[ अधुना वैज्ञानि के युगे यदा प्रकृति ः असन्तुलि ता जाता तदा पर्या वरणस्य चर्चा भवति । कथं प्रदूषणं दूरीकरणीयम्, प्रकृति ः सन्तुलि ता भवेत्,पशुपक्षि णः स्वस्वरूपेषु स्थिता भवन्तु, मानवश्च शुद्धं जलं वायुं च लभेत, जीवनं च कल्याणमयं स्यादि ति प्रश्नः भूयोभूयः सर्वा न्आन्दोलयति । संस्कृतसाहि त्ये नेयमवस्था आसीदि ति पाठेऽस्मि न्संक्षेपेण आदर्शरूपस्य पर्या वरणस्य नि रूपणं वर्तते।]
अर्थ – आज वैज्ञानि क युग में जब प्रकृति असंतुलि त हुई तब पर्या वरण की चर्चा होती है । कैसे प्रदूषण को दूर करना चाहि ए, प्रकृति को संतुलि त होना चाहि ए, पशु-पक्षी अपने-अपने रूपों में स्थि त हों और मनुष्य को शुद्ध जल और वायु मि लें, और जीवन कल्याणमय हो, ये प्रश्नसबको बार-बार आन्दोलि त करते हैं । संस्कृत साहि त्यों में यह अवस्था नहीं थी, इस पाठ में संक्षप में पर्या वरण को आदर्शरूप का नि रूपण है ।
भूमि र्जलं नभो वायुरन्तरि क्षं पशुस्तृणम्। साम्यं स्वस्थत्वमेतेषां पर्या वरणसंज्ञकम्॥
अर्थ – भूमि , जल, नभ, वायु अन्तरि क्ष, पशु एवं घास की–इन सबों की स्वस्थ समता ही पर्या वरण कहा जाता है।
संस्कृतसाहि त्यस्य महती परम्परा संसारस्य सर्वा न्वि षयानूरीकृत्य प्रचलि ता। प्रकृति संरक्षणं पर्या वरणस्य संतुलनं वा तत्र स्वभावतः उपस्थापि तमस्ति । वैदि ककाले प्रकृतेरुपकरणानि देवरूपाणि प्रकल्पि तान्यभवन्। पर्जन्यो वेदे इत्थं स्तूयते-
इरा वि श्वस्मै भुवनाय जायते यत्पर्जन्यः पृथि वीं रेतसावति
अर्थ – संस्कृत साहि त्य की महान परम्परा संसार के सभी वि षयों को स्वीकार करके प्रचलि त है । प्रकृति संरक्षण पर्या वरण का संतुलन यहाँ स्वभावतः उपस्थापि त है । वैदि क काल में प्रकृति के उपकरण देवरूप में प्रकल्पित हुए । पर्जन्य (मेघ) के लि ए ही उत्पन्न होती है क्योंकि मेघ जल द्वारा पृथ्वी की रक्षा करते हैं ।
मेघः पृथि वीं जलेन रक्षति तदा सर्वेभ्यः अन्नं भवति । एवमेव ये वनस्पतयः फलयुक्ता अफला वा, पुष्पवन्तः अपुष्पा वा सर्वेऽपि ते मानवान्रक्षन्तु, पापानि अर्था त्मलानि दूरीक्र्वन्तु-
अर्थ – मेघ जल द्वारा पृथ्वी की रक्षा करता है तभी सभी के द्वारा अन्न को उत्पन्न कि या जाता है। इसी प्रकार से वनस्पति याँ फलयुक्त हों या अफला हों, पुष्पयुक्त हों या अपुष्प हों सभी मनुष्यों की रक्षा करें, पाप अर्था त्गंदगी को दूर करें ।
याः फलि नी या अफलाः अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः । बृहस्पति -प्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः ॥
अर्थ – जो फल से परि पूर्ण हैं या जो बि ना फल के हैं, जो बि ना पुष्प के हैं या जो पुष्प से युक्तहैं, बृहस्पति द्वारा प्रसूत ये सब हमें पाप से मुक्तकरें ।
अत्र ओषधयो देव्यः स्तूयन्ते।
संस्कृतकाव्येषु प्रकृति वर्णनम्आवश्यक वि द्यते। कथ्यते यत्ऋतुः, सागरः, नदी, सूर्या दयः, सन्ध्या, चन्द्रोदयः, सरोवरः, उद्यानम्,वनम्-इत्यादीनि उपादानानि अवश्यं वर्णनीयानि भवन्ति महाकाव्ये। वाल्मीकि ः सरोवरश्रेष्ठां पम्पां वर्णयति -
अर्थ – यहाँ औषधि याँ देवि यों द्वारा स्तुति कि ये जाते हैं । संस्कृत काव्यों में प्रकृति वर्णन आवश्यक है । कहा जाता है 'कि महाकाव्य में ऋतु, सागर, नदी, सूर्यो दय, संध्या, चन्द्रोदय, सरोवर, उद्यान एवं वन आदि उपादानों का वर्णन अवश्य होता है । वाल्मीकि सरोवरों में श्रेष्ठ पम्पा का वर्णन करते हैं ।
नाना-द्रुमलताकीर्णा शीतवारि नि धि ं शुभाम्। पदमसौगन्धि कैस्ताम्रां शुक्लां कुमुदमण्डलैः ॥
अर्थ – अनेक प्रकार के वृक्ष लताओं से धि री हुई ठंडे एवं शुभ जल का कोष कमलों के सुगन्धों से ताँबा के समान सफेद कुमुदनि यों के फूलों से भरा हुआ है ।
संस्कृतकाव्येषु स्वस्थपर्या वरणस्य कल्पनया स्वाभावि करूपेण प्रवहन्तीनां नदीनां वर्णनं बाहुल्येन लभ्यते, जलप्लावनस्य वर्णनं तु वि रलमेव। सूर्यतापि तः ज्येष्ठमासस्य मध्याह्नः बाणभट्टेन वर्णि तः। स च स्वाभावि कः। वस्तुतः स्वाभावि करूपेण प्रवर्तमानानाम्ऋतूनां वर्णनेन पर्या वरणं प्रति कवीनामास्था दृश्यते। ग्रीष्मातपेन सन्तप्तस्य रक्षां वृक्षाः कुर्वन्ति प्रकृति वरदानम्।अतएव मार्गेषु वृक्षारोपणं पुण्यमि ति प्रति पादि तम्।फलवन्तो वृक्षास्तु परोपकारि णः इति कथयति नीति कारः-
अर्थ – सस्कृत काव्यों में स्वस्थ पर्या वरण की कल्पना को स्वाभावि क रूप से बढ़ती हुई नदि यों का वर्णन बहुत प्राप्त होता है । जल प्लावन का वर्णन तो वि रल ही है । सूर्य से तपते हुए ज्येष्ठ मास के दोपहरी का वर्णन बाणभट्ट के द्वार कि या जाता है और यह स्वाभावि क ही है । वास्तव में स्वाभावि क रूप से प्रवर्ति त ऋतुओं के वर्णन से पर्या वरण के प्रति कवि यों | कौ आस्था दि खाई पड़ती है । गरमी से तपते एवं जलते की रक्षा वृक्ष करते हैं, यह प्रकृति का वरदान ही है । इसलि ए रास्ते पर वृक्षारोपण पुण्य के रूप में प्रति पादि त कि या गया है । फलने वाले वृक्ष तो परोपकारी हैं ऐसा नीति कार कहते हैं ।
स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः स्वयं न वारीणि पि बन्ति नद्यः ।
अर्थ – स्वयं वृक्ष फलों को नहीं खाते हैं, नदि याँ स्वयं जल नहीं पीती हैं ।
नरा कन्याश्च वृक्षान्प्रति ममताशीला इति शाकुन्तले नाटके वर्ण्य ते। शकुन्तला वृक्षान्जलेन तर्पयि त्वैव स्वयं जलं पि बति -
पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या ।
अर्थ – मनुष्य और कन्याएँ वृक्षों के प्रति ममताशील होते हैं ऐसा शकुन्तला नाटक में वर्णि त है । शकुन्तला वृक्षों को जल से तर्पण करके ही स्वयं जल को पीती हैं ।
तुम सबों को जल पि लाये हुए जो स्वयं प्रथम जल नहीं पीती । और क्या भट्ट शरत्काल में जलाशयों में कमलों के ऊपर बैठे हुए भ्रमरों का वर्णन करते हैं ।
वह जल जल नहीं है जहाँ सुन्दर कमल नहीं है। वह कमल कमल नहीं जो भ्रमरों से युक्तनहीं है ।
च भटि टः शरत्काले जलाशयेषु कमलानां तद्वर्ति नां भ्रमराणां च वर्णनं करोति -
न तज्जलं यन्न सुचारुपडऱकजं न पडऱकजं तद यदलीनषट्पदम्।
वसन्ते तु सर्वां प्रकृति ः शोभनतरा भवति इति कालि दासः कथयति -
द्रुमाः सुपुष्याः सलि लं सपदां सर्वं प्रि ये चारुतरं वसन्ते ।
कालि दास: पशूनां स्वाभावि कस्थिते: नि रूपणमेव करोति -
गाहन्तां महि षा नि पानसलि लं शृङगैर्मुहुस्ताडि तं छाया-बद्धकदम्बकं मृगकुलं रोमन्थमभ्यस्यतु ।
एवं प्राचीनभारते साहि त्यकाराः सर्वस्यापि पर्या वरणस्य स्वस्थतां प्रति जागरूका अभवन्।कुत्रापि प्रकृतेः असन्तुलनं न भवेत्इति प्रयासशीलाः आसन्।
अर्थ – वसन्त में तो सम्पूर्ण प्रकृति शोभायुक्त होती है ऐसा कालि दास कहते हैं - वसन्त में वृक्ष सुन्दरं पुष्पों से युक्तएवं जल कमल से युक्तहोकर सभी को प्रि य होते हैं । कालि दास पशुओं के स्वाभावि क स्थि ति का नि रूपण ही करते हैं- भैंसा तालाब के पानी में सर (चोटी) के द्वारा बार-बार डुबकी लगा रहे हैं, कदम्ब के पेड़ छाया युक्त हैं, पशुगण भयमुक्त होकर पागुर कर रहे हैं ।
इस प्रकार प्रचीन भारत में साहि त्यकारः सभी पर्या वरण के प्रति जागरूक हुए हैं तथा कहीं भी प्रकृति का असंतुलन न हो इसके लि ए प्रयत्नशील थे ।
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