- रसायन विज्ञान (Chemistry) विज्ञान की वह शाखा है, जिसके अन्तर्गत पदार्थों के गुण,संघटन, संरचना तथा उनमें होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है।
- Chemistry अर्थात् रसायन विज्ञान शब्द की उत्पत्ति मिस्र के प्राचीन शब्द 'कीमिया' (Chemea) से हुई है, जिसका अर्थ है काला रंग। मिस्र के लोग काली मिट्टी को केमि(Chermi) कहते थे और प्रारंभ में रसायन विज्ञान के अध्ययन को केमिटेकिंग (Chemeteching) कहा जाता था।
- लेवायसिये (Lavoisier) को रसायन विज्ञान का जनक कहा जाता है।
1. हमारे आस-पास के पदार्थ
ब्रह्माण्ड दो अवयवो से मिलकर बना है – द्रव्य तथा ऊर्जा।
प्रारंभ में भारतीयों और यूनानियों का अनुमान था कि प्रकृति की सारी वस्तुएँ पाँच तत्वों के संयोग से बनी हैं, ये पाँच तत्व है क्षितिज, जल, पावक, गगन एवं समीर।
भारत के महान ऋषि कणाद के अनुसार सभी पदार्थ अत्यन्त सूक्ष्मकणों से बने हैं; जिसे परमाणु कहा गया है।
वे सभी वस्तुएँ जो स्थान घेरती हैं, जिनमें भार होता है तथा जिनका ज्ञान हम हैं। अपनी ज्ञानेन्द्रि यों के द्वारा कर सकते हैं, द्रव्य (Matter) कहलाती हैं।
दुनिया की कोई भी वस्तु जो स्थान घेरती हो, जिसका द्रव्यमान होता हो और जो अपनी संरचना में परिवर्तन का विरोध करती हो, पदार्थ (Matter) कहलाते हैं। उदाहरण – जल, हवा, बालू आदि।
पदार्थो का वर्गीकरण : (क) भौतिक वर्गीकरण और (ख) रासायनिक वर्गीकरण
(क) भौतिक वर्गीकरण
- पदार्थ की वह भौतिक अवस्था जिसका आकार एवं आयतन दोनों निश्चित हो, ठोस (Solid) कहलाता है। जैसे – लोहे की छड़, लकड़ी की कुर्सी , बर्फ का टुकड़ा आदि।
- पदार्थ की वह भौतिक अवस्था जिसका आकार अनिश्चित एवं आयतन निश्चित हो द्रव (Liquid) कहलाता है। जैसे – अल्कोहल, पानी, तारपीन का तेल, मिट्टी तेल आदि।
- पदार्थ की वह भौतिक अवस्था जिसका आकार एवं आयतन दोनों अनिश्चित हो गैस (Gas) कहलाता है। जैसे – हवा, ऑक्सीजन आदि। ( गैसों का कोई पृष्ठ नहीं होता है, इसका विसरण बहुत अधिक होता है तथा इसे आसानी से संपीड्रित (Compress) किया जा सकता है। )
अवस्था-परिवर्तन (Change of State)
अधिकांश पदार्थों को एक अवस्था से दूसरी अवस्था में बदला जा सकता है।
- किसी द्रव को गर्म करने पर एक निश्चित ताप पर उसके सम्पूर्ण हिस्से से उसकी गैसीय अवस्था में बदलने की क्रिया को क्वथन या उबलना (Boiling) कहते हैं।
- किसी पदार्थ की ठोस-अवस्था से द्रव-अवस्था में बदलने की क्रिया को गलन या द्रवण या पिघलना (Melting) कहते हैं ।
- किसी पदार्थ की द्रव-अवस्था से ठोस-अवस्था में बदलने की क्रिया को हिमिकरण या जमना (Freezing) कहते हैं ।
- किसी पदार्थ के वाष्पीय अवस्था से द्रव-अवस्था में बदलने की क्रिया को संघनन (Condensation) कहते हैं ।
- कुछ पदार्थ गर्म करने पर सीधे ठोस रूप से गैस बन जाते हैं, इसे ऊर्ध्वपात (Sublimation) कहते हैं। जैसे – आयोडीन, कपूर आदि।
- ताप एवं दाब में परिवर्तन करके किसी भी पदार्थ की अवस्था को बदला जा सकता है। परन्तु इसके अपवाद भी हैं, जैसे – लकड़ी, पत्थर; ये केवल ठोस अवस्था में ही रहते हैं।
- जल तीनों भौतिक अवस्था में रह सकता है।
- पदार्थ की तीनों भौतिक अवस्थाओं में निम्न रूप से साम्य होता है ठोस <=> द्रव <=> गैस। उदाहरण – जल।
- पदार्थ की चौथी अवस्था प्लाज्मा एवं पाँचवीं अवस्था वोस-आइस्टाइन कडनसेट है।
पदार्थ की अवस्था परिवर्तन (Change in state)
- गर्म करने पर जब ठोस पदार्थ द्रव अवस्था में परिवर्तित होते हैं, तो उनमें से अधिकांश में यह परिवर्तन एक विशेष दाब पर तथा एक नियत ताप पर होता है; यह नियत ताप वस्तु का द्रवणांक (Melting Point) कहलाता है। जब तक पदार्थ गलता (ठोस के आखिरी कण तक) रहता है, तब तक ताप स्थिर रहता है। यदि विशेष दाब नियत रहे।
- किसी विशेष दाब पर वह नियत ताप जिस पर कोई द्रव जमता है, हिमांक (Freezing point) कहलाता है।
- सामान्यतः पदार्थ का द्रवणांक एवं हिमांक का मान बराबर होता है। जैसे – बर्फ का द्रवणांक एवं हिमांक 0℃ है।
- अशुद्धियों की उपस्थिति में पदार्थ का हिमांक और द्रवणांक दोनों कम हो जाता है।
द्रवणांक पर दाब का प्रभाव
- उन पदार्थों के द्रवणांक दाब बढ़ाने से बढ़ जाते हैं, जिनका आयतन गलने पर बढ़ जाता है। जैसे – मोम, ताँबा आदि।
- उन पदार्थों के द्रवणांक दाब बढ़ाने से घट जाता है, जिनका आयतन गलने पर घट जाता है; जैसे – बर्फ, ढलवाँ लोहा आदि।
गलने तथा जमने पर आयतन में परिवर्तन (Change of volume in fusion and solidification) : क्रिस्टलीय पदार्थों में से अधिकांश पदार्थ गलने पर आयतन में बढ़ जाते हैं, ऐसी दशा में ठोस अपने ही गले हुए द्रव में डूब जाता है।
ढला हुआ लोहा, बफ, एण्टीमनी, बिस्मथ, पीतल आदि गलने पर आयतन में सिकुड़ते हैं; अतः इस प्रकार के ठोस अपने ही गले द्रव में प्लवन करते रहते हैं। इसी विशेष गुण के कारण बर्फ का टुकड़ा गले हुए पानी में प्लवन करता है।
साँचे में केवल वे पदार्थ ढाले जा सकते हैं, जो ठोस बनने पर आयतन में बढ़ते हैं, क्योंकि तभी वे साँचे के आकार को पूर्णतया प्राप्त कर सकते है।
मुद्रण धातु ऐसे पदार्थ के बने होते हैं, जो जमने पर आयतन में बढ़ते हैं।
चाँदी या सोने की मुद्राएँ ढाली नहीं जातीं, केवल मुहर (stamp) लगाकर बनायी जाती हैं।
मिश्र धातुओं का द्रवणांक (M.P.) उन्हें बनाने वाले पदार्थों के गलनांक से कम होता है क्योंकि अशुद्धियाँ डाल देने पर पदार्थ का गलनांक घट जाता है।
हिमकारी मिश्रण (Freezing mixture) : किसी ठोस को उसके द्रवणांक पर गलने के लिए ऊष्मा की आवश्यकता होगी जो उसकी गुप्त ऊष्मा होगी। यह ऊष्मा साधारणतः बाहर से मिलती है, जैसे जल में बर्फ का टुकड़ा मिलाने पर बर्फ गलेगी, परन्तु गलने के लिए द्रवणांक पर वह जल से ऊष्मा लेगी जिससे जल का तापमान घटने लगेगा और मिश्रण का ताप घट जाएगा। हिमकारी मिश्रण का बनना इसी सिद्धान्त पर आधारित है। उदाहरण – घर पर आईसक्रीम जमाने के लिए नमक का एक भाग एवं बर्फ का तीन भाग मिलाया जाता है, इससे मिश्रण का ताप −22℃ प्राप्त होता है।
द्रव से वाष्प में परिणत होने की क्रिया वाष्पीकरण (Vaporization) कहलाती है।
यह दो प्रकार से होती है
- क्वथनांक से कम तापमान पर द्रव के वाष्प में परिवर्तित होने की प्रक्रिया को वाष्पन (Evaporation) कहते हैं। वाष्पन की क्रिया निम्न बातों पर निर्भर करती है –
- (क) क्वथनांक का कम होना : क्वथनांक जि तना कम होगा, वाष्पन की क्रि या उतनी ही अधि क तेजी से होगी।
- (ख) द्रव का ताप : द्रव का ताप अधि क होने से वाष्पन अधि क होगा।
- (ग) द्रव के खुले पृष्ठ का क्षेत्रफल : क्षेत्रफल अधि क होने पर वाष्पन तेजी से होगा।
- (घ) द्रव के पृष्ठ पर : (i) द्रव के पृष्ठ पर वायु बदलने पर वाष्पन तेज होगा। (ii) द्रव के पृष्ठ पर वायु का दाब जितना ही कम होगा वाष्पन उतनी ही तेजी से होगा। (iii) द्रव के पृष्ठ पर वाष्प दाव जितना बढ़ता जाएगा वाष्पन की दर उतनी ही घटती जायेगी।
- दाब के किसी दिए हुए नियत मान के लिए वह नियत ताप जिस पर कोई द्रव उबलकर द्रव अवस्था से वाष्प की अवस्था में परिणत हो जाय तो वह नियत ताप द्रव का क्वथनांक (Boiling point) कहलाता है।
- क्वथनांक से कम तापमान पर द्रव के वाष्प में परिवर्तित होने की प्रक्रिया को वाष्पन (Evaporation) कहते हैं। वाष्पन की क्रिया निम्न बातों पर निर्भर करती है –
दाब बढ़ाने से द्रव का क्वथनांक बढ़ जाता है और दाब घटने से द्रव का क्वथनांक घट जाता है।
2. क्या हमारे आस-पास के पदार्थ शुद्ध हैं?
(ख) रासायनिक वर्गीकरण
(i) शुद्ध पदार्थ
वे द्रव्य, जिनका रासायनिक संघटन निश्चित होता है, शुद्ध पदार्थ अथवा शुद्ध द्रव्य कहलाते है।
तत्व (Element) वह शुद्ध पदार्थ है, जिसे किसी भी ज्ञात भौतिक एवं रासायनिक विधियों से न तो दो या दो से अधिक पदार्थों में विभाजित किया जा सकता है, और न ही अन्य सरल पदार्थों के योग से बनाया जा सकता है। जैसे – सोना (Ag), चाँदी, ऑक्सीजन (O) आदि।
तत्वों का वर्गीकरण :
- (क) ऐसे तत्त्वों को धातु (Metal) कहते हैं, जिनमें (i) चमक होती है, (ii) जो आघातर्ध्य तथा तन्य होते हैं, (iii) जिनकी तनन-क्षमता अधिक होती है, (iv) जो ऊष्मा और विद्युत के सुचालक होते हैं तथा (v) ये ठोस अवस्था में पाये जाते हैं। अपवाद – पारा। जैसे – सोडियम, पोटैशियम, लोहा, ताँबा इत्यादि।
- (ख) ऐसे तत्त्वों को अधातु (non-Metal) कहते हैं, (i) चमक नहीं होती, (ii) ये न तो आघातर्ध्य होते हैं और न ही तन्य, (iii) ये भंगुर होते हैं, (iv) ये ऊष्मा और विधुत् के कुचालक होते हैं, तथा (v) ये ठोस, द्रव और गैसीय तीनों अवस्थाओं में पाये जाते हैं। जैसे – हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, कार्बन, गंधक, इत्यादि ।
- (ग) ऐसे तत्त्व, जिनमें धातु और अधातु दोनों के कुछ गुण रहते हैं, उन्हें उपधातु (Metalloid) कहते हैं। जैसे आर्सेनि क, सि लि कॉन, जर्मेनि यम, ऐंटीमनी, बिस्मथ, इत्यादि ।
वह शुद्ध पदार्थ जो रासायनिक रूप से दो या दो से अधिक तत्वों के एक निश्चित अनुपात में रासायनिक संयोग से बने हैं, यौगिक (Compound) कहलाते हैं। यौगिक के गुण उनके अवयवी तत्वों के गुणों से भिन्न होता है, जैसे – जल। जल ऑक्सीजन एवं हाइड्रोजन से मिलकर बनता है, इसमें ऑक्सीजन जलने में सहायक होता है और हाइड्रोजन खुद जलता है लेकिन इन दोनों का यौगिक जल आग को बुझा देता है।
(ii) मिश्रण (Mixture)
वह पदार्थ जो दो या दो से अधिक तत्वों या यौगिकों के किसी भी अनुपात में मिलाने से प्राप्त होता है, मिश्रण (Mixture) कहलाता है। इसे सरल यांत्रिक विधि द्वारा पुनः प्रारंभिक अवयवों में प्राप्त किया जा सकता है।
- समांग मिश्रण (Homogeneous Mixture) : निश्चित अनुपात में अवयवों को मिलाने से समांग मिश्रण का निर्माण होता है। इसके प्रत्येक भाग के गुण-धर्म एक समान होते हैं। जैसे – चीनी या नमक का जलीय विलयन, हवा आदि।
- विषमांग मिश्रण (Hetrogeneous Mixture) : अनिश्चित अनुपात में अवयवों को मिलाने से विषमांग मिश्रण का निर्माण होता है। इसके प्रत्येक भाग के गुण एवं उनके संघटक भिन्न-भिन्न होते हैं। जैसे – बारूद, कुहासा आदि।
- वह पदार्थ जो विलायक में अघुलनशील तथा आँखों से देखा जा सकता है, निलंबन कहलाता है। निलंबन एक विषमांगी मिश्रण होता है।
मिश्रण के अवयवों का पृथक्करण
- हाथ से चुनकर (Hand Picking)
- चलनी से चालकर (Sieving)
- निस्पंदन (Filtration) : यह एक फिल्टर पेपर के माध्यम से तरल और ठोस निलम्बित कणों को शीघ्रता तथा पूर्णतया हटाने की प्रक्रिया है। उदाहरण – चाय बनाते समय चाय की पत्तियों के ठोस कणों को छान के अलग करना।
- वाष्पीकरण (Evaporation) : हम वाष्पशील घटकों (विलायक) को इसके अवाष्पशील घटकों (वि लेय) से वाष्पीकरण की प्रक्रि या द्वारा पृथक्कर सकते हैं। ठदाहरण समुद्री जल से नमक की पुन: प्राप्ति।
- कार्डिग (Carding) : यह एक ऐसी प्रक्रिया है। जिसमें ऊन जैसी कुछ सामग्रियों के धागे हटाने के लिए ब्रश का उपयोग किया जाता है। इसका उपयोग साधारणतया टेक्सटाइल उद्योग में कि या जाता है।
- अपकेन्द्रण (Centrifugation) : इस प्रक्रिया में विषमांगी मि श्रण के अवसादन ( भारी कणों का बैठना) के लिए अपकेन्द्रीय बल (centrifugal force) का ठपयोग किया जाता है।
- क्रिस्टलीकरण (Crystallisation) : इस विधि के द्वारा अकार्बनि क ठोस मि श्रण को अलग किया जाता है। इस विधि में अशुद्ध ठोस मिश्रण को उचित विलायक (solvent) के साथ मिलाकर गर्म किया जाता है तथा गर्म अवस्था में ही कीप द्वारा छान लि या जाता है। छानने के बाद विक्यन को कम ताप पर धीरे-धीरे ठण्डा कि या जाता है। ठण्डा होने पर शुद्ध पदार्थ क्रिस्टल के रूप में विलियन से पृथक् हो जाता है। जैसे – शर्करा और नमक के मिश्रण को इथाइल अल्कोहल में 348 K ताप पर गर्म कर इस विधि द्वारा अलग किया जाता है।
- आसवन विधि (Distillation) : जब दो द्रवों के क्वथनांकों में अन्तर अधिक होता है, तो उसके मि श्रण को आसवन विधि से पृथक्करते हैं। अर्थात् यह द्रवों के मिश्रण को अलग करने की विधि है। इसका प्रथम भाग वाष्पीकरण (vaporisation) एवं दूसरा भाग संघनन (condensation) कहलाता हैं।
- ऊर्ध्वपातन (Sublimation) : इस विधि द्वारा दो ऐसे ठोसों के मिश्रण को अलग करते हैं, जि समें एक ठोस ऊर्ध्वपातित (sublimate) हो, दूसरा नहीं। इस विधि से कर्पूर, नेफ्थठीन, अमोनियम क्लोराइड, ऐंश्रासीन आदि को अलग करते है।
- आंशिक आसवन (Factional Distillation) : इस विधि से वैसे मिश्रित द्रवों को अलग करते हैं, जिनके क्वथनांकों में अन्तर बहुत कम होता है। खनि ज तेल या कच्चे तेल में से शुद्ध डीजल, पेट्रोल, मिट्टी तेल, कोलतार आदि इसी वि धि द्वारा अलग कि या जाता है।
- वर्णलेखन (Chromatography) : यह विधि इस तथ्य पर आधारित है कि किसी मिश्रण के विभिन्न घटकों की अवशोषण (absorption) क्षमता भिन्न-भिन्न होती है तथा वे किसी अधिशोषक पदार्थ में विभिन्न दूरियों पर अवशोषित होते हैं, इस प्रकार वे पृथक्कर लिए जाते हैं।
- भाप आसवन (Steam Disaillation) : इस विधि से कार्बनिक मिश्रण को शुद्ध किया जाता है, जो जल में अघुलनशील होता है, परन्तु भाप के साथ वाष्पशील होता है। इस विधि विशेष रूप से उन पदार्थों का शुद्धीकरण किया जाता है, जो अपने क्वथनांक पर अपघटित हो जाते है। जैसे – एसीटोन, मेथिल अल्कोहरु आदि।
- अवसादन और निस्तारण : इस विधि का उपयोग तब तक किया जाता है। जब एक घटक अघुलनशील ठोस होता है और दूसरा द्रव होता है अर्थात् मिट्टी और पानी।
प्रकृति में होनेवाले परि वर्तनों को दो भागों में बाटा जा सकता है —
- भौतिक परिवर्तन (Physical Change) वह है जि समें पदार्थ के कुछ गुणों (रंग, रूप आदि) में थोड़ा अस्थायी परि वर्तन अवश्य हो जाता है, कितु उसके मूल संघटन और द्रव्यमान में कोई परि वर्तन नहीं होता और इस परिवर्तन के फलस्वरूप कोई नया पदार्थ नहीं बनता है। उदाहरण – (क) जल का वाष्प बनना (ख) नमक का जल में विलय (ग) विद्युत बल्ब से प्रकाश का उत्सर्जन
- रासायनिक परिवर्तन (Chemical Change) वह परिवर्तन है जिसके फलस्वरूप पदार्थ नए पदार्थ में परिवर्तित हो जाता है जिसके गुण (संरचना, द्रव्यमान आदि) मूल पदार्थ से पूर्णत: भिन्न होते हैं और परिवर्तन लानेवाले कारण को हटा लेने पर भी पदार्थ अपनी मूल अवस्था में नहीं आता। उदाहरण – (क) लोहे में जंग लगना (ख) कोयले का जलना (ग) लोहे और गंथक के मिश्रण को गर्म करन (घ) शरीर में भोजन का पचना।
विलयन (Solution)
विलयन (Solution) दो या दो से अधिक पदार्थों का समांग मिश्रण है जिसमें किसी निश्चित ताप पर विलेय और विलायक की आपेक्षिक मात्राएँ एक निश्चित सीमा तक निरंतर परिवर्तित हो सकती हैं।
किसी विलयन में विलेय के कणों की त्रिज्या 10−7 सेमी से कम होती है। अतः इन कणों को सूक्ष्मदर्थी द्वारा भी नहीं देखा जा सकता है।
विलयन स्थायी एवं पारदर्शक होता है।
विलयन में जो पदार्थ अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में होता है, उसे विलायक कहते हैं तथा जो पदार्थ कम मात्रा में उपस्थित रहते हैं उसे विलेय कहते हैं। विलयन के प्रकार :
- किसी निश्चित ताप पर बना वह विलयन जिसमें विलेय की और अधिक मात्रा उस ताप पर घुलाई जा सकती है, असंतृप्त विलयन (Unsaturated Solution) कहलाता है।
- किसी निश्चित ताप पर बना वह विलयन जिसमें विलेय की अधिकतम मात्रा घुली हो, संतृप्त विलयन (Saturated Solution) कहलाता है।
- वह संतृप्त विलयन जिसमें विलेय की मात्रा उस विलयन को संतृप्त करने के लिए आवश्यक विलेय की मात्रा से अधिक घुली हुई हो, अतिसंतृप्त विलयन (Super Saturated Solution) कहलाता है। एक निश्चित ताप और दाब पर 100 g विलायक में
किसी निश्चित ताप और दाव पर 100 ग्राम वि लायक में घुलने वाली विलेय की अधिकतम मात्रा को उस विलेय पदार्थ की उस विलायक में विलेयता (Solubility) कहते हैं।
विलेयता = विलेय की मात्रा/विलायक की मात्रा × 100
किसी विलायक (या विलयन) की इकाई मात्रा में उपस्थित विलेय की मात्रा को विलयन का सांद्रण (Concentration of Solution) कहते हं। जिस विलयन में विलेय की पर्याप्त मात्रा घुली रहती है उसे सान्द्र वि लयन कषा जाता है और जिसमें वि लेय की कम मात्रा घुली रहती है उसे तनु विलयन कहा जाता है। सभी तनु विलयन असंतृप्त विलयन होते हैं। जो विलयन जितना ही अधिक तनु होता है वह उतना ही अधिक असंतृप्त होता है।
परिक्षेपण (D1ispc1sion): जब किसी पदार्थ के कण (परमाणु, अणु या आयन) दूसरे पदार्थ के कणों के ईर्द-गिर्द छितरा दिए जाते हैं तो यह क्रिया परिक्षेपण कहलाती है । पहले पदार्थ को परिक्षेपित पदार्थ और दूसरे को परिक्षेपण माध्यम कहा जाता है । परिक्षेपण के फलस्वरूप
दो प्रकार के पदार्थ बनते हैं– (i) विषमांग पदार्थ (निलंबन एवं कोलॉइड) (ii) समांग पदार्थ (वास्तविक विलयन) ।
निलेबन (Suspension) : इसमें परिक्षेपि त कणों का आकार 10−5 सेमी से 10−4 सेमी या इससे अधिक होता है । इन्हें आँखों से देखा जा सकता है। इसके कण छन्ना-पत्र के आर-पार नहीं आ-जा सकते | ये अस्थायी होते हैं तथा इनके कणों में परिक्षेपण माध्यम से अलग हो जाने की प्रवृति पायी जाती है। उदाहरण नदी का गंदा पानी, वायु में धुआँ आदि ।
कोलॉइड (Colloid) : इसमें परिक्षेपि त कणों का आकार 10−5 सेमी और 10−7 सेमी के बीच होता है । इसके कणों को नग्न आँखों की सहायता से नहीं देखा जा सकता बल्कि सूक्ष्मदर्शी की सहायता से देखा जा सकता है। इसके कण छन्ना-पत्र के आर-पार आ-जा सकते हैं लेकिन चर्म पत्र से नहीं नि कल सकते हैं। इसके कणों में परि क्षेपण माध्यम से अलग हो जाने की बहुत कम प्रवृति पायी जाती है। उदाहरण दूध, गोंद, रक्त, स्याही आदि।
3. परमाणु एवं अणु
- परमाणु (Atom), तत्व का वह छोटा-से छोटा कण है, जो किसी भी रासायनिक अभिक्रिया में भाग ले सकता है परन्तु स्वतंत्र अवस्था में नहीं रह सकता है।
- तत्व तथा यौगिक का वह छोटा-से-छोटा कण है, जो स्वतंत्र अवस्था में रह सकता है, अणु (Molecule) कहलाता है।
- धातु एवं अधातु युक्त यौगिक आवेशित कणों से बने होते हैं। इन आवेशित कणों को आयन कहते हैं। आयन एक आवेशित परमाणु अथवा परमाणुओं का एक ऐसा समूह होता है जिस पर नेट आवेश विद्यमान होता है। यह ऋण आवेश अथवा धन आवेश होता है। ऋण आवेशित आयन को ऋणायन (anion) तथा धन आवेशित आयन को धनायन (cation) कहते हैं। उदाहरण – सोडियम क्लोराइड (NaCl) को लीजिए। इसमें धनात्मक सोडियम आयन (Na+) तथा ऋणात्मक क्लोराइड आयन (Cl–) संघटक कण के रूप में विद्यमान होते हैं। परमाणुओं के समूह जिन पर नेट आवेश विद्यमान हो उसे बहुपरमाणुक आयन कहते हैं
रासायनिक संयोजन के नियम
द्रव्यमान संरक्षण का द्रव्य की अविनाशिता का नियम
- इस नियम को लेवोशिए ने सन् 1789 में दिया था।
- इस नियम के अनुसार, द्रव्य न तो बनाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है।
- किसी रासायनिक अभिक्रिया में अभिकारको का कुल द्रव्यमान = उत्पादों का कुल द्रव्यमान
स्थिर अनुपात का नियम
- इस नियम को जोसेफ प्राउस्ट ने सन् 1799 में दिया था।
- इस नियम के अनुसार, किसी यौगिक, में तत्वों के द्रव्यमानों का अनुपात सदैव समान होता है।
- विभिन्न स्थानों से लिए गए जल के प्रत्येक नमूने में भारानुसार हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन का अनुपात 1: 8 में होता है।
डाल्टन का परमाणु सि द्धान्त (0alton’s Atomic Theory)
रासायनिक संयोग के नियमों के आधार पर डाल्टन ने सन् 1803 में एक सिद्धान्त प्रतिपादित किया, जिसे डाल्टन का परमाणु सिद्धान्त कहा गया। इस सिद्धान्त के मुख्य बिन्दु निम्नलिखित हैं
"द्रव्य का वह सूक्ष्मतम कण जो रासायनिक अभिक्रियाओं में बिना विभाजित हुए भाग लेता है, परमाणु कहलाता है।”
- परमाणु को न तो बनाया जा सकता है और न ही नष्ट कि या जा सकता है।
- परमाणु अविभाज्य है अर्थात् परमाणु को किसी भी विधि से अन्य सूक्ष्म कणों में विभाजित नहीं किया जा सकता है।
- एक ही तत्व के परमाणु आकार, द्रव्यमान तथा अन्य सभी गुणों में एक-दूसरे के समान (Identical) होते है।
- विभिन्न तत्वों के परमाणु आकार, द्रव्यमान तथा अन्य सभी गुणों में एक-दूसरे से भिन्न होते हैं।
- दो या दो से अधिक तत्वों के परमाणु सरल गुणित अनुपात (अर्थात् 1:1, 1:2, 2:3 आदि) में संयुक्त होकर यौगिक परमाणु (जो अब अणु कहलाते हैं) बनाते हैं।
रासायनिक सूत्र लिखना
संकेत (प्रतीक)
तत्त्वों के नाम के संक्षिप्त रूप या चिह्न को संकेत या प्रतीक कहते हैं।
संकेत से प्राप्त सूचनाएँ :
- संकेत से तत्त्व के नामों का पता चलता है।
- किसी तत्त्व का संकेत उस तत्त्व के एक परमाणु को सूचित करता है।
- संकेत तत्त्व के एक ग्राम परमाणु-भार को सूचित करता है।
संकेत लिखने की प्रणाली – अनेक रसायनज्ञों ने संकेत या प्रतीक के संबंध में अपनी-अपनी प्रणाली रखी । जैसे – ग्रीक प्रणाली, डाल्टन प्रणाली, आदि ।
1813 ई० में बर्जीलियस ने संकेत के संबंध में अपनी प्रणाली रखी, जिसे बर्जीलियस प्रणाली कहते हैं। इसके अनुसार,
- तत्त्वों के संकेत उनके अंग्रेजी नामों के प्रथम अक्षर द्वारा दिया जाता है । जैसे – हाइड्रोजन के लिए H, आयोडीन के लिए I, आदि ।
- जब कई तत्त्वों के नाम एक ही अक्षर से शुरू होते हैं, तो उनके संकेतों के लिए उनके नाम से दो अक्षर लि ये जाते हैं । इनमें पहला अक्षर उनके नाम का पहला अक्षर होता है और दूसरा अक्षर नाम का वह अक्षर होता है, जि सपर उच्चारण में (बोलने में) विशेष जोर पड॒ता है। जैसे – बेरियम (Barium) के लिए Ba, बेरिलियम (Bery11ium) के लिए Be, ब्रोमीन (Bromine) के लिए Br, इत्यादि ।
- कुछ तत्त्वों के संकेत उनके लैटिन नामों के आधार पपर दि ये गये हैं। जैसे – सोडियम का लैटिन नाम नैट्रियम (Natnium) है, अतः इसका संकेत Na रखा गया । उसी प्रकार पोटैशियम का संकेत K है; जो इसके लैटिन नाम कैलियम (Kalium) से लिया गया है ।
किसी तत्त्व के अन्य तत्त्वों से संयोग करने की क्षमता को उस तत्त्व की संयोजकता कहते हैं और इसकी माप हाइड्रोजन परमाणुओं की उस संख्या से की जाती है जो उस तत्त्व के एक परमाणु से संयोग करती है या किसी अम्ल में से उस तत्त्व के एक परमाणु द्वारा विस्थापित होती है।
किसी यौगिक के अणु में उपस्थित तत्त्वों के परमाणुओं की संख्याओं के सरलतम अनुपात को व्यक्त करनेवाला सूत्र सरल या मूलाुनपाती सूत्र कहलाता है।
किसी तत्त्व या यौगि क के अणु में उपस्थि त तत्त्वों के परमाणुओं की वास्तवि क संख्या को व्यक्त करनेवाला सूत्र अणुसूत्र या रासायनिक सूत्र कहलाता है।
दो विभिन्न तत्त्वों से बना हुआ यौगि क द्विअंगी (011) यौगिक कहलाता है।
परमाणु या परमाणुओं का वह समूह जो रासायनिक अभिक्रियाओं के क्रम में अपरिवर्तित रहता है और बिना कुछ परिवर्तन के यह किसी पदार्थ के साथ संयोग कर सकता है या निष्कासित हो सकता है, मूलक कहलाता है।
4. परमाणु की संरचना
परमाणु अतिसूक्ष्म कणों (इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन व न्यूटन) से मिलकर बने होते हैं। परमाणु की संरचना के सम्बन्ध में विभिन्न परिकल्पनाएँ दी गई हैं। सर्वप्रथम परमाणु सिद्धान्त को प्रस्तुत करने का श्रेय जॉन डाल्टन को दिया जाता है।
परमाणु के मूल कण
परमाणु मुख्यतः तीन मूल कणों – इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन व न्यूट्रॉन से मिलकर बने होते हैं, क्योंकि ये परमाणु में सदैव उपस्थित होते हैं। हाइद्वोजन (1H1) यद्यपि इसका अपवाद है, क्योंकि इसमें न्यूट्रॉन अनुपस्थित होता है।
परमाणु के मूल कणों के गुण
| परमाणु के मूल कण | स्थिति | खोजकर्ता | आवेश (C) | द्रव्यमान (kg) |
|---|---|---|---|---|
| प्रोटॉन (p) | नाभिक के अन्दर | रदरफोर्ड | 1.6 × 10−19 C | 1.67 × 10−17 kg |
| न्यूट्रॉन (n) | नाभिक के अन्दर | चैडविक | 0 | 1.6750 × 10−27 kg |
| इलेक्ट्रॉन (e) | नाभिक के बाहर | जे.जे. थॉमसन | −1.6 × 10−19 C | 9.1 × 10−31 kg |
थॉमसन का परमाणु मॉडल (Thomson's Atomic Model)
जे.जे, थॉमसन ने सन् 1898 में प्रथम परमाणु मॉडल प्रस्तुत किया। इसके अनुसार
- परमाणु धनावेशित गोले का बना होता है और इलेक्ट्रॉन ठसमें उपस्थित होते हैं।
- परमाणु में ऋणात्मक और घनात्मक आवेश परिमाण में समान होते हैं, जिससे परमाणु विद्युतीय रूप से उदासीन होता है।
कमियां (Drawbacks)
यह मॉडल परमाणु की उदासीनता की व्याख्या तो करता था, परन्तु यह α-कणों के प्रकीर्णन प्रयोग और हाइड्रोजन परमाणु के स्पेक्ट्रम की व्याख्या करने में असमर्थ था।
रदरफोर्ड का परमाणु मॉडल (Ruthedford's Atomic Model)
वर्ष 1911 में रदरफोर्ड ने सोने की पतली पन्नी पर एल्फा (α) कणों की बौछार करके प्राप्त परिणामों से निम्न निष्कर्ष निकालें
- अधिकांश α-कण धातु की पन्नी से सीधे निकल जाते हैं, जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि परमाणु का अधिकांश भाग रिक्त होता है।
- कुछ एल्फा कण प्रतिकर्षित होकर मूल पथ से विभिन्न कोण बनाते हुए विचलित हो जाते हैं, जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि परमाणु के केन्द्र में कोई धनावेशित वस्तु स्थित है।
- बहुत धोड़े एल्फा कण जिस पथ से गए थे, उसी पथ से वापस लौट आए, जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि परमाणु का समस्त धनावेश एक अतिसूक्ष्म आयतन में केन्द्रित रहता है। इस धनावेशित भाग को रदफोर्ड ने नाभिक (nucleus) नाम दिया।
- इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर वृत्ताकार पथों में चक्कर लगाते हैं, जिन्हें कक्षाएं (कोश) कहते हैं।
- इलेक्ट्रॉन नाभिक के साथ स्थिर वैद्युत आकर्षण बलों द्वारा बँधे होते है।
कमियां (Drawbacks)
यह मॉडल परमाणु के स्थायि त्व तथा नाभि क के चारों ओर इलेक्ट्रॉन के वितरण की व्याख्या नहीं कर सका।
यह मॉडल स्पेक्ट्रम की व्याख्या नहीं कर सकता है।
बोर का परमाणु मॉडल (Bohr's Atomic Model)
- वर्ष 1913 में नील्स बोर ने मैक्स प्लांक के क्वाण्टम सिद्धान्त का उपयोग कर रदरफोर्ड के नाभिकीय मॉडल का एक संशोधित एवं विस्तृत रूप प्रस्तुत किया।
- इस मॉडल के अनुसार परमाणु में इलेक्ट्रॉन लगातार बिना ऊर्जा खोए अपनी अनुमत कक्षाओं में चक्कर लगाते हैं। इन कक्षाओं को स्थिर कक्षा (stationary orbit) या ऊर्जा स्तर (energy levels) कहते हैं।
- इन कक्षाओं या (कोशों) को K, L, M, N, … अक्षरों या संख्याओं 1, 2, 3, 4…. से प्रदर्शित करते हैं।
- इलेक्ट्रॉन तथा नाभिक के मध्य जो आकर्षण बल कार्य करता है, वह अपकेन्द्र बल द्वारा सन्तुलित होता है। अर्थात्
- इलेक्ट्रॉन केवल उन्हीं कक्षों में घूमते है, जि नमें उनका कोणीय संवेग का पूर्ण गुणक होता है अर्थात्
; n = 1, 2, 3, … - किसी परमाणु द्वारा ऊर्जा का अवशोषण या उत्सर्जन केवल तभी किया जाता है, जब इलेक्ट्रॉन एक ऊर्जा स्तर से दूसरे ऊर्जा स्तर तक जाता है।
कमियां (Drawbacks)
- बहु-इलेक्ट्रॉन परमाणुओं एवं आयनों के स्पेक्ट्रम की व्याख्या करने में असफल रहा।
- यह जीमान प्रभाव और स्टार्क प्रभाव की व्याख्या करने में असफल रहा।
- यह परमाणुओं के रासायनिक आबन्धों द्वारा अणु बनाने की योग्यता की व्याख्या नहीं कर सका।
परमाणु संख्या एवं द्रव्यमान संख्या
- किसी तत्व के परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों की संख्या उस परमाणु की परमाणु संख्या (परमाणु क्रमांक) कहलाती है।
- परमाणु क्रमांक तत्वों का मूलभूत गुण (अभिलाक्षणिक गुण) है।
- परमाणु को उदासीन बनाए रखने के लिए उसमें इलेक्ट्रॉनों की संख्या प्रोटॉनों की संख्या के बराबर होती है।
- किसी भी परमाणु की द्रव्यमान संख्या उस परमाणु में उपस्थित न्यूक्लिऑनों (न्यूट्रॉन तथा प्रोटॉन) की कुल संख्या के बराबर होती है अर्थात् प्रोटॉन और न्यूट्रॉन की संख्याओं का योग उस परमाणु की द्रव्यमान संख्या (A) कहलाती है।
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