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कक्षा 12 राजनीति विज्ञान अध्याय 1 नोट्स: शीतयुद्ध का दौर

अध्याय 1: शीत युद्ध का दौर (The Cold War Era)

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Bihar Board, CBSE, State Board,

1. शीत युद्ध का अर्थ (Meaning of Cold War)

  • परिभाषा: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दो महाशक्तियों (अमेरिका और सोवियत संघ) के बीच उत्पन्न तनाव, प्रतिस्पर्धा और वैचारिक संघर्ष की स्थिति को शीत युद्ध कहा जाता है।
  • स्थिति: इसमें कभी भी वास्तविक या सीधे तौर पर रक्‍तपात वाला महायुद्ध नहीं हुआ। यह केवल धमकियों, प्रोपेगैंडा (प्रचार), सैन्य प्रतिस्पर्धा और कूटनीतिक चालों तक सीमित रहा।
  • वैचारिक मतभेद: यह लड़ाई केवल प्रभाव बढ़ाने की नहीं, बल्कि विचारधारा की भी थी:
    • संयुक्त राज्य अमेरिका (USA): उदारवादी लोकतंत्र और पूंजीवाद (Capitalism) का समर्थक था।
    • सोवियत संघ (USSR): समाजवाद और साम्यवाद (Communism) का समर्थक था।

2. द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि और अंत

  • समय: द्वितीय विश्व युद्ध 1939 से 1945 तक चला।
  • प्रतिद्वंद्वी गुट: यह युद्ध दो बड़े गुटों के बीच लड़ा गया था:
    • मित्र राष्ट्र (Allied Powers): अमेरिका, सोवियत संघ, ब्रिटेन और फ्रांस।
    • धुरी राष्ट्र (Axis Powers): जर्मनी, इटली और जापान।
  • युद्ध का अंत (अगस्त 1945): अमेरिका ने जापान के दो शहरों हिरो沁मा (Hiroshima) और नागासाकी (Nagasaki) पर परमाणु बम गिराए। इसके तुरंत बाद जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया और युद्ध समाप्त हो गया।
  • बमों के गुप्त नाम: 'लिटिल बॉय' (Little Boy - 15 किलोटन) और 'फैट मैन' (Fat Man - 21 किलोटन)।
  • आलोचना: आलोचकों का मानना था कि जापान आत्मसमर्पण करने ही वाला था, इसलिए बम गिराना गैर-जरूरी था। अमेरिका का असली मकसद सोवियत संघ को अपनी ताकत दिखाना और एशिया में उसके प्रभाव को रोकना था।

3. अपरोध का तर्क (The Logic of Deterrence)

  • अर्थ: जब दोनों पक्षों के पास एक-दूसरे को परमाणु हथियारों से भारी नुकसान पहुँचाने की क्षमता हो, तो कोई भी पक्ष युद्ध का जोखिम नहीं उठाना चाहता।
  • सिद्धांत: दोनों देश जानते थे कि यदि परमाणु युद्ध हुआ, तो विजेता कौन है यह तय करना असंभव हो जाएगा क्योंकि विनाश दोनों तरफ बराबर होगा।
  • परिणाम: 'अपरोध के तर्क' ने दोनों महाशक्तियों को उकसावे के बावजूद सीधे सैन्य युद्ध में उतरने से रोका और दुनिया तीसरे विश्व युद्ध से बच गई।

4. दो-ध्रुवीय विश्व का आरंभ (Emergence of Two-Power Blocks)

दोनों महाशक्तियों ने विश्व के अलग-अलग हिस्सों में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए छोटे देशों को अपने साथ मिलाना शुरू किया। इसके लिए उन्होंने सैन्य संगठन (Military Alliances) बनाए, जिससे दुनिया दो गुटों में बंट गई:

अ. पश्चिमी गठबंधन (USA के नेतृत्व में)

  • नाटो (NATO - North Atlantic Treaty Organization):
    • स्थापना: अप्रैल 1949 में हुई।
    • मूल देश: शुरुआत में इसमें 12 देश शामिल थे।
    • सिद्धांत: यदि उत्तरी अमेरिका या यूरोप के किसी भी एक नाटो देश पर हमला होता है, तो उसे सभी देशों पर हमला माना जाएगा और सब मिलकर मुकाबला करेंगे।
  • सीटो (SEATO - South-East Asian Treaty Organization): दक्षिण-पूर्व एशिया में साम्यवाद के फैलाव को रोकने के लिए बनाया गया।
  • सेंटो (CENTO - Central Treaty Organization): मध्य पूर्व (Middle East) में सोवियत प्रभाव को रोकने के लिए गठित किया गया।

ब. पूर्वी गठबंधन (USSR के नेतृत्व में)

  • वारसा संधि (Warsaw Pact):
    • स्थापना: 1955 में की गई।
    • मुख्य उद्देश्य: नाटो में शामिल देशों की सेनाओं का यूरोप में मुकाबला करना।

5. महाशक्तियों के लिए छोटे देश क्यों जरूरी थे?

महाशक्तियों के पास खुद विशाल संसाधन और सेना थी, फिर भी वे छोटे देशों को अपने गुट में शामिल करती थीं। इसके 4 मुख्य कारण (बोर्ड परीक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण) हैं:

  1. महत्वपूर्ण संसाधन: तेल, खनिज और अन्य प्राकृतिक संपदा प्राप्त करने के लिए।
  2. भू-क्षेत्र (Territory): ताकि महाशक्तियां वहाँ से अपने हथियारों और सेना का संचालन कर सकें।
  3. सैन्य ठिकाने (Military Bases): जहाँ से वे एक-दूसरे की जासूसी (Spying) कर सकें।
  4. आर्थिक मदद: गठबंधन में शामिल छोटे देश सेना के रखरखाव और खर्च वहन करने में मददगार होते थे।

6. शीत युद्ध के दायरे (Arenas of the Cold War)

'शीत युद्ध के दायरे' से तात्पर्य उन क्षेत्रों से है जहाँ दोनों महाशक्तियों के बीच संकट आया, युद्ध की परिस्थितियां बनीं, कई लोग मारे गए, लेकिन बात विश्व युद्ध तक नहीं पहुँची।

  • कोरिया संकट: 1950 से 1953 के बीच।
  • बर्लिन संकट: 1958 से 1962 के बीच (1961 में बर्लिन की दीवार खड़ी की गई)।
  • कांगो संकट: 1960 के दशक की शुरुआत में।
  • वियतनाम और अफगानिस्तान: इन क्षेत्रों में महाशक्तियों ने प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से सैन्य हस्तक्षेप किया।

7. क्यूबा का मिसाइल संकट (Cuban Missile Crisis - 1962)

यह शीत युद्ध का चरम बिंदु (Climax) था, जब दुनिया परमाणु युद्ध के सबसे करीब पहुँच गई थी।

  • पृष्ठभूमि: क्यू巴 (Cuba) अमेरिका के तट से लगा एक छोटा द्वीपीय देश था, लेकिन वहाँ की सरकार सोवियत संघ की समर्थक थी।
  • घटना: 1962 में सोवियत संघ के नेता निकिता ख्रुश्चेव ने क्यूबा में अपनी परमाणु मिसाइलें तैनात कर दीं। इससे अमेरिका पहली बार सोवियत संघ के नजदीकी निशाने पर आ गया।
  • अमेरिकी प्रतिक्रिया: अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. केंनेडी ने सोवियत संघ के जहाजों को रोकने के लिए अमेरिकी जंगी बेड़ों को आगे कर दिया।
  • समाधान: दोनों देशों को समझ आ गया कि युद्ध से भारी विनाश होगा। सोवियत संघ ने अपने जहाजों को वापस मोड़ लिया और मिसाइलें हटा दीं।

8. दो-ध्रुवीयता को चुनौती: गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM)

शीत युद्ध के दौरान एशिया, अफ्रीका और लातिनी अमेरिका के नए स्वतंत्र (उपनिवेशवाद से मुक्‍त) देशों के सामने दोनों गुटों से अलग रहने का एक तीसरा विकल्प आया, जिसे गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement) कहा गया।

संस्थापक नेता (The Five Founders):

  1. पंडित जवाहरलाल नेहरू (भारत)
  2. जोसिप ब्रॉन्ज टीटो (यूगोस्लाविया)
  3. गमाल अब्दुल नासिर (मिस्र)
  4. सुकर्णो (इंडोनेशिया)
  5. वामे एनक्रूमा (घाना)

पहला सम्मेलन:

  • वर्ष व स्थान: पहला गुटनिरपेक्ष सम्मेलन 1961 में बेलग्रेड (Belgrade) में हुआ।
  • सदस्य: इसमें 25 सदस्य देश शामिल हुए थे।

गुटनिरपेक्षता क्या नहीं है?

  • पृथकतावाद (Isolationism) नहीं है: पृथकतावाद का अर्थ होता है विश्व के मामलों से खुद को पूरी तरह अलग काट लेना (जैसे अमेरिका ने 1787 से प्रथम विश्व युद्ध तक किया)। गुटनिरपेक्ष देशों ने विश्व मामलों में सक्रिय भूमिका निभाई।
  • तटस्थता (Neutrality) नहीं है: तटस्थता का अर्थ होता है युद्ध में शामिल न होना और युद्ध के सही-गलत होने पर कोई स्टैंड न लेना। गुटनिरपेक्ष देशों ने युद्धों को टालने और वैश्विक शांति के लिए सक्रिय काम किया।

9. नव अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO)

  • चुनौती: गुटनिरपेक्ष आंदोलन में शामिल अधिकांश देश 'अल्पविकसित देश' (LDCs) थे। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक विकास और गरीबी उन्मूलन थी। बिना विकास के वे सही मायने में स्वतंत्र नहीं रह सकते थे।
  • UNCTAD की रिपोर्ट (1972): संयुक्त राष्ट्र के व्यापार और विकास सम्मेलन में 'टुवर्ड्स अ न्यू ट्रेड पॉलिसी फॉर डेवलपमेंट' रिपोर्ट आई, जिसमें वैश्विक व्यापार प्रणाली में निम्नलिखित सुधार सुझाए गए:
    1. अल्पविकसित देशों को अपने प्राकृतिक संसाधनों पर पूर्ण नियंत्रण मिलेगा (जिसका दोहन पहले पश्चिमी देश करते थे)।
    2. इन देशों की पहुँच पश्चिमी देशों के बाजारों तक होगी ताकि वे अपना सामान बेच सकें।
    3. पश्चिमी देशों से मँगाई जाने वाली तकनीक (Technology) की लागत कम की जाएगी।
    4. अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थानों (जैसे IMF और वर्ल्ड बैंक) में अल्पविकसित देशों की भूमिका बढ़ाई जाएगी।

10. शीत युद्ध और भारत (India and the Cold War)

गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेता के रूप में शीत युद्ध के दौरान भारत की नीति दो स्तरों पर काम कर रही थी:

  1. भारत ने स्वयं को दोनों महाशक्तियों के सैन्य गठबंधनों से दूर रखा।
  2. भारत ने नए स्वतंत्र हुए देशों के महाशक्तियों के गुटों में शामिल होने का पुरजोर विरोध किया।

भारत की नीति के सकारात्मक प्रभाव (लाभ):

  • स्वतंत्र निर्णय: भारत ऐसे अंतर्राष्ट्रीय फैसले ले पाया जिससे उसके अपने राष्ट्रीय हित सधते हों, न कि किसी महाशक्ति के।
  • संतुलन बनाने की क्षमता: यदि भारत को लगा कि एक महाशक्ति उसकी उपेक्षा कर रही है, तो वह दूसरी महाशक्ति के करीब जा सकता था। कोई भी गुट भारत को लेकर न तो बेफिक्र रह सकता था और न ही अनुचित दबाव बना सकता था।

भारत की नीति की आलोचना:

  • सिद्धांतविहीन नीति: आलोचकों का मानना था कि भारत अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर कोई स्पष्ट स्टैंड लेने से बचता रहा।
  • विरोधाभासी व्यवहार: भारत ने 1971 के बांग्लादेश संकट के समय सोवियत संघ के साथ 20 साल की 'मित्रता की संधि' की थी। आलोचकों ने इसे गुटनिरपेक्षता के सिद्धांतों के खिलाफ और सोवियत गुट में शामिल होना माना (हालाँकि भारत का तर्क था कि संकट के समय उसे केवल कूटनीतिक और सैन्य मदद की जरूरत थी, न कि वह किसी गुट का सदस्य बन रहा था)।

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