[संस्कृतभाषायां नीतिविषयकं विपुलं साहित्यं वर्तते। सदाचारस्य शिक्षया नीति ः मानवान् उन्नतान् करोति। नीति ः क्वचि त्कथारूपेण प्रकाश्यते, क्वचि त्पद्यरूपेण। पञ्चतन्त्रं कथात्मको नीति ग्रन्थः अस्ति। नीतिशतकं, चाणक्यनीतिदर्पणः, विदुरनीति ः एवमादयः ग्रन्थाः पद्यात्मकाः। सर्वेऽपि ते मानवस्य प्रगतिमुपदिशन्ति। तैः मानवः विचारपूर्वकं स्वकीयं मार्गं निश्चित्य सत्कार्यं कृत्वा उन्नतो भवति, समाजस्य हिताय उपयोगी च जायते। प्रस्तुते पाठे भर्नृहरिकृतस्य नीतिशतकस्य सरलानि पद्यानि संकलितानि सन्ति]
अर्थ – संस्कृत भाषा में नीति के वि षय में बहुत बड़ा साहि त्य है । सदाचार की शि क्षा द्वारा नीति मनुष्यों को उन्नत करती है । कोइ नीति कहानी के रूप द्वारा प्रकाशि त होती है, कोई पद्य रूप द्वारा । पंचतंत्र कथात्मक नीति ग्रन्थ है । नीति शतक चाणक्य नीति दर्पण, वि दुरनीति आदि ग्रन्थ पद्य के रूप में हैं । वे सभी मनुष्य की प्रगति का उपदेश देते हैं । उसके द्वारा मनुष्य वि चारपूर्वक अपना मार्ग नि श्चि तकर अच्छे कार्य को करके उन्नत होता है, और समाज की भलाई के लिए उपयोगी होता है । प्रस्तुत पाठ में भर्तृहरि की रचना नीति शतक से सरल पद्य संकलि त है ।
अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः।
ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि नरं न रञ्जयति॥1॥
अर्थ – ज्ञानहीन सुखपूर्वक समझाया जा सकता है, जो विशेष ज्ञानवान है उसे और भी सुखपूर्वक समझाया जा सकता है लेकिन अल्प ज्ञान से जो अहंकार पूर्ण है उस मनुष्य को ब्रह्मा भी नहीं प्रसन्न कर सकते हैं ।
येषां न विद्या न तपो न दानं न चापि शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मर्त्यलोके भुवि चारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति॥2॥
अर्थ – जि सके पास न वि द्या है, न तप है, न दान है, न शील (चरि त्र) है, न गुण है और न ही धर्म है वे'लोग इस पृथ्वी पर बोझ स्वरूप हैं तथा मनुष्य रूप में होते हुए भी पशुओं की तरह आचरण करते हैं ।
जाड्यं धियो हरति सिञ्चति वाचि सत्यं मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति।
चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्ति सत्संगति ः कथय किं न करोति पुंसाम्॥3॥
अर्थ – जो बुद्धि के अज्ञानता को हरती है, वाणी से सत्य को सींचती है, मान और उन्नति को बढ़ाती है, पाप को दूर करती है, हृदय को प्रसन्न करती है, दि शाओं में कीर्ति को फैलाती है ऐसी सत्संगति कहो पुरुषों के लि ए क्या नहीं करती है ।
प्रारभ्यते न खलु वि घ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य वि घ्नवि हता वि रमन्ति मध्याः।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमाना प्रारब्धमुत्तमजना न परित्यजन्ति॥4॥
अर्थ – निम्न श्रेणी के लोग आने वाले वि घ्न के भय से कार्य को रम्भ ही नहीं करते, मध्यम श्रेणी के लोग कार्य का प्रारम्भ कर वि घ्न आ जाने पर छोड़ देते हैं, लेकि न उत्तम श्रेणी के लोग कार्य को प्रारम्भ कर वि घ्नों के द्वारा बार-बार आहत, पीडि त होते हुए भी परि त्याग नहीं करते हैं ।
निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्।
अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः॥5॥
अर्थ – नीति-निपुण लोग निन्दा करे या स्तुति करे, लक्ष्मी आये अथवा अपनी इच्छा से चली जाये, आज ही मरना हो या युग के बाद लेकिन धैर्यवान लोग न्याय के मार्ग से पैर विचलित नहीं करते हैं ।
सिंहः शिशुरपि निपतति मदमलिनकपोलभित्तिषु गजेषु।
प्रकृतिरियं सत्त्ववतां न खलु वयस्तेजसो हेतुः॥6॥
अर्थ – सिंह का शिशु भी मद से मलिन हुए गाल वाले हाथियों पर आक्रमण करता है, बलवानों की यह प्रकृति अवस्था के कारण नहीं बल्कि तेज के कारण होता है ।
आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमुपैति पश्चात्।
दिनस्य पूर्वार्धपरार्धभिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्॥7॥
अर्थ – जिस प्रकार दिन के पूर्वार्द्ध के प्रारम्भ में सूर्य की छाया हल्की लेकिन बाद में क्रमशः बढ्ने वाली होती है और अपरार्द्ध की छाया बड़ी होती है लेकिन क्रमशः क्षीण होने वाली होती है, उसी प्रकार सज्जन की मित्रता पहले हल्की और क्रमशः प्रगाढ़ होती है तथा दुष्ट की मित्रता प्रारम्भ में गंभीर लेकि न क्रमशः क्षीण होने वाली होती है ।
विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्॥8॥
अर्थ – विपत्ति में धैर्य, उन्नति काल में क्षमा, सभा में वाक्पटुता, युद्ध में पराक्रम, यश प्राप्ति में अभिरुचि और शास्त्र में आसक्ति महात्माओं के ये प्रकृति सिद्ध लक्षण हैं ।
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