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BSEB Class 9 Science Chapter 15 Notes: खाद्य संसाधनों में सुधार

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Notes

हमारे देश की अधि कांश जनसंख्या अपने जीवनयापन के लि ए कृषि पर नि र्भर करती है।

संपूषणीय जीवनयापन के लि ए मि श्रि त खेती, अंतराफसलीकरण तथा संघटि त कृषि - प्रणालि याँ अपनानी चाहि ए । पौधे सूर्य के प्रकाश में प्रकाश-संश्लेषण द्वारा अपना भोजन बनाते हैं । कुछ ऐसी फसलें हैं, जि न्हें हम वर्षा ऋतु में उगाते हैं, खरीफ फसल कहते हैं। धान सोयाबीन, अरहर, मक्का, मूँग तथा उड़द खरीफ फसलें हैं । कुछ फसलें शीतकऋतु में उगायी जाती हैं, जो नवम्बर से अप्रैल माह तक में होती है । इन फसलों को रबी फसल कहते हैं । गेहूँ, चना, मटर, सरसों तथा अलसी रबी फसलें हैं। भारत में सन्‌1960 से सन्‌2004 तक कृषि -भूमि की पैदावार में चारगुनी वृद्धि हुई है । में 25% की वृद्धि हुई है, जबकि अन्न खाद बनाने में हम जैवि क कचरे का उपयोग करते हैं । फसल के लि ए पोषकों के मुख्य सोत खाद तथा उर्वरक हैं । कुशल फसलीकरण पद्धति आवश्यक हैं । के लि ए मि श्रि त खेती, अंतरफसलीकरण तथा फसल-चक्र मि श्रि त फसल में दो अथवा दो से अधि क फसलों को एकसाथ एक ही खे त में उगाते 1 एक वि शेष फॉर्म में फसल-उत्पादन तथ पशुपालन आदि मि श्रि त खेती-तंत्र कहते हैं। में बढ़ावा देनेवाली खेती को दो या दो से अधि क फसलों को नि श्चि त कतार-पैरटर्न में उगाने को अंतराफसलीकरण कहते हैं । एक ही खेत में वि भि न्न फसलों को पूर्व नि योजि त अनुक्रम में उगाएँ, तो उसे फसल- चक्र कहते हैं । समुद्र तथा अंतः:स्थली स्रोतों से मछलि याँ प्राप्त कर सकते हैं । मधुमक्खी पालन मधु तथा मोम को प्राप्त करने के लि ए कि या जाता है। फार्म पशुओं के लि ए उचि त देखभाल तथा प्रबंधन; जैसे–आवास, आहार, जनन तथा रोगों पर नि यंत्रण की आवश्यकता होती है । इसे पशुपालन कहते हैं ।

फसल उत्पादन में उन्नति

मुख्य स्रोत और पोषक तत्व

  • अनाज (गेहूँ, चावल, मक्का, बाजरा, ज्वार): ऊर्जा (कार्बोहाइड्रेट)
  • दालें (चना, मटर, उड़द, मूँग, अरहर, मसूर): प्रोटीन
  • तेल वाले बीज (सोयाबीन, मूँगफली, तिल, अरंड, सरसों, अलसी, सूरजमुखी): वसा
  • सब्जियाँ, मसाले, फल: विटामिन, खनिज, कुछ प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट
  • चारा फसलें (वर्सीम, जई, सूडान घास): पशु चारा

फसलों की वृद्धि पर प्रभावी पर्यावासीय कारक

  • जलवायु, तापमान, दीप्तिकाल (photoperiod) — पुष्पन और वृद्धि सूर्य-प्रकाश पर निर्भर

फसल मौसम (भारत के सन्दर्भ में)

  • खरीफ: वर्षा ऋतु (जून — अक्टूबर) — उदाहरण: धान, सोयाबीन, अरहर, मक्का, मूँग, उड़द
  • रबी: शीत ऋतु (नवंबर — अप्रैल) — उदाहरण: गेहूँ, चना, मटर, सरसों, अलसी

कृषि उत्पादन में वृद्धि (1952–2010, भारत)

  • कृषि भूमि में ~25% वृद्धि; अनाज पैदावार में ~4 गुना वृद्धि

फसल उत्पादन में उन्नति के तीन चरण (व्यवस्थात्मक दृष्टि)

  1. बीज का चयन (फसल की किस्मों में सुधार)
  2. फसल की उचित देखभाल (फसल-उत्पादन प्रबंधन)
  3. फसल सुरक्षा व कटाई के बाद संरक्षण (फसल सुरक्षा प्रबंधन)

उन्नति के प्रमुख वर्ग (संक्षेप)

  • फसल किस्मों में सुधार: उन्नत/हाइब्रिड/बीज उपचार, रोग-प्रतिरोधी व अधिक उपज देने वाली किस्में
  • फसल-उत्पादन प्रबंधन: बुआई समय, उचित सिंचाई, पोषक तत्व प्रबंधन (उर्वरक), पारगमन/कटाई तकनीकें, आदर्श कृषि अभ्यास
  • फसल सुरक्षा प्रबंधन: कीट, रोग व खरपतवार नियंत्रण; भंडारण और पोस्ट-हार्वेस्ट हानि कम करना

फसल की किस्मों में सुधार (मुख्य बिंदु)

  • उद्देश्य: फसलों की उपज, गुणवत्ता और प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर उत्पादन स्थिर व अधिक करना।
  • मुख्य विधियाँ:
    • संकरण (hybridization): अंतराकिस्मीय, अंतरास्पीशीज या अंतरावंशीय संकरण से इच्छित जातीय गुण जोड़े जाते हैं।
    • जीन प्रविष्टि (genetic modification): विशिष्ट गुण सीधे जीन स्तर पर डाले जाते हैं (जीएम फसलें)।
  • नए प्रभेद अपनाने से पहले: विभिन्न क्षेत्रों/परिस्थितियों में परीक्षण आवश्यक; उच्च गुणवत्ता वाले प्रमाणित बीज उपलब्ध होने चाहिए।
  • सुधार के प्रमुख लक्ष्यों/गुण:
    1. उच्च उत्पादन — प्रति एकड़ उपज बढ़ाना।
    2. बेहतर उत्पादन गुणवत्ता — दालों में प्रोटीन, तिलहन में तेल आदि की गुणवत्ता।
    3. जीववैज्ञानिक व अजैविक प्रतिरोधकता — रोग, कीट, निमेटोड; तथा सूखा, क्षारता, जलाक्रांति, गर्मी, ठंड, पाला इत्यादि सहने की क्षमता।
    4. परिपक्वन काल में कमी — जल्दी पकने वाली किस्में, अधिक फसल चक्र व कम लागत।
    5. व्यापक अनुकूलता — विविध जलवायु व मिट्टी में स्थिर प्रदर्शन।
    6. वांछित सस्य-विज्ञान गुण — चारे हेतु घना व लम्बा वृक्ष, अनाज हेतु बौने पौधे इत्यादि (कृषि प्रबंधन में लाभकारी)।

यदि आप चाहें तो मैं:

  • किसी विशेष फसल (जैसे गेहूँ/धान/मक्का/सोयाबीन) के लिए किस्म सुधार के तरीकों पर विस्तृत निर्देश दे सकता/सकती हूँ, या
  • किस्म विकास में इस्तेमाल होने वाली प्रजनन तकनीकें (backcrossing, pedigree, recurrent selection, marker-assisted selection) और उनके लाभ/सीमाएँ स्पष्ट कर सकता/सकती हूँ।

फसल उत्पादन प्रबंधन (मुख्य बिंदु)

  1. उत्पादन प्रणालियाँ और लागत
  • किसान भिन्न संसाधन (भूमि, धन, सूचना, तकनीक) के अनुसार अलग–अलग उत्पादन प्रणालियाँ अपनाते हैं: बिना लागत, अल्प लागत, अधिक लागत।
  • निवेश और उत्पादन में सहसंबंध है — अधिक निवेश से उच्च उत्पादन की संभावना बढ़ती है।
  1. पोषक प्रबंधन
  • पौधों को पोषक हवा (C, O), पानी (H, O) व मिट्टी से अन्य तत्व मिलते हैं। मिट्टी से मिलने वाले प्रमुख पोषक:
    • वृहत्-पोषक: N, P, K, Ca, Mg, S
    • सूक्ष्म-पोषक: Fe, Mn, B, Zn, Cu, Mo, Cl
  • खाद (ऑर्गेनिक): कंपोस्ट/वर्मी-कंपोस्ट व हरी खाद मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ व पोषक बढ़ाती हैं; मिट्टी की संरचना व जलधारण क्षमता में सुधार करती हैं।
  • उर्वरक (इनॉर्गेनिक): तेज़ वृद्धि व अधिक उपज दिलाते हैं पर महँगे हैं और अनुचित प्रयोग से मिट्टी उर्वरता घटती है तथा जल प्रदूषण हो सकता है।
  • संतुलन आवश्यक: उर्वरक की सही मात्रा, सही समय व सिंचाई-संयोजन लागू करें; कार्बनिक पदार्थों की नियमित पूर्ति जरूरी।
  • कार्बनिक खेती: रासायनिक प्रतिरोधक/उर्वरक कम/न के बराबर; जैविक खाद, फसल चक्रीकरण, अंतर-फसलीकरण, जैव-कीटनाशक प्रयोग।
  1. सिंचाई
  • भारत की अधिकांश कृषि मानसून-आधारित; अनियमित वर्षा सूखा और उपज घटने का कारण बनता है।
  • सिंचाई स्रोत: खुदे कुएँ, नलकूप, नहरें, नदी से जल उठाव, तालाब/छोटे जलाशय।
  • जल सरंक्षण व प्रबंधन (वर्षा जल संचय, छोटे बाँध, जल विभाजन) से जलस्तर बढ़ता है और मृदा अपरदन घटता है।
  • सूखे-प्रतिरोधी किस्में व सिंचाई के उन्नत तरीके सूखे के प्रभाव को कम करते हैं।
  1. फसल पैटर्न (उद्यमशीलता व जोखिम-नियंत्रण)
  • मिश्रित फसल: एक ही खेत में 2+ फसलें; जोखिम विभाजन और फसल की स्थिरता।
  • अंतराफसलीकरण (row intercropping): पंक्तिबद्ध पैटर्न में अलग फसलें; पोषक उपयोग का अनुकूलन और रोग/कीट के प्रसार को रोकना।
  • फसल चक्र (crop rotation): ऋतुओं व परिपक्वन काल के अनुरूप क्रमवार फसलें उगाना; मिट्टी की सेहत और पोषक संतुलन बनाए रखना; वर्ष में 2–3 फसलों तक उत्पादन बढ़ाना संभव।

यदि आप चाहें तो मैं किसी एक उपविभाग (उदाहरण: उर्वरक खुराक निर्धारण, सिंचाई शेड्यूल, या किसी फसल के लिए उपयुक्त अंतराफसलीकरण/फसल चक्र का उदाहरण) पर विस्तृत, चरण-दर-चरण योजना दे दूँ।

फसल सुरक्षा प्रबंधन

संक्षेप — फसल सुरक्षा प्रबंधन (मुख्य बिंदु)

  1. खतरे और प्रभाव
  • प्रमुख शत्रु: खर-पतवार, कीट-पीडक, रोगजनक (बैक्टीरिया, कवक, वायरस), भंडारण में कीट/कृंतक/कवक।
  • प्रभाव: पौधे से पोषक, स्थान व प्रकाश की प्रतिस्पर्धा; पत्तियाँ/तने/मूल क्षतिग्रस्त; रस चूसना; फल/बीज में छेद; उपज एवं गुणवत्ता में कमी; भंडारण में वजन, अंकुरण क्षमता व मूल्य घटाना।
  1. खर-पतवार नियंत्रण
  • प्रारम्भिक हटाना: रोपण के शुरुआती चरण में निकालें—प्रतियोगिता कम होती है।
  • यांत्रिक विधि: दरौपण, नालियाँ/क्यारियाँ, हाथ से हटाना, हल चालन (ग्रीष्म में गहराई से)।
  • कृषिगत निरोधक: समय पर बुआई, अंतराफसलीकरण, मिश्रित फसल व फसल चक्र — खरपतवार के प्रसार और प्रतिकूल प्रभाव घटते हैं।
  • रासायनिक नियंत्रण: शाकनाशी (herbicides) आवश्यकतानुसार—परंतु अनुशासित उपयोग ताकि पर्यावरण व लाभप्राणी प्रभावित न हों।
  • ऑर्गेनिक/प्रवर्तनात्मक: ढकने वाली फसल, मल्चिंग, जैविक उपाय आदि।
  1. कीट-पीडक और रोग नियंत्रण
  • रोकथाम: रोग-प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग; स्वस्थ बीज; खेत की स्वच्छता और बचे हुए पादप अवशेष को नष्ट करना।
  • जैविक नियंत्रण: नेचुरल शिकारी/परजीवी, बैक्टीरियल/फंगी जैव-नियंत्रक, पीषक-प्रेरित (pheromone) ट्रैप इत्यादि।
  • रासायनिक नियंत्रण: कीटनाशक/कवकनाशक का लक्ष्यनिष्ठ, नियमानुसार और न्यूनतम प्रभाव वाले उत्पादों का उपयोग; लागू समय और खुराक का पालन।
  • कृषि प्रबंधन: अंतराफसलीकरण, मिश्रित फसल, फसल चक्र और उपयुक्त पौध-घनत्व से रोग व कीट के प्रसार को सीमित करें।
  • कृषि-संवेधन (IPM): निरीक्षण, थ्रेसहोल्ड निर्धारित कर तभी रासायनिक उपचार; संयोजन—जैविक, सांस्कृतिक, यांत्रिक व रासायनिक उपाय।
  1. भंडारण प्रबंधन (अनाज व कृषि उत्पाद)
  • नुकसान के कारण: जैविक (कीट, कृंतक, कवक, चिंचड़ी, जीवाणु) तथा अजैविक (अत्यधिक नमी/उचित ताप का अभाव)।
  • तैयारी: कटाई के बाद अच्छी तरह सुखाना (पहले सूर्य में, फिर छाया), सफाई और नमी नियंत्रित करना।
  • रोकथाम: भंडारण से पहले धूमक (fumigation) तथा आवश्यक उपचार; साफ-सुथरे, सूखे और कीट-रहित गोदाम।
  • निगरानी: गोदाम में नियमित निरीक्षण; नमी/तापमान नियंत्रण; उपयुक्त पैकेजिंग व सिल-बंद भंडारण।
  • जैविक विकल्प: नीम या अन्य प्राकृतिक धूमक/अवरोधक; कंटेनर-सुक्षा व स्वच्छता बढ़ाना।
  1. व्यावहारिक सिफारिशें (फार्म-स्तर पर)
  • निरिक्षण-आधारित निर्णय लें: नियमित फील्ड सर्वे और ध्यान देकर समस्या पहचानें।
  • प्राथमिक रोकथाम पर जोर: स्वच्छता, प्रतिरोधक किस्में, विविधीकरण (इंटरक्रॉप/फसल चक्र)।
  • IPM अपनाएँ: यांत्रिक/जीववैज्ञानिक उपाय पहले; रासायनिक केवल आवश्यकता पर और निर्देशानुसार।
  • कटाई के बाद त्वरित सुखाना व सही भंडारण—भंडारण हानियों को बहुत घटाता है।
  • किसान शिक्षा व प्रमाणित उपायों/उत्पादों का उपयोग सुनिश्चित करें।

यदि आप चाहें तो मैं किसी एक भाग पर विस्तृत कार्ययोजना दे सकता/सकती हूँ — उदाहरण: किसी विशेष फसल के लिए IPM चरण-दर-चरण, भंडारण के लिए ताप/नमी मानक व कंटेनर डिज़ाइन, या स्थानीय खरपतवार/कीट की पहचान व नियंत्रण सूची।

पशुपालन और संबंधित प्रणालीयाँ (मुख्य बिंदु)

  1. परिभाषा व लक्ष्य
  • पशुपालन = पशुधन का समग्र प्रबंधन (आहार, प्रजनन, स्वास्थ्य, आवास) ताकि दूध, मांस, अंडा, कार्यशक्ति व अन्य उत्पाद की मात्रा व गुणवत्ता बढ़े।
  1. पशु उत्पादों का पोषण संकेत (सारांश)
  • दूध (गाय): ~3.6% वसा, 4% प्रोटीन, 4.5% शर्करा, ≈87% जल; विटामिन B1, B2, B12, D, E।
  • अंडा: ≈12% वसा, 13% प्रोटीन, ≈74% जल; विटामिन B2, D।
  • मांस: ≈3.6% वसा, 21% प्रोटीन, ≈74% जल; विटामिन B2, B12।
  • मछली: ≈2.5% वसा, 19% प्रोटीन, ≈77% जल; नियासीन इत्यादि।
  1. पशु कृषि (उद्देश्य व नस्ल)
  • उद्देश्य: दुग्ध-उत्पादन व कृषि कार्य (ड्राफ्ट)। प्रमुख भारतीय स्पीशीज़: गाय (Bos indicus), भैंस (Bos bubalis)।
  • दुग्धोत्पादन बढ़ाने हेतु: दुग्धस्रावण अवधि बढ़ाना; विदेशी नस्ल (जर्सी, ब्राउन स्विस) उच्च उत्पादन, देसी नस्लें (रेड सिन्धी, साहीवाल) रोग-प्रतिरोधी; क्रॉसब्रेडिंग से दोनों लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं।
  1. कुक्कुट पालन (अंडे व ब्रॉलर)
  • ब्रॉलर: तेज वृद्धि व उच्च आहार दक्षता के लिए उच्च प्रोटीन व वसा वाले आहार, विटामिन (A, K) आवश्यक; आवास—उचित ताप व स्वच्छता; रोग नियंत्रण व टीकाकरण अनिवार्य।
  • लेयर (अंडे देने वाले): प्रकाश प्रबंधन, पोषण संतुलन, संचित रोग-प्रबंधन।
  • प्रबंधन हेतु: उचित आवास, ताप-नियंत्रण, पोषण तालिका, रोग-निगरानी व जैवसुरक्षा अपनाएँ।
  1. मत्स्य उत्पादन (मछली पालन)
  • दो स्रोत: प्राकृतिक (पकड़ना) व संवर्धन (aquaculture)।
  • समुद्री मत्स्यकी: प्रमुख मछलियाँ (पॉमफ्रेट, मैकेरल, टुना, सार्डिन इत्यादि); मेरीकल्चर से स्टॉक बढ़ाना।
  • अंतःस्थली (फ़्रेशवाटर) मत्स्यकी: तालाब/पोखर/नाले; मिश्रित संवेधन (poly-culture) — विभिन्न स्पीशीज़ जिनके आहार भिन्न हों, तालाब के संसाधन का अधिकतम उपयोग।
  • समस्याएँ व समाधान: गुणवत्ता वाले डिंभ की उपलब्धता, प्रजनन का नियंत्रण (हॉर्मोन)।
  1. मधुमक्खी पालन
  • शहद उत्पादन व मोम के लिए लाभकारी; कम पूँजी में आरंभ। प्रमुख प्रजातियाँ: Apis indica, Apis dorsata, Apis florea; व व्यावसायिक रूप से Apis mellifera (इटली-मक्खी) उपयोगी।
  • अच्छा प्रबंधन: उपयुक्त मधुवाटिका, चरागाह की उपलब्धता, रोग/परजीवी नियंत्रण व सही निष्कर्षण तकनीक।
  1. सामान्य प्रबंधन सुझाव (सभी प्रजातियों पर लागू)
  • पोषण: संतुलित आहार, स्वच्छ जल, पोषक तत्वों का अनुपात लक्षित उत्पादन के अनुरूप रखें।
  • स्वास्थ्य: नियमित टीकाकरण, रोग-निगरानी, परजीवी नियंत्रण, जैवसुरक्षा और स्वच्छता।
  • प्रजनन: उद्देश्य (दूध/मांस/उत्पादन) के अनुसार नस्ल चयन और योजनाबद्ध ब्रीडिंग।
  • कल्याण व आवास: पर्यावरणीय अनुकूल आवास, आरामदायक तापमान, उचित रोशनी व जगह।
  • बाजार व आर्थिक पक्ष: लागत-अनुकूल तकनीक (छोटे व बड़े पैमाने दोनों के लिए), विविधीकरण (एक से अधिक उत्पाद) व मूल्य वर्धन (प्रसंस्करण, भंडारण) पर ध्यान दें।

यदि आप चाहें तो बताइए — किस पशु (गाय/भैंस/मुर्गी/ब्रॉलर/मछली/मधुमक्खी) पर आप विस्तृत पोषण तालिका, टीकाकरण शेड्यूल या फार्म-स्तर पर चरण-दर-चरण प्रबंधन योजना चाहते हैं।

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Class 11 Maths Chapter 6 क्रमचय-संचय: Objective Qs

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क्रमचय एवं संचय: महत्वपूर्ण प्रश्न (हल सहित) हिंदी में ​ JEE Main, NDA, CBSE, BSEB, UP, PYQ, Sample Questions, Model Paper Question क्रमचय एवं संचय: महत्वपूर्ण प्रश्न (हल सहित) हिंदी में उच्च स्तरीय बुद्धि कौशल प्रश्न [High Order Thinking Skills (HOTS) Questions] 2019 (II) 2019 (I) 2018 (II) 2018 (I) 2017 (II) 2017 (I) 2016 (II) 2016 (I) 2015 (II) 2015 (I) 2014 (I) प्रश्‍न 1 : A और B के बीच चार बस मार्ग हैं तथा B और C के बीच तीन बस मार्ग हैं। एक व्यक्ति B से होकर A से C तक जाने में बस द्वारा राउंड यात्रा (round trip), अर्थात् आने-जाने की यात्रा कर सकता है। यदि वह एक बस मार्ग का एक से अधिक बार प्रयोग नहीं करना चाहता है, तो वह आने-जाने की यात्रा कितनी विधियों से कर सकता है? 72 144 14 19 उत्तर : हल : (A) सही उत्तर है। नीचे दी आकृति में, A से B तक A ⇄ B ⇄ C 4 बस मार्ग हैं और B से C तक 3 मार्ग हैं। अतः, A से C तक जाने के लिए, 4 × 3 = 12 प्रकार या विधियाँ हैं। यह आने-जाने की यात्रा है, इसलिए वह व्यक्ति C से A, B से होकर वापस भी जाएगा। यह प्रतिबंध है कि वह C से B और फिर B से A उसी बस मार्ग स...
By Guddu Kumar

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