कक्षा 12 समकालीन विश्व राजनीति
अध्याय 4: सत्ता के नए / वैकल्पिक केंद्र (New Centres of Power)
[CBSE, बिहार बोर्ड (BSEB) एवं अन्य राज्य बोर्डों के लिए संपूर्ण एवं सरल नोट्स]
1. 'सत्ता के वैकल्पिक केंद्र' का क्या अर्थ है?
- परिभाषा: 1990 के दशक के शुरुआती सालों में सोवियत संघ के टूटने और अमेरिकी वर्चस्व (एक-ध्रुवीय विश्व) के उभरने के बाद, दुनिया में कुछ ऐसे संगठन और देश सामने आए जो अमेरिका की मनमानी पर अंकुश लगा सकते थे। इन्हीं राजनीतिक और आर्थिक शक्ति के रूपों को 'सत्ता के वैकल्पिक केंद्र' कहा जाता है।
- मुख्य केंद्र: इसके अंतर्गत यूरोपीय संघ (EU), आसियान (ASEAN), ब्रिक्स (BRICS) जैसे क्षेत्रीय संगठनों तथा चीन, जापान, इजराइल और भारत जैसे शक्तिशाली देशों का अध्ययन किया जाता है।
2. यूरोपीय संघ (European Union - EU)
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यूरोप के देशों की अर्थव्यवस्था पूरी तरह बर्बाद हो चुकी थी। अमेरिका ने यूरोप के पुनर्निर्माण के लिए एक बड़ी योजना शुरू की जिसे 'मार्शल योजना' (Marshall Plan) कहा जाता है। इसी योजना के तहत 1948 में 'यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन' की स्थापना हुई, जो आगे चलकर यूरोपीय संघ बना।
- स्थापना: 1992 में मास्ट्रिच संधि (Maastricht Treaty) के तहत यूरोपीय संघ (EU) का गठन हुआ।
- गठन का उद्देश्य: एक समान विदेश और सुरक्षा नीति, आंतरिक मामलों तथा न्याय से जुड़े मुद्दों पर सहयोग और एक समान मुद्रा का चलन।
यूरोपीय संघ की मुख्य विशेषताएं (ताकत):
- राष्ट्र-राज्य की तरह रूप: यूरोपीय संघ का अपना एक झंडा, गान, स्थापना दिवस और अपनी एक मुद्रा (यूरो - Euro) है। हालाँकि, इसका अपना कोई लिखित संविधान नहीं है।
- आर्थिक शक्ति: यूरोपीय संघ दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। इसकी मुद्रा 'यूरो' अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व के लिए एक बड़ा खतरा बन सकती है। विश्व व्यापार में इसकी हिस्सेदारी अमेरिका से भी कहीं ज्यादा है।
- राजनीतिक और कूटनीतिक प्रभाव: यूरोपीय संघ का एक महत्वपूर्ण देश फ्रांस, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का स्थायी सदस्य है। इसके पास परमाणु हथियार भी हैं। सुरक्षा परिषद के कई अस्थायी सदस्य भी इसी संघ से आते हैं।
- सैन्य शक्ति: यूरोपीय संघ की संयुक्त सेना दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना है। रक्षा बजट के मामले में यह अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर आता है।
यूरोपीय संघ की कमजोरियां (सीमाएं):
- इसके सदस्य देशों की अपनी स्वतंत्र विदेश और रक्षा नीति है, जो कई बार एक-दूसरे के खिलाफ हो जाती है (जैसे- इराक हमले के समय ब्रिटेन ने अमेरिका का साथ दिया, जबकि फ्रांस और जर्मनी इसके खिलाफ थे)।
- यूरोप के कुछ हिस्सों में 'यूरो' मुद्रा को लागू करने को लेकर नाराजगी रही है।
- ब्रेक्जिट (Brexit): जून 2016 में एक जनमत संग्रह के बाद ब्रिटेन यूरोपीय संघ से अलग हो गया, जिसे 'ब्रेक्जिट' कहा जाता है। इससे संघ को बड़ा झटका लगा।
3. आसियान (ASEAN - Association of South-East Asian Nations)
दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों ने आर्थिक विकास को तेज करने और सांस्कृतिक व सामाजिक विकास हासिल करने के लिए एक मजबूत संगठन बनाया।
- स्थापना: 1967 में 5 देशों (इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर और थाईलैंड) ने बैंकाक घोषणापत्र (Bangkok Declaration) पर हस्ताक्षर करके आसियान की स्थापना की। बाद में 5 और देश इसमें शामिल हुए (कुल सदस्य = 10)।
- आसियान शैली (ASEAN Way): आसियान के काम करने के तरीके को 'आसियान शैली' कहा जाता है। यह अनौपचारिक, टकराव-रहित और सहयोगात्मक बातचीत पर आधारित एक राष्ट्रीय संप्रभुता का सम्मान करने वाला मॉडल है।
- आसियान के तीन स्तंभ (2003 में गठित):
- आसियान सुरक्षा समुदाय: सदस्य देशों के बीच क्षेत्रीय विवादों को सैन्य टकराव तक न बढ़ने देना।
- आसियान आर्थिक समुदाय: सदस्य देशों के लिए एक साझा बाजार और उत्पादन आधार तैयार करना तथा इलाके के आर्थिक विकास को सुधारना।
- आसियान सामाजिक-सांस्कृतिक समुदाय: दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के सामाजिक और सांस्कृतिक विकास को बढ़ावा देना।
- ARF (आसियान क्षेत्रीय मंच): इसकी स्थापना 1993 में हुई, जिसका काम सदस्य देशों की सुरक्षा और विदेश नीतियों में तालमेल बनाना है।
4. ब्रिक्स (BRICS)
- परिभाषा: ब्रिक्स दुनिया की पाँच उभरती हुई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह है।
- सदस्य देश: Brazil (ब्राजील), Russia (रूस), India (भारत), China (चीन) और South Africa (दक्षिण अफ्रीका)।
- इतिहास: शुरुआत में इसका नाम 'ब्रिक' (BRIC) था और इसकी स्थापना 2006 में हुई थी। 2009 में रूस में इसका पहला सम्मेलन हुआ। 2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद इसका नाम 'BRICS' हो गया।
- उद्देश्य: सदस्य देशों के बीच आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा सहयोग को बढ़ाना, आपस में व्यापार को सरल बनाना और वैश्विक वित्तीय प्रणाली में सुधार करना।
- NDB (न्यू डेवलपमेंट बैंक): ब्रिक्स देशों ने मिलकर अपना एक बैंक स्थापित किया है जिसे 'न्यू डेवलपमेंट बैंक' कहा जाता है। इसका मुख्यालय शंघाई (चीन) में है।
5. चीन का एक आर्थिक शक्ति के रूप में उभार
1949 में माओ त्से तुंग के नेतृत्व में हुई साम्यवादी क्रांति के बाद चीन ने सोवियत मॉडल पर आधारित अर्थव्यवस्था अपनाई थी, लेकिन वह बहुत सफल नहीं रही। इसके बाद चीन ने अपनी नीतियों में ऐतिहासिक बदलाव किए:
- आर्थिक सुधारों की शुरुआत:
- 1972: चीन ने अमेरिका से संबंध बनाकर अपना राजनीतिक और आर्थिक एकांतवास खत्म किया।
- 1973: प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई ने कृषि, उद्योग, सेना और विज्ञान-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में 'चार आधुनिकीकरण' के प्रस्ताव रखे।
- 1978: चीनी नेता देंग शियाओपेंग ने चीन में आर्थिक सुधारों और 'मुक्त द्वार की नीति' (Open Door Policy) की घोषणा की, जिसके तहत विदेशी निवेश के लिए दरवाजे खोले गए।
- 1982: कृषि का निजीकरण किया गया।
- 1998: उद्योगों का निजीकरण किया गया।
- SEZ (विशेष आर्थिक क्षेत्र): व्यापारिक बाधाओं को हटाने और विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए 'स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन' बनाए गए।
- 2001: चीन विश्व व्यापार संगठन (WTO) में शामिल हो गया।
- परिणाम: इन सुधारों के बाद चीन की अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ी और आज वह अमेरिका को टक्कर देने वाला सबसे बड़ा आर्थिक केंद्र बन चुका है।
6. भारत-चीन संबंध (India-China Relations)
- पृष्ठभूमि: भारत और चीन के संबंध प्राचीन काल से सांस्कृतिक और व्यापारिक रहे हैं। आजादी के बाद भारत ने 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' का नारा दिया और 1954 में दोनों देशों के बीच पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर हुए।
- विवाद के मुख्य कारण:
- तिब्बत का मुद्दा: 1950 में चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया। जब तिब्बती धार्मिक गुरु दलाई लामा ने 1959 में भारत में शरण ली, तो चीन ने इसका कड़ा विरोध किया।
- सीमा विवाद (1962 का युद्ध): चीन ने भारत के अक्साई चिन इलाके (लद्दाख) और नेफा (NEFA - अब अरुणाचल प्रदेश) पर अपना दावा ठोका और 1962 में भारत पर अचानक आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में भारत को सैन्य नुकसान उठाना पड़ा।
- हालिया विवाद: डोकलाम विवाद (2017) और गलवान घाटी संघर्ष (2020) के कारण दोनों देशों के सैन्य संबंध तनावपूर्ण बने हुए हैं। चीन का 'वन बेल्ट वन रोड' (OBOR) प्रोजेक्ट भी भारत की संप्रभुता का उल्लंघन करता है।
- सुधार के प्रयास: 1988 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी की चीन यात्रा के बाद संबंधों में सुधार शुरू हुआ। दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्ते बहुत मजबूत हैं, और दोनों देश वैश्विक मंचों (जैसे ब्रिक्स और जी-20) पर एक साथ काम करते हैं।
7. सत्ता के अन्य महत्वपूर्ण नए केंद्र (देश)
NCERT के नए पाठ्यक्रम में कुछ अन्य देशों को भी शक्ति के नए केंद्रों के रूप में जोड़ा गया है:
- जापान: यह दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। तकनीक, ऑटोमोबाइल (जैसे टोयोटा, होंडा) और इलेक्ट्रॉनिक्स (जैसे सोनी, पैनासोनिक) के मामले में जापान दुनिया में सबसे आगे है। यह जी-7 समूह का एकमात्र एशियाई सदस्य देश है।
- इजराइल: मध्य पूर्व (Middle East) का यह छोटा सा देश विज्ञान, रक्षा तकनीक, खुफिया एजेंसी (मोसाद - Mossad) और कृषि नवाचार (ड्रिप सिंचाई) के मामले में बेहद शक्तिशाली है। यह अपनी सैन्य मारक क्षमता के कारण वैश्विक राजनीति का एक नया केंद्र बन चुका है।
- भारत: 21वीं सदी में भारत एक बड़ी वैश्विक शक्ति (Global Power) के रूप में उभर रहा है। विशाल जनसंख्या (युवा आबादी), तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था (जीडीपी), मजबूत सैन्य क्षमता (परमाणु शक्ति), अंतरिक्ष अनुसंधान (ISRO) और 'मेक इन इंडिया' जैसी नीतियों के कारण भारत आज सत्ता का एक मजबूत और प्रभावशाली केंद्र बन चुका है।
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