माँ
ईश्वर पेटलीकर
ईश्वर पेटलीकर गुजराती के लोकप्रिय कथाकार हैं। इनके कथा साहित्य में गुजरात का समय और समाज, नये-पुराने मूल्य, दर्शन और कला आदि रच-पककर एक नई आस्वादकता के साथ उपस्थित होते हैं। 'खून की सगाई' इनकी प्रसिद्ध कहानी है और 'काला पानी' इनका लोकप्रिय उपन्यास है। साहित्य के अलावा श्री पेटलीकर सामाजिक-राजनीतिक जीवन में भी सक्रिय रहे हैं । इनकी दर्जनों पुस्तकें पुरस्कृत और बहुप्रशंसित हो चुकी हैं। यह कहानी गोपालदास नागर द्वारा संपादित एवं अनूदित कहानी संग्रह 'माँ' से साभार संकलित है ।
मंगु को पागलों के अस्पताल में भर्ती करने की सलाह लोग उसकी माँ को देते, तब उसकी आँखों में आँसू झिलमिला आते और हरएक को वह एक ही जवाब देती "मैं माँ होकर सेवा नहीं कर सकती, तो अस्पताल वालों को क्या पड़ी है ? अपंग जानवरों की गौशालाओं में भर्ती कर आने जैसा ही यह कहा जायेगा ।"
माँ की यह ग्रन्थि प्रकट हो जाने के बाद, कोई उनसे ऐसी बातें करता भी नहीं था । जन्म की पागल और गूंगी पुत्री को वे जिस तरह पालती-पोसती, सेवा करती और लाड़-प्यार करती, यह प्रत्यक्ष देख लोग उनकी प्रशंसा भी करते कि इस तरह पागल पुत्री को तो एक माँ ही पाल सकती है, दूसरे के घर हो तो भूखी-प्यासी कब की ही मर गई होती ! और जीवित भी होती तो भी ऐसा हृष्ट-पुष्ट शरीर तो नहीं होता ।
मंगु के अलावा उसकी माँ को तीन संतानें थीं, दो पुत्र और एक पुत्री ! दोनों पुत्र पढ़-लिखकर शहर में काम में लगे थे; पुत्री का विवाह हो गया था और वह अपनी ससुराल चली गयी थी । मंगु की माँ अपनी उन तीनों संतानों को भूल गयी हो यह बात नहीं थी किंतु उसका समग्र मातृत्व मंगु पर ही निछावर हो गया था । इसलिए, छुट्टियों में जब कभी लड़के घर आते, तब उनका घर-बार पौत्र पौत्रियों से खिल उठता; फिर भी दादी माँ के रूप में, वह हर्ष में पागल नहीं होती थी । उन बालकों को वह लेतीं, खिलातीं और लाड़-प्यार करतीं ।
माँ के इस व्यवहार के विषय में पुत्रों को तो कुछ ख्याल नहीं आता पर, पुत्रवधुएँ कसमसा जातीं । दोनों बहुओं की पति से यह एक ही फरियाद थी, "अपने पुत्रों के बालक उन्हें बिल्कुल अच्छे नहीं लगते और पगली मंगु को छाती से भी अलग नहीं करतीं ।"
मातृत्व के स्नेह में खिंची बहुएँ माँ जी के प्रति अन्याय कर बैठतीं । इतना ही नहीं, पुत्री 20
के बालकों के प्रति भी माँ जी का व्यवहार वैसा ही था । इस कारण बहुएँ पति के आगे बड़बड़ाकर जब थक जातीं, तब पुत्री माँ के मुँह पर ही सुना देती, "मंगु को झूठा लाड़-लड़ाकर ही तुमने अधिक पागल बना दिया है। आदत डाली हो, तो जानवरों को भी पाखाना-पेशाब कहाँ करना और कहाँ न करना, इसका ख्याल आ जाता है; बारह वर्ष की लड़की चाहे जितनी पगली हो, पर उसे आदत डाली हो, तो क्या इतना ख्याल भी न आए ? वह गूंगी है, पर कुछ बहरी नहीं है, कि हमारी बात सुने भी नहीं। भूल करने पर दो थप्पड़ लगा दिए हों, तो दूसरी बार तुरंत ख्याल रखे ।"
उसकी पुत्री आगे कुछ बोले, उससे पहले ही माँ जी की आँखें बरसने लगीं । पुत्री का हृदय भी भर आया, परन्तु कलेजा कठोर कर वह मन की बात निकाले बिना न रह सकी, "तुम समझती हो, मंगु को लाड़-प्यार करके उसे सुखी बनाती हो । पर यह समझ लो, कि तुम ही इसकी वास्तविक दुश्मन हो । तुम कुछ हमेशा बैठी रहने की नहीं हो, भाभियों के पाले पड़ेगी, तब नित्य उसके मल-मूत्र धोने का झंझट कोई नहीं करेगा और वह दुखी हो जाएगी ।" कुछ रुककर वह धीमे स्वर में बोली- "कहावत है, यह झूठी नहीं, 'पराई माँ ही कान छेदती है ।' अस्पताल में रखने से पागलपन दूर होने का तो नहीं, पर मल-मूत्र और कपड़ों का ध्यान आएगा तो भी बहुत है । भाइयों के घर में भगवान ने बहुत कुछ दिया है, भाभियाँ एक बार भी खाने को न दें, ऐसी ओछी नहीं हैं।"
माँ जी लोगों को अस्पताल के लिए गौशालाओं की उपमा देतीं, तब लोग पराये की तरह जो नहीं कह पाते थे, वह उनकी पुत्री ही कह डालती, "अस्पताल गौशाला जैसा होगा और शायद मंगु मर गई तो उसका और कुटुंब का छुटकारा होगा ।"
मंगु की मौत को माँ जी भी छुटकारा मानती थी, यदि वह प्राकृतिक रूप में आए तो । परन्तु, लापरवाही दिखाकर, उसे जान-बूझकर मौत के मुँह में ढकेलने का विचार उन्हें असह्य लगता । स्वार्थ से सभी सगे, पर निःस्वार्थ से सगा हो, वही सच्चा सगा । पुत्र कमाते-धमाते हों; पुत्री ससुराल में हिंडोले झूलती हो; उनसे प्यार भरा संबंध रखने का कोई अर्थ न था; मंगु की सच्ची माँ बनी रहें, तभी माँ बेटी का संबंध सार्थक था । इसीलिए पुत्री कहे या पुत्र कहे, तो भी मंगु को अस्पताल द्वारा मौत के मुँह में ढकेलने को माँ जी तैयार नहीं थीं ।
पुत्र माँ के इस भाव को समझ गए थे, इसलिए वे कभी ऐसी बात करते ही नहीं थे । क्योंकि, तीन गोरे निष्णात डॉक्टरों ने एकमत होकर निदान प्रकट किया था कि पागलपन मिटाना संभव नहीं । केवल एक विश्वास था कि किसी ट्रेण्ड और अनुभवी नर्स या डॉक्टर की देख-रेख में उसे रखा जाए, तो आदत के कारण शायद उसे शौच और कपड़ों का ध्यान आ जाए । परन्तु ऐसी अवस्था घर के पास हो सके यह संभव नहीं था, इसलिए वे मौन थे ।
फिर भी माँ जी ने अपनी श्रद्धा के अनुसार उपचार जारी रखे थे । दवा करनेवाले बिना बुलाए घर आ पहुँचते । शिलाजीत बेचने वाले या हींग बेचने वाले मंगु को पागल जानकर, वे दवा
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जानते हैं इसका दावा करते । माँ जी मानती थीं कि हजार उपचार करें, तब एक तो लग ही जाता है । इसलिए, दूसरे की दृष्टि में पागलपन जैसी बात भी वह गम्भीरता से सुनतीं और श्रद्धा से उस पर अमल करतीं । किसी ज्योतिषी ने कहा था कि आने वाले अगहन का महीना इसके लिए श्रेष्ठ है, इसीलिए संभव है, वह ठीक हो जाए। तभी से अगहन का महीना माँ जी के लिए आराध्यदेव बन गया था ।
अगहन के महीने में मंगु के चौदह वर्ष पूरे हो जाते थे, इसीलिए कोई बुद्धिमान व्यक्ति जिस तरंग में नहीं चढ़ जाता, वैसी तरंग में माँ जी चढ़ जातीं। चौदहवाँ पूरा होते-होते तो मंगु की बड़ी बहन का विवाह कर दिया था। मंगु पागल न होती, तो आज इसका विवाह भी तय हो गया होता । यदि अगहन के महीने में इसका पागलपन मिट जाए तो …. मरी का रूप तो ऐसा है कि मूरतिआ (वर) उसे देखने के साथ ही हाँ कह दे !
और, जैसे सब कुछ ठीक हो गया हो, वैसे वह विवाह की योजना भी मन में बनाने लग जातीं । कमु (मंगु की बड़ी बहन) के समय घर की स्थिति आज जैसी नहीं थी। आज तो दोनों भाई शहर में अच्छा कमाते हैं, पानी की तरह पैसा खर्च करते हैं, फिर मंगु के विवाह में वे किसलिए पीछे घूमकर देखें ?
एक बार मंगु बुद्धिमानी के साथ हौज में पेशाब करने बैठी। उससे प्रसन्न हो माँ जी कई दिनों तक हरएक के आगे पारायण करती रहीं "ज्योतिषी का कहना ठीक होगा । मंगु अब से पहले कभी भी नहीं, और यह पहली बार अपने आप हौज में पेशाब करने बैठी !"
सुनने वालों के गले से यह बात उतरनी कठिन थी, क्योंकि यह सुनते समय मंगु पेशाब कर गीली मिट्टी को अंगूठे से कुरेदती नजर पड़ती। माँ जी की दृष्टि उस तरफ जाते ही, बुद्धिमान पुत्री को जैसे शिक्षा देती हों, वैसे धीरे से कहतीं, "मंगु ! ऐसा गंदा नहीं करना चाहिए। अच्छा बेटा !"
मंगु को धुन आती और वह खड़ी हो जाती, तो उन्हें नई बात मिल जाती, "मैंने कहा तो समझकर बुद्धिमान की तरह खड़ी हो गई !"
इस प्रकार माँ जी का आशा-भरा अगहन का महीना आया। फिर मंगु अच्छी तो न हुई, पर शहर के कन्या विद्यालय में पढ़ती गाँव की एक लड़की कुसुम पागल हो गई । मंगु की तरह उसे भी टट्टी-पेशाब का ध्यान न रहता । माँ जी को इससे दुख तो हुआ पर साथ-साथ संतोष भी हुआ कि अच्छी-भली लड़की पागल होते ही इस प्रकार विवेक खो बैठती है, तो जन्म से पागल मंगु बेचारी को ऐसा ख्याल न हो तो इसमें क्या आश्चर्य ?
कुसुम को दवाखाने में भर्ती करने का निश्चय हुआ है, यह समाचार जानकर माँ जी को लगा कि उसकी माँ जीवित होती, तो उसे अस्पताल में भर्ती न करने देती । माँ बिना सब सूना कहा जाता है, वह झूठ थोड़े ही है ! इसके साथ उनकी भी आँखें बन्द हो जाने पर, मंगु को भी उसके भाई दवाखाने में भर्ती कर आते हों, वैसा दृश्य उन्हें कँपा गया ।
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पहले महीने के अन्त तक कुसुम को अच्छा फायदा हुआ वैसा समाचार मिला । उसे बाँध कर रखा जाता था, पर अब तो स्वतंत्र घूमती है और उपद्रव नहीं करती । टट्टी-पेशाब का ठीक-ठीक ध्यान आ गया है। पागलपन रहा है तो वह मात्र सारा दिन गाया करती है, इतना ही । यह भी दूसरे महीने में मिट जाएगा, ऐसा डॉक्टर ने कहा था ।
दूसरे महीने में कुसुम का पागलपन मिट गया, फिर भी एकाध महीना रहे तो अच्छा, ऐसी डॉक्टर की सलाह से उसे तीसरे महीने भी रखा गया था। वह घर आयी तब सारा गाँव उसे देखने उमड़ पड़ा था । सब से आगे माँ जी थीं ।
कुसुम को ठीक-ठीक सुधरी हुई देख माँ जी को हर व्यक्ति सलाह देने लगा, "माँ जी ! आप मंगु को एक बार अस्पताल में भर्ती करके तो देखें ? जरूर वह अच्छी हो जाएगी ।"
माँ जी ने जिंदगी में पहली बार अस्पताल का विरोध नहीं किया। चुपचाप वह लोगों की सलाह सुनती रहीं । दूसरे दिन उन्होंने कुसुम को अपने घर बुलवाया । उसे पास बैठाकर अस्पताल के हाल-चाल पूछना शुरू किया । माँ दया-भाव रखकर सेवा न कर सके, तो डॉक्टर-नर्स कर ही नहीं सकते, ऐसी उनके मन में जो गाँठ पड़ गई थी, वह कुसुम की बातचीत से खुल गई । नर्स या डॉक्टरों को कोई-कोई पागल चाँटा मार दे, तो भी वे लोग उस पर नहीं खीझते या उसे मारते नहीं, यह जानकर उन्हें अस्पताल पर श्रद्धा भी हुई। नई आशा पैदा हुई कि मंगु के भाग्य में दवाखाने जाने से पागलपन मिटने का लिखा होगा तो वह किसे पता ? इतने उपचार कर देखे तब एक और सही । नहीं मिटेगा तो क्या वापस नहीं लायी जा सकती ?
अंत में मंगु को दवाखाने में भर्ती करने का माँ जी ने निर्णय किया । इसीलिए बड़े पुत्र को घर आने को उन्होंने पत्र भी लिखवाया। फिर भी यह निर्णय किया तब से उनकी नींद भी उड़ गई थी । जैसे वह हारकर यह काम कर रही थीं ऐसा उनके मस्तिष्क पर एक प्रकार का भार-सा मालूम पड़ने लगा था । दवाखाने पर श्रद्धा उत्पन्न हुई, वह एक निमित्त था, बाकी धीरे-धीरे दूसरा छिपा कारण भी उन्हें दीखता था ।
मंगु बड़ी होती जाती थी, उनकी वृद्धावस्था बढ़ती जाती थी । बहुएँ चाकरी नहीं करेंगी, यह मालूम हो गया था, क्योंकि दोनों में से एक बहू ने भी अभी तक साथ रहने का आमंत्रण उन्हें न दिया था । आज के लड़के भी पत्नियों से दबे दबे ही घर-घर दीखते हैं। इसलिए अपने पुत्रों से भी आशा उन्हें अधिक न दीखती थी। इस स्थिति में मंगु का भगवान साथी हो, और उसका पागलपन मिट जाए; या न मिटे तो भी यदि उसे अस्पताल में भर्ती कर जाएँ, तो उन्हें मरने के समय एक प्रकार की शांति रहे, कि उसकी चाकरी करनेवाला दुनिया में पराया ही कोई है तो सही !
इस विचारधारा के साथ माँ जी की आँखों से इतना अधिक पानी बह जाता कि बिछौना तर हो जाता । हृदय पुकार उठता, 'चाहे जो बहाना भले ही निकालो, पर मूल बात इतनी, कि वह स्वयं भी पुत्री से थक गईं।' माँ जी नींद में से चौंक उठतीं, बोल उठतीं, 'क्या मैं थकी हूँ ?'
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हृदय और दूने वेग से पुकार उठता, 'एक बार नहीं, हजार बार !'
माँ जी को लगा, उन्होंने पुत्र को पत्र लिखकर ही बड़ी भूल की है। इतनी जल्दी क्या थी, कि जाड़े में उसे दवाखाने में भर्ती करना पड़े ? रात में मैं उसे कितनी ही बार ओढ़ाती हूँ। दवाखाने में इस तरह घड़ी घड़ी कौन ओढ़ाएगा ? गर्मी में भर्ती करने का रखा होता तो ठीक था।
परन्तु पत्र मिलते ही पुत्र आ पहुँचा। अस्पताल में भर्ती करने के लिए मजिस्ट्रेट से ऑर्डर भी प्राप्त कर लिया । एक सप्ताह में मंगु को भर्ती करने का तय हो गया। माँ जी को विश्वास हो गया कि पुत्र पगली बहन को अस्पताल में ढकेलकर बोझ उतारना चाहता है। ऐसा न होता, तो पत्र मिलते ही किसलिए आ पहुँचता ? कुछ सोर्स आदि लगाकर तुरंत डॉक्टर तथा मजिस्ट्रेट-से मंजूरी कराता ही किसलिए ? इन्हें लगता था कि अभी यह विचार स्थगित कर दें और गर्मी में भर्ती करें, पर पुत्र से कहने के लिए जुबान खुलती ही न थी। वह बड़ी मुश्किल से छुट्टी लेकर आया होगा, और भर्ती करने का प्रबंध कर चुका, तो अब मना करूँ तो, उसे लगेगा कि माँ को दूसरा धंधा नहीं है ।
मंगु को अस्पताल में भर्ती कराने जाना था, उस रात माँ जी को बिलकुल नींद नहीं आई। सुबह एक विचार यह भी आया कि वह साथ में न जाएँ तो अच्छा । अस्पताल वाले बेटी को उनसे अलग करेंगे यह उनसे सहन नहीं होगा। पर अस्पताल में कैसी व्यवस्था है, यह सब अपनी नजरों से देखेंगी नहीं, तब तक चैन पड़े, यह संभव नहीं था । इसीलिए विवश हो वह जाने को तैयार हुईं, पर मंगु को लेकर घर के बाहर निकलने लगे तब मानो उन पर ब्रह्मांड का भार आ गया । आँखों में सावन-भादो शुरू हो गया। नजर मंगु पर चिपक गई थी। वह किसी भी तरह उखड़ती न थी । मंगु अपने को पहनाये गये कपड़ों का रंग जी भर कर देख रही थी, भाव में आ गई हो जैसे, माँ जी की तरफ देखकर वह हँस भी पड़ी। उस समय माँ जी का कलेजा कट कर रह गया । गाय-बैल भी, जब उन्हें पुराने खूँटे से खोलकर दूसरी जगह ले जाया जाता है, तब नये आसामी के घर जाने में आनाकानी करते हैं। मंगु को इतना भी ध्यान नहीं था, यह प्रत्यक्ष अनुभव करती, माँ जी ड्योढ़ी से फिसल गईं। हृदय कलकला उठा, "अबोध पुत्री का दुनिया में कोई नहीं । सगी माँ भी उसकी न हुई !"
पुत्र का हृदय भी भर आया था। माँ की तरफ आँखें उठाने जितनी भी उसमें हिम्मत नहीं थी । जितना विलम्ब होता था, उतना ही ट्रेन पकड़ने का समय कम होता था । आँगन के बाहर गाड़ी में जुते बैल पाँव उठाने को तत्पर हो रहे थे। पुत्र ने माँ की तरफ आँखें बिना किए ही, लथड़ाकर पाँव उठाते हुए कहा, "देर हो रही है। अब निकलना चाहिए ।"
आँगन से निकलते समय उसने धोती के कोने से आँखें पोंछ लीं ।
पड़ोस की एक स्त्री ने मंगु का हाथ पकड़कर आगे किया। दूसरी स्त्रियों ने माँ जी को सहारा दिया । अंत में कड़वा घूँट हृदय में पीकर घुटनों पर हाथ टेक वे खड़ी हुईं। दो स्त्रियों ने पकड़कर चढ़ाया तब उनसे बैलगाड़ी पर चढ़ा गया ।
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गया । मंगु पागल है, यह जानकर ट्रेन के अन्य मुसाफिरों को अच्छा-खासा चर्चा का विषय मिल
"ऐसी खाती-पीती सुखी लड़की को अस्पताल में रखेंगी, तो एक महीने में ही लकड़ी जैसी हो जाएगी । वहाँ तो जानवरों की तरह जितना दिया उतना खाया, बस !"
"हमारे गाँव में एक वृद्धा को उसके लड़के पाँच साल से अस्पताल में भर्ती कर आए हैं, पर कुछ भी फर्क नहीं पड़ा है। गाँव का कोई व्यक्ति मिलने जाता है, तो रोने लगती है । पाँव पकड़कर कहती है- "मुझे यहाँ से ले चलो !' …. पर आज के लड़के लाते ही नहीं !"
"ऐसे लड़कों से क्या आशा रखी जाए ?"
"लड़के तो ऐसे अच्छे हैं, पर आजकल की बहुएँ जानती हैं न, पहनना-ओढ़ना हो, इसलिए अधिक आदमी घर में पोसाता ही नहीं ।"
"इस लड़की की माँ नहीं है क्या ?"
माँ जी को यह घाव असह्य हो गया । आँखों में आँसू आ गए, कंठ रुँध गया, शर्म से आँखें झुक गईं । साथ-साथ सिर झुकते ही, माँ जैसा उनका दावा भी अपने-आप व्यक्त हो गया ।
"बाप रे ! आप माँ होकर इसे ढकेल रही हैं, फिर अस्पताल वालों को क्या दोष दिया जाए ?"
माँ जी यदि अकेली होतीं या लड़के को बुरा लगने का भय न होता तो लौटती गाड़ी से मंगु को लेकर घर वापस आ जातीं परन्तु दूसरा उपाय नहीं था, इसलिए भारी कदमों और भारी हृदय से वह अस्पताल में प्रविष्ट हुईं ।
मुलाकात का समय था, इसलिए बीच के खंड में रोगी और उनके सगे-संबंधी अलग-अलग बैठे थे। स्वजनों द्वारा घर से लाया खाना काफी लोग खा रहे थे। कोई-कोई फल खा रहे थे। एक पागल पति के साथ पत्नी घर की और बच्चों की बातें कर रही थी। एक पागल पत्नी से उसका पति मिलने आया था, उससे वह लिपट पड़ी थी और बगल में खड़ी वार्ड की परिचारिकाओं की तरफ इशारा करके फरियाद कर रही थी "ये भुतनियाँ मुझे अच्छे कपड़े पहनने को नहीं देतीं, अच्छा खाना नहीं देतीं। सिर में डालने को तेल भी नहीं देतीं ।"
माँ जी उस समय परिचारिकाओं की तरफ देख रही थीं। उस पागल स्त्री के लिए जो परिचारिका थी, वह हँसकर बोली "अब मैं तुम्हें सब कुछ दूँगी । तुम्हारे पति अच्छा-अच्छा खाने को लाए हैं, वह एक बार खा लो ।"
उस पगली स्त्री ने कहा, "मैंने मंजन नहीं किया है, मैंने मुँह नहीं धोया है ।"
माँ जी ने देखा, तो उनका मुँह धुला था, फिर भी जरा भी खीझे बिना परिचारिका ने पानी का लोटा लाकर मुँह धुलाया, रूमाल से मुँह पोंछ दिया । माँ जी को विश्वास हो गया कि काम करने वाले हैं तो दयालु ।
डॉक्टर और स्त्री-वार्ड की मेट्रन आ गई। माँ जी के पुत्र ने मजिस्ट्रेट का ऑर्डर दिया ।
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माँ को संतोष हो, इसलिए ऊँचे स्वर में, मंगु की देखभाल अच्छी तरह करने को कहा ।
मेट्रन ने कहा, "इस बाबत आपको चिंता नहीं करनी चाहिए।"
बीच ही में माँ जी बोलीं, "बहन ! चिंता तो इसलिए करनी पड़ती है, कि यह एकदम पागल है । कोई इसके पास बैठक खिलाए नहीं, तो यह खाती भी नहीं…." इतना कहते हुए उनका कंठ भर आया और वाक्य अधूरा ही रह गया ।
दूर खड़ी परिचारिकाएँ निकट दौड़ आयीं । एक बोली, "माँ जी ! आप किसी तरह की फिकर न करें । हम इसे मुँह में कौर डाल-डालकर खिलाएँगी ।"
भरी-भरी आवाज में माँ जी बोलीं, "यही तो बहन, मुझे कहना है। इसे टट्टी पेशाब का भी ख्याल नहीं रहता, यह रात में कपड़े बिगाड़े तो देखना । नहीं तो गीले में सो रहेगी, तो वायु हो जाएगा ।"
दूसरी परिचारिका बोली, "रात में चार-पाँच बार जाँच की जाती है ।"
माँ जी ने कहा, "रात में रोशनी जलती रहने से इसे नींद नहीं आती ।"
"जिसे नींद नहीं आती, उसे नींद की दवा दी जाती है ।"
"इसे दूसरे उपद्रवी मरीज मारें-पीटें नहीं, वह देखना ।"
"जो उपद्रवी होते हैं, उन्हें अलग रखा जाता है। रात में सबको अलग-अलग कमरों में सुलाया जाता है ।"
मिलने आने वाले लोग विदा लेते तब रोगी को अंदर के कमरे में ले जाने के लिए दरवाजा थोड़ा खुलता । इस अवसर का लाभ लेकर माँ जी की नजर दो-तीन बार अंदर घूम जाती थी। तीन-चार स्त्रियों को अस्त-व्यस्त बालों में, अस्त-व्यस्त कपड़ों में उन्होंने अन्दर घूमते हुए देखा । एक ने उनकी तरफ देखकर, छाती कूटी और भयभीत आँखों से देखा, कि वह डर गईं। इस पर उन्हें अंदर के रहने की जगह देखने की इच्छा हुई । माँग की, "मंगु को जिस कमरे में रखना हो वह मुझे दिखला दें ।"
मेट्रन ने कहा, "अंदर किसी को देखने जाने का नियम नहीं है ।"
विस्मय भरे नेत्रों से यह नई दुनिया देख रही मंगु माँ जी की बगल में लपकी । सिर पर हाथ रख, माँ जी रोज की तरह स्नेहमय 'बेटा' शब्द उच्चारित करने लगीं कि तभी उनका स्वर फूट पड़ा, मरने के समय जैसी एक लंबी सिसकी फूट पड़ी । इस आक्रंदन में सारा अस्पताल डूब गया । पुत्री की आँखों से चौधार आँसू बह चले। ऐसे रुदन से अभ्यस्त हो गए डॉक्टर, मेट्रन और परिचारिकाओं के हृदय भी भर आए । दीवारें भी आर्द्र हो उठीं । इतना स्नेहभरा किसी पागल का स्वजन आज तक आया हो, यह वहाँ किसी ने देखा नहीं था ।
एक परिचारिका हाथ का रूमाल फटकारकर, मंगु का ध्यान अपनी तरफ खींचकर बोली, "लो, चाहिए तुम्हें ?"
मंगु रूमाल पकड़ने के लिए माँ को छोड़कर एकदम खड़ी हो गई। थोड़ा रूमाल पकड़
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लेने के बाद, उसका हाथ थपथपाकर परिचारिका मीठे शब्दों में बोली, "तुम मेरे पास रहोगी न, बहन ? मैं अच्छा-अच्छा खाने को दूँगी, नये-नये कपड़े पहनाऊँगी ।" मंगु उसके चेहरे की तरफ ही ताक रही थी । इसलिए उस क्षण का उपयोग करके 'चलो, दूँ' कहा और उसका हाथ पकड़कर आगे किया । वह दरवाजा आधा खुला और मंगु को अपने अंदर ले गया ।
"मंगु… मंगु…!" कलेजा काँप उठे, ऐसी चीखें माँ जी ने पुनः निकालीं ।
डॉक्टर ने आश्वासन देते हुए कहा, "माँ जी !" और बगल में खड़े पुत्र की तरफ उँगली करके बताया, "अपने इस पुत्र जैसा मुझे भी पुत्र समझिएगा। बेटी को अस्पताल में नहीं, बेटे के घर छोड़े जा रही हैं, ऐसा मानिएगा ।"
अधेड़वय की बालवय में विधवा हुई मेट्रन ने आश्वासन देते हुए कहा, "आज तक आप इसकी माँ थीं, आज से मैं इसकी नई माँ हुई हूँ।"
माँ जी सिसकी भरती हुई बोलीं, "इसे बेजबान जानवर जितनी भी बुद्धि नहीं । मैंने इसे आज तक अपने से अलग नहीं किया है। कुसुम आपके अस्पताल में ठीक हो गयी, इसलिए मैंने हृदय कठोर करके…." और उनका कंठ भर आया ।
मेट्रन ने कहा, "उस कुसुम की तरह यह भी थोड़े समय में समझदार हो जाएगी ।"
माँ जी की सिसकियाँ रुकीं । फिर उनकी दृष्टि उस बंद दरवाजे को पार कर मंगु पर ही जैसे पड़ी थी । मंगु ने जैसे उन्हें याद दिलाया हो, वैसे वह बोली, "वह रूखी रोटियाँ नहीं खाती । शाम के भोजन में रोटी दूध के साथ दीजिएगा या दूध न हो तो दाल में ।"
माँ जी की करुण आँखों की तरफ नजर करने की मेट्रन की शक्ति लुप्त हो गई हो, वैसे ही वह नीची दृष्टि किए हुए ही बोली, "अच्छा ।"
माँ जी और उनका पुत्र मंगु को अस्पताल में भर्ती कर बाहर आए, तब दोनों के चेहरे पर शोक के बादल छाए थे । चुपचाप दोनों बाहर खड़ी घोड़ागाड़ी में बैठ विदा हुए । ट्रेन के डिब्बे में पाँव रखते ही माँ जी को याद आया, अस्पताल में सोने के लिए चारपाई देते होंगे या नहीं ? मंगु धरती पर कभी नहीं सोई है, इसलिए चारपाई नहीं होगी तो उसे ठीक नहीं लगेगा ।
अस्पताल में काम करने वाले दयालु हैं, भले हैं, ऐसा विश्वास माँ जी को हुआ था । परन्तु उन्हें अन्दर जाने न दिया था इसलिए संदेह रह गया था, कि हमें अच्छा न लगे वैसा कुछ होगा, इसीलिए तो हमें न जाने का नियम बनाया होगा न ? इस बात का पुष्टीकरण करता था वह अधखुला दरवाजा, भूत की तरह घूमती गंदी और भूख से मरती सी भयानक लगनेवाली पागल स्त्रियाँ ! इसके साथ ही माँ जी को, मंगु उन्हें न देखकर रोती हो, वैसी आवाज सुनाई दी। उनकी आँखों से आँसू निकल पड़े । बगल में बैठी एक स्त्री ने पूछा, "माँ क्यों रोती हैं ? किसी की मृत्यु हो गई है क्या ?"
रात में पौने ग्यारह बजे घर आईं तब उनकी राह देखती पड़ोसिन, जो उनके कुटुम्ब की ही थी, वह जाग रही थी। उनके लिए उसने खाना भी बना रखा था। पर दोनों ने खाने के लिए
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मना कर दिया । स्वजन की मृत्यु का घाव ताजा हो तब जैसा आग्रह करने वाले की जीभ नहीं खुलती, वैसे ही पड़ोसिन ज्यादा खींचतान न कर सकी ।
माँ जी के अन्तर में एक तंबूरा बज ही रहा था, मंगु इस समय क्या करती होगी ? पल-पल में यही विचार उनके हृदय को वेध रहा था। कितनी ठंढ है ! उसे ओढ़ाया तो होगा ? पेशाब करके गीला कर दिया होगा, तो उसका फ्राक और बिछौना बदला होगा ?
जैसे मंगु उनकी बात सुन रही हो वैसे वह बोलीं, "बेटा ! पेशाब न करना । ओढ़ा हुआ फेंकना मत ।" ये शब्द सोने के समय वह नित्य उच्चारण करतीं, फिर भी मंगु इन पर अमल नहीं करती । रात में पेशाब कर देती, तो उसका फ्राक और बिछौना भी बदल डालतीं । मंगु बड़ी हो गई, फिर भी अपने साथ ही उसे सुलातीं, जिससे वह पेशाब करे तो उन्हें तुरंत पता चले, और उसे गीले में सोये रहना न पड़े ।
माँ जी को स्वयं भी उसके बिना बिछौना सूना सूना लगता था । मन में हुआ-मेरे साथ सोने की आदत है, उसे नींद आई होगी या नहीं ? उनके लिए आँखें बावरी बन उन्हें ढूँढती हों, वैसा उन्हें दीखा । उन्होंने चारपाई की पाटी पर सिर पटका, "मैं माँ होकर उसे अस्पताल में छोड़कर आ गई !' उनकी एक सिसकी फूट पड़ी ।
बाहर के खंड में सोये पुत्र को भी नींद नहीं आई। माँ की अपेक्षा उसे सौवें हिस्से जितनी भी मंगु के साथ ममता न थी, फिर भी उसके कलेजे पर वेदना का काला पत्थर रखा गया था। माँ की सिसकियों के साथ उसकी आँखों में भी आँसू बहने लगे। अपने को इतनी वेदना होती है, तो माँ को क्या-क्या होता होगा ? माँ के हृदय का मांस ! वेदना कितनी क्रूरता से कौंच रही थी, उसका साक्षात्कार जीवन में पहली ही बार पुत्र को हुआ। उसका हृदय पुकार उठा, "माँ का यह दुख किसी भी उपाय से टालना चाहिए। पुत्र होकर इतना भी मैं न कर सकूँ, तो मेरा जीना व्यर्थ है ।" उसके साथ ही उसके अंतर ने प्रतिज्ञा की, "मैं मंगु को जीते-जी अच्छी तरह से पालूँगा । बहू उसका मल-मूत्र धोने को तैयार नहीं होगी तो मैं धोऊँगा ।" इसके साथ वेदना का काला पत्थर उसकी छाती पर से खिसक गया ।
माँ जी ने दूसरी सिसकी ली होती, तो वह उसी क्षण उन्हें अपनी प्रतिज्ञा सुनाकर सांत्वना दे देता, पर वह शांत पड़ गई लगीं, इसलिए उसने भी सोने के लिए आँखों पर पलकें गिरा लीं।
सुबह जब चक्की की और मथने की मधुर आवाज गूँज रही थी, तब सारे गाँव को जैसे बेध डाले वैसी चीखें माँ जी ने मारनी शुरू कीं, "दौड़ो रे दौड़ो ! मेरी मंगु को मार डाला रे.. !"
पुत्र चारपाई से उछल पड़ा, पड़ोसी दौड़े आए, चक्कियाँ और मथनियाँ रुक गईं ! जिसने सुना वही दौड़ आया, और जो आए वैसे ठिठक गए। माँ जी मंगु की श्रेणी में मिल गई थीं..!
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