ढहते विश्वास
सातकोड़ी होता
सातकोड़ी होता उड़िया के एक प्रमुख कथाकार हैं। इनका जन्म 29 अक्टूबर 1929 ई० में मयूरभंज, उड़ीसा में हुआ था। अबतक इनकी एक दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । होता जी भुवनेश्वर में भारतीय रेल यातायात सेवा के अंतर्गत रेल समन्वय आयुक्त व उड़ीसा सरकार के वाणिज्य एवं यातायात विभाग में विशेष सचिव तथा उड़ीसा राज्य परिवहन निगम के अध्यक्ष रह चुके हैं। इनके कथा साहित्य में उड़ीसा का जीवन गहरी आंतरिकता के साथ प्रकट हुआ है। यह कहानी राजेन्द्र प्रसाद मिश्र द्वारा संपादित एवं अनूदित 'उड़िया की चर्चित कहानियाँ' (विभूति प्रकाशन, दिल्ली) से यहाँ साभार संकलित है ।
पिछले कई दिनों से लगातार बारिश होते देख लक्ष्मी को लग रहा था जैसे इस बार भी बाढ़ आयेगी । तूफान में घर टूट गया था सो उधार-कर्ज माँगकर किसी तरह कुछ बाँस बाँध-बँध कर उस पर पुआल डाल दिया था उसने । लक्ष्मण कलकत्ता में नौकरी करके पत्नी को जो कुछ भेजता है उससे गुजारा न होने की वजह से तहसीलदार साहब के घर का छिटपुट काम करके लक्ष्मी जो कुछ पाती है, उसी से अपनी कमी पूरी कर लिया करती है। लगता है अब समय को लोगों का सुख-चैन सहन नहीं हो पा रहा है। वरना तूफान के तुरन्त बाद सूखा न पड़ता । एक बीघा खेत छोड़ गये हैं पूर्वज । एक टुकड़ी जमीन भी है। हल किराये पर लेकर उस बीघे-भर में खेती करवायी थी लक्ष्मी ने । अंकुर जल गये और कहीं-कहीं पर धान के हरे-भरे सभी कोमल पौधे धूप में भुनकर स्वाहा हो गये । फिर भी हार न मानकर बारिश होने पर रोपनी करने का इन्तजार कर रहे थे किसान । गहरे खेतों में जरई समाप्त करके नदी के बाँध पर बैठे गर्दिश के दिन भूलने की कोशिश करते वक्त यह अनवरत बारिश शुरू हो गयी। भादों के शुरू से बरस रही है। पूरा महीना खत्म होने को आया, पर बारिश थम नहीं रही। एक पक्ष से अधिक हो गया, सूर्य देवता के दर्शन तक नहीं हुए ।
लगातार बारिश होने के कारण बाढ़ आने की चिंता से अब रात को नींद नहीं आती थी लक्ष्मी को । देबी नदी के बाँध के नीचे लक्ष्मी का घर था । दलेइ बाँध में पिछली बार जब नदी ने दाव साधा था, उस समय वह नयी-नयी आयी थी ससुराल । जिस दिन दलेइ बाँध टूट गया चारों ओर बाढ़ के पानी के साथ मनुष्य का हाहाकार मिलकर एकाकार हो गया था । उसके बाद सबकुछ खत्म हो गया । तुरई के फूल की तरह खिल-खिलाकर हँसते लोग सहसा मुरझा गये । मनुष्य की आवाज, उसके शब्द, आनंद, कोलाहल सब रेत में दफन गये । वे दिन अभी तक नहीं
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भुला पायी है लक्ष्मी । कितनी दर्दनाक है वह अनुभूति, कितना भयानक था वह दृश्य । मरी पड़ी माँ के शव से टिककर बैठा था बच्चा, सांत्वना पाने के लिए। कौन देगा उसे सांत्वना ? इससे पहले कि माँ उसे गोद में उठाये सियार वनभोज के लिए घसीट ले जाते हैं उस जीते-जागते बच्चे को । वह दृश्य याद आते ही सिर से पैर तक शरीर आतंक से सिहर उठता है। यदि दुबारा दलेइ बाँध टूट जाये, तो उन्हें कौन बचायेगा ? बच्चे विपत्ति का सामना कैसे कर पायेंगे ?
विपत्ति अकेले न आकर संगी-साथियों के साथ आती है। यह बात सच साबित हुई । तूफान के बाद सूखा और उसके बाद बाढ़ । तूफान और सूखा में जिनकी कमर टूट चुकी थी, बाढ़ की धारा के आगे सीना तानने की ताकत उन्हें भगवान भी नहीं दे सकता था। हालाँकि बाढ़ में पुआल के छप्पर को अपने बचने का सहारा बनाकर बहते व्याकुल मनुष्य को भगवान भी स्वर्ग से झाँककर देखेंगे; पर कोई कुछ कर नहीं सकता, मानो यह सब विधि का विधान हो, पूर्व निर्धारित-सा । विधि के निर्देशों को हमेशा से मानता आया है मनुष्य, कभी विरोध नहीं कर सका है । यही उसकी विडंबना है, यही उसका बेसहारापन है ।
लक्ष्मी आसमान का रुख देखकर सशंकित हो उठी। उस बार भी इसी तरह भयावह था आसमान का रुख । पड़ोस का पढ़ाकू लड़का गुणनिधि अभी-अभी कटक से लौटा है। उसने घर-घर जाकर कह दिया है कि महानदी का ऊपरी और निचला छोर दोनों पानी में डूब चुके हैं, बारिश थमकर साँस ही नहीं लेती, नदी-नालों का पानी बढ़ता ही जा रहा है, न जाने किस पल बाढ़ आ जाये, कुछ कहा नहीं जा सकता। महानदी के ऊपरी छोर में संबलपुर का हीराकुंद बाँध बँधे होने की बात लक्ष्मी ने सुन रखी है, किन्तु क्या वह एक बाँध पूरे राज्य के बाढ़ के पानी को रोक सकेगा ? कटक शहर को बाढ़ की चपेट से बचाने के लिए महाराज ययाति केशरी ने पत्थर का बाँध बँधवाया था, इस युग के पढ़े-लिखे बुद्धिमान लोगों ने हीराकुंद बाँध बनाया । हालाँकि यह सब देखा नहीं है लक्ष्मी ने, सिर्फ सुना भर है। उसी हीराकुंद बाँध में काम करते समय पत्थर के नीचे दब कर उसके ससुर शहीद हो गए थे, ऐसा लोगों का कहना है। ससुर के देहांत के बाद वह इस घर में बहू बनकर आयी थी। इन अट्ठाईस वर्षों में उसने कई बाढ़, सूखा और तूफान देखे हैं; किन्तु इंसान इन बाधा विपत्तियों को मानकर हठीले जंगली भैंसे की तरह अपनी आशा और अपने अरमानों को पूरा करने के लिए निरंतर दौड़ रहा है। न जाने कितनी आशाएँ, कितनी अभिलाषाएँ उसने भी अपने दिल में सँजो रखी हैं। लक्ष्मण के परदेशी होने का उसे बेहद दुख है, फिर भी वह बगैर टूटे अच्छे दिनों की प्रतीक्षा किये जा रही है ।
शायद वह डरावना दिन आते-आते रास्ते में कहीं ठहर गया है, जैसे जोब्रा आनिकट में महानदी का पानी ठहर जाता है । पर मन हार नहीं मानता, नसीब के साथ तर्क-वितर्क करके निकल पड़ता है कूच करने को । लक्ष्मी दलेइ बाँध पर खड़ी होकर महानदी के दोनों किनारों को डूबते हुए देखकर मन-ही-मन कहती है, 'किनारा लाँघे बगैर चली जा, हमारी हँसी-खुशी की दुनिया को और रेतीला मत बना ।'
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गाँव के लड़कों को इकट्ठा करके गुणनिधि ने स्वेच्छासेवक दल का गठन किया है । लड़कों का साथ देने के लिए बूढ़े भी कमर कसकर निकल पड़े हैं। यह तो किसी एक का काम नहीं है। पूरे गाँव में फैल गई है यह बात बाढ़ आ रही है। हीराकुंद से पानी छोड़ दिया गया है, बाँध टूटने की आशंका से । लोगों की सहनशक्ति एवं मन के दंभ को परखने के लिए नदी के वक्ष को व्यापक करते हुए बारिश का पानी बढ़ता ही जा रहा है। बारी-बारी से गाँव के लड़के दलेइ बाँध की निगरानी कर रहे हैं। बूढ़े उपदेश दे रहे हैं। कमजोर स्थानों पर मिट्टी डाली जा रही है। पत्थर ढोये जा रहे हैं बाँध को और भी मजबूत करने के लिए। रेत की बोरियाँ इकट्ठी की जा रही हैं काम में लाने के लिए ।
बाँध की निगरानी के लिए लक्ष्मी ने अपने बड़े लड़के को भेज दिया है। अपने साथियों के साथ वह रात भर बाँध की निगरानी करेगा, कमजोर स्थानों पर रेत की बोरियाँ डालेगा, पत्थर ढोयेगा । लड़का बाप की तरह कर्मठ है। गठा हुआ शरीर, काम पड़ने पर झपट पड़ता है शेर की तरह । घर पर दो लड़कियों और साल भर के लड़के को लेकर अकेली है लक्ष्मी । उसे नींद नहीं आती । नदी की आवाज और बारिश की रिमझिमाहट को कान डेरकर सुनती है वह । नदी किनारे गुणनिधि से उसने पूछा था, 'हिम्मत बँध रही है क्या छोटे, सकोगे ?'
गुणनिधि ने हँसते हुए कहा, 'क्यों नहीं सकेंगे मौसी, निठल्ले लोगों के लिए जगह भी तो नहीं है दुनिया में। जिस मनुष्य ने काठजोड़ी का पत्थर-बाँध बाँधा है, हीराकुंद बाँध बनाया है, वह मनुष्य अभी मरा थोड़े ही है !'
उसके चेहरे की चमक देखकर लक्ष्मी को कुछ तसल्ली हुई । कुछ भी कहो, पढ़-लिखकर नालायक नहीं निकला । पैंट-शर्ट उतारकर, काँछ लगाकर अन्य पच्चीस लोगों के साथ कमर कसकर जुटा हुआ है। बड़ा लड़का अच्युत भी पलभर को नहीं बैठता, रेत की एक बोरी डालने के के बाद दूसरी बोरी लाने दौड़ जाता है। खतरे से जूझने के लिए सभी लोग इकट्ठे हुए हैं ।
सरपंच ने गुणनिधि से कहा, 'घर-घर खबर पहुँचवा दो, सबों को सतर्क कर दो । बाढ़ का पानी बढ़ता ही जा रहा है, कल शाम तक यहाँ पहुँच जायेगा; दूसरे दिन सुबह एरसमा, बालीकूदा….एक मुँह से दूसरे मुँह को होती हुई यह बात हवा की तरह चारों ओर फैल गयी, किसी को प्रचार नहीं करना पड़ा, बुलावा नहीं देना पड़ा । गाँव के युवक बाढ़ के पानी का मुकाबला करने के लिए निकल पड़े। आशंका से सिहर उठे वृद्ध, महिला और अक्षम तथा कमजोर लोग । बाढ़ पहली बार नहीं आ रही है, पहले भी कई बार आयी है, आगे भी आयेगी। लेकिन एक-एक बाढ़ जमाने-जमाने तक याद है, लोगों की कमर तोड़ डालने की वजह से। यह बाढ़ सन् पचपन में दलेइ बाँध तोड़ने वाली बाढ़ से बड़ी होगी या छोटी कोई नहीं कह सकता । नदी के बाँध से उतरते वक्त लक्ष्मी ने कहा, 'जुटे रहो बच्चो, पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर रखना तो मुश्किल है । बाढ़ अपने रास्ते जाये, तुम अपने रास्ते काम में जुटे रहो ।'
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आई सॉल्यूशन * पटना एस
बिल्कुल
लक्ष्मण का मिट्टी की दीवार और पुआल के छप्पर से बना घर दलेइ बाँध से कुछ ही दूरी पर है। घर के चबूतरे पर बैठने से बाँध दिखता है, छप्पर पर बैठने से नदी का पानी दिखता है । इस गाँव के इतिहास के साथ नदी का इतिहास लिखा है । दलेइ बाँध की मिट्टी में कई लोगों का परिश्रम, पसीना और खून मिला है। नदी की बाढ़ का विकराल रूप देखने के बावजूद मनुष्य वहाँ से खिसका नहीं है, नदी के किनारे ही घर बनाया है उसने, इस तरह नगर और जनपद बनते गये और सभ्यता का विकास होता गया नदी के किनारे । मनुष्य के सुख-दुख का गीत गाती हुई नदी बह रही है, उसका पानी पीकर, उसी पानी से खेत सींच अनाज उत्पन्न करके वह जी रहा है। नदी की उपजाऊ मिट्टी ने जमीन को उर्वर बनाया है। जाल डालकर थोड़ी-बहुत मछली पकड़कर सुख-चैन से खाना खाते हैं लोग । बाढ़ आई है, बाँध के घेरे को तहस-नहस किया है; पर नदी को किसी ने शत्रु नहीं कहा, न ही कोई उसका किनारा छोड़कर भागा है। बल्कि उसी की ओर देखकर मन-ही-मन कहा है, शरारती नटखट बच्चे की तरह लोगों को परेशान कर रही है । खुद-ब-खुद मान जायेगी और अपने रास्ते चली जायेगी। हमारी नदी हमारा ही गीत गाती हुई मुहाने की ओर बह जायेगी । नाव को पतवार से खेते हुए माँझी भंज-संगीत गायेगा ।
लक्ष्मी के दिल में बेशुमार आशंकाएँ उठती हैं। बीच-बीच में उसका सीना तड़क उठता है । मन में अच्छे-बुरे ख्याल आते हैं। कहीं विपत्ति वाकई न आ जाए, ऐसा सोचकर सतर्क होते हुए उसने एक बोरे में थोड़ा-सा चिवड़ा, दो काँसे के बर्तन अंगोछा भरकर रख लिया । सन् पचपन वाली घटना उसे आज तक याद है । उस समय सास-ससुर और पति के साथ ऊँचे स्थान पर चढ़ गयी थी वह । तब भी एक बोरे में थोड़ा-सा चिवड़ा, कुछ कपड़े और दो-चार बर्तन रख लिये थे उन्होंने । मन रह-रहकर चौंक उठता था । लक्ष्मण होता तो कुछ सहारा होता, साहस बँधता । क्या बच्चों को लेकर वह इतने बड़े संकट का मुकाबला कर सकेगी ?
बड़ा लड़का अच्युत सारी रात नदी के बाँध पर रहेगा। कहीं बाढ़ का पानी बाँध न तोड़ दे इसलिए रतजगा होगा । बाँध के किनारे-किनारे रतजगे की व्यवस्था की गई है। रात को मूसलाधार बारिश हो रही थी, फिर भी लड़कों ने अपना मोर्चा नहीं छोड़ा। वहीं डटे रहे । ठिठुरन भरी हवा से रह-रहकर सिहर उठता था उनका शरीर । फिर भी जिद्दी से काम में जुटे हुए थे सभी । मनुष्य जिद कर रहा है अपनी दिक्कत खुद दूर करने के लिए। वह अपनी हार मानने को तैयार नहीं ।
लक्ष्मी अपनी दोनों लड़कियों और छोटे बेटे को सुलाकर गुहाल में गयी । बाद में समय मिले न मिले इसलिए उसने गाय और बछड़े के गले से पगहा खोल दिया । दोनों बकरियों को भी कमरे में खुला छोड़ दिया। घर की सारी चीजें एक कमरे में इकट्ठा करके ताला लगा दिया । देखते-देखते रात बीत गई । सुबह होते-होते बाढ़ के पानी के लिए नदी में जगह नहीं बची थी। बारिश की रफ्तार में कोई फर्क नजर नहीं आया। उसने नदी के बाँध की ओर देखा । बाँध पर अभी भी लोग काम कर रहे थे। गुणनिधि, अच्युत, शंकर, मकरा, चंदरा सभी हो-हो करके
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आस-पास के लोगों को सतर्क कर रहे थे। दिन के उजाले में सिर्फ पृथ्वी की गर्मी ही नहीं बढ़ती, आदमी भी चुस्त हो जाता है और भी तेजी से काम करने लगता है ।
हठात् जरा नीचे की ओर ताड़ के पेड़ के पास पानी की तेज धारा किनारे से आ टकराई । टकराते ही पानी बाँध के दूसरी ओर लाँघ गया, दस-वर्षीय गोलमटोल बच्चे की तरह । सूर्य देवता दिखलाई नहीं दे रहे थे, फिर भी लक्ष्मी ने अंदाजा लगाया कि समय बारह से कम नहीं है ।
गुणनिधि गला फाड़-फाड़कर चिल्लाने लगा, रेत की बोरी, ताड़ के पेड़ के पास नदी में घुसी चली आ रही है……..
गाँव के छोटे-बड़े जो भी लोग वहाँ इकट्ठे थे रेत की बोरी और ढीमा पत्थर ढो-ढोकर लाने लगे । गुणनिधि ने दो लड़कों को, गाँव के लोग ऊँची जगहों पर चढ़ जायें, ऐसा कहने के उद्देश्य से गाँव में भेज दिया ।
पलभर में शोर-शराबा मच गया पूरे गाँव में। लोग हाँफते हुए टीले की ओर दौड़ने लगे । टीले के नीचे स्कूल है। कइयों ने स्कूल में शरण ली। चार कमरों में दो सौ के करीब लोग खचाखच भर गये । बाकी लोग टीले पर चढ़ गये । तेज बारिश और हवा की वजह से टीले पर बरगद की शाखाएँ इधर-उधर डोल रही थीं। पेड़ के नीचे देवी का थान बारिश के पानी से भीग चुका था । साल में एक बार चैत की संक्रान्ति को इसी टीले पर मेला लगता है, देवी पर बलि चढ़ायी जाती है, आसपास के गाँव के लोग इकट्ठे होते हैं, खरीद-बिक्री होती है। नाच-गाना भी होता है । उस वक्त टीले पर चढ़ने वाले लोगों के चेहरों में रौनक होती है; किंतु आज सभी किसी आशंका से थरथर काँप रहे हैं, मानो सबों की आशाएँ आशंका में बदल चुकी हैं। कौन जाने क्या होगा ! सिर्फ माँ चंडेश्वरी का ही भरोसा था ।
लक्ष्मी दोनों लड़कियों और छोटे लड़के को साथ लेकर निकलते-निकलते कुछ पिछड़ गयी । वह अच्युत का इंतजार कर रही थी, यह सोचकर कि कहीं वह आ न पहुँचे। पर अच्युत नहीं आया । नदी के बाँध की ओर देखकर उसने ऊँची आवाज में बेटे को पुकारा । पर वह आवाज शायद बेटे के कानों तक नहीं पहुँच सकी । ठीक उसी वक्त बाँध टूटकर पानी की धारा गाँव की ओर लपकने की आवाज ने क्षणभर को उसे स्तब्ध कर दिया। इसके बाद और कुछ भी सोचने का वक्त नहीं था उसके पास । वह दोनों लड़कियों को साथ लेकर, बच्चे को गोद में लेकर जैसे-तैसे बोरे को उठाये टीले की ओर दौड़ने लगी ।
नदी ने दुबारा दाँव साधा। लोगों को पहले से दिए वायदों को किसी एहसानफरामोश की तरह तोड़ते हुए नदी की पागल धारा बाँध की दूसरी ओर कूद पड़ी । किनारे ढहने लगे थे नदी के गर्भ में । पल झपकते ही ताड़ के पेड़ का नामोनिशान मिट गया ।
पीछे मुड़कर देखने को वक्त न रहने पर भी थोड़ी दूर दौड़ने के बाद लक्ष्मी पीछे घूमकर देखने लगी । मानो अच्युत की आवाज कहीं दूर से उसके कानों में सुनायी दी हो ।
'माँ आं……..
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किंतु अच्युत नहीं दिखा ।
काश ! यह नदी भी माँ कहकर आगे न बढ़ते हुए उसी तरह खड़ी हो जाती कुछ देर ! काश ! आते-आते कुछ देर ही कर देती ।
लेकिन बाँध-टूटे नदी की धारा से पहले परिचित है लक्ष्मी । घर के समान ऊँची धारा चली आती है नदी की ओर से । दौड़ते वक्त जब उसे ठोकर लगी, उसके हाथ से बोरा छूट गया। लड़कियों को आगे जाने को कहकर जैसे ही वह खुद चलने को हुई, पानी उसके घुटनों तक आ गया ।
लड़कियाँ स्कूल तक पहुँची ही होंगी कि कमर तक पानी में आगे की ओर झुकते हुए चलने लगी लक्ष्मी ।
शिव मंदिर के पास वाले बरगद के नीचे पहुँचते ही उसके गले तक पानी आ गया । तेज धारा में बहने लगी थी वह, पैर जमीन में नहीं टिक रहे थे । खूब घबराकर उसने एक हाथ से बच्चे को ऊपर उठा लिया और दूसरे हाथ से बरगद की जटा को जोर से जकड़ लिया ।
{ उसके बाद वह कब और किस तरह जटा के सहारे पेड़ पर चढ़ गयी, वह खुद भी नहीं बता सकती । किन्तु देखते-ही-देखते पेड़ का तना भी डूब गया और बाढ़ का पानी शाखाओं को चूमने लगा। न जाने किस जमाने का बरगद बाढ़ के पानी की रफ्तार से थरथराने लगा था । लक्ष्मी ने आधी साड़ी खोलकर अपनी कमर को पेड़ की डाल से लपेट लिया ।
चारों ओर असहाय लोगों का आर्तनाद सुनायी दे रहा था। घर, खेत-खलिहान, बाग-बगीचों को मिट्टी में मिलाकर परिहास करते हुए आगे बढ़ती जा रही थी नदी की धारा ।
लक्ष्मी कब बेहोश हो गयी, वह जान नहीं पायी ।
दिन-भर और रात-भर सू-सू करके बह रहा था नदी का पानी । दलेइ बाँध टूटने पर जिस तरह हर बार किसी अबोध अनाथ बच्चे के रोने की आवाज आती है, इस बार भी ठीक उसी तरह सुनायी दी । ऊँची छलांगें भर-भरकर तेज गर्जन करते हुए बाढ़ का पानी आगे ही बढ़ता जा रहा था, पीछे खिसकते जा रहे थे मनुष्य और पशु, जीव-जगत के कितने ही प्राणी, स्थावर और जंगम ।
ऐसी बाढ़ कभी कहीं नहीं आयी। बूढ़ों ने कहा, नदी कई बार किनारा लाँघ चुकी है, लेकिन इस बार की बाढ़ का मिजाज कुछ अलग ही है। कोई मुकाबला नहीं इसका ।
पूरा दिन खत्म होने के बाद पुनः सुबह होने तक बाढ़ का पानी एरसमा पहुँच चुका था । चारों ओर पानी भरा था। सिर्फ पानी ही पानी । मानो एक और महोदधि हो ।
टीले पर चढ़े हुए लोग व्याकुल होकर अपने-अपने लोगों को ढूँढ रहे थे। जो लोग ऊपर नहीं चढ़ पाये, क्या वे अभी तक जिन्दा होंगे ? बाप बेटे को ढूँढ रहा था, पत्नी पति को, माँ बेटी को, भाई बहन को । किन्तु इतनी सी जगह पर दो गाँवों के लोग इस कदर एक-दूसरे से सटे खड़े थे कि सरसों तक डालने को जगह नहीं थी। पहला दूसरे को कुछ बोलने से पहले ही दूसरा बोल
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उठता था, 'भैया, जरा देखना, मेरा छोटा लड़का केशव उस ओर है क्या ?' एक कदम चलने तक की गुंजाइश नहीं थी, फिर भी तलाश जारी थी, मन और हृदय में ।
टीले के नीचे स्थित स्कूल पानी में डूब चुका था । स्कूल की छत पर जिन्होंने आश्रय लिया था, उनके घुटनों तक पानी था । सौभाग्य से उस जगह बहाव तेज नहीं था, वरना सब के सब तिनकों की तरह बह जाते नदी की धारा में। जो लोग कमरों में थे वे क्या कर रहे होंगे यह जानने का कोई उपाय नहीं था । संभवतः वे लोग टीले पर चढ़ आये होंगे, या फिर एक-दूसरे का हाथ पकड़े दूसरे धाम को चले गये होंगे ।
लक्ष्मी को होश आया, सूर्य देवता सिर पर आ चुके थे ।
हठात् जब उसने बेटे का मुँह स्तन से नहीं लगा हुआ अनुभव किया, उसने चारों ओर निगाह दौड़ायी ।
परन्तु उसका छोटा लड़का कहीं नहीं दिखा । वह जोर-जोर से गुहार मार-मारकर व्याकुल हो खूब रोयी, लेकिन उसका रोना सुनने के लिए वहाँ आसपास कोई चिड़िया तक नहीं थी ।
पेड़ की दो शाखाओं के बीच किसी की काली गाय टिकी थी। जान न रहने की वजह से उसका सारा शरीर फूला हुआ था ।
थोड़ी ही दूरी पर नदी की धारा में किसी व्यक्ति का शव बह रहा था, उसी के ठीक आस-पास एक दूसरे व्यक्ति का, मानो आगे-पीछे होकर वे लोग जा रहे हों ।
लक्ष्मी का सारा शरीर जकड़ चुका था । मन भी शून्य था। वह न कुछ कहना चाहती थी, न देखना और न ही सुनना ।
दलेइ बाँध उसकी नजरों से ओझल हो रहा था । सिर्फ बाढ़ के पानी की धारा आगे की ओर बढ़ती चली जा रही थी । उसी धारा की आवाज 'के साथ-साथ लोगों के रोने की आवाज भी बह रही थी ।
अब लोगों को किसी पर भरोसा नहीं रह गया है। देवी-देवताओं पर से विश्वास उठने लगा है। मानो सृष्टि की शुरुआत में लोगों को दिए हुए सारे वायदे खोखली आवाजों में तब्दील हो गये हों । बार-बार किसी पर विश्वास करके इनसान ठगा जा चुका है। उसके साथ विश्वासघात हुआ है ।
लक्ष्मी के पीछेवाली शाखाओं के जोड़ पर न जाने क्या आकर फँस गया है ।
शरीर में थोड़ी भी ताकत नहीं बची है, मन में शक्ति नहीं है, लाश की तरह एक जगह टिकी हुई है लक्ष्मी ।
अब सूर्य दिखलायी नहीं देता ।
बादल काले-काले होकर फिर घिर आये ।
लक्ष्मी की याददाश्त को कुछ ऊर्जा मिली । उसने अपने पीछे वाली शाखाओं की जोड़ में फँसी चीज को देखने के लिए पीछे की ओर देखा ।
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उसके हाथों में ताकत नहीं रह गयी थी ।
पानी की धारा में न बहकर पेड़ की शाखा प्रशाखा की जोड़ में हैरतअंगेज रूप से फँसे बच्चे को लक्ष्मी उठा लायी। बच्चे की दोनों आँखें मुंदी थीं, सारा शरीर फूल गया था, सीने में धड़कन नहीं थी ।
वह उसका छोटा बेटा नहीं था, फिर भी उसने उसे अपने सीने से सटाकर अपना स्तन उसके मुँह के पास लगाकर जोरों से अपने सीने में भींच लिया ।
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