कक्षा 12 समकालीन विश्व राजनीति
अध्याय 8: पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन (Environment and Natural Resources)
[CBSE, बिहार बोर्ड (BSEB) एवं अन्य राज्य बोर्डों के लिए संपूर्ण एवं सरल नोट्स]
1. पर्यावरण वैश्विक राजनीति का हिस्सा क्यों बन गया?
- पृष्ठभूमि: लंबे समय तक पर्यावरण को केवल भूगोल या विज्ञान का विषय माना जाता था। लेकिन 20वीं सदी के उत्तरार्ध से यह अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का एक मुख्य मुद्दा बन गया।
- राजनीतिक मुद्दा बनने के कारण (वैश्विक चिंताएं):
- कृषि भूमि में कमी: दुनिया भर में उपजाऊ और कृषि योग्य भूमि का आकार घट रहा है, जबकि मिट्टी की उत्पादकता कम हो रही है।
- पेयजल संकट: दुनिया के एक बड़े हिस्से में स्वच्छ पीने के पानी की भारी कमी हो रही है, जिससे भविष्य में जल-युद्ध (Water Wars) की आशंका जताई जा रही है।
- वनों की कटाई (Deforestation): जैव-विविधता (Biodiversity) का मुख्य आधार माने जाने वाले वर्षावनों को तेजी से काटा जा रहा है, जिससे अनेक प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं।
- ओजोन परत का ह्रास (Ozone Depletion): पृथ्वी के वायुमंडल में मौजूद ओजोन परत (जो सूर्य की हानिकारक पराबैंगनी किरणों से हमारी रक्षा करती है) में क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) गैसों के कारण छेद हो रहा है।
- समुद्री प्रदूषण: इंसानी गतिविधियों और औद्योगिक कचरे के कारण समुद्र का पानी बड़े पैमाने पर प्रदूषित हो रहा है, जिससे तटीय इलाकों का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र संकट में है।
2. वैश्विक पर्यावरण कूटनीति के महत्वपूर्ण मील के पत्थर
विश्व स्तर पर पर्यावरण की रक्षा के लिए सरकारों और बुद्धिजीवियों ने कई महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं:
- 'क्लब ऑफ रोम' की रिपोर्ट (1972): वैज्ञानिकों और बुद्धिजीवियों के इस समूह ने 'लिमिट्स टू ग्रोथ' (Limits to Growth) नामक पुस्तक प्रकाशित की, जिसने दुनिया का ध्यान इस ओर खींचा कि प्राकृतिक संसाधन असीमित नहीं हैं।
- पृथ्वी सम्मेलन (Earth Summit - 1992):
- स्थान व समय: जून 1992 में ब्राजील के शहर रियो डी जेनेरियो में यह सम्मेलन आयोजित हुआ।
- आयोजक: संयुक्त राष्ट्र संघ का 'पर्यावरण और विकास सम्मेलन' (UNCED)।
- भागीदारी: इसमें 170 देशों, हजारों गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भाग लिया।
- एजेंडा 21: इस सम्मेलन में विकास के लिए 21वीं सदी के कुछ नियम और रूपरेखा तय की गई, जिसे 'एजेंडा 21' कहा जाता है।
- सतत पोषणीय विकास (Sustainable Development): इस सम्मेलन में आर्थिक विकास के ऐसे तरीके अपनाने पर जोर दिया गया जिससे पर्यावरण को नुकसान न पहुँचे और भविष्य की पीढ़ियों की ज़रूरतें भी सुरक्षित रहें।
3. साझी संपदा की धारणा (Global Commons)
- अर्थ: ऐसी संपदा या संसाधन जिस पर किसी एक व्यक्ति, समाज या देश का संप्रभु अधिकार नहीं होता, बल्कि पूरे वैश्विक समुदाय का सामूहिक अधिकार होता है, उसे 'साझी संपदा' (Global Commons) कहते हैं।
- प्रमुख उदाहरण:
- पृथ्वी का वायुमंडल (Atmosphere)
- अंटार्कटिका महाद्वीप
- समुद्री सतह (Ocean Floor)
- बाह्य अंतरिक्ष (Outer Space)
- चुनौती: साझी संपदा के रखरखाव और नियम निर्धारण को लेकर विकसित और विकासशील देशों के बीच हमेशा मतभेद रहते हैं। इसका दोहन तकनीक और आर्थिक रूप से मजबूत विकसित देश ज्यादा करते हैं, लेकिन नुकसान सबको उठाना पड़ता है।
4. साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ (Common but Differentiated Responsibilities)
यह पर्यावरण कूटनीति का सबसे महत्वपूर्ण और केंद्रीय सिद्धांत है, जिसे 1992 के रियो पृथ्वी सम्मेलन में स्वीकार किया गया था।
- विकसित देशों का तर्क: पर्यावरण को नुकसान हर देश पहुँचा रहा है, इसलिए इसकी रक्षा करने की ज़िम्मेदारी भी दुनिया के सभी देशों की बराबर होनी चाहिए।
- विकासशील देशों का तर्क (भारत और चीन का पक्ष):
- वर्तमान में जो ग्लोबल वार्मिंग या पर्यावरण प्रदूषण दिख रहा है, वह पश्चिमी और विकसित देशों के अंधाधुंध औद्योगीकरण की देन है।
- विकासशील देश (जैसे भारत, चीन, ब्राजील) तो अभी विकास की प्रक्रिया में कदम रख रहे हैं। उनकी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन विकसित देशों के मुकाबले बहुत कम है।
- इसलिए विकासशील देशों पर पर्यावरण संरक्षण के वही सख्त नियम नहीं थोपे जा सकते जो विकसित देशों पर लागू होते हैं।
- सहमति का सिद्धांत: रियो घोषणापत्र में माना गया कि पर्यावरण की रक्षा करना सबकी 'साझी ज़िम्मेदारी' है, लेकिन प्रदूषण फैलाने के ऐतिहासिक रिकॉर्ड और आर्थिक-तकनीकी क्षमता के आधार पर विकसित देशों की 'अलग-अलग (ज्यादा) ज़िम्मेदारी' होगी।
5. क्योटो प्रोटोकॉल (Kyoto Protocol - 1997)
- परिभाषा: यह ग्लोबल वार्मिंग को रोकने और ग्रीनहाउस गैसों (जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन) के उत्सर्जन को कम करने के लिए किया गया एक अंतर्राष्ट्रीय समझौता था।
- स्थान व समय: इस पर 1997 में जापान के क्योटो शहर में सहमति बनी।
- भारत की भूमिका: भारत ने अगस्त 2002 में क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए और इसका अनुमोदन किया।
- विशेष छूट: क्योटो प्रोटोकॉल के पहले चरण में भारत, चीन और अन्य विकासशील देशों को ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने की बाध्यता से छूट दी गई थी, क्योंकि इनका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन वैश्विक औसत से बहुत कम था।
6. पर्यावरण आंदोलन: एक या अनेक?
पर्यावरण की रक्षा के लिए केवल सरकारें ही काम नहीं कर रही हैं, बल्कि पूरी दुनिया में जन-आंदोलनों (People's Movements) ने बड़ी भूमिका निभाई है:
- वनों के रक्षक: फिलीपींस, इंडोनेशिया और भारत (जैसे- चिपको आंदोलन) में वनों को व्यावसायिक कटाई से बचाने के लिए स्थानीय आदिवासियों और गरीब जनता ने बड़े आंदोलन किए।
- खनन विरोधी आंदोलन: बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा खनिजों के अंधाधुंध दोहन के कारण नदियों के प्रदूषित होने और स्थानीय लोगों के विस्थापन के खिलाफ ऑस्ट्रेलिया, लातविया और भारत में बड़े आंदोलन हुए हैं।
- बांध विरोधी आंदोलन: बड़े बांधों के निर्माण से जलभराव, जंगलों के डूबने और लाखों लोगों के बेघर होने के खिलाफ आंदोलन हुए हैं। भारत में 'नर्मदा बचाओ आंदोलन' इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
7. प्राकृतिक संसाधनों की भू-राजनीति (Resource Politics)
वैश्विक राजनीति में संसाधनों (विशेषकर तेल और पानी) पर नियंत्रण पाने के लिए हमेशा संघर्ष और युद्ध होते रहे हैं:
- इमारती लकड़ी और खनिज: औपनिवेशिक काल में यूरोपीय देशों ने एशिया और अफ्रीका के देशों पर कब्जा केवल वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने के लिए किया था।
- पेट्रोलियम (तेल): 20वीं सदी की राजनीति पूरी तरह 'तेल की राजनीति' रही है। खाड़ी देशों (Middle East) के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है। अमेरिका द्वारा 1990 का खाड़ी युद्ध और 2003 में इराक पर किया गया हमला सीधे तौर पर तेल भंडारों पर नियंत्रण स्थापित करने की कूटनीति का हिस्सा माना जाता है।
- जल (पानी): स्वच्छ पानी की कमी के कारण नदियों के जल के बंटवारे को लेकर देशों के बीच हिंसक टकराव की स्थिति बनती रही है। उदाहरण के लिए— नील नदी के पानी को लेकर मिस्र, सूडान और इथियोपिया के बीच, तथा जॉर्डन नदी के पानी को लेकर इजराइल और सीरिया के बीच विवाद रहे हैं।
8. मूलवासी और उनके अधिकार (Indigenous People)
- परिभाषा: संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) के अनुसार, 'मूलवासी' उन लोगों के वंशज हैं जो किसी देश या क्षेत्र में बहुत प्राचीन काल से (बाहरी संस्कृतियों या देशों के आने से पहले से) रहते आ रहे हैं और आज भी अपनी विशिष्ट सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार जीवन जीते हैं।
- उदाहरण: भारत के आदिवासी, अमेरिका के 'रेड इंडियंस', और ऑस्ट्रेलिया के 'एबोरिजिनल'।
- अधिकारों की लड़ाई: मूलवासी पूरी तरह से जंगलों, ज़मीन और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर होते हैं। आधुनिक विकास और औद्योगीकरण के नाम पर उनकी ज़मीनों को छीना जा रहा है और उन्हें विस्थापित किया जा रहा है। 1975 में 'वर्ल्ड काउंसिल ऑफ इंडिजिनस पीपल्स' का गठन हुआ, जो संयुक्त राष्ट्र में इनके अधिकारों की वकालत करता है।
9. पर्यावरण के मुद्दों पर भारत का दृष्टिकोण (India's Stand)
भारत पर्यावरण संरक्षण के वैश्विक प्रयासों में एक जिम्मेदार और सक्रिय भूमिका निभाता रहा है:
- ऐतिहासिक रिकॉर्ड की वकालत: भारत हमेशा अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर 'साझी परंतु अलग-अलग ज़िम्मेदारियों' के सिद्धांत को सख्ती से उठाने का पक्षधर रहा है। भारत का मानना है कि विकसित देशों को विकासशील देशों को वित्तीय मदद और पर्यावरण-अनुकूल तकनीक (Clean Technology) देनी चाहिए।
- राष्ट्रीय प्रयास: भारत ने अपनी घरेलू नीतियों में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं:
- राष्ट्रीय सौर मिशन (National Solar Mission): सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए बड़े पैमाने पर काम किया जा रहा है।
- स्वच्छ ईंधन: देश में सीएनजी (CNG), एलपीजी (LPG) और अब इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) तथा बायो-फ्यूल (Bio-fuels) के इस्तेमाल को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है।
- पेरिस जलवायु समझौता (2015): भारत इस समझौते का हिस्सा है और अपनी कार्बन उत्सर्जन तीव्रता को कम करने के लिए तय लक्ष्यों पर समय से आगे चल रहा है।
- अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA): भारत और फ्रांस ने मिलकर 'इंटरनेशनल सोलर एलायंस' की शुरुआत की है, जिसका मुख्यालय गुरुग्राम (भारत) में है। इसका उद्देश्य सूर्य की रोशनी वाले देशों में सौर ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देना है।
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