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NCERT Class 9 Physics Complete Notes in Hindi PDF

भौतिकी प्राकृतिक विज्ञान की वह शाखा है जिसमें द्रव्य (matter) तथा ऊर्जा (energy) और उसकी परस्पर क्रियाओं का अध्ययन होता है।

1. भौतिक राशियों के मात्रक एवं विमीय विश्लेषण

  • वे सभी राशियों, जिन्हें एक नियम संख्या द्वारा व्यक्त किया जा सके तथा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मापा जा सके, भौतिक राशियाँ कहलाती है। जैसे – लम्बाई, ताप, बल आदि।

भौतिक राशियों के प्रकार

मापन के आधार पर भौतिक राशि याँ तीन प्रकार की होती है।

  1. मूल राशियाँ (Fundamental Quantities) – ये राशियाँ एक-दूसरे से स्वतन्त्र होती हैं। भौतिकी में, लम्बाई, द्रव्यमान, समय, विद्युत धारा, ताप, ज्योति तीव्रता तथा पदार्थ की मात्रा सात मूल राशियाँ (Fundamental Quantities) हैं।
  2. व्युत्पन्न राशियाँ (Derived Quantities) – ये राशियाँ मूल राशियों की सहायता से व्युत्पन्न की जाती हैं। जैसे – क्षेत्रफल, आयतन, बल, दाब आदि ।
  3. पूरक राशियाँ (Supplementary Quantities) – मूल राशि यों तथा व्युत्पन्न राशि यों के अतिरिक्त दो अन्य राशि याँ होती हैं, जिन्हें पूरक राशियाँ कहते हैं। जैसे – समतल कोण तथा घन कोण।

दिशा तथा परिमाण के आधार पर भौतिक राशियाँ दो प्रकार की होती है।

अदिश राशियाँसदिश राशियाँ
इन राशियों को व्यक्‍तकरने के लिए कवल परि माण की आवश्यकता होती है, दि शा की नहीं।इन राशियों को व्यक्त करने के लिए परिमाण के साथ-साथ दिशा को भी आवश्यकता होती है।
उदाहरण - लम्बाई, दूरी, द्रव्यमान, ऊर्जा , विद्युत धारा आदि ।उदाहरण - विस्थापन, आवेग, विद्युत क्षेत्र, त्वरण, स्थिति , वेग, बल, संवेग आदि ।
  • किसी राशि के मापन के निर्देश मानक को मात्रक (Unit) कहते हैं।

  • मात्रक दो प्रकार के होते हैं –

    1. मूल राशियों के मात्रक मूल मात्रक (Fundamental Unit) कहलाते है। ये पूर्णतय एक दूसारे से स्वतन्त्र होते है। जैसे लम्बाई का मीटर
    2. व्युत्पन्न राशियों के मात्रक व्युत्पन्न मात्रक (Derived Unit) कहलाते है। ये मात्रक मूल मात्रको की सहायता से प्राप्त कि ये जाते है। जैसे – क्षेत्रफल का मात्रक मीटर2
    3. पूरक राशियों के मात्रक पूरक मात्रक कहलाते है। जैसे – रेडियन, स्टेरेडियन
  • बहुत लम्बी दूरि यों को मापने के लिए प्रकाशवर्ष का प्रयोग कि या जाता है अर्थात्‌ प्रकाशवर्ष दूरी का मात्रक है। 1 प्रकाशवर्ष = 9.46 × 10¹⁵ मीटर

  • दूरी मापने की सबसे बड़ी इकाई पारसेक है । 1 पारसेक = 3.26 प्रकाशवर्ष = 3.08 × 10¹⁶ मीटर

मात्रक पद्धतियाँ

  1. CGS (सेन्टीमीटर, प्राम, सेकण्ड)
  2. MKS (मीटर, किलोग्राम, सेकण्ड)
  3. FPS (फुट, पाउण्ड, सेकण्ड)
  4. SI Units ( अन्तर्राष्ट्रीय मात्रक पद्धति )

S.I. पद्धति में मूल मात्रक की संख्या सात हैं –

भौतिक राशिS.I. के मूल मात्रकसंकेत
लम्बाईमीटर (metre)m (मी)
द्रव्यमानकिलोग्राम (kilogram)kg (किग्रा)
समयसेकण्ड (second)s (से)
तापकेल्विन (kelvin)K (के)
विद्युत्‌ धाराऐम्पियर (ampere)A (ऐ)
ज्योति-तीव्रताकैण्डेला (Candela)cd (कैण्ड)
पदार्थ का परिमाणमोल (mole)mol (मोल)
भौतिक राशिS.I. के सम्पूरक मूल मात्रकसंकेत
समतल कोणरेडियन (radian)rad (रेड)
घन कोण (solid angle)स्टेरेडि यन (steradian)sr

S.I. के कुछ पुराने मात्रकों के नये नाम और संकेत

भौतिक राशिपुरान नामनया नाम
तापडिग्री सेण्टीग्रेड, डिग्री सेल्सियस
आवृतिकम्पन प्रति सेकण्ड, cpsहट्‍‍र्ज, Hz
ज्योति-तीव्रताकैण्डिल शक्ति C.P.कैण्डेला, cd
  • बल की C.G.ऽ. पद्धति में मात्रक डाइन है एवं S.I. पद्धति में मात्रक न्यूटन है । 1 न्यूटन = 10 डाइन
  • कार्य की C.G.ऽ. पद्धति में मात्रक अर्ग है एवं S.I. पद्धति में मात्रक जूल है। 1 जूछ = 107 अर्ग

दस की विभिन्न घात्तों के प्रतीक (Symbols for various powers of 10) : भौतिकी में बहुत छोटी और बहुत बड़ी राशियों के मानों को दस की घात के रूप में व्यक्त किया जाता है। 10 की कुछ घातों को वि शेष नाम तथा संकेत दि ये गये हैं जि से नीचे दी गई सारणी में दिया गया है ।

दस की घातपूर्व प्रत्यय (Prefix)प्रतीक (Symbol)
10−18पटो (atto)a
10−15फेम्टो (femto)f
10−12पीको (Pico)p
10−9नैनो (nano)n
10−6माइक्रो (micro)µ
10−3मिठी (milli)m
10−2सेण्टी (centi)c
10−1डेसी (deci)d
101डेका (deca)da
102हेक्टो (hecto)h
103किलो (kilo)k
106मेगा (mega)M
109गीगा (giga)G
1012टेरा (tera)T
1015पेटा (peta)P
1018एक्सा (exa)E

2. गति

  • यदि किसी वस्तु की स्थिति में समय के साथ कोई परि वर्तन नहीं होता है, तो वस्तु विराम (Rest) अवस्था में कहलाती है।
  • यदि किसी वस्तु की स्थि ति में समय के साथ परि वर्तन होता है, तो वस्तु गति (Motion) की अवस्था में कहलाती है।

गति के प्रकार (Types of Motion)

  1. जब कोई कण एक सरल रेखा में गति मान होता है, तो उसकी गति सरलरेखीय गति (Rectilinear Motion) कहलाती है। उदाहरण – प्रकाश के कणों की गति।
  2. जब एक वस्तु (कण नहीं) एक सीधी रेखा में गति मान होता है, तो उसकी गति स्थानान्तरीय गति (Trasnlatory Motion) कहलाती है। उदाहरण – कार की सीधी सड़क पर गति
  3. जब कोई कण कि सी वृत्ताकार मार्ग पर गति करता है, तो उसकी गति वृत्तीय गति (Circular Motion) कहलाती है उदाहरण – पत्थर को तार पर बाँधकर घुमना।
  4. जब कोई वस्तु (कण नहीं) एक निश्चित अक्ष के परित : (यह अक्ष वस्तु से भी गुजर सकता है) एक वृत्तीय पथ पर गति करती है, तो उसकी गति घूर्णन गति (Rotatory Motion) कहलाती है। उदाहरण – घरों में पंखें की गति।
  5. जब कोई वस्तु किसी निश्चित बिन्दु के इघर-उघर गति करती है, तो उसकी गति आवर्ती या दोलनी गति (Periodic or Oscillatory Motion) कहलाती है। उदाहरण – सरल लोलक की गति।
  6. यदि दोलनी गति में आयाम बहुत कम होते है, तो उसको गति कम्पनिक गति (vibratory Motion) कहलाती है। उदाहरण – वायंलिन या गिटार
  7. जब कोई वस्तु बिना किसी निश्चित पथ दिशा के अनुदिश अनियमित रूप से चलती है तो वह यादृच्छिक गति कहलाती है। उदाहरण – मक्खी की गति, फुटबॉल मैदान में खि
गति सम्बन्धी कुछ मूलभूत पद
  • दूरी (Distance): किसी दिये गये समयान्तराल में वस्तु द्वारा तय किये गये मार्ग की लम्बाई को दूरी कहते हैं। यह एक अदिश राशि है। यह सदैव धनात्मक (+ve) होती है ।
  • विस्थापन (Displacement) : एक निश्‍चित दिशा में दो बिन्दुओं के बीच की लम्बवत्‌ (न्यूनतम) दूरी को विस्थापन कहते हैं। यह सदिश राशि है। इसका S.I. मात्रक मीटर है। विस्थापन धनात्मक, ऋणात्मक और शून्य कुछ भी हो सकता है ।
  • चाल (Speed) : किसी वस्तु द्वारा प्रति सेकेण्ड तय की गई दूरी को चाल कहते हैं । अर्थात्‌ चाल = दूरी/समय यह एक अदिश राशि है। इसका S.I. मात्रक m/sec है।

चाल के प्रकार

  1. जब कोई वस्तु समान समयान्तरालों में समान दूरी तय करती है, तो इसकी चाल एकसमान चाल (Uniform Speed) या स्थिर चाल कहलाती है।
  2. जब कोई वस्तु समान समयान्तरालों में असमान दूरी तय करती है, तो इसकी चाल असान (परिवर्ती) चाल(Non-Uniform Speed)/अस्थिर चाल कहलाती है।
  3. किसी गति मान वस्तु द्वारा तय की गई कुल दूरी तथा दूरी तय करने में लगे कुल समय के अनुपात को वस्तु की औसत चाल (Average Speed) कहते हैं।
  4. किसी विशेष क्षण पर वस्तु की चाल को उस वस्तु की तात्क्षणिक चाल (Instantaneous Speed) कहते हैं।
  • वेग (Velocity) : किसी वस्तु के विस्थापन की दर को या एक निश्‍चित दिशा में प्रति सेकेण्ड वस्तु द्वारा तय की गई दूरी को वेग कहते हैं। यह एक सदिश राशि है। इसका S.I. मात्रक मी०/से० है ।

वेग के प्रकार

  1. यदि कोई वस्तु समान समयान्तरालों में समान विस्थापन तय करती है, तो वस्तु का वेग एकसमान वेग (Uniform Velocity) कहलाता है।
  2. जब कोई वस्तु समान समयान्तरालों में असमान विस्थापन तय करती है, तो वस्तु का वेग असमान वेग (Non-Uniform Velocity) कहलाता है।
  3. किसी वस्तु द्वारा तय किए गए कुल विस्थापन तथा वस्तु द्वारा लिए गए कुल समय के अनुपात को वस्तु को औसत वेग (Average Velocity) कहते हैं।
  4. किसी विशेष क्षण पर वस्तु का वेग, उसका तात्क्षणिक वेग (Instantaneous Velocity) कहलाता है।
  • किसी वस्तु के वेग में परिवर्तन की दर को त्वरण (Acceleration) कहते हैं। यह एक सदिश राशि है। इसका S.I. मात्रक मी०/से० है। यदि समय के साथ वस्तु का वेग घटता है तो त्वरण ऋणात्मक होता है, जिसे मंदन (retardation) कहते हैं।

त्वरण के प्रकार

  1. यदि किसी वस्तु के वेग में समान संमयान्तरालों में समान परिवर्तन होता है, तो वस्तु का त्वरण एकसमान त्वरण (Uniform acceleration) कहलाता है।
  2. यदि किसी वस्तु के वेग में समान समयान्तरालों में भिन्न-भिन्न परिवर्तन होता है, तो वस्तु का त्वरण असमान त्वरण (Non-Uniform acceleration) कहलाता है। उदाहरण – स्प्रिंग बॉक्स में उत्पन्न त्वरण
  3. जब एक वस्तु परिवर्ती त्वरण (Variable acceleration) से गति मान है, तब गति शील वस्तु के वेग में कुल परिवर्तन तथा उसमें लगे कुल समय का अनुपात वस्तु का औसत त्वरण (Average Acceleration) कहलाता है। यह घनात्समक, ऋणात्मक अथवा शून्य हो सकता है।
  4. किसी विशेष क्षण पर वस्तु की गति में त्वरण, तात्क्षणिक त्वरण (Instantaneous acceleration) कहलाता है।

गति के समीकरण

  • v = u + at
  • s = ut + at2
  • 2as = v2 − u2
  • वृत्तीय गति (Circular Motion) : जब कोई वस्तु किसी वृत्ताकार मार्ग पर गति करती है, तो उसकी गति को 'वृत्तीय गति' कहते हैं। यदि वह एकसमान चाल से गति करती है, तो उसकी गति को 'एकसमान वृत्तीय गति' कहते हैं । वृत्तीय गति एक त्वरित गति होती है, क्योंकि वेग की दिशा प्रत्येक बिन्दु पर बदल जाती है।
  • कोणीय वेग (Angular Velocity) : वृत्ताकार मार्ग पर गति शील कण को वृत्त के केन्द्र से मिलाने वाली रेखा एक सेकण्ड में जितने कोण से घूम जाती है, उसे उस कण का कोणीय वेग कहते हैं। इसे प्रायः w (औमेगा) से प्रकट कि या जाता है। अर्था त ७ = 0 यहि कण

3. बल तथा गति के नियम

न्यूटन का गति-नियम (Newton's laws of motion)

भौतिकी के पिता न्यूटन ने सन्‌ 1687 ई० में अपनी पुस्तक 'प्रिसिपिया' में सबसे पहले गति के नियम को प्रतिपादित किया था ।

न्यूटन का प्रथम गति-नियम (Newton's first law of motion):

यदि कोई वस्तु विराम अवस्था में है, तो वह विराम अवस्था में रहेगी या यदि वह एकसमान चाल से सीधी रेखा में चल रही है, तो वैसी ही चलती रहेगी, जब तक कि उस पर कोई बाह्य बल लगाकर उसकी वर्तमान अवस्था में परिवर्तन न किया जाए ।

  • प्रथम नियम को गैलीलियो का नियम या जड़त्व का नियम भी कहते हैं।
  • बाह्य बल के अभाव में किसी वस्तु की अपनी विरामावस्था या समान गति की अवस्था को बनाये रखने की प्रवृत्ति को जड़त्व (Inertia) कहते हैं।
    • जड़त्व के प्रकार : (क) विराम का जड़त्व (ख) गति का जड़त्व (ग) दिशा का जड़त्व
    • जड़त्व के कुछ उदाहरण : (क) ठहरी हुई मोटर या रेलगाड़ी के अचानक चल पड़ने पर उसमें बैठे यात्री पीछे की ओर झुक जाते हैं। (ख) चलती हुई मोटरकार के अचानक रुकने पर उसमें बैठे यात्री आगे की ओर झुक जाते हैं। (ग) कम्बल को हाथ से पकड़कर डण्डे से पीटने पर धूल के कण झड़कर गिर पड़ते हैं।
  • प्रथम नियम से बल की परिभाषा मिलती है।
  • बल की परिभाषा : बल वह बाह्य कारक है जो किसी वस्तु की प्रारंभिक अवस्था में परिवर्तन करता है या परिवर्तन करने की चेष्टा करता है। बल एक सदिश राशि है। इसका S.I. मात्रक न्यूटन तथा CGS मात्रक डाइन है।

बल के प्रकार

  1. जब कि सी वस्तु पर एक साथ कई बल कार्य कर रहे हों और उनका परि णामी बल शून्य हो, तो उन बलों को सन्तुलित बल कहा जाता है। उदाहरण – यदि एक गुटके को दोनों तरफ समान बल लगाकर परस्पर विपरीत दिशा में खींचा जाये, तो गुटके में कोई गति नहीं होती। अतः गुटके पर लगे बल सन्तुलित बल है।
  2. जब कि सी वस्तु पर लगे अनेक बलों का परि णामी बल शून्य न हो, तो उन बलों को असन्तुलित बल कहा जाता है उदाहरण – रस्साकशी में शक्तिशाली टीम, कमजोर टीम को अपनी ओर खींच लेती है, इस दशा में रस्से पर लगने वाला बल असन्तुलित बल है।
  3. ऐसे बल, जिनमें दो वस्तुओं के मध्य सम्पर्क की आवश्यकता होती है, सम्पर्क बल कहलाते हैं। उदाहरण – घर्षण बल, पेशीय बल।
  4. ऐसे बल जिनमें दो वस्तुओं के मध्य सम्पर्क की आवश्यकता नहीं होती, असम्पर्क बल कहलाते हैं। उदाहरण – गुरुत्वाकर्षण बल, चुम्बकीय बल, विद्युत स्थैतिक बल, नामिकीय बल(प्रबल और दुर्बल नाभिकीय बल)।
  • संवेग (Momentum) : किसी वस्तु के द्रव्यमान तथा वेग के गुणनफल को उस वस्तु का संवेग कहते हैं। अर्थात्‌ संवेग = वेग × द्रव्यमान
    • यह एक सदिश राशि है, इसका S.I. मात्रक किग्रा० × मी०/से० है।

न्यूटन का द्वितीय गति-नियम (Newton's second law of motion) :

किसी वस्तु के संवेग में परिवर्तन की दर उस वस्तु पर आरोपित बल के समानुपाती होता है तथा संवेग परिवर्तन बल की दिशा में होता है। अब यदि आरोपित बल F, बल की दिशा में उत्पन्न त्वरण a एवं वस्तु का द्रव्यमान m हो, तो न्यूटन के गति के दूसरे नियम से F = ma अर्थात्‌

  • न्यूटन के दूसरे नियम से बल का व्यंजक प्राप्त होता है ।
  • नोट : प्रथम नियम दूसरे नियम का ही अंग है।

न्यूटन का तृतीय गति-नियम (Newton's third law of motion) :

प्रत्येक क्रिया के बराबर, परन्तु विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है। उदाहरण – (क) बन्दूक से गोली चलाने पर, चलाने वाले को पीछे की ओर धक्का लगना (ख) नाव से कि नारे पर कूदने पर नाव को पीछे की ओर हट जाना (ग) रॉकेट को उड़ाने में ।

  • संवेग संरक्षण का सिद्धान्त : यदि कणों के कि सी समूह या नि काय पर कोई बाह्य बल नहीं छग रहा हो, तो उस नि काय का कुल संवेग नि यत रहता है। अर्था त्‌टक्कर के पहले और बाद का संवेग बराबर होता है।
  • जब कोई बड़ा बल किसी वस्तु पर थोड़े समय के लिए कार्य करता है, तो बल तथा समय-अन्तराल के गुणनफल को उस बल का आवेग (Impulse) कहते हैं|
    • आवेग = बल × समय अन्तराल = संवेग में परिवर्तन
    • आवेग एक संदिश राशि है, जिसका मात्रक न्यूटन सेकण्ड (Ns) है तथा इसकी दिशा वही होती है, जो बल की होती है।
  • अभिकेन्द्रीय बल (Centripetal Force): जब कोरई वस्तु कि सी वृत्ताकार मार्ग पर चरती है, तो उस पर एक बल वृत्त के केन्द्र की और कार्य करता है। इस बल को ही अभि केन्द्रीय बल कहते हैं। इस बल के अभाव में वस्तु वृत्ताकार मार्ग पर नहीं चल सकती है । यदि कोई द्रव्यमान का पि ंड ० चाल से “त्रि ज्या के वृत्तीय मार्ग पर चल रहा है, तो उस पर कार्यकारी वृत्त के केन्द्र की ओर आवश्यक अभि केन्द्रीय बल £ = ~ होता है ।
  • अपकेन्द्रीय बल (Centrifugal Force): अजड़त्वीय फ्रेम (Non-inertial frame) में न्यूटन के नि यमों को लागू करने के लि ए कुछ ऐसे बलों की कल्पना करनी होती है जि न्हें परि वेश में कि सी पि ण्ड से संबंधि त नहीं कि या जा सकता । ये बल छद्म बल या जड़त्वीय बल कहलाते है । अपकेन्द्रीय बल एक ऐसा ही जड़त्वीय बल या छद्म बल है । इसकी दि शा अभि केन्द्री बल के वि परीत दि शा में होती है। कपड़ा सुखाने की मशीन, दूध से मक्खन नि कालने की _ मशीन आदि अपकेन्द्रीय बर के सि द्धान्त पर कार्य करती है । : वृत्तीय पृथ पर गति मान वस्तु पर कार्य करने वाले अभि केन्द्री बल की प्रति क्रि या होती है, जैसे “मौत के कुएँ” में कुएँ की दीवार मीटर-साइकि ल पर अन्दर की ओर क्रि या बल लगाती है, जबकि इसका प्रति क्रि या बल मोटर-साइकि ल द्वारा कुएँ की दीवार पर बाहर की और कार्य करता है। कभी-कभी बाहर की और कार्य करने वाले इस प्रति क्रि या बल को श्रमवश अपकेन्द्रीय बल कह दि या जाता है, जो कि बि ल्कुल गलत है ।
  • बल-आघूर्ण (Moment of Force): बल द्वारा एक पि ण्ड को एक अक्ष के परि तः घुमाने की प्रवृत्ति को बल-आघूर्ण कहते हैं। कि सी अक्ष के परि तः एक बल का बल-आघूर्ण उस बल के परि माण तथा अक्ष से बल की क्रि या-रेखा के बीच की लम्बवत्‌दूरी के गुणनफल के बराबर होता है । [अर्था त्‌बल-आघूर्ण (7) = बल » आघूर्ण भुजा] यह एक सदि श राशि है। इसका मात्रक न्यूटन मी० होता है।

4. गुरुत्वाकर्थण

न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का नियम (Newton's Law of Gravitaion) : किन्हीं दो पिण्डों के बीच कार्य करने वाला आकर्षण-बल पि ण्डों के द्रव्यमानों के गुणनफछ के अनुक्रमानुपाती तथा उनके बीच के दूरी की वर्ग के व्युल्मानुपाती होता है ।

माना दो पिण्ड जिनके द्रव्यमान m1, एवं m2 हैं, एक दूसरे से R दूरी पर स्थित है, तो न्यूटन के नि यम के अनुसार उनके बीच लगने वाला आकर्षण-बल, होता है। जहाँ g एक नियतांक है, जिसे सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नियतांक कहते हैं और जिसका मान 6.67 × 10−11 Nm2kg−2 होता है ।

गुरुत्व (Gravity) : न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के अनुसार दो पिंडों के बीच एक आकर्षण बल कार्य करता है। यदि इनमें से एक पिंड पृथ्वी हो तो इस आकर्षण-बल को गुरुत्व कहते हैं। अर्थात्‌, गुरुत्व वह आकर्षण-बल है, जिससे पृथ्वी किसी वस्तु को अपने केन्द्र की और खींचती है । इस बल के कारण जो त्वरण उत्पन्न होता है, उसे गुरुत्व जनि त त्वरण (g) कहते हैं, जिसका मान 9.8 m/s2 होता है ।

गुरुत्वजनित त्वरण (g) वस्तु के रूप, आकार, द्रव्यमान आदि पर निर्भर नहीं करता है।

g के मान में परिवर्तन

  1. पृथ्वी की सतह से ऊपर या नीचे जाने पर & का मान घटता है ।
  2. का मान महत्तम पृथ्वी के ध्रुव ०/९) पर होता है ।
  3. का मान न्यूतम वि षुवत्‌रेखा (९quat०7)न्पर हीता है ।
  4. पृथ्वी के घूर्णन गति ं बढ़ने पर 2 का मान कम हो जाता है।
  5. पृथ्वी के घूर्णन गति घटने पर ° का मान बढ़ जाता है।

नोट : यदि पृथ्वी अपनी वर्तमान कोणीय चाल से 17 गुनी अधि क चाल से घूमने लगे तो भूमध्य रेखा पर रखी वस्तु का भार शून्य हो जायेगा ।

लिफ्ट में पिण्ड का भार (Weight of a body in lift)

  1. जब लिफ्ट ऊपर की ओर जाती है तो लिफ्ट में स्थित पिण्ड का भार बढ़ा हुआ प्रतीत होता है ।
  2. जब लिफ्ट नीचे की ओर जाती है तो लिफ्ट में स्थित पिण्ड का भार घटा हुआ प्रतीत होता है ।
  3. जब लिफ्ट एक समान वेग से ऊपर या नीचे गति करती है तो लिफ्ट में स्थित पिण्ड के भार में कोई परि वर्तन नहीं प्रतीत होता है।
  4. यदि नीचे उतरते समय लिफ्ट की डोरी टूट जाए तो वह मुक्त पिण्ड की भांति नीचे गिरती है । ऐसी स्थिति में लिफ्ट में स्थित पिण्ड का भार शून्य होता है । यही भारहीनता की स्थिति है ।
  5. यदि लिफ्ट के नीचे उतरते समय लिफ्ट का त्वरण गुरुत्वीय त्वरण से अधिक हो तो लिफ्ट में स्थित पि ण्ड उसकी फर्श से उठकर उसकी छत से जा लगेगा । ग्रहों की गति से संबंधि त केप्लर का नियम 1 प्रत्येक ग्रह सूर्य के चारों ओर दीर्घवृत्ताकार (€11P४८cal) कक्षा में परि क्रमा करता है तथा सूर्य ग्रह की कक्षा के एक फोकस बि न्दु पर स्थित होता है ।
  6. प्रत्येक ग्रह का क्षेत्रीय वेग (areal velocit) नि यत रहता है । इसका प्रभाव यह होता है कि जब ग्रह सूर्य के नि कट होता है, तो उसका वेग बढ़ जाता है और जब वह दूर होता है, तो उसका वेग कम हो जाता है ।

३. सूर्य के चारों ओर ग्रह एक चक्कर जि तने समय में लगाता है, उसे उसका परि क्रमण काल (7) कहते हैं, परि क्रमण काल का वर्ग (72) ग्रह की सूर्य से औसत दूरी (”) के धन (1?) के अनुक्रमानुपाती होता है, अर्था त्‌7? ०% । —— _— अर्था त्‌सूर्य से अधि क दूर के ग्रहों का परि क्रमण काल भी अधि क होता है। उदाहरण–सूर्य के नि कटसम ग्रह बुध का परि क्रमण काल 88 दि न है, जबकि दूरस्थ ग्रह वरुण (Neptune) का परि क्रमण काल 165 वर्ष है । चोट : आईएयू (1.A.0.) ने यम (1५1०) कौ ग्रह की श्रेणी से नि काल दि या है इसीलि ए अब दूरस्थ ग्रह वरुण (Neptune) |

उपग्नह (ऽate1॥ite) : कि सी ग्रह के चारों ओर परि क्रमा करने वाले पि ंड को उस ग्रह का उपग्रह कहते है। जैसे–चन्द्रमा पृथ्वी का एक उपग्रह है। उपग्रह का कक्षीय चाल (Orbital Speed of a Satellite) (i) उपग्रह की कक्षीय चाल उसकी पृथ्वी तरु से ऊँचाई पर नि र्भर करती है। उपग्रह पृथ्वी तल से जि तना अधि क दूर होगा, उतनी ही उसकी चाल कम होगी । (i) उपग्रह की कक्षीय चाल उसके द्रव्यमान पर नि र्भर नहीं करती है । एक ही त्रि ज्या के कक्षा में भि न्न-भि न्न द्रव्यमानों के उपग्रहों की चाल समान होगी । नोट : पृथ्वी तल के अति 8 कि नि कट चक्कर लगाने वाले उपग्रह की कक्षीय चाल लगभग मी०/सेकेण्ड होता है। उपग्रह का परि क्रमण काल (Period of Revolution of a Satellite): उपग्रह अपनी कक्षा में पृथ्वी का एक चक्कर जि तने समय में लगाता है, उसे उसका परि क्रमण काल कहते हैं | | र! अतः परि क्रमण काल = कक्षा की परि धि कक्षीय चाल (1) उपग्रह का परि क्रमण काल भी केवल उसकी पृथ्वी तरु से ऊँचाई पर नि र्भर करता है (i) उपग्रह का परि क्रमण काल उसके द्रव्यमान पर नि र्भर नहीं करता है । नोट : पृथ्वी के अति नि कट चक्कर ठगाने वाले उपग्रह का परि क्रमण काल 1 घंटा 24 मि नट होता है। ne ne और उपग्रह जि तना अधि क दूर होता है उतना ही अधि क उसका परि क्रमण काल होता है। भूस्थायी उपग्रह (Geo-Stationary Satellite): ऐसा उपग्रह जो पृथ्वी के अक्ष के लुम्बवत्‌ तल में पश्चि म से पूरब की ओर पृथ्वी की परि क्रमा करता है तथा जि सका परि क्रमण काल उपग्रह पृथ्वी तरु से लगभग 36,000 कि मी० की ऊँचाई पर रहकर पृथ्वी का परि क्रमण करता है | भू-तुल्यकालि क (Geosynchronous) कक्षा में संचार उपग्रह स्थापि त करने की संभावना सबसे पहले आर्थर सी. कलाक ने व्यक्त की थी। पलायन वेग (Escape Velocity) : पलायन वेग वह न्यूनतम वेग है जि ससे कि सी पि ंड को पृथ्वी की सतह से ऊपर की ओर फेके जाने पर वह गुरुत्वीय क्षेत्र को पार कर जाता है, पृथ्वी पर वापस नहीं आता । पृथ्वी के लि ए पलायन वेग का मान 11.21 /5 है अर्था त्‌ परृथ्वी-तल से कि सी वस्तु को 11.2 km /5 या इससे अधि क वेग से ऊपर कि सी भी दि शा में फेक दि या जाए तो वस्तु फि र पृथ्वी-तल पर वापस नहीं आयेगी । उपग्रह के लि ए कक्षीय वेग ०0 = 8२, तथा पृथ्वी-तल से पलायन वेग०, = /29R,, अत ०,= ४2४, अर्था त्‌पलायन वेग कक्षीय वेग का 2 गुना होता है। इसलि ए यदि कि सी उपग्रह का कक्षीय वेग को ५2 गुना (अर्था त्‌41%) बढ़ा दि या जाय तो वह उपग्रह अपनी कक्षा को छोड़कर पलायन कर जायेगा ।

दाब

किसी सतह के एकांक क्षेत्रफल पर लगने वाले बल को दाब कहते हैं अर्थात्‌ P = दाब, F = पृष्ठ के लम्बवत् बल, A = पृष्ठ का क्षेत्रफल

दाब का S.I. मात्रक होता है, जिसे पास्कर (Pa) भी कहते हैं । दाब एक अदिश राशि है।

वायुमंडलीय दाब (Atmospheric Pressure) : सामान्यतया वायुमंडलीय दाब वह दाब होता है, जो पारे के 76 सेमी० लम्बे कॉलम के द्वारा 0°C पर 45° अक्षांश पर समुद्रतल पर लगाया जाता है। यह एक वर्ग सेमी० अनुप्रस्थ काट वाले पारे के 76 सेमी० लम्बे कॉलम के भार के बराबर होता है । वायुमंडलीय दाब का 5] मात्रक बार (a7) होता है । YY 1 बार = 100 N/m वायुमंडलीय दाब 105 न्यूटन/मीटर“ अर्था त्‌एक बार के बराबर होता है । पृथ्वी की सतह से ऊपर जाने पर वायुमंडलीय दाब कम होता जाता है, जि सके कारण (i) पहाड़ों पर खाना बनाने में कठि नाई होती है, (11) वायुयान में बैठे यात्री के फाउण्टेन पेन से स्याही रि स जाती है। VY Y वायुमंडललीय दाब को बैरोमीटर से मापा जाता है। इसकी सहायता से मौसम संबंधी पूर्वा नुमान भी लगाया जा सकता है । बैरोमीटर का पाठ्यांक जब एकाएक नीचे गि रता है, तो आँधी आने की संभावना होती है। बैरोमीटर का पाठ्यांक जब धीरे-धीरे नीचे गि रता है, तो वर्षा होने की संभावना होती है । बैरोमीटर का पाठ्यांक जब धीरे-धीरे ऊपर चढ़ता है, तो दि न साफ सहने-न्नी संमावना WS होती है । द्रव में दाब (Pressure i Liquid) : द्रव के अणुओं द्वारा बर्तन की दीवार अथवा तली के प्रति एकांक क्षेत्रफल पर लगने वाले बल को द्रव का दाब कहते हैं। द्रव के अन्दर कि सी बि न्दु पर द्रव के कारण दाब द्रव की सतह से उस बि न्दु की गहराई (॥) द्रव के घनत्व (4) तथा गुरुत्वीय त्वरण (४) के गुणनफल के बराबर होता है । अर्था त्‌ PP (दाब) = h * d x द्रवो में दाब के नि यम (i) स्थि र द्रव में एक ही क्षैति ज तल में स्थि त सभी बि न्दुओं पर दाब समान होता है । (i) स्थि र द्रव के भीतर कि सी बि न्दु पर दाब प्रत्येक दि शा में बराबर होता है। (iii) द्रव के भीतर कि सी बि न्दु पर दाब स्वतंत्र तल से बि न्दु की गहराई के अनुक्रमानुपाती होता है । (1४) कि सी बि न्दु पर द्रव का दाब द्रव के घनत्व पर नि र्भर करता है। घनत्व अधि क होने पर दाब भी अधि क होता है। द्रव-दाब सम्बन्धी पास्कल का नि यम

पषाश्‍श्कलके नि यम का प्रथम कथन : यदि गुरुत्वीय प्रभाव को नगण्य माना जाय तो संतुलन bo की अवस्था में द्रव के भीतर प्रत्येक बि न्दु पर दबाव समान होता है। पास्कछल के नि यम का द्वि तीय कथन: कि सी बर्तन में बंद द्रव के कि सी भाग पर आरोपि त बढ, द्रव द्वारा सभी दि शाओं में समान परि माण में संचरि त कर दि या जाता है। पाय्कल के नि यम पर आधारि त कुछ यंत्र हैं : हाइड्रोलि क लिफ्ट, हाइड्रोलि क प्रेस, हाइड्रोलि क ब्रैक आदि । द्रव का दाब उस पात्र के आकार या आकृति पर नि र्भर नहीं करता जि समें द्रव रखा जाता है ।

गरुसाक तथा क्वथनाक पर दाब का प्रभाव (Effect of Pressure on Melting Point and Boiling Point) गलनांक पर प्रभाव : (1) गरम करने पर जि न पदार्थों का आयतन बढ़ता है, दाब बढ़ाने पर उनका गलनांक भी बढ़ जाता है; जैसे–मोम, घी आदि । (1) गरम करने पर जि न पदार्थों का आयतन घट जाता है, दाब बढ़ाने पर उनका गलनांक भी कम हो जाता है; जैसे–बर्फ । क्वथनांक पर प्रभाव : सभी द्रवों का क्वथनांक दाब बढ़ाने पर बढ़ जाता है।

5. कार्य, ऊर्जा एवं शक्ति

कार्य (Work)

कार्य की माप लगाये गये बल तथा बल की दि शा में वस्तु के वि स्थापन के गुणनफल के बराबर होता है। कार्य एक अदिश राशि है, इसका S.I. मात्रक जूल है । कार्य = बल × विस्थापन

ऊर्जा (Energy)

किसी वस्तु की कार्य करने की क्षमता को उस वस्तु की ऊर्जा कहते हैं । ऊर्जा एक अदिश राशि है, इसका S.I. मात्रक जूल है ।

कार्य द्वारा प्राप्त ऊर्जा यांत्रिक ऊर्जा कहलाती है, जो दो प्रकार की होती है–

  1. गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy): कि सी वस्तु में उसकी गति के कारण कार्य करने की जो क्षमता आ जाती है, उसे उस वस्तु की गति ज ऊर्जा कहते हैं। यदि वेग से चल रही हो, तो गति ज ऊर्जा (KE) होगी– KE = + mov - द्रव्यमान की वस्तु ८316
  2. स्थितिज ऊर्जा ।

गति ज ऊर्जा D> Ns 0 RA Fi SHES PRE PN LASS oe iis YR स्थि ति ज ऊर्जा (2०tetial energy): जब कि सी वस्तु में वि शेष अवस्था (५६ate) या स्थि ति के कारण कार्य करने की क्षमता आ जाती है, तो उसे स्थि ति ज ऊर्जा कहते हैं, जैसे–बाँध बनाकर इकट्ठा कि ये गये पानी की ऊर्जा , घड़ी की चाभी में संचि त ऊर्जा , तनी हुई स्प्रि कमानी की ऊर्जा । गुरुत्व बल के वि रुद्ध संचि त स्थि ति ज ऊर्जा का व्यंजक है– ंग या ए.६. = ०१1९४ जहाँ 1 = द्रव्यमान, 9 = गुरुत्वजनि त त्वरण, ॥ = ऊँचाई ऊर्जा संरक्षण का नि यम (Law of Conservation of Energy): ऊर्जा न तो उत्पन्न की जा सकती है और न नष्ट की जा सकती है। ऊर्जा केवल एक रूप से दूसरे रूप में परि वर्ति त की जा सकती है। जब भी ऊर्जा कि सी रूप में लुप्त होती है तब ठीक उतनी ही ऊर्जा अन्य रूपों में प्रकट होती है। अतः वि शव की सम्पूर्ण ऊर्जा का परि माण स्थि र रहता है। यह ऊर्जा -संरक्षण का नि यम कहलाता है । ऊर्जा रूपान्तरि त करने वाले कुछ उपकरण मोमबत्ती रासायनि क ऊर्जा को प्रकाश एवं ऊष्मा ऊर्जा में माइक्रोफोन ध्वनि ऊर्जा को वि द्युत्‌ऊर्जा में लाऊडस्पीकर वि द्युत्‌ऊर्जा को ध्वनि सोलर सेल Db ऊर्जा में सौर ऊर्जा को वि द्युत्‌ऊर्जा में ट्यूब लाइट वि द्युत्‌ऊर्जा को प्रकाश ऊर्जा में वि द्युत्‌मोटर वि द्युत्‌ऊर्जा को यांत्रि क ऊर्जा में वि द्युत्‌बल्ब वि द्युत्‌ऊर्जा को प्रकाश एवं ऊष्मा ऊर्जा में वि द्युत्‌सेरु रासायनि क ऊर्जा को वि द्युत्‌ऊर्जा में सि © ~ © pNP 0p wD m उपकरण ऊर्जा का रूपान्तरण डायनेमो यांत्रि क ऊर्जा को वि द्युत्‌ऊर्जा में तार ˆ यांत्रि क ऊर्जा 'को ध्वनि ऊर्जा में संवेग एवं गति ज ऊर्जा में संबंध जहाँ ? (संवेग) = m२ KE= P- 2m अर्था त्‌संवेग को दुगुना करने पर गति ज ऊर्जा चार गुनी हो जायेगी ।

शक्ति (Power)

कार्य करने की दर को शक्ति

कहते है। यदि कि सी कर्ता द्वारा ५ कार्य £ समय में कि या जाता है, तो कर्ता की शक्ति A होगी । शक्ति का S.I. मात्रक वाट (WwW) है, जि से वैज्ञानि क जेम्स वाट के सम्मान में रखा गया है। शक्ति = का. गु वाट समय सेकण्ड 1KW=1000W 1MW=10°W शक्ति की एक और मात्रक अश्व शक्ति 1 अश्व शक्ति है। (H.P) = 746 W वाट-सेकण्ड (Ws): 1 वाट-सेकण्ड = 1 वाट _ 1 सेकण्ड = 1 जूल 1 वाट घंटा (Wh) = 3600 जूल 1 कि लोवाट घंटा = 1000 वाट घंटा = 3-6 _ 106 जूल W, KW, MW तथा H.P. शक्ति के मात्रक है। Ws, Wh, kWh कार्य अथवा ऊर्जा के मात्रक है। . .

6. ध्वनि

तरंग

1. सरल आवर्त गति

  • आवर्त गति (Periodic Motion) : एक निश्‍चित पथ पर गति करती वस्तु जब एक निश्‍चित समय-अन्तराल के पश्चात्‌ बार-बार अपनी पूर्व गति को दोहराती है, तो इस प्रकार की गति को आवर्त गति कहते हैं ।
  • दोलन गति (Oscillatory Motion): किसी पिंड की साम्य स्थिति के इधर-उधर गति करने को दोलन अथवा काम्पनि क गति कहते हैं ।
  • एक दोढन या एक कम्पन : दोलन करने वाले कण का अपनी साम्य स्थिति के एक ओर जाना फिर साम्य स्थिति में आकर दूसरी ओर जाना और पुनः साम्य स्थिति में वापस लौटना, एक दोलन या कम्पन कहललाता है ।
  • आवर्तकाल (Time Period) : एक दोलन पूरा करने के समय को आवर्तकाल कहते है।
  • आवृति (Frequency) : कम्पन करने वाली वस्तु एक सेकेण्ड में जितना कम्पन करती है, उसे उसकी आवृत्ति कहते हैं। इसका S.I. मात्रक हरटर्ज (Hertz) होता है । यदि आवृति n तथा आवर्तकाल T हो, तो n = होता है ।
  • सरल आवर्त गति (Simple Harmonic Motion) : यदि कोई वस्तु एक सरल रेखा पर मध्यमान स्थिति (Mean Position) के इधर-उधर इस प्रकार की गति करे कि वस्तु का त्वरण मध्यमान स्थि ति से वस्तु के वि स्थापन के अनुक्रमानुपाती हो तथा त्वरण की दिशा मध्यमान स्थि ति की और हो, तो उसकी गति सरल आवर्त गति कहलाती है।

2. ध्वनि तरंग

  • ध्वनि तरंग अनुदैर्घ्य यांत्रि क तरंगें होती हैं।
  • जिन यांत्रिक तरंगों की आवृति 20 Hz से 20000 Hz के बीच होती है, उनकी अनुभूति हमें अपने कानों के द्वारा होती है, और इन्हें हम ध्वनि के नाम से पुकारते हैं।
  • ध्वनि तरंगों का आवृति परिसर
    1. अवश्रव्य तरंगें (nfrasonic Waves): 20 Hz से नीचे की आवृति वाळली ध्वनि तरंगों को "अवश्रव्य तरंगें" कहते हैं । इसे हमारा कान सुन नहीं सकता है।इस प्रकार की तरंगों को बहुत बड़े आकार के स्रोतों से उत्पन्न कि या जा सकता है ।
    2. श्रव्य तरंगें (Audible Waves): 20 Hz से 20,000 Hz के बीच की आवृति वाली तरंगों को "श्रव्य तरंग" कहते हैं। इन तरंगों को हमारा कान सुन सकता है ।
    3. पराश्रव्य तरंगें (Ultrasonic Wave): 20,000 Hz से ऊपर की आवृति वाली तरंगों को पराश्रव्य तरंगें कहा जाता है । मनुष्य के कान इसे नहीं सुन सकता है । परन्तु कुछ जानवर जैसे–कुत्ता, बिल्ली, चमगादड़ आदि, इसे सुन सकते हैं । इन तरंगों को गाल्टन की सीटी के द्वारा तथा दाब विद्युत्‌ प्रभाव की विधि द्वारा क्वाट्‍‍र्ज के क्रिस्टल के कम्पनों से उत्पन्न करते हैं। इन तरंगों की आवृति बहुत ऊँची होने के कारण इसमें बहुत अधिक ऊर्जा होती है । साथ ही इनका तरंगदैर्घ्य छोटी होने के कारण इन्हें एक पतले कि रण-पुंज के रूप में बहुत दूर तक भेजा जा सकता है। उपयोग - (i) संकेत भेजने में (ii) समुद्र की गहराई का पता लगाने में (iii) कीमती कपड़ों, वायुयान तथा घड़ियों के पुर्जों को साफ करने में (iv) कल-कारखानों की चिमनियों से कालिख हटाने में (v) दूध के अन्दर के हानि कारक जीवाणुओं को नष्ट करने में (vi) गठि या रोग के उपचार एवं मस्तिष्क के ट्यूमर का पता लगाने में ।
  • विभिन्न माध्यमों में ध्वनि की चाल भि न्न-भि न्न होती है। कि सी माध्यम में ध्वनि की चाल मुख्यतः माध्यम की प्रत्यास्थता तथा घनत्व पर निर्भर करती है।
  • ध्वनि की चाळ सबसे अधिक ठोस में, उसके बाद द्रव में और उसके बाद गैस में होती है ।

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