1. वर्चस्व (Hegemony) का क्या अर्थ है?
- परिभाषा: अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में जब कोई एक देश इतना शक्तिशाली हो जाता है कि वह सैन्य, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से पूरी दुनिया को प्रभावित या नियंत्रित करने लगता है, तो इस स्थिति को 'वर्चस्व' (Hegemony) कहा जाता है।
- शुरुआत: 1991 में सोवियत संघ (USSR) के विघटन के बाद दो-ध्रुवीय विश्व समाप्त हो गया और एक-ध्रुवीय विश्व (Unipolar World) का उदय हुआ, जिसका नेतृत्व अमेरिका कर रहा था।
2. नई विश्व व्यवस्था की शुरुआत (The New World Order)
- प्रथम खाड़ी युद्ध (First Gulf War - 1990-1991):
- कारण: अगस्त 1990 में इराक ने अपने पड़ोसी देश कुवैत पर आक्रमण कर उस पर अवैध कब्जा कर लिया। संयुक्त राष्ट्र (UN) ने कुवैत को मुक्त कराने के लिए बल प्रयोग की अनुमति दी।
- ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म (Operation Desert Storm): अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश (सीनियर) ने इस सैन्य अभियान का स्वागत करते हुए इसे 'नई विश्व व्यवस्था' कहा।
- सैन्य बल: 34 देशों की मिली-जुली सेना (6,600,000 सैनिक) ने इराक के खिलाफ युद्ध लड़ा। इस सेना में लगभग 75% सैनिक केवल अमेरिका के थे। इराक इस युद्ध में बुरी तरह हार गया।
- स्मार्ट युद्ध: इस युद्ध को 'कंप्यूटर युद्ध' (Computer War) और 'वीडियो गेम वॉर' भी कहा जाता है क्योंकि अमेरिका ने इसमें बड़े पैमाने पर 'स्मार्ट बमों' का प्रयोग किया और इसका टेलीविजन पर लाइव प्रसारण हुआ।
3. क्लिंटन का दौर (The Clinton Years: 1993 - 2001)
जॉर्ज बुश के बाद डेमोक्रेटिक पार्टी के विली जेफरसन (बिल) क्लिंटन अमेरिका के राष्ट्रपति बने। क्लिंटन ने अपनी विदेश नीति में कठोर सैन्य कदमों के बजाय 'नरम मुद्दों' (जैसे- लोकतंत्र को बढ़ावा, जलवायु परिवर्तन और विश्व व्यापार) पर ध्यान केंद्रित किया। इसके बावजूद उनके कार्यकाल में दो बड़े सैन्य अभियान हुए:
- युगोस्लाविया में नाटो की कार्रवाई (1999): युगोस्लाविया के प्रांत कोसोवो में अल्बेनियाई लोगों के दमन को रोकने के लिए अमेरिका के नेतृत्व में नाटो देशों ने युगोस्लाविया पर दो महीने तक बमबारी की।
- ऑपरेशन इनफाइनाइट रीच (Operation Infinite Reach - 1998): नैरोबी (केन्या) और दारे-सलाम (तंजानिया) में अमेरिकी दूतावासों पर अल-कायदा के आतंकवादी हमलों के जवाब में क्लिंटन ने सूडान और अफगानिस्तान के अल-कायदा ठिकानों पर क्रूज़ मिसाइलों से हमले करवाए।
4. 9/11 की घटना और आतंकवाद के विरुद्ध 'विश्वव्यापी युद्ध'
- घटना (11 सितंबर 2001): अल-कायदा के 19 अपहरणकर्ताओं ने चार अमेरिकी व्यावसायिक विमानों का अपहरण कर लिया।
- दो विमान न्यूयॉर्क स्थित वर्ल्ड ट्रेड सेंटर (World Trade Center) के उत्तरी और दक्षिणी टावरों से टकराए।
- तीसरा विमान वर्जीनिया के आर्लिंगटन स्थित अमेरिकी रक्षा विभाग के मुख्यालय 'पेंटागन' से टकराया।
- चौथा विमान पेनसिल्वेनिया के एक खेत में गिरा (जिसका निशाना अमेरिकी कांग्रेस की इमारत थी)।
- नुकसान: इस आत्मघाती हमले में लगभग 3,000 लोग मारे गए। इसे अमेरिकी इतिहास का सबसे भीषण हमला माना जाता है।
- अमेरिकी प्रतिक्रिया (ऑपरेशन एंड्योरिंग फ्रीडम): राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश (जॉर्ज बुश सीनियर के पुत्र) ने आतंकवाद के खिलाफ 'विश्वव्यापी युद्ध' की घोषणा की। अल-कायदा और अफगानिस्तान के तालिबान शासन को निशाना बनाकर 'ऑपरेशन एंड्योरिंग फ्रीडम' चलाया गया, जिससे तालिबान का पतन हो गया।
5. इराक पर आक्रमण (ऑपरेशन इराकी फ्रीडम - 2003)
- शुरुआत: 19 मार्च 2003 को अमेरिका ने 'ऑपरेशन इराकी फ्रीडम' के तहत इराक पर सैन्य हमला किया।
- अमेरिकी बहाना: अमेरिका का दावा था कि इराक सामूहिक विनाश के हथियार (WMD - Weapons of Mass Destruction) बना रहा है, जो विश्व सुरक्षा के लिए खतरा हैं।
- वास्तविक उद्देश्य: इराक के तेल भंडारों पर नियंत्रण करना और वहाँ अपनी मनपसंद सरकार बनाना।
- परिणाम: संयुक्त राष्ट्र (UN) की अनुमति के बिना किए गए इस हमले में इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाकर फांसी दे दी गई। हालाँकि, इराक में कोई विनाशकारी हथियार नहीं मिले। अमेरिकी सेना को वहाँ के स्थानीय लोगों के भारी विरोध और गुरिल्ला युद्ध का सामना करना पड़ा, जिससे अमेरिका के 3,000 से अधिक सैनिक मारे गए। इसे अमेरिका की एक बड़ी सैन्य व राजनीतिक असफलता माना जाता है।
6. अमेरिकी वर्चस्व के तीन आयाम (Dimensions of US Hegemony)
अमेरिकी वर्चस्व को तीन अलग-अलग रूपों में समझा जा सकता है:
क. सैन्य शक्ति के रूप में वर्चस्व (Hard Power)
- अजेय सेना: अमेरिकी सैन्य क्षमता अनूठी और अचूक है। दुनिया के किसी भी कोने में सटीकता से हमला करने में उसकी सेना सक्षम है।
- विशाल रक्षा बजट: अमेरिका अपनी रक्षा (सेना) पर जितना पैसा खर्च करता है, उतना दुनिया के अगले 12 शक्तिशाली देश मिलकर भी खर्च नहीं करते।
- तकनीकी बढ़त: अमेरिकी सैन्य अनुसंधान और तकनीक दुनिया में सबसे आगे है, जिससे उसकी मारक क्षमता का कोई मुकाबला नहीं है।
ख. ढांचागत शक्ति के रूप में वर्चस्व (Structural Power)
इसका अर्थ है वैश्विक अर्थव्यवस्था को अपने नियमों के अनुसार चलाने की क्षमता:
- वैश्विक सार्वजनिक वस्तुएं (Global Public Goods): ऐसी वस्तुएं जिनका उपयोग सभी करते हैं (जैसे- समुद्री व्यापार मार्ग - SLOCs)। दुनिया के व्यापारिक रास्तों पर अमेरिकी नौसेना का नियंत्रण है।
- इंटरनेट: इंटरनेट अमेरिकी सैन्य अनुसंधान परियोजना (DARPA) की ही देन है। आज भी इंटरनेट के मुख्य सर्वर और उपग्रहों पर अमेरिकी कंपनियों का दबदबा है।
- एमबीए (MBA) की डिग्री: व्यवसाय और प्रबंधन की यह प्रतिष्ठित डिग्री पूरी तरह अमेरिकी मॉडल पर आधारित है। दुनिया का पहला बिजनेस स्कूल (व्हाarton स्कूल) अमेरिका में ही खुला था।
- वैश्विक वित्तीय संस्थान: विश्व बैंक (World Bank), अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व व्यापार संगठन (WTO) पर अमेरिका का गहरा प्रभाव है。
ग. सांस्कृतिक वर्चस्व (Soft Power)
इसका अर्थ है अपनी संस्कृति और जीवनशैली के माध्यम से दूसरों को अपनी ओर आकर्षित करना:
- जींस और फास्ट फूड: नीली जींस (Blue Jeans), पेप्सी, मैकडॉनल्ड्स और हॉलीवुड फिल्में अमेरिकी सांस्कृतिक वर्चस्व के सबसे बड़े उदाहरण हैं।
- अमरीकी जीवनशैली (American Way of Life): दुनिया भर के युवाओं को अमेरिकी सुख-सुविधाओं और आज़ादी वाली जीवनशैली सबसे अच्छी और आधुनिक लगती है, जिससे वे अनजाने में अमेरिकी संस्कृति के गुलाम बन जाते हैं।
7. अमेरिकी वर्चस्व के रास्ते में तीन मुख्य अवरोध (Constraints on US Power)
अमेरिका दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश है, लेकिन उसकी शक्ति निरंकुश नहीं है। उसके रास्ते में तीन बड़ी बाधाएं (अवरोध) हैं:
- अमेरिका का संस्थागत ढांचा: अमेरिका में शासन के तीन अंग (विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका) हैं। कार्यपालिका (राष्ट्रपति) द्वारा सेना के अत्यधिक प्रयोग पर वहाँ की संसद (कांग्रेस) अंकुश लगा सकती है।
- अमेरिकी समाज का खुलापन: अमेरिका की जनता और मीडिया बहुत जागरूक हैं। यदि सरकार किसी गलत युद्ध में शामिल होती है (जैसे वियतनाम या इराक युद्ध), तो अमेरिकी नागरिक खुद अपनी सरकार की नीतियों का कड़ा विरोध करने लगते हैं।
- नाटो (NATO): अमेरिका के सबसे बड़े सहयोगी देश नाटो संगठन में शामिल यूरोपीय देश हैं। चूंकि अमेरिका की बाजार आधारित अर्थव्यवस्था इन देशों पर टिकी है, इसलिए वह अपने इन लोकतांत्रिक साथियों की इच्छाओं को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर सकता।
8. अमेरिकी वर्चस्व से निपटने की रणनीतियां
अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति के विद्वानों ने अमेरिकी वर्चस्व का सामना करने के लिए मुख्य रूप से तीन उपाय बताए हैं:
- बैंडवैगन रणनीति (Bandwagon Strategy): इसका अर्थ है 'जैसी बहे बयार, पीठ तब तैसी कीजै' या वर्चस्व के विरोध के बजाय महाशक्ति के साथ मिलकर काम करना और उसके तंत्र का उपयोग करके खुद को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना (जैसे चीन ने किया)।
- खुद को छुपा लेने की नीति (Hide Strategy): महाशक्ति की नजरों से खुद को दूर रखना ताकि उसके कोपभाजन से बचा जा सके (जैसे कुछ समय तक चीन, रूस और यूरोपीय संघ ने किया)। यह नीति बड़े देशों के लिए लंबे समय तक काम नहीं आ सकती।
- गैर-राज्य संस्थाओं का प्रतिरोध: अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती सेनाओं से नहीं, बल्कि बुद्धिजीवियों, कलाकारों, लेखकों, मीडिया और स्वयंसेवी संगठनों (NGOs) के विश्वव्यापी नेटवर्क से मिल सकती है, जो जन-आंदोलनों के जरिए इसके खिलाफ आवाज उठाते हैं।
9. भारत-अमेरिका संबंध (India-US Relations)
शीत युद्ध के दौरान भारत और अमेरिका के संबंध ठंडे थे (क्योंकि भारत सोवियत संघ के करीब था), लेकिन 1991 के बाद दोनों देशों के रिश्ते बहुत मजबूत हुए हैं:
- आर्थिक एवं तकनीकी निर्भरता:
- भारत के सॉफ्टवेयर क्षेत्र का लगभग 65% निर्यात अमेरिका को होता है।
- अमेरिकी टेक कंपनी बोइंग के 35% कर्मचारी भारतीय मूल के हैं।
- सिलिकॉन वैली (Silicon Valley) में लगभग 3,00,000 भारतीय काम करते हैं और वहाँ की 15% स्टार्ट-अप कंपनियों की शुरुआत भारतीयों ने की है।
- भारत के सामने तीन रणनीतिक विकल्प:
- दूरी बनाए रखना: कुछ विद्वानों का मानना है कि भारत को अमेरिकी वर्चस्व से दूर रहकर अपनी राष्ट्रीय शक्ति बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए।
- गठबंधन का लाभ: कुछ विचारकों के अनुसार भारत को अमेरिका के साथ मजबूत सामरिक और आर्थिक संबंध बनाने चाहिए ताकि विकास की गति तेज हो सके।
- गुटनिरपेक्षता/विकासशील देशों का नेतृत्व: तीसरे दृष्टिकोण के अनुसार भारत को विकासशील देशों का एक मजबूत गुट बनाना चाहिए जो समय आने पर अमेरिका को टक्कर दे सके।
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