
न्युटन के गति के नियम
गति के नियमो को सबसे पहले सर आइनक न्यूटन के सन् 1637 मे अपनी पुस्तक "प्रिंयिपीया" में प्रतिपादित किया। ड्सलिए आइनक न्यूटन के सम्मान मे डन नियमों को न्यूटन के गति नियम कहते है।
जड़त्व
किसी पिण्ड का वह गुण जिसके कारण पिण्ड विराम की अवस्था में अथवा, वेग से गति की अवस्था मे किसी भी प्रकार के परिवर्तन का विरोध करता हैं। इसे ही जड़त्व कहते हें।
हमारे दैनिक जीवन में अनेकों घटनाए घटित होती हैं। उनमें जड़त्व को आसानी से देखा जा सकता हैं। किसी वस्तु का भार जितना अधिक होगा वह वस्तु अपने मे परिवर्तन का उतना ही अधिक विरोध करती हैं। अतः जड़त्व की परिभाषा स्पस्ट होता है कि उस वस्तु का जड़त्व भी अधिकतम होगा।
जड़त्व का नियम
इस नियम के अजुसार गहि कोई वस्तु विरामावस्था में हैं तो वह विरामावस्था मे ही रहेगी। अथवा कोई वस्तु एकसमान वेग से सीधि सरल रेखा मे गति शि ल हैं तो वह गति करती ही रहेगी। जब तक उस वस्तु पर कोई बाह्य बल न लगाया नाए। इसे जड़त्व का नियम कहते हें। जड़त्व के नियम को न्युटन के गति का प्रथम नियम भी कहा जाता हैं।
जड़त्व के प्रकार –
जड़त्वो को तीन भागों में बाटा गया है। अर्थात किसी वस्तु मे जड़त्व को तीन प्रकार से देखा जा सकता हैं।
- विराम का जड़त्व
- गति का जड़त्व
- दिशा का जड़त्व
1. विराम का जड़त्व
जैसे कि नाम से स्पष्ट हैं कि किसी वस्तु का वह गुण जिसके कारण वह वस्तु अपनी विराम की अवस्था में परिवर्तन का विरोध करती हैं। विराम का जड़त्व कहते हैं। उदाहरण द्वारा समझा जा सकता हें।
उदाहरण –
- (क) जब किसी बस के अचानक चलने पर उसमें खड़े गात्री पीछे की और गिर जाते हैं। इसका कारण यह हैं कि यात्री विराम की अवस्था मे होता हैं एवं बस के चलने पर उसका शरीर बस की ओर गति का विरोध करता हैं। अतः विराम के जड़त्व के कारण यात्री पीछे की ओर गीर जाते हें।
- (ख) पेड़ को अचानक हि लाने पर उसके फलों का गिरना ।
2. गति का जड़त्व
इसकी परिभाषा भी नाम से ही स्पष्ट हैं कि किसी वस्तु का वह गुण जिसमें वस्तु स्वयं अपनी गति की अवस्था मे परिवर्तन का विरोध करती हैं। गति का जड़त्व कहलाता हैं।
उदाहरण –
- (क) चलती रेलगाड़ी से अचानक उतर जाने पर व्यक्ति आगे की ओर गिर जाता है।
- (ख) चलती बस के अचानक खुकने पर यात्री का आगे की ओर झुकना।
3. दिशा का जड़त्व
किसी वस्तु का वह गुण जिसके कारण वह वस्तु स्वयं की गति की दिशा में होनें पाली परिवर्तन का विरोध करती हैं। दिशा का जड़त्व कहलाता है।
उदाहरण –
- (क) जब कोई बस दायी ओर मुइती हैं तो दिशा के जड़त्व के कारण उसमें बैठे यात्री बायी ओर झुक जाती है।
न्युटन के गति के नियम
न्युटन के गति के तीन नियम हैं।
- गति का प्रथम नियम - नइत्ब फा नियम
- गति का द्वितिय नियम - संवेग का नियम
- गति का तृतिय नियम - क्रिया-प्रतिक्रिया नियम
1. गति का प्रथम नियम - ( जड़त्वर का नियम )
न्युटन के गति के प्रथम नियम के अनुसार गदि कोई वस्तु विराम अबस्था में हैं तो वह विरामाबस्था में ही रहेगी। वस्तु पर कोई बाह्य बल लगाकर ही वस्तु को बि रामाबरस्था मे गति की अबस्था में परिबर्तित किया जा सकता हैं। एवं यदि कोई वस्तु गतिशिल अवस्था मे हैं तो वह एक समान चाल से सरल रेखा में चलती ही रहेगी , जब तक उस वस्तु पर बाह्य बल न लगाया जाए। इसे गति का प्रथम नियम कहते हैं। इसे न्युटन का नियम श्री कहा जाता हैं।
उदाहरण –
- (क) चलती रेलगाड़ी से अचानक उतर जाने पर व्यक्ति आगे की और गिर जाते हैं।
- (ख) खिड़की के शिशें पर बन्दुक से गोली मारने पर शिशें में छेड़ हो जाता हैं।
2. गति का द्वितिय नियम (संवेग का नियम)
न्युटन के गति का द्वितिय नियम के अनुसार रेखि य संवेग मे परि वर्तन की दूर उस वस्तु पर लगाए गए बाह्य बल के अनुक्रमानुपाती होती हैं। एबं संवेग परिवर्तन वस्तु पर लगाए गए बल की दि शा में ही होता हैं। इसे गति का द्वितिय नियम कहते हैं एवं इस नियम को संयोग का नियम भी कहते हैं।
उदाहरण –
क्रिकेट खेल में खिलाड़ी तेजी से आति गेंद को कैच करते समय अपने हाथो को पीछे की ओर कर लेते हैं। इससे गेंद का वेग कम हो जाता हैं और खिलाड़ी को कोई चोट नही लगती हैं।
3. गति का तृतिय नियम (क्रिया-प्रतिक्रिया नियम)
न्युटन के गति के तृतिय नियम के अनुसार, प्रत्येक क्रिया के बराबर एवं बिपरित दिशा मे प्रतिक्रिया होती है। गति के तृतिय नियम को क्रिया-प्रति क्रिया नियम भी कहते है।
उदाहरण –
- (क) गति के तृतीय नियम को ऐसा समझते हैं कि आप किसी टेबल पर हाथ रख कर खड़े हैं तो जितना बल आपका हाथ टेबल पर बल लगा रहा हैं। उतना ही बल तेबल आपके हाथ पर लगा रही है। आपने देखा होगा कि कमनोर छत पर ब्याद्वा बल अर्थात कई व्यक्तियों के बेॅंठने पर वह छत प्रतिक्रिया बल उतना नही लगा पाति हैं जितना व्यक्ति उस पर क्रिया बल लगा देते हैं।
- (ख) कुए से नल खीचते समय रस्सी टूटने पर रस्सी खीचनें वाला पीछे की और गिर जाता हैँ।
- (ग) बन्दुक से गोली मारने पर पीछे की और धक्का लगना।
संवेग
वह राशि जो किसी वस्तु के बेग ब दव्यमान पर निर्भर करती हैं अर्थात किसी गतिशिल बस्त्र के द्रव्यमान ऑर उसके वेग के गुणनफल को संवेग कहते हैं। इसे P से प्रदृर्शित करते हैं। माना किसी गतिशिल वस्तु का दव्यमान m तथा वेग v हो तो संवेग की परिभाषा p = mv। संवेग एक सदिश राशि हैं। इसकी दिशा वही होती हैं जो वस्तु की वेग की दिशा होती हैं। सदिश रूप मे संवेग
p = mv
संवेग का MKS पद्धति मे मात्रक kg m/s होता हैं। एवे इसे न्युटन सेकेण्ड श्री कहते हैं।
संवेग संरक्षण का नियम
इस नियम के अनुसार, यदि पिण्डों के किसी निकाय पर बाह्य बल शून्य हैं तो निकाय कर सम्पूर्ण संवेग संरक्षित रहता हें। इसमें समय के साथ कोई परिवर्तन नही होता हैं। यही संवेग संरक्षण का नियम हैं।
संवेग संरक्षण सिद्धान्त ( नियम ) का निगमन
घर्षण बल
जब ढ़ो पिण्ड परस्पर सम्पर्क मे होते हैं एबं एक वस्तु दुसरी वस्तु के पृष्ट पर गति करती हैं। तो इनके सम्पर्क तलों के बीच एक बल कार्य करता हैं। नो वस्तुओं की गति का वि रोध करता हैं डस बल को घर्षण बल कहते हें।
उदाहरण :-
घर्षण बल को उदाहरण द्वारा अच्छी तरह समझा जा सकता हैं। मान लिजिए एक मेज हैं जिसके ऊपर कोई वस्तु हैं। यदि हम वस्तु को किसी वेग से धक्का दे तो वस्तु कुछ टूर चलने के बाद रुक जाएगी या बिरामावस्था में आ जाएगी तो ध्यान देने वाली बात यह हैं कि वस्तु क्यों रुकी।
चूँकि हम जानते हैं कि किसी भी गतिशिल वस्तु को रोकने के लिए एक बाह्य बल की आवश्यकता होती हैं। वस्तु तथा मेज के सम्पर्क तलो के बिच एक बल कार्यरत हैं जो इनकी गति का विरोध करता हैं। इस बल को ही घर्षण बल कहते हैं। चित्र द्वारा स्पष्ट होता हैं।
घर्षण बल के प्रकार
घर्षण बल दो प्रकार के होते हें।
- गतिक घर्षण बल
- स्थैतिक द्घर्षण बल
1. गतिक घर्षण बल
जब दो वस्तुओं के बीच परस्पर गति होती हैं तो इन वस्तुओं के बिच एक बल आरोपित हो जाता हैं। जिसे गतिक धर्षण बल कहते हैं।
अर्थात्, दो वस्तुओं के बीच उनकी गति के कारण उत्पन्न बल को गति घर्षण बल कहते हैं। इसे fk द्वारा प्रदर्शित किया जाता हैँ
जहां uk एक नियतांक हैं जिसे गतिक घर्षण गुणांक कहते हैं।
2. स्थैतिक घर्षण बल
जब दो वस्तुएं एक दूसरे के सम्पर्क मे होती हैं लेकिन उनके बीच कोई गति नहीं होती हैं अर्थात् वह विरामाबस्था मे होती हैं। तो इन वस्तुओं के बीच आरोपित बल को स्थैतिक घर्षण बल कहते हैं अर्थात , वस्तुओं के बीच उनकी विरामावस्था के कारण उत्पन्न बल को स्थैतिक घर्षण बल कहते हैं। इसे fs से प्रदर्शि त करते हें।
नहाँ us एक नियतांक हैं जिसे स्थैतिक घर्षण गुणांक कहते हैं।
घर्षण के नियम
- घर्षण बल सदैव गतिशील वस्तुओं पर उनकी गति की दिशा के विपरित आरोपित होता हें।
- जब दो वस्तुए परस्पर एक दूसरे के सम्पर्क में होती हैं तो उनके बीच घर्षण बल, अभिलम्ब प्रतिक्रिया R के अनुक्रमानुपाति होता है।
घर्षण गुणांक
घर्षण निगम से स्पस्ट होता हैं कि घर्षण बल F अभिलम्ब प्रतिक्रिया R के अनुक्रमानुपाति होता हैं। तो
f ∝ R या f = uR
जहाँ u एक नियतांक हैं नि से घर्षण गुणांक कहते हैं।
घर्षण कोण
सीमांत घर्षण की दिशा में, अभिलम्ब प्रतिक्रिया R एवं इसका परिमाणी B के बीच कोण को घर्षण कोण कहते हैं। घर्षण कोण को θ से प्रदर्शित करते हें।
चतुर्गुण OABC में
AB = OC = fs तथा OA = BC = R
अब AOCB में
tanθ =
अब घर्षण के सूत्र fs = usR
tanθ =
या
यही द्र्षण कोण का सूत्र हैं।
लोटनिक घर्षण
किसी भी वस्तु को दुसरी वस्तु के पृष्ट पर सरकाने की अपेक्षा लुढ़काना अधिक आसान हैं। अर्थात एक पिण्ड किसी दूसरे पिण्ड के तल पर लुढ़कता हैं। तो दोनों पिण्डों के सम्पर्क तलों के बीच एक बल आरोपित हो जाता है। जिसे लोटनिक घर्षण कहते हैं
तरल घर्षण
जब द्रव को किसी बर्तन में लेकर तेजी से घुमाया जाता है तो द्रव्य कृछ समय धूमने के पश्चात रुक जाता हैं। इससे स्पष्ट होता हैं कि द्रव की विभिन्न परतो के मध्य एक बल कार्य करता हैं। जो द्रव की गति का विरोध करता हैं। इसे तरल दर्षण कहते हैं।
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