Skip to content

वर्ण-प्रकरण: Hindi Grammar Varn Vichar Full Guide

Image of grammar
व्याकरण

वर्ण (Sound)

वर्ण उस मूल ध्वनि को कहते हैं, जिसके खंड या टुकड़े नहीं हो सकते । जैसे – , , , , , क्, ख्‌, च्‌ , छ्, य्‌, र्, ल्‌ आदि।

अब कुछ शब्द या ध्वनियाँ लें और उनमें निहित मूल ध्वनि (वर्ण) को समझें । जैसे – खा और लो

इस वाक्य में मुख्यत: दो शब्द या ध्वनियाँ सुनाई पड़ती हैं – खा और लो

अब इसका खंड करें –

  • खा (एक शब्द/ध्वनि ) = ख् ‌+ आ (दो मूल ध्वनियाँ/वर्ण)
  • लो (एक शब्द/ध्वनि ) = ल्‌ + ओ (दो मूल ध्वनियाँ/वर्ण)

स्पष्ट है कि – खा लो में चार मूल ध्वनि याँ या चार वर्ण हैं, क्योंकि –(ख्‌, आ) तथा (ल्‌, ओ) के और टुकड़े या खंड नहीं हो सकते । इसलिए इन्हें वर्ण या मूल ध्वनि कहते हैं। इससे यह भी ज्ञात होता है कि – भाषा की सबसे छोटी इकाई को मूल ध्वनि या वर्ण कहते हैं।

वर्णमातल्ना (Alphabet)

वर्णो के क्रमबद्ध समूह को वर्णमाला कहते हैं। हिन्दी वर्णमाला में 52 वर्ण या ध्वनि याँ प्रयुक्त होती हैं

  • अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ — स्वर – 11
  • अं (अनुस्वार), अ: (विसर्ग) — अयोगवाह — 2
  • क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब, भ, म — स्पर्श व्यंजन — 25
  • य, र, ल, व — अंतःस्थ व्यंजन – 4
  • श, ष, स, ह — ऊष्म व्यंजन – 4
  • क्ष, त्र, ज्ञ, श्र — संयुक्त व्यंजन – 4
  • ड़, ढ़ — हिन्दी के अपने व्यंजन – 2

वर्ण के भेद

वर्ण के दो भेद हैं-

  1. स्वर वर्ण (Vowel)
  2. व्यंजन वर्ण (Consonant)

1. स्वर वर्ण (Vowel)

स्वर वर्ण – स्वर उन वर्णों या ध्वनि यों को कहते हैं, जिनका उच्चारण स्वतः होता है। जैसे – , , , , , , , , , , औ।

इनकी संख्या 11 है। ये व्यंजन वर्णो के उच्चारण में भी सहायक होते हैं।

जैसे –

  • क + अ = क।
  • ख्‌ + अ = ख।

नोट

कुछ वैयाकरण को स्वर नहीं मानते हैं। उनका तर्क है कि इसका उच्चारण प्रायः रि – जैसा होता है, लेकि न मात्रा की दृष्टि से स्वर है। जैसे –

  • ऋषभ, ऋषि , ऋण, ऋतु आदि । (रि व्यंजन ध्वनि )
  • कृषक, कृषि , पितृण, पृष्ठ आदि। ( स्वर की मात्रा)

नोट

अं ( ) और अः ( ) – हिन्दी वर्णमाला में अं और अ: को स्वरों के साथ लि खने की परंपरा है, लेकि न अं (अनुस्वार) और अः (विसर्ग) न स्वर हैं न व्यंजन । इन्हें अयोगवाह कहा जाता है।

नोट

( ) — इसे अर्द्धचन्द्र भी कहते हैं। इसका उच्चारण स्वर की तरह होता है, लेकि न यह अँगरेजी की स्वर ध्वनि है। इसे गृहीत/आगत स्वर ध्वनि कहते हैं। इसका प्रयोग प्राय: अँगरेजी के शब्दों में होता है । जैसे –

  • ऑफिस, ऑफसेट, कॉलेज, नॉलेज, स्पॉट, स्टॉप आदि।

स्वर वर्ण के भेद

स्वर वर्ण के भेद मुख्यत: दो आधार पर किए जाते हैं –

  • (क) उच्चारण में लगनेवाले समय और
  • (ख) जाति के आधार पर ।

(क) उच्चारण में लगनेवाले समय

उच्चारण में लगनेवाले समय या उच्चारण-काल के आधार पर स्वरों के तीन भेद हैं –

  • (i) ह्रस्व स्वर
  • (ii) दीर्घ स्वर और
  • (iii) प्लुत स्वर ।
(i) ह्रस्व स्वर

, , एवं ह्रस्व स्वर है। इन्हें मूल स्वर भी कहते है। हैं। ये एकमात्रिक होते हैं तथा इनके उच्चारण में दीर्घ स्वर की अपेक्षा आधा समय लगता है।

(ii) दीर्घ स्वर

आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ एवं औ दीर्घ स्वर हैं। इनके उच्चारण में हस्व स्वर की अपेक्षा दुगना समय लगता है। चूँकि इनमें दो मात्राओं का समय लगता है, अत: इन्हें द्विमात्रिक स्वर भी कहते हैं । दूसरे शब्दों में, इनमें दो स्वरों की संधि रहती है। जैसे –

  • = अ + अ
  • = इ + इ
  • = उ + उ
  • = अ + इ / अ + ई / आ + इ / आ + ई
  • = अ + ए / आ + ए
  • = अ + उ / आ + उ / आ + ऊ
  • = अ + ओ / आ + ओ / अ + औ / आ + औ

Note

इन्हीं दीर्घ स्वरों में ए, ऐ, ओ तथा औ संयुक्त स्वर हैं।

हस्व स्वर और दीर्घ स्वर में लगनेवाले समय को इन शब्दों के उच्चारण से समझा जा सकता है

हस्व उच्चारणअड़बलइड़ादिनउष्मसुत
दीर्घ उच्चारणआड़बालईड़ादीनऊष्मसूत
(iii) प्लुत स्वर

प्लुत स्वर – जिस स्वर के उच्चारण में दीर्घ स्वर से भी ज्यादा समय लगता है, उसे प्लुत स्वर कहते हैं। कि सी को देर तक पुकारने या नाटक-संवाद में इसका प्रयोग देखा जाता है; वैदिक मन्त्रों में भी इसका प्रयोग पाया जाता है । इसे त्रिमात्रिक स्वर भी कहते हैं। इसके लिए ३ का अंक लगाया जाता है । जैसे – ओडम्‌

(ख) जाति के आधार

जाति के आधार पर स्वर के दो भेद हैं –

  • (i) सजातीय स्वर या सवर्ण और
  • (ii) विजातीय स्वर या असवर्ण ।
(i) सजातीय या सवर्ण

अ-आ, इ-ई, उ-ऊ आदि जोड़े आपस में सजातीय या सवर्ण कहे जाते हैं, क्योंकि ये एक ही उच्चारण-ढंग या उच्चारण-प्रयत्न से उच्चरि त होते हैं। इनमें सि र्फ मात्रा का अंतर होता है ।

(ii) विजातीय स्वर या असवर्ण

विजातीय स्वर या असवर्ण – अ-इ, अ-ई, अ-उ, अ-ऊ, आ-इ आई आदि जोड़े आपस में विजातीय स्वर या असवर्ण हैं, क्योंकि ये दो उच्चारण-ढंग या उच्चारण-प्रयत्न से उच्चरि त होते हैं ।

स्वरों के उच्चारण

स्वरों के उच्चारण प्रायः चार प्रकार से होते हैं

  • (क) निरनुनासिक,
  • (ख) अनुनासिक,
  • (ग) सानुस्वार और
  • (घ) विसर्गयुक्त ।

(क) निरनुनाखसिक

यदि स्वरों का उच्चारण सिर्फ मुख से कि या जाए, तो ऐसे स्वरों को नि रनुनासि क स्वर कहा जाएगा । जैसे , , , , , , , , ,

(ख) अनुनासिक

यदि स्वरों का उच्चारण मुख और नाक (नासिका) से किया जाए और उसमें कोमलता हो, तो ऐसे स्वरों को अनुनासि क स्वर कहा जाएगा । जैसे–

अँ, आँ, इँ, ईँ/ईं, उँ , ऊँ , एँ, ऐँ /ऐं, ओँ /ओं, औँ /औं

निम्नलिखित तालि का से ये बातें और स्पष्ट हो जाती हैं

निरनुनासिकअकड़ाआधीसिगारयहीउगलीपूछचलेहैगोदचौक
अनुनासिकअँकड़ाआँधीसिँगार/सिंगारयहीँ/यहींउँगलीपूँछचलेँ /चलेंहैँ /हैंगोँद/गोंदचौँक/चौंक

ध्यान रखें कि

अनुनासिक के लिए चन्द्रबिंदु ( ) का प्रयोग होता है । लेकिन, जब अनुनासिक स्वर का चिह्न () शिरोरेखा पर लगता है, तब मजबूरन चन्द्रबिंदु ( ) के बदले बिंदु () दिया जाता है । ऐसा, लेखन-सुविधा हेतु किया जाता है । इस बिंदु () को आप पंचमाक्षर के लिए प्रयुक्त अनुस्वार न समझें । इसे इस तरह समझें –

  • शिरोरेखा (सिर के ऊपर रेखा) पर चन्द्रबिंदु — सिँगार, यहीँ, चलेँ, हैँ
  • लेखन सुविधा हेतु चन्द्रबिंदु के बदले बिंदु — सिंगार, यहीं, चलें, हैं

(ग) सानुस्वार

इसमें स्वरों के ऊपर अनुस्वार () का प्रयोग होता है । इसका उच्चारण नाक से होता है और उच्चारण में थोड़ी कठोरता होती है । जैसे — अंग, अंगद, अंगूर, ईंट, कंकण आदि।

(घ) विसर्गयुक्त

इसमें स्वरों के बाद विसर्ग ( ) का प्रयोग होता है । इसका उच्चारण घोष ध्वनि — की तरह होता है। संस्कृत में इसका काफी प्रयोग होता है। तत्सम शाब्दों में इसका प्रयोग आज भी देखा जाता है । जैसे — अतः, स्वतः, प्रातः, प्रायः, पय:पान, मन:कामना आदि।

स्वर-मात्रा एवं स्वर-व्यंजन संयोग

स्वर के संकेत-चिह्व को मात्रा कहते हैं। स्वर के दस संकेत-चिह्न हैं, लेकिन का कोई संकेत-चिह्न या मात्रा नहीं होती है । स्वर जब किसी व्यंजन से मिलता है, तब व्यंजन का हल्‌ चिह्न () लुप्त हो जाता है । जैसे –

क्‌ + अ = ख्‌ + अ =

स्वर-व्यंजन संयोग (मेल) को नीचे की तालि का से समझें –

स्वर
मात्रकुछ नहींि
व्यंजनक्क्क्क्क्क्क्क्क्क्
संयोगकाकिकीकुकूकेकैकोकौ

कुछ विशेष निर्देश :

  1. ये मात्राएँ व्यंजनों के पहले या बाद में अथवा ऊपर या नीचे लगती हैं। लेकि न, र् व्यंजन के साथ जब () या () की मात्रा लगती है, तब यह ठीक बीच में लगाई जाती है। जैसे –
  • र् + उ ( ) = रुरुज, रुंङ, रुँदवाना, रुँधना, रुकना, रुकवाना, रुकावट, रुक्मवती, रुक्मिणी, रुक्मी, रुक्ष, रुख, रुखाई, रुग्न, रुचना, रुचि, रुचिमान, रुचिवर्द्धक, रुज, रुझान, रुठ, रुतबा, रुदन, रुद्र, रुधिर, रुनझुन, रुपया, रुमाली, रुलाई, रुलाना, रुष्ट, रुस्तम, रुहेलखंड आदि।
  • र् + ऊ () = रूरूई, रूख, रूखा, रूठ, रूठना, रूळ, रूढि , रूनी, रूप, रूपक, रूपकार, रूपमय, रूपवती, रूपा, रूबरू, रूम, रूमाल, रूल, रूस, रूहानी आदि।
  1. किसी भी स्वर के साथ किसी दूसरे स्वर की मात्रा या अपनी मात्रा नहीं लगती । जैसे – अेवरेस्ट, अैसा, ऐसा, अुस, उुस, ऋृण आदि लिखना गलत है।

  2. श्‌ और ह्‌ के साथ जब ( ) की मात्रा लगती है , तब इनका रूप होता है –

  • श्‌ + ऋ ( ) = श्रृ – श्र्गाल, शृंखला, शृंग, शृंगार आदि ।
  • ह्‌ + ऋ ( ) = हृ – हदय, हृषीकेश, हृष्टपुष्ट आदि

बारहरखडी

किसी व्यंजन के साथ स्वरों की मात्राएँ (ऋ को छोड़कर) अनुस्वार और विसर्ग के साथ लिखने को बारहखड़ी कहते हैं। जैसे –

क का कि की कु कू के कै को कौ कं कः। ख खा खि खी खु खू खे खै खो खौ खं खः ।

इसी प्रकार अन्य व्यंजनों की बारहखड़ी लि खी जाती है।

2. व्यंजन वर्णा

व्यंजन वर्ण जि न वर्णों का उच्चारण किसी अन्य (स्वर) की सहायता से होता है उन्हें व्यंजन वर्ण कहते हैं।

दूसरे शब्दों में — स्वर वर्ण की सहायता से जि स वर्ण का उच्चारण होता है उसे व्यंजन वर्ण कहते हैं। जैसे –

(स्वर) की सहायता से – , , आदि वर्णों का उच्चारण होता है, अत: क्, ख्‌, ग्‌, आदि व्यंजन वर्ण हैं। मूल व्यंजन वर्णों की कुल संख्या 33 है–

  • क् ख् ग् घ् ङ्
  • च् छ् ज् झ् ञ्
  • ट् ठ् ढ् ड् ण्‌
  • त्‌ थ् द्‌ ध्‌ न्‌
  • प् फ् ब् भ् म् ‌।
  • य् र् ल् व् श् ष् स्‌ ह्

हल्‌

संस्कृतमें व्यंजन को हल् ‌कहते हैं, जबकि व्यंजनों के नीचे जो एक छोटी ति रछी लकीर दिखाई देती है उसे हि न्दी में हल्‌कहते हैं। हल्‌ लगे व्यंजन अर्था त्‌स्वररहित व्यंजन' ही शुद्ध व्यंजन हैं। बोल-चाल की भाषा में ऐसे व्यंजन को आधा व्यंजन या आधा अक्षर भी कहा जाता है ।

व्यंजन वर्ण के भेद

सभी व्यंजनों को मुख्यत: तीन भागों में बाँटा गया है

  • (क) स्पर्श व्यंजन,
  • (ख) अंतःस्थ व्यंजन और
  • (ग) ऊष्म व्यंजन ।

(क) स्पर्श व्यंजन

जो व्यंजन कंठ, तालु, मूर्धा (तालु का ऊपरी भाग), ओठ, दाँत आदि के स्पर्शा से बोले जाते हैं उन्हें स्पर्श व्यंजन या स्पर्शी कहते हैं। इनकी संख्या 25 है । इन्हें वर्गीय व्यंजन भी कहते हैं, क्योंकि ये पाँच वर्गो में बँटे हुए हैं । प्रत्येक वर्ग का नामकरण उनके प्रथम वर्ण के आधार पर कि या गया है । जैसे —

  • क-वर्ग (, , , , ) — इनका उच्चारण कंठ के स्पर्श से होता है।
  • च-वर्ग (, , , , ) — इनका उच्चारण तालु के स्पर्श से होता है।
  • ट-वर्ग (, , , , ) — इनका उच्चारण मूर्द्धा के स्पर्श से होता है।
  • त-वर्ग (, , , , ) — इनका उच्चारण दंत के स्पर्श से होता है।
  • प-वर्ग (, , , , ) — इनका उच्चारण ओष्ठ के स्पर्श से होता है।

(ख) अंतःस्थ व्यंजन

, , और अंतःस्थ व्यंजन हैं। इनकी संख्या 4 है | ये स्वर और व्यंजन के बीच स्थि त (अंतःस्थ) हैं। इनका उच्चारण जीभ, तालु, दाँत और ओठों के परस्पर सटने से होता है, लेकि न कहीं भी पूर्ण स्पर्शा नहीं होता । कुछ वैयाकरण '' और '' को अर्द्धस्वर भी कहते हैं।

(ग) ऊष्म व्यंजन

, , और ऊष्म व्यंजन हैं। इनका उच्चारण रगड़ या घर्षण से उत्पन्न ऊष्म (गरम) वायु से होता है। इसलिए, इन्हें ऊष्म व्यंजन कहते हैं। इनकी संख्या 4 है । इनके अलावा कुछ और व्यंजन ध्वनियाँ हैं जिनकी चर्चा आवश्यक है। जैसे –

  • (i) संयुक्त व्यंजन या संयुक्ताक्षर और
  • (ii) तल बि ंदुवाले व्यंजन ।

(i) संयुक्त व्यजन

परंपरा से क्ष, त्र, ज्ञ और श्र को हिन्दी वर्णमाला में स्थान दि या गया है, लेकि न ये मूल व्यंजन नहीं हैं। इनकी रचना दो व्यंजनों के मेल से हुई है, इसलिए इन्हें संयुक्त व्यंजन या संयुक्ताक्षर कहते हैं। जैसे –

  • क् + ष = क्ष
  • ज्‌ + ञ = ज्ञ
  • त्‌ + र = त्र
  • श्‌ + र = श्र

(ii) तल बिंदुवाले व्यंजन

हिन्दी में कुछ ऐसे शब्द हैं जिनमें प्रयुक्त व्यंजन के नीचे बिंदु दि या जाता है । ऐसे व्यंजन तल बि ंदुवाले व्यंजन कहलाते हैं। जैसे –

  • (a) हिन्दी में ड़ और ढ़ ।
  • (b) उर्दू (अरबी-फारसी) में क़, ख़, ग़, ज़ और फ़।
  • (c) अँगरेजी में ज्ञ और फ़।

ड़ और ढ़

ये हिन्दी के अपने व्यंजन हैं। संस्कृत में इनका प्रयोग नहीं होता है। ये ट-वर्गीय व्यंजन '' और '' के नीचे बिंदु देने से बनते हैं। अतः, इन्हें द्वि गुण व्यंजन भी कहते हैं। शब्दों में इनका प्रयोग प्रायः अक्षरों के बीच या अंत में होता है, शब्द के शुरू में नहीं। जैसे —

  • पढ़ना, ओढ़ना, लड़का, सड़क आदि। – (अक्षरों के बीच में)
  • बाढ़, आषाढ़, कड़ी, हथकड़ी आदि। – (शब्द का अंतिम अक्षर)

नोट

मूल शब्द के शुरू में 'ढ' हमेशा बिंदुरहित आता है। जैसे –

  • ढकनी, ढाल, ढाँचा, ढोंग, ढोलक, ढाई, ढकना आदि

अब, इन दोनों शब्दों को देखें पढ़ाई, उढ़्कना आदि।

क़, ख़, ग़, ज़ और फ़

हिन्दी में प्रयुक्त अरबी-फारसी के कुछ शब्दों में इनका प्रयोग ध्वनि-विशेष के लिए होता है। जैसे -क्लम, ख़राब, गरीब, राज़, बाज़ार, फ़ौरन आदि।

ज़ और फ़

अँगरेजी भाषा से आए कुछ शाब्दों में, ध्वनि -वि शेष के लि ए इनका प्रयोग होता है। जैसे-इज़, ज़ीरो, फ़ेल, फ़ास्ट आदि ।

वर्णों के उच्चारण-स्थान

किसी भी वर्ण के उच्चारण के लिए मुख के विभिन्न भागों का सहारा लेना पड़ता है । मुख के जिस भाग (अवयव) से वर्ण का उच्चारण किया जाता है, वह भाग उस वर्ण का उच्चार॑ण-स्थान कहलाता है । उच्चारण-स्थान मुख्यतः छह हैं

  1. कंठ
  2. तालु
  3. मूर्द्धा (तालु का ऊपरी भाग)
  4. दंत (दाँत)
  5. ओष्ठ (ओठ) और
  6. नासिका (नाक)

नीचे के चित्र द्वारा इसे अच्छी तरह समझा जा सकता है

Image of varn prakaran sound place
उच्चारण स्थान

उच्चारण-स्थान के आधार पर सभी वर्णों का वर्गी करण किया गया है, जो निम्नलिखित हैं —

  1. कंठ्य — जि नका उच्चारण कंठ से हो वे कंठ्य वर्ण हैं। जैसे — , , क-वर्ग, विसर्ग तथा
  2. तालव्य — जिनका उच्चारण तालु से हो वे तालव्य वर्ण हैं। जैसे — , , च-वर्ग, तथा
  3. मूर्द्धन्य — जिनका उच्चारण मूर्द्धा से हो वे मूर्द्धन्य वर्ण हैं। जैसे — , ट-वर्ग, तथा
  4. दत्य — जिनका उच्चारण दाँत से हो वे दंत्य वर्ण हैं। जैसे — त-वर्ग, और
  5. ओष्ठ्य — जिनका उच्चारण ओठ से हो वे ओष्ठ्य वर्ण हैं। जैसे — , तथा प-वर्ग
  6. अनुनासिक — जिनका उच्चारण मुख और नाक से हो वे अनुनासि क वर्ण हैं। जैसे — पंचमाक्षर (, , , , ), अनुस्वार और चन्द्रबिंदु
  7. कंठ-तालव्य — जिनका उच्चारण कंठ और तालु से हो वे कंठ-तालव्य वर्ण हैं। जैसे — तथा
  8. कंठौष्ट्य — जिनका उच्चारण कंठ और ओष्ठ से हो वे कंठौष्ठ्य वर्ण हैं। जैसे — तथा
  9. दंतौष्ट्य — जिसका उच्चारण दंत और ओष्ठ से हो वह दंतौष्ठद्य वर्ण है । जैसे —

वर्णों के उच्चारण-स्थान और उनके नाम निम्नलिखित तालि का द्वारा समझें

उच्चारण-स्थानवर्णो के नामउच्चरित वर्ण
कंठकंठ्य वर्ण, , क-वर्ग, और विसर्ग
तालुतालव्य वर्ण, , च-वर्ग, और
मूर्द्धामूर्द्धन्य वर्ण, टवर्ग, और
दंतदंत्य वर्णत-वर्ग, और
ओष्ठओष्ठ्य वर्ण, और प-वर्ग
नासि का और मुखअनुनासिक वर्णपंचमाक्षर, अनुस्वार और चन्द्रबिंदु
कंठ और तालुकंठतालव्य वर्ण तथा
कंठ और ओष्ठकंठौष्ट्य वर्ण तथा
दंत और ओष्ठदंतौष्ठट्य वर्ण

अल्पप्राण और महाप्राण

श्वास-वायु की मात्रा के आधार पर व्यंजन के दो भेद हैं '

  1. अल्पप्राण और
  2. महाप्राण ।

1. अल्पप्राण

अल्पप्राणा –जि न वर्णों के उच्चारण में श्वास (प्राण) वायु की मात्रा कम

(अल्प) होती है, उन्हें अल्पप्राण वर्ण कहते हैं। दूसरे शब्दों में, जि न ध्वनि यों के उच्चारण में “हकार” की ध्वनि नहीं सुनाई पड़ती उन्हें अल्पप्राण कहते हैं ।

  • (क) प्रत्येक वर्ग का प्रथम, तृतीय और पंचम वर्ण तथा
  • (ख) अंतःस्थ व्यंजन ।

इन्हें घेरे के अंदर दिखलाया गया है –

प्रथमतृतीयपंचमअंत:स्थ

2. महाप्राण

जिन वर्णों के उच्चारण में श्वास-वायु की मात्रा अधि क होती है, अर्थात् ‌जिनके उच्चारण में 'हकार' की ध्वनि सुनाई पड़ती है उन्हें महाप्राण कहते हैं। ये हैं–

  • (क) प्रत्येक वर्ग का द्वितीय और चतुर्थ वर्ण तथा
  • (ख) ऊष्म व्यंजन

इन्हें घेरे के अंदर दि खलाया गया है –

द्वितीयचतुर्थऊष्म

घोष आर अघोष

संपूर्ण स्वर और व्यंजन वर्णों को स्वरतंत्रि यों में कंपन के आधार पर दो भागों में बाँटा गया है-

  1. घोष या सघोष और
  2. अघोष ।

1. घोष या सघोष

घोष या सघोष जिन वर्णो के उच्चारण में स्वरतंत्रि यों में कंपन होता है उन्हें घोष या सघोष कहते हैं। जैसे-

  • (क) सभी स्वर,
  • (ख) प्रत्येक वर्ग 'का तृतीय, चतुर्थ और पंचम तथा
  • (ग) अंतःस्थ और ह।

इन्हें घेरे के अंदर दि खलाया गया है–

सभी स्वर – , , , , , , , , , ,

तृतीयचतुर्थपंचमअंतःस्थऊष्म

2. अघोष

जिन वर्णो के उच्चारण में स्वरतंत्रि यों में कंपन नहीं होता है उन्हें अघोष कहते हैं। जैसे –

  • (क) प्रत्येक वर्ग का प्रथम और द्वि तीय
  • (ख) श, ष और स।

इन्हें घेरे के अंदर दि खलाया गया है –

प्रथमद्वितीयऊष्म

व्यंजन-गुच्छ एवं द्वित्व

व्यंजन-गुच्छ

यदि किसी शाब्द में दो-तीन व्यंजन लगातार हों और उनके बीच कोई स्वर न हो, तो उस व्यंजन-समूह को व्यंजन-गुच्छ कहते हैं। जैसे – अच्छा, क्यारी, क्लेश, स्फूर्ति , स्पष्ट, स्वप्न, मत्स्य, उज्ज्वल, स्वास्थ्य आदि।

उदाहरणा :

अच्छा = अ + च्‌ + छ् + आ (च्‌, छ् — दो व्यंजनों का गुच्छ) मत्स्य = म्‌ + अ + त्‌ + स्‌ + य्‌ + अ (त्‌, स्‌, य् — तीन व्यंजनों का गुच्छ)

कभी-कभी एक ही शाब्द में एक से अधि क व्यंजन-गुच्छ पाए जाते हैं। जैसे – स्वास्थ्य, च्यवनप्राश, ज्योत्स्ना, ध्वस्त आदि ।

उदाहरणा :

स्वास्थ्य = स्‌ + व् + आ + स्‌ + थ् ‌+ य्‌ + अ (दो व्यंजन-गुच्छ)

द्वित्व

यदि दो समान व्यंजनों के बीच कोई स्वर न हो, तो वह संयुक्त व्यंजन या व्यंजन-गुच्छ द्वित्व कहलाता है। जैसे –

अड्डा / अड्डा, पद्टी / पट्ठी, धक्का / धक्का, सत्ता / सत्ता, पत्ती / पत्ती, कुत्ता / कुत्ता आदि ।

उपर्युक्त शब्दों में मोटे अक्षर प्रत्येक शब्द में दो-दो बार आए हैं। इन्हीं को 'द्वित्व' कहते हैं।

उदाहरणा :

धक्का = ध्‌+ अ +[वक्ट + क्‌|+ आ (क्‌+ क्-द्वि त्व हैं )

TIP

वर्गीय व्यंजन के दूसरे अथवा चौथे वर्णो को द्वित्व (दो बार) के रूप में नहीं लिखा जाता, अर्था त्‌दो महाप्राण आपस में संयुक्त नही होते हैं ।

जैसे–

ख-ख; घ-घ; छ-छ; झ-झ; ठ-ठ; ढ-ढ; थ-थ; ध-ध; फ-फ और भ-भ ।

उदाहरणा :

  • अशुद्ध – मख्खन, बघ्घी, मछछर, झझ्झर, चिठ्ठी, बुढढा, पथ्यर आदि।
  • शुद्ध – मक्खन, बग्घी, मच्छर, झज्झर, चिट्ठी, बुड्ढा, पत्थर आदि।

अनुस्वार और पंचमाक्षर

ङ्, ज्‌, ण्‌, न् ‌और म् – अनुनासिक व्यंजन हैं। इन्हें 'पंचमाक्षर' भी कहते हैं। ये जब अपने वर्ग के व्यंजन से ह्‍ल रूप में जुड़ते हैं, तब लेखन सुविधा हेतु इन्हें अनुस्वार () में बदल दिया जाता है। जैसे –

  • क-वर्ग के साथ (ड) –
    • अङ्क/अङ्क = अंक ।
    • पङ्क/पडख़ = पंख ।
    • अङ्ग/अड = अंग ।
    • जङ्घा / जङ्घा = जंघा ।
  • च-वर्ग के साथ (ञ्‌) –
    • पञ्च = पंच ।
    • पञ्छी = पंछी ।
    • झञ्झट = झंझट ।
  • ट-वर्ग के साथ (ण्‌) –
    • घण्टा = घंटा ।
    • कण्ठ = कंठ ।
    • दण्ड = दंड ।
    • ढण्ढवार = ढंढ़ार (बेडौल) ।
  • त-वर्ग के साथ (न्‌) –
    • पन्त = पंत ।
    • पन्थ = पंथ ।
    • बन्द = बंद ।
    • अन्था = अंधा ।
  • प-वर्ग के साथ (म्‌) –
    • कम्प = कंप ।
    • जम्फर = जंफर ।
    • अम्बा = अंबा ।
    • दम्भ = दंभ ।

नोट (1)

अनुस्वार का प्रयोग ज्यादा प्रचलि त एवं मान्य है। फिर भी आप कि सी व्यंजन के साथ पंचमाक्षर संयुक्त करना चाहते हों, तो वर्ग का हमेशा खयाल रखें। एक वर्ग के साथ दूसरे वर्ग के पंचमाक्षर को संयुक्त न करें । जैसे –

अञ्क/अण्क/अन्क, डन्डा/डञ्डा आदि लिखना गलत है।

नोट (3)

लेकि न, कि सी शब्द में दो भि न्न पंचमाक्षर या कि सी पंचमाक्षर का द्वि त्व हो, तो अनुस्वार का प्रयोग न करें। उसमें पंचमाक्षर का प्रयोग करें । जैसे –

  • वाङ्मय, जन्म, निम्न, मृण्मय आदि। – (भिन्न पंचमाक्षर)
  • उन्नति, सम्मति, अक्षुण्ण आदि। – (द्वित्व पंचमाक्षर)

नोट (3)

जिन शाब्दों के पहले सम्‌उपसर्ग लगता है, वहाँ “म्‌'के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग करें। जैसे –

  • सम्‌ + यम = संयम
  • सम्‌ + रक्षण = संरक्षण
  • सम्‌ + लाप = संलाप
  • सम्‌+ वाद संवाद
  • सम्‌+ शय = संशय
  • सम्‌+ सार = संसार

अयोगवाह

अनुस्वार और विसर्ग को संस्कृत में अयोगवाह माना गया है, क्योंकि ये दोनों न तो स्वर हैं और न व्यंजन । पं. किशोरीदास वाजपेयी ने सच ही कहा है– "इनकी स्वतंत्र गति नहीं, इसलिए ये स्वर नहीं हैं और व्यंजनों की तरह ये स्वरों के पूर्व नहीं, पश्चात्‌आते हैं, इसलिए ये व्यंजन भी नहीं हैं।"

दूसरे शब्दों में, स्वर और व्यंजन में जो-जो गुण हैं, वे गुण इनमें नहीं। इसलिए इन दोनों ध्वनि यों को अयोगवाह कहा जाता है, अर्थात्‌ ये न तो स्वर से योग हैं और न व्यंजन से अयोग, फिर भी अर्थ का निर्वाह (वाह) करते हैं, अत अयोगवाह है ।

अनुतान (Intonation)

जब कोई व्यक्ति कुछ बोलता है, तब वह यों ही धाराप्रवाह बोलता नहीं जाता, बल्कि किसी शब्द या वाक्य को बोलने के समय अपने भावों (सुख, दु:ख, आश्चर्य, खीझ आदि )के अनुरूप शब्द-ध्वनि को ऊपर-नीचे चढ़ाता-उतारता है। इसी चऴाव-उतार या आरोह-अवरोह अथवा ऊची-नीची स्वर (ध्वनि ) लहरी को 'सुर-लहर' या सुर का अनुतान कहते हैं। जैसे–

'अच्छा' शब्द को विभिन्न अनुतान में बोला जा सकता है –

  • अच्छा। – सामान्य कथन (अनुतान समान है ।)
  • अच्छा? – प्रश्‍नवाचक (अनुतान जोरदार है ।)
  • अच्छा! – आश्चर्य (अनुतान अंत में लंबा है ।)

इसी प्रकार वाक्य में भी भावानुसार अनुतान का प्रभाव देखा जाता है । जैसे–

  • वह जा रहा है। (अनुतान सभी अक्षरों में समान है ।)
  • वह जा रहा है ? (अनुतान बीच में उठता है और अंत में गि रता है।)
  • वह जा रहा है । (अनुतान अंत में उठकर लंबा हो जाता है।)

बलाघात या स्वराघात

'बलाघात' शब्द, बल + आघात से बना है । शब्द-उच्चारण के समय किसी खास स्वर पर बल देना, बलाघात या स्वराघात कहलाता है । इसके तीन भेद हैं

  1. वर्ण या अक्षर-बलाघात,
  2. शब्द-बलाघात और
  3. वाक्य-बलाघात ।

1. वर्ण या अक्षर-बलाघात

किसी खास वर्ण या अक्षर पर पड़नेवाले बलाघात को वर्ण या अक्षर-बलाघात कहते हैं। जैसे –

(क) चला (वह स्कूल से चला) – “च” पर बलाघात है । (ख) चल्ना (तू गाड़ी चला) -— “ला” पर बलाघात है।

2. शब्द-बलाघात

शब्द-बलाघात–वाक्य में प्रयुक्त किसी खास शब्द पर विशेष बल देना, शब्द-बलाघात कहलाता है । इससे अर्थ में अंतर आता है। जैसे –

(क) तुम नहीं पढ़ोगे। – (किसी शब्द पर वि शेष बल नहीं है।) (ख) तुम नहीं पढ़ोगे ? - (“नहीं' शब्द पर वि शेष बलाघात है।)

3. वाक्य-बलाघात

शब्द-बलाघात से वाक्य-बलाघात अधिक अर्थपूर्ण होता है । जैसे–

(क) आज मैं गीता पढूंगा। (कल किसी अन्य व्यक्ति ने गीता पढ़ने का काम किया था ।) (ख) आज मैं गीता पटूँगा। (कल मैंने कुछ और पढ़ा था, आज गीता पढूँगा ।)

संगम

संगम को 'संहिता' भी कहते हैं। उच्चारण करते समय केवल स्वरों और व्यंजनों के उच्चारण, उनकी दीर्घता, उनमें संयोग और बलाघात का ही ध्यान नहीं रखना पड़ता, बल्कि पदीय सीमाओं का भी खयाल रखना पड़ता है । दूसरे शब्दों में, किस शब्द (पद) के बाद वि राम रखना है या नहीं, अर्था त्‌दो पदों के बीच मौन वि राम (बगैर वि राम चि ह्न के) को “संगम” कहते हैं। इससे भी अर्थ में अंतर आता है। “संगम' को समझने के लिए (+) चि ह्न दि या गया है।

  • (क) उसके भाई का रण में देहांत हो गया । — (का + रण) (यहाँ “का” और “रण” के बीच थोड़ा ठहरना है।) इसी ठहराव या विराम को संगम कहते हैं ।
  • (ख) उसके भाई इसी कारण नहीं आए । – (कारण)
  • (ग) मरुभूमि का मैदान जल सा दि खाई देता है। - (जल + सा) (यहाँ भी “जल” और “सा” के बीच मौन वि राम है ।)
  • (घ) मेरे वि द्यालय में आज जलसा (सभा) है। – (जलसा)
  • (ङ) जा पानी ला। – (जा + पानी)
  • (च) जापानी ला । – (जापानी)

वर्ण, ध्वनि , लिपि और अक्षर

वर्ण और ध्वनि

कभी-कभी वर्ण के लिए ध्वनि या ध्वनि के लिए वर्ण शब्द का प्रयोग होता है, फिर भी दोनों में अंतर है।

मुँह के विभिन्न अवयवों या उच्चारण-स्थानों से जो वर्ण या वर्णों के समूह उच्चरि त होते हैं उन्हें ध्वनि कहते हैं।

उच्चरित ध्वनि अर्थपूर्ण हो, तो वह व्याकरण की दृष्टि से ध्वनि है और यदि उसका कोई अर्थ न हो, तो वह "निरर्थक ध्वनि" कहलाती है। लि खते समय वर्णो को जोड़कर शब्द बनाया जाता है और शब्दों से वाक्य । वर्णों के सही मेल से "सार्थक शब्द" बनते हैं, अगर वर्णो का सही मेल न हो, तो "निरर्थक शब्द" बनते हैं । ध्वनि मुँह द्वारा उच्चरित होती है और कान द्वारा सुनी जाती है। वर्ण कि सी संकेत द्वारा हाथ से लिखा जाता है या कि सी यंत्र द्वारा छापा जाता है।

स्पष्ट है कि मौखि क भाषा की सबसे छोटी इकाई "ध्वनि" है और लिखित भाषा की सबसे छोटी इकाई "वर्ण" । कभी-कभी ध्वनि समान होते हुए भी उसके अर्थ और लिपि में अंतर होता है । जैसे हिन्दी की "कम" ध्वनि की "come" ध्वनि में ध्वनिगत समानता है, लेकिन अर्थ और लिपि में अंतर है।

लिपि

भाषा के मुख्यत: दो रूप हैं मौखिक और लिखित। मौखिक भाषा और अँगरेजी में ध्वनि याँ मुख द्वारा उच्चरि त होती हैं। यदि उन उच्चरित ध्वनियों को किसी चिह्न या संकेत द्वारा मूर्त रूप दें, तो वह लिखित भाषा (लिखित रूप) "लिपि" कहलाएगी । अर्थात्‌, "भाषा-ध्वनियों को लिखकर प्रकट करने हेतु निश्चिचत किए गए संकेतों या चिह्लों को लिपि कहते हैं।"

हिन्दी जिस लिपि में लिखी जाती है, उसे 'देवनागरी' लिपि कहते हैं। इस लिपि में संस्कृत, मराठी और नेपाली भाषाएँ लिखी जाती हैं। पंजाबी भाषा 'गुरुमुखी' में तथा अँगरेजी 'रोमन' लिपि में लिखी जाती है | उर्दु और कश्मीरी की लिपि 'फारसी' कहलाती है।

संसार की अधिकतर लिपियाँ बाएँ से दाएँ लिखी जाती हैं। जैसे – देवनागरी, गुरुमुखी, रोमन आदि । इसके विपरीत फारसी लिपि दाएँ से बाएँ लिखी जाती है। चीनी-जापानी भाषाएँ तो ऊपर से नीचे लिखी जाती है।

यहाँ कुछ प्रमुख भाषाओं की लि पि यों को दि खलाया गया है ।

  • भारत एक महान्‌ देश है। (हिन्दी)
  • ભારત એક મહાન દેશ છે. (गुजराती)
  • ভারত এক মহান দেশ। (बँगला)
  • ਭਾਰਤ ਇੱਕ ਮਹਾਨ ਦੇਸ਼ ਹੈ। (पंजाबी)
  • India is a great country. (अँगरेजी)
  • بھارت ایک عظیم ملک ہے۔ (उर्दू)

अक्षर

कुछ वैयाकरण के अनुसार – जिसका क्षर न हो, वह 'अक्षर' है । जैसे – अ, आ, क्‌, ख् ‌आदि । अर्थात् ‌– वर्ण ही अक्षर है।

आधुनिक वैयाकरण वर्ण और अक्षर में अंतर मानते हैं। उनका मत है कि स्वर या स्वरसहित व्यंजन 'अक्षर' हैं। जैसे अ, आ, क, ख आदि।

उनके अनुसार, "लड़का" शाब्द में तीन अक्षर हैं – ल + ड़ + का । लेकिन, वर्णों की संख्या छह है – ल्‌+ अ + डू + अ + क्‌+ आ ।

इस तरह अक्षर चार प्रकार के होते हैं –

  • (क) एक वर्णवाले अक्षर- — स्वर (अ, आ, ई आदि।)
  • (ख) दो वर्णवाले अक्षर — क, ख, ग, की, खु, खै आदि।
  • (ग) तीन वर्णवाले अक्षर — क्ष, त्र, ज्ञ, श्र, त्त, क्क, त्व, च्च आदि।
  • (घ) चार वर्णवाले अक्षर — ज्ज्व, त्स्य, स्थ्य आदि।

Join the Discussion

Show Comments

No comments

No comments yet.

Post a Comment

Popular Post

संक्षेपण लेखन: नियम, उदाहरण और महत्वपूर्ण टिप्स

संक्षेपण लेखन: नियम, उदाहरण और महत्वपूर्ण टिप्स

संक्षेपण-लेखन (Precis Writing) संक्षेपण-लेखन के लिए आवश्यक निर्देश : संक्षेपण उदाहरण (Precis Example) - 1 संक्षेपण उदाहरण (Precis Example) - 2 संक्षेपण उदाहरण (Precis Example) - 3 संक्षेपण उदाहरण (Precis Example) - 4 संक्षेपण उदाहरण (Precis Example) - 5 संक्षेपण उदाहरण (Precis Example) - 6 संक्षेपण उदाहरण (Precis Example) - 7 संक्षेपण उदाहरण (Precis Example) - 8 Conclusion संक्षेपण-लेखन (Precis Writing) ​ संक्षेपण-लेखन एक ऐसी विधा है जिसके द्वारा पठित/अपठित गंद्यांश की मूल बातों/भावों को संक्षेप में प्रस्तुत किया जाता है। और, यह संक्षेपित रूप उस मूल उद्धरण की आत्मा होती है। संक्षेपण-लेखन के लिए आवश्यक निर्देश : ​ Notes 1 दिए गए उद्धरण या गद्यांश को दो-तीन बार ठीक ढंग से पढ़ना चाहिए , जिससे मूल बातें समझ में आ जाएँ । Notes 2 पढ़ते समय गद्यांश के महत्त्वपूर्ण वाक्य या शब्दों के नीचे लकीर देकर चिह्नित कर लेना चाहिए । Notes 3 गद्यांश में निहित शब्दों की संख्या की गिनती कर लेनी चाहिए और एक ऐसा खाका तैयार करना चाहिए जिसमें शब्दों की संख्या मूल गद्यांश की एक तिहाई हो। अगर संक्षेपित गद...
By Guddu Kumar
Algebra Class 6 to 8 Worksheet with Solutions in Hindi

Algebra Class 6 to 8 Worksheet with Solutions in Hindi

1. बीजीय व्यंजक प्रश्नावली 1.1 प्रश्नावली 1.2 प्रश्नावली 1.3 प्रश्नावली 1.4 प्रश्नावली 1.5 प्रश्नावली 1.6 2. गुणनखंड प्रश्नावली 2 3. एक चर वाले रेखिक समीकरण प्रश्नावली 3.1 प्रश्नावली 3.2 प्रश्नावली 3.3 4. शाब्दिक समीकरण 1. बीजीय व्यंजक ​ प्रश्नावली 1.1 ​ प्रश्‍न 1 ​ (क) p + 7 (ख) (ग) − 5p (घ) 2m − 11 (ङ) 5y + 3 (च) 5y − 16 (छ) −5y + 16 (ज) (झ) z × z (ञ) (ट) x 2 + y 2 (ठ) 10 − yz (ड) (a × b) − (a + b) (ढ) 2x + 1 (यहाँ x वह संख्या है) (ण) x℃ − 20℃ (त) 3m (परिमाप = m + m + m) (थ) आयत का क्षेत्रफल = k × n (द) x + 1 (ध) x और x + 2 (यहाँ x एक विषम संख्या है।) (न) x और x + 2 (यहाँ x एक सम संख्या है।) (प) 5n (यहाँ n कोई भी पूर्णांक है, जैसे 1, 2, 3...) (फ) (यहाँ x भिन्न का अंश (numerator) है और x+1 उसका हर (denominator)) प्रश्‍न 2 ​ (क) पद: −4x, 5y गुणनखंड: –4x → –4, x 5y → 5, y पेड़ आरेख (Tree Diagram) : (ख) पद: xy, 2x 2 y 2 गुणनखंड: xy → x, y 2x 2 y 2 → 2, x, x, y, y पेड़ आरेख (Tree Diagram) : (ग) पद: 1, x, x 2 गुणनखंड: 1 → 1 x → x x 2 → x, x पेड़ आरेख (Tree...
By Guddu Kumar

अपठित गद्यांश: Intermediate Hindi Unseen Passage Guide

अपठित गद्यांश और प्रश्नोत्तर-लेखन ​ परीक्षा में कभी-कभी ऐसे गद्यांश दिए जाते हैं जिनका पाठ्यपुस्तकों से कोई संबंध नहीं रहता। फिर भी उस अंश से संबद्ध कई प्रकार के प्रश्‍न रहते हैं। छात्रों को उनका उत्तर देना पड़ता है। इस अभ्यास से बौद्धिक क्षमता और भाषा पर उनकी कैसी पकड़ है, इसका ज्ञान होता है । उदाहरणार्थ कुछ गद्यांश और उनसे संबंधित प्रश्नोत्तर दिए जा रहे हैं। अपठित गद्यांश और प्रश्नोत्तर-लेखन अपठित गद्यांश 1 अपठित गद्यांश 2 अपठित गद्यांश 3 अपठित गद्यांश 4 अपठित गद्यांश 5 अपठित गद्यांश 6 अपठित गद्यांश 7 अपठित गद्यांश 8 अपठित गद्यांश 9 अपठित गद्यांश 10 अपठित गद्यांश 11 अपठित गद्यांश 12 अपठित गद्यांश 13 अपठित गद्यांश 14 अपठित गद्यांश 15 अपठित गद्यांश 16 अपठित गद्यांश 17 अपठित गद्यांश 18 अपठित गद्यांश 1 ​ विश्वविद्यालय कोई ऐसी वस्तु नहीं हैजो समाज से काटकर अलग की जा सके । समाज दरिद्र है तो विश्वविद्यालय भी दरिद्र होंगे, समाज कदाचारी है, तो विश्वविद्यालय भी कदाचारी होंगे और समाज में अगर लोग आगे बढ़ने के लिए गलत रास्ते अपनाते हैं तो विश्वविद्यालय के शिक्षक और छात्र भी सही रास्तों को छोड़कर ...
By AvN Learn

Class 6-8 Number System Quiz PDF with Answers in Hindi

0 से छोटे प्रत्येक पूर्णांक का चिह्न होता है - + − × ÷ संख्या रेखा पर 0 के दायीं ओर 5 इकाई की दूरी पर पूर्णाक है - + 5 − 5 + 4 − 4 पूर्णाक −1 का पूर्ववती है - 0 2 −2 1 पूर्णाकों −1 और 1 के बीच पूर्णाकों की संख्या है - 1 2 3 0 −5 और 5 के बीच स्थित पूर्ण संख्याओं की संख्या है - 10 3 4 5 −10 और −15 के बीच स्थित सबसे बड़ा पूर्णाक है - −10 −11 −15 −14 −10 और −15 के बीच स्थित सबसे छोटा पूर्णाक है - −10 −11 −15 −14 संख्या रेखा पर, पूर्णाक 5 स्थित है - 0 के बायीं ओर 0 के दायीं ओर 1 के बायीं ओर −2 के बायीं ओर पूर्णाकों के किस युग्म में, पहला पूर्णांक संख्या रेखा पर दूसरे पूर्णांक के बायीं ओर स्थित नहीं है? (−1, 10) (−3, −5) (−5, −3) (−6, 0) ऋणात्मक चिहण (−) वाला पूर्णाक सदैव निम्नलिखित से छोटा होता है 0 −3 −1 −2 धनात्मक चिहू (+) वाला पूर्णाक सदैव निम्नलिखित से बड़ा होता है - 0 1 2 3 −50 के पूर्ववर्ती का परवर्ती है −48 −49 −50 −51 एक ऋणात्मक पूर्णांक का योज्य प्रतिलोम - सदैव ऋणात्मक होता है सदैव धनात्मक होता है वही पूर्णांक होता है शून्य होता है अमूल्य और अमर कश्मीर में क्रमशः दो स्थानों 2 और 5 पर...
By Guddu Kumar

संख्या स्थानीय मान सारणी: एक संपूर्ण मार्गदर्शिका

संख्या स्थानीय मान सारणी (Place value chart) ​ संख्या स्थानीय मान सारणी (Place value chart) भारतीय पद्धति (Indian System) अंतर्राष्ट्रीय पद्धति (International System) भारतीय पद्धति (Indian System) ​ भारतीय पद्धति (Indian System) संख्या (Commas) Scientific Notation इकाई 1 10 0 दहाई 10 10 1 सैकड़ा 100 10 2 हज़ार 1,000 10 3 दस हज़ार 10,000 10 4 लाख 1,00,000 10 5 दस लाख़ 10,00,000 10 6 करोड़ 1,00,00,000 10 7 दस करोड़ 10,00,00,000 10 8 अरब 1,00,00,00,000 10 9 दस अरब 10,00,00,00,000 10 10 खरब 1,0...
By AvN Learn

NCERT Class 11 Math Chapter 3 Objective Questions Hindi

Level 1 ​ प्रश्‍न 1 : यदि tan θ = है, तो sin θ है − परंतु नहीं − या परंतु − इनमें से कोई नहीं उत्तर : सही विकल्प (B) है। क्योंकि tan θ = ऋणात्मक है, इसलिए θ या तो दूसरे चतुर्थांश में है या चौथे चतुर्थांश में है। इस प्रकार, sin θ = यदि θ दूसरे चतुर्थांश में स्थित है या sin θ = , यदि θ चौथे चतुर्थांश में स्थित है। प्रश्‍न 2 : यदि sin θ और cos θ समीकरण ax 2 − bx + c = 0 के मूल है, तो a, b और c निम्नलिखित संबंध को संतुष्ट करते है : a 2 + b 2 + 2ac = 0 a 2 − b 2 + 2ac = 0 a 2 + c 2 + 2ab = 0 a 2 − b 2 − 2ac = 0 उत्तर : … Coming Soon Solution प्रश्‍न 3 : sin x cos x का अधिकतम मान है: 1 2 उत्तर : … Coming Soon Solution प्रश्‍न 4 : sin 20° sin 40° sin 60° 80° का मान है: उत्तर : … Coming Soon Solution प्रश्‍न 5 : cos cos cos cos का मान है: 0 उत्तर : … Coming Soon Solution प्रश्‍न 6 : यदि sin θ + cosec θ = 2, तो sin 2 θ + cosec 2 θ बराबर है – 1 4 2 इनमें से कोई नहीं उत्तर : … Coming Soon Solution प्रश्‍न 7 : यदि f(x) = cos 2 x + sec 2 है, तो f(x) < 1 f(x) = 1 1 < f...
By Guddu Kumar

Number System Class 6 to 8 Worksheet with Answer in Hindi

1. प्राकृत संख्याएँ ​ 2. पूर्ण संख्याएँ 3. गुणनखंड और गुणज​ 1. प्राकृत संख्याएँ ​ ​ प्रश्‍न 1 ​ 6 अंकों की कुल संख्याएँ: 9,00,000 (नौ लाख) सबसे बड़ी संख्या: 9,99,999 सबसे छोटी संख्या: 1,00,000 प्रश्‍न 2 ​ 4, 7, 5, 0 से बनी संख्याएँ: सबसे बड़ी संख्या: 7,540 सबसे छोटी संख्या: 4,057 प्रश्‍न 3 ​ 2, 0, 4, 7, 6, 5 से बनी संख्याएँ और उनका योग: सबसे बड़ी संख्या: 7,65,420 सबसे छोटी संख्या: 2,04,567 योग: 9,69,987 प्रश्‍न 4 ​ 4, 5, 6, 0, 7, 8 से बनी 5 संख्याएँ: 4,56,078; 8,76,540; 5,04,678; 7,80,456; 6,54,780 प्रश्‍न 5 ​ 4, 5, 6, 7, 8, 9 से 8 अंकों की 3 संख्याएँ (अंक दोहराते हुए): 9,98,76,544 4,45,67,899 8,87,76,544 प्रश्‍न 6 ​ 3, 0, 4 से 6 अंकों की 5 संख्याएँ (अंक दोहराते हुए): 3,00,044; 4,33,000; 3,40,340; 4,00,433; 3,33,440 प्रश्‍न 7 ​ 8 अंकों की सबसे छोटी संख्या से अगली 5 संख्याएँ (आरोही क्रम): 1,00,00,000 (एक करोड़) 1,00,00,001 (एक करोड़ एक) 1,00,00,002 (एक करोड़ दो) 1,00,00,003 (एक करोड़ तीन) 1,00,00,004 (एक करोड़ चार) 1,00,00,005 (एक करोड़ पाँच) प्रश्‍न 8 ​ तुलना और क्रम: सबसे छोटी संख्या:...
By Guddu Kumar

120+ पर्यायवाची शब्द लिस्ट: Paryayvachi Shabd in Hindi

पर्यायवाची शब्द ​ पर्यायवाची शब्द ऐसे शब्दों की सूची नीचे प्रस्तुत है– अभ्यास Conclusion किसी शब्द के समान अर्थवाले अन्य शब्दों को पर्यायवाची या समानार्थी शब्द कहते हैं। जैसे - आँख के बदले नेत्र, नयन, लोचन आदि शब्द पर्यायवाची शब्द कहे जाते हैं । हिन्दी में अधिकतर शाब्द ऐसे हैं जिनके बदले बहत से शब्द प्रयुक्त होते हैं। ऐसे शब्दों की सूची नीचे प्रस्तुत है– ​ अंग : अंश, अवयव, खंड, भाग, विभाग, हिस्सा । अंधकार : अँधियारा, अँधेरा, तम, तमिस्र, तिमिर, ध्वांत। अदरक : अनूपज, अपाकशाक, आदी, आर्द्रशाक, कटुभद्र । अनुपम : अतुल्य, अद्वितीय, अदभुत, अनूठा, अनोखा, अपूर्व । अपमान : अनादर, अवज्ञा, अवमान, अवमानना, अवहेलना, तिरस्कार । अभिमान : अहं, अहंकार, अहंभाव, गर्व, घमंड, दर्प, दंभ, मद । अमृत : अमी, अमिय, पीयूष, मधु, सुधा, सोम । अर्जुन : गांडीवधर, गांडीवी, पांडुनन्दन, पांडुपुत्र, पार्थ, मध्यमपांडव, वृहन्नला, सव्यसाची । आँख : अंबक, अक्ष, अक्षि, ईक्षण, चश्म, चक्षु, दृक्‌, दृग्‌, दृष्टि, नजर, नयन, नेत्र, नैन,. लोचन, बिलोचन । आकाश : अंबर, अंतरिक्ष, अनंत, अभ्र, अर्श, आसमान, ख, गगन, तारापथ, दिव,...
By AvN Learn
फारेनहाइट और सेल्सियस: तापमान बदलने का आसान तरीका

फारेनहाइट और सेल्सियस: तापमान बदलने का आसान तरीका

Notes फारेनहाइट और सेल्सियस (Farenheit and Celsius) फारेनहाइट से सेल्सियस में बदलने का सुत्र (Convert to fahrenheit to celsius) प्रश्‍न सेल्सियस से फारेनहाइट में बदलने का सुत्र (Convert to celsius to fahrenheit) प्रश्‍न फारेनहाइट और सेल्सियस (Farenheit and Celsius) ​ वस्तु(Object) फारेनहाइट मापन (Farenheit Scale) सेल्सियस मापन (Celsius Scale) पानी का जमना 32°F 0°C पानी का ऊवलना 212°F 100°C फारेनहाइट से सेल्सियस में बदलने का सुत्र (Convert to fahrenheit to celsius) ​ °C = ((°F - 32) × 5) ÷ 9 या (or) °C = (°F - 32) × 5/9 या (or) °C = ∘ F − 32 9 × 5 प्रश्‍न ​ 75°F को सेल्सियस में बदलें। हल : °C = 75 − 32 9 × 5 = 43 9 × 5 = 23.89°C सेल्सियस से फारेनहाइट में बदलने का सुत्र (Convert to celsius to fahrenheit) ​ °F = { ( °C × 9 ) ÷ 5 } + 32 या (or) °F = ( °C × 9/5 ) + 32 या (or) °F = °C × 9 5 + 32 प्रश्‍न ​ 20°C को फारेनहाइट में बदलें। हल : °F = (20 × 9/5) + 32 = 68°F
By AvN Learn

AvN Learn English

AvN Learn English

No blogs found in this list.

Share