Piyusham Class 9 Chapter 6 संस्कृतसाहित्ये पर्यावरणम् Notes
[ अधुना वैज्ञानि के युगे यदा प्रकृति ः असन्तुलि ता जाता तदा पर्या वरणस्य चर्चा भवति । कथं प्रदूषणं दूरीकरणीयम्, प्रकृति ः सन्तुलि ता भवेत्,पशुपक्षि णः स्वस्वरूपेषु स्थिता भवन्तु, मानवश्च शुद्धं जलं वायुं च लभेत, जीवनं च कल्याणमयं स्यादि ति प्रश्नः भूयोभूयः सर्वा न्आन्दोलयति । संस्कृतसाहि त्ये नेयमवस्था आसीदि ति पाठेऽस्मि न्संक्षेपेण आदर्शरूपस्य पर्या वरणस्य नि रूपणं वर्तते।] अर्थ – आज वैज्ञानि क युग में जब प्रकृति असंतुलि त हुई तब पर्या वरण की चर्चा होती है । कैसे प्रदूषण को दूर करना चाहि ए, प्रकृति को संतुलि त होना चाहि ए, पशु-पक्षी अपने-अपने रूपों में स्थि त हों और मनुष्य को शुद्ध जल और वायु मि लें, और जीवन कल्याणमय हो, ये प्रश्नसबको बार-बार आन्दोलि त करते हैं । संस्कृत साहि त्यों में यह अवस्था नहीं थी, इस पाठ में संक्षप में पर्या वरण को आदर्शरूप का नि रूपण है । भूमि र्जलं नभो वायुरन्तरि क्षं पशुस्तृणम्। साम्यं स्वस्थत्वमेतेषां पर्या वरणसंज्ञकम्॥ अर्थ – भूमि , जल, नभ, वायु अन्तरि क्ष, पशु एवं घास की–इन सबों की स्वस्थ समता ही पर्या वरण कहा जाता है। संस्कृतसाहि त्यस्य महती परम...
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Guddu Kumar