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Class 11 Biology Chapter 2 Notes Hindi NCERT

अध्याय 2: जीव जगत का वर्गीकरण (Biological Classification)

यह अध्याय संपूर्ण जीव विज्ञान का सबसे आधारभूत और महत्वपूर्ण अध्याय है। हमारे चारों ओर पाए जाने वाले लाखों जीवों को व्यवस्थित रूप से समझने के लिए वैज्ञानिकों ने कई वर्गीकरण प्रणालियाँ दीं। आर. एच. व्हिटेकर (R.H. Whittaker) द्वारा दिया गया पाँच जगत वर्गीकरण (Five Kingdom Classification) इस अध्याय का मुख्य केंद्र है। यह NEET, CUET और सभी State Boards (BSEB, CBSE) की परीक्षाओं के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण और हाई-वेटेज अध्याय है।


🗂️ 1. वर्गीकरण प्रणालियों का इतिहास (History of Classification)

  • अरस्तू (Aristotle): इन्होंने सबसे पहले वैज्ञानिक आधार पर जीवों का वर्गीकरण किया। इन्होंने पौधों को आकारिकी के आधार पर शाक (Herbs), झाड़ी (Shrubs) और वृक्ष (Trees) में बाँटा, तथा जंतुओं को लाल रक्त की उपस्थिति के आधार पर दो समूहों—इनेइमा (Enaima - लाल रक्त वाले) और अनेइमा (Anaima - बिना लाल रक्त वाले) में विभाजित किया.
  • द्विजगत वर्गीकरण पद्धति (Two Kingdom System): कैरोलस लिनियस ने सभी जीवों को दो जगतों—प्लांटी (Plantae - पादप) और एनिमेलिया (Animalia - जंतु) में बाँटा।
    • 🚨 कमियाँ: यह पद्धति प्रोकेरियोट्स व यूकेरियोट्स, एककोशिकीय व बहुकोशिकीय, तथा प्रकाशसंश्लेषी (शैवाल) व अप्रकाशसंश्लेषी (कवक) के बीच अंतर स्पष्ट नहीं कर सकी।
  • पाँच जगत वर्गीकरण पद्धति (Five Kingdom System — 1969) — ⭐ सर्वमान्य
    • अमेरिकन वैज्ञानिक आर. एच. व्हिटेकर (R.H. Whittaker) ने सभी जीवों को पाँच जगतों में वर्गीकृत किया: मोनेरा, प्रोटिस्टा, फंजाई (कवक), प्लांटी और एनिमेलिया.
    • वर्गीकरण के 5 मुख्य मापदंड (Criteria): कोशिका संरचना (प्रोकेरियोटिक/यूकेरियोटिक), शारीरिक संगठन (एककोशिकीय/बहुकोशिकीय), पोषण की विधि (स्वपोषी/परपोषी), प्रजनन की विधि, और जातिवृत्तीय संबंध (Phylogenetic relationships - विकासीय संबंध).

🧫 2. जगत मोनेरा (Kingdom Monera) — प्रोकेरियोटिक जगत

  • मुख्य जीव: जीवाणु (Bacteria) मोनेरा जगत के एकमात्र और मुख्य सदस्य हैं। ये सर्वव्यापी (Everywhere) हैं और कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी रह सकते हैं।
  • आकार के आधार पर बैक्टीरिया के 4 प्रकार:
    1. कोकस (Coccus): गोलाकार।
    2. बैसिलस (Bacillus): छड़ाकार (Rod-shaped)।
    3. विब्रियो (Vibrio): कोमा के आकार का ( , )।
    4. स्पाइरिलम (Spirillum): सर्पिलाकार।
  • संरचना बनाम व्यवहार: संरचना में बैक्टीरिया अत्यंत सरल दिखाई देते हैं, परंतु इनका व्यवहार और उपापचयी विविधता (Metabolic diversity) पूरे जीव जगत में सबसे अधिक विस्तृत होती है।

🌋 A. आर्कीबैक्टीरिया (Archaebacteria - आद्य जीवाणु)

ये पृथ्वी के सबसे प्राचीन और कठिन वातावरण में रहने वाले बैक्टीरिया हैं। इनकी कोशिका भित्ति (Cell wall) की संरचना विशिष्ट होती है, जो इन्हें प्रतिकूल परिस्थितियों में जीवित रखती है।

  • हैलोफी (Halophiles): अत्यंत लवणीय (Salt) क्षेत्रों में पाए जाने वाले।
  • थर्मोएसिडोफिल्स (Thermoacidophiles): गर्म झरनों (Hot springs) में रहने वाले।
  • मेथेनोजन (Methanogens): दलदली क्षेत्रों तथा गाय-भैंस के रुमेन (Rumen/आमाशय) में पाए जाने वाले बैक्टीरिया, जो मीथेन गैस पैदा करते हैं।

🦠 B. यूबैक्टीरिया (Eubacteria - वास्तविक जीवाणु)

इन्हें 'सत्य जीवाणु' कहा जाता है। इनके पास एक दृढ़ कोशिका भित्ति और (यदि गतिशील हैं तो) एक कशाभिका (Flagellum) होती है।

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  • सायनोबैक्टीरिया (Cyanobacteria / नील-हरित शैवाल): ये प्रकाश-संश्लेषी स्वपोषी (Photosynthetic autotrophs) होते हैं। इनमें पौधों की तरह क्लोरोफिल-ए (Chlorophyll-a) पाया जाता है। ये एककोशिकीय, कॉलोनीमय या तंतुमय होते हैं।
    • 🚨 हेटेरोसिस्ट (Heterocyst): एनाबीना (Anabaena) और नोस्टॉक (Nostoc) नामक सायनोबैक्टीरिया में वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर (Fix) करने के लिए एक विशेष मोटी भित्ति वाली कोशिका पाई जाती है, जिसे हेटेरोसिस्ट कहते हैं।
  • रसायन-संश्लेषी स्वपोषी (Chemosynthetic Autotrophs): ये अकार्बनिक पदार्थों (जैसे नाइट्रेट, अमोनिया) को ऑक्सीकृत करके ऊर्जा प्राप्त करते हैं और नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, सल्फर चक्रों में मदद करते हैं।
  • परपोषी जीवाणु (Heterotrophic Bacteria): ये प्रकृति में सबसे प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इनमें से अधिकांश अपघटक (Decomposers) होते हैं। (जैसे: दूध से दही बनाना, प्रतिजैविक एंटीबायोटिक्स बनाना, और रोग उत्पन्न करना जैसे टायफाइड, हैजा, सिट्रस कैंकर)।
  • 🚨 माइकोप्लाज्मा (Mycoplasma) — NEET का पेटेंट प्रश्न:
    • ये ऐसे जीव हैं जिनमें कोशिका भित्ति (Cell Wall) पूर्णतः अनुपस्थित होती है।
    • यह पृथ्वी पर पाई जाने वाली सबसे छोटी जीवित कोशिका (Smallest living cell) है।
    • यह ऑक्सीजन के बिना भी जीवित रह सकती है तथा पौधों व जंतुओं में गंभीर रोग पैदा करती है।

🔬 3. जगत प्रोटिस्टा (Kingdom Protista) — एककोशिकीय यूकेरियोट्स

  • मुख्य विशेषता: इस जगत में सभी एककोशिकीय यूकेरियोटिक (Single-celled Eukaryotic) जीवों को रखा गया है। इसकी सीमाएँ स्पष्ट नहीं हैं (यह प्लांटी, फंजाई और एनिमेलिया के बीच एक वैचारिक कड़ी है)। यह मुख्य रूप से जलीय होते हैं।

इसके मुख्य 5 समूह निम्नलिखित हैं:

① क्राइसोफाइट (Chrysophytes)

  • इसके अंतर्गत डायटम (Diatoms) और सुनहरे शैवाल (Desmids) आते हैं। ये स्वच्छ और लवणीय जल दोनों में तैरते हैं।
  • 🚨 डायटमी मृदा (Diatomaceous Earth): डायटम की कोशिका भित्ति में सिलिका (Silica) समाया होता है, जिसके कारण इनकी दीवारें कभी नष्ट नहीं होतीं। जब ये मरते हैं, तो समुद्र की तली में करोड़ों वर्षों में इनकी दीवारों का एक विशाल ढेर जमा हो जाता है, जिसे डायटमी मृदा कहते हैं। यह मिट्टी कणिकामय होती है, इसलिए इसका उपयोग पालिश करने, तेलों और सिरप के निस्यंदन (Filtration) में किया जाता है। इन्हें "समुद्र के मुख्य उत्पादक" (Chief producers in the oceans) कहा जाता है।

② डाइनोफ्लैजेलेट (Dinoflagellates)

  • ये मुख्य रूप से समुद्री और प्रकाश-संश्लेषी होते हैं। इनकी कोशिका भित्ति पर सेल्युलोज की कड़ी पट्टिकाएं होती हैं। इनके पास दो कशाभिका (Flagella) होती हैं (एक अनुदैर्ध्य और दूसरी अनुप्रस्थ)।
  • 🚨 लाल तरंगें (Red Tide): गोन्याउलैक्स (Gonyaulax) नामक लाल डाइनोफ्लैजेलेट समुद्र में इतनी तीव्र गति से बहुगुणन करता है कि पूरा समुद्र लाल दिखाई देने लगता है, जिसे 'लाल तरंगें' कहते हैं। इनसे निकलने वाला विष (Toxin) मछलियों को मार देता है।

③ यूग्लीनॉइड (Euglenoids)

  • ये स्वच्छ और स्थिर जल (Stagnant water) में पाए जाते हैं। इनमें कोशिका भित्ति नहीं होती, बल्कि प्रोटीन से भरपूर एक लचीली परत होती है जिसे पेलिकल (Pellicle) कहते हैं।
  • 🚨 मिश्रपोषी पोषण (Mixotrophic): सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में ये स्वपोषी (प्रकाश-संश्लेषण) की तरह व्यवहार करते हैं, परंतु प्रकाश न होने पर ये अन्य छोटे जीवों का शिकार करके परपोषी बन जाते हैं। उदाहरण: यूग्लीना (Euglena)। इनमें पाए जाने वाले वर्णक उच्च पौधों के समान होते हैं।

④ अपंक कवक (Slime Moulds)

  • ये मृतजीवी (Saprophytic) प्रोटिस्ट हैं, जो सड़ती हुई टहनियों और पत्तियों के कार्बनिक पदार्थों को खाते हैं।
  • अनुकूल परिस्थितियों में ये एक समूह बनाते हैं जिसे प्लाज्मोडियम (Plasmodium) कहते हैं, जो कई फीट तक फैल सकता है। विपरीत परिस्थितियों में ये बीजाणु (Spores) बनाते हैं, जिनकी दीवारों पर सेल्युलोज होता है और ये हवा द्वारा बिखरते हैं।

⑤ प्रोटोजोआ (Protozoans)

  • ये सभी परपोषी होते हैं जो परभक्षी या परजीवी के रूप में रहते हैं। इन्हें जंतुओं का आदिम पूर्वज माना जाता है। इनके 4 प्रकार हैं:
    • अमीबीय: कूटपाद (Pseudopodia) द्वारा गति व शिकार (जैसे: Ameoba, परजीवी Entamoeba)।
    • कशाभी (Flagellated): कशाभिका पाई जाती है। उदाहरण: ट्रिपैनोसोमा (Trypanosoma), जो मानव में 'निद्रालु व्याधि' (Sleeping Sickness) नामक गंभीर बीमारी पैदा करता है।
    • पक्ष्माभी (Ciliated): हजारों पक्ष्माभ (Cilia) पाए जाते हैं (जैसे: Paramecium)।
    • स्पोरोजोआ (Sporozoans): इनके जीवन चक्र में संक्रामक बीजाणु जैसी अवस्था होती है। उदाहरण: प्लाज्मोडियम (Plasmodium), जो मानव में मलेरिया रोग पैदा करता है।

🍄 4. जगत फंजाई / कवक (Kingdom Fungi) — परपोषी जगत

  • मुख्य विशेषता: यह विशिष्ट परपोषी (Heterotrophic) जीवों का जगत है। ये आकारिकी और वासस्थान में अत्यधिक विविधता दर्शाते हैं। (जैसे: ब्रेड पर उगने वाली फफूंदी, कुकुरमुत्ता/Mushroom, और सरसों की पत्तियों पर सफेद धब्बे पैदा करने वाले अलबूगो परजीवी कवक)।
  • अपवाद: यीस्ट (Yeast) एकमात्र ऐसा कवक है जो एककोशिकीय (Single-celled) होता है, जिसका उपयोग ब्रेड और बियर बनाने में होता है। बाकी सभी कवक बहुकोशिकीय और तंतुमय होते हैं।
  • कवकजाल (Mycelium): कवक का शरीर लंबे, पतले धागे जैसी संरचनाओं से बना होता है जिन्हें कवकतंतु (Hyphae) कहते हैं। कवकतंतुओं के जाल को कवकजाल कहते हैं।
  • कोशिका भित्ति: कवकों की कोशिका भित्ति काइटिन (Chitin) और पॉलीसेकेराइड की बनी होती है (🚨 रासायनिक रूप से अति महत्वपूर्ण)
  • सहजीवन (Symbiosis): कवक शैवाल के साथ मिलकर लाइकेन (Lichen) और उच्च पौधों की जड़ों के साथ मिलकर माइकोराइजा (Mycorrhiza) बनाते हैं।

📊 कवक का वर्गीकरण (4 मुख्य वर्ग):

कवकजाल की आकारिकी, बीजाणु निर्माण की विधि और फलनकाय (Fruiting bodies) के आधार पर फंजाई को चार वर्गों में बाँटा गया है:

  1. फाइकोमाइसिटीज (Phycomycetes): ये जलीय आवासों और नम व सड़ी-गली लकड़ियों पर पाए जाते हैं। इनका कवकजाल अमटीय और बहुकेंद्रकी (Aseptate & Coenocytic) होता है। अलैंगिक जनन चलबीजाणु (Zoospore) या अचलबीजाणु द्वारा होता है।
    • उदाहरण: म्यूकर (Mucor), राइजोपस (Rhizopus - ब्रेड मोल्ड), और अलबूगो (Albugo - सरसों का परजीवी)
  2. एस्कोमाइसिटीज (Ascomycetes): इन्हें "थैली कवक" (Sac-fungi) भी कहते हैं। ये अधिकांशतः बहुकोशिकीय (जैसे: Penicillium) या एककोशिकीय (जैसे: यीस्ट) होते हैं। इनका कवकजाल पटयुक्त और शाखित (Septate & Branched) होता है। अलैंगिक बीजाणु कोनीडिया (Conidia) होते हैं। लैंगिक बीजाणु एस्कोबीजाणु (Ascospores) होते हैं जो थैली जैसे एस्कस में बनते हैं।
    • उदाहरण: Aspergillus, Claviceps, और न्यूरोस्पोरा (Neurospora — इसे पादप जगत का ड्रोसोफिला कहते हैं, इसका उपयोग जैव-रासायनिक अनुसंधानों में प्रचुरता से होता है)। मोरिल और ट्रफल खाने योग्य कवक हैं।
  3. बेसिडियोमाइसिटीज (Basidiomycetes): इन्हें "क्लब फंजाई" या ब्रैकेट फंजाई और पफबॉल भी कहते हैं। ये मिट्टी, लट्ठों और पेड़ों के ठूंठों पर उगते हैं। इनमें अलैंगिक बीजाणु सामान्यतः नहीं बनते, कायिक जनन खंडन द्वारा होता है। लैंगिक अंग अनुपस्थित होते हैं, परंतु प्लाज्मोगेमी द्वारा बेसिडियम बनता है, जिसमें बेसिडियोबीजाणु (Basidiospores) बहिर्जात (Exogenously) उत्पन्न होते हैं।
    • उदाहरण: अगरिकस (Agaricus - मशरूम), अस्टीलागो (Ustilago - कंड/Smut), और पकसीनिया (Puccinia - किट्ट कवक / Rust kavax)
  4. ड्यूटेरोमाइसिटीज (Deuteromycetes) — ⭐ Very Important: इन्हें "अपूर्ण कवक" (Fungi Imperfecti) कहा जाता है, क्योंकि इनकी केवल अलैंगिक या कायिक प्रावस्था ही खोजी जा सकी है, लैंगिक प्रावस्था अनुपस्थित या अज्ञात है (यदि लैंगिक अवस्था खोजी जाती है, तो इन्हें एस्को या बेसिडियो में भेज दिया जाता है)। इनका कवकजाल भी पटयुक्त और शाखित होता है। ये मुख्य रूप से कचरे के अपघटक (Decomposers) होते हैं और खनिज चक्रण में मदद करते हैं।
    • उदाहरण: अल्टरनेरिया (Alternaria), कोलीटोट्राइकम (Colletotrichum), और ट्राइकोडर्मा (Trichoderma)

🌱 🍄 5. वायरस, वाइरॉइड, प्रियोन और लाइकेन (Acellular Organisms)

आर. एच. व्हिटेकर के पाँच जगत वर्गीकरण में कुछ अकोशिकीय (Acellular) जीवों को कोई स्थान नहीं मिला, क्योंकि इन्हें वास्तविक 'सजीव' नहीं माना जाता। [5]

① वायरस / विषाणु (Virus)

  • वायरस का अर्थ है "विषैला तरल" (Venom / Poisonous fluid)। यह नाम इवानोवस्की (1892) ने दिया था जब उन्होंने तंबाकू में मोजेक रोग पैदा करने वाले जीव की खोज की। [6, 7]
  • एम. डब्ल्यू. बेइजेरिनेक (1898): इन्होंने संक्रमित पौधे के रस को स्वस्थ पौधे पर छिड़का और देखा कि स्वस्थ पौधा भी बीमार हो गया। इन्होंने इस संक्रामक जीवित तरल को "Contagium vivum fluidum" (संक्रामक जीवित तरल) कहा (🚨 परीक्षा में सीधे पूछा जाता है)। [8, 9, 10, 11]
  • डब्लू. एम. स्टैन्ले (1935): इन्होंने दिखाया कि वायरस को क्रिस्टल (रवेदार) रूप में बदला जा सकता है, जो मुख्य रूप से प्रोटीन के बने होते हैं। [12]
  • संरचना: वायरस एक न्यूक्लियोप्रोटीन है। इसके पास दो मुख्य भाग होते हैं:
    1. आनुवंशिक पदार्थ: यह या तो DNA हो सकता है या RNA (दोनों एक साथ कभी नहीं हो सकते)। पादप वायरस में सामान्यतः एक-रज्जुकीय RNA () होता है, और जंतु वायरस में एकल या द्विरज्जुकीय RNA या द्विरज्जुकीय DNA होता है। बैक्टीरिया को संक्रमित करने वाले वायरस (बैक्टीरियोफेज) में द्विरज्जुकीय DNA () होता है।
    2. कैप्सिड (Capsid): प्रोटीन का बाहरी सुरक्षात्मक आवरण, जो छोटी इकाइयों कैप्सोमीयर (Capsomeres) से मिलकर बना होता है। [13, 14, 15, 16, 17]
  • प्रकृति: ये कोशिका के बाहर अक्रिय (Inert) होते हैं, परंतु परपोषी कोशिका के भीतर प्रवेश करते ही उसकी मशीनरी पर कब्जा कर जीवित हो जाते हैं। (रोग: चेचक, इन्फ्लूएंजा, एड्स, मम्प्स, और पौधों में मोजेक बनना, पत्तियों का मुड़ना)। [18]

② वाइरॉइड (Viroid) — टी. ओ. डाइनर (T.O. Diener - 1971)

  • इन्होंने पोटैटो स्पिंडल ट्यूबर (आलू का एक रोग) पैदा करने वाले एक नए संक्रामक कारक की खोज की जो वायरस से भी छोटा था।
  • विशेषता: इसमें वायरस की तरह प्रोटीन आवरण (Capsid) पूर्णतः अनुपस्थित होता है (इसीलिए इसे वाइरॉइड यानी 'बिना आवरण का' कहते हैं)।
  • इसके पास केवल मुक्त कम आणविक भार वाला RNA (Low molecular weight RNA) होता है। [19]

③ प्रियोन (Prions)

  • ये आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में खोजे गए संक्रामक कारक हैं, जो केवल असामान्य रूप से मुड़े हुए प्रोटीन (Abnormally folded proteins) के बने होते हैं। इनका आकार वायरस के बराबर होता है। [20, 21]
  • ये न्यूरोलॉजिकल (मस्तिष्क) की गंभीर बीमारियाँ पैदा करते हैं। उदाहरण: गायों में मैड काउ रोग (Mad Cow Disease - BSE) और मनुष्यों में इसका समतुल्य सीआर-जैकोब रोग (Cr-Jacob Disease - CJD)

🤝 ④ लाइकेन (Lichens)

  • यह शैवाल (Algae) और कवक (Fungi) के बीच का एक अत्यंत सुंदर सहजीवी (Symbiotic) संबंध है, जहाँ दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।
  • फाइकोबायॉन्ट (Phycobiont - शैवालांश): प्रकाश-संश्लेषी स्वपोषी भाग जो भोजन बनाता है।
  • माइकोबायॉन्ट (Mycobiont - कवकांश): परपोषी भाग जो खनिज, जल का अवशोषित करता है और आश्रय देता है।
  • 🚨 प्रदूषण के सूचक (Pollution Indicators): लाइकेन वायु प्रदूषण के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं। ये सल्फर डाइऑक्साइड () वाले प्रदूषित क्षेत्रों (जैसे शहरों या औद्योगिक इलाकों) में कभी नहीं उगते। अतः इनका न उगना प्रदूषण का सीधा संकेत है। [23, 24, 25, 26]

💡 Exam Points & Tips-Tricks (NEET / CUET / State Boards)

  • 🚨 Mycoplasma Flash Card: बिना कोशिका भित्ति की सबसे छोटी जीवित कोशिका जो बिना ऑक्सीजन के भी जिंदा रह सकती है माइ科प्लाज्मा। इसे रट लें, यह नीट का सदाबहार प्रश्न है।
  • Contagium Vivum Fluidum Phrase: यह कथन वैज्ञानिक बेइजेरिनेक ने दिया था (याद रखने की ट्रिक: बेइजेरिनेक का 'तरल' संदेश).
  • Diatoms Chief Producers Code: समुद्र के मुख्य उत्पादक कौन हैं? डायटम (क्राइसोफाइट)। इनकी दीवारें सिलिका की बनी होती हैं जिससे डायटमी मृदा बनती है।
  • Fungi Classification Mycelium Trick: केवल फाइकोमाइसिटीज का कवकजाल अमटीय (Aseptate) होता है। बाकी तीनों वर्गों (एस्को, बेसिडियो, ड्यूटेरो) का कवकजाल हमेशा पटयुक्त और शाखित (Septate & Branched) होता है।
  • Deuteromycetes Hidden Name: इसे अपूर्ण कवक (Fungi Imperfecti) कहते हैं क्योंकि इसकी लैंगिक अवस्था अभी तक खोजी नहीं जा सकी है।

📝 अध्याय का सारांश (Conclusion)

जीव जगत का वर्गीकरण अध्याय हमें प्रकृति की उस विशाल सूक्ष्म और वृहद् जैव विविधता को खानों में सजाकर व्यवस्थित रूप से देखना सिखाता है। अरस्तू और लिनियस के शुरुआती प्रयासों के बाद, आर. एच. व्हिटेकर का पाँच जगत वर्गीकरण (1969) जीव विज्ञान का सबसे ठोस वैज्ञानिक आधार बना। मोनेरा जगत के प्रोकेरियोटिक जीवाणुओं की असीमित उपापचयी क्षमता और माइकोप्लाज्मा की दीवार-रहित सूक्ष्मता हमें विस्मित करती है। प्रोटिस्टा जगत ने एककोशिकीय यूकेरियोट्स को समेटकर डायटम के सिलिका महलों (डायटमी मृदा) और यूग्लीना के मिश्रपोषी जादू को उजागर किया।

कवक जगत की काइटिन युक्त दीवारें और ड्यूटेरोमाइसिटीज (अपूर्ण कवक) के खनिज चक्रण की खूबियाँ प्रकृति के पुनर्चक्रण कारखाने को चलाती हैं। अंत में, पाँच जगतों के अनुशासन से बाहर छूटे हुए वायरस के प्रोटीन आवरण (कैप्सिड), वाइरॉइड के नग्न कम आणविक भार वाले आरएनए, प्रियोन के मुड़े हुए संक्रामक प्रोटीनों के रहस्यमयी व्यवहार, तथा लाइकेन के प्रदूषण सूचक सहजीवन ने हमें यह वैचारिक दृष्टिकोण दिया कि जीवन की सीमाएँ कितनी सूक्ष्म और अनंत हैं।

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