अध्याय 3: वनस्पति जगत (Plant Kingdom)
[CBSE / State Boards / NEET-UG के लिए विशेष व्यापक जीव विज्ञान नोट्स]
1. पादप वर्गीकरण पद्धतियाँ (Systems of Classification)
समय के साथ पादपों को वर्गीकृत करने के लिए तीन मुख्य पद्धतियाँ अपनाई गईं:
- कृत्रिम वर्गीकरण पद्धति (Artificial System): यह पद्धति केवल सतही और कुछ आकारिकीय लक्षणों (जैसे- आदत, रंग, पत्तियों की संख्या और आकृति) तथा पुमंग (Androecium) की संरचना पर आधारित थी। (दाता: कैरोलस लिनियस)।
- प्राकृतिक वर्गीकरण पद्धति (Natural System): यह पादपों के बाहरी लक्षणों के साथ-साथ आंतरिक लक्षणों (जैसे- परासंरचना, शरीर, भ्रूणविज्ञान और पादप रसायन) पर आधारित थी। (दाता: जॉर्ज बेंथम तथा जोसेफ डाल्टन हूकर)।
- जातिवृत्तीय वर्गीकरण पद्धति (Phylogenetic System): यह विभिन्न जीवों के बीच विकासीय संबंधों (Evolutionary relationships) पर आधारित है। वर्तमान में यह सबसे अधिक स्वीकार्य है।
वर्गीकरण में अन्य आधुनिक तकनीकें:
- संख्यात्मक वर्गिकी (Numerical Taxonomy): कंप्यूटर का उपयोग करके सभी प्रेक्षणीय लक्षणों को कोड और संख्या देकर गणना करना।
- रसायन वर्गिकी (Chemotaxonomy): पादपों के रासायनिक घटकों (Chemical constituents) का उपयोग करना।
2. शैवाल (Algae)
- शैवाल क्लोरोफिल-युक्त, सरल, थैलासाभ (Thalloid), स्वपोषी तथा मुख्यतः जलीय जीव हैं।
- सहजीवन: ये कवक के साथ (लाइकेन में) तथा प्राणियों के साथ (जैसे- स्लॉथ भालू पर) भी पाए जाते हैं।
शैवाल के तीन मुख्य वर्ग और उनके लक्षण (NCERT Table 3.1):
| वर्ग (Class) | सामान्य नाम | मुख्य वर्णक (Pigments) | संचित भोजन (Food) | कोशिका भित्ति | कशाभिका संख्या व स्थिति | उदाहरण |
|---|---|---|---|---|---|---|
| क्लोरोफाइसी | हरे शैवाल | क्लोरोफिल a, b | स्टार्च | सेल्युलोज | 2-8, समान, शीर्षस्थ | वॉल्वॉक्स, यूलोथ्रिक्स, कारा |
| फियोफाइसी | भूरे शैवाल | क्लोरोफिल a, c, फ्यूकोक्सैन्थिन | लैमिनेरिन, मैनिटोल | सेल्युलोज + ऐल्जिन | 2, असमान, पार्श्वीय | एक्टोकार्पस, डिक्टिओटा, लैमिनेरिया |
| रोडोफाइसी | लाल शैवाल | क्लोरोफिल a, d, r-फाइकोइरिथ्रिन | फ्लोरिडियन स्टार्च | सेल्युलोज, पेक्टिन, पॉलीसल्फेट एस्टर | अनुपस्थित (Non-motile) | पॉलीसाइफोनिया, पोर्फायरा, ग्रेसीलेरिया |
📌 शैवाल का आर्थिक महत्व (Economic Importance):
- महासागरों के कुल कार्बन डाइऑक्साइड (
) स्थिरीकरण का आधा भाग शैवाल करते हैं। - जिलेडियम तथा ग्रेसीलेरिया से अगर-अगर (Agar) प्राप्त होता है, जिसका उपयोग सूक्ष्मजीवों के संवर्धन और आइसक्रीम व जेली बनाने में होता है।
- क्लोरेला (Chlorella): यह एककोशिकीय शैवाल है जिसमें प्रोटीन प्रचुर मात्रा में होता है, इसका उपयोग अंतरिक्ष यात्री भोजन के रूप में करते हैं।
3. ब्रायोफाइटा (Bryophytes) - "पादप जगत के उभयचर"
- इन्हें पादप जगत के उभयचर (Amphibians of Plant Kingdom) कहा जाता है क्योंकि ये भूमि पर रहते हैं, लेकिन लैंगिक जनन के लिए जल पर निर्भर करते हैं।
- इनकी मुख्य पादप काय युग्मकोद्भिद (Gametophyte - n) होती है जो अगुणित होती है और युग्मक उत्पन्न करती है।
(A) लिवरवर्ट (Liverworts)
- इनका थैलासाभ पृष्ठअधरीय (Dorsiventrally flattened) होता है। (उदा: मार्केन्शिया)।
- अलैंगिक जनन: थैलेस के खंडन या विशिष्ट हरी, बहुकोशिकीय कलिकाओं द्वारा होता है जिन्हें जेमा (Gemmae) कहते हैं। ये जेमा कप में विकसित होती हैं और टूटकर नए पौधे बनाती हैं।
(B) मॉस (Mosses)
- इनके जीवन चक्र की मुख्य अवस्था युग्मकोद्भिद है जिसकी दो प्रावस्थाएं होती हैं: पहली प्रतंतु (Protonema) जो बीजाणु से सीधे बनती है, और दूसरी पर्णिल (Leafy) प्रावस्था।
- (उदा: फ्युनेरिया, पॉलीट्राइकम, स्फैग्नम)।
- स्फैग्नम (Sphagnum): इसे 'पीट मॉस' भी कहते हैं। यह जल को रोक कर रखने की उच्च क्षमता के कारण सजीव पदार्थों के परिवहन (Trans-shipment) में पैकेजिंग सामग्री के रूप में उपयोग किया जाता है।
4. टेरिडोफाइटा (Pteridophytes)
- ये प्रथम स्थलीय पौधे हैं जिनमें संवहन ऊतक—जाइलम (Xylem) तथा फ्लोएम (Phloem) पाए जाते हैं।
- इनकी मुख्य पादप काय बीजाणुद्भिद (Sporophyte - 2n) होती है, जो वास्तविक जड़, तना और पत्तियों में विभेदित होती है।
- (उदा: सिलाजिनेला, साल्विनिया, इक्विसीटम, ड्रायोप्टेरिस)।
📌 महत्वपूर्ण जैविक लक्षण [NEET Hot Topics]:
- समबीजाणुक व विषमबीजाणुक: अधिकांश टेरिडोफाइट्स समान प्रकार के बीजाणु बनाते हैं (समबीजाणुक), लेकिन सिलाजिनेला (Selaginella) और साल्विनिया (Salvinia) दो प्रकार के (छोटे व बड़े) बीजाणु बनाते हैं, जिन्हें विषमबीजाणुक (Heterosporous) कहते हैं।
- बीज प्रवृत्ति (Seed Habit): विषमबीजाणुक पौधों में मादा युग्मकोद्भिद अपनी आवश्यकताओं के लिए मुख्य बीजाणुद्भिद पर ही टिकी रहती है। यह घटना बीज प्रवृत्ति का अग्रदूत (Precursor to seed habit) मानी जाती है, जो उद्विकास का एक महत्वपूर्ण चरण है।
5. जिम्नोस्पर्म (Gymnosperms) - "नग्नबीजी पौधे"
- ऐसे पौधे जिनमें बीजांड (Ovules) अंडाशय भित्ति से ढके हुए नहीं होते और निषेचन से पहले व बाद में भी नग्न (Naked) रहते हैं। इनमें फल नहीं बनते।
- इसके अंतर्गत मध्यम या लंबे वृक्ष और झाड़ियां आती हैं। (उदा: साइकस, पाइनस, सिकोआ)।
- सिकोआ (Sequoia): यह 'रेड वुड ट्री' संसार के सबसे लंबे वृक्षों में से एक है।
विशिष्ट लक्षण:
- जड़ें: पाइनस की जड़ों में कवक सहजीवी के रूप में रहते हैं, जिसे कवकमूल (Mycorrhiza) कहते हैं। साइकस की विशिष्ट जड़ें नाइट्रोजन-स्थिरीकरण करने वाले साइनोबैक्टीरिया के साथ जुड़ी होती हैं, जिन्हें प्रवालाभ जड़ें (Coralloid roots) कहते हैं।
- ये विषमबीजाणुक होते हैं और अगुणित लघुबीजाणु तथा गुरुबीजाणु बनाते हैं, जो शंकु (Cones) में व्यवस्थित होते हैं।
6. एंजियोस्पर्म (Angiosperms) - "पुष्पी पादप"
👉 नोट: नवीनतम NCERT पाठ्यक्रम के अनुसार एंजियोस्पर्म के विस्तृत विवरण और पादप जीवन चक्र (पीढ़ी एकांतरण) को इस अध्याय से हटा दिया गया है, लेकिन इसकी बुनियादी जानकारी आवश्यक है:
- ये पुष्पी पादप हैं जिनमें बीजांड अंडाशय के भीतर बंद होते हैं और निषेचन के बाद फल बनते हैं। इन्हें दो वर्गों—द्विबीजपत्री (Dicots) और एकबीजपत्री (Monocots) में विभाजित किया जाता है।
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