[अयं पाठः व्यासरचि तस्य महाभारतस्य वनपर्वणः ( अध्यायः - 313) संकलि तः। महाभारतं संस्कृतभाषायाः वि शालतमो ग्रन्थः लक्षश्लोकात्मकः। अस्मिन्ग्रन्थे अष्टादश पर्वा णि सन्ति । तेषु वनपर्व अन्यतमम्।तत्र पाण्डवाः वने वि चरन्ति । एकदा ते एक सरोवरं गताः। तस्य स्वामी यक्षः। ये सरोवरात्जलं पातुम्इच्छन्ति , तान्स यक्षः प्रश्नान्करोति । उत्तरम्अदत्त्वा ये जलं पि बन्ति ते मूर्च्छिताः पतन्ति । सैव गति ः भीमस्य अर्जुनस्य नकुलस्य सहदेवस्य च जाता। अन्ततः युधि ष्ठि रः तत्र गतः। स एव यक्षप्रशनानां समुचि तम्उत्तरं ददाति । प्रश्नोत्तरेषु नीति ः सदाचारश्च वर्णि तौ।]
अर्थ — यह पाठ व्यासरचि त महाभारत के वानप्रर्वण (अध्याय 313) से संकलि त है । महाभारत संस्कृत भाषा का वि शालतम ग्रन्थ है जिसमें लाखों श्लोक हैं । इस ग्रन्थ में आठारह पर्व हैं । उनमें वनपर्व अन्यतम हैं । वहाँ पाण्डव वन में घूमते हैं। एक बार वे एक तालाब के पास गये । उसका स्वामी यक्ष था जो इस तालाब से जल पीने की इच्छा करते हैं उनसे यक्ष प्रश्नकरता है । उत्तर नहीं देकर जो जल पीते हैं, वे मूर्च्छि त होकर गि र जाते हैं । सत गति भीम, अर्जुन नकुल और सहदेव की भी हुई । अन्त में युधि ष्ठि र वहाँ गये । वह ही यक्ष के प्रश्नोंका उचि त देते हैं । प्रश्नोत्तरमें नीति और सदाचार वर्णि त है ।
यक्षः – केन स्विदावृतो लोकः केनस्विन्न प्रकाशते । केन त्यजति मि त्राणि केन स्वर्ग न गच्छति ॥1॥।
अर्थ — यह संसार कि ससे ढका है ? कि ससे यह प्रकाशि त नहीं होता ? कि सके द्वारा मि त्रों का त्याग कर दि या जाता है ? कि सके द्वारा स्वर्ग नहीं जाया जाता ?
युधि ष्ठि रः- अज्ञानेनावृतो लोकस्तमसा न प्रकाशते । लोभात्त्यजति मि त्राणि सङ्कात्स्वर्ग न गच्छति ॥2॥
अर्थ — संसार अज्ञान के द्वारा ढका है, अन्धकार के कारण प्रकाश नहीं होता। लोभ से मित्र साथ छोड़ देते हैं, आसक्ति (लगाव) के कारण जीव स्वर्ग नहीं जाता।
यक्षः- 'कि ज्ञानं प्रोच्यते राजन्कः शमश्च प्रकीर्ति तः । दया च का परा प्रोक्ता कि चार्जवमुदाहतम्।3॥
अर्थ — ज्ञान कि से बताया गया है ? चि त्त की शांति कि से कहा गया है ? श्रेष्ठ दया कि से कही जाती है ? सरलता क्या है ? उदाहरण दें ।
युधि ष्ठि रः- ज्ञानं तत्त्वार्थसम्बोधः शमश्चि त्तप्रशान्तता । दया सर्वसुखैषि त्वमार्जवं समचि त्तता ॥4॥
अर्थ — तत्व अर्थ (ब्रह्मज्ञान) का ज्ञान ही वास्तवि क ज्ञान है । हृदय की शाति ही वास्तवि क शांति है । सबके सुख को कामना करना ही दया है, चि त्त की स्थि रता ही सरलता है
यक्षः- कः शत्रुर्दुर्जयः पुंसां कश्च व्याधि रनन्तकः । को वा स्यात्पुरुषः साधुरसाधुः पुरुषश्च कः ॥5॥
अर्थ — मनुष्य का दुर्जेय शत्रु कौन है ? न अन्त होने वाला रोग कौन है ? कौन पुरुष साधु (सज्जन) है ? तथा कौन-कौन पुरुष असाधु ( असज्जन) +
युधि ष्ठि रः- क्रोधः सुदुर्जयः शत्रुर्लो भो व्याधि रनन्तकः । सर्वभूतहि तः साधुरसाधुर्नि र्दयः स्मृतः ॥6॥।
अर्थ — क्रोध ही दुर्जेय शत्रु है, अन्तहीन रोग लोभ, है। सभी प्राणि यों का हि त चाहने वाला पुरुष साधु है । नि र्दय व्यक्ति असाधु है
यक्षः- कि स्थैर्यमृषि भि ः प्रोक्तं कि ं च धैर्यमुदाहृतम्। स्नानं च कि परं प्रोक्तं दानं च कि मि होच्यते ॥ +॥।
अर्थ — भ्ऋषि यों ने स्थि रता कि से कहा है ? धैर्य का लक्षण वया है ? स्नान कि से कहा गया है ? तथा, दान कि से कहा गया है ?
युधि ष्ठि रः- स्वधर्मे स्थिरता स्थैर्यं धैर्यमि न्द्रि यनि ग्रहः । स्नानं मनोमलत्यागो दानं वै भूतरक्षणम्॥8॥
अर्थ — अपने धर्म पर स्थि र रहना स्थि रता है । इन्द्रि यों को नि यन्त्रण में रखना धैर्य है । मन की मलीनता का त्याग करना स्नान है। सभी प्राणि यों की रक्षा करना दान है ।
यक्षः- कः पण्डितः पुमाञ्ज्ञेयो नास्ति कः कश्च उच्यते । को मूर्खः कश्च कामः स्यात्को मत्सर इति स्मृतः ॥9१॥
अर्थ — कि स पुरुष को पण्डि त जानना चाहि ए ? नास्ति क कि से कहा गया है, मूर्ख कौन है ? काम क्या है ? तथा मत्सर क्या है ?
युधि ष्ठि रः- धर्मज्ञः पण्डितो ज्ञेयो नास्तिको मूर्ख उच्यते । कामः संसारहेतुश्च हृत्तापो मत्सरः स्मृतः ॥10॥
अर्थ — धर्मज्ञ को पण्डित जानना चाहि ये । नास्तिक को मूर्ख कहा गया है, काम संसार का कारण है तथा हृदय का ताप मत्सर है ।
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