अमरकांत
हिन्दी के सशक्त कथाकार अमरकांत का जन्म जुलाई 1925 ई० में नागरा, बलिया (उत्तरप्रदेश) में हुआ था। उन्होंने गवर्नमेंट हाईस्कूल, बलिया से हाईस्कूल की शिक्षा पायी। कुछ समय तक उन्होंने गोरखपुर और इलाहाबाद में इंटरमीडिएट की पढ़ाई की, जो 1942 के स्वाधीनता संग्राम में शामिल होने से अधूरी रह गयी, और अंततः 1946 ई० में सतीशचंद्र कॉलेज बलिया से इंटरमीडिएट किया। उन्होंने 1947 ई० में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी० ए० किया और 1948 ई० में आगरा के दैनिक पत्र 'सैनिक' के संपादकीय विभाग में नौकरी कर ली। आगरा में ही वे 'प्रगतिशील लेखक संघ' में शामिल हुए और वहीं से कहानी लेखन की शुरुआत की। बाद में वे दैनिक 'अमृत पत्रिका' इलाहाबाद, दैनिक 'भारत' इलाहाबाद, मासिक पत्रिका 'कहानी' इलाहाबाद तथा 'मनोरमा' इलाहाबाद के भी संपादकीय विभागों से सम्बद्ध रहे। अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में उनकी कहानी 'डिप्टी कलक्टरी' पुरस्कृत हुई थी। उन्हें कथा लेखन के लिए 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' भी प्राप्त हो चुका है।
आजादी के बाद के हिंदी कथा साहित्य के महत्त्वपूर्ण कथाकार अमरकांत की कहानियों में मध्यवर्ग, विशेषकर निम्न मध्यवर्ग के जीवनानुभवों और जिजीविषा का बेहद प्रभावशाली और अंतरंग चित्रण मिलता है। अक्सर सपाट नजर आनेवाले कथनों में भी वे अपने जीवंत मानवीय संस्पर्श के कारण अनोखी आभा पैदा कर देते हैं। अमरकांत के व्यक्तित्व की तरह उनकी भाषा में भी एक खास किस्म का फक्कड़पन है। लोकजीवन के मुहावरों और देशज शब्दों के प्रयोग से उनकी भाषा में एक ऐसी चमक पैदा हो जाती है जो पाठकों को निजी लोक में ले जाती है। अमरकांत के कई कहानी संग्रह और उपन्यास हैं। 'जिंदगी और जॉक', 'देश के लोग', 'मौत का नगर', 'मित्र-मिलन', 'कुहासा' आदि उनके कहानी संग्रह हैं और 'सूखा पत्ता', 'आकाशपक्षी', 'काले उजले दिन', 'सुखजीवी', 'बीच की दीवार', 'ग्राम सेविका' आदि उपन्यास हैं। उन्होंने 'वानर सेना' नामक एक बाल उपन्यास भी लिखा है।
अमरकांत की प्रस्तुत कहानी में मँझोले शहर के नौकर की लालसा वाले एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार में काम करनेवाले बहादुर की कहानी है एक नेपाली गवई गोरखे की। परिवार का नौकरी पेशा मुखिया तटस्थ स्वर में बहादुर के आने और अपने स्वच्छंद निश्छल स्वभाव की आत्मीयता के साथ नौकर के रूप में अपनी सेवाएँ देने के बाद एक दिन स्वभाव की उसी स्वच्छंदता के साथ हर हृदय में एक कसकती अंतर्व्यथा देकर चले जाने की कहानी कहता है। लेखक घर के भीतर और बाहर के यथार्थ को बिना बनाई सँवारी सहज परिपक्व भाषा में पूरी कहानी बयान करता है। हिंदी कहानी में एक नये नायक को यह कहानी प्रतिष्ठित करती है।
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तीस मार खान
सहसा मैं काफी गंभीर हो गया था, जैसा कि उस व्यक्ति को हो जाना चाहिए, जिस पर एक भारी दायित्व आ गया हो। वह सामने खड़ा था और आँखों को बुरी तरह मलका रहा था। बारह-तेरह वर्ष की उम्र । ठिगना चकइठ शरीर, गोरा रंग और चपटा मुँह। वह सफेद नेकर, आधी बाँह की ही सफेद कमीज और भूरे रंग का पुराना जूता पहने था। उसके गले में स्काउटों की तरह एक रूमाल बँधा था । उसको घेरकर परिवार के अन्य लोग खड़े थे। निर्मला चमकती दृष्टि से कभी लड़के को देखती और कभी मुझको और अपने भाई को। निश्चय ही वह पंच-बराबर हो गई थी।
उसको लेकर मेरे साले साहब आए थे। नौकर रखना कई कारणों से बहुत जरूरी हो गया था। मेरे सभी भाई और रिश्तेदार अच्छे ओहदों पर थे और उन सभी के यहाँ नौकर थे। मैं जब बहन की शादी में घर गया तो वहाँ नौकरों का सुख देखा। मेरी दोनों भाभियाँ रानी की तरह बैठकर चारपाइयाँ तोड़ती थीं, जबकि निर्मला को सबेरे से लेकर रात तक खटना पड़ता था। मैं ईर्ष्या से जल गया। इसके बाद नौकरी पर वापस आया तो निर्मला दोनों जून 'नौकर-चाकर' की माला जपने लगी। उसकी तरह अभागिन और दुखिया स्त्री और भी कोई इस दुनिया में होगी? वे लोग दूसरे होते हैं, जिनके भाग्य में नौकर का सुख होता है…..।
पहले साले साहब से असाधारण विस्तार से उसका किस्सा सुनना पड़ा। वह एक नेपाली था, जिसका गाँव नेपाल और बिहार की सीमा पर थान उसका बाप युद्ध में मारा गया था और उसकी माँ सारे परिवार का भरण-पोषण करती थी। माँ उसकी बड़ी गुस्सैल थी और उसको बहुत मारती थी। माँ चाहती थी कि लड़का घर के काम-धाम में हाथ बटाये, जबकि वह पहाड़ या जंगलों में निकल जाता और पेड़ों पर चढ़कर चिड़ियों के घोंसलों में हाथ डालकर उनके बच्चे पकड़ता या फल तोड़-तोड़कर खाता। कभी-कभी वह पशुओं को चराने के लिए ले जाता था। उसने एक बार उस भैंस को बहुत मारा, जिसको उसकी माँ बहुत प्यार करती थी, और इसीलिए जिससे वह बहुत चिढ़ता था। मार खाकर भैंस भागी-भागी उसकी माँ के पास चली गई, जो कुछ दूरी पर एक खेत में काम कर रही थी। माँ का माथा ठनका। बेचारा बेजुबान जानवर चरना छोड़कर वहाँ क्यों आएगा? जरूर लौंडे ने इसको काफी मारा है। वह गुस्से से पागल हो गई। जब लड़का आया तो माँ ने भैंस की मार का काल्पनिक अनुमान करके एक डंडे से उसकी दुगुनी पिटाई की और उसको वहीं कराहता हुआ छोड़कर घर लौट आई। लड़के का मन माँ से फट
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गया और वह रात भर जंगल में छिपा रहा। जब सबेरा होने को आया तो वह घर पहुँचा और किसी तरह अन्द्र चोरी-चुपके घुस गया। फिर उसने भी की होडया में हाथ डालकर माँ के रखे रुपयों में से दो रुपये निकाल लिए। अन्त में नौ दो ग्यारह हो गया। वहाँ से छह मील की दूरी पर बस-स्टेशन था, वहाँ गोरखपुर जानेवाली बस थी ।
तुम्हारा नाम क्या है जी ? मैंने पूछा ।
- दिल बहादुर, सर.
उसके स्वर में एक मोठी झनझनाहट थी। मुझे ठीक-ठीक याद नहीं कि मैंने उसको क्या हिदायतें दीं। शायद यह कि वह शरारतें छोड़कर ढंग से काम करे और घर को अपना घर समझे। इस घर में नौकर-चाकर को बहुत प्यार और इन्जत से रखा जाता है। जो सत्ब खाते-पहनते हैं, वही नौकर चाकर खाते पहनते हैं। अगर वह यहाँ रह गया तो ढंग शऊर सीख जाएगा, घर के और लड़कों की तरह पढ़-लिख जाएगा और उसकी जिंदगी सुधर जाएगी। निर्मला ने उसी समय कुछ व्यावहारिक उपदेश दे डाले थे। इस मुहल्ले में बहुत तुच्छ लोग रहते हैं, वह न किसी के यहाँ जाए और न किसी का काम करे। कोई बाजार से कुछ लाने को कहे तो वह 'अभी आता हूँ' कहकर अन्दर खिसक जाए। उसको घर के सभी लोगों से सम्मान और तमीज से बोलना चाहिए । और भी बहुत-सी बातें। अन्त में निर्मला ने बहुत ही उदारतापूर्वक लड़के के नाम में से 'दिल' शब्द उड़ा दिया ।
परन्तु बहादुर बहुत हो हँसमुख और मेहनती निकला। उसकी वजह से कुछ दिनों तक हमारे वर में वैसा ही उत्साहपूर्ण वातावरण छाया रहा, जैसा कि प्रथम बार तोता मैना या पिल्ला पालने पर होता है। सबेरे सबेरे ही मुहल्ले के छोटे लड़के वर के अन्दर आकर खड़े हो जाते और उसको देखकर हँसते या तरह-तरह के प्रश्न करते । 'ऐ, तुम लोग छिपकली को क्या कहते हो ?' 'एं, तुमने शेर देखा है?' ऐसी ही बातें। उससे पहाड़ी गाने की फरमाइशें की जातीं। घर के लोग भी उससे इसी प्रकार की छेड़खानियों करते थे। वह जितना उत्तर देता था उससे अधिक हँसता था । सबको उसके खाने और नाश्ते की बड़ी फिक्र रहती ।
निर्मला आँगन में खड़ी होकर पड़ोसियों को सुनाते हुए कहती थी बहादुर, आकर नाश्ता क्यों नहीं कर लेते ? मैं दूसरी औरतों को तरह नहीं हूँ, जो नौकर चाकर को जलाती-भुनती हैं। मैं तो नौकर चाकर को अपने बच्चे की तरह रखती हूँ। उन्होंने तो साफ-साफ कह दिया है कि सौ-डेढ़ सौ महीनवारी उस पर भले ही खर्च हो जाए, पर तकलीफ उसको जरा भी नहीं होनी चाहिए । एक नेकर-कमीज तो उसी रोज लाए थे… और श्री कपड़े बन रहे हैं…
धीरे धीरे वह घर के सारे काम करने लगा। सबेरे ही उठकर वह बाहर नीम के पेड़ से दातुन तोड़ लाता था । वह हाथ का सहारा लिए बिना कुछ दूर तक तने पर दौड़ते हुए चढ़ जाता। मिनट भर में वह पेड़ की पुलई पर नजर आता। निर्मला छाती पीटकर कहती थी- अरे रीछ-बन्दर की जात, कहीं गिर गया तो बड़ा बुरा होगा। वह घर की सफाई करता, कमरों में पोंछा
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लगाता, अँगीठी जलाता, चाय बनाता और पिलाता। दोपहर में कपड़े धोता और बर्तन मलता। वह रसोई बनाने की भी जिद करता, पर निर्मला स्वयं सब्जी और रोटी बनाती निर्मला को उसकी बहुत फिक्र रहती थी । उसकी उन दिनों तबीयत ठीक नहीं रहती थी, इसलिए वह कुछ दवा ले रही थी। बहादुर उसको कोई काम करते देखकर कहता था माता जी, मेहनत न करो, तकलीफ बढ़ जाएगा । वह कोई भी काम करता होता, समय होने पर हाथ धोकर भालू की तरह दौड़ता हुआ कमरे में जाता और दवाई का डिब्बा निर्मला के सामने लाकर रख देता ।
जब मैं शाम को दफ्तर से आता, तो घर के सभी लोग मेरे पास आकर दिन भर के अपने अनुभव सुनाते थे। बाद में वह भी आता था। वह एक बार मेरी ओर देखकर सिर झुका लेता और धीरे-धीरे मुस्कराने लगता। वह कोई बहुत ही मामूली घटना की रिपोर्ट देता । - बाबूजी, बहिन जी का एक सहेली आया था। या बाबू जी, भैया सिनेमा गया था। इसके बाद वह इस तरह हँसने लगता था, गोया बहुत ही मजेदार बात कह दी हो। उसकी हँसी बड़ी कोमल और मीठी थी, जैसे फूल की पंखुड़ियाँ बिखर गई हों में उससे बातचीत करना चाहता था, पर ऐसी इच्छा रहते हुए भी मैं जान-बूझकर बहुत गम्भीराहो जाता था और दूसरी ओर देखने लगता था ।
निर्मला कभी-कभी उससे पूछती भी बहादुर, तुमको अभी थाँ की बाद आती है ?
नहीं ।
क्यों ?
बात हो । वह मारता क्यों था ? इतना कहकर वह खूब हँसता था, जैसे मार खाना खुशी की
तब तुम अपना पैसा माँ के पास कैसे भेजने को कहते हो ?
माँ-बाप का कर्जा तो जन्म भर भरा जाता है वह और भी हँसता था ।
निर्मला ने उसको एक फटी पुरानी दरी दे दी थी। घर से वह एक चादर भी ले आया था । रात को काम-धाम करने के चाद वह भीतर के बरामदे में एक टूटी हुई बैसखट पर अपना बिस्तर बिछाता था। वह विस्तरे पर बैठ जाता और अपनी जेब में से कपड़े की एक गोल-सी नेपाली टोपी निकालकर पहन लेता, जो बाई ओर काफी झुकी रहती थी। फिर वह एक छोटा-सा आईना निकालकर बन्दर की तरह उसमें अपना मुँह देखता था। वह बहुत ही प्रसन्न नजर आता था । इसके बाद कुछ और भी चीजें उसकी जेब से निकलकर उसके बिस्तरे पर सज जाती थीं - कुछ गोलियाँ, पुराने ताश की एक गड्डी, कुछ खूबसूरत पत्थर के टुकड़े, ब्लेड, कागज की नावें । वह कुछ देर तक उनसे खेला था। उसके बाद वह धीमे-धीमे स्वर में गुनगुनाने लगता था। उन पहाड़ी गानों का अर्थ हम समझ नहीं पाते थे, पर उसकी मीठी उदासी सारे घर में फैल जाती, जैसे कोई पहाड़ की निर्जनता में अपने किसी बिलुड़े हुए साथी को बुला रहा हो ।
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दिन मजे में बीतने लगे। बरसात आ गई थी। पानी रुकता था और बरसता था। मैं अपने
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को बहुत ऊँचा महसूस करने लगा था। अपने परिवार और सम्बन्धियों के बड़प्पन तथा शान-बान पर मुझे सदा गर्व रहा है। अब मैं मुहल्ले के लोगों को पहले से भी तुच्छ समझने लगा। मैं किसी से सीधे मुँह बात नहीं करता। किसी की ओर ठीक से देखता भी नहीं था। दूसरे के बच्चों को मामूली-सी शरारत पर डॉट-डपट देता । कई बार पड़ोसियों को सुना चुका था जिसके पास कलेजा है, वही आजकल नौकर रख सकता है। घर के सवांग की तरह रहता है। निर्मला भी सारे मुहल्ले में शुभ सूचना दे आई थी आधी तनख्वाह तो नौकर पर ही खर्च हो रही है, पर रुपया-पैसा कमाया किसलिए जाता है ? वे तो कई बार कह ही चुके थे कि तुम्हारे लिए दुनिया के किसी कोने से नौकर जरूर लाऊँगा….वही हुआ ।
निस्संदेह बहादुर की वजह से सबको खूब आराम मिल रहा था। घर खूब साफ और चिकना रहता । कपड़े चम्माचम सफेद । निर्मला की तबीयत भी काफी सुधर गई । अब कोई एक खर भी न टसकाता था। किसी को मामूली से मामूली काम करना होता, तो वह बहादुर को आवाज देता । 'बहादुर, एक गिलास पानी। बहादुर, पेन्सिल नीचे गिरी है, उठाना । इसी तरह की फरमाइशें । बहादुर घर में फिरकी की तरह नाचता रहता में सभी रात में पहले ही सो जाते थे और सबेरे, आठ बजे के पहले न उठते थे ।
मेरा बड़ा लड़का किशोर काफी शान शौकत और रोज दाब से रहने का कायल था और उसने बहादुर को अपने कड़े अनुशासन में रखने की आवश्यकता महसूस कर ली थी। फलतः उसने अपने सभी काम बहादुर को सौंप दिए । सबैर उसके जूते में पालिश लगनी चाहिए। कॉलेज जाने के ठीक पहले साइकिल की सफाई जरूरी थी। राज हो उसके कपड़ों की धुलाई और इस्त्री होनी चाहिए। और रात में सोते समय वह नित्य बहादर से अपने शरीर की मालिश कराता और मुक्की भी लगवाता । पर इतनी सारी फरमाइशों की पूर्ति में कभी-कभी कोई गड़बड़ी भो हो जाती। जब ऐसा होता, किशोर गर्जन-तर्जन करने लगता, उसको बुरी-बुरी गालियाँ देता और उस पर हाथ छोड़ देता । भार खाकर बहादुर एक कोने में खड़ा हो जाता चुपचाप ।
- देख-वे किशोर चेतावनी देता मेरा काम सबसे पहले होना चाहिए। अगर एक काम भी छूटा तो मारते-मारते हुलिया टाइट कर दूँगा। साला, कामचोर, करता क्या है तू ? बैठा-बैटा खाता है।
रोज ही, कोई-न-कोई ऐसी बात होने लगी. जिसकी रिपोर्ट पत्नी मुझे देती थी । मैंने किशोर को मना किया, पर वह नहीं माना तो मैंने यह सोचकर छोड़ दिया कि थोड़ा बहुत तो यह चलता ही रहता है। फिर एक हाथ से ताली कहाँ बजती है ? बहादुर भी बदमाशी करता होगा। पर एक दिन जब में दफ्तर से आया तो मैंने किशोर को एक डंडे से बहादुर की पिटाई करते हुए देखा । निर्मला कुछ दूरी पर खड़ी होकर हाँ हाँ करती हुई मना कर रही थी ।
मैंने किशोर को डाँट कर अलग किया। कारण यह था कि शाम को साइकिल की सफाई करना बहादुर भूल गया था। किशोर ने उसको भारा तथा गालियाँ दी तो उसने उसका काम करने
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से ही इनकार कर दिया ।
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- तुम साइकिल साफ क्यों नहीं करते? मैंने उससे कड़ाई से पूछा ।
- बाबू जी, भैया ने मेरे बाप को क्यों लाकर खड़ा किया? वह रोते हुए बोला ।
मैं जानता था कि किशोर उसको और भी भद्दी गालियाँ देता था, लेकिन आज उसने 'सूअर का बच्चा' कहा था, जो उसे बरदाश्त न हुआ। निस्संदेह वह गाली उसके बाप पर पड़ती थी । मुझे कुछ हँसी आ गई। खैर, किशोर के व्यवहार को अच्छा नहीं कहा जा सकता था, पर गृहस्वामी होने के कारण मुझ पर कुछ और गम्भीर दायित्व भी थे ।
मैंने उसे समझाया बहादुर, ये आदतें ठीक नहीं। तुम ठीक से काम करोगे तो तुमको कोई कुछ भी नहीं कहेगा। मेहनत बहुत अच्छी चीज है, जो उससे बचने की कोशिश करता है, वह कुछ भी नहीं कर सकता। रूठना-फूलना मुझे सख्त नापसंद है। तुम तो घर के लड़के की तरह हो । घर के लड़के मार नहीं खाते ? हम तुमको जिस सुख-आराम से रखते हैं, वह कोई क्या रखेगा ? जाकर दूसरे घरों में देखो तो पता लगे। नौकर-चाकर भरपेट भोजन के लिए तरसते रहते हैं। चलो, सब खत्म हुआ, अब काम करो….
वह चुपचाप सुनता रहा। फिर हाथ मुँह धोकर काम करने लगा। जल्दी वह प्रसन्न भी हो गया। रात में सोते समय वह अपनी टोपी पहनकर देर तक गाता रहा ।
लेकिन कुछ दिनों बाद एक और भी गड़बड़ी शुरू हुई। निर्मला बहुत पतली-पतली रोटियाँ सेंकती थी, इसलिए वह रोटी बनाने का काम कभी भी बहादुर से नहीं लेती थी। लेकिन मुहल्ले की किसी औरत ने उसे यह सिखा दिया कि परिवार के लिए रोटियाँ बनाने के बाद वह बहादुर से कहे कि वह अपनी रोटी खुद बना लिया करे, नहीं तो नौकर-चाकर की आदतें खराब हो जाती हैं, महीन खाने से उनकी आदत बिगड़ जाती है।
यह बात निर्मला को जँच गई थी और रात में उसने ऐसा ही प्रयोग किया वह अपनी सोल । बहादुर का मुँह उतर गया। वह चूल्हे के पास सिर शेष रोटियाँ बनाकर चौके में से उठ गई। झुकाकर चुपचाप खड़ा रहा ।
- क्या हो गया, रे? निर्मला ने पूछा।
वह कुछ नहीं बोला ।
-चल, चुपचाप बना अपनी रोटियाँ। तू सोचता है कि मैं तुझे पतली-पतली, नरम-नरम रोटियाँ सेंककर खिलाऊँगी ? तू कोई घर का लड़का है? नौकर-चाकर तो अपना बनाकर खाते ही रहते हैं। तीता तो इनको इसलिए लग रहा है कि सारे घर के लिए मैंने रोटियाँ बनाईं, इनको अलग करके इनके साथ भेद क्यों किया ? वाह रे, इसके पेट में तो लम्बी दाढ़ी है। समझ जा, रोटियाँ नहीं सेंकेगा तो भूखा रहेगा।
पर बहादुर उसी तरह खड़ा रहा तो निर्मला का गुस्से से बुरा हाल हो गया। उसने लपककर उसके माथे पर दो-तीन थप्पड़ जड़ दिए सूअर कहीं के इसीलिए तुझे किशोर मारता
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है। इसी वजह से तेरी माँ भी मारती होगी। चल, बना रोटी……
मैं नहीं बनाऊँगा…. मेरी माँ भी सारे घर की रोटियाँ बनाकर मुझये रोटी सेंकवाती थी वह रोने लगा था।
तो क्या मैं तेरी माँ हूँ कि तू मुझसे जिद कर रहा है ? घर के लड़कों के बराबर बन रहा है ? मारते-मारते मुँह रंग दूंगी ।
पर उसने अपने लिए रोटी नहीं बनाई । मुझे भी बड़ा गुस्सा आया। मैंने उसको डाँटा और समझाया। पर वह नहीं माना। रात भर वह भूखा ही रहा ।
पर सबेरे उठकर वह पहले की तरह ही हँसने लगा। उसने अँगीठी जला कर अपने लिए रोटियाँ सेंकीं। अपनी बनाई मोटी और भद्दी रंटियों को देखकर वह खिलखिलाने लगा। फिर रात की बची हुई सब्जी से उसने खाना खा लिया।
लेकिन निर्मला का भी हाथ खुल गया था। वह उससे कुछ चिढ़ भी गई थी । अब बहादुर से कोई भी गलती होती तो वह उस पर हाथ बला देती। उसको मारनेवाले अब घर में दो व्यक्ति हो गए थे और कभी-कभी एक गलती के लिए उसको दोनों मारते ।
बरसात बीत गई थी। आकाश दर्पण की तरह स्वच्छ दिखलाई देता । मैंने बहादुर की माँ के पास चिट्ठी लिखी थी कि उसका लड़का मेरे पास मजे में है और मैं उसकी तनख्वाह के पैसे उसके पास भेज दिया करूँगा, लेकिन कई महीनों के बाद भी उधर से कोई जवाब नहीं आया था । मैंने बहादुर से कह दिया था कि उसका पैसा यहाँ जमा रहेगा, जब वह घर जाएगा तो लेता जाएगा।
पर अब बहादुर से भूल-गलतियाँ अधिक होने लगी थीं। शायद इसका कारण भार-पीट और गाली-गलौज हो। मैं कभी-कभी इसको रोकना चाहता, फिर यह सोचकर चुप लगा जाता कि नौकर-चाकर तो मार-पीट खाते ही रहते हैं।
एक दिन रविवार को मेरी पत्नी के एक रिश्तेदार आए। वह बीबी-बच्चों के साथ थे। वह अपने किसी खास संबंधी के यहाँ आए थे, तो यहाँ भी भेंट-मुलाकात करने के लिए चले आए थे। घर में बड़ी चहल-पहल भच गई। मैं बाजार से रोहू भहली और देहरादूनी चावल ले आया। नाश्ता-पानी के बाद बातों की जलेबी छनने लगी। पर इसी समय एक घटना हो गई ।
अचानक उस रिश्तेदार की पत्नी नीचे फर्श पर झुककर देखने लगीं। फिर उन्होंने चारपाई के अन्दर झांककर देखा। अन्त में कमरे के अन्दर गई और फर्श पर पड़े हुए कागजों को उठाकर जाँच-पड़ताल कारने लगीं ।
क्या बात है ? - मैंने पूछा ।
रिश्तेदार की पत्नी जबरदस्ती मुस्कराकर मजबूरी में सिर हिलाते हुए बोली- क्या बताएँ, …ग्यारह रुपए साड़ी के खूंट से निकालकर यहीं चारपाई पर रखे….पर वे मिल नहीं रहे हैं…
- आपको ठीक याद है न…..
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हाँ-हाँ - खूब अच्छी तरह याद है। ये रुपए मैंने खूंट में बाँधकर रखे थे… रिक्शेवाले को देने के लिए खूँट खोला ही था, फिर वे रुपए चारपाई पर रख दिए थे कि चार रुपए की मिठाई मँगा लूंगी और कुछ बच्चों के हाथ पर रख दूँगी। रास्ते में कोई ढंग की दुकान नहीं मिली थी, नहीं तो उधर से ही लाती। किसी के यहाँ खाली हाथ जाने में अच्छा भी नहीं लगता। बताइए, अब तो मैं कहीं की न रही। फिर मेरी ओर झुक कर धीमे स्वर में कहा था- जरा उससे पूछिए न । वह इधर आया था। कुछ देर तक यहाँ खड़ा रहा, फिर तेजी से बाहर चला गया था।
अरे नहीं, वह ऐसा नहीं है मैंने कहा ।
यू डू नॉट नो-दीज पीपुल आर एक्सपर्ट इन दिस आर्ट' रिश्तेदार ने कहा ।
मैंने बहादुर की ओर तिरक्षी दृष्टि से देखा। वह सिर झुकाकर आटा गूँथ रहा था। उसके चेहरे पर संतुष्टि एवं प्रफुल्लता थी। उसने ऐसा काम तो कभी नहीं किया, बल्कि जब कभी उसने दो-चार आने इधर-उधर पड़े देखे जो उठाकर निर्मला के हाथ में दे दिए थे। पर किसी के दिल की बात कोई कैसे जान सकता है के न मालूम अचानक मुझे क्या हो गया और मैं गुस्से में आ गया ।
नहादुर । मैंने कड़े स्वर में कहा ।
जी, बाबू जी ।
इधर आओ ।
-वह आकर खड़ा हो गया।
- तुमने यहाँ से रुपए उठाए थे ?
-जी नहीं बाबूजी । उसने निर्भय उत्तर दिया ।
-ठीक बताओ… मैं बुरा नहीं मानूँगा ।
नहीं बाबूजी। मैं लेता, तो बता देता ।
तुम यहाँ खड़े नहीं थे ? रिश्तेदार की पत्नी ने कहा फिर तेजी से बाहर चले गए। देखो भैया, सच-सच बता दो। मिठाई खरीदने और बच्चों को देने के लिए वे रुपए रखे थे। मैं तो बुरी फँसी। अब वापस जाने के लिए रिक्शे के भी पैसे नहीं ।
मैं तो बाहर नमक लेजे गया था ।
सच-सच बता बहादुर आगर नहीं बताएगा तो बहुत पीदूँगा और पुलिस के सुपुर्द कर
दूँगा। मैं चिल्ला पड़ा ।
मैंने नहीं लिया, बाबूजी । बहादुर का मुँह काला पड़ गया था ।
पता नहीं मुझे क्या हो गया। मैंने सहसा उछलकर उसके गाल पर एक तमाचा जड़ दिया। मैं आशा कर रहा था कि ऐसा करने से वह बता देगा। तभाचा खाकर वह गिरते-गिरते बचा। उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे ।
मैंने नहीं लिया…
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इसी समय रिश्तेदार साहब ने एक अजीब हरकत की अच्छा छोड़िए, इसको पुलिस के पास ले जाता हूँ। - इतना कहकर उन्होंने बहादुर का हाथ पकड़ लिया और उसको दरवाजे की ओर घसीटकर ले गए। पर दरवाजे के पास उससे धीरे से बोले देखो, तुम मुझे बता दो…. मैं कुछ नहीं करूँगा, बल्कि तुमको इनाम में दो रुपए दे दूँगा ।
पर बहादुर ने इनकार कर दिया। इसके बाद रिश्तेदार साहब दो-तीन बार उसको दरवाजे की ओर खींचकर ले गए, जैसे पुलिस को देने ही जा रहे हैं। लेकिन आगे बढ़कर वह रुक जाते और उससे धीमे-धीमे शब्दों में पूछ-ताछ करने लगते ।
अन्त में हारकर उन्होंने उसको छोड़ दिया और वापस आकर चारपाई पर बैठते हुए हँसकर बोले- जाने दीजिए…. ये सब बड़े घाघ होते हैं। किसी झाड़ी-वाड़ी में छिपा आया होगा या जमीन में गाड़ आया होगा। मैं तो इन सबों को खूब जानता हूँ। भालू-बन्दर से कम थोड़े होते हैं ये। चलिए, इतना नुकसान लिखा था ।
इसके बाद निर्मला ने भी उसको डराया धमकाया और दो-चार तमाचे जड़ दिए, पर वह 'नहीं-नहीं' करता रहा ।
इस घटना के बाद बहादुर काफी डाँट मार खाने लगा। घर के सभी लोग उसको कुत्ते की तरह दुरदुराया करते । किशोर तो जैसे उसकी जान के पीछे पड़ गया था। वह उदास रहने लगा और काम में लापरवाही करने लगा।
एक दिन मैं दफ्तर से विलम्ब से आया। निर्मला आँगन में चुपचाप सिर पर हाथ रखकर बैठी थी। अन्य लड़कों का पता नहीं था, केवल लड़की अपनी माँ के पास खड़ी थी। अँगीठी अभी नहीं जली थी। आँगन गंदा पड़ा था, बर्तन बिना मले हुए रखे थे। सारा घर जैसे काट रहा था । दिल सोलो
क्या बात है ? मैंने पूछा ।
बहादुर भाग गया ।
भाग गया! क्यों ?
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पटना एस
पता नहीं। आज तो कुछ हुआ भी नहीं था। सबेरे से ही बड़ा प्रसन्न था । हमेशा 'माताजी माताजी' किए रहा। दोपहर में खाना खाया। उसके बाद आँगन से सिल-बट्टा लेकर बरामदे में रखने जा रहा था कि सिल हाथ से छूटकर गिर गई और दो टुकड़े हो गई। शायद इसी डर से वह भाग गया कि लोग मारेंगे। पर मैं इसके लिए उसको थोड़े कुछ कहती ? क्या बताऊँ मेरी किस्मत में आराम ही नहीं….
कुछ ले गया ?
यही तो अफसोस है। कोई भी सामान नहीं ले गया है। उसके कपड़े, उसका बिस्तरा, उसके जूते - सभी छोड़ गया है। पता नहीं उसने हमें क्या समझा ? अगर वह कहता तो मैं उसे रोकती थोड़े ? बल्कि उसको खूब अच्छी तरह पहना ओढ़ाकर भेजती, हाथ में उसकी तनख्वाह
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के रुपए रख देती । यो चार रुपए और अधिक दे देती। पर वह तो कुछ ले ही नहीं गया….
और वे ग्यारह रुपए ?
अरे वह सब झूट है। मैं तो पहले की जानती थी कि वे लोग बच्चों को कुछ देना नहीं चाहते इसलिए अपनी गलती और लाज छिपाने के लिए यह प्रपंच रच रहे हैं। उन लोगों को क्या मैं जानती नहीं ? कभी उनके रुपए रास्ते में गुम हो जाते हैं. कभी वे गलती से घर ही पर छोड़ आते हैं। मेरे कलेजे में तो जैसे कुछ यँड़ रहा है। किशोर को भी बड़ा अफसोस है। उसने सारा शहर छान मारा, पर बहादुर नहीं मिला। किशार आकर कहने लगा अम्मा, एक बार भी अगर बहादुर आ जाता तो में उसको पकड़ लेता और कभी जाने न देता । उससे माफी माँग लेता और कभी नहीं मारता । सच, अब ऐसा नौकर कभी नहीं मिलेगा। कितना आराम दे गया है वह । अगर वह कुछ चुराकर ले गया होता तो संतोष हो जाता ।
निर्मला आँखों पर आँचल रखकर रोने लगी। मुझे बड़ा क्रोथ आया। मैं चिल्लाना चाहता था, पर भीतर ही भीतर कलेजा जैसे बैठ रहा हो। मैं वहीं चारपाई पर सिर झुकाकर बैठ गया। मुझे एक अजीब सी लघुता का अनुभव हो रहा था। यदि मैं न मारता, तो शायद वह न जाता ।
मैंने आँगन में नजर दौड़ाई। एक ओर स्टूल पर उसका बिस्तरा रखा था। अलगनी पर उसके कुछ कपड़े टँगे थे। स्टूल के नीचे वह भूरा जूता था, जा मेरे साले साहब के लड़के का था। मैं उठकर अलगनी के पास गया और उसके नेकर की जेब में हाथ डालकर उसके सामान निकालने लगा वहीं गोलियाँ, पुराने ताश की गड्डी, खूबसूरत पत्थर, ब्लेड, कागज की नावें….
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