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कक्षा 12 राजनीति विज्ञान अध्याय 2 नोट्स: दो ध्रुवीयता का अंत

अध्याय 2: दो-ध्रुवीयता का अंत (The End of Bipolarity)

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Bihar Board, CBSE, State Board, SCERT

1. सोवियत प्रणाली क्या थी? (What was the Soviet System?)

  • पृष्ठभूमि: रूस में 1917 की समाजवादी क्रांति (Socialist Revolution) के बाद सोवियत संघ (USSR - Union of Soviet Socialist Republics) अस्तित्व में आया। यह क्रांति पूंजीवाद के विरोध में और समाजवाद के आदर्शों से प्रेरित थी।
  • सोवियत प्रणाली की मुख्य विशेषताएं:
    • एक दलीय व्यवस्था: शासन पर केवल कम्युनिस्ट पार्टी का पूरा नियंत्रण था। किसी भी अन्य राजनीतिक दल या विपक्ष को अनुमति नहीं थी।
    • राज्य का नियंत्रण: भूमि, कारखानों और उत्पादन के सभी साधनों पर पूरी तरह से राज्य (सरकार) का स्वामित्व था।
    • नियोजित अर्थव्यवस्था: अर्थव्यवस्था बाजार के भरोसे नहीं थी, बल्कि सरकार द्वारा योजनाबद्ध तरीके से चलाई जाती थी।
    • बुनियादी सुविधाएं: सरकार ने अपने नागरिकों के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, बच्चों की देखभाल और लोक-कल्याण की बुनियादी ज़रूरतें बहुत कम (रियायती) दरों पर सुनिश्चित की थीं।
    • बेरोजगारी का न होना: सोवियत संघ में कोई बेरोजगारी नहीं थी, हर नागरिक को काम का अधिकार था।
    • उन्नत बुनियादी ढांचा: सोवियत संघ के पास विशाल ऊर्जा संसाधन (तेल, लोहा, इस्पात) और एक उन्नत घरेलू उपभोक्ता उद्योग था, जहाँ 'पिन से लेकर कार तक' सब कुछ देश में ही बनता था।

2. बर्लिन की दीवार (The Berlin Wall)

  • प्रतीक: बर्लिन की दीवार शीत युद्ध का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष प्रतीक थी।
  • निर्माण: यह दीवार 1961 में बनाई गई थी, जिसने बर्लिन शहर को पूर्वी बर्लिन (सोवियत/साम्यवादी गुट) और पश्चिमी बर्लिन (अमेरिकी/पूंजीवादी गुट) में विभाजित किया था।
  • लंबाई व समय: यह दीवार 150 किलोमीटर से भी लंबी थी और लगभग 28 वर्षों तक खड़ी रही।
  • गिरावट (अंत): 9 नवंबर 1989 को पूर्वी जर्मनी की आम जनता ने इस दीवार को गिरा दिया। यह घटना सोवियत गुट के पतन और शीत युद्ध के अंत की शुरुआत थी। इसके बाद जर्मनी का एकीकरण हुआ।

3. सोवियत प्रणाली में कमियां (दोष)

समय के साथ सोवियत प्रणाली अत्यधिक नौकरशाही और सत्तावादी (Authoritarian) हो गई, जिससे नागरिकों का जीवन कठिन हो गया:

  • लोकतंत्र का अभाव: नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं थी। लोग सरकार की नीतियों का खुलकर विरोध नहीं कर सकते थे और अपनी बात चुटकुलों या कार्टूनों के माध्यम से व्यक्त करते थे।
  • नौकरशाही का शिकंजा: व्यवस्था पूरी तरह नौकरशाही (Bureaucracy) के नियंत्रण में आ गई और आम नागरिकों के प्रति जवाबदेह नहीं रही।
  • कम्युनिस्ट पार्टी का एकाधिकार: कम्युनिस्ट पार्टी ने लगभग 70 वर्षों तक शासन किया, लेकिन वह जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने में असफल रही। पार्टी के नेताओं को आम जनता से कहीं ज्यादा विशेषाधिकार प्राप्त थे।
  • सैन्य खर्च का भारी बोझ: सोवियत संघ ने अमेरिका के साथ हथियारों की होड़ में अपने संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा सेना और परमाणु हथियारों पर खर्च कर दिया।
  • आर्थिक ठहराव: 1970 के दशक के अंतिम वर्षों में सोवियत अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई। उपभोक्ता वस्तुओं (दैनिक उपयोग के सामान) की भारी कमी हो गई और सोवियत संघ को अनाज का आयात करना पड़ा।

4. मिखाइल गोर्बाचेव और सोवियत संघ का विघटन

1985 में मिखाइल गोर्बाचेव सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने। उन्होंने सोवियत व्यवस्था को सुधारने और पश्चिम के देशों के साथ संबंधों को सामान्य बनाने का प्रयास किया।

गोर्बाचेव की दो मुख्य नीतियां (सुधार):

  1. पेरेस्त्रोइका (Perestroika): इसका अर्थ था 'आर्थिक पुनर्गठन'। इसके तहत अर्थव्यवस्था में ढील दी गई और निजीकरण को थोड़ा बढ़ावा दिया गया।
  2. ग्लासनोस्त (Glasnost): इसका अर्थ था 'खुलापन'। इसके तहत नागरिकों को बोलने की आजादी और सरकार की आलोचना करने का अधिकार दिया गया।

सुधारों का विपरीत प्रभाव:

गोर्बाचेव सोवियत संघ को बचाना चाहते थे, लेकिन उनके सुधारों ने विघटन की गति को तेज कर दिया।

  • जनता को जब स्वतंत्रता मिली, तो वे और अधिक आजादी की मांग करने लगे। सुधारों की गति जनता को बहुत धीमी लगी।
  • दूसरी ओर, कम्युनिस्ट पार्टी के कट्टरपंथी नेताओं ने गोर्बाचेव का विरोध किया क्योंकि उन्हें लगा कि उनके विशेषाधिकार छिन रहे हैं।
  • अगस्त 1991 में तख्तापलट: कम्युनिस्ट पार्टी के कट्टरपंथियों ने एक सैन्य तख्तापलट का प्रयास किया, लेकिन जनता ने इसका कड़ा विरोध किया। इस जन-विरोध के नायक बोरिस येल्तसिन बने।

5. सोवियत संघ का अंत (दिसंबर 1991)

  • ऐतिहासिक घोषणा: दिसंबर 1991 में बोरिस येल्तसिन के नेतृत्व में सोवियत संघ के तीन बड़े गणराज्यों — रूस, यूक्रेन और बेलारूस — ने सोवियत संघ की समाप्ति की घोषणा कर दी।
  • साम्यवाद का अंत: उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी को प्रतिबंधित कर दिया और पूंजीवाद तथा लोकतंत्र को अपना नया आधार बनाया।
  • CIS का गठन: सोवियत संघ से अलग हुए देशों ने मिलकर स्वतंत्र राज्यों का राष्ट्रकुल (CIS - Commonwealth of Independent States) बनाया।
  • उत्तराधिकारी देश: रूस को सोवियत संघ का उत्तराधिकारी देश स्वीकार किया गया। सोवियत संघ की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की स्थायी सीट रूस को मिली। सोवियत संघ द्वारा की गई सभी अंतर्राष्ट्रीय संधियों को निभाने की जिम्मेदारी रूस पर आ गई।

6. सोवियत संघ के विघटन के प्रमुख कारण (Reasons for Disintegration)

  1. संस्थानों की आंतरिक कमजोरी: सोवियत संघ की राजनीतिक और आर्थिक संस्थाएं जनता की आकांक्षाओं और जरूरतों को पूरा करने में पूरी तरह विफल रहीं।
  2. संसाधनों का गलत इस्तेमाल: सोवियत संघ ने अपने संसाधनों का बड़ा हिस्सा परमाणु हथियारों, सेना और अपने पिछड़ते उपग्रह देशों (पूर्वी यूरोप) को अपने नियंत्रण में बनाए रखने में गंवा दिया।
  3. कम्युनिस्ट पार्टी का भ्रष्टाचार: पार्टी के नेता आम जनता से कट चुके थे, उन्हें विशेष अधिकार प्राप्त थे और भ्रष्टाचार चरम पर था।
  4. पश्चिमी देशों की सच्चाई का पता चलना: सोवियत नागरिकों को जब यह अहसास हुआ कि पश्चिमी पूंजीवादी देशों का जीवन स्तर और तकनीक उनके मुकाबले बहुत आगे है, तो उन्हें गहरा मनोवैज्ञानिक धक्का लगा।
  5. राष्ट्रवाद का उदय: रूस, बाल्टिक गणराज्य (एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया), यूक्रेन और जॉर्जिया जैसे देशों में संप्रभुता और राष्ट्रवाद की भावना का उभार विघटन का सबसे तात्कालिक कारण बना।

7. सोवियत संघ के विघटन के परिणाम (Consequences of Disintegration)

  • शीत युद्ध की समाप्ति: अमेरिका और सोवियत संघ के बीच चल रही दशकों पुरानी वैचारिक और सैन्य प्रतिस्पर्धा हमेशा के लिए समाप्त हो गई।
  • एक-ध्रुवीय विश्व का उदय: सोवियत संघ के अंत के बाद दुनिया में केवल एक महाशक्ति बची — संयुक्त राज्य अमेरिका। अमेरिकी पूंजीवाद और उदारवादी लोकतंत्र को पूरी दुनिया में सर्वश्रेष्ठ मॉडल मान लिया गया।
  • नए देशों का उदय: सोवियत संघ के टूटने से 15 नए स्वतंत्र देशों का जन्म हुआ। बाल्टिक और पूर्वी यूरोप के देश नाटो (NATO) और यूरोपीय संघ में शामिल होने लगे।
  • शक्ति संतुलन में बदलाव: अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में नए आर्थिक और सैन्य गठबंधनों का उदय हुआ और वैश्विक निर्णयों में पूंजीवादी संस्थाओं का प्रभाव बढ़ा।

8. शॉक थेरेपी (Shock Therapy)

  • अर्थ: सोवियत संघ के पतन के बाद, वहाँ के देशों को साम्यवाद (Communism) से पूंजीवाद (Capitalism) की तरफ ले जाने के लिए विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा एक विशेष आर्थिक मॉडल निर्देशित किया गया, जिसे 'शॉक थेरेपी' (आघात पहुँचाकर उपचार करना) कहा गया।
  • मुख्य विशेषताएं:
    • संपत्ति पर निजी स्वामित्व (Private Ownership) को बढ़ावा देना।
    • राज्य की संपत्तियों का निजीकरण करना।
    • मुक्‍त व्यापार (Free Trade) और बाहरी निवेश को पूरी तरह अपनाना।
    • मुद्राओं की आपसी परिवर्तनशीलता (Convertibility) सुनिश्चित करना।

शॉक थेरेपी के विनाशकारी परिणाम (प्रभाव):

यह मॉडल पूरी तरह असफल रहा और इसने सोवियत क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर दिया:

  1. इतिहास की सबसे बड़ी गैराज सेल: रूस का पूरा औद्योगिक ढांचा चरमरा गया। लगभग 90% उद्योगों को बहुत कम दामों पर निजी हाथों या कंपनियों को ओने-पौने दामों में बेच दिया गया।
  2. रूसी मुद्रा में गिरावट: रूसी मुद्रा रूबल (Ruble) के मूल्य में भारी गिरावट आई, जिससे मुद्रास्फीति (महंगाई) इतनी बेकाबू हो गई कि लोगों की जीवन भर की जमापूँजी खत्म हो गई।
  3. खाद्यान्न संकट: सामूहिक खेती (Collective Farming) की प्रणाली समाप्त होने से खाद्यान्न सुरक्षा खत्म हो गई और रूस को बड़े पैमाने पर अन्न का आयात करना पड़ा।
  4. माफिया वर्ग का उदय: आर्थिक गतिविधियों और उद्योगों पर नए अमीर और माफिया वर्ग का नियंत्रण हो गया।
  5. अमीर-गरीब की खाई: समाज में अमीर और गरीब के बीच की दूरी बहुत अधिक बढ़ गई। सरकारी रियायतें और कल्याणकारी नीतियां खत्म होने से लोग गरीबी के दलदल में फंस गए।

9. पूर्व साम्यवादी देश और भारत के संबंध

भारत के सोवियत संघ (USSR) के साथ हमेशा से बहुत गहरे संबंध रहे थे, जो विघटन के बाद रूस और अन्य देशों के साथ भी जारी रहे।

भारत और रूस के संबंध (Indo-Russian Relations):

  • बहु-ध्रुवीय विश्व का सपना: दोनों देश एक 'बहु-ध्रुवीय विश्व' (Multipolar World) का समर्थन करते हैं, जहाँ दुनिया में केवल एक नहीं बल्कि कई शक्तियां हों और फैसले अंतर्राष्ट्रीय संगठनों (जैसे UN) के माध्यम से हों।
  • सामरिक संबंध: भारत और रूस के बीच 80 से अधिक द्विपक्षीय समझौतों पर हस्ताक्षर हो चुके हैं।
  • सैन्य सामग्री: भारत रूसी हथियारों का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार देश है। भारतीय सेना के अधिकांश मुख्य हथियार और तकनीक रूसी मूल के हैं।
  • ऊर्जा और अंतरिक्ष: रूस ने भारत के तेल संकट के समय हमेशा मदद की है। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रमों (जैसे क्रायोजेनिक रॉकेट) और परमाणु ऊर्जा योजनाओं में रूस कूटनीतिक व तकनीकी सहायता देता रहा है।
  • कश्मीर मुद्दा: संयुक्त राष्ट्र (UN) में कश्मीर के मुद्दे पर रूस ने हमेशा भारत के रुख का पुरजोर समर्थन किया है।

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