👩विदुषी चतुर्थः पाठः : संस्कृतसाहित्ये लेखिकाः 📚
(संस्कृत साहित्य के विकास में महिलाओं और महान लेखिकाओं का अनमोल योगदान)

📖 [पाठ का परिचय / भूमिका]
समाजस्य यानं पुरुषैः नारीभिश्च चलति। साहित्येऽपि उभयोः समानं महत्त्वम्। अधुना सर्वभाषासु साहित्यरचनायां नार्योऽपि तत्पराः सन्ति यशश्च लभन्ते। संस्कृतसाहित्ये प्राचीनकालादेव साहित्यसमृद्धौ योगदानं न्यूनअधिकं प्राप्यते। पाठेऽस्मिन् अतिप्रसिद्धानां लेखिकानामेव चर्चा वर्तते येन साहित्यपूरणे तासां योगदानं ज्ञायेत।
- 📝 सरल हिंदी अर्थ: हमारे इस समाज की गाड़ी पुरुषों और महिलाओं (नारियों) दोनों के सहयोग से चलती है। साहित्य के विकास में भी इन दोनों का एक समान महत्व है। आज के समय में दुनिया की सभी भाषाओं में साहित्य लिखने (रचना करने) में महिलाएँ भी पूरी लगन से लगी हुई हैं और खूब नाम (यश) कमा रही हैं। संस्कृत साहित्य में भी प्राचीन काल से ही इसके विकास और समृद्धि में महिलाओं का योगदान कम या ज़्यादा ज़रूर मिलता आया है। इस पाठ में केवल उन्हीं बहुत प्रसिद्ध लेखिकाओं की चर्चा की गई है, जिससे संस्कृत साहित्य को पूरा करने में उनके महान योगदान को जाना जा सके।
🏛️ [भाग 1: वैदिक काल में ऋषिकाएँ]
विपुलं संस्कृतसाहित्यं विभिन्नैः कविभिः शास्त्रकारैश्च संवर्धितम्। वैदिककालादारभ्य शास्त्राणां काव्यानां च रचने संरक्षणे च यथा पुरुषाः दत्त्वावधानाः अभवन् तथैव नार्योऽपि दत्तावधानाः प्राप्यन्ते। वैदिका युगे मन्त्राणां दर्शकाः न केवलं ऋषयः, अपितु ऋषिकाः अपि सन्ति। ऋग्वेदे चतुर्विंशतिः (२४) अथर्ववेदे च पञ्च (५) ऋषिकाः मन्त्रदर्शनवत्यो निर्दिश्यन्ते। यथा — यमी, अपाला, उर्बशी, इन्द्राणी, वागाम्भृणी इत्यादयः।
- 📝 सरल हिंदी अर्थ: यह विशाल (विपुलम्) संस्कृत साहित्य अलग-अलग कवियों और शास्त्रकारों द्वारा आगे बढ़ाया गया है। वैदिक काल की शुरुआत से ही शास्त्रों और काव्यों को लिखने तथा उनकी रक्षा करने में जिस प्रकार पुरुषों ने पूरा ध्यान (दत्तावधानाः) दिया, ठीक उसी प्रकार महिलाओं का ध्यान भी देखने को मिलता है। वैदिक युग में मंत्रों को रचने वाले या देखने वाले केवल ऋषि ही नहीं थे, बल्कि बहुत सी विदुषी महिलाएँ यानी ऋषिकाएँ भी थीं। हमारे ऋग्वेद में २४ (चतुर्विंशतिः) और अथर्ववेद में ५ (पञ्च) मन्त्रदृष्टा ऋषिकाओं का नाम मिलता है, जिनमें प्रमुख हैं— यमी, अपाला, उर्वशी, इन्द्राणी और वागाम्भृणी आदि।
⚖️ [भाग 2: उपनिषद काल और गार्गी-मैत्रेयी का शास्त्रार्थ]
बृहदारण्यकोपनिषदि याज्ञवल्क्यस्य भार्या मैत्रेयी दार्शनिकरुचिमती वर्णिता, यां याज्ञवल्क्यः आत्मतत्त्वं शिक्षयति। जनकस्य सभायां शास्त्रार्थकुशला गार्गी वाचक्नवी तिष्ठति स्म। लौकिकसंस्कृतसाहित्ये च प्रायेण चत्वारिंशत्कवयित्रीणां सार्धशतं (१५०) पद्यानि स्फुटहूपेण इतस्ततः लभ्यन्ते। तासु विजयाङ्का प्रथमकल्पा वर्तते। सा च श्यामवर्णा आसीदिति पद्येनानेन स्फुटीभवति —"नीलोत्पलदलश्यामां विजयाङ्कां जानता।वृथैव दण्डिना प्रोक्ता 'सर्वशुक्ला सरस्वती'॥"
- 📝 सरल हिंदी अर्थ: 'बृहदारण्यक उपनिषद' में महर्षि याज्ञवल्क्य की पत्नी मैत्रेयी का वर्णन आता है, जिनकी रुचि दर्शनशास्त्र (अध्यात्म) में थी, जिन्हें याज्ञवल्क्य खुद आत्मज्ञान (आत्मतत्त्व) की शिक्षा देते हैं। राजा जनक की राजसभा में शास्त्रों में अत्यंत कुशल विदुषी महिला गार्गी रहती थीं, जो बड़े-बड़े विद्वानों से शास्त्रार्थ करती थीं। अगर हम लौकिक संस्कृत साहित्य की बात करें, तो उसमें लगभग ४० कवयित्रियों के १५० (सार्धशतम्) सुंदर श्लोक इधर-उधर बिखरे हुए मिलते हैं। उन सबमें विजयाङ्का का स्थान सबसे पहला (प्रथमकल्पा) है। वह सांवले रंग (श्यामवर्ण) की थीं, जिसका पता महाकवि दण्डी के इस प्रसिद्ध श्लोक से चलता है— "नीले कमल की पंखुड़ियों की तरह सांवली (नीलोत्पलदलश्यामाम्) उस विजयाङ्का को न जानकर, महाकवि दण्डी ने बेकार में ही (वृथैव) उसे 'सर्वशुक्ला सरस्वती' (सफेद रंग वाली ज्ञान की देवी) कह दिया था।" (अर्थात् विजयाङ्का सांवली होने पर भी साक्षात सरस्वती का रूप थी)।
👑 [भाग 3: चालुक्य और विजयनगर साम्राज्य की महारानियाँ]
तस्याः कालः अष्टमशतकमित्यनुमीयते। चालुक्यवंशस्य राज्ञी विजयभट्टारिका एव 'विजयाङ्का' इति बहवो मन्यन्ते। किञ्च शीलाभट्टारिका, देवकुमारिका, रामभद्राम्बाप्रभृतयो दक्षिणभारतीयाः कवयित्र्यः स्वस्फुटपद्यैः प्रसिद्धाः।विजयनगरराज्यस्य राजानः संस्कृतभाषासंरक्षणाय कृतप्रयासा आसन्निति विदितमेव। तेषामन्तःपुरेऽपि संस्कृतरचनाकुशला राज्ञ्योऽभवन्। कम्पणरायस्य (चतुर्दशशतकम्) राज्ञी गङ्गादेवी 'मधुरावियजम्' इति महाकाव्यं स्वामिनो मदुरैविजयघटनामाश्रित्य अरचयत्। तत्र अलङ्काराणां सन्निवेशो आवर्जको वर्तते। तस्मिन्नेव राज्ये षोडशशतके शासनं कुर्वतः अच्युतरायस्य राज्ञी तिरुमलाम्बा 'वरदाम्बिकापरिणय' नामकम्य प्रौढं चम्पूकाव्यमरचयत्।
- 📝 सरल हिंदी अर्थ: विजयाङ्का का समय आठवीं शताब्दी (अष्टम शतक) माना जाता है। बहुत से विद्वानों का मानना है कि चालुक्य वंश के राजा की पत्नी विजयभट्टारिका ही असल में 'विजयाङ्का' थीं। इसके अलावा दक्षिण भारत की कई अन्य कवयित्रियाँ जैसे— शीलाभट्टारिका, देवकुमारिका और रामभद्राम्बा अपने सुंदर श्लोकों के कारण बहुत प्रसिद्ध हैं। विजयनगर साम्राज्य के राजाओं ने संस्कृत भाषा को बचाने के लिए बहुत बड़े प्रयास किए थे, यह सब जानते हैं। उनके महलों (अन्तःपुर) में भी संस्कृत लिखने में माहिर महारानियाँ (राज्ञी) हुआ करती थीं। १४वीं शताब्दी में राजा कम्पणराय की पत्नी गङ्गादेवी ने अपने पति की मदुरै विजय की ऐतिहासिक घटना पर आधारित 'मधुरावियजम्' नामक बहुत ही शानदार महाकाव्य लिखा। उसी विजयनगर साम्राज्य में १६वीं शताब्दी (षोडश शतक) में शासन करने वाले राजा अच्युतराय की पत्नी महारानी तिरुमलाम्बा ने 'वरदाम्बिकापरिणय' नाम का बहुत ही ऊंचे स्तर का गद्य-पद्य मिश्रित 'चम्पूकाव्य' लिखा, जिसमें संस्कृत के बहुत सुंदर और बड़े-बड़े समासों का प्रयोग किया गया है।
✍️ [भाग 4: आधुनिक काल की विदुषी - पण्डिता क्षमाराव]
आधुनिककाले संस्कृतलेखिकासु 'पण्डिता क्षमाराव' (१८९०-१९५४) नामधेया विदुषी अतीव प्रसिद्धा। तया स्वपितुः शङ्करपाण्डुरङ्गपण्डितस्य महतो विदुषो जीवनचरितं 'शङ्करचरितम्' इति रचितम्। गान्धिदर्शनप्रभाविता सा 'सत्याग्रहगीता', 'मीरालहरी', 'कथामुक्तावली', 'विचित्रपरिषद्यात्रा', 'ग्रामज्योतिः' इत्यादीन् बहून् गद्यपद्यग्रन्थान् प्रणीतवती। सम्प्रति लेखनशिरतासु कवयित्रीषु वनमाला भवालकर-मिथिलेशकुमारी मिश्रप्रभृतयोऽनुदिनं संस्कृतसाहित्यं पूरयन्ति।
- 📝 सरल हिंदी अर्थ: आधुनिक काल (Modern Era) की संस्कृत लेखिकाओं में 'पण्डिता क्षमाराव' नाम की विदुषी महिला सबसे ज़्यादा प्रसिद्ध हैं। उन्होंने अपने पिता और बहुत बड़े विद्वान शंकर पाण्डुरंग पंडित के जीवन पर आधारित 'शङ्करचरितम्' नाम का एक महान जीवन चरित्र ग्रंथ लिखा। पण्डिता क्षमाराव महात्मा गांधी के विचारों (गाँधी दर्शन) से बहुत प्रभावित थीं, इसलिए उन्होंने 'सत्याग्रहगीता', 'मीरालहरी', 'कथामुक्तावली', 'विचित्रपरिषद्यात्रा' और 'ग्रामज्योतिः' जैसे बहुत से गद्य और पद्य ग्रंथों की रचना की। आज के इस वर्तमान समय में भी वनमाला भवालकर और मिथिलेश कुमारी मिश्र जैसी बहुत सी लेखिकाएँ और कवयित्रियाँ रोज़ नया साहित्य लिखकर संस्कृत के इस अनमोल खजाने को पूरा करने में लगी हुई हैं।
📝 अभ्यास के कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न (BSEB Board Special):
- प्रश्न 1. ऋग्वेद और अथर्ववेद में कितनी मन्त्रदृष्टा ऋिकाओं का वर्णन है?
- उत्तर: ऋग्वेद में २४ (चतुर्विंशतिः) और अथर्ववेद में ५ (पञ्च) ऋषिकाओं का वर्णन है।
- प्रश्न 2. विजयाङ्का को 'सर्वशुक्ला सरस्वती' किसने और क्यों कहा है?
- उत्तर: महाकवि दण्डी ने विजयाङ्का को 'सर्वशुक्ला सरस्वती' कहा है, क्योंकि सांवली होने के बाद भी उनकी काव्य रचनाएँ और ज्ञान साक्षात सरस्वती माँ के समान अद्भुत और उच्च कोटि का था।
- प्रश्न 3. आधुनिक काल की सबसे प्रसिद्ध संस्कृत लेखिका कौन हैं और उनकी रचनाएँ क्या हैं?
- उत्तर: आधुनिक काल की सबसे प्रसिद्ध लेखिका पण्डिता क्षमाराव हैं। उनकी मुख्य रचनाएँ 'शङ्करचरितम्', 'सत्याग्रहगीता', 'मीरालहरी' और 'ग्रामज्योतिः' हैं।
🎯 पाठ का मुख्य संदेश (Conclusion):
यह पाठ हमें सिखाता है कि संस्कृत साहित्य केवल पुरुषों के द्वारा नहीं रचा गया है। वेदों के मंत्रों से लेकर आधुनिक उपन्यासों तक, महिलाओं और महारानियों ने अपनी कलम की ताकत से संस्कृत को दुनिया की सबसे समृद्ध और सुंदर भाषा बनाया है।
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