🐅 एकादशः पाठः : व्याघ्रपथिककथा 💍
(बूढ़े आदमखोर बाघ और लालची राही की कहानी — "लोभ ही विनाश का कारण है")

📖 [पाठ का परिचय / भूमिका]
अयं पाठः नारायणपण्डितरचितस्य 'हितोपदेशः' नामकस्य नीतिकथाग्रन्थस्य मित्रलाभनामकभागात् संकलितः। हितोपदेशे बालकानां मनोरञ्जनेन नीतिक्षिक्षणाय च विविधाः कथाः पशुपक्षिसम्बद्धाः प्रस्तुताः सन्ति। प्रस्तुतकथायां लोभस्य दुष्परिणामः प्रकटितः। पशुपक्षिकथानां मूल्यं मानवानां शिक्षार्थं प्रभूतं भवतीति एतादृशीभिः कथाभिः ज्ञायते।
- 📝 सरल हिंदी अर्थ: यह पाठ प्रसिद्ध विद्वान नारायण पंडित द्वारा रचित 'हितोपदेश' नामक नीतिकथा ग्रंथ के 'मित्रलाभ' नामक भाग से लिया गया है। 'हितोपदेश' में बच्चों के मनोरंजन के साथ-साथ उन्हें नैतिक शिक्षा देने के लिए पशु-पक्षियों से जुड़ी बहुत सी मज़ेदार कहानियाँ दी गई हैं। इस कहानी में 'लोभ' (लालच) के बहुत ही भयानक और बुरे परिणाम (दुष्परिणाम) को दिखाया गया है। ऐसी पशु-पक्षियों की कहानियों का असली महत्व इंसानों को सही सीख देना ही होता है, जो हमें इस कहानी से अच्छी तरह समझ आता है।
🐅 🌾 [भाग 1: बूढ़े बाघ का जाल और सोने का कंगन]
कश्चिद् वृद्धव्याघ्रः स्नातः कुशहस्तः सरस्तीरे ब्रूते — "भो भोः पान्थाः! इदं सुवर्णकङ्कणं गृह्यताम्।"ततो लोभाकृष्टेन केनचित्पान्थेनालोचितम् — 'भाग्येनैतत् सम्भवति। किन्तु अस्मिन्नात्मसंदेहे प्रवृत्तीर्न विघेया, यतः —अमृतात् सम्प्राप्तिः स्याद् यदा, तदापि मरणं निश्चितम्।न च संशयमनाह्य नरो भद्राणि पश्यति' इति विचिन्त्य प्राह — "कुत्र तव कङ्कणम् ?"व्याघ्रः हस्तं प्रसार्य दर्शयति।
- 📝 सरल हिंदी अर्थ: जंगल में एक बूढ़ा बाघ (वृद्धव्याघ्रः) रहता था। वह नदी/तालाब के किनारे स्नान करके, अपने हाथ में पवित्र कुशा (घास) लेकर चिल्ला-चिल्ला कर बोल रहा था— "अरे ओ राही (पान्थाः) भाइयों! सुनो, यह सोने का कंगन (सुवर्णकङ्कणम्) मुझसे दान में ले लो।" तभी लालच से अंधा (लोभाकृष्ट) होकर एक राही ने अपने मन में सोचा— "अरे वाह! ऐसा मौका तो केवल बड़े भाग्य से ही मिलता है! लेकिन जहाँ अपनी जान का खतरा (आत्मसंदेह) हो, वहाँ ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए। क्योंकि— अगर ज़हर के बीच अमृत भी मिल जाए, तो भी मौत निश्चित है।" फिर भी उसने सोचा— "बिना जोखिम और डर का सामना किए (संशयमनाह्य) मनुष्य को कभी बड़ा धन (भलाई) भी तो नहीं दिखता।" ऐसा सोचकर उसने बाघ से दूर से ही पूछा— "कहाँ है तुम्हारा सोने का कंगन?" बाघ ने तुरंत अपना हाथ आगे फैलाकर (हस्तं प्रसार्य) उसे वह कंगन दिखा दिया।
🤥 💀 [भाग 2: बाघ का झूठा रोना और शास्त्रों का बहाना]
पान्थोऽवदत् — "कथं मारात्मके त्वयि विश्वासः ?"व्याघ्र उवाच — "शृणु रे पान्थ! प्रागेव यौवनदशायामतिदुर्वृत्त आसम्। अनेकगोमानुषाणां वधाद्मे पुत्रा मृता दाराश्च, वंशहीनश्चाहम्। ततः केनचिद्धार्मिकेणाहमुद्दिष्टः — 'दानधर्मादिकं चरतु भवान्' इति। तदुपदेशादिदानीमहं स्नानशीलो दाता वृद्धो गलितनखदन्तः कथं न विश्वासभूमिः ?मया च धर्मशास्त्राण्यप्यधीतानि, शृणु —दरिद्रान् भर कौन्तेय मा प्रयच्छेश्वरे धनम्।व्याधितस्यौषधं पथ्यं नीरुजस्य किमौषधैः ॥"
- 📝 सरल हिंदी अर्थ: राही ने डरते हुए कहा— "तुम जैसे हिंसक और आदमखोर (मारात्मके) जीव पर मैं भला कैसे विश्वास करूँ?" बाघ ने अपनी झूठी और चिकनी-चुपड़ी बातें बनाते हुए रोकर कहा— "अरे राही भाई! मेरी बात सुनो। जवानी के दिनों (यौवनदशायाम्) में मैं सचमुच बहुत दुष्ट और पापी था। मैंने बहुत सी गायों और इंसानों को मार डाला था, जिसके पाप के कारण मेरे सारे बच्चे (पुत्राः) और मेरी पत्नी (दाराः) मर गए। आज मैं बिल्कुल अकेला और वंशहीन हूँ। तभी मुझे एक बहुत दयालु संत और धार्मिक पुरुष मिले। उन्होंने मुझे उपदेश दिया कि— 'अब तुम अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए दान-पुण्य करो।' उन्हीं के उपदेश से आज मैं रोज नहाता हूँ (स्नानशील), सबको दान देता हूँ, बूढ़ा हो चुका हूँ और मेरे नाखून व दाँत भी गिर चुके (गलितनखदन्तः) हैं। अब तुम ही बताओ, मैं विश्वास करने योग्य क्यों नहीं हूँ? और सुनो भाई! मैंने तो बहुत से धर्मशास्त्र भी पढ़े हैं, जैसा कि शास्त्र कहते हैं— 'हे कुंतीपुत्र (कौन्तेय)! हमेशा गरीबों और बेसहारों की मदद करो (उन्हें दान दो), अमीरों को धन देने का कोई फायदा नहीं है। बीमार व्यक्ति (व्याधितस्य) के लिए ही दवा फायदेमंद होती है, जो पहले से ही चंगा और निरोगी है, उसे दवाओं की क्या ज़रूरत है?'"
🌊 🐆 [भाग 3: कीचड़ का दलदल और राही का अंत]
"तदत्र सरसि स्नात्वा सुवर्णकङ्कणं जगृहाण।"ततो यावदसौ तद्वचः प्रतीतलोभात् सरः स्नातुं प्रविशति, तावन्महापङ्के निमग्नः पलायितुमक्षमः।पङ्के पतितं दृष्ट्वा व्याघ्रोऽवदत् — "अहह! महापङ्के पतितोऽसि। अतस्त्वामहममुत्थापयामि" इत्युक्त्वा शनैः शनैः उपगम्य तेन व्याघ्रेण स पान्थो धृतः स च चिन्तयत् —'न धर्मशास्त्रं पठतीति कारणं, न चापि वेदाध्ययनं दुरात्मनः।स्वभाव एवात्र तथातिरिच्यते, यथा प्रकृत्या मधुरं गवां पयः॥'इति चिन्तयन्नेवासौ व्याघ्रेण व्यापादितः खादितश्च।
- 📝 सरल हिंदी अर्थ: बाघ ने आगे कहा— "इसलिए भाई, तुम इस तालाब (सरसि) में पवित्र स्नान कर लो और आकर मुझसे यह सोने का कंगन ले लो।" जैसे ही वह राही बाघ की मीठी बातों के झांसे में आकर और लालच के मारे तालाब में नहाने के लिए अंदर घुसा, वैसे ही वह वहाँ के बहुत गहरे और भारी कीचड़ (महापङ्के) में बुरी तरह धंस गया (निमग्नः) और वहाँ से भागने में असमर्थ हो गया। राही को कीचड़ में फंसा हुआ देखकर बाघ ने मन ही मन हँसते हुए नाटक किया— "अरे रे रे! तुम तो गहरे कीचड़ में गिर गए हो! ठहरो, मैं तुम्हें बाहर निकालता हूँ।" ऐसा कहकर वह बूढ़ा शेर धीरे-धीरे (शनैः शनैः) राही के पास गया और उसे दबोच (पकड़) लिया। जब बाघ ने उसे पकड़ा, तब मरते समय उस राही ने रोते हुए यह कड़वा सच सोचा— "कोई दुष्ट व्यक्ति (दुरात्मनः) धर्मशास्त्र पढ़ता है या वेदों का अध्ययन करता है, यह उसके सुधरने का कारण नहीं हो सकता। मनुष्य का असली स्वभाव (नेचर) ही सबसे ऊपर होता है, ठीक उसी तरह जैसे गाय चाहे कुछ भी खाए, उसकी प्रकृति से निकलने वाला दूध हमेशा मीठा (मधुरं गवां पयः) ही होता है। (अर्थात् हिंसक जीव का हिंसक स्वभाव कभी नहीं बदलता)।" वह बेचारा ऐसा सोच ही रहा था कि उस आदमखोर बाघ ने उसे मार डाला (व्यापादितः) और मज़े से चबा-चबा कर खा गया।
🎯 पाठ का मुख्य संदेश (Conclusion):
यह अत्यंत प्रसिद्ध कहानी हमें सिखाती है कि "लोभः पापस्य कारणम्" (लालच ही सारे दुखों, पापों और विनाश की असली जड़ है)। जब हम बिना सोचे-समझे कम मेहनत में बड़ी सफलता या धन का लालच करने लगते हैं, तो हम खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेते हैं। कपटी और चालाक लोगों की मीठी बातों पर आँख मूँदकर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए।
📝 अभ्यास के कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न (BSEB Board Special):
- प्रश्न 1. बूढ़ा बाघ हाथ में क्या लेकर तालाब के किनारे बोल रहा था?
- उत्तर: बूढ़ा बाघ अपने हाथ में पवित्र कुशा (घास) और सोने का कंगन लेकर तालाब के किनारे राहगीरों को आवाज़ दे रहा था।
- प्रश्न 2. राही कीचड़ में क्यों फंसा और उसका क्या अंत हुआ?
- उत्तर: राही सोने के कंगन के लालच में आकर बाघ की बातों में फंस गया और जैसे ही वह तालाब में नहाने उतरा, वह गहरे कीचड़ (दलदल) में धंस गया। इसके बाद बाघ ने उसे पकड़कर मार डाला और खा गया।
- प्रश्न 3. 'व्याघ्रपथिककथा' पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
- उत्तर: इस पाठ से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें जीवन में कभी भी अत्यधिक लालच नहीं करना चाहिए। कपटी और हिंसक स्वभाव वाले दुष्ट व्यक्तियों की चिकनी-चुपड़ी बातों में आकर अपनी व्यावहारिक बुद्धि का त्याग कभी नहीं करना चाहिए।
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