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BSEB Class 9 Economics Chapter 4 Summary & Notes

📚 इकाई-4: बेकारी (Unemployment) — संपूर्ण डिजिटल नोट्स

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Notes

🌟 1. परिचय: बेकारी या बेरोजगारी क्या है? (What is Unemployment?)

  • 📌 परिभाषा: बेकारी वह आर्थिक परिस्थिति या समस्या है जिसमें कोई व्यक्ति प्रचलित-मजदूरी की दर पर कार्य करने का इच्छुक और योग्य हो, किन्तु उसे मनपसंद या कोई भी काम नहीं मिल पाता है।
  • 🔗 दो मुख्य बातें: बेकारी की धारणा के अंतर्गत दो मुख्य बातें अनिवार्य हैं— (1) व्यक्ति द्वारा सक्रिय रूप से काम खोजना और (2) वर्तमान में काम के लिए उपलब्ध रहना
  • 👥 श्रम बल (Labour Force) की आयु सीमा: अर्थशास्त्र के नियमानुसार 'श्रम बल जनसंख्या' में केवल उन्हीं लोगों को शामिल किया जाता है जिनकी उम्र 15 वर्ष से 59 वर्ष के बीच होती है।
    • ❌ अपवाद (जिन्हें बेरोजगार नहीं कह सकते): 15 वर्ष से कम आयु के बच्चे (जैसे खेल-कूद में समय बिताने वाले जीतू-सीतू), 60 वर्ष से अधिक आयु के वृद्ध (दादा-दादी) और वे महिलाएँ (जैसे घरेलू कामकाज करने वाली सीता देवी) जो घर के बाहर जाकर पारिश्रमिक (पैसा) कमाने की इच्छुक नहीं हैं।
  • 🤝 गरीबी से संबंध: बेकारी और गरीबी हमेशा साथ-साथ चलते हैं, क्योंकि जो व्यक्ति आजीविका अर्जित करने में असमर्थ होता है, वह निश्चित रूप से गरीबी का दंश झेलता है।

📊 2. बेरोजगारी का वर्गीकरण एवं स्वरूप (Types of Unemployment)

भारत और बिहार के संदर्भ में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में बेरोजगारी की प्रकृति में बड़ा अंतर पाया जाता है:

┌──────────────────────────────┐│      बेरोजगारी के मुख्य रूप     │└──────────────┬───────────────┘┌─────────────────────────────┴─────────────────────────────┐▼                                                           ▼🌾 ग्रामीण बेरोजगारी                                         🏢 शहरी बेरोजगारी• मौसमी बेरोजगारी                                           • शिक्षित बेरोजगारी• छिपी (प्रच्छन्न) हुई बेरोजगारी                              • औद्योगिक बेरोजगारी• प्रच्छन्न बेरोजगारी                                         • तकनीकी बेरोजगारी

🌾 (A) ग्रामीण बेरोजगारी (Rural Unemployment):

  1. 📅 मौसमी बेरोजगारी (Seasonal Unemployment): मौसम में परिवर्तन के कारण उत्पन्न होने वाली बेकारी को मौसमी बेरोजगारी कहते हैं। भारतीय कृषि पूरी तरह मानसून पर निर्भर है। खेती का कार्य विभिन्न चरणों (रोपनी, पटौनी, निकौनी तथा कटनी) में बंटा होता है। इन चरणों के पूरा होने के बाद फसल तैयार होने की समयावधि में ग्रामीण क्षेत्रों में वैकल्पिक काम न होने के कारण कृषि-मजदूर कई महीनों तक बेकार बैठ जाते हैं।
  2. 👁️ छिपी या प्रच्छन्न हुई बेरोजगारी (Disguised Unemployment): इसके अंतर्गत लोग काम पर नियोजित (लगे हुए) तो प्रतीत होते हैं, लेकिन कुल उत्पादन में उनका कोई योगदान नहीं होता।
    • 💡 उदाहरण: यदि किसी खेत के भूखंड पर काम करने के लिए केवल 5 लोगों की आवश्यकता है, लेकिन उस परिवार के सभी 8 सदस्य उसी खेत पर काम कर रहे हैं। यहाँ जो 3 अतिरिक्त लोग लगे हैं, वे प्रच्छन्न रूप से बेरोजगार हैं। यदि इन तीनों को काम से हटा भी दिया जाए, तो खेत की कुल उत्पादकता में कोई कमी नहीं आएगी। इसलिए प्रच्छन्न बेरोजगारी की सीमांत उत्पादकता हमेशा शून्य (0) होती है

🏢 (B) शहरी बेरोजगारी (Urban Unemployment):

  1. 📚 शिक्षित बेरोजगारी (Educated Unemployment): देश में शिक्षा की सुविधाओं के तेजी से प्रसार और दोषपूर्ण शिक्षा पद्धति के कारण पढ़े-लिखे युवाओं को योग्यता के अनुसार काम नहीं मिल पाता। मैट्रिक, स्नातक (Graduate) और स्नातकोत्तर (Post Graduate) डिग्रीधारी लाखों युवक-युवतियाँ आज इस श्रेणी में शामिल हैं।
  2. 🏭 औद्योगिक बेरोजगारी (Industrial Unemployment): आधुनिक युग में औद्योगिक प्रसार का ढाँचा पूरी तरह स्वचालित और आधुनिक तकनीकों पर आधारित है, जिससे मानव श्रम-शक्ति की आवश्यकता बहुत कम हो गई है। ग्रामीण क्षेत्रों से भारी संख्या में लोग काम की तलाश में शहरों की ओर पलायन करते हैं, लेकिन उद्योगों में जगह न होने या मशीनीकृत व्यवस्था के कारण होने वाली छंटनी के चलते वे इस बेकारी का शिकार हो जाते हैं।
  3. ⚙️ तकनीकी बेरोजगारी (Technical Unemployment): आधुनिक युग में नए-नए तकनीकी परिवर्तनों और उन्नत मशीनों के आने से पहले से कार्यरत पुराने कर्मियों की छंटनी कर दी जाती है।
    • 🧵 उदाहरण: कपड़ा मिलों में बड़ी आधुनिक मशीनों के आने से पारंपरिक हैंडलूम-बुनकर बड़े पैमाने पर बेकार हो गए। बिहार के भागलपुर और गया जिलों में मशीनी उत्पादन क्रिया के कारण पारंपरिक हैंडलूम उद्योगों में यह बेकारी व्यापक रूप से फैली है।

📊 3. आंकड़ों का विश्लेषण: भारत एवं बिहार (1999-2000)

योजना आयोग और मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट्स के अनुसार, बिहार में श्रम-शक्ति का संतुलन और बेरोजगारी की दर देश के औसत से काफी भिन्न है:

  • 🌾 ग्रामीण बेरोजगारी दर: भारत का औसत 7.20% है, जबकि बिहार का ग्रामीण औसत 7.00% है।
  • 🏢 शहरी बेरोजगारी दर (चिंताजनक): भारत का राष्ट्रीय औसत 7.70% है, जबकि बिहार का शहरी बेरोजगारी औसत 9.30% है।
  • 🚺 महिला बेरोजगारी (शहरी बिहार): शहरी क्षेत्रों में बिहार की महिलाओं की बेरोजगारी दर 13.50% (अत्यधिक उच्च) है, जो महिलाओं में कौशल और रोजगार के अवसरों की भारी कमी को दर्शाती है।

📖 4. गोबिन्दपुर गाँव की कहानी (अजय-विजय के संघर्ष की दास्तान)

बेकारी के विभिन्न आयामों को व्यावहारिक रूप से समझने के लिए आइए बिहार के नवादा जिला के 'गोबिन्दपुर' प्रखंड की कहानी पढ़ते हैं, जिसकी सीमा झारखंड राज्य से सटी हुई है।

  • 🏞️ गाँव की पृष्ठभूमि: गोबिन्दपुर गाँव की आबादी लगभग 8,000 है। यहाँ 'सकरी' नामक एक बरसाती नदी बहती है। गाँव में नहर, आहर, पैन या डैम जैसे सिंचाई का कोई कृत्रिम साधन नहीं है। बिजली भी पूरे दिन में मात्र आधे-एक घंटे ही आती है। अतः यहाँ की पूरी कृषि मानसून पर आश्रित है।
  • 📉 रामधनी के परिवार का संकट: गाँव के एक छोटे कृषि-मजदूर रामधनी के पास मात्र 7 कट्ठा जमीन है। उसके दो बेटे— विजय और अजय खेतों में उसका हाथ बंटाते हैं। वे वर्ष में केवल दो महीने (फसल बुवाई और कटाई के समय) ही काम पाते हैं और बाकी समय बेकार बैठते हैं (यानी मौसमी व छिपी हुई बेकारी का सामना करते हैं)। विजय और अजय के न रहने पर भी खेत में उतना ही अनाज पैदा होता था, जितना उनके रहने पर (यानी सीमांत उत्पादकता शून्य थी)।
  • ❌ तकनीकी बेकारी का झटका: काम की तलाश में दोनों भाई कलकत्ता (कोलकाता) चले गए और एक चमड़े के कारखाने में मजदूरी करने लगे। कुछ समय बाद कारखाने में आधुनिक तकनीक की नई मशीनें आ गईं। चूँकि दोनों भाई मशीनी काम नहीं जानते थे और अप्रशिक्षित थे, इसलिए उन्हें कारखाने से निकाल दिया गया और वे तकनीकी बेरोजगारी के शिकार होकर वापस गाँव आ गए।
  • 🚀 स्वरोजगार से आत्मनिर्भरता: गाँव लौटने पर बढ़ते पारिवारिक कर्ज और बहनों की शादी की चिंता के बीच दोनों भाइयों ने हिम्मत नहीं हारी। वे प्रखंड कार्यालय (Block Office) गए और सरकार द्वारा चलाए जा रहे युवा स्वरोजगार प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लेकर साइकिल मरम्मती का तकनीकी हुनर सीख लिया। इसके बाद उन्होंने बैंक से ₹10,000 का ऋण (लोन) लेकर गाँव में साइकिल रिपेयरिंग की एक छोटी दुकान खोल ली। गाँव में कोई दूसरी दुकान न होने के कारण उनकी कड़ी मेहनत रंग लाई, बैंक का कर्ज भी चुकता हो गया और वे गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकलकर सफल आत्मनिर्भर युवक बन गए।

🚨 5. भारत व बिहार में बेकारी के 7 मुख्य कारण (Causes)

  1. 💥 अत्यधिक जनसंख्या: देश की बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या (2001 में 102 करोड़ पार) श्रम बाजार पर भारी दबाव डाल रही है, जिससे रोजगार के अवसर कम पड़ रहे हैं।
  2. 📚 व्यापक अशिक्षा: बिहार में अशिक्षितों की संख्या 53 प्रतिशत (2001 के अनुसार सबसे नीचे) है। शिक्षा और विशेष तकनीकी कुशलता की कमी के कारण विशेषकर महिलाओं को संगठित क्षेत्रों में स्थायी रोजगार नहीं मिल पाता।
  3. 🌾 कृषि का पिछड़ापन: कृषि पूरी तरह अनिश्चित मानसून पर निर्भर है, जिससे अक्सर उत्तरी बिहार में भीषण बाढ़ (जैसे कोसी, बागमती का तांडव) और दक्षिणी बिहार में सुखाड़ की स्थिति बनी रहती है। पुराने उपकरणों व सिंचाई के आधुनिक साधनों की कमी से कृषि में बेकारी पनपती है।
  4. ⚖️ कृषि पर जनसंख्या का अत्यधिक बोझ: देश की आधे से अधिक आबादी आजीविका के लिए केवल खेती पर निर्भर है, जिससे सेवा और उद्योग क्षेत्रों पर दबाव कम है और कृषि में 'छिपी बेरोजगारी' बढ़ती जा रही है।
  5. 🏭 औद्योगीकरण का अभाव (बिहार का विशेष झटका): 15 नवंबर, 2000 को अविभाजित बिहार से झारखंड राज्य के अलग हो जाने के कारण बिहार के सभी प्रमुख औद्योगिक नगर (जैसे जमशेदपुर, बोकारो, राँची, धनबाद) झारखंड में चले गए। शेष बिहार में कृषि-आधारित उद्योगों का पर्याप्त विकास न होना बेकारी का बड़ा कारण है।
  6. 💰 पूँजी का अभाव: निम्न प्रति व्यक्ति आय के कारण बचत और पूँजी निर्माण की दर बहुत धीमी है, जिससे नए उद्योगों में वांछित निवेश नहीं हो पाता।
  7. 🛠️ प्रशिक्षित श्रम-शक्ति की कमी: प्रशिक्षण के अभाव में भारतीय मजदूर कंप्यूटर, प्रबंधन और आधुनिक भारी मशीनों को चलाने में असमर्थ हैं, जिससे वे आधुनिक रोजगारों की दौड़ से बाहर हो जाते हैं।

🛡️ 6. बेकारी का समाज और अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव (Impact)

🎭 (A) सामाजिक प्रभाव (Social Impact):

  • 🛑 जनशक्ति संसाधन की बर्बादी: देश की अमूल्य और ऊर्जावान युवा श्रम-शक्ति बिना किसी उत्पादक कार्य के पूरी तरह बर्बाद हो जाती है।
  • 📉 हीन भावना का जन्म: रोजगार न मिलने के कारण युवा वर्ग मानसिक अवसाद और हीन भावना का शिकार हो जाता है। वे स्वयं को समाज पर एक बोझ समझने लगते हैं, जिससे उनका मनोवैज्ञानिक स्तर गिर जाता है।
  • ❌ सामाजिक कुरीतियों का बढ़ना: बेकारी के कारण समाज में चोरी, डकैती, छीना-झपटी, ठगी, धोखाधड़ी और दहेज जैसी विकृतियाँ और अपराध तेजी से बढ़ते हैं।
  • 🚚 पलायन की प्रवृत्ति (Migration): स्थाई आजीविका न होने के कारण लोग अपने पैतृक स्थान, परिवार और संस्कृति को छोड़कर दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर होते हैं, जहाँ उन्हें उपेक्षा और बहुत कम मजदूरी पर काम करने की विवशता झेलनी पड़ती है (बिहार में यह समस्या अत्यधिक है)।

💰 (B) आर्थिक प्रभाव (Economic Impact):

  • 📉 प्रतिव्यक्ति आय की कमी: बेकारी के कारण लोगों की आय का स्तर अत्यंत निम्न होता है।
  • 🏚️ निम्न जीवन-स्तर: आय की कमी का सीधा असर रहन-सहन, खान-पान और भेष-भूषा पर पड़ता है, जिससे जीवन स्तर बहुत घटिया हो जाता है।
  • 🚨 आर्थिक मंदी का खतरा: व्यापक बेरोजगारी अर्थव्यवस्था में मंदी का सबसे बड़ा सूचक है। जो नागरिक देश के लिए एक मूल्यवान 'संसाधन' बन सकते थे, वे सही नीतियों के अभाव में पूरी अर्थव्यवस्था पर एक अनुत्पादक बोझ बनकर रह जाते हैं।

🏛️ 7. बेकारी निवारण एवं रोजगार सृजन के उपाय (Solutions)

🏛️ (I) महत्वपूर्ण सरकारी कार्यक्रम (Government Efforts):

सरकार ने चतुर्थ और छठी पंचवर्षीय योजनाओं के समय से ही निर्धनता निवारण और रोजगार के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं (जैसे— IRDP, NREP, RLEGP, TRYSEM और DWCRA)। वर्तमान में निम्नलिखित योजनाएँ सबसे प्रभावी हैं:

  • 🛠️ राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (NREGA / मनरेगा):
    • 📅 प्रारंभ: इस ऐतिहासिक योजना की शुरुआत 2 फरवरी, 2006 को प्रधानमंत्री द्वारा देश के पिछड़े जिलों की ग्राम पंचायतों में की गई थी, जिसमें बिहार के 38 में से 23 जिले शामिल थे। बाद में इसका नाम परिवर्तित कर संपूर्ण देश में विस्तारित किया गया।
    • 📋 मुख्य विधिक प्रावधान:
      1. प्रत्येक ग्रामीण परिवार को एक वित्तीय वर्ष में कम से कम 100 दिनों के गारंटीकृत रोजगार की विधिक गारंटी।
      2. रोजगार आवेदन करने के 15 दिनों के भीतर काम न मिलने पर विधिक बेरोजगारी भत्ता पाने का अधिकार।
      3. इस योजना के तहत रोजगार में 33% (एक-तिहाई) सीटें महिलाओं के लिए अनिवार्य रूप से आरक्षित हैं।
      4. कार्य के दौरान यदि किसी श्रमिक की आकस्मिक मृत्यु हो जाती है, तो उसके परिवार को ₹25,000 की वित्तीय क्षतिपूर्ति दी जाती है।
  • 🌱 संपूर्ण राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (2006): इसके अंतर्गत ग्रामीण युवा स्वरोजगार प्रशिक्षण योजना (TRYSEM), ग्रामीण महिला एवं बाल विकास योजना (DWCRA) तथा जवाहर ग्राम समृद्धि योजना (JGSY) को मिलाकर एक एकीकृत सशक्त स्वरूप दिया गया है।

🔵 (II) प्रभावी गैर-सरकारी उपाय (Non-Governmental Efforts):

बेरोजगारी की विकरालता को देखते हुए केवल सरकारी नौकरियां पर्याप्त नहीं हैं, इसलिए गैर-सरकारी और सामुदायिक स्तर पर निम्नलिखित उपाय अत्यंत सुगम और सरल सिद्ध हो रहे हैं:

  • 🧵 कुटीर उद्योगों का सघन विस्तार: ऐसे छोटे-छोटे उद्योग जिन्हें बहुत कम पूँजी और बिना बड़ी मशीनों के घर पर ही चलाया जा सकता है, कुटीर उद्योग कहलाते हैं। कृषि में छिपी बेरोजगारी (अदृश्य बेकारी) से जूझ रहे अतिरिक्त पारिवारिक श्रमिकों को इन कुटीर उद्योगों (जैसे सूत कातना, बुनाई, हस्तशिल्प) में लगाकर पूरे परिवार को काम दिया जा सकता है, जिससे कृषि पर से बोझ कम होता है।
  • 💼 स्वरोजगार (Self-Employment) का निर्माण: बेकारी, विशेषकर शिक्षित बेरोजगारी को दूर करने का यह सबसे अचूक और प्रभावकारी माध्यम है। इसमें युवा वर्ग सरकारी योजनाओं के माध्यम से कम ब्याज पर पूँजी (ऋण) और हुनर का प्रशिक्षण प्राप्त कर स्वयं का स्वतंत्र व्यवसाय (जैसे मरम्मत की दुकान, लघु विनिर्माण केंद्र) स्थापित करता है, जिससे वह स्वयं स्वावलम्बी बनता है और दूसरों को भी रोजगार देता है। (जैसे स्वयं सहायता समूहों - SHGs का गठन)।

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