[ पञ्चतन्त्रं संस्कृतसाहित्यस्य अतीव लोकप्रियो ग्रन्थः। अस्य रूपान्तराणि प्राचीने काले एव नाना वैदेशिकभाषासु कृतानि आसन्। अतएव अस्य संस्कृतभाषायामपि विविधानि संस्करणानि जातानि । पञ्चभिर्भागैर्विभक्तमिदम् अन्वर्थतः पञ्चतन्त्रम्। तत्र मित्रभेदः, मित्रसम्प्राप्ति ः, काकोतूकीयम्, लब्धप्रणाशः, अपरीक्षितकारकं चेति पञ्च भागाः सन्ति। अन्तिमस्य भागस्यैव कथाविशेषः पाठेऽस्मिन् संपाद्य प्रस्तुतो वर्तते। अत्र लोभाधिक्यस्य दुष्परिणामः कथाव्याजेन प्रस्तुतः]
अर्थ — पंचतंत्र संस्कृत साहित्य का बहुत लोकप्रिय ग्रन्थ है । इसका अनुवाद प्राचीन समय में ही विभिन्न विदेशी भाषाओं में किया गया था । इसलिए इसके संस्कृत भाषा में भी कई संस्करण हुए । पाँच भागों में वि भक्त होने से यह पंचतंत्र है । उसमें मि त्रभेद; मि त्रसम्प्राप्ति ; काकोतूकीयम्, लब्धप्रणाशः और अपरि क्षि तकारक भाग हैं । अन्तिम भाग के ही कथावि शेषका संपादित रूप इस पाठ में प्रस्तुत है । इसमें अधि क लाभ का दुष्परि णाम कथा के बहाने (रूप में) प्रस्तुत है ।
कस्मिंश्चित् अधिष्ठाने चत्वारो ब्राह्मणपुत्राः मित्रतां गता वसन्ति स्म। ते दारिद्र्योपहता मन्त्रं चक्रुः – अहो धिगियं दरिद्रता। उक्तञ्च –
वरं वनं व्याघ्रगजादिसेवितं जनेन हीनं बहुकण्टकावृतम्।
तृणानि शय्या परिधानवल्कलं न बन्धुमध्ये धनहीनजीवि तम्॥
अर्थ — किसी नगर में चार ब्राह्मणपुत्र मि त्रा को प्राप्त हो रहते थे। दरि द्रता से पीड़ि त हो उन सबों ने वि चार कि या-अरे इस दरि द्रता को धिक्कार है। और कहा गया है – "व्याघ्र, हाथी आदि से सेवि त वन में रहना, लोगों से रहित काँटों से घिरा होना, घास की शैय्या होना एवं बल्कल (मोटा-वस्त्र) होना अच्छा है लेकि न बन्धुओं के बीच में धनहीन होकर जीवित रहना श्रेयष्कर नहीं है ।"
तद्गच्छामः: कुत्रचि दर्था य इति संमन्त्र्य स्वदेशं परि त्यज्य प्रस्थिताः। क्रमेण गच्छन्तः ते अवन्तीं प्राप्ताः। तत्रक्षि प्राजले कृतस्नाना महाकालं प्रणम्य यावन्नि र्गच्छन्ति , तावद्भेरवानन्दो नाम योगी सम्मुखो बभूव। तेन ते पृष्टा:- कुतो भवन्तः समायाताः? कि प्रयोजनम्?
ततस्तैरभि हि तम्-वयं सि द्धि यात्रि काः। तत्र यास्यामो यत्र धनाप्ति र्मृत्युर्वा भवि ष्यतीति । एष नि श्चयः। उक्तञ्च-
अभि मतसि द्धि रशेषा भवति हि पुरुषस्य पुरुषकारेण ।
दैवमि ति यदपि कथयसि पुरुषगुणः सोऽप्यदृष्टाख्यः ॥
अर्थ — तो कहीं धन के लि ए चलें ऐसी मन्त्रणा करके अपने देश को छोड्कर प्रस्थान कि ये। क्रमानुसार जाते हुए उन्हें उज्जयनी प्राप्त हुई । (वे लोग' उज्जयनी पहुंचे) वहाँ शि प्रानदी के जल में स्नान कर महाकाल को प्रणाम कर जैसे ही नि कलते हैं तभी भैरवानन्द नामक योगी सम्मुख हुए। उनके द्वारा उनसे पूछा गया-आप सब कहाँ से आये हैं? क्या प्रयोजन है ? इसके बाद उन सबों के द्वारा कहा गया (सबों ने उत्तर दि या) – हम सब सि द्धि यात्री हैं। हम वहाँ ठहरेंगे जहाँ धन की या मृत्यु होगी । यह नि श्चय है। कहा गया है - सम्पूर्ण अभिष्टकी सिद्धि पुरुष के उद्योग करने से होती है। भाग्य ऐसा यदि कहते हो तो वह भी अदृष्ट नामक पुरुष गुण ही है।
तत्कथ्यतामस्माक कश्चि द्धनोपायः। वयमप्यति साहसि काः। उक्तञ्च-
महान्त एव महतामर्थं साधयि तुं क्षमाः ।
ऋते समुद्रादन्यः को बि भर्ति वडवानलम्॥
भैरवानन्दोऽपि तेषां सि द्ध्यर्थं बहूपायं सि द्धवर्ति चतुष्टयं कृत्वा आर्पयत्।आह च- गम्यतां हि मालयदि शि , तत्र सम्प्राप्तानां यत्र वर्ति ः पति ष्यति तत्र नि धानमसन्दि ग्धं प्राप्स्यथ। तत्र स्थानं खनि त्वा नि धि ं गृहीत्वा नि वर्त्य ताम्।
अर्थ — तो कहो हमारे लि ए कोई धन का उपाय । हम सब अति साहसी हैं। और कहा है– महान लोग ही महान धन को पूरा करने के लि ए सक्षम हैं । समुद्र के अतिरिक्त बड़वानल को कौन धारण कर सकता है । भैरवानन्द भी उनकी सि द्धि के लिए अनेक उपायों को करके चार मार्गों वाला सि द्धवती दे दि या । और बोला – हि मालय की दि शा में जाओ । वहाँ पहुँचने पर जहाँ यह बत्ती गिरेगी वहाँ निश्चित ही खजाना प्राप्त होगा । उस स्थान को खन कर खजाना लेकर लौट आना ।
तथानुष्ठि ते तेषां गच्छतामेकतमस्य हस्तात्वर्ति ः नि पपात। अथासौ यावन्तं प्रदेशं खनति तावनत्ताग्रमयी भूमि ः। ततस्तेनाभि हि तम्- 'अहो! गृह्यतां स्वेच्छया ताम्रम्।' अन्ये प्रोचुः- भो मूढ! कि मनेन क्रि यते? यत्प्रभूतमपि दारि द्र्यं न नाशयति । तदुत्ति ष्ठ, अग्रतो गच्छामः। सोऽब्रवीत्- 'यान्तु भवन्तः नाहमग्रे यास्यामि।' एवमभि धाय ताम्रं यथेच्छया गृहीत्वा प्रथमो नि वृत्तः।
अर्थ — ऐसा करते हुए उनके जाने के क्रम में एक के हाथ से बत्ती गि र पड़ी । इसके बाद जैसे ही वह उस जगह को खोदता है वैसे ही ताम्रमयी भूमि प्राप्त होती है । इसके बाद उसके द्वारा कहा गया-अरे ! इच्छानुकूल ताम्र को ग्रहण करो । दूसरे ने कहा-अरे मूर्ख ! इसके द्वारा यह क्या कि या जा रहा है ? इससे बहुत अधि क दरि द्रता नष्ट न होगी। तो उठो आगे चलें । वह बोला आप जायें मैं आगे नहीं जाऊँगा । ऐसा कहकर इच्छा के अनुसार ताम्र लेक्र प्रथम लौट आया ।
ते त्रयोऽप्यग्रे प्रस्थिताः। अथ कि ञ्चिन्मात्रं गतस्य अग्रेसरस्य वर्ति ः नि पपात, सोऽपि यावत् खनि तुमारभते तावत्रूप्यमयी क्षि ति ः। ततः प्रहर्षि तः आह- गृह्यतां यथेच्छया रूप्यम्।नाग्रे गन्तव्यम्।कि न्तु अपरौ अकथयताम्-आवामग्रे यास्यावः। एवमुक्त्वा द्वावप्यग्रे प्रस्थि तौ। सोऽपि स्वशक्त्या रूप्यमादाय नि वृत्तः।
अर्थ — उन तीनों ने आगे प्रस्थान किया। इसके बाद थोड़ी दूर पर जाने पर आगे वाले की वत्ती गिर पड़ी, उसने भी जैसे ही खनना प्रारम्भ किया वैसे ही रजन (चांदी) मयी पृथ्वी दिखाई पड़ी। उसके बाद प्रसन्न होता हुआ बोला – इच्छा के अनुसार चाँदी को ग्रहण करो। आगे नहीं जाना चाहिए। किन्तु दूसरों ने कहा – हम दोनों आगे जायेंगे। ऐसा कह कर दोनों ने आगे प्रस्थान किया। वह भी अपनी शक्ति के अनुसार चाँदी लेकर लौटा।
अथ तयोरपि गच्छतोरेकस्याग्रे वर्ति ः पपात। सोऽपि प्रहृष्टो यावत्खनति तावत्सुवर्णभूमिं दृष्ट्वा प्राह- 'भोः गृह्यतां स्वेच्छया सुवर्णम्।सुवर्णा दन्यन्न किञ्चिदुत्तमं भवि ष्यति ।' अन्यस्तु प्राह- मूढ! न किञ्चिद् वेत्सि। । प्राक्ताम्रम्ततो रूप्यम्,ततः सुवर्णम्।तन्नूनम्अतःपरं रत्नानि भवि ष्यन्ति। तदुत्तिष्ठ, अग्रे गच्छावः। किन्तु तृतीयः यथेच्छया स्वर्णं गृहीत्वा नि वृत्तः।
अर्थ — इसके बाद उन दोनों के जाते हुए एक के आगे बत्ती गि र पड़ी । वह भी प्रसन्न होकर जैसे ही खोदता है वैसे ही स्वर्ण भूमि देख कर बोला–अरे इच्छानुसार सोने को ग्रहण करो । सोने से भी उत्तम कुछ होगा । दूसरे ने कहा-मूर्ख ! कुछ नहीं जानते हो। पहले ताँबा, फिर चाँदी, इसके बाद सोना । तो नि श्चि त ही इसके बाद रत्न होगा । तो.उठो आगे चलते हैं । लेकिन तीसरा इच्छानुसार सोना लेकर लौट गया ।
अनन्तरं सोऽपि गच्छन्नेकाको ग्रीष्मसन्तप्ततनुः पि पासाकुलि तः मार्गच्युतः इतश्चेतश्च बभ्राम। अथ भ्राम्यन्स्थलोपरि पुरुषमेक रुधि रप्लावि तगात्रं भ्रमच्चक्रमस्तकमपश्यत्।ततो द्रुततरं गत्वा तमवोचत् – भोः को भवान्? कि मेवं चक्रेण भ्रमता शि रसि ति ष्ठसि ? तत्कथय मे यदि कुत्रचि ज्जलमस्ति
अर्थ — इसके बाद वह भी अकेला जाता हुआ गरमी से जलते हुए शरीर वाला प्यास से व्याकुल मार्ग से गि रा हुआ इधर-उधर भ्रमण कि या । इसके बाद भ्रमण करता हुआ उस स्थान पर खून बहते हुए शरीर वाले मस्तक पर घूमते हुए चक्र वाले एक पुरुष को देखा । वहीं शीघ्रता से जाकर उसको कहा – अरे ! आप कौन हैं ? क्या इस प्रकार चक्र के द्वारा घूमते हुए शिर में रहते हो? तो मुझे कहो यदि कहीं जल है ।
एवं तस्य प्रवदतस्तच्चक्रं तत्क्षणात्तस्य शि रसो ब्राह्मणमस्तके आगतम्।सः आह - किमेतत् ? स आह - ममाप्येवमेतच्छि रसि आगतम्। स आह- तत् कथय, कदैतदुत्तरि ष्यति ? महती मे वेदना वर्तते। स आह- 'यदा त्वमि व कश्चि द्धृतसि द्धवर्ति रेवमागत्य त्वामालापयि ष्यति तदा तस्य मस्तके गमिष्यति ।'
इत्युक्त्वा स गतः। अतः उच्यते-
अति लोभो न कर्तव्यो लोभं नेव परि त्यजेत्।
अति लोभाभि भूतस्य चक्रं भ्रमति मस्तके ॥
अर्थ — ऐसा उनके कहते हुए वह चक्र उसी क्षण उस ब्राह्मण के मस्तक में आ गया । वह बोला – यह क्या है ? वह बोला – मेरे भी यह सि र पर आ गया । वह बोला – तो कहो यह कैसे उतरेगा ? मुझे पीड़ा है । वह बोला – जब तुम्हारे ही तरह कोई सि द्धि बत्ती ही आकर के कहेगा तो उसके मस्तक पर जायेगा । ऐसा कहकर वह चला गया । इसीलि ये कहा गया है-
अत्यधि क लोभ नहीं करना चाहि ए और लोभ को न ही छोड़ना चाहि ए । अति लोभ से अभि भूत होकर ही चक्र मस्तक पर घूमता रहा ।
Join the Discussion