी और सूक्ष्मजीवों की ऊष्मा से चारे के ढेर में स्वतः आग लग सकती है, जिसे 'तत्कालीन दहन' (Instantaneous Combustion) कहते हैं।
  • सुखाने की विधि: चारे को छाए में सुखाना चाहिए, सीधी धूप से कैरोटीन नष्ट हो जाता है।
  • सर्वोत्तम फसलें: पतले तने वाली दलहनी फसलें जैसे ल्यूसर्न (रिजका), बरसीम और लोबिया 'हे' बनाने के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं।

7.2 साइलेज (Silage Making) 🎋

हरे चारे को गड्ढे या बुर्ज (साइलो - Silo) में ऑक्सीजन रहित (Anaerobic) वातावरण में दबाकर किण्वन (Fermentation) द्वारा सुरक्षित रखना साइलेज कहलाता है।

  • सिद्धांत: हवा की अनुपस्थिति में जीवाणु चारे की शर्करा को लैक्टिक अम्ल (Lactic Acid) में बदल देते हैं, जिससे pH गिर जाता है और चारा सड़ने से बच जाता है। इसका आदर्श pH मान 4.2 होता है और रंग पीलापन लिए हरा होता है। इसमें फलों जैसी सुखद अल्कोहल की गंध आती है।
  • लाभ: इसका प्रभाव पशु पर मृदुरेचक (Laxative) होता है। इसमें 'हे' की तुलना में अधिक विटामिन और कैरोटीन सुरक्षित रहता है। इसे कम श्रम में बनाया जा सकता है।
  • सर्वोत्तम फसलें: कार्बोहाइड्रेट और शर्करा से भरपूर मोटी फसलें जैसे मक्का (सर्वश्रेष्ठ) 🌽, ज्वार और जई साइलेज के लिए सर्वोत्तम हैं। अपक्व ज्वार में पाया जाने वाला जहरीला प्यूरूसिक अम्ल (Prussic Acid) साइलेज बनाने पर नष्ट हो जाता है।

📦 सम्पूर्ण चारा ब्लॉक (Complete Feed Block): अकाल, सूखा या बाढ़ जैसी आपदाओं में चारे के आसान परिवहन हेतु गेहूँ का भूसा ()+ सूखी बरसीम पत्ती ()+ दाना मिश्रण ()+ शीरा व खनिज () को मिलाकर हाई-डेंसिटी मशीन द्वारा घनीकृत ब्लॉक (ईंट) बनाए जाते हैं।


🩺 अध्याय 8: पशु स्वास्थ्य — स्वस्थ/बीमार पशु की पहचान व शारीरिक मानक## 8.1 स्वस्थ पशु के बाह्य लक्षण

नियमित जुगाली (पागुर) करना, सजग व चौकन्ना रहना, थूथन (Muzzle) पर ओस की बूंदों जैसी नमी का होना 💧, चमकदार त्वचा और सामान्य मलमूत्र।

8.2 पशुओं के शारीरिक मानक सूचकांक (Vital Signs Table) 📊

पशु का नामसामान्य शारीरिक तापमान (°F)नाड़ी / हृदय गति (प्रति मिनट)फेफड़े / साँस की गति (प्रति मिनट)
गाय (Adult)60 - 9025 - 30
भैस50 - 7030 - 40
बछड़ा80 - 10025 - 30
भेड़ - बकरी70 - 9010 - 20
मुर्गा - मुर्गी (सर्वाधिक)120 - 16015 - 30
  • तापमान मापने की विधि: थर्मामीटर को पशु के गुदामार्ग (Rectum) में 1-2 मिनट रखकर।
  • नाड़ी गति मापने का स्थान: गाय/भैंस में पूँछ की जड़ के नीचे या बाहरी जबड़े की धमनी (Maxillary Artery) को छूकर। कुत्तों में जाँघ की भीतरी फिमोरल धमनी द्वारा।

💡 सुपर परीक्षा हैक्स और शॉर्टकट ट्रिक्स (Smart Exam Hacks)

  1. आमाशय के 4 खंड (Ruminant Stomach): इसे R-R-O-A ट्रिक से याद रखें → Rumen (रूमेन - सबसे बड़ा, किण्वन गृह) → Reticulum (रेटिकुलम - मधुमक्खी के छत्ते जैसा) → Omasum (ओमेजम) → Abomasum (एबोमेजम - सत्य आमाशय, जहाँ एंजाइम पाचन होता है)।
  2. खीस (Colostrum) का महत्व: नवजात बछड़े को जन्म के तुरंत बाद माँ का पहला गाढ़ा दूध (खीस) उसके शारीरिक वजन के 1/10 भाग के बराबर अवश्य पिलाना चाहिए, क्योंकि इसमें इम्यूनोग्लोबुलिन्स (Antibodies) होते हैं जो रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं। अधिक दूध देने वाली गाय का पूरा खीस एक बार में निकालने से उसे मिल्क फीवर (मन्द ज्वर - कैल्शियम की कमी) हो सकता है।
  3. सींग रोधन (Disbudding): बछड़े के जन्म के 15 दिनों के अंदर कास्टिक पोटाश () स्टिक या इलेक्ट्रॉनिक डिहॉर्नर द्वारा सींग की कली को नष्ट करना 'डिसबडिंग' कहलाता है।
  4. दूध उतारने का हार्मोन: दूध उतारने (Let-down of Milk) के लिए ऑक्सीटोसिन (Oxytocin) हार्मोन जिम्मेदार है। इसकी हाफ-लाइफ केवल 5-7 मिनट होती है, इसलिए दूध दुहने का कार्य इसी समय सीमा के भीतर पूर्ण हो जाना चाहिए ⏱️। दूध दुहने की पूर्ण हस्त विधि (Full Hand Method / मुट्ठी विधि) सर्वोत्तम मानी जाती है।

🎯 निष्कर्ष (Conclusion)

पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने वाला एक अत्यंत लाभकारी और कृषि का पूरक व्यवसाय है। भारत का दुग्ध उत्पादन में विश्व में प्रथम स्थान डॉ. वर्गीज कुरियन के 'ऑपरेशन फ्लड' सहकारी आन्दोलन की ही देन है। प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से गाय-भैंस की नस्लों की शारीरिक विशेषताएं (जैसे मुर्रा के जलेबी सींग व भदावरी का ताँबा रंग), बिहार की विशिष्ट भारवाहक नस्ल 'बछौर', साइलेज के लिए मक्के की उपयोगिता, आमाशय के खंड और ऑक्सीटोसिन हार्मोन की समय-सीमा सबसे महत्वपूर्ण और निश्चित अंक दिलाने वाले टॉपिक्स हैं।

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भाषा ⚡ Competitive exam 📋 Bihar Board - Class 12 वर्ण-विचार Books Based Questions ⚡ Competitive exam 📋 Bihar Board - Class 10 📋 Bihar Board - Class 10 PYQ 📋 Bihar Board - Class 12 📋 Bihar Board - Class 12 PYQ वर्तनी ⚡ Competitive exam विराम-चिह्ना ⚡ Competitive exam 🏁 निष्कर्ष (Conclusion) भाषा ​ ### 📙 Book Based Questions प्रश्‍न 1 : हिन्दी भाषा का प्रादुर्भाव किस भाषा से हुआ? पालि संस्कृत अपभ्रंश प्राकृत उत्तर : सही विकल्प () है। प्रश्‍न 2 : भारतीय आर्य भाषाओं को कितनी भाषाओं में विभाजित किया गया है? तीन चार पाँच दो उत्तर : सही विकल्प () है। प्रश्‍न 3 : प्राचीन भारतीय आर्य भाषा के अन्तर्गत कौन-सी भाषा आती है? वैदिक संस्कृत लौकिक संस्कृत अवहट्ठ 'a' तथा 'b' दोनों उत्तर : सही विकल्प () है। प्रश्‍न 4 : बौद्ध साहित्य की रचना किस भाषा से हुई? संस्कृत प्राकृत पालि अपभ्रंश उत्तर : सही विकल्प () है। प्रश्‍न : मध्यकालीन आर्य भाषा की तीसरी अवस्था कौन-सी है? प्राकृत पालि संस्कृत अपभ्रंश उत्तर : सही विकल्प () है। प्रश्‍न : भोजपुरी बोली का क्षेत्र है पटना दरभंगा बनार...
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