नगर सुजाता
सुजाता का वास्तविक नाम एस० रंगराजन है। इनका जन्म 3 मई 1935 ई० में चेन्नई, तमिलनाडु में हुआ । अपनी रचना-शैली तथा विषय-वस्तु के द्वारा इन्होंने तमिल कहानी में उल्लेखनीय बदलाव किए। इनकी रचनाएँ खूब लोकप्रिय हुईं। इन्होंने कुछ अभिनेय नाटक भी लिखे । इनके कुछ उपन्यासों पर चलचित्र भी बने। इनकी पच्चीस से अधिक कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें 'करैयेल्लान शेण्बकप्पू', 'कनवुत् तोलिरशालै' आदि उपन्यास काफी चर्चित और सम्मानित हुए । यह कहानी 'आधुनिक तमिल कहानियाँ' (नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया) से यहाँ साभार संकलित है। इस कहानी के अनुवादक के० ए० जमुना हैं ।
काल्डवेल के 'तुलनात्मक व्याकरण' में लिखा है- "मदुरै पांडिय लोगों की दूसरी राजधानी है । हमारे देश में प्राचीन मानचित्रों में 'मथरा' नाम से उल्लिखित, अंग्रेजों द्वारा 'मदुरा' और यूनानी लोगों द्वारा 'मेदोरा' कहे जाने वाला नगर तमिल लोगों का मदुरै ही है ।"
दीवारों पर मोटे अक्षरों में छपे, विविध वस्तुओं का विज्ञापन करनेवाले, तरह-तरह के पोस्टर लगे हुए थे । निजाम लेडी तंबाकू, ए० के० ब्रांड ब्रेसियर्स, सावधान ! क्रांति की आग भड़क रही है । खास सभाएँ, हाजी मूसा की कपड़ों की दुकान (कपड़ों का सागर), 30.9.73 को नास्तिक लोग आग की हांडियाँ लेकर चलेंगे ।
मदुरै नगर में एक साधारण दिंन । हमेशा की तरह सड़कों पर नलों के सामने मनुष्यों के बदले घड़े लाइन बनाकर खड़े थे । छोटे बच्चे 'टिटनेस' जैसे भयानक रोग की चिंता किये बिना मिट्टी में खेल रहे थे । पांडियन परिवहन निगम की बसें सर्वत्र स्वदेशी की भावना से युक्त डीजल का धुआँ फैला रही थीं। कलफ लगी निकर-कमीज पहने, प्रोटीन की कमी से पीड़ित से पुलिसवाले इधर-उधर आने-जानेवाले वाहनों और मनुष्यों की गति को नियंत्रित कर रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो वे 'ब्राउनीय गति सिद्धांत' का पालन कर रहे थे ।
खादीधारी लोगों का एक जुलूस, जो न ज्यादा बड़ा था और न लंबा, महँगाई के लिए सरकार को कोसता हुआ सड़क की बायीं ओर मानो रेंग रहा था । चप्पलरहित गँवार लोगों की भीड़, मीनाक्षी मंदिर के स्तब्ध से खड़े अनेक गोपुरम, सूखी हुई बेगै नदी का पुल… यही है मदुरै ।
हमारी कहानी एक ऐसी लड़की से संबंधित है जो आज ही इस नगर में आयी है। वल्लि अम्माल अपनी लड़की पाप्पाति के साथ मदुरै स्थित बड़े अस्पताल के बहिरंग रोगी विभाग के बाहर बरामदे में बैठी प्रतीक्षा कर रही थी। पहले दिन पाप्पाति को बुखार था । उसे गाँव के प्राइमरी
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हेल्थ सेंटर ले जाये जाने पर वहाँ के डॉक्टर ने उन्हें डरा दिया। वे बोले, "सुबह की पहली बस लेकर झटपट बड़े अस्पताल पहुँच जाओ ।"
पाप्पाति स्ट्रेचर पर लेटी हुई थी । छह डॉक्टर उसे घेरे खड़े थे । पाप्पति लगभग बारह साल की थी । उसकी नाक दोनों ओर से छिदी हुई थी । नाक की लौंग में जड़े मामूली नगीने अस्पताल की रोशनी में चमक रहे थे। माथे पर विभूति का आड़ा तिलक लगा था । छाती तक चादर ओढ़ायी हुई थी । उसमें से बाहर निकले उसके हाथ दुबले-पतले से लग रहे थे । बुखार की तेजी के कारण पाप्पाति बेहोश-सी पड़ी थी। उसका मुँह खुला हुआ था ।
बड़े डॉक्टर ने उसका सिर घुमाकर देखा । आँखों की पलकों को उठाकर देखा । गालों को उँगली से दबाकर देखा । खोपड़ी को उँगलियों से ठोक-ठोककर उसका परीक्षण किया । बड़े डॉक्टर विदेश से शिक्षा पाकर लौटे थे । स्नातकोत्तर कक्षाओं को पढ़ाते थे । वे प्रोफेसर थे । उनके चारों ओर खड़े डॉक्टर उनके छात्र थे। वे बोले, "एक्यूट केस ऑफ मेनिनजाइटिस । नोटिस दि.
वल्लि अम्माल न समझ में आनेवाली उनकी बातों को सुनती हुई अत्यंत चिंतित होकर अपनी पुत्री को एकटक देख रही थी । चारों ओर खड़े डॉक्टरों ने बारी-बारी से आकर 'ऑप्थलमस्कोप' की सहायता से उस लड़की की आँखों के भीतरी भाग का परीक्षण किया । टार्च से रोशनी फेंककर यह देखा कि उसकी पुतलियाँ हिलती हैं या नहीं। फिर अपनी-अपनी कॉपियों पर आवश्यकतानुसार टिप्पणियाँ लिख लीं ।
बड़े डॉक्टर बोले, "कह दीजिए कि इसे एडमिट कर लें ।"
वल्लि अम्माल ने बारी-बारी से उनके चेहरों की ओर देखा । डॉक्टरों में से एक बोला, "माताजी ! इस लड़की को तुरंत अस्पताल में भर्ती करना होगा। वह देखिए, वहाँ जो सज्जन बैठे हुए हैं, उनके पास जाइए । आपकी चिट कहाँ है ?"
वल्लि अम्माल के पास चिट नहीं थी ।
"कोई बात नहीं, वे दे देंगे अरे यार ! तू चल ! बाबूजी इस तरफ से ।"
वल्लि अम्माल ने बड़े डाक्टर की तरफ देखते हुए पूछा, "बाबूजी ! बच्ची अच्छी हो जायेगी न ?"
"पहले इसे एडमिट करवा दे । हम इसकी देखभाल करेंगे । डॉ० धनशेखरन, इस केस को मैं स्वयं देखूँगा ।"
दूसरे लोगों द्वारा घिरे हुए वे किसी मंत्री की तरह वहाँ से चल दिये । डॉ० धनशेखरन वहाँ बैठे श्रीनिवासन को सारी बातें समझाकर बड़े डॉक्टर के पीछे दौड़े ।
श्रीनिवासन ने वल्लि अम्माल की ओर देखा ।
"अम्मा ! इधर आओ । तुम्हारा नाम क्या है ? अरे ओ हरामजादे ! वह रजिस्टर उठा
दे।"
31 एल सोलुट 4
बिल्कुल
- पटना
"वल्लियम्मा.
"पेशेंट का नाम ?"
"वे मर चुके हैं।"
श्रीनिवासन ने सिर उठाकर देखा ।
"पेशेंट यानी रोगी, किसे भरती करना है ?"
"मेरी बेटी को ।"
"नाम क्या है ?י
"हाँ, वल्लियम्मा।
"क्या मजाक कर रही है ? तेरी बेटी का नाम क्या है ?"
"पाप्पात्ति ।"
"पाप्पाति ….. हे ईश्वर । ये ले। इस चिट को लेकर सीधे चली जा । वहाँ सीढ़ियों के ऊपर एक सज्जन कुर्सी पर बैठे मिलेंगे । वे लोगों से वेतन आदि के बारे में पूछताछ करते हैं । उन्हें यह चिट दे देना ।"
"बच्ची का क्या होगा ?"
"बच्ची को कुछ नहीं होगा। उसे यहाँ लेटी रहने दे। तेरे साथ कोई नहीं आया ? तू जा । यहाँ विजयरंगम कौन है ?"
वल्लि अम्माल पाप्पाति को अकेली छोड़कर नहीं जाना चाहती थी। वहाँ की लंबी कतार देखकर और वहाँ फैली एक विशेष गंध के कारण जी मिचलाने लगा। उसे अपने मृत पति पर बहुत गुस्सा आया ।
वह चिट लेकर सीधे चली गयी। कुर्सी खाली पड़ी थी। उसकी पीठ पर धूल जमी हुई थी । पास बैठे एक व्यक्ति को उसने चिट दिखायी। उन्होंने कुछ लिखते हुए कनखियों से उस चिट की ओर देखा । "माँ जी ! तनिक ठहरो, उन्हें आने दो" कहकर खाली कुर्सी की ओर संकेत किया । वल्लि अम्माल के मन में अपनी बेटी के पास लौट जाने की तीव्र इच्छा जागी । उस अनपढ़ स्त्री के हृदय में इस प्रश्न ने अत्यंत विशाल रूप ले लिया कि "मैं यहाँ प्रतीक्षा करूँ या बच्ची के पास लौट जाऊँ ?"
उसे यह पूछते हुए डर लग रहा था कि, "क्या उन्हें आने में बहुत देर लगेगी ?"
वेतन के बारे में पूछताछ करनेवाले ये सज्जन अपने भानजे को भर्ती करवाकर आराम से लौटे । आकर कुर्सी पर बैठे। उन्होंने तीन बार नसवार ली। फिर रूमाल को रस्सी की तरह बटकर नथुनों में डालकर सुरसुराकर चुस्त होकर बोले- "देखो भाई, तुम लोगों को लाइन बनाकर खड़े होना चाहिए । फतिंगों की तरह झुंड बनाकर चले आओगे तो कैसे काम चलेगा ?"
तीस मिनट तक इंतजार करने के बाद वल्लि अम्माल के हाथ की चिट को जैसे किसी ने छीन-सा लिया ।
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"इस चिट पर तो डॉक्टर साहब के दस्तखत ही नहीं हैं। जाकर डॉक्टर साहब के दस्तखत करवा ला ।"
"मुझे इसके लिए कहाँ जाना होगा ?"
"तू कहाँ से आयी है ?"
"मूनॉडिप्पट्टि से !"
"अच्छा मूनांडिप्पट्टि से !" कहकर क्लर्क जोर से हँसे फिर बोले, "अपनी वह चिट मुझे दे दे ।"
उसने दोबारा अपनी चिट उन्हें दी। उन्होंने उसे उलट-पलटकर देखा ।
"तेरे पति का वेतन कितना है ?"
"वे मर चुके हैं।"
"तेरा वेतन कितना है ?"
"वे मर चुके हैं।"
उसकी समझ में नहीं आया कि वह क्या करे ।
"महीने में कितने रुपये कमाती है ?י
"जब फसल काटने जाती हूँ तब वेतन के रूप में धान मिलता है। दूसरे मौकों पर बाजरा, रागी आदि मिलता है ।"
"रुपये नहीं मिलते ! अच्छा, अच्छा । तेरा वेतन नब्बे रुपये लिख लेता हूँ ।"
"एक महीने में ?יי
"घबरा मत । तुझसे पैसे नहीं लेंगे। ले इस चिट को लेकर यहाँ से सीधे जाकर बाय उनसे हाथ की तरफ मुड़ जा । दीवार पर तीर का निशान बना होगा । वहाँ से तू 48 नंबरवाले कमरे में चली जाना ।"
वल्लि अम्माल ने उस चिट को दोनों हाथों में ले लिया। क्लर्क ने उसे जो संकेत दिये थे, उनसे उसके सरल मन में और अधिक उलझन पैदा हो गयी। हवा के झोकों में पड़े कागज के टुकड़े की तरह वह अस्पताल में इधर से उधर भटकती फिरी । वह पढ़ना नहीं जानती थी । उस समय उसके ध्यान से यह बात उतर गयी थी कि उसे 48 नंबरवाले कमरे में जाना है । लौटकर उस क्लर्क से दोबारा कुछ पूछते हुए उसे डर लग रहा था ।
अचानक उसने अपने पास से दो रोगियों को एक ही स्ट्रेचर पर ले जाते देखा । उनमें एक बैठा हुआ था और दूसरा अधलेटी अवस्था में पड़ा था। दोनों की नाक में नली डाली गई थी । दूसरी ओर एक ट्राली में एक चौड़े मुँहवाले बर्तन में सांभर मिला भात ले जा रहे कुछ सफेद टोपीधारी लोग दिखायी दिये। सभी प्रकार से सुसज्जित, सफेद कोट पहने, स्टेथस्कोप को माला की तरह गले में डाले कुछ डॉक्टरनियाँ सामने से निकलीं। पुलिसवाले, चाय-काफीवाले, नर्स - सभी लोग सभी दिशाओं में आ-जा रहे थे। वे लोग जल्दी में थे। उन्हें रोककर कुछ पूछते
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हुए उसे डर लग रहा था । उसकी समझ में नहीं आया कि वह उनसे क्या पूछे ।
किसी एक कमरे के सामने लोग भीड़ लगाये खड़े थे। वहाँ एक आदमी उसके हाथ की चिट की तरह पीले रंग की बहुत सारी चिटें जमा किये हुए था । उसने अपनी चिट उस आदमी को दे दी। उसने बिना देखे उसकी चिट लेकर रख ली। बाहर बेंच पर बैठे सभी अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे। वल्लि अम्माल को पाप्पात्ति की चिंता सताने लगी। लड़की वहाँ अकेली पड़ी है। जिस आदमी ने चिट इकट्ठी की थी, वह एक-एक का नाम लेकर पुकार रहा था और उन्हें उसी क्रम से बैठाता जा रहा था । चिट पर पाप्पाति का नाम पढ़कर वह बोला, "इसे यहाँ क्यों लायी ? ले, इसे लेकर सीधे चली जा" और वह चिट वल्लि अम्माल को वापस दे दी । इस पर वह बोली, "बाबूजी, मेरी समझ में नहीं आया कि मुझे कहाँ जाना है।" कुछ सोचकर उसने उसके सामने से जाते एक व्यक्ति को रोककर कहा, "अमलराज, माताजी को 48 नंबर का कमरा दिखा दे ।" वल्लि अम्माल से वह बोला, "इस आदमी के पीछे-पीछे चली जाओ । ये
वहीं जा रहे हैं।"
उसे अमलराज के पीछे भाग-भागकर जाना पड़ा ।
वहाँ एक ओर बेंच पर दूसरे लोगों की भीड़ दिखायी दी। एक आदमी ने उसके हाथ की चिट ले ली । सुबह से भूखी होने के कारण और अस्पताल में फैली विशेष गंध के कारण वल्लि अम्माल का सिर चकराने लगा ।
आधे घंटे बाद उसका नाम पुकारा गया । वह कमरे के अंदर गयी । आमने-सामने दो लोग बैठे पेंसिल से कुछ लिख रहे थे । उनमें से एक व्यक्ति ने उसकी चिट अपने हाथ में ली और उसे उलट-पलटकर ध्यान से देखा ।
"बहिरंग रोगी विभाग से आयी हो ?"
वह उसके इस प्रश्न का उत्तर न दे सकी ।
"चिट पर लिखा है कि रोगी को एडमिट किया जाय । इस समय जगह नहीं है। कल
सुबह ठीक साढ़े सात बजे आ जाना, समझी ?"
"बाबूजी, कहाँ आना होगा ?"
"यहीं आना । सीधे यहीं आ जाना, समझी ?"
उस कमरे से बाहर आते ही वल्लि अम्माल को अपनी बेटी पाप्पात्ति की बहुत चिंता सताने लगी, जिसे वह लगभग डेढ़ घंटे से अकेला छोड़ आयी थी। वह उसके पास लौटने का रास्ता नहीं पा सकी । अस्पताल के सभी कमरे एक जैसे थे । उसे लगा, मानो एक ही आदमी घूम-फिरकर अस्पताल के अलग-अलग कमरों में बैठा हुआ है। एक वार्ड में अनेक रोगी लेटे हुए थे, जिनके हाथ-पैरों को ऊँचा करके उन पर वजन बाँधा गया था। एक कमरे में क्रम से लेटे छोटे-छोटे बच्चे मुँह बना-बनाकर रो रहे थे। मशीनों, रोगियों और डॉक्टरों की उस भीड़ में, वह वापस लौटने का रास्ता न पा सकी ।
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उसने डॉक्टरनी को पास बुलाकर उस जगह की पहचान बतायी, जहाँ से वह चली थी। वह बोली, "डॉक्टर बीबी, वहाँ बहुत से डॉक्टर लोग मिलकर बातचीत कर रहे थे । एक आदमी ने मुझसे मेरा वेतन पूछा था । उसने यह भी बताया कि मुझे इलाज के लिए पैसे नहीं देने पड़ेंगे । मैं अपनी लड़की को वहीं छोड़ आयी हूँ ।"
डॉक्टरनी द्वारा बताये गये रास्ते से वह लौटी। उस समय मुख्य द्वार पर ताला लगा हुआ था । उसका मामूली सा डर भीषण भय की भावना में परिणत हो गया। वह रोने लगी । उसे बरामदे के बीचों-बीच खड़े रोता देख एक आदमी ने उसे किनारे पर खड़े होकर रोने को कहा । वहाँ के लोगों को उसका रोना शायद वहाँ फैली रोगाणुनाशक दवाइयों की गंध के समान सहज स्वाभाविक लगा था ।
"पाप्पात्ति ! पाप्पात्ति ! मैं तुझे कहाँ ढूँढूँ ? मैं अब कहाँ जाऊँ ?" कहती हुई वह इधर-उधर घूमती फिरी । तभी उसे एक तरफ बाहर जाने का रास्ता दिखायी दिया । अस्पताल से बाहर जाने का रास्ता । उस दरवाजे से सिर्फ अंदर के लोगों को बाहर जाने दिया जा रहा था । उसे याद आया कि उसने यह दरवाजा पहले भी देखा था ।
वह बाहर आयी । उसे याद आया कि वह यहाँ से थोड़ी दूर चलकर दूसरे दरवाजे से अस्पताल भीतर गयी थी। वह उस ओर दौड़ी। दूसरे दरवाजे के पास पहुँचने पर उसे लकड़ी की बनी सीढ़ियों की याद आयी । सामने उस सज्जन की कुर्सी खाली पड़ी थी, जिसने वेतन आदि के बारे में पूछा था ! मुझे वहीं जाना है ।
वह दरवाजा बंद था । अंदर एक किनारे पर पाप्पाति अब भी एक स्ट्रेचर पर आँखें मूँदे पड़ी दिखायी दी ।
"बाबूजी, बाबूजी ! जरा दरवाजा खोलिए । मेरी बेटी अंदर है ।"
"ठीक तीन बजे आना । इस समय सब कुछ क्लोज हो चुका है।" वह दस मिनट तक उस आदमी से मिन्नतें करती रही। उसकी भाषा वल्लि अम्माल की समझ में नहीं आयी । किसी व्यक्ति से पैसे पाकर उन्हें चूमकर उसने उनके लिए दरवाजा खोला । उस रास्ते से वह झटपट अंदर भागी । अपनी बेटी को उठाकर छाती से लगाया और अकेले ही जाकर एक बेंच पर बैठकर खूब रोयी ।
बड़े डॉक्टर एम० डी० के छात्रों की कक्षा समाप्त कर एक कप कॉफी पीकर वार्ड की ओर चल दिये । उन्होंने सुबह मेनिनजाइटिस का जो केस देखा था, वह उन्हें अच्छी तरह याद था । उन्होंने हाल ही में ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में उस रोग की कुछ नई दवाइयों के बारे में पढ़ा था ।
"मैंने आज सुबह मेनिनजाइटिस का एक केस एडमिट करने को कहा था । बारह साल की वह लड़की कहाँ है ?"
"डॉक्टर साहब, आज यहाँ कोई भी एडमिट नहीं हुआ ।"
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"क्या ? एडमिट नहीं हुआ ? मैंने उसे एडमिट करने का खास आदेश दिया था । धनशेखरन, क्या आपको याद है ?"
"याद है, डॉक्टर साहब !"
दिया ?" "पाल ! आप जाकर पता करके आइए । उस केस को इन लोगों ने कैसे मिस कर
पाल सीधे नीचे गये और उन्होंने आमने-सामने बैठे दोनों क्लर्कों से पूछताछ की ।
"क्या करें बाबूजी ! आप लोग 'एडमिट', 'एडमिट' लिखकर चिट पकड़ा देते हैं । यहाँ वार्ड में खड़े होने की भी जगह नहीं है ।"
"स्वामी ! बड़े डॉक्टर साहब पूछताछ कर रहे हैं।"
"वे लोग उनके परिचित हैं ?"
"हो सकता है। मैं क्या जानूँ ?"
"बारह साल की कोई लड़की मेरे पास नही आयी। हो सकता है उसके बदले कोई और आया हो । मैंने सभी लोगों से कल सुबह 7.30 बजे आने के लिए कह दिया है। रात को दो-तीन बेड खाली हो जायेंगे। इमरजेंसी हो तो पहले बता देना चाहिए। हाँ, इस बात का संकेत भी दे देना चाहिए कि बड़े डॉक्टर उस केस में इंट्रेस्टेड हैं। वे लोग उनके रिश्तेदार हैं ?"
वल्लि अम्माल की समझ में नहीं आया कि वह अगले दिन सुबह 7.30 बजे तक क्या करे । अस्पताल के वातावरण ने उसे अत्यंत भयभीत कर दिया था। वह नहीं जान सकी कि उसे अपनी बेटी के पास रहने देंगे अथवा नहीं । क्षणभर के लिए वह कुछ सोचती रही। फिर उसने बेटी को उठाकर अपनी छाती से लगा लिया । उसके सिर को अपने कंधे से टिकाकर और हाथ-पैरों को लटकता छोड़कर वह उसे लेकर अस्पताल से बाहर आयी। पीले रंग की एक साइकिल रिक्शा पर सवार हुई । रिक्शे वाले से बस अड्डा चलने के लिए कहा ।
"व्हाट नान्सेंस ! कल सुबह साढ़े सात बजे ? तब तक वह लड़की मर जाएगी ! डॉक्टर धनशेखरन, आप स्वयं ओ. पी. डी. में जाकर देखिए । वह वहीं होगी। इन दुष्टों के वार्ड में कोई बेड खाली नहीं है तो क्या, हमारे विभाग के वार्ड में एक बेड खाली है। उसे वह बेड दिलवा दीजिए । जल्दी कीजिए ।"
"डॉक्टर साहब ! उसे किसी के लिए रिजर्व करके रखा गया है ।"
"आइ डोंट केयर । आइ वांट दैट गर्ल एडमिटेड नाउ । राइट नाउ !"
बड़े डॉक्टर साहब आज तक इस तरह चिल्लाकर नहीं बोले थे । अतः डॉक्टर धनशेखर, पाल और 'हेड नर्स' मिरांडा सभी घबराकर वल्लि अम्माल को खोजने ओ. पी. डी. की ओर दौड़े ।
"इसे मामूली बुखार ही तो है। वापस मूनांडिप्पट्टि ले चलती हूँ। वहाँ के वैद जी को दिखा दूँगी । गाँव के अस्पताल नहीं ले जाऊँगी। वहाँ के डॉक्टर साहब ने ही तो मुझे डराकर
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