🏗️ अध्याय 3: नियोजित विकास की राजनीति (Politics of Planned Development)
यह NCERT कक्षा 12 राजनीति विज्ञान की द्वितीय पुस्तक 'स्वतंत्र भारत में राजनीति' के तीसरे अध्याय का एक संपूर्ण, सरल और परीक्षा-उपयोगी (CBSE, CUET, BSEB/बिहार बोर्ड, SCERT, BSTBPC) वन-शॉट डिजिटल नोट्स है।

📌 1. विकास की संकल्पना और वैचारिक टकराव
आज़ादी के समय भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि देश का आर्थिक और सामाजिक विकास किस मॉडल पर किया जाए? उस समय दुनिया में विकास के दो मुख्य मॉडल (विकल्प) मौजूद थे:
- 🇺🇸 उदारवादी-पूंजीवादी मॉडल (Capitalist Model): यह मॉडल संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप में लागू था, जहाँ मुख्य ध्यान निजी संपत्ति, मुक्त बाजार और उद्योगों पर निजी मालिकाना हक पर होता है।
- ☭ समाजवादी मॉडल (Socialist Model): यह मॉडल सोवियत संघ (USSR) में लागू था, जहाँ पूरी अर्थव्यवस्था, जमीन और उद्योगों पर सरकार का नियंत्रण होता है।
- 💡 भारत का मध्य मार्ग (मिश्रित अर्थव्यवस्था): भारत के नेताओं और योजनाकारों ने किसी एक अतिवादी मॉडल को चुनने के बजाय दोनों के तत्वों को मिलाकर 'मिश्रित अर्थव्यवस्था' (Mixed Economy) का रास्ता चुना। इसके तहत भारी उद्योग और सार्वजनिक कल्याण के कार्य सरकार (सार्वजनिक क्षेत्र) के अधीन रखे गए, और कृषि, व्यापार व उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन को निजी क्षेत्र के लिए खुला रखा गया।
📊 2. नियोजन और योजना आयोग (Planning Commission)
आर्थिक विकास के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम करना नियोजन कहलाता है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ही देश के बड़े उद्योगपतियों ने 1944 में एक साथ मिलकर देश में नियोजित अर्थव्यवस्था चलाने का एक संयुक्त प्रस्ताव तैयार किया था, जिसे 'बॉम्बे प्लान' (Bombay Plan) कहा जाता है।
- 🏢 योजना आयोग (Planning Commission): देश के संसाधनों का आकलन करने और विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाएँ बनाने के लिए मार्च 1950 में एक सरकारी प्रस्ताव के जरिए योजना आयोग का गठन किया गया।
- प्रकृति: यह एक गैर-संवैधानिक और सलाहकार संस्था थी।
- अध्यक्ष: भारत के प्रधानमंत्री इसके पदेन (Ex-officio) अध्यक्ष होते थे।
- 💡 नीति आयोग (NITI Aayog): 1 जनवरी 2015 को योजना आयोग को समाप्त करके उसके स्थान पर नीति आयोग (National Institution for Transforming India) का गठन किया गया है, जो 'सहकारी संघवाद' के सिद्धांत पर सरकार के थिंक-टैंक के रूप में कार्य करता है।
⏳ 3. प्रथम बनाम द्वितीय पंचवर्षीय योजना (The Core Debate)
भारत के शुरुआती विकास के दौर में पहली और दूसरी पंचवर्षीय योजनाओं के बीच प्राथमिकताओं को लेकर एक बड़ा वैचारिक द्वंद्व देखने को मिला:
① प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951 - 1956) 🌱
- मुख्य योजनाकार: युवा अर्थशास्त्री के. एन. राज।
- मूल मंत्र: इनका नारा था कि भारत को अपनी विकास की गति को धीमा रखना चाहिए, ताकि अर्थव्यवस्था को संतुलित रखा जा सके।
- मुख्य फोकस: इस योजना का मुख्य ध्यान कृषि क्षेत्र पर था। विभाजन के कारण देश में खाद्यान्न (अनाज) का भारी संकट था।
- प्रमुख कार्य: कृषि में सुधार के लिए बड़े बांधों का निर्माण और सिंचाई परियोजनाओं पर भारी निवेश किया गया (जैसे- प्रसिद्ध भाखड़ा-नांगल बांध परियोजना)। इसके अतिरिक्त भूमि सुधारों (जमींदारी उन्मूलन) पर बल दिया गया।
② द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956 - 1961) 🏭
- मुख्य योजनाकार: प्रसिद्ध सांख्यिकीविद पी. सी. महालनोबिस (इन्होंने ही भारतीय सांख्यिकी संस्थान - ISI की स्थापना की थी)।
- मूल मंत्र: इनका मानना था कि भारत को बिना समय गंवाए तीव्र गति से संरचनात्मक बदलाव करने चाहिए।
- मुख्य फोकस: इस योजना का मुख्य ध्यान भारी और बुनियादी उद्योगों के विकास पर था।
- प्रमुख कार्य: बिजली, रेलवे, इस्पात (Steel) और मशीनरी उद्योगों को सार्वजनिक क्षेत्र में तेजी से स्थापित किया गया। घरेलू उद्योगों को बचाने के लिए विदेशी वस्तुओं के आयात पर भारी शुल्क (संरक्षणवाद) लगाया गया।
- ⚠️ विवाद (कृषि बनाम उद्योग): आलोचकों (जैसे जे. सी. कुमारप्पा और चौधरी चरण सिंह) का मानना था कि भारी उद्योगों पर अत्यधिक ध्यान देने से कृषि क्षेत्र की उपेक्षा हुई, जिससे ग्रामीण भारत और गरीब किसान हाशिए पर चले गए।
⚠️ 4. भारत में खाद्य संकट और बिहार का अकाल (1960 का दशक)
1960 के दशक में भारत की अर्थव्यवस्था अत्यंत गंभीर दौर से गुजरी। 1962 में चीन के साथ युद्ध और 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के कारण रक्षा बजट बढ़ गया, और इसी दौरान देश में लगातार दो वर्ष भीषण सूखा पड़ा, जिससे खाद्यान्न का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया।
- 🏢 'जोनिंग' या इलाकाबांदी की नीति: खाद्य संकट के समय सरकार ने राज्यों के बीच अनाज के व्यापार पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिसे 'जोनिंग' कहा जाता था। इसके कारण अधिक अनाज वाले राज्य कमी वाले राज्यों को अनाज नहीं बेच पा रहे थे, जिससे संकट और गहरा गया।
- 💔 बिहार का अकाल: बिहार के कई जिलों में खाद्यान्न उत्पादन बहुत नीचे गिर गया। वहाँ भुखमरी और कुपोषण की स्थिति इतनी भयानक थी कि मृत्यु दर बहुत बढ़ गई थी। भारत को अनाज के लिए पूरी तरह अमेरिका की मदद (PL-480 योजना) पर निर्भर होना पड़ा, जिसने भारत की संप्रभुता को चुनौती दी।
🟢 5. हरित क्रांति (The Green Revolution)
खाद्यान्न संकट और बाहरी निर्भरता से मुक्ति पाने के लिए भारत सरकार ने अपनी कृषि नीति में आमूल-चूल बदलाव किए, जिसे हरित क्रांति कहा जाता है।
- नीति में बदलाव: पहले सरकार उन क्षेत्रों में निवेश करती थी जो पिछड़े थे। लेकिन अब सरकार ने उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया जहाँ पहले से सिंचाई की सुविधा थी और किसान समृद्ध थे, ताकि कम समय में अधिकतम खाद्यान्न का उत्पादन किया जा सके।
- प्रमुख घटक (Package Technology):
- HYV Seeds: उच्च उपज देने वाले प्रमाणित बीजों का प्रयोग (मुख्यतः मेक्सिकन गेहूँ के बीज)।
- रासायनिक उर्वरकों (Fertilizers) और कीटनाशकों का बड़े पैमाने पर उपयोग।
- नलकूपों और नहरों द्वारा सुनिश्चित सिंचाई व्यवस्था।
- किसानों को फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी देना।
- 🚀 सकारात्मक परिणाम:
- भारत अनाज (विशेषकर गेहूँ और चावल) के उत्पादन में पूरी तरह आत्मनिर्भर बन गया और देश में 'बफर स्टॉक' का निर्माण हुआ।
- कृषि का आधुनिकीकरण (ट्रैक्टरों और मशीनों का उपयोग) तेजी से बढ़ा।
- 📉 नकारात्मक परिणाम (क्षेत्रीय व सामाजिक असमानता):
- इसका लाभ पूरे देश को नहीं मिला। हरित क्रांति मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक ही सीमित रही, जिससे बाकी के राज्य पिछड़े रह गए।
- इसका फायदा केवल बड़े और समृद्ध किसानों को हुआ, जिससे अमीर और गरीब किसानों के बीच की सामाजिक खाई और चौड़ी हो गई।
🥛 6. श्वेत क्रांति (White Revolution / Operation Flood)
- प्रतिपादक: डॉ. वर्गीज कुरियन (इन्हें 'मिल्क मैन ऑफ इंडिया' कहा जाता है)।
- केंद्र: गुजरात का आनंद शहर, जहाँ सहकारी दुग्ध विपणन महासंघ की शुरुआत हुई, जिसे आज हम 'अमूल' (AMUL) ब्रांड के नाम से जानते हैं।
- ऑपरेशन फ्लड (1970): दुग्ध उत्पादन को बढ़ाने और ग्रामीण आय को सुदृढ़ करने के लिए 1970 में 'ऑपरेशन फ्लड' नामक एक राष्ट्रव्यापी डेयरी विकास कार्यक्रम शुरू किया गया। इसके तहत दुग्ध उत्पादकों को एक राष्ट्रव्यापी ग्रेड से जोड़ा गया ताकि बिचौलियों के शोषण को समाप्त कर उपभोक्ताओं तक सीधे दूध पहुँचाया जा सके।
🎯 विश्लेषण: शुरुआती विकास के मुख्य परिणाम
- बुनियादी ढांचे का निर्माण: शुरुआती पंचवर्षीय योजनाओं ने भारत के भविष्य के विकास के लिए एक मजबूत नींव रखी। इसके तहत भाखड़ा-नांगल, हीराकुंड जैसे विशाल बांध, भिलाई, बोकारो जैसे भारी इस्पात संयंत्र, रक्षा अनुसंधान और आईआईटी (IITs) जैसे बड़े संस्थान स्थापित हुए।
- भूमि सुधार: जमींदारी प्रथा को कानूनन समाप्त कर दिया गया, जिससे जमीन पर वास्तविक खेती करने वालों को अधिकार मिले। हालांकि, जमीन की अधिकतम सीमा तय करने वाले 'हदबंदी कानून' (Land Ceiling Act) को बड़े जमींदारों ने अदालती कमियों का फायदा उठाकर प्रभावी ढंग से लागू नहीं होने दिया।
🎯 क्विक टेस्ट: खुद को परखें! (Self-Assessment)
चलिए देखते हैं इस डिजिटल नोट से आपने कितना सीखा! नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर अपने मन में सोचें:
- स्वतंत्रता से पूर्व वर्ष 1944 में देश के बड़े उद्योगपतियों द्वारा नियोजित अर्थव्यवस्था के लिए तैयार किए गए संयुक्त प्रस्ताव को क्या कहा जाता है?
- प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-56) के मुख्य योजनाकार कौन थे, जिन्होंने कृषि क्षेत्र पर विशेष बल दिया था?
- 'भारतीय सांख्यिकी संस्थान' (ISI) के संस्थापक और द्वितीय पंचवर्षीय योजना के मुख्य सूत्रधार कौन थे?
- भारत में दुग्ध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए 'ऑपरेशन फ्लड' (श्वेत क्रांति) की शुरुआत करने वाले प्रणेता कौन थे?
👀 सही उत्तर देखने के लिए यहाँ क्लिक करें:
- बॉम्बे प्लान (Bombay Plan)
- के. एन. राज
- पी. सी. महालनोबिस
- डॉ. वर्गीज कुरियन (Milk Man of India)
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