🛡️ द्वादशः पाठः : कर्णस्य दानवीरता 🏹
(महाभारत के महानायक और दुनिया के सबसे बड़े दानवीर सूर्यपुत्र कर्ण के महान बलिदान की अमर गाथा)

📖 [पाठ का परिचय / भूमिका]
अयं पाठः भासरचितस्य 'कर्णभार' नामकस्य रूपकस्य भागविशेषः। अस्य रूपकस्य कथावस्तु महाभारताद् गृहीतम्। महाभारतयुद्धे कुन्तीपुत्रः कर्णः कौरवपक्षाद् युद्धं करोति। कर्णस्य शरीरेण सम्बद्धं कवचं कुण्डले च तस्य रक्षकौ स्तः। यावत् कवचं कुण्डले च कर्णस्य शरीरे वर्तेते तावत् न कोऽपि कर्णं हन्तुं प्रभवति। अतएव अर्जुनस्य सहायार्थम् इन्द्रः कपटेन ब्राह्मणरूपधारी कर्णस्य समीपं गच्छति, महतीं भिक्षां च याचते। कर्णः सहर्षं स्वाङ्गभूतं कवचं कुण्डले च ददाति। भासस्य त्रयोदश नाटकानि लभ्यन्ते। तेषु कर्णभारम् अतिसरलं विनीतं च वर्तते।
- 📝 सरल हिंदी अर्थ: यह पाठ महाकवि भास द्वारा रचित 'कर्णभार' नामक नाटक (रूपक) का एक विशेष भाग है। इस नाटक की कहानी प्रसिद्ध ग्रंथ 'महाभारत' से ली गई है। महाभारत के युद्ध में कुंतीपुत्र कर्ण अपने सगे भाइयों (पांडवों) को छोड़कर दुर्योधन की तरफ से यानी कौरव पक्ष से युद्ध करते हैं। कर्ण के शरीर के साथ ही जन्म से जुड़े कवच और कुंडल उनके सबसे बड़े रक्षक हैं। जब तक वे दोनों कर्ण के शरीर पर रहेंगे, तब तक ब्रह्मांड में कोई भी कर्ण को मार नहीं सकता। इसलिए, अर्जुन की मदद करने के लिए देवताओं के राजा इन्द्र कपट (धोखे) से ब्राह्मण का रूप धारण करके कर्ण के पास जाते हैं और बहुत बड़ी भिक्षा मांगते हैं। महादानी कर्ण खुशी-खुशी अपने शरीर के हिस्से (अंगभूत) उस कवच और कुंडल को काटकर दान कर देते हैं। महाकवि भास के १३ नाटक मिलते हैं, जिनमें 'कर्णभार' सबसे सरल और बहुत ही सुंदर नाटक है।
🏛️ 🎭 [दृश्य 1: ब्राह्मण रूप में इंद्र का प्रवेश और कर्ण का स्वागत]
(ततः प्रविशति ब्राह्मणरूपेण शक्रः)शक्रः — भो मेघाः! सूर्यमिव निवर्त्य गच्छन्तु भवन्तः। (कर्णमुपगम्य) भो कर्ण! महतरां भिक्षां याचे।कर्णः — दृढं प्रीतोऽस्मि भगवन्! कर्णो भवन्तमहमेष नमस्करोमि।शक्रः — (स्वगतम्) किमु न खलु वक्तव्यम्? यदि दीर्घायुर्भवेति वक्ष्ये, दीर्घायुर्भविष्यति। यदि न वक्ष्ये, मूढ इति मां परिभवति। तस्मादुभयं परिहृत्य किं नु खलु वक्ष्यामि? (प्रकाशम्) भो कर्ण! सूर्य इव, चन्द्र इव, हिमवानिव, सागर इव यषस्ते तिष्ठतु।कर्णः — भगवन्! किमर्थं न वक्तव्यं 'दीर्घायुर्भवेति'? अथवा एतदेव शोभनम्, यतः —धर्मो हि यत्नैः पुरुषेण साध्यो, भुजङ्गजिह्वाचपला नृपश्रियः।तस्मात्प्रजापालनमात्रबुद्ध्या, हतेषु देहेषु गुणा धरन्ते ॥भगवन्! किमिच्छसि? किं मह्यं प्रदीयताम्?
- 📝 सरल हिंदी अर्थ: (ब्राह्मण का रूप धारण करके इन्द्र—जिन्हें 'शक्र' भी कहा जाता है, का प्रवेश होता है) इन्द्र (शक्र): "ओ बादलों! तुम सब सूर्य की तरफ़ लौट जाओ (ताकि मैं कर्ण से अकेले में बात कर सकूँ)।" (कर्ण के पास जाकर) "ओ कर्ण! मैं तुमसे बहुत बड़ी भिक्षा मांगता हूँ।" कर्ण: "भगवन! आपको देखकर मेरा मन बहुत प्रसन्न हुआ। मैं कर्ण आपको सादर प्रणाम (नमस्कार) करता हूँ।" इन्द्र: (अपने मन में/स्वगतम्) "अरे! अब मुझे इसके जवाब में क्या आशीर्वाद देना चाहिए? अगर मैं कहूँगा कि 'दीर्घायु भव' (लंबी उम्र वाले बनो), तो यह सचमुच लंबी उम्र पा जाएगा और महाभारत के युद्ध में अर्जुन इसे मार नहीं पाएगा। और अगर मैं कोई आशीर्वाद नहीं दूँगा, तो यह मुझे मूर्ख और घमंडी समझेगा। तो फिर इन दोनों बातों को छोड़कर मैं इसे क्या आशीर्वाद दूँ?" (सामने आकर/प्रकाशम्) "हे कर्ण! सूर्य की तरह, चंद्रमा की तरह, हिमालय की तरह और विशाल समुद्र की तरह तुम्हारा यश (नाम) हमेशा अमर रहे।" कर्ण: "भगवन! आपने मुझे लंबी उम्र का आशीर्वाद क्यों नहीं दिया? वैसे आपका यह यश वाला आशीर्वाद ही सबसे सुंदर है, क्योंकि शास्त्रों में कहा गया है— मनुष्य को हमेशा मेहनत से धर्म और अच्छे कर्मों को कमाना चाहिए, क्योंकि राजाओं की धन-दौलत और राजपाठ तो सांप की जीभ (भुजङ्गजिह्वा) की तरह चंचल और अस्थिर होते हैं। इसलिए जब यह नश्वर शरीर नष्ट भी हो जाता है, तब भी मनुष्य के द्वारा किए गए अच्छे गुण और उसका यश हमेशा जिंदा रहते हैं। हे भगवन! बताइए आपकी क्या इच्छा है? मैं आपको दान में क्या दूँ?"
🐄 🐎 [दृश्य 2: कर्ण द्वारा दान के बड़े-बड़े प्रस्ताव और इंद्र का मना करना]
शक्रः — महतरां भिक्षां याचे।कर्णः — महतरां भिक्षां भवते प्रदास्ये। सालङ्कारं गोसहस्रं ददामि।शक्रः — गोसहस्रमिति? मुहूर्त्तकं क्षीरं पिबामि। नेच्छामि कर्ण! न इच्छामि।कर्णः — किं नेच्छति भवान्? इदमपि श्रूयताम्। बहुसहस्रं वाजिनां ददामि।शक्रः — अश्वमिति? मुहूर्त्तकमारोहामि। नेच्छामि कर्ण! न इच्छामि।कर्णः — किं नेच्छति भवान्? अन्यदपि श्रूयताम्। वारणानों अनेकमूहं ददामि।शक्रः — गजमिति? मुहूर्त्तकमारोहामि। नेच्छामि कर्ण! न इच्छामि।कर्णः — किं नेच्छति भवान्? अन्यदपि श्रूयताम्। अपर्याप्तं कनकं (सुवर्ण) ददामि।शक्रः — (गृहीत्वा गच्छामि - इति किञ्चिद् गत्वा) नेच्छामि कर्ण! न इच्छामि।कर्णः — तेन हि जित्वा पृथिवीं ददामि।शक्रः — पृथिव्या किं करिष्यामि?कर्णः — तेन हि अग्निष्टोमफलं ददामि।शक्रः — अग्निष्टोमफलेन किं कार्यम्?कर्णः — तेन हि मच्छिरो ददामि।शक्रः — अविहा! अविहा! (अशुभं न भवतु)
- 📝 सरल हिंदी अर्थ:इन्द्र: "मैं बहुत बड़ी भिक्षा मांगता हूँ।" कर्ण: "मैं आपको बहुत बड़ी भिक्षा ही दूँगा। मैं आपको गहनों से सजी हुई एक हज़ार गाएँ (गोसहस्रम्) दान में देता हूँ।" इन्द्र: "एक हज़ार गाएँ? अरे, इनका दूध तो मैं बस थोड़ी देर (मुहूर्त्तकम्) ही पी पाऊँगा। मुझे यह नहीं चाहिए कर्ण! मुझे नहीं चाहिए।" कर्ण: "क्या आपको यह नहीं चाहिए? तो फिर यह सुनिए, मैं आपको हज़ारों उत्तम नस्ल के घोड़े (वाजिनाम्/अश्व) दान में देता हूँ।" इन्द्र: "घोड़े? इन पर तो मैं बस थोड़ी देर ही सवारी कर पाऊँगा। मुझे यह भी नहीं चाहिए कर्ण!" कर्ण: "यह भी नहीं चाहिए? तो और सुनिए, मैं आपको हाथियों का एक बहुत बड़ा झुंड (वारणानम्/गज) दान में देता हूँ।" इन्द्र: "हाथी? इन पर भी मैं थोड़ी देर ही बैठ पाऊँगा। मुझे यह भी नहीं चाहिए।" कर्ण: "तो फिर मैं आपको असीमित सोना (कनकम्/सुवर्ण) दान देता हूँ।" इन्द्र: (सोना लेकर जाने का नाटक करते हुए थोड़ी दूर जाकर रुकते हैं) "नहीं-नहीं, मुझे यह सोना भी नहीं चाहिए कर्ण!" कर्ण: "तो फिर मैं युद्ध में पूरी पृथ्वी को जीतकर (जित्वा पृथिवीम्) आपको उसका राजा बना देता हूँ।" इन्द्र: "मैं पूरी पृथ्वी का भला क्या करूँगा?" कर्ण: "तो फिर मैं आपको अपने सभी यज्ञों का पुण्य फल (अग्निष्टोम फल) दान देता हूँ।" इन्द्र: "यज्ञ के फल से मेरा क्या काम?" कर्ण: "तो फिर (अगर आपको कुछ भी पसंद नहीं आ रहा) मैं अपनी तलवार से अपना सिर काट कर (मच्छिरो ददामि) आपके चरणों में अर्पित करता हूँ।" इन्द्र: (घबराकर) "अरे नहीं-नहीं! ऐसा अशुभ मत कहो! ऐसा मत करो!"
🛡️ 💎 [दृश्य 3: कवच और कुंडल का महादान]
कर्णः — न भेतव्यं, न भेतव्यम्। प्रसीदतु भवान्। अन्यदपि श्रूयताम् —अङ्गैः सहैव जनितं मम देहरक्षा, देवासुरैरपि न भेद्यमिदं सहस्रैः।देयं तथापि कवचं सह कुण्डलाभ्याम्, प्रीत्या मया भगवते रुचितं यदि स्यात् ॥शक्रः — (सहर्षम्) ददातु, ददातु।कर्णः — (स्वगतम्) एष एवास्य कामः। किं नु खलु वैकपटबुद्धेः कृष्णस्योपायः? सोऽपि भवतु। धिगुक्तमनुशोचितुम्। नास्ति संशयः। (प्रकाशम्) गृह्यताम्।शल्यः — अङ्गराज! न दातव्यं, न दातव्यम्।कर्णः — शल्यराज! मा निवारय। पश्य —शिक्षा क्षयं गच्छति कालपर्ययात्, सुबद्धमूला निपतन्ति पादपाः।जलं जलस्थानगतं च शुष्यति, हुतं च दत्तं च तथैव तिष्ठति ॥(तस्माद् गृह्यताम् — इति कवचं कुण्डले च ककृत्त्वा ददाति)
- 📝 सरल हिंदी अर्थ:कर्ण: "आप डरिए मत, डरिए मत (न भेतव्यम्)। प्रसन्न हो जाइए। अब मेरी सबसे अनमोल वस्तु के बारे में सुनिए— मेरे अंगों के साथ ही पैदा हुआ, मेरे इस शरीर की रक्षा करने वाला यह कवच और कुंडल, जिसे हज़ारों देवता और राक्षस मिलकर भी कभी भेद नहीं सकते; यदि आपको यही पसंद है, तो मैं बड़े प्रेम (प्रीत्या) से अपना यह कवच और कुंडल आपको दान में सौंपता हूँ।" इन्द्र: (खुशी से झूम उठते हैं और अपना असली रूप छुपा नहीं पाते) "दे दो! दे दो! मुझे यही चाहिए!" कर्ण: (अपने मन में/स्वगतम्) "ओह! तो असल में यही इसकी मुख्य इच्छा और चाल थी। निश्चित ही यह सब उस चतुर और कपटी कृष्ण की कोई बड़ी योजना (उपाय) है। खैर, जो भी हो। अब दान का फैसला करने के बाद पछताना (अनुशोचितुम्) ठीक नहीं है। इसमें कोई शक नहीं है कि मुझे दान देना ही है।" (सामने आकर) "ठीक है भगवन, इसे ग्रहण कीजिए।" शल्यराज (कर्ण के सारथी और मित्र): "अंगराज कर्ण! रुक जाइए! यह दान मत दीजिए, मत दीजिए! (क्योंकि इसके बिना आप युद्ध में मारे जाएंगे)।" कर्ण: "मित्र शल्यराज! मुझे मत रोको। ज़रा इस संसार के अटल सत्य को देखो— समय बीतने के साथ (कालपर्ययात्) बड़े से बड़ा ज्ञान और शिक्षा भी नष्ट हो जाती है। बहुत मज़बूत जड़ वाले विशाल पेड़ भी एक दिन जमीन पर गिर जाते हैं। जलाशयों और तालाबों में भरा हुआ पानी भी समय के साथ सूख जाता है। लेकिन, मनुष्य के द्वारा अग्नि में किया गया हवन (हुतम्) और सच्चे दिल से दिया गया दान (दत्तम्) इतिहास में हमेशा अमर और जीवंत रहते हैं। इसलिए हे ब्राह्मण देव, इसे ग्रहण कीजिए।" (ऐसा कहकर कर्ण ने बिना दर्द की परवाह किए अपने शरीर से उस जन्मजात कवच और कुंडल को काटकर इंद्र के हाथों में सौंप दिया)।
🎯 पाठ का मुख्य संदेश (Conclusion):
यह अमर नाटक हमें सिखाता है कि दुनिया में सब कुछ (धन, ताकत, जवानी, यहाँ तक कि प्रकृति भी) समय के साथ नष्ट हो जाती है। लेकिन, हमारे द्वारा किया गया 'त्याग' और 'दान' इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए अमर हो जाता है। दानवीर कर्ण जानते थे कि सामने साक्षात इंद्र छल करने आए हैं, फिर भी उन्होंने अपने प्राणों की चिंता न करके 'दानवीरता' के अपने धर्म को निभाया।
📝 अभ्यास के कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न (BSEB Board Special):
- प्रश्न 1. कर्ण के रक्षक कौन थे और उनकी क्या विशेषता थी?
- उत्तर: कर्ण के रक्षक उनके जन्मजात कवच और कुंडल थे। उनकी विशेषता यह थी कि जब तक वे कर्ण के शरीर पर रहते, तब तक कोई भी देवता या असुर कर्ण को मार नहीं सकता था।
- प्रश्न 2. इन्द्र ने कर्ण से छल क्यों किया और उन्होंने क्या आशीर्वाद दिया?
- उत्तर: इन्द्र ने अपने पुत्र अर्जुन की मदद करने के लिए ब्राह्मण का रूप धरकर कर्ण से छल किया ताकि वे उसका कवच-कुंडल ले सकें। उन्होंने कर्ण को 'दीर्घायु भव' के स्थान पर 'सूर्य और चंद्र की तरह यश अमर रहे' का आशीर्वाद दिया।
- प्रश्न 3. कर्ण के अनुसार समय बीतने पर क्या-क्या नष्ट हो जाता है और क्या अमर रहता है?
- उत्तर: कर्ण के अनुसार समय बीतने पर शिक्षा नष्ट हो जाती है, बड़े-बड़े पेड़ गिर जाते हैं और तालाबों का पानी सूख जाता है। लेकिन, मनुष्य द्वारा किया गया हवन और दिया गया दान हमेशा अमर रहता है।
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