बीएसटीबीपीसी-2015
पंडित बिरजू महाराज
एबीडी सॉल्यूशंस एब्सोल्ज़
- पटना एस
जित जित मैं निरखत हूँ
आज कलाप्रेमी जनसाधारण तथा नृत्य रसिकों के बीच कथक और बिरजू महाराज एक-दूसरे के पर्यायवाची से बन गये हैं। महाराज की अथक साधना, एकांतनिष्ठा और कल्पनाशील सर्जनात्मकता के संयोग से ही यह संभव हो सका है। कथक के व्याकरण और कौशल को उन्होंने सार्थक सौंदर्यबोध और काव्य दिया है। वे कथक के लालित्य के कवि हैं। परंपरा की प्रामाणिकता की रक्षा करते हुए उन्होंने सर्जनात्मक साहस के साथ कथक का अनेक नई दिशाओं में विस्तार किया है तथा यह सिद्ध किया है कि शास्त्रीय कला जड़ या स्थिर नहीं है। उसमें एक निरंतर गतिशीलता और समकालीनता बरकरार है।
लखनऊ घराने के वंशज और सातवीं पीढ़ी के इस कलाकार में मानो सातों पीढ़ियों का सौंदर्य केंद्रीभूत हो गया है। सौम्य, हँसमुख, मिलनसार व्यक्तित्व और सहज-निष्कपट लगभग बच्चे का भोलापन लिए बिरजू महाराज को देखकर इनकी महान प्रतिभा का अंदाज लगाना कठिन है। किंतु बात करते-करते उनका न जाने कहाँ खो जाना, उँगलियों का निरंतर गिनती में उलझे रहना और अचानक चेहरे पर नितांत शून्य भाव बेचैन करने वाला होता है। अचानक कुछ कौंधता-सा है उनकी आँखों में और फिर वही फुसलाती सी सरल मुस्कराहट, दोहरा बदन, मँझोला कद, चेचक के हल्के दाग और बड़ी आँखों वाला ढीलाढाला व्यक्ति मंच पर एकदम और ही हो जाता है। गजब
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का लोच, फुर्ती और हल्कापन….. कथक नृत्य का सौंदर्य मानो मूर्तिमान हो उठा हो ।
यहाँ बिरजू महाराज की सुयोग्य शिष्या मशहूर नृत्यांगना और रंगकर्म की पत्रिका 'नटरंग' की संपादक रश्मि वाजपेयी की महाराज से बातचीत किंचित संपादित रूप में अविकल प्रस्तुत है। बातचीत के बहाने बिरजू महाराज का अंतरंग जीवन उनके आत्मकथनों में झलक उठता है। पाठ के क्रोड़स्थ अंतःपाठ उन्हीं की दो काव्य रचनाओं के हैं।
अपने बारे में कुछ बताएँ ।
बिरंजू महाराज: जन्म मेरा लखनऊ के जफरीन अस्पताल में 1938, 4 फरवरी, शुक्रवार, सुबह
रश्मि वाजपेयी 8 बजे; वसंत पंचमी के एक दिन पहले हुआ। घर में आखिरी सन्तान । तीन बहनों के बाद। सबसे छोटी बहन मुझसे आठ नौ साल बड़ी। अम्मा तब 28 के लगभग रही होंगी। बहनों का जन्म रामपुर में क्योंकि बाबूजी यहाँ 22 साल रहे। बड़ी बहन लगभग 15 साल बड़ी । उस समय बाबूजी रायगढ़ आदि राजाओं के यहाँ भी गए। मैं डेढ़ दो साल का था। उस समय विभिन्न राजा कुछ समय के लिए कलाकारों को माँग लिया करते थे। पटियाला भी गए थे पहले। रायगढ़ दो ढाई साल रहे होंगे। रामपुर लौटकर आए। रामपुर काफी अरसे रहे। जब पाँच छह साल के थे तो अकसर नवाब याद कर लिया करते थे। हलकारे आ गए तो जाना ही पड़ता था। चाहे जो भी वक्त हो ।
छह साल की उम्र में मैं नवाब साहब को बहुत पसंद आ गया। मैं नाचता था जाकर । पीछे पैर मोड़कर बैठना पड़ता था। चूड़ीदार पैजामा साफा, अचकन पहन कर । अम्मा जी बेचारी बहुत परेशान । उन्होंने हमारे तनख्वाह भी बाँध दी थी। बाबूजी रोज हनुमानजी का प्रसाद माँगे कि 22 साल गुजर गए, अब नौकरी छूट जाए। नवाब साहब बहुत नाराज कि तुम्हारा लड़का नहीं होगा तो तुम भी नहीं रह सकते। खैर बाबू जी बहुत खुश हुए और उन्होंने मिठाई बाँटी । हनुमान जी को प्रसाद चढ़ाया कि जान छूटी।
वहाँ से फिर निर्मला जी (जोशी) के स्कूल में यहाँ दिल्ली में हिन्दुस्तानी डान्स म्यूजिक में चले गए। यहाँ दो तीन साल काम करते रहे। ये शायद 43 की बात रही होगी। उस उम्र में जुबली टॉकीज दिल्ली के बड़े भारी कांफ्रेंस में मेरा नाच रखा गया। यह हाल अभी भी है। इसमें मैं एक कलाकार के नाते आमंत्रित था। उस उम्र में न जाने क्या नाचा रहा होऊँगा। तबला बाबूजी ने बजाया। अकसर वे बजा देते थे। पर उन्होंने मेरी आदत डाल दी थी अक्सर जहाँ वे खुद नाचते तो पहले मुझे नचवाते थे और खूब जोरों से जमकर नाचता था। यों मुझे याद तो था नहीं पर वे जो बोल देते थे तो टुकड़े का मेजरमेंट मैं फट से याद कर लेता था। जैसे दिग दिग थेई ता थेई। मैं अंदाज कर लेता यह नाप मेरा ईश्वर की कृपा से शुरू में अच्छा रहा। खूब नाचा । उसी समय यहाँ कपिला जी, लीला कृपलानी आदि हिन्दुस्तानी डांस अकादेमी में थीं।
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बाबूजी के साथ मैं रोज आता था। हालाकि लौटते लौटते मुझे नींद आ जाती थी ताँगे में। मुझे हैट पहनने का बहुत शौक था। एक बार हैट पहने साँगे में लेटा था। पार्टिशन के कारण चैकिंग भी चल रही थी; हैट गिर गया तो उन्हें गुप्सा आया आते हैं स्कूल और सो जाते हैं। फिर उठाया । इाण्डेवालान के पास उस समय यों भी डर लगता था पहाड़ी से रात में। बाबूजी के हाथ में छड़ी देखकर पुलिसवाले ने टोका भी, क्योंकि उन दिनों यह सब नहीं रख सकते थे । खैर उन दिनों ऐसे ही दिन बीतते रहे। लेकिन कपिला जी लीलाजी की जो हायर ट्रेनिंग होती थी- वड़ मैं याद कर लेता था और अगले दिन बाबूजी से कहूँ कि मुझे याद हो गया तो जानते नहीं थे। फिर जब अम्मा जी कहें सुन लो ऐसे परन किड तक धुन-धुन सात साल की उम्र में खूब सुनाता का यह नहीं था कि जम गए से यहाँ हूँ। तब जहाँ भी नौकरी आ गए दो तीन महीने । यह महीने दिल्ली चले आए। बंदिश मेरा भी मन नहीं लगता और तरह वक्त बीता । यहाँ दिल्ली लगे काटा मारी होने लगी तो चले गए ।
श्याम श्याम श्याम है ॥ वृक्षन की पतियन में फूलन की कलियन में पवन के झकोरन में श्याम श्याम श्याम है ॥ गुणियन के तालन में यायक के स्वरन में कवियन के हृदय में श्याम श्याम श्याम है ॥ में जब हिन्दू-मुस्लिम दंगे होने याही ब्रजश्याम तोसाँ अरज करे कर जोरे अंत हैं शरण पाऊँ श्याम श्याम श्याम है ।॥
और मस्का लगाएँ तो सुनते थे। तो
नातिट ता धाधिनता। ये परनें उस
उनको । दरअसल उस समय नौकरी
एक ही जगह । जैसे में 28 साल
को वहाँ रहे कुछ दिन फिर लखनऊ
स्वतंत्रता थी । रामपुर हैं तो तीन
नहीं थी कि कहीं हिल नहीं सकते ।
लगता मैं भी ऐसा करूं। बस इसी
डर के मारे अम्मा और मैं लखनऊ
तालीम इसी किस्म की थी । कुछ क्लास में देखा । कुछ ताऊ जी को सिखा रहे हैं, उसे देखा । कुछ लखनऊ में। इसके अलावा प्रायवेट प्रोग्राम जिनमें बाबूजी जाते थे जौनपुर, मैनपुरी, कानपुर, देहरादून, कलकत्ता, बबई आदि, इनमें मुझे जरूर रखते थे। पहले इसीलिए कलकत्ते में बहुत मजा आया। उसमें फर्स्ट प्राइज मिलने वाला था । उसमें शम्भू महाराज चाचाजी और बाबूजी दोनों नाचे। पर उसमें फर्स्ट प्राइज मुझे मिला । तो चाचा कहने लगे देख भैया बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ छोटे मियाँ सुभान अल्लाह । और में बहुत खुश । चेन और मैडल वगैरह मुझे मिला। उस समय मैं आठ साढ़े आठ साल का था । समझ लीजिए कि नौ साढ़े नौ साल के भीतर ही सब हमाशे हो गए मेरी जिन्दगी के । हाँ मैं आमलेट नहीं खाता था। चाचाजी खाते थे। तो कहे अबे दाल का चिल्ला खाएगा। जब अण्डा कहकर पूछें तो नहीं खाता था पर जब मूंग की दाल का कहें तो बड़े मजे से खा लेता था, तो शंभू महाराज शुरू से ही बड़े शौकीन तबीयत के थे। लच्छू महाराज शुरू से ही बड़े अपटूडेट रहते थे । जब थे शायद 28-30 साल के थे तब से गए हैं कलकचे न्यू थियेटर्स कंपनी में । चालीस साल कलकचे और बंबई भिलाकर फिल्म में बीते।
हाँ साढ़े नौ साल का था जब बाबूजी की मृत्यु हुई। उनके साथ आखिरी प्रोग्राम मैनपुरी
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में था मेरा । वे 54 साल के थे। लू लग गई थी उन्हें। और यहाँ इनकी जगह मैं नाचा था और उन्होंने भाव बताया था। उस समय व्यकि उन्हें बुखार था। लू उन्हें मैनपुरी में ही लगो थी। वहाँ से हमलोग लौटकर आए तो 16-20 दिन रहे वो। कमजोरी आती गई। बाबूजी की यह आदत थी और मेरी भी आदत है कि अपना दुरख और कष्ट ज्यादा किसी से कहता नहीं हूँ । वो भी छिपाते रहते थे। उन्हें भी शुगा था। तो इनके पर चौक वगैरह चले गए और सबसे मिल आए। जितने भी अमीनाबाद में थे बासार आदि में मिलने वाले और सब ही प्यार करते थे उन्हें। वह उनके साथ आखिरी प्रोग्राम था।
बाबूजी का हूँ। मुझे तालीम बाबूजी से ही मिली। गाण्डा भी बाँधा उन्होंने मुझे। जब बाँधा तो अम्गा से कहा जब तक तुम्हारा लड़का मुझे नजराना नहीं देगा मण्डा नहीं बाधूंगा। तो मुझे 500 रुपए के दो प्रोग्राम सिले थे। जब पाँच सौ आया तो गण्डा पाँष्ण उन्होंने। और कहा इसमें एक पैसा नहीं दूँगा । यह मेरा पैसा है । मैं इसका गुरु हूँ और यह इसने मुझे नजराना दिया है । तो 500 रुपए देकर मैंने गण्डा बंधनाया तो मुझे और जगत कडार, एक लड़का है लखनऊ में, दोनों को एक साथ गण्डा बाँधा । तो शागिर्द में
आज प्यारी श्यामा, श्यामा भाई।
एक अजूबा देखि सधी में
आती बहुत हैरान हुई
अंकहि भरि भरि काल राधिके
एकल रूप भई ॥
लै कान्ह की बाँसी
अपने करहु लई
बार बार से अक्षर लगानीले
बैठो और स्ट्रेच करो।
अम्मा को लेकर नेपाल गया । निरखत छबि बजे श्याम रंग सो
पिताजी के । मुजफ्फरपुर भी राधा श्याम भई ।
फिर पिताजी की मृत्यु इतना छोटा था कि उनका दुख आया। उनके मरते ही हम. शुरू हो गए । उधर शम्भू लेकर खाना-पीना-गालियाँ ऐना बच्चों की मृत्यु भी लगभग उन्हीं समय की बात है। बाबूजी की पिताजी बहुत दुखी रहते थे बाँसबरेली भी । उस समय वह हालत थी कि पंचाध रुपए भी मिल जाएँ कहीं से तो बहुत हैं। पहले का सब पैसा हमारे टाइम तक खत्म हो गया था। कर्जदार बहुत हो गए थे। बाबूजी किसी का भी भला करने के लिए एक से लेकर दूसरे को दे देते थे। मतलब सौ लिए दो सौ दूँगा कहकर । यह उनकी अजीब सी आदत थी। कानपुर से हाई साल रहा। जिसमें 25-25 रुपए की दो ट्यूशन की मैंने अर्यानगर में । पैदल तीन मील जाता था और रास्ते में कब्रिस्तान पड़ता था तो दर भी लगता था । दस ग्यारह साल की उम्र थी मेरी। अब पचास रुपए में रिक्शे पर
हुई और उस समय मैं भी ठीक समझ में नहीं लोगों के बहुत खराब दिन महाराजजी का शौक। कर्जा घर घर को। उनके दो दिनों हुई। यह सब उसी मृत्यु के साथ ही साथ। उनसे । उसी समय में सोचिए उस समय बिना गए। अम्मा ले गई।
खर्च करता तो क्या बचता और ट्यूशन में नागा हो तो पैसा अलग काट लेते थे। 50 रुपए में काम करके किसी तरह पढ़ता रहा मैं। एक सीताराम बागला करके लड़का था अमीर घर का। उसे मैं डांस सिखाता और वह बेचारा मुझे पढ़ा देता था। हाई स्कूल की पढ़ाई। कहाँ चिन्ता, कहाँ
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अम्मा, कहाँ 50 रुपए की ट्यूशन सब बिखरा हुआ इसलिए फेल भी हो गया। मतलब पढ़ाई अच्छी तरह नहीं कर पाया। अच्छी तरह पढ़ता तरीके से तो ईश्वर की कृपा से मेरा दिमाग बहुत तेज था शुरू से। नेपाल भी इसी दौरान गए थे। एक हमारे रिश्तेदार थे वहाँ झुमकलाल करके। तो अम्मा इसीलिए ले गई थी कि कुछ इनाम वगैरह मिल जाए। बस यही एक कारण था। वहाँ रहे नहीं। खास प्राप्ति नहीं हुई। जाते में मुजफ्फरपुर भी गए थे। जयपुर भी गया मैं। वहाँ भी कोशिश की। मतलब यह कि प्रोग्राम मिल जाए दो चार सौ मिल जाएँ तो कुछ महीने कट जायेंगे। ऐसी हालत थी । हम लोग रहते एक मकान में ही थे, पर ऊपर नीचे। चूल्हा शुरू से ही अलग था। महाराज जी का अपना खानापीना जैसा था। पिताजी के समय से ही दादी, पिता अलग रहते, चाचा अलग। और वे मारा पीटी बहुत करते थे ।
चौदह साल की उम्र में जब मैं वापस लखनऊ आया फेल होकर तब कपिला जी अचानक लखनऊ पहुँची मालूम करने कि लड़का जो है वह कुछ करता भी है या आवारा या गिरहकट हो गया, वह है कहाँ। तब अम्मा जी ने दिखाया मुझे कि करते तो हैं थोड़ा बहुत जो सीख पाए थे। तब कपिला जी मुझे संगीत भारती (जो पहले हिन्दुस्तानी म्यूजिक डांस अकादमी था वही संगीत भारती हो गया था) लाई। छह महीने बढ़ गए तो बहुत खुश हुआ मैं। उस समय 250 रुपए मिलते थे। और रहता था दरियागंज में एक दुछत्ती थी जैन साहब का मकान था। अम्माजी को यह दुख कि जैनियों का मकान है लड़के को प्याज खाने को नहीं मिल रहा है। मछली तो खाता नहीं था। पर उसमें छोटी सी तो जगह थी। एक टेबिल फैन ले लिया था। दरियागंज से पाँच या नौ नंबर बस पकड़ता था। कभी रीगल पर और तो कभी ओडेन सिनेमा के पास उतरता था। वह स्कूल था रिवोली के पास तो एक महीने तक मैं रास्ता ही भूल जाता था। एक से खंबे हैं चारों तरफ तो मैं किसी भी सीढ़ी से चढ़ जाता था। बड़ी मुश्किल से फिर निशान बनाए कि यहाँ से जाओ यहाँ से जाओ।
हाँ एक घटना बहुत दुखदायी रही शुरू में बाबूजी की मृत्यु के समय। बिल्कुल पैसा नहीं था घर में कि उनका दसवाँ किया जा सके। दस दिन के अंदर सोचिए मैंने दो प्रोग्राम किए । और उन दो प्रोग्राम से 500 इकट्ठे हुए तो दसवाँ और तेरहीं की गई। बाहर मित्रों आदि को भी शायद अंदाज नहीं रहा होगा कि घर की ऐसी हालत है। जो भी हो यह मुझे अच्छी तरह याद है कि पिताजी का मरना, फिर उन दस दिनों में मेरा नाचना और पैसे इकट्ठे होना और उनसे ही दसवाँ तेरही का इन्तजाम होना। यह मुझे अच्छी तरह याद है। उससे बड़ा कष्ट और कुछ नहीं हुआ होगा। ऐसी हालत में मैं नाचने गया। मेरा ख्याल है-कानपुर या देहरादून। ऐसी जगह
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लखनऊ से वहाँ गया। नहीं जचता तो पैसा कहाँ होता। यह बहुत बड़ा दुखद वक्त था…. खैर ।
बहरहाल जब सौदह साल का था तो संगीत भारती आया। फिर जब एक साल हो गया तो कहने लगे अब तुम परमानेंट हो गए। मैंने वहाँ साढ़े चार साल काम किया। संगीत भारती में सबसे बड़ी कमी थी कि गुप्ता जी भरतनाट्यम मणिपुरी आदि वालों को तो कहते थे पंक्ति बनाकर ग्रुप फिट करो ये करो वो करो और समझते थे कथक में आठ मिनट का रानी करणा का भोली करवा दो बस वही काफी है। तो मुझे बहुत दुख होता था कि मैं कर सकता हूँ और मुझे करने नहीं देते। इसी धर्म-संकट में मैंने नौकरी छोड़ दी। करीब 56 आसपास । लगभग आठ महीने में अलग रहा। मैं लखनऊ चला गया था। बस ऐसे ही। तब तकः शम्भू महाराज आ चुके थे भारतीय कला केंद्र में। और सुमित्रा जी के यहाँ करजन रोड में सिखाते थे मायाराव का। संगीत भारती की कमाई से मैंने एक साइकिल खरीदी थी जो मेरे पास अभी भी है। और उस साइकिल को में नहीं बेचता हूँ। उसे देखकर मैं पुराना वक्त याद करता हैं, किस तरह साइकिल पर मैं चढ़कर एक ट्यूशन करता था पचास रुपए की। संगीत भारती के पैसे काफी नहीं होते थे। फैमिली थी बाराखम्बा रोड पर दो बच्ने थे मिकी और अनु। दो बार यहाँ सड़क पर गिर भी पड़ा में अनबैलेंस होकर। साइकिल कामचलाऊ आती थी ठीक से थोड़ी आती थी । बस के पैसे बचाने के लिए खरीदी थी। एक्स
बिरजू महाराज का नृत्य देखते हुए
(कायांग)
न कोई स्थिति, न कोई गति, न कोई अलगाव, न कोई लय मुद्रा में लय सुष्टि कथा-कथन सन्निहित
एक्स
एक्स
अजते हुए घुँघरू नहीं, पूरा का पूरा अंतरिक्ष धूपता चमकत नक्षत्रों का अंकुरित भाव में सँवरे जाते जमीन पर सुरम्य सूक्ष्म सुरों के गणितरूप अगाध
एक्स
पैर महज चत्ते नहीं, भाषाएँ बेबस जहाँ वहाँ से आगे बढ़ हमें रंगते, रचते, गाते, आत्मा को सँवारते, अवतार लेने लीलाकमल बनते-बनाते
एक्स
भावा अनन्त की यह कैसी है चरणों की चेरी है. ध्वनियों के छविगृह में शाश्वती दीपित है हृदय-शिखा ।
एक्स
- श्रीराम वर्मा
खैर भारतीय कला केंद्र आये पूषा ग्रेड पर । वहाँ आये तो वहाँ भी छोटी बलास मिली। यहाँ भी इझमेला चाली क्तास। जबकि मेरे अंदर वो चरण टुकड़े तिहाइयाँ बल खातीं कि कोई आने तो उसे हूँ। पर वहाँ यह था कि बड़ी लड़कियों समझदार जो भी आयेंगी बड़े महाराज के पास आयेंगी। यहाँ काहे को आयेगी। अब अठारह बीस साल का लड़का बड़े बुजुर्ग के आगे कहाँ चल सकता था। खैर उसमें से रश्मि जी एक लड़की मिली थी। उन्हें पूरे मन से सिखाया
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इसलिए भी कि हमको तो और कोई बड़ी लड़की मिलती नहीं कि इनको तैयार करेंगे। वो तालीम देखकर जो महाराज के यहाँ थी लड़कियाँ, अटेक्ट हुई। और हमारी तरफ खिंचने लगीं क्योंकि तालीम जरा अच्छी थी मेरी ।
बस उसके बाद से बैले वगैरह जो लच्छ महाराज जी ने मालती माधव पहला किया उसमें असिस्टेंट था । जबकि मजेदार बात यह है कि उसके एक्शन वगैरह सब मैं ही बनाता था अंदर अंदर और वे कहते थे अने जब वहाँ जाएगा तो बोल देना सबके सामने चाचाजी वह कौन सा मूवमेंट सिखाया था। तो मैं कहूँगा वो वाला और फिर तू बना लीजो अपने आप । बस तो बनाता मैं था । और.. बरखाबहार गोवर्धन लीला बनाने के लिए साल डेढ साल पहले आये थे। पूसा रोड में कॉलेज जब शुरू हुआ तो मैं आ गया था। नीनाजी के सामने ही मैंने जॉइन किया। केशतभाई और मैं साथ ही रहते थे। सूप आदि पीते थे। ये बिचारे बनाते थे, मुझे तो वह भी नहीं आता था । बस उसके बाद संगीत भारती के जमाने में अपने होश में कलकत्ते में एक कांफ्रेंस में नाता हूँ। उस समय दयाराम जी साथ थे। यही मेरी देखरेख करते थे। इनको ले जाता था रखवाली के लिए। वह जो मेरा नाच हुआ है वहाँ से कलकत्ते की ऑडियन्स ने मेरी बड़ी प्रशंसा की। इतनी की कि तभाम अखबारों में में छप गया एकदम । और वहाँ से दूसरे डांसर्स थे तमाम उनको भी लगा कि भई लड़के ने कुछ कर ही डाला है। मतलब वहाँ से लोगों को पता लगा कि मैं कुछ हूँ घर का। पर उस समय की कुछ कटिंग आदि नहीं है। बहुत पुरानी बात है। वो यहाँ से मेरा एक मोड़ हुआ । उसके बाद हरिदास स्वामी कांफ्रेंस बंबई ब्रजनारायण ने बुलाया। यह भी प्रोग्राम मेरा बहुत अच्छा गया। यह भारतीय कला केंद्र जॉइन करने के बाद। उसके बाद से फिर ईश्वर की कृपा से प्रोग्राम कलकत्ते, बबई और उन्हीं दिना कुछ अरसे के बाद मद्रास, भारतीय कला केंद्र के साथ ही गया था मद्रास । और धीरे-धीरे लोग मुझे चाहने लगे, इज्जत करने लगे। तीन साल जो संगीत भारती में बीते हैं उसमें मेरा नियम था सुबह चार बजे उठना बगैर नागा। चाहे बुखार चढ़ा है, चाहे खाँसी आ रही है ।… सुबह पाँच बजे से रियाज पाँच, छह, सात, आठ तक रियाज फिर घर जाना और एक घंटे में तैयार होकर वापस नौ बजे दो घंटे की क्लास सुबह की। वह तीन साल मैंने खूब रियाज किया। मतलब यही सोचकर कि यही टाइम है अगर कुछ बढ़ना है तो अँधेरा कमरा करके किया करता था जब बाद में यक जाऊँ मैं तो जो भी साज हाथ आये कभी सितार, कभी गिटार, कभी हारमोनियम लेकर बजाऊँ, मतलब रिलेक्स होने के लिए। सितार भी मैं बहुत बजाने लगा था। अच्छा खासा हाँ खूब जोरों से। फिर हाथ में शक्लें बनने लगीं, मिजाब की वजह से तो मैंने डर के गारे छोड़ दिया कि डिस्टर्ब करेगा डांस में कि दो आँखें दिखेंगी तो मैंने सितार छोड़
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दिया । गिटार बजाने लगा ऐसे ही थोड़ा शौक के मारे। सितार छोड़ा, गिटार छोड़ा फिर बाँसुरी मेरी बहुत दिन चली। मतलब शौक के मारे बजाता रहा। डागर साहब के साथ ट्रेन में भी अपने ऊपर बजा रहा हूँ वे नीचे गुनगुना रहे हैं। तो शौक उसका भी रहा फिर सरोद भी चलता रहा। खैर सरोद तो अभी भी मेरा शौक है। तबला मैं शुरू से बजाता हूँ। हारमोनियम थोड़ा बहुत, लहरा बजाने के लायक बहुत शुरू से बजाता हूँ। शुरू में फिल्मी गाने गाकर मैं पूरे मोहल्ले के लोगों को खुश किया करता था जब मैं छोटा था। और दो एक फेमिली थीं मोहल्ले में जो मेरा गाना सुनकर बहुत खुश होती थीं तो खाना-वाना भी खिला देती थीं। सिन्धी फैमिली थीं। वो बिचारी मेरी बहुत मदद करती थीं कभी दाल मखाने की सब्जी जब बने तो चुपचाप लाकर खिला देती थीं। उन दिनों मतलब हमारी हालत भी ऐसी थी कि कोई खिला दे तो अच्छा लगता था। खैर फिर उसके बाद तो तमाम फिर यहाँ काम करने लगे नए-नए। उसके बाद की कहानी तो फिर मालूम ही है आपको कि कितने बैले किए दुनिया भर के अलग-अलग हिस्टॉरिकल और फिर विदेश टूर भी शुरू हो गए। रूस पहला हमारा ट्रिप था जिसमें कुमारसंभव लेकर हम लोग सब गए थे ।
२० वा० आपको संगीत नाटक अकादेमी अवार्ड कब मिला ?
बि० म० : 27 साल का था तब मैं। बहुत छोटे में ही। मेरी सब चीज बहुत छोटे में
जल्दी-जल्दी हो गईं।
२० वा० : आपकी शादी किस सन् में हुई ?
बि० म० : ओ माँ! मैं अठारह साल का था बस इतना ही याद है मुझे। अठारह साल की उम्र में मेरी शादी अम्माजी ने कर दी। बहुत बड़ी गलती की। जब कि हम सोच रहे थे कि पहले काम कर लें फिर शादी करें। पर अम्माजी शायद घबराई हुई थीं, क्योंकि उनको तो चिंता थी कि पिताजी मर ही गए उनका क्या होगा पता नहीं । उस घबराहट में शादी कर दी। पर वह मेरे लिए बहुत नुकसानदेह रहा । एक जिम्मेवारी और ज्यादा बढ़ गई। और शायद नौकरी मैं नहीं भी करता । अपने रियाज में और अपने नाच में ही मस्त हो सकता था लेकिन इन पाबन्दियों ने शादी, गृहस्थी और लखनऊ और घर इन चीजों ने मुझे मजबूर कर दिया कि तुम नौकरी नहीं करोगे तो क्या करोगे। वरना छोड़छाड़ के मैं अपना अकेले फिल्म में भी चाचाजी की वजह से उनका असिस्टेंट बन सकता था बंबई जाकर, और लालच शुरू में जैसे
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बच्चों को अकसर हुआ करता है कि बंबई भाग जाओ। पर खैर वो तो अच्छा ही हुआ जो नहीं गया। कुछ समझदार लोगों ने मुझे एडवाइज किया कि ये ठीक नहीं है। अच्छा ही हुआ जो बच गया। खैर… बाद का हमारा किस्सां फिर सत्यजीत रे की फिल्म का रिसेन्ट किया था। उसके बाद से भी मेरी एक बड़ी खास आदत रही है जैसे कि मेरे बाबूजी की भी थी कि जब शागिर्द को सिखा रहे हैं तो पूर्णरूप से मेहनत करके सिखाना और अच्छा बना देना है। ऐसा बना देना कि मैं खुद हूँ। यह कोशिश है। पर अब भगवान की कृपा भी होनी चाहिए तब । मतलब कोशिश यही रहती है कि मैं कोई चीज चुराता नहीं हूँ कि अपने बेटे के लिए ये रखना है उसको सिखाना है। उस लड़की को नहीं सिखाना है….. यह मेरे भेद नहीं है। मतभेद बिलकुल नहीं है। तो बस यह छोटी सी कहानी थी मेरी फिलहाल डिटेल में तो पता नहीं बहुत कुछ है।
२० वा० :- अपने शागिदों के बारे में बताएँ कौन है ऐसा जिनके बारे में सोचकर आपको लगता है कि कुछ करेंगे ?
बि० म० :- शागिदों में ऐसा है कि अब तुम हो इतने असें से
किसी भी अच्छे खानदान की 15-20 साल से और कुछ दिन लड़की के नाम से तो हम कहेंगे यही कि शाश्वती लगी हुई हैं। पहले मैंने ये कहा कि उनके अंदर रंग अब शुरू हुआ है। वैसे विदेशियों में वैरोनिक भी तरक्की कर रही है। उधर फिलिप गया बहुत अच्छा … वह लाजवाब । उसकी फिर मुझसे । बाकी तीरथ प्रताप, लेकिन इन लोगों को बड़ी काम मिल गया अब हम परफारमेंस कर लो। तालियाँ खत्म हो गई। कला के होने वाले बहुत कम लोग बढ़ाएँ । बहुत कम हैं। तो करने वाली सामने आने दुर्गा भी अच्छी तरक्की कर की लड़की है, अच्छी स्थिति मन नाच के साथ जुड़ा हुआ बहुत से लोग अभी भी सीख जितना बढ़ना चाहिए मेक्लीन टॉक था ।… वह चला इस वक्त अच्छा होता । तमन्ना है फिर आके सीखे प्रदीप ये लोग नाम किये हैं जल्दी तसल्ली हो गयी कि कमाने लगे हैं। अब इतनी ले लो पैसे मिल जायेंगे, बात लिए सच्चे दिल से परेशान रहते हैं जो कि उसे आगे अब लड़कियों में तरक्की वालियों में शाश्वती हैं ही। रही है। ये छोटी सी फैमिली घर की नहीं है पर उसका है। अब सीखने को तो ही रहे हैं। और लड़कों में, कृष्णमोहन, राममोहन को उतना ध्यान नहीं है। यहाँ तक कि मेरे बेटे भी ध्यान नहीं देते। उस तरह का ध्यान नहीं देते जैसे कि मेरी कहानी आपने सुनी है। इन लोगों ने कभी ये नहीं सोचा कि हाँ भैया ने कहा
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है- हुक्म दे दिया है तो हम दो साल तक कुछ नहीं सोचेंगे। बस यही सोचेंगे। उस तरह का त्याग नहीं है। उतनी शक्ति ही नहीं है। मौज लेते हैं। नाचते हैं तो उसे भी एक एन्जॉय सोचकर कर लेते हैं। क्योंकि देश विदेश तो मैं बहुत गया। जर्मनी, जापान, हांगकांग, लाओस, बर्मा ।
२० वा० :- इतनी बार आप गये तो कोई खास बात आपको याद आती है…. कोई विशेष आयोजन जिससे आपको लगे कि हम….
बि० म० : हाँ क्यों नहीं।
जैसे लंदन फेस्टीवल था । और एक दफा तो एक बहुत ही जरूरी अमेरिका में दो चार जगहें हम नाचे थे।।… बड़े अच्छे लड़का ।… आँखें उसकी आया हाँफते और काँपते हुआ उसको तो मैंने कहा है क्या तुम्हें । यस-यस गया। अब लड़का तक तो यह जरा मजेदार बात खातून थीं पूरे हॉल में सुभान अल्लाह । मतलब वहाँ भी कामगी हॉल में लोग थे। एक जगह एक फटी हुई एकदम अंदर हुए । मैंने सोचा जाने क्या मेरे साथ फोटो खिंचाना अब बेचारा बेहाल हो बेहाल हो नाच देखकर है। पाकिस्तान में कोई उनकी ही आवाज आए मेरे नाच के आशिक तो बहुत हैं। मेरे आशिक भी हैं। मगर…. मैं नाच की वजह से हूँ। … इसलिए आशिक तो नाच के
ही होते हैं। मैं तो बेचारा उसका असिस्टेंट हूँ। उस नाचने वाले का ।
उसके बाद से तो खैर धीरे-धीरे दिल्ली में स्कूटर भी खरीदा; फिर चला नहीं; हम लड़ गए खम्भे में अपने आप ही। फिर डर के मारे मोटर खरीदी पुरानी। दो चार दफे पुरानी खरीदी । फिर बैंक से लोन लेकर नई एम्बेसेडर । फिर उसको बेचकर नई फियेट खरीदी। अब दूसरी फियेट है। अब तो ईश्वर की कृपा से काफी सुविधा है। काफी कृपा है उनकी। लोग प्यार
करते हैं मुझे बहुत । और मैं उस प्यार की वजह से ही इतना बढ़ा हूँ। क्योंकि….
२० वा० : आपको आगे बढ़ाने में अम्मा जी का बहुत हाथ है ?
बि० म० : अम्मा जी का बहुत बड़ा हाथ है। अम्मा जी ने तो शुरू से उन बुजुर्गों की तारीफ कर करके मेरे सामने हरदम कि बेटा वो ऐसे थे। उनको कम से कम इतना नाम तो याद था उन बुजुर्गों का । अभी आप दूसरे किसी से पूछें घर में तो उन्हें नाम भी नहीं मालूम था कि कौन थे। चाची (शंभू महाराज की पत्नी) से आप पूछें महाराज बिन्दादीन के बाद पहले और कौन थे तो उनको नहीं मालूम । ठुमरियाँ भी मैंने उनसे सीखीं। मेरी वाकई में गुरुवाइन थीं; वो माँ तो थीं ही। गुरुवाइन भी। और जब भी मैं नाचता था तो सबसे बड़ा एक्जामिनर या जज अम्मा को समझता था। जब भी वो नाच देखती थीं तो मैं कहता था उनसे कि मैं कहीं गलत तो नहीं कर
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बीएसटीबीपीसी-2015
रहा हूँ। मतलब बाबूजी वाला ढंग है न। कहीं गड़बड़ी तो नहीं हो रही। तो कहतीं नहीं बेटा नहीं। उन्हीं की तस्वीर हो। पर बैले वैले यह तो मेरा नया क्रियेशन है। वो हरदम ऐसे ही कहती रहीं और लखनऊ के जो बुजुर्ग थे उनसे भी गवाही ली मैंने। चेंज तो नहीं लग रहा है। "नहीं बेटा वही ढंग है। और तुम्हारा शरीर वगैरह टोटल ढंग वैसा ही है। बैठने का, उठने का, बात करने का। मतलब जैसा था उनका ।
बस यही….
और जगहें तो बहुत थीं आने जाने की। हम बहुत लोकप्रिय हैं बंबई में, कलकत्ता में, साउथ के लोग भी अब बहुत चाहते हैं मुझे और हर डांसर के लिए चाहे थोड़ी देर के लिए गलत शब्द इस्तेमाल कर ले। पर दिल से अगर आप पूछेंगे कि ईमानदारी से बताओ तो दूसरा शब्द इस्तेमाल नहीं करेगा। वह यही कहेगा वो अच्छे हैं। मतलब अगर ईमानदारी से कहेंगे तो। और प्रोफेशनल जहाँ आता है तो चार जगह बुराई करेंगे कि उन्हें क्या आता है वो तो ऐसे ही बेकार आदमी हैं। तो मुझे मालूम है इस चीज का। मुझे कोई द्वेष नहीं है शुरू से किसी के बारे में। जो करता है बढ़िया करता है (बस मैं अपना बुरा नहीं चाहूँगा) बस यही खास आदत है।
२० वि० : आपको मंच पर कुछ अनुभव या संस्मरण बचपन के या ऐसे अनुभव जो याद
आते हों ?
बि० म० :- अब नाचे तो हम बहुत ज्यादा हैं। इतना कि गिनती करना मुश्किल है। और उस
जमाने से । रामपुर नवाब के महल में भी नाचा हूँ… नेपाल महाराज के यहाँ भी नाचा हूँ… और जमींदारों के यहाँ भी नाचा हूँ… जहाँ का मैं अक्सर तमाशा सुनाता रहता हूँ… कि जहाँ महफिल भी लगी है कि लड़का नाचेगा…. जरा चारों तरफ थोड़ा खिसककर जगह बनाओ…तो सब खिसक जायें. …तो नीचे गलीचा…गलीचे पर चाँदनी और चाँदनी गलीचे के नीचे जमीन पर कहीं पर गड्ढे हैं कहीं पर खाँचा है… मतलब यह सब नहीं…. कौन परवाह करे। आजकल हमारे नये डांसर हैं कि स्टेज बड़ा खराब है….बड़ा टेढ़ा है…. बड़ा गड्ढा है। हम लोगों को यह सब सोचने का कहाँ मौका मिलता था। अब गर्मी के दिनों में जरा सोचो न एयर कंडीशन; न कुछ वो बड़े-बड़े पंखे लेकर जो नौकर चाकर थे, वो हाँकते रहते थे। उनसे भी हाथ बचाना पड़ता था। नाचने में उससे न लड़ जायें कहीं। दूसरे कि गैस लाइट जल रही है उसकी भी गर्मी ।
२० वि०: अक्सर रात में होते थे… या दिन में भी होते थे प्रोग्राम ?
बि० म० दिन में भी होते थे। भैरवी का प्रोग्राम जो कहा जाता था यह कायदा था कि रात को डेढ़ दो बजे तक तो चलता था नाच वाच। उसमें थोड़ा भाव गीत वगैरह हुआ तो हुआ ठुमरी भाव पर विशेष दूसरे दिन दस बजे की महफिल । सुबह दस बजे से चार बजे तक भैरवी का एक प्रोग्राम कहलाता था। तो उससे समापन होता था। माने टोटल प्रोग्राम। याने डांसर आया है तो सुबह से लेकर शाम तक……
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