📚 इकाई-6: कृषक मजदूर (Agricultural Labourers) — संपूर्ण डिजिटल नोट्स

🌾 1. परिचय एवं परिभाषा: कृषक मजदूर कौन हैं? (Introduction)
पिछले अध्यायों में हमने बिहार की कृषि और खाद्यान्न सुरक्षा का विस्तृत अध्ययन किया था। अब हम इस अध्याय में उन वास्तविक हाथों के बारे में पढ़ेंगे जो इन खाद्यान्नों का उत्पादन करते हैं— अर्थात् कृषक मजदूर।
- 📌 प्रथम कृषि श्रम-जाँच समिति (1950-51) के अनुसार: "कृषि श्रमिक या कृषक मजदूर वे लोग हैं, जो कृषि कार्य में लगे हैं और जो वर्ष भर में जितने दिन काम करते हैं, उसका आधा या आधे से अधिक भाग मजदूरी के आधार पर करते हैं।" अर्थात् जो साल के 6 महीने या उससे अधिक समय दूसरे के खेतों में काम करके आजीविका चलाते हैं, वे कृषि श्रमिक कहलाते हैं।
- 📊 राष्ट्रीय स्तर पर भयावह आंकड़े: भारत की कुल कार्यशील आबादी का लगभग 64 प्रतिशत हिस्सा कृषि क्षेत्र में लगा हुआ है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों में से 75 प्रतिशत आबादी कृषक मजदूर के रूप में है, जो ग्रामीण ऋणग्रस्तता के कारण अत्यंत दयनीय जीवन जीने को विवश हैं।
- 🥇 बिहार में निरंतर बढ़ती संख्या (तालिका 6.1): बिहार के कुल कार्यबल में कृषक मजदूरों का अनुपात देश के औसत से बहुत अधिक है, जो यहाँ के तीव्र औद्योगीकरण के अभाव को दर्शाता है:
- वर्ष 1991: बिहार में 37.1% कृषक मजदूर थे (जबकि पूरे भारत का औसत 26.1% था)।
- वर्ष 2001: बिहार में यह आंकड़ा बढ़कर 48.0% हो गया (जबकि भारत का राष्ट्रीय औसत मात्र 26.5% था)।
🛠️ 2. कृषक मजदूरों के तीन मुख्य आर्थिक वर्ग (Classification)
सामान्यतः ग्रामीण समाज और कार्य कुशलता के आधार पर कृषक मजदूरों को तीन मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:
- 🌾 (1) खेत में सीधे कार्य करने वाले मजदूर: इसके अंतर्गत हल चलाने वाले (हलवाहे), बीज बोने वाले तथा फसल काटने वाले श्रमिक आते हैं। इन्हें पूर्ण रूप से कृषक मजदूर कहा जाता है क्योंकि इन्होंने अपने काम के दौरान एक विशेष व्यावहारिक कुशलता हासिल कर ली है।
- 🚚 (2) कृषि से सम्बद्ध अन्य सहायक कार्यों के मजदूर: इसके अंतर्गत कुआँ खोदने वाले, मिट्टी काटने वाले और अनाज ढोने वाले गाड़ीवान आदि श्रमिक आते हैं। अर्थशास्त्र की दृष्टि से इन्हें अर्द्ध-कुशल (Semi-skilled) मजदूर माना जाता है।
- 🛠️ (3) सहायक ग्रामीण उद्योगों के मजदूर: इसके अंतर्गत गाँवों के पारंपरिक बढ़ई (लकड़ी का काम करने वाले) और लोहार आदि आते हैं। इन्हें कृषि क्षेत्र की रीढ़ और 'ग्रामीण कलाकार' भी कहा जाता है।
🏛️ राष्ट्रीय श्रम आयोग (National Labour Commission) का वर्गीकरण: राष्ट्रीय श्रम आयोग ने कृषक मजदूरों को मुख्य रूप से दो व्यावहारिक श्रेणियों में बाँटा है:
- क. भूमिहीन श्रमिक: वे श्रमिक जिनके पास खेती करने के लिए अपनी कोई ज़मीन नहीं होती। ये पूरी तरह जमींदारों पर निर्भर होते हैं।
- ख. बहुत छोटा किसान (सीमांत किसान): वे श्रमिक जिनके पास बहुत ही सूक्ष्म या नाममात्र की भूमि का टुकड़ा होता है, जिससे उनका गुजारा नहीं चलता। अतः वे अपना अधिकांश समय दूसरे के खेतों पर श्रमिक के रूप में ही व्यतीत करते हैं।
🚨 3. बिहार में कृषक मजदूरों की 11 प्रमुख समस्याएँ (Problems)
प्रसिद्ध फ्रांसीसी अर्थशास्त्री क्वेसने (Quesney) का एक ऐतिहासिक कथन भारत पर शत-प्रतिशत सच बैठता है— "दरिद्र कृषि, दरिद्र राजा, दरिद्र देश"। जहाँ देश के किसान खुद कर्ज में डूबे हों, वहाँ मजदूरी करने वाले श्रमिकों की सामाजिक-आर्थिक दशा का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। बिहार के कृषक मजदूरों का संपूर्ण जीवन बेकारी, शोषण, उत्पीड़न और घोर अनिश्चिता से भरा हुआ है।
📋 प्रमुख समस्याओं की विस्तृत सूची:
- 📉 कम मजदूरी दर: यह कृषक मजदूरों की सबसे बड़ी समस्या है। अत्यधिक और कठिन शारीरिक श्रम करने के बावजूद भूमिपतियों द्वारा उन्हें बहुत ही कम मजदूरी दी जाती है। वैकल्पिक रोजगार (लघु उद्योगों) के अभाव के कारण वे इस कम मजदूरी पर भी काम करने को मजबूर हैं।
- 📅 मौसमी रोजगार और बेकारी: कृषि एक मौसमी व्यवसाय है। इन मजदूरों को पूरे वर्ष काम न मिल कर केवल फसलों की बुआई या कटाई के विशिष्ट मौसम में ही काम मिलता है। फलस्वरूप वे साल में कम से कम 4 महीने पूरी तरह बेकार बैठते हैं और अल्प-रोजगार का दंश झेलते हैं।
- ⏱️ काम के अत्यधिक और अनिश्चित घंटे: कारखानों की तरह कृषि में काम के घंटे तय नहीं हैं। कृषक मजदूरों से प्रायः 10 से 14 घंटे तक कठिन कार्य कराया जाता है और कभी-कभी तो रात के समय पशुओं या खलिहान की चौकीदारी करने के कारण उन्हें पूरे 24 घंटे काम पर रहना पड़ता है।
- 🩸 स्थायी ऋणग्रस्तता (कर्ज का जाल): मजदूरी अत्यंत कम होने के कारण दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए ये मजदूर सदा महाजनों या बड़े किसानों से ऊँचे ब्याज पर कर्ज लेते हैं, जिसे न चुका पाने के कारण वे जीवन भर उनके यहाँ बेगारी (बिना पैसे के काम) करने को विवश हो जाते हैं।
- 🏚️ निम्न जीवन स्तर: इनकी आय इतनी कम है कि ये भोजन, वस्त्र और मकान की न्यूनतम मूलभूत आवश्यकताओं को भी पूरा नहीं कर पाते। इन्हें ठीक से दो वक्त (दो जून) की भरपेट रोटी भी नसीब नहीं होती और बदन पर फटे-पुराने कपड़े होते हैं।
- 🛖 गंदी आवास व्यवस्था: ये मजदूर जमींदार या ग्राम-समाज की अनुमति से उनकी बंजर भूमि पर एक छोटी सी झोपड़ी बनाकर रहते हैं। ये झोपड़ियाँ इतनी छोटी होती हैं जहाँ मजदूर केवल पैर फैलाकर सो सकता है। इनमें शुद्ध हवा और प्रकाश के लिए खिड़कियों तक का अभाव होता है, जिससे मजदूरों और उनके बच्चों का स्वास्थ्य स्तर लगातार गिरता चला जाता है।
- ⛓️ बंधुआ मजदूर (Bonded Labour) की प्रथा: पुराने कर्ज को न चुका पाने के कारण कई कृषक मजदूर अपने मालिक के यहाँ आजन्म (या ऋण चुकता होने तक) केवल दो वक्त के साधारण भोजन के बदले गुलामी करने को मजबूर हो जाते हैं। उनके इस दयनीय काम में परिवार के छोटे बच्चे और महिलाएँ भी हाथ बंटाती हैं, जिन्हें भूमिपति नाममात्र की मजदूरी देकर उनका घोर सामाजिक-आर्थिक शोषण करते हैं।
- 🌾 सहायक धंधों का घोर अभाव: गाँवों में गैर-कृषि कार्यों या लघु उद्योगों का पूर्ण अभाव है। यदि किसी वर्ष बिहार में भीषण बाढ़ या सुखाड़ के कारण फसल नष्ट हो जाती है, तो इन मजदूरों के पास जीवन-निर्वाह का कोई साधन नहीं बचता और वे कर्ज के दलदल में गहरे डूबते चले जाते हैं।
- ❌ मजबूत संगठन का अभाव: कृषक मजदूर अत्यधिक अशिक्षित, अज्ञानी और रूढ़िवादी होते हैं। बिखरे होने और मजबूत यूनियनों (संगठनों) का अभाव होने के कारण वे अपनी मजदूरी बढ़वाने, काम के घंटे निश्चित कराने या जमींदारों के उत्पीड़न के खिलाफ संगठित आवाज उठाने में असमर्थ हैं।
- ⚙️ कृषि में मशीनीकरण से बढ़ती बेकारी: आधुनिक समय में बिहार की कृषि में भी ट्रैक्टर, थ्रेशर और कम्बाइन हार्वेस्टर जैसी मशीनों का प्रयोग तेजी से बढ़ा है। मशीनों के इस प्रवेश से कृषक मजदूरों के हाथों का काम छिन रहा है और ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीकी बेकारी एक गंभीर समस्या बन चुकी है।
- 🎭 निम्न सामाजिक स्तर: बिहार के अधिकांश कृषक मजदूर अनुसूचित जाति (SC) और अत्यंत पिछड़ी जातियों से आते हैं, जिन्हें सदियों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव और सामंती कुप्रथाओं के कारण समाज में निम्न और उपेक्षित दर्जा प्राप्त है।
🚚 4. कृषक मजदूरों का पलायन: भिखारी ठाकुर के लोकगीत एवं अंतरराष्ट्रीय सफलता
🚚 पलायन का अर्थ एवं कारण
जब स्थानीय स्तर पर भीषण गरीबी, बाढ़-सुखाड़ और भुखमरी की स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं, तो कृषक मजदूर हीनभावना से ग्रसित होकर आजीविका की तलाश में अपना पैतृक गाँव छोड़कर दूसरे राज्यों या शहरों की ओर चले जाते हैं, इसे ही पलायन (Migration) कहते हैं। वर्तमान में बिहार के अधिकांश मजदूर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, कोलकाता और मुंबई की ओर पलायन कर रहे हैं।
📜 भिखारी ठाकुर के शब्दों में पलायन का दर्द
बिहार के प्रसिद्ध लोकगीतकार और सांस्कृतिक पुरोधा भिखारी ठाकुर ने अपने मर्मस्पर्शी लोकगीतों के माध्यम से बिछड़ते परिवारों के दर्द को अभिव्यक्त किया था:
"लागल झूलनिया के धक्का,
बलम गईलन कलकत्ता।"
उस समय कोलकाता (कलकत्ता) अपनी बड़ी जूट मिलों के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध था, जहाँ बिहार के ग्रामीण इलाकों से भारी संख्या में मजदूर काम की तलाश में जाते थे। इसके अतिरिक्त, आज पंजाब की कृषि की महान सफलता (हरित क्रांति) के पीछे भी मुख्य रूप से हमारे बिहारी कृषक मजदूरों के खून-पसीने का अमूल्य योगदान रहा है।
🚀 पलायन के वैश्विक आयाम: सर शिवसागर रामगुलाम की गौरव गाथा
बिहारी कृषक मजदूरों ने केवल देश के भीतर ही नहीं, बल्कि सात समंदर पार विदेशों में भी अपनी कड़ी मेहनत और योग्यता के बल पर इतिहास रचा है। औपनिवेशिक काल में बिहार के मजदूरों को गिरमिटिया बनाकर मॉरिशस, त्रिनिदाद, युगांडा और नेपाल जैसे देशों में ले जाया गया था।
- 🎖️ होनहार बालक की कहानी: यह कहानी बिहार के भोजपुर (आरा) जिले के एक अत्यंत गरीब परिवार में जन्मे बालक मोहित रामगुलाम की है, जिन्हें आर्थिक तंगी के कारण शुरुआती दिनों में बिहार में एक साधारण कृषक मजदूर के रूप में काम करना पड़ा था। वे रोजी-रोटी की तलाश में पानी के जहाज से सुदूर मॉरिशस देश चले गए और वहाँ के एक छोटे से गाँव 'बेलेरिभे' (Belle Rive) में रहकर ईमानदारी से गन्ने के खेतों में काम करने लगे।
- 👑 मॉरिशस के राष्ट्रपिता: स्व० मोहित रामगुलाम के घर एक अत्यंत होनहार बालक का जन्म हुआ, जिनका नाम शिवसागर रामगुलाम था। पढ़ाई और राजनीति दोनों में श्रेष्ठता हासिल करते हुए वे मॉरिशस के सबसे लोकप्रिय जननेता बने और उन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा 'सर' (Sir) की उपाधि दी गई।
- 🥇 प्रथम प्रधानमंत्री: सर शिवसागर रामगुलाम को मॉरिशस का प्रथम प्रधानमंत्री बनने का गौरव प्राप्त हुआ। जिस प्रकार भारत में महात्मा गाँधी को राष्ट्रपिता माना जाता है, ठीक उसी प्रकार सर शिवसागर रामगुलाम को 'मॉरिशस का राष्ट्रपिता' कहकर सम्मानित किया जाता है। (नोट: उनके सुपुत्र श्री नवीनचंद्र रामगुलाम भी मॉरिशस के प्रधानमंत्री पद को सुशोभित कर चुके हैं)।
- 📍 पटना में सम्मान: बिहार के इस महान सपूत के सम्मान में राजधानी पटना के ऐतिहासिक गाँधी मैदान के दक्षिणी छोर वाली मुख्य सड़क का नामकरण 'सर शिवसागर रामगुलाम पथ' रखा गया है।
🛑 5. पलायन का दोहरा प्रभाव और सामाजिक-राजनीतिक चुनौतियाँ
मजदूरों का यह पलायन जहाँ एक ओर उनके परिवार को तात्कालिक वित्तीय सहारा देता है, वहीं दूसरी ओर इसके कई गंभीर और नकारात्मक सामाजिक-राजनीतिक दुष्प्रभाव भी सामने आए हैं:
- 🌾 बिहार की कृषि को नुकसान: अत्यधिक पलायन के कारण व्यस्त कृषि मौसम में बिहार के भीतर ही कुशल कृषि मजदूरों की भारी कमी हो जाती है, जिससे यहाँ के खेतों में समय पर बुवाई या कटाई प्रभावित होती है।
- ❌ अन्य राज्यों में अमानवीय शोषण: पंजाब, हरियाणा या दिल्ली जैसे राज्यों में बिहारी मजदूरों से बहुत कम मजदूरी पर तय सीमा से अधिक घंटों तक अमानवीय परिस्थितियों में कार्य कराया जाता है।
- 🩸 हिंसक अत्याचार एवं क्षेत्रीय राजनीति: हाल के वर्षों में बाहरी राज्यों में बिहारी श्रमिकों को भारी क्षेत्रीय राजनीतिक द्वेष का सामना करना पड़ा है।
- वर्ष 2007: असम राज्य में बिहारी मजदूरों के साथ गंभीर दुर्व्यवहार किया गया और कई निर्दोष मजदूरों की हिंसक हत्याएँ कर दी गईं।
- वर्ष 2008: मुंबई (महाराष्ट्र) में भी बिहारी प्रवासियों के साथ व्यापक मारपीट की गई और उन्हें उपेक्षा सूचक शब्द 'भैया' कहकर प्रताड़ित किया गया।
- 🔙 जन्मभूमि की ओर वापसी: मुंबई और अन्य राज्यों में बढ़ते अत्याचारों के बाद बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने प्रवासियों को ढाँढस बंधाते हुए एक ऐतिहासिक वक्तव्य दिया था— "जो भी बिहारी मजदूर अन्य राज्यों में चले गए हैं वे पुनः बिहार में चले आएँ। उन्हें यहाँ काम की कमी नहीं होने दी जाएगी। सरकार उनके साथ अच्छा वर्ताव करेगी।" इस भावुक अपील का गहरा असर हुआ और सुरक्षा व आत्मसम्मान के लिए मजदूर अपनी जन्मभूमि बिहार की ओर लौटने लगे।
🛠️ 6. कृषक मजदूरों की समस्याओं के निदान के 13 उपाय (Solutions)
जब तक हम स्थानीय स्तर पर कृषक मजदूरों की बुनियादी समस्याओं का पूर्ण निदान नहीं करेंगे, तब तक उनका यह विवशतापूर्ण पलायन पूरी तरह नहीं रुक सकता। इसके निवारण के लिए निम्नलिखित 13 दीर्घकालिक उपाय लागू किए जाने आवश्यक हैं:
- 🏭 कृषि पर आश्रित उद्योगों का विकास: बिहार में कृषि आधारित उद्योगों (जैसे जूट मिल, चीनी मिल, फल प्रसंस्करण) का तेजी से विकास किया जाए ताकि मजदूर कृषि के खाली समय (Off-season) में इनमें काम पा सकें।
- 🧵 लघु एवं कुटीर उद्योगों का प्रसार: ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे-छोटे घरेलू कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए ताकि भूमिहीन और सीमांत श्रमिकों के परिवारों को स्थानीय स्तर पर अतिरिक्त आय हो सके।
- ⚖️ न्यूनतम मजदूरी नियमों का उचित क्रियान्वयन: कागजों पर बने न्यूनतम मजदूरी अधिनियम का धरातल पर कड़ाई से पालन कराया जाए ताकि कोई भी भूमिपति श्रमिकों को तय सीमा से कम मजदूरी न दे सके।
- ⏱️ कार्य के घंटों का विधिक निर्धारण: कृषि क्षेत्र में भी काम के घंटे विधिक रूप से निश्चित किए जाएँ और निर्धारित समय से अधिक काम लेने पर अनिवार्य रूप से अतिरिक्त (Overtime) मजदूरी देने की व्यवस्था हो।
- 🛡️ कार्य दशाओं में मानवीय सुधार: श्रमिकों को साप्ताहिक छुट्टियाँ मिलनी चाहिए और खेतों में कीटनाशकों के छिड़काव या मशीन चलाते समय दुर्घटना होने पर उन्हें उचित चिकित्सीय मुआवजा दिया जाना चाहिए।
- 🏗️ पक्के मकानों का निर्माण: भूमिहीन मजदूरों के सम्मानजनक जीवन के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी योजनाओं के तहत पक्के और हवादार मकानों का निर्माण कराकर उन्हें निःशुल्क उपलब्ध कराया जाए।
- 🏥 कृषि श्रम कल्याण केंद्रों की स्थापना: प्रत्येक प्रखंड (Block) स्तर पर विशेष लेबर वेलफेयर अस्पतालों की स्थापना हो, जहाँ गरीब मजदूर अपनी बीमारियों और चोटों का मुफ्त व त्वरित इलाज करा सकें।
- 💼 ग्रामीण रोजगार केंद्रों (Employment Exchanges) की स्थापना: ग्रामीण अंचलों में रोजगार केंद्रों की स्थापना हो ताकि सरकारी योजनाओं और शहरों में उपलब्ध वैध काम की सही सूचनाएँ समय पर सीधे मजदूरों तक पहुँच सकें।
- 🧱 भूमि सुधार एवं मालिकाना हक की व्यवस्था: जोत की अधिकतम सीमा (Ceiling Act) से बची हुई अतिरिक्त सरकारी भूमि या बंजर भूमि को पूरी तरह कृषि योग्य बनाकर इन भूमिहीन मजदूरों के बीच मालिकाना हक के साथ समान रूप से बाँटा जाए।
- 🎛️ कृषि मजदूरों के लिए उचित संगठन (Union) की व्यवस्था: मजदूरों के भीतर जागरूकता लाकर मजबूत यूनियनों की स्थापना कराई जाए ताकि वे सामूहिक रूप से अपने अधिकारों की रक्षा कर सकें और शोषण के खिलाफ आवाज उठा सकें।
- 🏦 रियायती सहकारी संस्थाओं (Cooperatives) की स्थापना: ऐसी ग्रामीण सहकारी समितियों की स्थापना हो जो साहूकारों के चंगुल से बचाने के लिए मजदूरों को बहुत ही कम ब्याज दर पर ऋण दें और उसकी वापसी आसान मासिक किश्तों में लें।
- 📚 शिक्षा का व्यापक प्रसार एवं बाल श्रम का अंत: यह अत्यंत दुखद है कि आर्थिक तंगी के कारण कृषक मजदूरों के मासूम बच्चे स्कूल न जाकर जमींदारों के मवेशियों की देखभाल (चरवाहे का काम) करते हैं या शहरों के होटलों में जूठे बर्तन साफ करते हैं। बाल श्रम को कानूनी रूप से पूरी तरह प्रतिबंधित कर इन बच्चों के लिए अनिवार्य एवं निःशुल्क प्राथमिक शिक्षा का व्यापक प्रसार किया जाना चाहिए।
- 🗺️ ऐतिहासिक भूदान आंदोलन की सीख: महान गांधीवादी आचार्य विनोबा भावे ने भूमिहीन श्रमिकों की समस्या को सुलझाने के लिए 'भू-दान आंदोलन' चलाया था, जिसमें उन्होंने बड़े-बड़े भूमिपतियों से स्वेच्छा से अतिरिक्त भूमि दान में मांगकर गरीबों में वितरित की थी। इस आंदोलन से मजदूरों में अभूतपूर्व आत्मविश्वास और साहस का संचार हुआ था।
🇮🇳 7. कृषक मजदूरों के कल्याण हेतु किए गए प्रमुख सरकारी प्रयास (Government Initiatives)
केंद्र और राज्य सरकारों ने पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से कृषक मजदूरों की स्थिति में सुधार लाने के लिए कई विधिक और आर्थिक सुरक्षात्मक कदम उठाए हैं:
- ⚖️ (i) न्यूनतम मजदूरी अधिनियम (1948): इस ऐतिहासिक अधिनियम को कृषि क्षेत्र पर भी कड़ाई से लागू कर दिया गया है, जिसके तहत बिहार सहित देश के सभी राज्यों में कृषि मजदूरों के लिए न्यूनतम दैनिक मजदूरी की विधिक सीमा तय है।
- 🛖 (ii) निःशुल्क आवासीय प्लॉट की व्यवस्था: भूमिहीन खेतिहर मजदूरों को स्वयं का मकान बनाने के लिए पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में मुफ्त प्लॉट (जगह) और इंदिरा आवास जैसी वित्तीय सहायता दी जा रही है।
- 🧱 (iii) जमींदारी प्रथा का उन्मूलन: स्वतंत्रता के तुरंत बाद जमींदारी प्रथा को कानूनन समाप्त कर दिया गया, जिससे मुक्त हुई अतिरिक्त अधिशेष भूमि और भूदान आंदोलन की जमीनों को भूमिहीन कृषि श्रमिकों में वितरित किया गया।
- ⛓️ (iv) बंधुआ मजदूर प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976: वर्ष 1976 के आपातकाल के समय एक कड़ा केंद्रीय कानून बनाकर देश से बंधुआ मजदूरी प्रथा को पूरी तरह समाप्त और अवैध घोषित कर दिया गया। अब यदि कोई भी सामंत या भूमिपति किसी मजदूर को बंधुआ या बेगार पर रखता हुआ पाया जाता है, तो उसे गैर-जमानती दण्ड दिया जाता है (जैसे बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में कई दोषी भूमिपतियों को इसके तहत गिरफ्तार किया गया था)।
- 💼 (v) ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम: ग्रामीण क्षेत्रों में श्रमिकों को स्थानीय स्तर पर स्थायी काम देने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम (मनरेगा) और 'ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारंटी कार्यक्रम' जैसी वृहद योजनाएँ संचालित हैं, जो सीधे उनके पलायन को रोकने में मददगार हैं।
- 👶 (vi) बाल श्रमिक निरोधक अधिनियम: इस कड़े विधिक कानून के द्वारा कृषक मजदूरों के मासूम बच्चों से श्रम कराने और उनके बचपन के आर्थिक शोषण को एक दंडनीय कानूनी अपराध घोषित किया गया है।
📝 स्व-मूल्यांकन: महत्वपूर्ण अभ्यास प्रश्न (Quiz Time!)
प्यारे छात्रों, इस महत्वपूर्ण अध्याय के डिजिटल नोट्स को अच्छी तरह पढ़ने के बाद नीचे दिए गए बहुविकल्पीय प्रश्नों के सही उत्तर खोजने का प्रयास करें:
प्रश्न 1. प्रथम कृषि श्रम-जाँच समिति (1950-51) की आधिकारिक परिभाषा के अनुसार, एक वास्तविक कृषि श्रमिक या कृषक मजदूर किसे माना जाता है? (क) जो वर्ष भर में किए गए कुल कार्यों का कम से कम एक-चौथाई भाग मजदूरी पर करता हो (ख) जो वर्ष भर में जितने दिन काम करता है, उसका आधा या आधे से अधिक भाग मजदूरी के आधार पर करता हो (ग) जो केवल अपनी ही पैतृक भूमि पर साल भर आधुनिक खेती करता हो (घ) जो पूरी तरह शहरी उद्योगों में काम करता हो
प्रश्न 2. वर्ष 2001 की जनगणना और बिहार के आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, बिहार के कुल कार्यबल में कृषक मजदूरों का अनुपात कितना प्रतिशत (जो भारत के औसत 26.5% से बहुत अधिक है) दर्ज किया गया था? (क) 26.1 प्रतिशत (ख) 37.1 प्रतिशत (ग) 48.0 प्रतिशत (घ) 75.0 प्रतिशत
प्रश्न 3. बिहार के शाहाबाद (वर्तमान भोजपुर) जिले के रहने वाले उस महान सपूत और होनहार कृषक मजदूर के पुत्र का क्या नाम है, जो अपनी कड़ी मेहनत से सुदूर 'मॉरिशस देश' के प्रथम प्रधानमंत्री और वहाँ के राष्ट्रपिता बने? (क) आचार्य विनोबा भावे (ख) भिखारी ठाकुर (ग) सर शिवसागर रामगुलाम (घ) नवीनचंद्र रामगुलाम
प्रश्न 4. भारत सरकार द्वारा किस वर्ष एक कड़ा विशेष अधिनियम पारित करके सदियों से चली आ रही अमानवीय 'बंधुआ मजदूर प्रथा' (
💡 उत्तर कुंजी (Answer Key):
1-(ख), 2-(ग), 3-(ग), 4-(ग)
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