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🕉️ Original Sanskrit Text
23
क्रियताम् एतत्……..
यदि किमपि करणीयम् इति इच्छा तर्हि परोपकारः क्रियताम्।
यदि किमपि पालनीयम् इति इच्छा तर्हि धर्मः पाल्यताम्।
यदि किमपि वक्तव्यम् इति इच्छा तर्हि सत्यम् उच्यताम्।
यदि सङ्गः करणीयः इति इच्छा तर्हि सज्जनानां सङ्गः क्रियताम्।
यदि व्यसने इच्छा अस्ति तर्हि दानव्यसनं पाल्यताम्।
यदि किमपि ग्रहीतव्यम् इति इच्छा सज्जनानां गुणाः गृह्यन्ताम्।
यदि लोभः कोऽपि आस्थेयः तर्हि सद्गुणेषु लोभः स्थाप्यताम्।
यदि निन्दां विना स्थातुं न शक्यते तर्हि स्वदोषाः निन्द्यन्ताम्।
यदि कोपे तीव्रेच्छा तर्हि कोपविषये एव कुप्यताम्।
यदि कस्माच्चित् दूरं गन्तव्यम् तर्हि परिग्रहात् दूरे स्थीयताम्।
यदि किमपि द्रष्टव्यम् इति इच्छा तर्हि आत्मा एव दृश्यताम्।
यदि कोऽपि शत्रुभावेन द्रष्टव्यः तर्हि रागद्वेषौ शत्रुभावेन दृश्येताम्।
यदि भेतव्यं तर्हि स्वस्य कुकृत्येभ्यः भीयताम्।
🌼 Simple Hindi Translation
पाठ-23: यह कीजिए (क्रियताम् एतत्)……..
- यदि कुछ करने की इच्छा हो, तो परोपकार (दूसरों की भलाई) कीजिए।
- यदि किसी चीज़ का पालन करने की इच्छा हो, तो धर्म (कर्तव्य) का पालन कीजिए।
- यदि कुछ बोलने की इच्छा हो, तो सत्य बोलिए।
- यदि संगति (साथ) करने की इच्छा हो, तो सज्जनों (अच्छे लोगों) की संगति कीजिए।
- यदि किसी व्यसन (लत) की इच्छा हो, तो दान देने का व्यसन पालना चाहिए।
- यदि कुछ ग्रहण करने (स्वीकारने) की इच्छा हो, तो सज्जनों के गुणों को ग्रहण कीजिए।
- यदि किसी बात का लोभ (लालच) रखना ही हो, तो सद्गुणों (अच्छे गुणों) का लोभ रखिए।
- यदि किसी की निंदा किए बिना नहीं रहा जा सके, तो अपने स्वयं के दोषों (कमियों) की निंदा कीजिए।
- यदि क्रोध करने की तीव्र इच्छा हो, तो क्रोध के ऊपर ही क्रोध कीजिए (कि यह हमारे भीतर क्यों आया)।
- यदि किसी चीज़ से दूर जाना हो, तो परिग्रह (अत्यधिक धन-वस्तुओं के संचय) से दूर रहिए।
- यदि कुछ देखने की इच्छा हो, तो अपनी अंतरात्मा को ही देखिए (आत्म-मंथन कीजिए)।
- यदि किसी को शत्रु (दुश्मन) की भावना से देखना ही हो, तो आसक्ति (राग) और द्वेष (नफ़रत) को शत्रु मानिए।
- यदि किसी बात से डरना ही हो, तो अपने स्वयं के बुरे कर्मों (कुकृत्यों) से डरिए।
📖 Word Meanings
- क्रियताम् — किया जाना चाहिए / कीजिए (विधि-निषेध सूचक कर्मवाच्य क्रिया)
- सङ्गः — साथ / संगति
- व्यसने — लत या बुरी आदत में
- आस्थेयः — रखना चाहिए / आश्रय लेना चाहिए
- निन्द्यन्ताम् — बुराई या निंदा की जानी चाहिए
- परिग्रहात् — सांसारिक वस्तुओं के अत्यधिक संचय या मोह से
- रागद्वेषौ — मोह (आसक्ति) और नफ़रत (ईर्ष्या)
- कुकृत्येभ्यः — बुरे या पाप कर्मों से
💡 Meaning and Simple Explanation
इस पाठ में मानव मन की विभिन्न स्वाभाविक इच्छाओं और प्रवृत्तियों (जैसे—लोभ, क्रोध, निंदा, डर, व्यसन) को एक बहुत ही सुंदर और सकारात्मक मोड़ दिया गया है। साधारणतया मनुष्य दूसरों की बुराई करता है, धन का लालच करता है और दुश्मनों से नफ़रत करता है। लेकिन यहाँ नीति वचन कहते हैं कि इन प्रवृत्तियों को बदलो—यदि निंदा करनी ही है तो अपनी कमियों की करो ताकि वे दूर हो सकें; यदि लालच करना है तो अच्छे गुणों का करो; और यदि डरना है तो केवल अपने गलत कामों से डरो ताकि पाप करने से बच सको। यह सूक्तियाँ आंतरिक सुधार (Self-Transformation) का सर्वोत्तम मार्ग बताती हैं।
✨ Main Message
मानवीय प्रवृत्तियों और इच्छाओं को सांसारिक विकारों की ओर मोड़ने के बजाय, उन्हें आत्म-सुधार, परोपकार और नैतिक मूल्यों की ओर मोड़ना ही श्रेष्ठ जीवन का रहस्य है।
📝 Brief Summary
इस २३वें पाठ 'क्रियताम् एतत्' में कर्मवाच्य (Passive Voice) और विधिलिङ्ग/लोट् लकार के प्रयोगों के माध्यम से जीवन जीने के व्यावहारिक और नैतिक नियम सिखाए गए हैं। इसमें मनुष्य को परोपकार करने, सत्य बोलने, सज्जनों की संगति करने और अपने भीतर के दोषों, क्रोध व राग-द्वेष को ही अपना वास्तविक शत्रु मानकर उन्हें सुधारने की सुंदर प्रेरणा दी गई है।
🌟 Overall Summary
यह पाठ सनातन नीति और सूक्ति-साहित्य का एक उत्कृष्ट निचोड़ है। यह हमें सिखाता है कि हम अपनी स्वाभाविक आदतों (जैसे क्रोध, लोभ या भय) को पूरी तरह नष्ट नहीं कर सकते, परंतु सही दिशा (Channelization) देकर उन्हें अपनी आध्यात्मिक और नैतिक उन्नति का साधन बना सकते हैं। पाठ की प्रत्येक पंक्ति मनुष्य को बाहरी दुनिया में कमियां ढूंढने के बजाय अपने अंतःकरण को झांकने (आत्मा एव दृश्यताम्), अपनी कमियों की निंदा करने और सांसारिक वस्तुओं के संचय (परिग्रह) से दूर रहकर केवल परोपकार और धर्म के मार्ग पर चलने का संदेश देती है।
📌 Main Teachings
- सकारात्मक रूपांतरण (Positive Redirection): अपनी कमियों जैसे क्रोध या लोभ को दबाने के बजाय उन्हें अच्छे कार्यों की ओर मोड़ें—सद्गुणों का लालच करें और अपने बुरे विचारों पर क्रोध करें।
- आत्म-अवलोकन (Self-Introspection): दूसरों की गलतियाँ निकालने (निंदा) या बाहर की दुनिया को देखने के बजाय अपनी आत्मा और अपने दोषों को देखना ही जीवन को बेहतर बनाने का सही तरीका है।
- वास्तविक शत्रु और भय: हमारे असली दुश्मन बाहर के लोग नहीं बल्कि हमारे भीतर के 'राग और द्वेष' हैं। हमें दुनिया के किसी व्यक्ति से डरने की आवश्यकता नहीं है, यदि डरना ही है तो केवल अपने स्वयं के बुरे कर्मों के परिणामों से डरना चाहिए।
📚 Important Sanskrit Words
| Sanskrit Word | Simple Hindi Meaning |
|---|---|
क्रियताम् | किया जाना चाहिए / कीजिए |
सज्जनानाम् | अच्छे और सदाचारी पुरुषों की |
दानव्यसनम् | हमेशा दान देने या परोपकार करने की आदत |
सद्गुणेषु | अच्छे और सात्विक मानवीय गुणों में |
परिग्रहात् | आवश्यकता से अधिक भौतिक वस्तुओं को इकट्ठा करने से |
रागद्वेषौ | किसी के प्रति अंधा मोह और किसी के प्रति घृणा/नफ़रत |
कुकृत्येभ्यः | हमारे द्वारा किए गए पाप या गलत कार्यों से |
भीयताम् | डरना चाहिए / भयभीत होना चाहिए |
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