
(ख) रासायनिक वर्गीकरण
(i) शुद्ध पदार्थ
वे द्रव्य, जिनका रासायनिक संघटन निश्चित होता है, शुद्ध पदार्थ अथवा शुद्ध द्रव्य कहलाते है।
तत्व (Element) वह शुद्ध पदार्थ है, जिसे किसी भी ज्ञात भौतिक एवं रासायनिक विधियों से न तो दो या दो से अधिक पदार्थों में विभाजित किया जा सकता है, और न ही अन्य सरल पदार्थों के योग से बनाया जा सकता है। जैसे – सोना (Ag), चाँदी, ऑक्सीजन (O) आदि।
तत्वों का वर्गीकरण :
- (क) ऐसे तत्त्वों को धातु (Metal) कहते हैं, जिनमें (i) चमक होती है, (ii) जो आघातर्ध्य तथा तन्य होते हैं, (iii) जिनकी तनन-क्षमता अधिक होती है, (iv) जो ऊष्मा और विद्युत के सुचालक होते हैं तथा (v) ये ठोस अवस्था में पाये जाते हैं। अपवाद – पारा। जैसे – सोडियम, पोटैशियम, लोहा, ताँबा इत्यादि।
- (ख) ऐसे तत्त्वों को अधातु (non-Metal) कहते हैं, (i) चमक नहीं होती, (ii) ये न तो आघातर्ध्य होते हैं और न ही तन्य, (iii) ये भंगुर होते हैं, (iv) ये ऊष्मा और विधुत् के कुचालक होते हैं, तथा (v) ये ठोस, द्रव और गैसीय तीनों अवस्थाओं में पाये जाते हैं। जैसे – हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, कार्बन, गंधक, इत्यादि ।
- (ग) ऐसे तत्त्व, जिनमें धातु और अधातु दोनों के कुछ गुण रहते हैं, उन्हें उपधातु (Metalloid) कहते हैं। जैसे आर्सेनि क, सि लि कॉन, जर्मेनि यम, ऐंटीमनी, बिस्मथ, इत्यादि ।
वह शुद्ध पदार्थ जो रासायनिक रूप से दो या दो से अधिक तत्वों के एक निश्चित अनुपात में रासायनिक संयोग से बने हैं, यौगिक (Compound) कहलाते हैं। यौगिक के गुण उनके अवयवी तत्वों के गुणों से भिन्न होता है, जैसे – जल। जल ऑक्सीजन एवं हाइड्रोजन से मिलकर बनता है, इसमें ऑक्सीजन जलने में सहायक होता है और हाइड्रोजन खुद जलता है लेकिन इन दोनों का यौगिक जल आग को बुझा देता है।
(ii) मिश्रण (Mixture)
वह पदार्थ जो दो या दो से अधिक तत्वों या यौगिकों के किसी भी अनुपात में मिलाने से प्राप्त होता है, मिश्रण (Mixture) कहलाता है। इसे सरल यांत्रिक विधि द्वारा पुनः प्रारंभिक अवयवों में प्राप्त किया जा सकता है।
- समांग मिश्रण (Homogeneous Mixture) : निश्चित अनुपात में अवयवों को मिलाने से समांग मिश्रण का निर्माण होता है। इसके प्रत्येक भाग के गुण-धर्म एक समान होते हैं। जैसे – चीनी या नमक का जलीय विलयन, हवा आदि।
- विषमांग मिश्रण (Hetrogeneous Mixture) : अनिश्चित अनुपात में अवयवों को मिलाने से विषमांग मिश्रण का निर्माण होता है। इसके प्रत्येक भाग के गुण एवं उनके संघटक भिन्न-भिन्न होते हैं। जैसे – बारूद, कुहासा आदि।
- वह पदार्थ जो विलायक में अघुलनशील तथा आँखों से देखा जा सकता है, निलंबन कहलाता है। निलंबन एक विषमांगी मिश्रण होता है।
मिश्रण के अवयवों का पृथक्करण
- हाथ से चुनकर (Hand Picking)
- चलनी से चालकर (Sieving)
- निस्पंदन (Filtration) : यह एक फिल्टर पेपर के माध्यम से तरल और ठोस निलम्बित कणों को शीघ्रता तथा पूर्णतया हटाने की प्रक्रिया है। उदाहरण – चाय बनाते समय चाय की पत्तियों के ठोस कणों को छान के अलग करना।
- वाष्पीकरण (Evaporation) : हम वाष्पशील घटकों (विलायक) को इसके अवाष्पशील घटकों (वि लेय) से वाष्पीकरण की प्रक्रि या द्वारा पृथक्कर सकते हैं। ठदाहरण समुद्री जल से नमक की पुन: प्राप्ति।
- कार्डिग (Carding) : यह एक ऐसी प्रक्रिया है। जिसमें ऊन जैसी कुछ सामग्रियों के धागे हटाने के लिए ब्रश का उपयोग किया जाता है। इसका उपयोग साधारणतया टेक्सटाइल उद्योग में कि या जाता है।
- अपकेन्द्रण (Centrifugation) : इस प्रक्रिया में विषमांगी मि श्रण के अवसादन ( भारी कणों का बैठना) के लिए अपकेन्द्रीय बल (centrifugal force) का ठपयोग किया जाता है।
- क्रिस्टलीकरण (Crystallisation) : इस विधि के द्वारा अकार्बनि क ठोस मि श्रण को अलग किया जाता है। इस विधि में अशुद्ध ठोस मिश्रण को उचित विलायक (solvent) के साथ मिलाकर गर्म किया जाता है तथा गर्म अवस्था में ही कीप द्वारा छान लि या जाता है। छानने के बाद विक्यन को कम ताप पर धीरे-धीरे ठण्डा कि या जाता है। ठण्डा होने पर शुद्ध पदार्थ क्रिस्टल के रूप में विलियन से पृथक् हो जाता है। जैसे – शर्करा और नमक के मिश्रण को इथाइल अल्कोहल में 348 K ताप पर गर्म कर इस विधि द्वारा अलग किया जाता है।
- आसवन विधि (Distillation) : जब दो द्रवों के क्वथनांकों में अन्तर अधिक होता है, तो उसके मि श्रण को आसवन विधि से पृथक्करते हैं। अर्थात् यह द्रवों के मिश्रण को अलग करने की विधि है। इसका प्रथम भाग वाष्पीकरण (vaporisation) एवं दूसरा भाग संघनन (condensation) कहलाता हैं।
- ऊर्ध्वपातन (Sublimation) : इस विधि द्वारा दो ऐसे ठोसों के मिश्रण को अलग करते हैं, जि समें एक ठोस ऊर्ध्वपातित (sublimate) हो, दूसरा नहीं। इस विधि से कर्पूर, नेफ्थठीन, अमोनियम क्लोराइड, ऐंश्रासीन आदि को अलग करते है।
- आंशिक आसवन (Factional Distillation) : इस विधि से वैसे मिश्रित द्रवों को अलग करते हैं, जिनके क्वथनांकों में अन्तर बहुत कम होता है। खनि ज तेल या कच्चे तेल में से शुद्ध डीजल, पेट्रोल, मिट्टी तेल, कोलतार आदि इसी वि धि द्वारा अलग कि या जाता है।
- वर्णलेखन (Chromatography) : यह विधि इस तथ्य पर आधारित है कि किसी मिश्रण के विभिन्न घटकों की अवशोषण (absorption) क्षमता भिन्न-भिन्न होती है तथा वे किसी अधिशोषक पदार्थ में विभिन्न दूरियों पर अवशोषित होते हैं, इस प्रकार वे पृथक्कर लिए जाते हैं।
- भाप आसवन (Steam Disaillation) : इस विधि से कार्बनिक मिश्रण को शुद्ध किया जाता है, जो जल में अघुलनशील होता है, परन्तु भाप के साथ वाष्पशील होता है। इस विधि विशेष रूप से उन पदार्थों का शुद्धीकरण किया जाता है, जो अपने क्वथनांक पर अपघटित हो जाते है। जैसे – एसीटोन, मेथिल अल्कोहरु आदि।
- अवसादन और निस्तारण : इस विधि का उपयोग तब तक किया जाता है। जब एक घटक अघुलनशील ठोस होता है और दूसरा द्रव होता है अर्थात् मिट्टी और पानी।
प्रकृति में होनेवाले परि वर्तनों को दो भागों में बाटा जा सकता है —
- भौतिक परिवर्तन (Physical Change) वह है जि समें पदार्थ के कुछ गुणों (रंग, रूप आदि) में थोड़ा अस्थायी परि वर्तन अवश्य हो जाता है, कितु उसके मूल संघटन और द्रव्यमान में कोई परि वर्तन नहीं होता और इस परिवर्तन के फलस्वरूप कोई नया पदार्थ नहीं बनता है। उदाहरण – (क) जल का वाष्प बनना (ख) नमक का जल में विलय (ग) विद्युत बल्ब से प्रकाश का उत्सर्जन
- रासायनिक परिवर्तन (Chemical Change) वह परिवर्तन है जिसके फलस्वरूप पदार्थ नए पदार्थ में परिवर्तित हो जाता है जिसके गुण (संरचना, द्रव्यमान आदि) मूल पदार्थ से पूर्णत: भिन्न होते हैं और परिवर्तन लानेवाले कारण को हटा लेने पर भी पदार्थ अपनी मूल अवस्था में नहीं आता। उदाहरण – (क) लोहे में जंग लगना (ख) कोयले का जलना (ग) लोहे और गंथक के मिश्रण को गर्म करन (घ) शरीर में भोजन का पचना।
विलयन (Solution)
विलयन (Solution) दो या दो से अधिक पदार्थों का समांग मिश्रण है जिसमें किसी निश्चित ताप पर विलेय और विलायक की आपेक्षिक मात्राएँ एक निश्चित सीमा तक निरंतर परिवर्तित हो सकती हैं।
किसी विलयन में विलेय के कणों की त्रिज्या 10−7 सेमी से कम होती है। अतः इन कणों को सूक्ष्मदर्थी द्वारा भी नहीं देखा जा सकता है।
विलयन स्थायी एवं पारदर्शक होता है।
विलयन में जो पदार्थ अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में होता है, उसे विलायक कहते हैं तथा जो पदार्थ कम मात्रा में उपस्थित रहते हैं उसे विलेय कहते हैं। विलयन के प्रकार :
- किसी निश्चित ताप पर बना वह विलयन जिसमें विलेय की और अधिक मात्रा उस ताप पर घुलाई जा सकती है, असंतृप्त विलयन (Unsaturated Solution) कहलाता है।
- किसी निश्चित ताप पर बना वह विलयन जिसमें विलेय की अधिकतम मात्रा घुली हो, संतृप्त विलयन (Saturated Solution) कहलाता है।
- वह संतृप्त विलयन जिसमें विलेय की मात्रा उस विलयन को संतृप्त करने के लिए आवश्यक विलेय की मात्रा से अधिक घुली हुई हो, अतिसंतृप्त विलयन (Super Saturated Solution) कहलाता है। एक निश्चित ताप और दाब पर 100 g विलायक में
किसी निश्चित ताप और दाव पर 100 ग्राम वि लायक में घुलने वाली विलेय की अधिकतम मात्रा को उस विलेय पदार्थ की उस विलायक में विलेयता (Solubility) कहते हैं।
विलेयता = विलेय की मात्रा/विलायक की मात्रा × 100
किसी विलायक (या विलयन) की इकाई मात्रा में उपस्थित विलेय की मात्रा को विलयन का सांद्रण (Concentration of Solution) कहते हं। जिस विलयन में विलेय की पर्याप्त मात्रा घुली रहती है उसे सान्द्र वि लयन कषा जाता है और जिसमें वि लेय की कम मात्रा घुली रहती है उसे तनु विलयन कहा जाता है। सभी तनु विलयन असंतृप्त विलयन होते हैं। जो विलयन जितना ही अधिक तनु होता है वह उतना ही अधिक असंतृप्त होता है।
परिक्षेपण (D1ispc1sion): जब किसी पदार्थ के कण (परमाणु, अणु या आयन) दूसरे पदार्थ के कणों के ईर्द-गिर्द छितरा दिए जाते हैं तो यह क्रिया परिक्षेपण कहलाती है । पहले पदार्थ को परिक्षेपित पदार्थ और दूसरे को परिक्षेपण माध्यम कहा जाता है । परिक्षेपण के फलस्वरूप
दो प्रकार के पदार्थ बनते हैं– (i) विषमांग पदार्थ (निलंबन एवं कोलॉइड) (ii) समांग पदार्थ (वास्तविक विलयन) ।
निलेबन (Suspension) : इसमें परिक्षेपि त कणों का आकार 10−5 सेमी से 10−4 सेमी या इससे अधिक होता है । इन्हें आँखों से देखा जा सकता है। इसके कण छन्ना-पत्र के आर-पार नहीं आ-जा सकते | ये अस्थायी होते हैं तथा इनके कणों में परिक्षेपण माध्यम से अलग हो जाने की प्रवृति पायी जाती है। उदाहरण नदी का गंदा पानी, वायु में धुआँ आदि ।
कोलॉइड (Colloid) : इसमें परिक्षेपि त कणों का आकार 10−5 सेमी और 10−7 सेमी के बीच होता है । इसके कणों को नग्न आँखों की सहायता से नहीं देखा जा सकता बल्कि सूक्ष्मदर्शी की सहायता से देखा जा सकता है। इसके कण छन्ना-पत्र के आर-पार आ-जा सकते हैं लेकिन चर्म पत्र से नहीं नि कल सकते हैं। इसके कणों में परि क्षेपण माध्यम से अलग हो जाने की बहुत कम प्रवृति पायी जाती है। उदाहरण दूध, गोंद, रक्त, स्याही आदि।
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