😴 तृतीयः पाठः : अलसकथा 🍲
(चार महा-आलसियों और परोपकारी मंत्री वीरेश्वर की मज़ेदार कहानी)

📖 [पाठ का परिचय / भूमिका]
अयं पाठः विद्यापतिकृतस्य 'पुरुषपरीक्षा' इति नामकरूय कथाग्रन्थस्य अंशविशेषो वर्तते। 'पुरुषपरीक्षा' सरलसंस्कृतभाषायां कथाकूपेन विविधानां मानवगुणानां महत्त्वं वर्णयति दोषाणां च निराकरणाय शिक्षां ददाति। विद्यापतिः लोकप्रियः मैथिलीकविः आसीत्। अपि च बहूनां संस्कृतग्रन्थानां निर्माताऽपि विद्यापतिरासीत् इति तस्य वैशिष्ट्यं संस्कृतविषयेऽपि प्रभूतमस्ति। प्रस्तुते पाठे आलस्यनामकस्य दोषस्य निरूपणे व्यङ्ग्यात्मिका कथा प्रस्तुता वर्तते। नीतिकाराः आलस्यं रिपुरूपं मन्यन्ते।
- 📝 सरल हिंदी अर्थ: यह पाठ प्रसिद्ध मैथिल कवि विद्यापति द्वारा रचित 'पुरुषपरीक्षा' नामक कथाग्रन्थ का एक विशेष हिस्सा (अंश) है। 'पुरुषपरीक्षा' सरल संस्कृत भाषा में कहानियों के माध्यम से इंसानी गुणों के महत्व को सिखाती है और हमारे दोषों (बुराइयों) को दूर करने की सीख देती है। विद्यापति एक बहुत ही लोकप्रिय मैथिली कवि थे। इसके साथ ही वे संस्कृत के बहुत सारे ग्रंथों के रचयिता भी थे, और यही उनकी सबसे बड़ी खासियत है। इस पाठ में 'आलस' (आलस्य) नाम के सबसे खतरनाक दोष को एक व्यंग्यात्मक कहानी के रूप में पेश किया गया है। हमारे नीतिशास्त्रों में आलस को मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन (रिपुः) माना गया है।
🏛️ [भाग 1: मिथिला के मंत्री वीरेश्वर की उदारता]
आसीन्मिथिलायां वीरेश्वरो नाम मन्त्री। स च स्वभावतो दानशीलः कारुणिकश्च सर्वेभ्यो दुर्गतेभ्योऽनाथेभ्यश्च प्रत्यहमिच्छाभोजनं दापयति स्म। तन्मध्येऽलसेभ्योऽप्यन्नवस्त्रे दापयति। यतः —
"निरगतीनां च सर्वेषामलसः प्रथमो मतः।
किञ्चिन्न क्षमते कर्तुं जाठरेणापि वह्निना॥"
- 📝 सरल हिंदी अर्थ: मिथिला नगरी में वीरेश्वर नाम के एक मंत्री थे। वे स्वभाव से बहुत ही दान करने वाले (दानशील) और परोपकारी (कारुणिक) थे। वे सभी बेसहारा, संकटग्रस्त लोगों और अनाथों को हर रोज़ (प्रत्यहम्) उनकी इच्छा के अनुसार मुफ्त भोजन और वस्त्र दान करते थे। इसी दान के क्रम में वे आलसियों (अलसेभ्यः) को भी भोजन और कपड़े देते थे। क्योंकि उनका मानना था— "दुनिया के सभी लाचार, दुखी और असहाय लोगों में आलसियों का स्थान सबसे पहला होता है, क्योंकि एक आलसी व्यक्ति पेट की आग (भूख) सह लेगा, लेकिन पेट भरने के लिए खुद से मेहनत का कोई काम कभी नहीं कर सकता।"
🍲 [भाग 2: बनावटी आलसियों (धूर्तों) की भारी भीड़]
ततोऽलसपुरुषाणां तत्रेष्टलाभं श्रुत्वा बहवस्तुन्दपरिमृजास्तत्र वर्गुलीबभूवुः। यतः —"स्थितिः सौकर्यमूला हि सर्वेषामपि संहते।सजातीनां सुखं दृष्ट्वा के न धावन्ति जन्तवः॥"पश्चादलसानां सुखं दृष्ट्वा धूर्ता अपि कृत्रिमालस्यं दर्शयित्वा भोजनं गृह्णन्ति।
- 📝 सरल हिंदी अर्थ: जब लोगों को पता चला कि आलसियों को वहाँ बिना कुछ काम किए मुफ्त में अपनी मनपसंद चीजें और स्वादिष्ट भोजन मिल रहा है, तो बहुत से तोंद बढ़ाने वाले (कामचोर) लोग भी वहाँ इकट्ठे होने लगे। क्योंकि नीति कहती है— "सुविधाजनक और आरामदायक स्थिति तो सभी जीवों को अपनी तरफ खींचती है। अपनी ही जाति (सजातीनां) के लोगों को सुख-सुविधा में देखकर भला कौन सा जीव उस तरफ दौड़कर नहीं जाता? (अर्थात् सब जाते हैं)।" आगे चलकर आलसियों के इस मुफ्त के सुख को देखकर बहुत से चालाक और धूर्त लोग भी बनावटी आलस (कृत्रिम आलस्य) का नाटक करके मुफ्त का भोजन करने लगे।
🔥 [भाग 3: परीक्षा की योजना - साला (घर) में आग लगाना]
तदनन्तरमलसशालायां विपुलं व्ययं दृष्ट्वा तन्नियोगिपुरुषैः परामृष्टम् — 'यद् सक्षमबुद्ध्या करुणया केवलमलसेभ्यः स्वामी वस्तूनि दापयति कपटेनालसा अपि गृह्णन्ति इत्यस्माकं प्रमादः। यदि भवति तर्दा लसपुरुषाणां परीक्षां कुर्मः' इति परामृश्य प्रसुप्तेषु अलसशालायां तन्नियोगिपुरुषा वह्निं दापयित्वा निरूपयामासुः।
- 📝 सरल हिंदी अर्थ: इसके बाद आलसियों के उस निवास स्थान (अलसशाला) में बहुत भारी खर्च (विपुलं व्ययम्) देखकर वहाँ के राजकर्मचारियों (नियोगिपुरुषैः) ने आपस में विचार-विमर्श किया— "हमारे दयालु मंत्री महोदय तो केवल लाचार और असली आलसियों को दान देना चाहते हैं, लेकिन यहाँ तो कपटी और चालाक लोग भी आलसी बनकर मुफ्त का माल उड़ा रहे हैं। यह हमारे प्रबंधन की बहुत बड़ी लापरवाही (प्रमादः) है। इसलिए, यदि ऐसा है तो क्यों न हम असली आलसी पुरुषों की परीक्षा (अलसपरीक्षा) लें।" ऐसा सोचकर, जब दोपहर में सभी आलसी आराम से सो रहे थे, तब कर्मचारियों ने उस अलसशाला (आलसियों के घर) में आग लगा दी और छिपकर देखने लगे।
🏃♂️ [भाग 4: धूर्तों का भागना और चार असली आलसी]
ततो गृहलग्गं प्रवृद्धमग्निं दृष्ट्वा धूर्ताः सर्वे पलायिताः। पश्चादीषदलसा अपि पलायिताः। चत्वारः पुरुषास्तत्रैव प्रसुप्ताः परस्परमालपन्ति।एकेन वस्त्रावृतमुखेनोक्तम् — 'अहो, कथं अयं कोलाहलः?'द्वितीयेनोक्तम् — 'तर्क्यते यदस्मिन् गृहे अग्निर्लग्नोऽस्ति।'तृतीयेनोक्तम् — 'कोऽपि तथा धार्मिको नास्ति, य इदानीं जलाद्रैर्वासोभिः कटैर्वा अस्मान् प्रावृणोति।'चतुर्थेनोक्तम् — 'अये वाचालाः! कति वचनानि वक्तुं शक्नुथ? तूष्णीं कथं न तिष्ठथ?'
- 📝 सरल हिंदी अर्थ: घर में आग की भयानक लपटों को बढ़ता हुआ देखकर जितने भी नकली और धूर्त आलसी थे, वे सब अपनी जान बचाकर सबसे पहले भाग खड़े हुए (पलायिताः)। उसके बाद जो थोड़े-बहुत आलसी थे, वे भी भाग गए। लेकिन, उस भीषण आग के बीच भी चार परम आलसी पुरुष वहीं चादर ओढ़कर सोए रहे और भागने के बजाय आपस में बातचीत करने लगे:
- पहला आलसी (कपड़े से मुँह ढके हुए ही बोला): "अरे! यह कैसा शोरगुल हो रहा है?" 🗣️
- दूसरा आलसी: "लगता है कि इस घर में आग लग गई है।" 🔥
- तीसरा आलसी: "क्या यहाँ कोई ऐसा दयालु और धार्मिक व्यक्ति नहीं है, जो इस समय पानी से भीगे हुए कपड़े या गीली चटाई हमारे ऊपर डाल दे (ताकि आग बुझ जाए)?" 💧
- चौथा आलसी (चिढ़कर बोला): "अरे बड़बोलो (वाचालाः)! कितना बकवास करते हो? चुपचाप (तूष्णीं) क्यों नहीं सो सकते?" 🤫
🛡️ [भाग 5: कर्मचारियों द्वारा रक्षा और अंतिम श्लोक]
ततश्चतुर्णामपि तेषां परस्परं विलापं श्रुत्वा वह्निं च प्रवृद्धमुपरि पतिष्यन्तं दृष्ट्वा नियोगिपुरुषैः वधभयेन चत्वारोऽप्यलसाः केशेष्वाकृष्य गृहाद् बहिः कृताः। पश्चात्तान् विलोक्य तैर्नियोगिभिर पठितम् —
"पतिरेव गतिः स्त्रीणां बालानां जननी गतिः।
नालसानां गतिः काचिल्लोके कारुणिकं विना॥"
पश्चात्तेषु चतुर्ष्वलसेषु ततोऽप्यधिकं वस्तु मन्त्री दापयामास।
- 📝 सरल हिंदी अर्थ: उन चारों की ऐसी बातें (विलाप) सुनकर और आग की लपटों को उनके बिल्कुल ऊपर गिरता हुआ देखकर, राजकर्मचारियों ने सोचा कि अगर इन्हें नहीं निकाला गया तो ये जलकर मर जाएंगे। इसलिए उन कर्मचारियों ने दयावश उन चारों आलसियों के बाल (केश) पकड़कर उन्हें घसीटते हुए उस जलते हुए घर से बाहर निकाला। तब राजकर्मचारियों ने असली आलसियों की पहचान करके यह प्रसिद्ध श्लोक पढ़ा— "स्त्रियों का एकमात्र रक्षक और सहारा उनका पति होता है, बच्चों की रक्षक उनकी माता होती है; लेकिन इस संसार में असली आलसियों का उद्धार करने वाला दयालु (कारुणिक) पुरुषों के अलावा कोई दूसरा नहीं होता।" इसके बाद, मंत्री वीरेश्वर ने उन चारों असली आलसियों को पहले से भी कहीं ज़्यादा सुख-सुविधाएँ और धन-सामग्री दान में दीं।
🎯 पाठ का मुख्य संदेश (Conclusion):
यह कहानी हमें व्यंग्यात्मक तरीके से सिखाती है कि आलस मनुष्य के शरीर में रहने वाला उसका सबसे बड़ा दुश्मन है। एक आलसी व्यक्ति अपने जीवन की रक्षा खुद भी नहीं कर सकता, वह हमेशा दूसरों की दया पर निर्भर रहता है। इसलिए हमें आलस का त्याग करके हमेशा आत्मनिर्भर और कर्मठ बनना चाहिए।
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