[उपनिषदः भगवद्गीता चेति जीवनस्य अभ्युदयाय विकसिताः अमूल्या ग्रन्थाः। उपनिषदः अनेकेषाम् ऋषीणां विचारान् प्रकटयन्ति, भगवद्गीता तु केवलस्य योगेश्वरस्य कृष्णस्य। उभयत्रापि परमात्मनः सर्वशक्तिसंपन्नता दर्शिता। अस्मिन् पाठे तस्यैव परमेश्वरस्य स्तुतिः वर्तते।]
अर्थ — उपनिषद् और भगवद्गीत । जीवन के अभ्युदय के लिए विकसित अमूल्य ग्रन्थ हैं उपनिषद अनेक ऋषियों के विचार प्रकट करते हैं, भगवद्गीता तो केबल योगेश्वर कृष्ण का। यहाँ भी दोनों परमात्मा की सर्वशक्ति संपन्नता को दर्शाते हैं । इसमें परमेश्वर की स्तुति है।
यतो वाचो नि वर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।
आनन्दं ब्रह्मणो वि द्वान्न बि भेति कुतश्चन॥ ( तेत्तरीय 2.9)
अर्थ — जो वाणी मन का साथ न पाकर लौट जाता है वह आनन्द स्वरूप ब्रह्म को जानने वाला किसी से भी नहीं डाता
असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योति र्गमय।
मृत्योर्मा अमृतं गमय॥ (बृहदारण्यक 1.3.28)
अर्थ — झूठ नहीं, सत्य (श्रेष्ठता) प्रदान करो । अंधकार नहीं, प्रकाश प्रदान करो। मृत्यु नहीं, अमरत्व प्रदान करो ।
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः। सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा॥
कर्मा ध्यक्षः सर्वभूताधि वासः। साक्षी चेताः केवलो नि र्गुणश्च ॥ (श्वेताश्व० 6.11)
अर्थ — एकमात्र देव ही सभी जीवों में छिपा हुआ है, वही सर्वव्यापी है, वही सभी जीवों की आत्मा है, वह सभी कर्मों पर नियंत्रण रखने वाला है, सभी वस्तुओं के भीतर वही स्थित है, सबों में वही चेतना स्वरूप है।
त्वमादि देवः पुरुषः पुराणः त्वमस्य वि श्वस्य परं नि धानम्।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥ (गीता 11.38)
अर्थ — तुम ही आदि देव हो, तुम ही पुरातन पुरुष हो, तुम ही इस संसार के सबसे बड़े भण्डार हो, तुम ही सब कुछ जानने वाले हो और जानने योग्य हो, तुम ही आलोकमय स्थान हो, तुम्हारे द्वारा ही यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है।
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्व समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥ (गीता 11.40)
अर्थ — तुम्हें सामने से प्रणाम है । इसके बाद पीछे से भी प्रणाम है, तुम्हें सभी ओर से प्रणाम हो तुम अनन्त शक्ति मान हो, तुम ही अत्यन्त पराक्रमी हो, तुम सबको अपने आप में विलीन करते हो, सब कुछ तुम्हारे द्वारा ही व्याप्त है।
अभ्यासः (मौखिकः)
1. एकपदेन उत्तरं बदत–
- (क) ईश्वरात्काः नि वर्तन्ते ?
- (ख) केन सह ताः नि वर्तन्ते ?
- (ग) ब्रह्मणः कि स्वरूपम्?
- (घ) कः न बि भेति ?
- (ङ) तमसः कुत्र गन्तुमि च्छति ?
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