महत्त्वपूर्ण बिंदु
- 'बातचीत' ललित निबंध के रचनाकार बालकृष्ण भट्ट हैं।
- इनका जन्म 23 जून, 1844 ई० उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में हुआ था।
- इनके माता-पिता का नाम पार्वती देवी एवं बेनी प्रसाद भट्ट था।
- इनका निधन 20 जुलाई, 1914 ई० को हुआ था।
- इनको कुछ रचनाएँ इस प्रकार से हैं –
- उपन्यास – रहस्य कथा, नूतन ब्रह्मचारी, सौ अजान एक सुजान, गुप्त वैरी, रसातल यात्रा, उचित दक्षिणा, हमारी घड़ी, सद्भाव का अभाव।
- नाटक – पद्मावती, वेणी संहार, शिशुपाल वध, नलदमयंती, शिक्षादान आदि।
लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
- BSEB Class - 12 Science : [2009A, 2011A, 2019A, 2022A]
अगर हमें वाक्शक्ति न होती, तो क्या होता?
अनेक प्रकार की शक्तियाँ जो वरदान के रूप में ईश्वर ने मनुष्य को दी हैं, उनमें वाक् शक्ति भी एक है।
यदि हममें वाशक्ति न होती तो हम गूँगे हो जाते। गूँगे-बहरे हो जाते। सारी सृष्टि पशुओं की तरह मौन हो जाती है। तब इस गूँगी सृष्टि का क्या होता ? अवाक् होने के कारण हम अपने सुख-दुःख किसी से कह भी नहीं पाते। हममें | प्रशंसा-आलोचना, सुनने-कहने की शक्ति का अभाव हो जाता।
दो हमजोली सहेलियों की बातचीत में बहुत अधिक समानता पायी जाती है। | दोनों हमजोली सहेली एक ही जैसा सोचती है।
- BSEB Class - 12 Science : [2024A]
जब तक मनुष्य बोलता नहीं, तब तक उसके व्यक्तित्व का कौन-सा पक्ष प्रकट नहीं होता है ?
लेखक बालकृष्ण भट्ट 'बातचीत' निबन्ध के माध्यम से यह बताना चाहता है कि बातचीत का एक विशेष तरीका होता है जिनके कारण मनुष्य आपस में प्रेम से बातें कर उसका आनन्द उठाते हैं। परन्तु व्यक्ति जब वाचाल हो जाता है अथवा बातचीत के दौरान अपने आप पर काबू नहीं रख पाता है तो वह दोष है। परन्तु जब वह बड़ी संजीदगी से सलीके से बातचीत करता है तो वह गुण है और उसी का पता देता है। मनुष्य के मूक रहने के कारण उसकी चरित्र का कुछ पता नहीं चलता है परन्तु वह जैसे ही कुछ बोलता है तो उसकी वाणी के माध्यम से गुण-दोष प्रकट होने लगते हैं। जब दो आदमी साथ बातचीत करते हैं तो अपने दिल एक-दूसरे के सामने खेलते हैं। इस खुलेपन में किसी की शिकायत, किसी की सच्चाई, किसी की बुराई करते हैं और इससे व्यक्ति का गुण-दोष प्रकट हो जाता है। अतः बोलने से ही मनुष्य के गुण-दोष की पहचान होती है और उसका जरिया है बातचीत ।
'आर्ट ऑफ कनवरसेशन' का अर्थ है- वार्तालाप की कला। 'आर्ट ऑफ कनवरसेशन' के हुनर की बराबरी स्पीच और लेख दोनों नहीं कर पाते। इस हुनर | की पूर्ण शोभा काव्यकला प्रवीण विद्वतमंडली में है। इस कला के माहिर व्यक्ति | ऐसे चतुराई से प्रसंग छेड़ते हैं कि श्रोताओं के लिए बातचीत कर्णप्रिय तथा अत्यन्त सुखदायी होती है। सुहृद गोष्ठी इसी का नाम है। सुहृद गोष्ठी की विशेषता है कि वक्ता के वाक्चातुर्य का अभिमान या कपट कहीं प्रकट नहीं हो पाता तथा बातचीत की सरसता बनी रहती है। कपट और एक-दूसरे को अपने पांडित्य के प्रकाश से परास्त करने का संघर्ष आदि रसाभास की सामग्री 'आर्ट ऑफ कनवरसेशन' का मूलतंत्र होती है। यूरोप के लोगों का 'आर्ट ऑफ कनवरसेशन' जगत् प्रसिद्ध है।
- BSEB Class - 12 Science : [2026A]
खाने, पीने, चलने, फिरने आदि की तरह मनुष्य के लिए बातचीत की आवश्यकता क्यों है ?
मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जिन्हें संवाद की आवश्यकता होती है। संवाद यानी करने से मनुष्य में मनुष्यता आती है। जिस प्रकार मनुष्य को अपनी जिंदगी मजेदार बनाने के लिए खाने पीने, चलने-फिरने आदि की जरूरत होती है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य में मनुष्यता बनाए रखने के लिए बातचीत की अत्यंत आवश्यकता होती है। | बातचीत करने से मनुष्य में वैचारिक शक्ति का विकास होता है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
बालकृष्ण भट्ट आधुनिक हिन्दी गद्य के आदि निर्माताओं और उन्नायक रचनाकारों में एक हैं। बालकृष्ण भट्ट बातचीत निबंध के माध्यम से मनुष्य को ईश्वर द्वारा दी गई अनमोल वस्तु वाक्शक्ति का सही इस्तेमाल करने को बताते हैं। वे बताते हैं कि यदि वाक्रशक्ति मनुष्य में न होती तो हम नहीं जानते कि इस गूँगी सृष्टि का क्या हाल होता। सबलोग मानों लुज-पुंज अवस्था में कोने में बैठा दिए गए होते। बातचीत के विभिन्न तरीके भी बताते हैं। यथा घरेलू बातचीत मन रमाने का ढंग है। वे बताते हैं कि जहाँ आदमी की अपनी जिंदगी मजेदार बनाने के लिए खाने, पीने, चलने, फिरने आदि की जरूरत है, वहाँ बातचीत की भी अत्यन्त आवश्यकता है। जो कुछ मवाद या धुआँ जमा रहता है वह बातचीत के जरिए भाप बनकर बाहर निकल पड़ता है। इससे चित हल्का और स्वच्छ हो परम आनंद में मग्न हो जाता है। बातचीत का भी एक खास तरह का मजा होता है। यही नहीं, वे बतलाते हैं कि मनुष्य बोलता नहीं तबतक उसका गुण-दोष नहीं प्रकट होता। बेन जानसन का कहना है कि बोलने से ही मनुष्य के रूप का साक्षात्कार हो जाता है। वे कहते हैं कि चार से अधिक की बातचीत तो केवल राम-रमौवल कहलाएगी। यूरोप के लोगों में बातचीत का हुनर है जिसे आर्ट ऑफ कनवरसेशन कहते हैं। इस प्रसंग में ऐसे चतुराई से प्रसंग छोड़े जाते हैं कि जिन्हें कान को सुन अत्यंत सुख मिलता है। हिन्दी में इसका नाम सुहद गोष्ठी है। बालकृष्ण भट्ट बातचीत का उत्तम तरीका यह मानते हैं कि हम वह शक्ति पैदा करें कि अपने आप बात कर लिया करें।
- BSEB Class - 12 Science : [2025A]
मनुष्य की बातचीत का उत्तम तरीका क्या हो सकता है ? इसके द्वारा वह कैसे अपने लिए सर्वधा नवीन संसार की रचना कर सकता है ?
मनुष्य की बातचीत का सबसे उत्तम तरीका उसका आत्मवार्तालाप है। वह अपने अन्दर ऐसी शक्ति विकसित करे जिस कारण वह अपने आप से बात कर लिया करें। आत्मवार्तालाप से तात्पर्य क्रोध पर नियंत्रण है जिसके कारण अन्य किसी व्यक्ति को कष्ट न पहुँचे। क्योंकि हमारी भीतरी मनोवृत्ति प्रतिक्षण नए-नए रंग दिखाया करती है। वह हमेशा बदलती रहती है। लेखक इस मन को प्रपंचात्मक संसार का एक बड़ा भारी आइना के रूप में देखता है जिसमें जैसी चाहो वैसी सूरत देख लेना कोई असंभव बात नहीं। अतः मनुष्य को चाहिए कि मन की चित्त को एकाग्र कर मनोवृत्ति स्थिर कर अपने आप से बातचीत करना चाहिए। इससे आत्मचेतना का विकास होगा। उस वाणी पर नियंत्रण हो जायेगा जिसके कारण | दुनिया में किसी से न वैर रहेगा और बिना प्रयास के हम बड़े-बड़े अजेय शत्रु पर भी विजय पा सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो हम सर्वथा एक नवीन संसार की रचना कर सकते हैं। इससे हमारी वाक्रशक्ति का दमन भी नहीं होगा। अतः व्यक्ति को चाहिए कि अपनी जिहवा को काबू में रखकर मधुरता से सिक्त वाणी बोले। न किसी से कटुता रहेगी न वैर। दुनिया सूबसूरत हो जायेगी। मनुष्य के बातचीत करने का सही उत्तम तरीका है।
'बातचीत' शीर्षक निबंध के माध्यम से विद्वान निबंधकार ने बातचीत करने के लिए ईश्वर द्वारा दी गई वाक्शक्ति को अनमोल बताया है और कहा है कि मनुष्य इसी शक्ति के कारण पशुओं से अलग है, बढ़कर है। बातचीत के विभिन्न तरीके जैसे आर्ट ऑफ कनवरसेशन, हृदय गोष्ठी आदि के बारे में बताया गया है कि, जिसके माध्यम से एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से उत्तम तरीके से बातचीत करता | हुआ उसका आनंद ले सकता है। इस निबंध में दो विदेशी निबन्धकारों, एडीसन एवं | बेन जॉनसन का मत दिया गया है जिसमें एडीसन ने यह कहा है कि जब तक | मनुष्य नहीं बोलता उसके गुण-दोष नहीं प्रकट होते। बेन जॉनसन का मत है कि बोलने से ही मनुष्य के सही रूप का साक्षात्कार होता है। निबंध में यह भी बताया गया है कि मनुष्य को अपने हृदय (मन) पर काबू रखकर बोलना या बातचीत करना चाहिए। यदि ऐसा हो तो वह सर्वथा नवीन संसार की रचना कर सकता है। उसे कोई दुःख विषाद नहीं झेलना पड़ेगा। बातचीत मनुष्य को अपनी जिन्दगी मजेदार बनाने का एक जरिया भी है। लोग यदि बातचीत के दौरान चुटीली बात कह दें तो लोग हँसने लगते हैं जिससे प्रच्छन्न सुख-भाव का बोध होता है। बातचीत मन बहलाव का माध्यम तो है ही, उत्तम बातचीत मनुष्य के व्यक्तित्व को विकसित करने का एक माध्यम भी है जिसके कारण व्यक्ति लोकप्रिय एवं प्रसिद्ध हो । जाता है।
व्याख्या संबंधी प्रश्नोत्तर
- BSEB Class - 12 Science : [2009A, 2011A]
सच है, जब तक मनुष्य बोलता नहीं, तब तक उसका गुण-दोष प्रकट नहीं होता।
प्रस्तुत पंक्तियाँ बालकृष्ण भट्ट के निबंध 'बातचीत' से ली गयी हैं। लेखक इस निबंध के माध्यम यह बताना चाहता है कि बातचीत का एक विशेष तरीका होता है जिसके कारण मनुष्य आपस में प्रेम से बातें कर उसका आनन्द उठाते हैं। परन्तु व्यक्ति जब वाचाल हो जाता है अथवा बातचीत के दौरान अपने आप पर काबु नहीं रख पाता है तो वह 'दोष' है, परन्तु जब वह बड़ी संजीदगी से, सलीके से बातचीत करता है तो वह गुण है और उसी का पता देता है। मनुष्य के मूक रहने के कारण उसकी चरित्र का कुछ पता नहीं चलता है परन्तु वह जैसे ही कुछ बोलता है तो उसकी वाणी के माध्यम से गुण-दोष प्रकट होने लगते हैं। जब दो आदमी साथ बातचीत करते हैं तो अपने दिल एक-दूसरे के सामने खोलते हैं। इस खुलेपन में किसी की शिकायत किसी की अच्छाई, किसी की बुराई होती है और इससे व्यक्ति का गुण-दोष प्रकट हो जाता है। बेन जॉनसन इस संदर्भ में कहते हैं कि बोलने से मनुष्य का साक्षात्कार होता है, उसकी पहचान सामने आती है। यहाँ आदमी की अपनी जिंदगी मजेदार बनाने के लिए खाने-पीने चलने-फिरने आदि की जरूरत होती है। वहाँ बातचीत की अत्यन्त आवश्यकता है जहाँ कुछ मवाद या धुआँ जमा रहता है, वह बातचीत के जरिए भाप बनकर बाहर निकल पड़ता है।. कहने का आशय यह है कि मनुष्य के मन के अन्दर बहुत सी परतें जमीं रहती हैं जिनमें कुछ अच्छी और कुछ बुरी होती हैं और यह बातचीत के दौरान हमारी जिह्वा से प्रकट हो जाता है। अतः बोलने से ही मनुष्य के गुण-दोष की पहचान होती है और उसका जरिया है बातचीत।
- BSEB Class - 12 Science : [2024A]
"जो कुछ मवाद या धुआँ जमा रहता है, वह बाचीत के जरिए भाप बनकर बाहर निकल पड़ता है।"
प्रस्तुत गद्यावतरण हमारी पाठ्यपुस्तक, दिगंत-2 में संकलित बातचीत' शीर्षक निबंध से उद्धृत है। इसके रचयिता भारतेंदु युग के प्रसिद्ध निबंधकार बालकृष्ण भट्ट हैं। किर्सी भ्रांति या गलतफहमी बढ़ती ही चली जाती है और एक समय ऐसा आता है जब दोनों मित्र एक-दूसरे के प्रति शत्रु-सा आचरण करने लगते हैं। बातचीत ही ऐसा शस्त्र है जो दो मित्रों के बीच की सारी भ्रांतियों और कटुताओं को काट देता है। दो मित्र जब किसी भ्रांति के शिकार होकर भीतर-ही-भीतर घुटते रहते हैं, तो बातचीत ही उन मित्रों को उस घुटन से, उस दुःख से मुक्त करती है। जिस तरह पके घाव से मवाद के बह जाने से घाव के दर्द से मुक्ति मिल जाती है और धुआँ के निकल जाने से साँसों की तकलीफ (धुआँ के कारण दम घुटने की तकलीफ) दूर हो जाती है, उसी प्रकार बातचीत कर लेने से बहुत दिनों से जमा हुई शिकायत भी दूर हो जाती है। संवादहीनता की स्थिति में दो मित्रों की (किसी भ्रांति के कारण) दूरी बढ़ती ही चली जाती है।
- BSEB Class - 12 Science : [2026A]
"यदि मनुष्य की और इंद्रियाँ अपनी-अपनी शक्तियों में अविकल रहतीं और वाक्शक्ति मनुष्यों में न होती तो हम नहीं जानते कि इस गूँगी सृष्टि का क्या हाल होता।"
प्रस्तुत पक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक दिगन्त भाग-2 के बालकृष्ण भट्ट के निबंध 'बातचीत' से ली गयी है। लेखक कहते हैं कि यदि मनुष्य की इन्द्रियाँ अपनी-अपनी शक्ति में अधूरी होतीं और मनुष्य में वाणी की क्षमता न होती, तो संसार अत्यन्त नीरस और गूँगा बन जाता। मनुष्य अपने विचार, भाव और अनुभव एक-दूसरे तक नहीं पहुँचा पाता। बातचीत के माध्यम से ही ज्ञान का आदान-प्रदान, सामाजिक सम्बन्ध और सांस्कृतिक विकास संभव है। लेखक इस अवतरण द्वारा यह स्पष्ट करता है कि बातचीत मनुष्य को मनुष्य बनाती है और समाज को जीवंत बनाए रखती है।
Join the Discussion