🕊️ त्रयोदशः पाठः : विश्वशान्तिः 🌍
(संसार में अशांति के कारण और विश्व शांति का महामंत्र)

📖 [पाठ का परिचय / भूमिका]
[पाठेऽस्मिन् संसारे वर्तमानस्य अशान्तिवातावरणस्य चित्रणं तत्समाधानोपायश्च निरूपितौ। देशेषु आन्तरिकी वाह्या च अशान्तिः वर्तते। तामुपेक्ष्य न कश्चित् स्वजीवनं नेतुं समर्थः। सेयम् अशान्तिः सार्वभौमिकी वर्तते इति दुःखस्य विषयः। सर्वे जनाः तया अशान्त्या चिन्तिताः सन्ति। संसारे तन्निवारणाय प्रयासाः क्रियन्ते।]
- 📝 सरल हिंदी अर्थ: इस पाठ में आज के संसार में फैले अशांति के माहौल (अशान्ति वातावरण) का चित्रण और उसे दूर करने के उपायों (समाधान) का वर्णन किया गया है। आजकल लगभग सभी देशों में आंतरिक (घर के अंदर का झगड़ा) और बाहरी अशांति बनी हुई है। इसे नज़रअंदाज़ (उपेक्षा) करके कोई भी मनुष्य अपना जीवन आराम से नहीं बिता सकता। यह अशांति पूरी दुनिया में फैली हुई है (सार्वभौमिकी है), जो बहुत ही दुख की बात है। संसार के सभी लोग इस अशांति से बहुत चिंतित हैं। पूरी दुनिया में इसे दूर करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
⛈️ [भाग 1: अशांति का समुद्र और मानवता का डर]
वर्त्तमाने संसारे प्रायशः सर्वेषु देशेषु उपद्रवः अशान्तिर्वा दृश्यते। क्वचिदेव शान्तं वातावरणं वर्तते। क्वचित् देशस्य आन्तरिकी समस्यामाश्रित्य कलहो वर्तते, तेन शत्रुराज्यानि मोदमानानि कलहं वर्धयन्ति। क्वचित् अनेकेषु राज्येषु परस्परं शीतयुद्धं प्रचलति। वस्तुतः संसारः अशान्तिसागरस्य कूलमध्यासीनो दृश्यते। अशान्तिश्च मानवताविनाशाय कल्पते। अद्य विश्वविध्वंसकान्यस्त्राणि बहून्याविष्कृतानि सन्ति। तैरेव मानवतानाशस्य भयम्।
- 📝 सरल हिंदी अर्थ: आज के संसार में लगभग सभी देशों में कोई न कोई उपद्रव (दंगा) या अशांति दिखाई देती है। बहुत कम जगहों पर शांत माहौल है। कहीं-कहीं देश की अंदरूनी समस्याओं (आंतरिक कलह) के कारण झगड़े हो रहे हैं, जिन्हें देखकर दुश्मन देश (शत्रुराज्यानि) बहुत खुश होते हैं और उस झगड़े को और ज़्यादा बढ़ाते हैं। कहीं बहुत से देशों के बीच आपस में शीतयुद्ध (Cold War) चल रहा है। सच कहा जाए तो, आज यह पूरा संसार अशांति के समंदर के किनारे बैठा हुआ दिखाई दे रहा है। यह अशांति पूरी मानवता के विनाश का कारण बन रही है। आज दुनिया को नष्ट करने वाले बहुत से परमाणु बम और विनाशकारी हथियार (विश्वविध्वंसकानि अस्त्राणि) बन चुके हैं, जिनसे पूरी मानव जाति के खत्म होने का डर बना हुआ है।
🐍 [भाग 2: अशांति के दो सबसे बड़े कारण — द्वेष और असहिष्णुता]
अशान्तेः कारणं तस्याः निवारणोपायश्च सावधानतया चिन्तनीयौ। कारणे ज्ञाते निवारणस्य उपायोऽपि ज्ञायते इति नीतिः। वस्तुतः द्वेषः असहिष्णुता च अशान्तेः कारणद्वयम्। एको देशः अपरस्य उत्कर्षं दृष्ट्वा द्वेष्टि, तस्य देशस्य उत्कर्षनाशाय निरन्तरं प्रयतते। द्वेषः एव असहिष्णुतां जनयति। इमौ दोषौ परस्परं वैरमुत्पादयतः। स्वार्थश्च वैरं प्रवर्धयति।
- 📝 सरल हिंदी अर्थ: अशांति का असली कारण क्या है और उसे दूर करने का क्या उपाय है, इस पर बहुत ध्यान से सोचने की जरूरत है। नीति कहती है कि— "यदि बीमारी का कारण पता चल जाए, तो उसका इलाज (निवारण) भी आसानी से मिल जाता है।" वास्तव में, 'द्वेष' (जलन) और 'असहिष्णुता' (भेदभाव/बर्दाश्त न करना) ही अशांति के दो सबसे बड़े कारण हैं। आज एक देश दूसरे देश की तरक्की (उत्कर्ष) को देखकर जलता है, और उसकी तरक्की को बर्बाद करने के लिए दिन-रात कोशिश करता रहता है। यही जलन (द्वेष) समाज में असहिष्णुता को जन्म देती है। ये दोनों बुराइयाँ आपस में दुश्मनी (वैर) पैदा करती हैं और मनुष्य का स्वार्थ इस दुश्मनी को और हवा देता है।
🧠 [भाग 3: स्वार्थ का त्याग और महापुरुषों का कर्तव्य]
स्वार्थप्रेरितो जनः अहंभावेन परस्य धर्मं जाति सम्पत्ति क्षेत्रं भाषां वा न सहते। आत्मन एव सर्वमुत्कृष्टमिति मन्यते। राजनीतिज्ञाश्च अत्र विशेषेण प्रेरकाः। सामान्यो जनः न तथा विश्वसन्नपि बलेन प्रेरितो जायते। स्वार्थोपदेशः बलपूर्वकं निवारणीयः। परोपकारं प्रति यदि प्रवृत्तिः उत्पाद्यते तदा सर्वे स्वार्थं त्यजेयुः। अत्र महापुरुषाः विद्वांसः चिन्तकाश्च न विरलाः सन्ति। तेषां कर्तव्यमिदं यत् जने-जने, समाजे-समाजे, राज्ये-राज्ये च परमार्थ वृत्ति जनयेयुः।
- 📝 सरल हिंदी अर्थ: स्वार्थ में अंधा व्यक्ति घमंड (अहंभावेन) के कारण दूसरों के मज़हब (धर्म), उनकी जाति, उनकी धन-दौलत, उनके क्षेत्र या उनकी भाषा को बर्दाश्त नहीं कर पाता। वह सोचता है कि जो कुछ मेरा है, बस वही सबसे बेस्ट (उत्कृष्ट) है। इसमें कुछ चालाक राजनेता (राजनीतिज्ञाः) आग में घी डालने का काम करते हैं। आम जनता (सामान्य जन) इस पर विश्वास नहीं करना चाहती, फिर भी उसे जबरदस्ती इस रास्ते पर धकेल दिया जाता है। ऐसे स्वार्थ के उपदेशों को हर हाल में रोकना होगा। यदि हमारे दिलों में दूसरों की भलाई (परोपकार) की भावना जगाई जाए, तो सब लोग अपना स्वार्थ छोड़ देंगे। हमारे समाज में महान पुरुषों, विद्वानों और विचारकों की कोई कमी नहीं है। उनका यह कर्तव्य है कि वे हर एक व्यक्ति, हर एक समाज और हर एक राज्य के बीच 'परमार्थ' (सबका भला करने) की सुंदर भावना जगाएं।
🤝 [भाग 4: "वसुधैव कुटुम्बकम्" का महामंत्र]
शुष्कः उपदेशश्च न पर्याप्तः, प्रत्युत तस्य कार्यान्वयनञ्च जीवनेऽनिवार्यम्। उक्तञ्च — ज्ञानं भारः क्रियां विना। देशानां मध्ये च विवादान् शमयितुमेव संयुक्तराष्ट्रसंघप्रभृतयः संस्थाः सन्ति। ताश्च काले-काले आशङ्कितमपि विश्वयुद्धं निवारयन्ति। भगवान् बुद्धः पुराकाले एव वैरेण वैरस्य शमनम् असम्भवं प्रोक्तवान्। अवैरेण करुणया मैत्रीभावेन च वैरस्य शान्तिः भवतीति सर्वे मन्यन्ते। भारतीयाः नीतिकाराः सत्यमेव उद्घोषयन्ति —अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥परपीडनम् आत्मनाशाय जायते, परोपकारश्च शान्तिकारणं भवति। अद्यापि परस्य देशस्य संकटकाले अन्ये देशाः सहायताराशिं सामग्रीं च प्रेषयन्ति इति विश्वशान्तेः सूर्योदयो दृश्यते।
- 📝 सरल हिंदी अर्थ: केवल कोरी और सूखी बातें (शुष्क उपदेश) कर देना ही काफी नहीं है, बल्कि उन अच्छी बातों को अपने जीवन में लागू करना (कार्यान्वयन) बहुत ज़रूरी है। जैसा कि कहा भी गया है— "ज्ञानं भारः क्रियां विना" (बिना उपयोग के ज्ञान केवल एक भारी बोझ के समान होता है)। अलग-अलग देशों के बीच के झगड़ों को शांत करने के लिए ही संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) जैसी बड़ी संस्थाएँ बनी हैं, जो समय-समय पर होने वाले विश्व युद्ध के खतरों को टालती हैं। प्राचीन काल में ही भगवान बुद्ध ने बहुत ही सुंदर बात कही थी कि— "दुश्मनी को दुश्मनी से (वैरेण वैरस्य) कभी खत्म नहीं किया जा सकता।" दुश्मनी केवल दोस्ती (मैत्रीभाव), करुणा और बिना किसी बैर के ही शांत हो सकती है। हमारे भारत के नीतिशास्त्रों में बिल्कुल सच कहा गया है— "यह मेरा है और वह पराया है, ऐसी छोटी सोच (गणना) तो केवल संकुचित और नीच बुद्धि वाले लोग (लघुचेतसाम्) करते हैं। जो विशाल दिल वाले और उदार चरित्र के लोग होते हैं, उनके लिए तो यह पूरी धरती ही उनका अपना परिवार (वसुधैव कुटुम्बकम्) होती है।" दूसरों को दुख पहुँचाना (परपीडनम्) खुद को नष्ट करने के बराबर है, और दूसरों की मदद करना (परोपकार) ही सच्ची शांति का कारण है। आज भी जब किसी देश पर कोई विपत्ति या संकट आता है, तो दूसरे देश मदद के लिए हाथ बढ़ाते हैं, दवाइयाँ और पैसे भेजते हैं; यही हमारे विश्व में सुख और शांति का असली सूर्योदय है।
📝 अभ्यास के कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न (BSEB Board Special):
- प्रश्न 1. विश्व में अशांति के दो मुख्य कारण कौन से हैं?
- उत्तर: पाठ के अनुसार 'द्वेष' (दूसरों की तरक्की से जलना) और 'असहिष्णुता' (एक-दूसरे के प्रति सहनशीलता न होना) ही विश्व में अशांति के दो मुख्य कारण हैं。
- प्रश्न 2. भगवान बुद्ध ने वैर (दुश्मनी) के शमन के विषय में क्या कहा था?
- उत्तर: भगवान बुद्ध ने कहा था कि दुश्मनी को दुश्मनी (वैर) से कभी शांत नहीं किया जा सकता। दुश्मनी केवल बिना किसी बैर (अवैर), करुणा और मित्रता की भावना से ही शांत हो सकती है।
- प्रश्न 3. "अयं निजः परो वेति…" श्लोक का क्या अर्थ है?
- उत्तर: इस श्लोक का अर्थ है कि "यह मेरा है और वह पराया है, ऐसी सोच छोटे दिल (नीच बुद्धि) वाले लोगों की होती है। जो उदार और बड़े दिल वाले होते हैं, उनके लिए तो पूरी दुनिया ही एक परिवार (वसुधैव कुटुम्बकम्) जैसी होती है।"
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