[पञ्चतन्त्रनामकस्य संस्कृतनीति कथाग्रन्थस्य अन्ति मे तन्त्रे वि द्यमानायाः कथायाः सम्पादि तः अंशोऽयं पाठः। अस्यां कथायां व्यवहारं वि ना शुष्कस्य ज्ञानस्य नि रर्थकता दर्शि ता। उक्त च- 'शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खा ः, यस्तु क्रि यावान्पुरुषः स वि द्वान्।' अत्रोपदेशो लभ्यते यत्व्यवहारो बुद्धि ः क्रि या वा ज्ञानस्य परि णामः भवति । व्यवहारं वि ना तु पाण्डित्यं व्यर्थं भारभूतं च।]
अर्थ – यह पाठ पंचतंत्र के संस्कृत नीति कथा ग्रन्थ के अन्ति म तंत्र में वि द्यमान कथा का संपादि त अंश है । इस कहानी में व्यवहार के बि ना शुष्क ज्ञान (छुछ ज्ञान) की नि रर्थकता दर्शि त है । और कहा गया- "शास्त्र .के अथ्ययन करने वाले भी . मूर्ख होते हैं परन्तु जो क्रि यावान पुरुष है, वह वि द्यान है । यहाँ उपदेश से प्राप्त होता है कि व्यावहारि क बुद्धि या क्रि या ज्ञान का परि णाम होता है । व्यवहार के बि ना तो पाण्डि त्य (ज्ञान) व्यर्थ और भार स्वरूप होता है ।
वरं बुद्धि र्न सा वि द्या वि द्याया बुद्धि
बुद्धि हीना वि नश्यन्ति यथा ते सि ंहकारकाः ॥
अर्थ – बुद्धि श्रेष्ठ है वह वि द्या नहीं । वि द्या से बुद्धि उत्तम है । बुद्धि हीन नष्ट हो जाते हैं जैसे वे सि ंह बनानेवाले नष्ट हो गये ।
एकस्मिन्नगरे चत्वारः युवानः परस्परं मि त्रभावेन नि वसन्ति स्म। तेषां त्रयः शास्त्रपारंगताः, परन्तु बुद्धि रहि ताः। एकस्तु बुद्धि मान्केवलं शास्त्रपराङमुखः। अथ ते: कदाचि न्मि त्रैर्गन्त्रतम्-'को गुणो वि द्यायाः येन देशान्तरं गत्वा भूपतीन्परि तोष्य अर्थो पार्जना न क्रि यते? तत्पूर्वदेशं गच्छामः:।' तथानुष्ठि ते कि ञ्चिन्मार्गं गत्वा तेषां ज्येष्ठतरः प्राह- अहो! अस्माकमेकश्चतुर्थो मूढः केवलं बुद्धि मान्।न च राजप्रति ग्रहो बुद्धया लभ्यते वि द्यां वि ना। तन्नास्मै स्वोपार्जि तं दास्यामः। तद्गच्छतु गृहम्।'ततो द्वि तीयेनाभि हि तम्-` भोः सुबुद्धे! गच्छ त्वं स्वगृहम्,यतस्ते वि द्या नास्ति ।
अर्थ – एक नगर में चार युवक परस्पर मि त्रता. के भाव से रहते थे । उन सबों में तीन शास्त्र-पारंगत परन्तु बुद्धि हीन थे । एक बुद्धि मान लेकि न शास्त्र वि मुख था । इसके बाद कभी उन सभी के द्वारा वि चार कि या गया-वि द्या का क्या गुण है जि सके द्वारा अन्य.देश जाकर राजा को संतुष्ट/'कर धन कमाया जाय ? तो पूर्व देश चलते हैं । ऐसा करते हुए कुछ दूर जाकर उनसबों में बड़े युवक ने कहा– हमारा एक चौथा ही मूर्ख है शेष सभी बुद्धि मान हैं । और राजा से धन आदि की प्राप्ति वि द्या के बि ना बुद्धि से नहीं हो सकती । तो उसे स्वयं के द्वारा उपार्जि त नहीं दूँगा । तो घर चलो । इसके बाद दूसरे के द्वारा कहा गया– अरे सुबुद्धे ! तुम अपने घर जाओ, क्योंकि तुम्हें वि द्या नहीं है ।'
ततस्तृतीयेनाभि हि तम्-` अहो, न युज्यते एवं कर्तुम्।यतो वयं बाल्यात्प्रभृत्येकत्र क्रीडि ताः। तदागच्छतु महानुभावोऽस्मदुपर्जि तवि त्तस्य समभागी भवि ष्यतीति । उक्तञ्च-
अर्थ – इसके-बाद तृतीय के द्वारा कहा गया– अरे, ऐसा करना उचि त नहीं है । क्योंकि हम लोग बचपन से ही-एक जगह खेले हैं । तो महानुभाव आप जायें, हमारे उपार्जि त घन में आप समभागी होंगे । कहा भी गया है
अयं नि जः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरि तानान्तु वसुधैव कुदुम्बकम्॥
अर्थ – यह अपना है, यह पणाया है ऐसी गणना नीच बुद्धि वाले करते हैं । उदार चरि त्रवालों के लि ये तो सम्पूर्ण पृथ्वी ही कुटुम्ब होता है ।
तदागच्छतु एषोऽपि इति । तथानुष्ठि ते तैः मार्गा श्रि तैरटव्यां कति चि दस्थीनि दुृष्टानि । ततश्चैकेनाभि हि त्तम्-अहो! अद्य वि द्यापरीक्षा क्रि यते। कति चि देतानि मृतसत्त्वस्यास्थीनि ति ष्ठन्ति । तद्दि द्याप्रभावेण जीवनसहि तानि कुर्मः अहमस्थिसञ्चयं करोमि । ततश्च तेनौत्सुक्यात्अस्थि सञ्चयः कृतः। द्वि तीयेन चर्ममांसरुधि रं संयोजि तम्।तृतीयोऽपि यावज्जीवनं सञ्चारयति तावत्सुबुद्धि ना वारि तः- भोः ति ष्ठतु भवान्,एष सि ंहो नि ष्पाद्यते। यद्येनं सजीवं करि ष्यसि ततः सर्वा नपि व्यापादयि ष्यति , इति तेनाभि हि तः स आह- “धि ङ मूर्ख! नाहं वि द्याया वि फलतां करोमि ।' ततस्तेनाभि हि तम्-` तर्हि प्रतीक्षस्व क्षणं यावदहं वृक्षमारोहामि ।' तथानुष्ठि ते यावत्सजीवः कृतस्तावत्ते त्रयोऽपि सि ंहेनोत्थाय व्यापादि ताः। स च पुनर्वृक्षादवतीर्य गृहं गतः। अतः उच्यते-
अर्थ – तब यह भी जाये । ऐसा करते हुए उन सबों के द्वारा मार्ग पर चलते हुए जंगल में कुछ हड्डी देखी गयी । उसके बाद एक के द्वारा कहा गया- अरे ! आज वि द्या की परीक्षा को जाय । ये सब कुछ मरे हुए जीव की हड्डि याँ हैं । तो वि द्या के प्रभाव से जीवन सहि त करते हैं । मैं हड्डि यों का संचय करता हूँ । इसके बाद उत्सुकता से उसके द्वारा हड्डि यों का संचय कि या गया । दूसरे के द्वारा चर्म, मांस और रकत इकट्ठा कि या गया । तीसरी जैसे ही जीवन संचारि त करता है वैसे ही सुबुद्धि के द्वारा रोका गया । अरे आप रुकें, यह सि ंह बन जाता है । इसको संजीव करोगे तब सबों को मार डालेगा । ऐसा उसके द्वारा कहे जाते हुए वह बोला-' धि क्कार मूर्ख । मैं वि द्या की वि फलता नहीं करता हूँ ।' इसके बाद उसके द्वारा कहा गया तो क्षण भर प्रतीक्षा करो जब तक मैं पेड़ पर चढ़ता हूँ । जैसे ही वैसा करते हुए सजीव कि या गया वैसे ही वे सब तीनों ही सि ंह के द्वारा उठकर मार डाला गया और वह फि र वृक्ष से उतर कर घर को गया । इसीलि ये कहा गया है–
अवशेन्द्रियचि त्तानां हस्तिस्नानमि व क्रिया । दुर्भगाभरणप्रायो ज्ञानं भारः क्रि यां वि ना ॥
अर्थ – जिसके इन्द्रि य और मन अपने वश में नहीं हैं तथा जि सकी क्रि या हाथी के स्नान के समान है उसका ज्ञान क्रि या के बि ना उसी प्रकार भारी है जैसे असुन्दर को अलंकारों से लादना ।
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