📢 अध्याय: जन-आंदोलनों का उदय (Rise of Popular Movements)
यह NCERT कक्षा 12 राजनीति विज्ञान की द्वितीय पुस्तक 'स्वतंत्र भारत में राजनीति' के एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय का संपूर्ण, सरल और परीक्षा-उपयोगी (CBSE, CUET, BSEB/बिहार बोर्ड, SCERT, BSTBPC, UPSC) वन-शॉट डिजिटल नोट्स है।
⚠️ महत्वपूर्ण सूचना (Latest Syllabus Update): NCERT और CBSE के नवीनतम युक्तिसंगत (Rationalised) पाठ्यक्रम में इस अध्याय की विषय-सामग्री को पुनर्गठित किया गया है। लेकिन CUET, बिहार बोर्ड (BSEB) और अन्य राज्य स्तरीय बोर्ड परीक्षाओं के लिए यह अध्याय आज भी मुख्य पाठ्यक्रम का एक अनिवार्य हिस्सा है।

📌 1. जन-आंदोलन क्या हैं और इनके प्रकार?
- मूल संकल्पना: जब समाज के विभिन्न वर्ग (जैसे- किसान, महिलाएँ, आदिवासी, दलित और पर्यावरणविद्) अपनी समस्याओं के समाधान के लिए दलीय राजनीति (चुनावों) से बाहर निकलकर सामूहिक रूप से सड़कों पर उतरते हैं, तो उसे जन-आंदोलन कहा जाता है। इन्हें 'गैर-दलीय राजनीतिक आंदोलन' भी कहते हैं।
- वर्गीकरण: जन-आंदोलन मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं:
- दलीय आंदोलन: जो किसी राजनीतिक दल के नेतृत्व या विचारधारा के तहत चलते हैं (जैसे- कम्युनिस्टों के नेतृत्व में मजदूर आंदोलन)।
- गैर-दलीय आंदोलन: जो किसी पार्टी से नहीं जुड़े होते, बल्कि समाज के जागरूक नागरिकों या स्वयंसेवी संगठनों (NGOs) द्वारा स्थानीय मुद्दों पर चलाए जाते हैं।
🌲 2. चिपको आंदोलन (Chipko Movement) - पर्यावरण संरक्षण 🌱
यह स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे प्रसिद्ध और सफल पर्यावरण आंदोलन माना जाता है।
- शुरुआत: इसकी शुरुआत 1973 में उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश का हिस्सा था) के दो-तीन गाँवों से हुई थी।
- कारण: वन विभाग ने स्थानीय ग्रामीणों को खेती के औजार बनाने के लिए अंगू के पेड़ काटने की अनुमति देने से इनकार कर दिया, लेकिन खेल-सामग्री बनाने वाली एक बड़ी प्राइवेट कंपनी को व्यावसायिक उपयोग के लिए उसी जंगल की कटाई का ठेका दे दिया। इससे ग्रामीणों में भारी आक्रोश फैल गया।
- विरोध की अनूठी विधि: जब ठेकेदार के कुल्हाड़ीबाज पेड़ काटने आए, तो गाँव की महिलाएँ, पुरुष और बच्चे पेड़ों से चिपक गए (गले लगा लिया) ताकि उन्हें कटने से बचाया जा सके।
- 🥇 प्रमुख नेतृत्वकर्ता: सुंदरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट और गौरा देवी।
- 🚀 सकारात्मक परिणाम: जन-आंदोलन के आगे सरकार को झुकना पड़ा। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने हिमालयी क्षेत्रों में वनों की कटाई पर 15 वर्षों के लिए पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया, ताकि उस क्षेत्र का पारिस्थितिकी संतुलन बहाल हो सके।
- 💡 महत्व: इस आंदोलन ने सिद्ध किया कि महिलाएँ पर्यावरण संरक्षण की अग्रदूत हैं। इसके बाद देश में टिकाऊ विकास (Sustainable Development) की मांग उठी।
🦏 3. दलित पैंथर्स (Dalit Panthers) - सामाजिक न्याय ✊
यह जातिवाद और सामाजिक छुआछूत के खिलाफ लड़ा गया एक उग्र और वैचारिक आंदोलन था।
- शुरुआत: इसकी स्थापना 1972 में महाराष्ट्र के दलित युवाओं (विशेषकर झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले पढ़े-लिखे युवाओं) द्वारा की गई थी। इसके मुख्य प्रणेताओं में नामदेव ढसाल और अर्जुन डांगले शामिल थे।
- पृष्ठभूमि: आज़ादी और संविधान बनने के बावजूद समाज में दलितों के खिलाफ जातिगत हिंसा, छुआछूत और महिलाओं पर अत्याचार जारी थे। कानून केवल कागजों पर सिमट कर रह गया था।
- कार्यवाही: 'दलित पैंथर्स' ने डॉ. बी.आर. आंबेडकर की विचारधारा को अपनाया और अन्याय के खिलाफ सीधे और उग्र प्रतिरोध का रास्ता चुना। उन्होंने मराठी साहित्य में 'दलित साहित्य' की एक नई लहर पैदा की, जिसने अपनी कविताओं और कहानियों के जरिए सामाजिक कड़वाहट को उजागर किया।
- 🚀 परिणाम: इस आंदोलन के तीव्र दबाव के कारण भारत सरकार को आगे चलकर 'अत्याचार निवारण अधिनियम' (SC/ST Prevention of Atrocities Act - 1989) जैसा बेहद सख्त कानून बनाना पड़ा। बाद में यह संगठन बिखर गया और बामसेफ (BAMCEF) जैसी राजनीतिक ताकतों का उदय हुआ।
🚜 4. भारतीय किसान यूनियन (BKU) - किसानों की ताकत 🌾
यह देश के पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के समृद्ध और यंत्रीकृत किसानों का एक बड़ा आंदोलन था।
- शुरुआत: 1988 के जनवरी महीने में उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में लगभग 20,000 किसान इकट्ठा हुए और उन्होंने जिला कलेक्टर कार्यालय का घेराव किया।
- 🥇 मुख्य नेता: चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत।
- प्रमुख मांगें:
- गन्ने और गेहूँ की सरकारी खरीद मूल्य (MSP) में वृद्धि की जाए।
- कृषि के लिए बिजली की दरों को कम किया जाए और बिजली आपूर्ति नियमित हो।
- किसानों के खेती से जुड़े सरकारी कर्जों को माफ किया जाए।
- विशेषता: बीकेयू ने अपनी मांगें मनवाने के लिए रैलियों, जेल भरो आंदोलनों और महापंचायतों का सहारा लिया। यह आंदोलन पूरी तरह गैर-राजनीतिक था और इसमें पश्चिमी यूपी के विशिष्ट 'जातिगत समाज' (खाप पंचायत व्यवस्था) का मजबूत ताना-बाना काम कर रहा था।
- 🚀 परिणाम: यह भारत के इतिहास का सबसे सफल किसान दबाव-समूह (Pressure Group) साबित हुआ, जिसने सरकारों को अपनी मांगें मानने पर विवश किया।
🚫 5. ताड़ी-विरोधी आंदोलन (Anti-Arrack Movement) - महिलाओं की जंग 🙅♀️
यह आंध्र प्रदेश की ग्रामीण महिलाओं द्वारा शराब माफिया और घरेलू हिंसा के खिलाफ चलाया गया एक स्वतःस्फूर्त (Spontaneous) जन-आंदोलन था।
- शुरुआत: 1992 में आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले के एक छोटे से गाँव 'दूबागुंटा' से हुई।
- पृष्ठभूमि: गाँव की महिलाएँ प्रौढ़ साक्षरता कार्यक्रम (Adult Literacy Drive) में भाग लेने जाती थीं। वहाँ उन्होंने चर्चा की कि उनके पति 'ताड़ी' (सस्ती देसी शराब) के व्यसन में डूबे रहते हैं, जिससे वे अपनी पूरी मजदूरी शराब में उड़ा देते हैं। इससे परिवारों पर कर्ज का बोझ बढ़ रहा था और घरों में महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा (मारपीट) आम बात हो गई थी।
- विरोध: महिलाओं ने एकजुट होकर गाँव की ताड़ी की दुकानों का घेराव किया और शराब की गाड़ियों को रोकने के लिए धरने दिए। यह आंदोलन देखते ही देखते पूरे आंध्र प्रदेश के गाँवों में फैल गया।
- 🗣️ मुख्य नारा: "ताड़ी की बिक्री बंद करो"।
- 🚀 व्यापक परिणाम: महिलाओं के भारी दबाव के कारण सरकार को राज्य में शराबबंदी लागू करनी पड़ी। इस आंदोलन ने आगे चलकर महिलाओं को घरेलू हिंसा, दहेज प्रथा और लैंगिक असमानता के खिलाफ जागरूक किया, जिससे राजनीति में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण (73वें व 74वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायतों में) की नींव मजबूत हुई।
🌊 6. नर्मदा बचाओ आंदोलन (Narmada Bachao Andolan - NBA) - विकास बनाम विस्थापन
यह देश की विशाल विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापित होने वाले स्थानीय आदिवासियों के अधिकारों का आंदोलन है।
- पृष्ठभूमि: मध्य भारत से गुजरने वाली नर्मदा नदी और उसकी सहायक नदियों पर 'नर्मदा घाटी परियोजना' के तहत 30 बड़े, 135 मंझोले और लगभग 3000 छोटे बांध बनाने की योजना थी, जिसमें गुजरात का 'सरदार सरोवर बांध' और मध्य प्रदेश का 'नर्मदा सागर बांध' सबसे मुख्य थे।
- विवाद की जड़ (चुनौती): इस विशाल परियोजना से सिंचाई और बिजली का भारी लाभ तो मिलने वाला था, लेकिन इसके कारण मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र के लगभग 245 गाँवों के जलमग्न होने और 2.5 लाख से अधिक स्थानीय आदिवासियों व गरीब किसानों के विस्थापित होने का भयानक खतरा था।
- 🥇 मुख्य नेता: मेधा पाटकर (इन्होंने बाबा आम्टे के साथ मिलकर इस आंदोलन का नेतृत्व किया)।
- प्रमुख मांगें:
- सरकार को विकास के नाम पर आदिवासियों को उनकी जल, जंगल और जमीन से बेदखल करने का कोई अधिकार नहीं है।
- यदि बांध बनाना अनिवार्य है, तो विस्थापित होने वाले प्रत्येक व्यक्ति का पहले वैज्ञानिक तरीके से उचित पुनर्वास (Rehabilitation) किया जाना चाहिए।
- 💡 महत्व: यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा। कोर्ट ने बांध के निर्माण की अनुमति तो दे दी, लेकिन सरकार को आदेश दिया कि वह विस्थापितों के पुनर्वास के कार्य को कड़ाई से और प्राथमिकता के आधार पर पूरा करे। इस आंदोलन ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के विकास मॉडल पर सवाल खड़े किए।
🎯 7. सूचना का अधिकार आंदोलन (RTI Movement - 2005) 📑
यह भारतीय लोकतंत्र को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने वाला सबसे महत्वपूर्ण जन-आंदोलन माना जाता है।
- शुरुआत: इसकी शुरुआत 1990 में राजस्थान के एक अति पिछड़े क्षेत्र (भीम तहसील) से हुई।
- 🥇 नेतृत्वकर्ता संगठन: मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS), जिसकी मुख्य सूत्रधार अरुणा रॉय थीं।
- कारण: ग्रामीणों को अकाल राहत कार्यों के तहत मजदूरी दी जाती थी, लेकिन उन्हें बहुत कम भुगतान मिलता था। जब मजदूरों ने अपने काम के मास्टर रोल और मस्टर-रोल (हाजिरी रजिस्टर) की कॉपियां मांगी, तो प्रशासन ने गोपनीयता का हवाला देकर मना कर दिया।
- मांग: ग्रामीणों ने नारा दिया— "हमारा पैसा, हमारा हिसाब" और "जानने का हक"।
- 🚀 ऐतिहासिक परिणाम: यह आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर पहुँचा और राष्ट्रीय जन-सूचना अधिकार अभियान (NCPRI) बना। इसके तीव्र दबाव के कारण संसद ने वर्ष 2005 में ऐतिहासिक 'सूचना का अधिकार अधिनियम' (Right to Information Act - RTI) पारित किया, जिसने आम नागरिक को सरकारी रिकॉर्ड और फाइलों को देखने का कानूनी अधिकार दे दिया।
🎯 क्विक टेस्ट: खुद को परखें! (Self-Assessment)
चलिए देखते हैं इस डिजिटल नोट से आपने कितना सीखा! नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर अपने मन में सोचें:
- उत्तराखंड में वर्ष 1973 में वनों की अंधाधुंध कटाई को रोकने के लिए चलाए गए 'चिपको आंदोलन' के सबसे प्रमुख नेता कौन थे?
- जातिगत भेदभाव और सामाजिक अत्याचारों के खिलाफ वर्ष 1972 में महाराष्ट्र में गठित युवा संगठन का नाम क्या था?
- आंध्र प्रदेश की ग्रामीण महिलाओं द्वारा देसी शराब की बिक्री और घरेलू हिंसा के खिलाफ चलाए गए स्वतःस्फूर्त आंदोलन को क्या कहा जाता है?
- राजस्थान के 'मजदूर किसान शक्ति संगठन' (MKSS) के अथक प्रयासों के कारण संसद द्वारा 'सूचना का अधिकार' (RTI) कानून किस वर्ष पारित किया गया?
👀 सही उत्तर देखने के लिए यहाँ क्लिक करें:
- सुंदरलाल बहुगुणा (साथ में चंडी प्रसाद भट्ट और गौरा देवी)
- दलित पैंथर्स (Dalit Panthers)
- ताड़ी-विरोधी आंदोलन (Anti-Arrack Movement - 1992)
- वर्ष 2005 में
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