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BSEB Class 9 Disaster Management Chapter 2 Summary & Notes

📚 अध्याय-11: मानवीय गलतियों के कारण घटित आपदाएँ

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Notes

🌟 1. परिचय: मानवीय भूल और विकास का चौराहे (Introduction)

आपदा एक ऐसी अचानक और अप्रत्याशित त्रासदी है जो न सिर्फ मानव समुदाय बल्कि संपूर्ण जैविक समूहों के लिए जान-माल की भारी क्षति लाती है। सामान्यतः आपदाओं को दो वर्गों में रखा जाता है— (अ) प्राकृतिक आपदाएं तथा (ब) मानवीय गलतियों के कारण घटित आपदाएं।

  • 🏔️ प्राकृतिक बनाम मानवजनित: प्राकृतिक आपदाओं (भूकंप, सुनामी, भूस्खलन आदि) पर मनुष्य का कोई नियंत्रण नहीं होता और अनादि काल से इसे 'ईश्वर की कुदृष्टि' कहा जाता रहा है।
  • 🛑 गलतियों से नहीं बच सकते: लेकिन जापान के हिरोशिमा पर परमाणु बम विस्फोट (1945) या भारत की भोपाल गैस त्रासदी (1984) जैसी भयानक घटनाओं को हम 'ईश्वर की कुदृष्टि' कहकर अपनी गलतियों से पीछे नहीं भाग सकते।
  • 🔬 विज्ञान का दूषित उपयोग: औद्योगिक प्रतिस्पर्धा के इस युग में विज्ञान का वास्तविक उद्देश्य जन-कल्याण और गरीबी मिटाना था, लेकिन वैज्ञानिक ज्ञान का दूषित उपयोग मानवजनित आपदाओं को लगातार बढ़ा रहा है। यदि समय रहते इस पर काबू नहीं पाया गया, तो भविष्य में मानवीय भूलों से मरने वालों की संख्या प्राकृतिक आपदाओं से भी अधिक होगी।

☢️ 11.1 नाभिकीय आपदा (Nuclear Disaster)

विज्ञान की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है नाभिकीय ऊर्जा (Nuclear Energy)। इसके अंतर्गत यूरेनियम और प्लूटोनियम जैसे खनिजों को परिष्कृत कर न्यूक्लियर रिएक्टर में नाभिकीय विखंडन (Nuclear Fission) कराया जाता है जिससे बिजली या ऊर्जा मिलती है। लेकिन जब इसी ऊर्जा का प्रयोग परमाणु हथियार (Atom Bomb) बनाने में होता है, तो यह महाविनाश का कारण बनती है।

📜 प्रमुख ऐतिहासिक एवं राष्ट्रीय तथ्य:

  • 🚀 सामरिक क्षमता: वर्तमान में भारत, चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देश परमाणु अस्त्रों की तकनीक से संपन्न हैं। भारत ने राजस्थान के मरुस्थल (पोखरण) में ज़मीन के अंदर परमाणु विस्फोट कर अपनी अभूतपूर्व सामरिक क्षमता का परिचय दिया है।
  • 🇯🇵 जापान की त्रासदी (1945): द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम चरण में संयुक्त राज्य अमेरिका ने जापान के दो आलीशान शहरों पर हवाई हमले से परमाणु बम गिराए, जिससे वे कब्रिस्तान बन गए:
    • 6 अगस्त, 1945: हिरोशिमा (Hiroshima) पर हमला.
    • 9 अगस्त, 1945: नागासाकी (Nagasaki) पर हमला.
    • 📉 प्रभाव: लाखों लोगों की तत्काल मौत हुई और बचे हुए लोगों में परमाणु रेडिएशन के प्रभाव से कैंसर, चर्म रोग तथा मानसिक अवसाद (मनोरोग) जैसी स्थायी बीमारियाँ पैदा हो गईं।
  • 🇺🇦 चेर्नोबिल दुर्घटना (1986): तत्कालीन सोवियत संघ (रूस) के चेर्नोबिल नगर में एक न्यूक्लियर रिएक्टर में मानवीय भूल के कारण भयंकर रेडियोधर्मी रिसाव हुआ, जिसने सैकड़ों लोगों की जान ली और वातावरण को सालों तक ज़हरीला बनाए रखा।
  • 🇮🇳 भारत की स्थिति: सन् 1993 ई० में भारत के नरोरा परमाणु केंद्र पर भी एक भयंकर दुर्घटना होते-होते बची थी। भारत में तारापुर (महाराष्ट्र) तथा कलपक्कम् (चेन्नई) परमाणु ऊर्जा केंद्रों पर श्रमिकों को बिना एंटी-रेडिएशन जैकेट और अधूरी जानकारी के काम कराने की रिपोर्ट्स भी सामने आई हैं जो चिंताजनक हैं।

🗑️ परमाणु कचरा (Nuclear Waste) का संकट

परमाणु ऊर्जा उत्पादन के बाद बचे हुए कचरे का यदि सही ढंग से निस्तारण न किया जाए, तो वह कुछ समय बाद स्वतः दोबारा रेडिएशन फैलाने लगता है।

  • 🛠️ सही तरीका: इसे बस्तियों से दूर विशेष रूप से निर्मित मजबूत स्टोर हाउस में रखा जाए या पृथ्वी की अत्यधिक गहराई में डंप किया जाए।
  • ❌ गलत तरीका: ऐसी सूचनाएं मिलती हैं कि अमीर व शक्तिशाली देश इस खतरनाक कचरे को या तो समुद्र में फेंक देते हैं या गरीब देशों की बंजर भूमि में डंप कर देते हैं। यहाँ तक कि परमाणु ऊर्जा से चलने वाली सबमरीन (पनडुब्बियों) की रॉड ऊर्जा समाप्त होने पर समुद्र में ही गिरा दी जाती हैं।

🛡️ नाभिकीय आपदा का प्रबंधन और बचाव

  1. 🕊️ परमाणु अप्रसार नीति: सभी देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परमाणु बम न बनाने के समझौते पर सहमत हों। भारत ने स्पष्ट किया है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल विकास और विद्युत (बिजली) उत्पादन के लिए है।
  2. ⚠️ अंतरराष्ट्रीय प्रतीक चिह्न: वर्ष 1946 ई० में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय द्वारा रेडियोधर्मी आपदा से बचाव और सामूहिक एकता को दर्शाने के लिए तीन पंखों वाला अंतरराष्ट्रीय रेडियोधर्मी प्रतीक विकसित किया गया।
  3. 📍 बस्तियों से दूरी: परमाणु केंद्रों की स्थापना घनी आबादी वाले क्षेत्रों से बहुत दूर की जानी चाहिए (जैसे भारत का कैगा परमाणु केंद्र)।
  4. 🧥 सुरक्षात्मक पोशाक: वैज्ञानिकों और श्रमिकों के लिए रेडिएशन-प्रतिरोधी (Anti-Radiation) जैकेट और मास्क पहनना अनिवार्य होना चाहिए।
  5. 🕳️ सुरक्षित तहखाने (Bunkers): परमाणु क्षेत्रों के आस-पास पर्याप्त भूमिगत तहखानों का निर्माण होना चाहिए ताकि चेतावनी मिलते ही लोग रेडिएशन से बचने के लिए अंदर जा सकें, क्योंकि निश्चित गहराई के बाद रेडिएशन का प्रभाव कम हो जाता है।
  6. 🚫 क्या न करें: दुर्घटना की स्थिति में खुले भोजनालयों के भोजन का प्रयोग न करें और आग जलाने का कार्य बिल्कुल न करें।

🧪 11.2 रासायनिक आपदा (Chemical Disaster)

औद्योगिक विकास और रासायनिक पदार्थों के अंधाधुंध उत्पादन ने कई क्षेत्रों में रासायनिक आपदा का रूप ले लिया है। इसे तीन प्रमुख भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

🌾 (क) विषैले रासायनिक उत्पादों से उत्पन्न छिपी हुई आपदाएँ (Hidden Hazards)

  • 🌾 हरित क्रांति की चुनौती: कृषि में रासायनिक खादों (Chemical Fertilizers) और कीटनाशकों (Pesticides) के अत्यधिक प्रयोग से मिट्टी के मित्र सूक्ष्म जीव नष्ट हो रहे हैं और फसलें विषैली हो रही हैं। कभी-कभी यह जहर बहकर तालाबों में जाता है जिससे पशु और मनुष्य बीमार पड़ रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार भारत के 80% कीटनाशक मानवीय स्वास्थ्य के लिए अत्यंत खतरनाक हैं।
  • 🏙️ महानगरों का अदृश्य जहर: वाहनों में जीवाश्म ईंधन (पेट्रोल-डीजल) के जलने से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन गैस से दम घुटने, आँखों और त्वचा में जलन की समस्या हो रही है। इसके लिए खोपड़ी के निशान वाला विषैले रासायनिक आपदा का प्रतीक तय किया गया है।
  • 🌧️ अम्लीय वर्षा (Acid Rain): कारखानों से निकलने वाली सल्फर डाइऑक्साइड () और नाइट्रोजन ऑक्साइड गैसें जब वायुमंडल की नमी से क्रिया करती हैं, तो सल्फ्यूरिक और नाइट्रिक अम्ल बनकर बरसती हैं। बिहार-झारखंड का दामोदर घाटी प्रदेश इससे सबसे ज्यादा प्रभावित है। इससे हरे-भरे पेड़ों के पत्ते मृतप्राय हो जाते हैं और वन वीरान हो जाते हैं।

⚔️ (ख) रासायनिक युद्ध सामग्री के उपयोग से उत्पन्न आपदा (Chemical Warfare)

  • 💣 इतिहास: द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी के तानाशाह हिटलर द्वारा लाखों यहूदियों को बंद गैस घरों (Gas Chambers) में जहरीली गैस छोड़कर अमानवीय रूप से मार दिया गया था। अमेरिका द्वारा इराक पर हमले का एक बड़ा कारण भी रासायनिक हथियारों का अवैध संग्रह बताया गया था। इन हथियारों की गैसों के संपर्क में आने से त्वचा तुरंत जलने और गलने लगती है तथा दम घुटने से मौत हो जाती है।इसके लिए तीन छल्लों वाला रासायनिक युद्ध आपदा का प्रतीक निर्धारित है।

🏭 (ग) रासायनिक औद्योगिक इकाइयों में रिसाव और कचरे से उत्पन्न आपदा

🚨 भोपाल गैस त्रासदी (Bhopal Gas Tragedy) — 1984

  • 📅 तिथि: 2-3 दिसंबर 1984 की मध्य रात्रि।
  • 🏭 कंपनी व गैस: भोपाल स्थित 'यूनियन कार्बाइड' के कीटनाशक कारखाने से मिथाइल आइसोसायनेट (MIC - Methyl Isocyanate) नामक अत्यंत जहरीली गैस का लगभग 45 टन रिसाव हुआ था।
  • 📉 भयंकर परिणाम: इसके प्रभाव से तत्काल लगभग 2,000 लोग मारे गए। वर्ष 1989 तक मरने वालों का आंकड़ा बढ़कर 16,000 तथा घायलों व मानसिक/शारीरिक रूप से अपंग होने वालों की संख्या 50,000 से अधिक हो गई। आज भी वहाँ की पीढ़ियाँ डिप्रेशन, कफ और मानसिक अपंगता झेल रही हैं।
  • 📍 अन्य उदाहरण: 5 जुलाई, 1997 को तमिलनाडु के तूतीकोरिन में एक ताँबा गलाने के कारखाने में गैस रिसाव से वहाँ काम करने वाली 90 लड़कियाँ निमोनिया, उल्टी और छाती में जलन का शिकार हुईं।

🛠️ रासायनिक आपदा का प्रबंधन:

  • 💨 हवा के विपरीत भागें: गैस रिसाव की स्थिति में हमेशा हवा के बहने की उल्टी दिशा (Opposite Direction) में भागना चाहिए। भोपाल में लोगों को यह जानकारी न होने के कारण मौतें ज्यादा हुईं।
  • 🛡️ सुरक्षा उपकरण: कारखानों में पर्याप्त पानी, अग्निशामक यंत्र, वायुमापन यंत्र होने चाहिए तथा श्रमिकों को मास्क, ग्लव्स और विशेष जूते अनिवार्य रूप से दिए जाएँ।
  • 🌾 सतत हरित क्रांति: रासायनिक खादों के स्थान पर जैविक उर्वरक (Bio-fertilizers) तथा संकर बीजों के स्थान पर परंपरागत बीजों के संरक्षण को बढ़ावा देकर हरित क्रांति को 'सतत हरित क्रांति' (Evergreen Revolution) में बदलने की आवश्यकता है (प्रो० स्वामीनाथन के अनुसार)।

🦠 11.3 जैविक आपदा (Biological Disaster)

जैविक आपदा का मूल कारण वे सूक्ष्म जीव (Bacteria, Virus, Organism) और उनसे प्राप्त पदार्थ हैं, जो मानव और मवेशियों के स्वास्थ्य पर जानलेवा हमला कर महामारी (Epidemic) का रूप ले लेते हैं।

📊 जैविक आपदा के चार प्रमुख वर्ग (CDC के अनुसार):

संयुक्त राज्य अमेरिका के 'रोग नियंत्रण एवं रोकथाम केंद्र' (CDC) ने इसे चार श्रेणियों में विभाजित किया है:

  • (अ) प्रथम वर्ग (कम विनाशकारी): सूक्ष्म जीवाणु और वायरस जो चिकन पॉक्स या केनिन हेपेटाइटिस जैसी सामान्य बीमारियाँ फैलाते हैं। बचाव के लिए ग्लव्स और मास्क का प्रयोग तथा प्रदूषित पदार्थों से दूरी पर्याप्त है।
  • (ब) द्वितीय वर्ग (मध्यम): इसके अंतर्गत सूक्ष्म जीवों से फैलने वाले हेपेटाइटिस A, B और C, इन्फ्लूएंजा, मिजिल्स और एड्स (AIDS) जैसी बीमारियाँ आती हैं। बचाव के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अनुशंसित स्वच्छ भोजन और गर्म जल का सेवन आवश्यक है।
  • (स) तृतीय वर्ग (विनाशकारी महामारी): इसके वायरस मानव समूह में तबाही लाते हैं, जैसे— एंथ्रेक्स, स्मॉल पॉक्स, मलेरिया, हैजा, डायरिया और पीला बुखार।
    • 🎯 बिहार की विशेष समस्या — कालाजार (Kala-azar): यह बीमारी मुख्य रूप से बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में पायी जाती है, जो बालू मक्खी (Sand Fly) के काटने से फैलती है। इससे लीवर और प्लीहा (Spleen) का आकार बढ़ जाता है। भारत में 1995 में इस संक्रमण से लगभग 2,56,000 लोगों की मृत्यु हुई थी।
  • (द) चतुर्थ वर्ग (अति विनाशकारी वैश्विक संकट): इसमें सबसे घातक वायरस आते हैं, जैसे— इबोला, डेंगू बुखार, बर्ड फ्लू और एचआईवी (HIV)।
  • 🦟 डेंगू (Dengue): दिल्ली महानगर में 1996 ई० में डेंगू से 423 लोग मरे थे। इसका मुख्य कारण एक बर्तन या जगह पर अधिक समय तक पानी का जमा रहना है, जिससे डेंगू के मच्छर पनपते हैं।
  • 🩸 एड्स (HIV): भारत में पहली बार 1986 में इसका पता चला। WHO के अनुसार भारत में लगभग 25 लाख लोग इससे ग्रसित हैं और इसका कोई पूर्ण इलाज नहीं है। यह दूषित खून चढ़ाने या वंशानुगत कारणों से फैलता है।

💣 जैविक अस्त्र से उत्पन्न आपदा (Biological Weapons — "गंदा बम")

आधुनिक युद्ध तकनीक में वायरस और बैक्टीरिया को 'भारी विनाश का अस्त्र' (Weapon of Mass Destruction) या 'गंदा बम' (Dirty Bomb) के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है।

  • 📜 इतिहास: इस तकनीक की शुरुआत जापानियों द्वारा की गई थी, लेकिन इसका वास्तविक और खौफनाक प्रयोग वर्ष 2001 में अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमले के बाद देखा गया, जब महत्वपूर्ण सामरिक क्षेत्रों में डाक सेवा (Post) द्वारा एंथ्रेक्स (Anthrax) नाम का जानलेवा जीवाणु पाउडर के रूप में भेजा जाने लगा। यह जीवाणु सांस के जरिए शरीर में जाकर खून में जहर पैदा कर देता है।
  • ⭕ चार छल्लों का प्रतीक: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जैविक आपदा से सामूहिक रूप से मिलकर लड़ने के संदेश के रूप में चार छल्लों वाला अंतरराष्ट्रीय जैविक आपदा प्रतीक विकसित किया गया है।

🛠️ जैविक आपदा से तत्काल बचाव के 9 सूत्र (SCERT मार्गदर्शिका):

  1. हमेशा शुद्ध पेयजल और यथासंभव गर्म जल तथा ताजा भोजन का ही उपयोग करें।
  2. अपने आस-पास या बर्तनों में गंदे पानी को जमा न होने दें ताकि डेंगू के लार्वा उत्पन्न न हो सकें।
  3. बस्तियों और नालियों में लगातार सफाई बनाए रखें तथा डी०डी०टी० (DDT) पाउडर का छिड़काव करें।
  4. बुखार या संक्रमण के लक्षण दिखने पर समय-समय पर खून की जाँच कराएं।
  5. सार्वजनिक शौचालयों को नियमित रूप से ब्लीचिंग पाउडर डालकर स्वच्छ रखें।
  6. किसी भी अनजान व्यक्ति द्वारा दिए गए लावारिस पैकेट, डिब्बे या चिट्ठी को बिना ग्लव्स के हाथ न लगाएं (एंथ्रेक्स का खतरा)।
  7. संदिग्ध और खतरनाक क्षेत्रों की जांच के लिए खोजी कुत्तों (Dog Squad) की मदद लें।
  8. स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा आम लोगों को स्वच्छता का प्रशिक्षण और परामर्श (Counselling) दिया जाए।
  9. विद्यालय के स्तर पर विद्यार्थियों को इन बीमारियों और महामारियों के प्रति जागरूक किया जाए।

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