
परमाणु अतिसूक्ष्म कणों (इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन व न्यूटन) से मिलकर बने होते हैं। परमाणु की संरचना के सम्बन्ध में विभिन्न परिकल्पनाएँ दी गई हैं। सर्वप्रथम परमाणु सिद्धान्त को प्रस्तुत करने का श्रेय जॉन डाल्टन को दिया जाता है।
परमाणु के मूल कण
परमाणु मुख्यतः तीन मूल कणों – इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन व न्यूट्रॉन से मिलकर बने होते हैं, क्योंकि ये परमाणु में सदैव उपस्थित होते हैं। हाइद्वोजन (1H1) यद्यपि इसका अपवाद है, क्योंकि इसमें न्यूट्रॉन अनुपस्थित होता है।
परमाणु के मूल कणों के गुण
| परमाणु के मूल कण | स्थिति | खोजकर्ता | आवेश (C) | द्रव्यमान (kg) |
|---|---|---|---|---|
| प्रोटॉन (p) | नाभिक के अन्दर | रदरफोर्ड | 1.6 × 10−19 C | 1.67 × 10−17 kg |
| न्यूट्रॉन (n) | नाभिक के अन्दर | चैडविक | 0 | 1.6750 × 10−27 kg |
| इलेक्ट्रॉन (e) | नाभिक के बाहर | जे.जे. थॉमसन | −1.6 × 10−19 C | 9.1 × 10−31 kg |
थॉमसन का परमाणु मॉडल (Thomson's Atomic Model)
जे.जे, थॉमसन ने सन् 1898 में प्रथम परमाणु मॉडल प्रस्तुत किया। इसके अनुसार
- परमाणु धनावेशित गोले का बना होता है और इलेक्ट्रॉन ठसमें उपस्थित होते हैं।
- परमाणु में ऋणात्मक और घनात्मक आवेश परिमाण में समान होते हैं, जिससे परमाणु विद्युतीय रूप से उदासीन होता है।
कमियां (Drawbacks)
यह मॉडल परमाणु की उदासीनता की व्याख्या तो करता था, परन्तु यह α-कणों के प्रकीर्णन प्रयोग और हाइड्रोजन परमाणु के स्पेक्ट्रम की व्याख्या करने में असमर्थ था।
रदरफोर्ड का परमाणु मॉडल (Ruthedford's Atomic Model)
वर्ष 1911 में रदरफोर्ड ने सोने की पतली पन्नी पर एल्फा (α) कणों की बौछार करके प्राप्त परिणामों से निम्न निष्कर्ष निकालें
- अधिकांश α-कण धातु की पन्नी से सीधे निकल जाते हैं, जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि परमाणु का अधिकांश भाग रिक्त होता है।
- कुछ एल्फा कण प्रतिकर्षित होकर मूल पथ से विभिन्न कोण बनाते हुए विचलित हो जाते हैं, जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि परमाणु के केन्द्र में कोई धनावेशित वस्तु स्थित है।
- बहुत धोड़े एल्फा कण जिस पथ से गए थे, उसी पथ से वापस लौट आए, जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि परमाणु का समस्त धनावेश एक अतिसूक्ष्म आयतन में केन्द्रित रहता है। इस धनावेशित भाग को रदफोर्ड ने नाभिक (nucleus) नाम दिया।
- इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर वृत्ताकार पथों में चक्कर लगाते हैं, जिन्हें कक्षाएं (कोश) कहते हैं।
- इलेक्ट्रॉन नाभिक के साथ स्थिर वैद्युत आकर्षण बलों द्वारा बँधे होते है।
कमियां (Drawbacks)
यह मॉडल परमाणु के स्थायि त्व तथा नाभि क के चारों ओर इलेक्ट्रॉन के वितरण की व्याख्या नहीं कर सका।
यह मॉडल स्पेक्ट्रम की व्याख्या नहीं कर सकता है।
बोर का परमाणु मॉडल (Bohr's Atomic Model)
- वर्ष 1913 में नील्स बोर ने मैक्स प्लांक के क्वाण्टम सिद्धान्त का उपयोग कर रदरफोर्ड के नाभिकीय मॉडल का एक संशोधित एवं विस्तृत रूप प्रस्तुत किया।
- इस मॉडल के अनुसार परमाणु में इलेक्ट्रॉन लगातार बिना ऊर्जा खोए अपनी अनुमत कक्षाओं में चक्कर लगाते हैं। इन कक्षाओं को स्थिर कक्षा (stationary orbit) या ऊर्जा स्तर (energy levels) कहते हैं।
- इन कक्षाओं या (कोशों) को K, L, M, N, … अक्षरों या संख्याओं 1, 2, 3, 4…. से प्रदर्शित करते हैं।
- इलेक्ट्रॉन तथा नाभिक के मध्य जो आकर्षण बल कार्य करता है, वह अपकेन्द्र बल द्वारा सन्तुलित होता है। अर्थात्
- इलेक्ट्रॉन केवल उन्हीं कक्षों में घूमते है, जि नमें उनका कोणीय संवेग का पूर्ण गुणक होता है अर्थात्
; n = 1, 2, 3, … - किसी परमाणु द्वारा ऊर्जा का अवशोषण या उत्सर्जन केवल तभी किया जाता है, जब इलेक्ट्रॉन एक ऊर्जा स्तर से दूसरे ऊर्जा स्तर तक जाता है।
कमियां (Drawbacks)
- बहु-इलेक्ट्रॉन परमाणुओं एवं आयनों के स्पेक्ट्रम की व्याख्या करने में असफल रहा।
- यह जीमान प्रभाव और स्टार्क प्रभाव की व्याख्या करने में असफल रहा।
- यह परमाणुओं के रासायनिक आबन्धों द्वारा अणु बनाने की योग्यता की व्याख्या नहीं कर सका।
परमाणु संख्या एवं द्रव्यमान संख्या
- किसी तत्व के परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों की संख्या उस परमाणु की परमाणु संख्या (परमाणु क्रमांक) कहलाती है।
- परमाणु क्रमांक तत्वों का मूलभूत गुण (अभिलाक्षणिक गुण) है।
- परमाणु को उदासीन बनाए रखने के लिए उसमें इलेक्ट्रॉनों की संख्या प्रोटॉनों की संख्या के बराबर होती है।
- किसी भी परमाणु की द्रव्यमान संख्या उस परमाणु में उपस्थित न्यूक्लिऑनों (न्यूट्रॉन तथा प्रोटॉन) की कुल संख्या के बराबर होती है अर्थात् प्रोटॉन और न्यूट्रॉन की संख्याओं का योग उस परमाणु की द्रव्यमान संख्या (A) कहलाती है।
Join the Discussion