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BSEB Class 9 Science Chapter 9 Notes: बल तथा गति के नियम

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Notes

न्यूटन का गति-नियम (Newton's laws of motion)

भौतिकी के पिता न्यूटन ने सन्‌ 1687 ई० में अपनी पुस्तक 'प्रिसिपिया' में सबसे पहले गति के नियम को प्रतिपादित किया था ।

न्यूटन का प्रथम गति-नियम (Newton's first law of motion):

यदि कोई वस्तु विराम अवस्था में है, तो वह विराम अवस्था में रहेगी या यदि वह एकसमान चाल से सीधी रेखा में चल रही है, तो वैसी ही चलती रहेगी, जब तक कि उस पर कोई बाह्य बल लगाकर उसकी वर्तमान अवस्था में परिवर्तन न किया जाए ।

  • प्रथम नियम को गैलीलियो का नियम या जड़त्व का नियम भी कहते हैं।
  • बाह्य बल के अभाव में किसी वस्तु की अपनी विरामावस्था या समान गति की अवस्था को बनाये रखने की प्रवृत्ति को जड़त्व (Inertia) कहते हैं।
    • जड़त्व के प्रकार : (क) विराम का जड़त्व (ख) गति का जड़त्व (ग) दिशा का जड़त्व
    • जड़त्व के कुछ उदाहरण : (क) ठहरी हुई मोटर या रेलगाड़ी के अचानक चल पड़ने पर उसमें बैठे यात्री पीछे की ओर झुक जाते हैं। (ख) चलती हुई मोटरकार के अचानक रुकने पर उसमें बैठे यात्री आगे की ओर झुक जाते हैं। (ग) कम्बल को हाथ से पकड़कर डण्डे से पीटने पर धूल के कण झड़कर गिर पड़ते हैं।
  • प्रथम नियम से बल की परिभाषा मिलती है।
  • बल की परिभाषा : बल वह बाह्य कारक है जो किसी वस्तु की प्रारंभिक अवस्था में परिवर्तन करता है या परिवर्तन करने की चेष्टा करता है। बल एक सदिश राशि है। इसका S.I. मात्रक न्यूटन तथा CGS मात्रक डाइन है।

बल के प्रकार

  1. जब कि सी वस्तु पर एक साथ कई बल कार्य कर रहे हों और उनका परि णामी बल शून्य हो, तो उन बलों को सन्तुलित बल कहा जाता है। उदाहरण – यदि एक गुटके को दोनों तरफ समान बल लगाकर परस्पर विपरीत दिशा में खींचा जाये, तो गुटके में कोई गति नहीं होती। अतः गुटके पर लगे बल सन्तुलित बल है।
  2. जब कि सी वस्तु पर लगे अनेक बलों का परि णामी बल शून्य न हो, तो उन बलों को असन्तुलित बल कहा जाता है उदाहरण – रस्साकशी में शक्तिशाली टीम, कमजोर टीम को अपनी ओर खींच लेती है, इस दशा में रस्से पर लगने वाला बल असन्तुलित बल है।
  3. ऐसे बल, जिनमें दो वस्तुओं के मध्य सम्पर्क की आवश्यकता होती है, सम्पर्क बल कहलाते हैं। उदाहरण – घर्षण बल, पेशीय बल।
  4. ऐसे बल जिनमें दो वस्तुओं के मध्य सम्पर्क की आवश्यकता नहीं होती, असम्पर्क बल कहलाते हैं। उदाहरण – गुरुत्वाकर्षण बल, चुम्बकीय बल, विद्युत स्थैतिक बल, नामिकीय बल(प्रबल और दुर्बल नाभिकीय बल)।
  • संवेग (Momentum) : किसी वस्तु के द्रव्यमान तथा वेग के गुणनफल को उस वस्तु का संवेग कहते हैं। अर्थात्‌ संवेग = वेग × द्रव्यमान
    • यह एक सदिश राशि है, इसका S.I. मात्रक किग्रा० × मी०/से० है।

न्यूटन का द्वितीय गति-नियम (Newton's second law of motion) :

किसी वस्तु के संवेग में परिवर्तन की दर उस वस्तु पर आरोपित बल के समानुपाती होता है तथा संवेग परिवर्तन बल की दिशा में होता है। अब यदि आरोपित बल F, बल की दिशा में उत्पन्न त्वरण a एवं वस्तु का द्रव्यमान m हो, तो न्यूटन के गति के दूसरे नियम से F = ma अर्थात्‌

  • न्यूटन के दूसरे नियम से बल का व्यंजक प्राप्त होता है ।
  • नोट : प्रथम नियम दूसरे नियम का ही अंग है।

न्यूटन का तृतीय गति-नियम (Newton's third law of motion) :

प्रत्येक क्रिया के बराबर, परन्तु विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है। उदाहरण – (क) बन्दूक से गोली चलाने पर, चलाने वाले को पीछे की ओर धक्का लगना (ख) नाव से कि नारे पर कूदने पर नाव को पीछे की ओर हट जाना (ग) रॉकेट को उड़ाने में ।

  • संवेग संरक्षण का सिद्धान्त : यदि कणों के कि सी समूह या नि काय पर कोई बाह्य बल नहीं छग रहा हो, तो उस नि काय का कुल संवेग नि यत रहता है। अर्था त्‌टक्कर के पहले और बाद का संवेग बराबर होता है।
  • जब कोई बड़ा बल किसी वस्तु पर थोड़े समय के लिए कार्य करता है, तो बल तथा समय-अन्तराल के गुणनफल को उस बल का आवेग (Impulse) कहते हैं|
    • आवेग = बल × समय अन्तराल = संवेग में परिवर्तन
    • आवेग एक संदिश राशि है, जिसका मात्रक न्यूटन सेकण्ड (Ns) है तथा इसकी दिशा वही होती है, जो बल की होती है।
  • अभिकेन्द्रीय बल (Centripetal Force): जब कोरई वस्तु कि सी वृत्ताकार मार्ग पर चरती है, तो उस पर एक बल वृत्त के केन्द्र की और कार्य करता है। इस बल को ही अभि केन्द्रीय बल कहते हैं। इस बल के अभाव में वस्तु वृत्ताकार मार्ग पर नहीं चल सकती है । यदि कोई द्रव्यमान का पि ंड ० चाल से “त्रि ज्या के वृत्तीय मार्ग पर चल रहा है, तो उस पर कार्यकारी वृत्त के केन्द्र की ओर आवश्यक अभि केन्द्रीय बल £ = ~ होता है ।
  • अपकेन्द्रीय बल (Centrifugal Force): अजड़त्वीय फ्रेम (Non-inertial frame) में न्यूटन के नि यमों को लागू करने के लि ए कुछ ऐसे बलों की कल्पना करनी होती है जि न्हें परि वेश में कि सी पि ण्ड से संबंधि त नहीं कि या जा सकता । ये बल छद्म बल या जड़त्वीय बल कहलाते है । अपकेन्द्रीय बल एक ऐसा ही जड़त्वीय बल या छद्म बल है । इसकी दि शा अभि केन्द्री बल के वि परीत दि शा में होती है। कपड़ा सुखाने की मशीन, दूध से मक्खन नि कालने की _ मशीन आदि अपकेन्द्रीय बर के सि द्धान्त पर कार्य करती है । : वृत्तीय पृथ पर गति मान वस्तु पर कार्य करने वाले अभि केन्द्री बल की प्रति क्रि या होती है, जैसे “मौत के कुएँ” में कुएँ की दीवार मीटर-साइकि ल पर अन्दर की ओर क्रि या बल लगाती है, जबकि इसका प्रति क्रि या बल मोटर-साइकि ल द्वारा कुएँ की दीवार पर बाहर की और कार्य करता है। कभी-कभी बाहर की और कार्य करने वाले इस प्रति क्रि या बल को श्रमवश अपकेन्द्रीय बल कह दि या जाता है, जो कि बि ल्कुल गलत है ।
  • बल-आघूर्ण (Moment of Force): बल द्वारा एक पि ण्ड को एक अक्ष के परि तः घुमाने की प्रवृत्ति को बल-आघूर्ण कहते हैं। कि सी अक्ष के परि तः एक बल का बल-आघूर्ण उस बल के परि माण तथा अक्ष से बल की क्रि या-रेखा के बीच की लम्बवत्‌दूरी के गुणनफल के बराबर होता है । [अर्था त्‌बल-आघूर्ण (7) = बल » आघूर्ण भुजा] यह एक सदि श राशि है। इसका मात्रक न्यूटन मी० होता है।

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