Skip to content

निबंध-लेखन: Hindi Grammar Essay Format for BSEB & CBSE

✍️ 25. निबंध-लेखन (Essay Writing) ​

यह अध्याय BSEB (कक्षा 9, 10, 11, 12), CBSE, State Boards और अन्य सभी अकादमिक परीक्षाओं के लेखन खंड (Writing Section) का सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा अंक दिलाने वाला विषय है। बोर्ड परीक्षाओं में यह प्रश्न प्रायः 8 से 10 अंकों के लिए पूछा जाता है। इस डिजिटल नोट्स में दी गई संरचना और ब्रह्मास्त्र ट्रिक्स की मदद से आप निबंध में अधिकतम अंक सुनिश्चित कर सकते हैं।

Image of grammar
CBSE, BSEB, UP, PYQ, Sample Questions, Model Paper Question

🗺️ निबंध-लेखन का मास्टर माइंड मैप ​

  • शाब्दिक अर्थ: 'नि' + 'बंध' अर्थात् भली-भाँति बंधी हुई रचना।
  • मुख्य परिभाषा: किसी विषय पर अपने विचारों, भावों और ज्ञान को सुव्यवस्थित, क्रमबद्ध और प्रभावशाली भाषा में लिपिबद्ध करना ही निबंध-लेखन कहलाता है।
  • 🎯 मुख्य उद्देश्य: लेखक की वैचारिक क्षमता, भाषा शैली और तार्किक शक्ति की परीक्षा लेना।

🏗️ ① निबंध के तीन मुख्य स्तम्भ (The Ideal 3-Step Structure) ​

एक उत्कृष्ट निबंध को मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित करके लिखना चाहिए। बिहार बोर्ड (BSEB) में अक्सर संकेत-बिंदु (Points) दिए रहते हैं, जिन्हें इन्हीं तीन भागों में समेटा जाता है:

📝 निबंध की संरचना (Structure)

┌──────────────────────────────┼──────────────────────────────┐
▼                              ▼                              ▼

🌟 1. प्रस्तावना / भूमिका       📊 2. मध्य भाग (विषय-विस्तार)    🏁 3. उपसंहार (Conclusion)
   (Introduction - आकर्षक शुरुआत)   (Body - लाभ, हानि, कारण, उपाय)   (निचोड़ और अपना सुझाव)

🧲 Ⓐ प्रस्तावना / भूमिका (Introduction) ​

  • यह निबंध का मुख्य प्रवेश द्वार है। इसे बहुत आकर्षक और प्रभावशाली होना चाहिए।
  • ब्रह्मास्त्र ट्रिक: इसकी शुरुआत किसी प्रसिद्ध कविता की पंक्ति, सूक्ति, स्लोगन या महापुरुष के कथन से करें। इससे परीक्षक (Checker) पर बहुत सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
  • यह पूरे निबंध का लगभग 10-15% भाग होना चाहिए (करीब 4-5 पंक्तियाँ)।

📈 Ⓑ विषय-विस्तार (Body of the Essay) ​

  • यह निबंध का सबसे बड़ा और मुख्य भाग है। इसमें विषय का पूरा विश्लेषण किया जाता है।
  • इसे हमेशा अलग-अलग अनुच्छेदों (Paragraphs) या संकेत-बिंदुओं (Headings) में लिखना चाहिए।
  • इसमें निम्नलिखित पहलुओं पर चर्चा की जाती है:
    • विषय का अर्थ और इतिहास।
    • समस्या के कारण और उसके प्रभाव (यदि विषय कोई समस्या है जैसे प्रदूषण, बेरोजगारी)।
    • विषय के लाभ और हानियाँ (जैसे विज्ञान, सोशल मीडिया)।
    • सुधार के उपाय या सरकार के प्रयास।

🏁 Ⓒ उपसंहार (Conclusion) ​

  • यह निबंध का अंतिम भाग यानी निष्कर्ष / निचोड़ है।
  • इसमें पूरे निबंध का सार लिखते हुए अपना सकारात्मक सुझाव या संदेश दिया जाता है।
  • निबंध का अंत भी किसी प्रेरणादायक पंक्ति या संकल्प के साथ करना सबसे बेहतर माना जाता है।

⚙️ ② परीक्षा में पूरे अंक पाने के 5 सुनहरे नियम (Golden Rules) ​

  1. शब्द-सीमा का ध्यान: बोर्ड परीक्षाओं में निबंध प्रायः 250 से 300 शब्दों में लिखने को कहा जाता है। बिना वजह बहुत लंबा खींचने से बचें।
  2. सटीक पदक्रम और शुद्ध वर्तनी: भाषा सरल, सुबोध और व्याकरणिक दृष्टि से शुद्ध होनी चाहिए। अशुद्धियों पर अंक कटते हैं।
  3. पैराग्राफ चेंज की ट्रिक: जब भी आप कोई नया विचार या पहलू शुरू करें, नया पैराग्राफ अवश्य बनाएं। इससे निबंध स्कैनेबल और सुंदर दिखता है।
  4. काट-छाँट से बचें: कॉपी में ज्यादा कटिंग न करें। यदि कोई शब्द गलत हो जाए, तो उसे केवल एक सीधी रेखा से काटें, न कि उस पर ओवरराइटिंग करें।
  5. कोटेशन को बॉक्स या अंडरलाइन करना: निबंध के बीच में प्रयुक्त महत्वपूर्ण पंक्तियों या नारों को काले (Black) पेन से लिखें या उन्हें रेखांकित (Underline) कर दें।

📝 ③ लाइव मॉडल उदाहरण (Live Model Essay Segment) ​

विषय: पर्यावरण प्रदूषण: कारण और निवारण

1. प्रस्तावना:

"वृक्ष लगाओ, धरा बचाओ, जीवन को खुशहाल बनाओ।" आज का मानव विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति को भूलता जा रहा है। इसी का दुष्परिणाम है— प्रदूषण। पर्यावरण के किसी भी घटक (हवा, पानी, मिट्टी) में अवांछनीय तत्वों का मिल जाना जो सजीवों के लिए हानिकारक हो, प्रदूषण कहलाता है। यह आज संपूर्ण मानव जाति के अस्तित्व के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है।

2. प्रदूषण के प्रकार और कारण (विषय-विस्तार): मुख्य रूप से प्रदूषण चार प्रकार का होता है: वायु प्रदूषण (वाहनों और कारखानों के धुएँ से), जल प्रदूषण (कचरे और रसायनों के नदियों में मिलने से), ध्वनि प्रदूषण (लाउडस्पीकरों और हॉर्न से) तथा मृदा प्रदूषण (प्लास्टिक और कीटनाशकों से)। वनों की अंधाधुंध कटाई और बढ़ती जनसंख्या इसके मुख्य कारण हैं।

3. सुधार के उपाय: इस विकराल समस्या से निपटने के लिए हमें युद्ध स्तर पर 'वृक्षारोपण' (Afforestation) करना होगा। प्लास्टिक के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना होगा और सौर ऊर्जा जैसी नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना होगा।

4. उपसंहार: पर्यावरण की रक्षा केवल सरकार का काम नहीं है, बल्कि यह हम सब का सामूहिक कर्तव्य है। जब तक हर नागरिक जागरूक नहीं होगा, तब तक हम अपनी धरती को नहीं बचा सकते। आइए संकल्प लें कि हम पर्यावरण को स्वच्छ रखेंगे क्योंकि— "स्वच्छ पर्यावरण, सुखी जीवन।"


Bihar Board Class 12 Science PYQ ​

1. कोई अविस्मरणीय घटना ​

[2009A]

यह बात तब की है, जबकि मैं आठवीं कक्षा में पढ़ता था। मैं कक्षा का अग्रणी छात्र था, विद्यालय का सर्वोत्तम वक्ता तथा भारोत्तोलन में प्रथम घोषित छात्र था। मेरा एक अनन्य मित्र था, जो मेरे साथ सहवक्ता था। वह नाटक आदि में अच्छी रुचि रखता था। उसे विद्यालय का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता घोषित किया गया था। इसी कारण मुझे उसकी मित्रता में रुचि थी। वह स्वभाव में बड़ा प्रेमी, चंचल, शरारती तथा मनमौजी था। मेरा मन करता था कि मैं सदा उसके साथ रहूँ। उसका नाम था सत्यम्।

सत्यम् की प्रत्येक बात मुझे अच्छी लगती थी। एक दिन उसने मुझे सलाह दी कि आज विद्यालय न जाकर शीतलपुर के बाग में रहेंगे। वहाँ पूरे दिन पके हुए फलों का स्वाद लेंगे और कुएँ का ठंडा पानी पीकर मौज़ करेंगे। मैंने उसके प्रस्ताव का विरोध किया। उसने फिर भी मेरा पीछा नहीं छोड़ा। मेरे मन में भी कुछ गुदगुदी होने लगी, लेकिन पकड़े जाने का भय, फिर पिताजी का रौब और माताजी का स्नेह याद आया, तो मैंने साफ मना कर दिया। उस दिन सत्यम् विद्यालय नहीं आया। मैं समझ गया कि वह अवश्य ही मीठे-मीठे फलों का स्वाद ले रहा होगा।

उसी दिन शाम को वह मेरे घर आया। उसने मुझे लाल-लाल अमरुद खाने को दिए। अमरुद बहुत मीठे थे। उसने मुझे बतलाया कि उसने उस दिन ऐसे ही पके हुए अमरुदों का स्वाद लिया था और घर में किसी को पता भी नहीं चला। मेरा मन उसकी ओर झुकने लगा। मैंने जिज्ञासावश उससे और भी बातें पूछीं, जो उसने बड़े मोहक ढंग से प्रस्तुत की। अंत में उसने मुझे अगलेदिन उस बाग में जाने के लिए तैयार कर लिया। अगले दिन, सबेरे-सबेरे, जब मैं बस्ता उठाकर घर से निकला, तो मेरा मन भय से काँप रहा था। उससे मुझे बस अड्डे के पीछे एक पानी के प्याऊ के पास मिलना था। ठीक समय पर वह मेरी इंतजार करता हुआ मुझे मिला। मुझे वहाँ बहुत डर लग रहा था। ऐसा लग रहा था मानो सभी लोग मेरी ओर देख रहे हैं। मुझे ऐसा लगा कि सभी साइकिल सवार मेरी शिकायत करने मेरे ही घर जा रहे हैं, या वहीं से शिकायत करके आ रहे हैं। मैं डर ही रहा था कि सत्यम्

ने कहा-सोच क्या रहे हो ? डरा नहीं करते। लाओ, बस्ता, यहीं पटको पनवाड़ी की दुकान पर। यह हमारा दोस्त है। फिर चलेंगे दोनों यार शीतलपुर के बाग में।

डर के मारे मेरा दम निकला जा रहा था। मैं तुरंत सत्यम् के साथ पनवाड़ी की दुकान पर बस्ता रखकर बाग की ओर चल दिया कि कहीं यहाँ खड़े-खड़े कोई देख न ले। राह भर मैं डरता रहा। मुझे अनुभव हुआ कि अपराधी की आत्मा बहुत कमजोर होती है। मैं अपने विद्यालय का जाना-माना भारोत्तोलक था, किंतु इस समय मुझे अपने पग ही उठाने भारी पड़ रहे थे, मानो मेरी भुजाओं का बल किसी ने चूस लिया हो। मुझे लगा कि चेहरा सिमट कर छोटा हो गया है।

मैंने देखा, सत्यम् बिल्कुल निश्चित था। शायद वह अबसर वहाँ आया करता था। बाग के अंदर एक कुआँ था, जिसके बाहर एक जंजीर तथा बाल्टी लटकी हुई थी। कुएँ का चौड़ा-सा पाट था। सत्यम् उस पाट पर लेट गया। उसने मुझे भी लेटने को कहा, किन्तु मैं डर रहा था कि कहीं कोई आ न जाय। तभी वहाँ स्कूटर रुकने का स्वर आया। स्कूटर की घर्र-घर्र आवाज से मुझे लगा कि लो, पिताजी आ गये हैं। मेरी रंगत उड़ गई। सत्यम् ने मुझे बताया कि घबराने की कोई बात नहीं, उसका मित्र अमर आया है। सच ही, उसका मित्र अमर अपने एक साथी के साथ वहाँ आया था। मैं हैरान था कि वे स्कूटर कहाँ से ले आए हैं। पता चला कि उनमें से दूसरा लड़का पढ़ाई छोड़कर स्कूटर-मैकेनिक का काम सीखने लगा था। वह अपनी दुकान से स्कूटर लाया था, जो किसी ग्राहक का होगा।

चारों के मध्य मुझे ऐसा अनुभव हुआ, जैसे मैं उनके बीच फँस गया हूँ या मुझे फंसाया जा रहा है। सत्यम् ने अपनी जेब से ताश निकाली। वे ताश खेलने लगे। मैंने उन्हें मना कर दिया। उसके दोनों मित्र मेरे भय को देखकर हँसने लगे। मैं अपमानित-सा, उखड़ा-सा वहाँ बैठा रहा। वे सिगरेट पीते हुए पैसे से खेलने लगे। जुआ का नाम सुनकर मैं घबरा गया।

जब वे दोनों एक घंटे बाद खेलकर स्कूटर पर चले गये, तो सत्यम् ने बतलाया कि उसने उस दिन उनसे पचास रुपये जीते हैं। उसने मुझे फिल्म देखने का वचन दिया। बाग के साथ-साथ ही एक संन्यासी की कुटिया थी। सत्यम् मुझे 'उस कुटिया में ले चला। बोला-वहाँ मोटे-मोटे बेर खाने को मिलेंगे। वहाँ जाकर मुझे बड़ा आनंद आ गया। कुटिया का वातावरण सुंदर, शांत तथा हरियाली से पूर्ण था। वहाँ मैं घास पर बैठ गया। वह उपदेश था- 'एक झूठ बोलने पर, उसे छिपाने के लिए सौ झूठ और बोलने पड़ते हैं। इसलिए समझदार प्राणी को पहले झूठ पर ही रुक जाना चाहिए।' यह पढ़ते ही मेरे मन में उथल-पुथल होने लगी।

दोपहर 12.30 बजे, जब छुट्टी का समय हुआ, हमने पनवाड़ी की दुकान से बस्ता उठाया और घर जा पहुँचे। मेरा मन अब भयभीत नहीं था, बल्कि रुआँस-सा था। मैं उस उपदेश पर सोचे जा रहा था और मन-ही-मन अपने अपराध पर पछता रहा था। आज चेहरे पर वैसी खुशी नहीं थी, जो पहले होती थी। घर पहुँचा तो पता चला कि मामाजी आए हुए हैं और वे मेरा ही इंतजार कर रहे हैं। मामाजी ने मुझे प्यार से उठा लिया, पिताजी ने मुझे प्यार किया, किन्तु अभी भी कुम्हलाया हुआ था। चेहरे पर प्रसन्नता न देखकर मामा ने पूछे- क्या बात है बण्टू ? पिता ने कहा-शायद, आज इसकी तबीयत खराब है। पिता ने मेरी प्रशंसा करते हुए कहा- हमारा बण्टू पढ़ाई में बहुत तेज, सच्चा और ईमानदार बच्चा है। मुझे यह सुनकर लगा कि ये शब्द मेरा उपहास उड़ा रहे हैं। मेरी आत्मा चीत्कार क्र उठी। मेरा शरीर जलने लगा। मैं अंदर के कमरे में भाग गया।

माता ने मेरी तबीयत का हाल पूछा तो मैं फूट-फूटकर रोया और मैंने अपनी गलती पर क्षमा माँगते हुए स्वयं सारी बात माँ को बतला दी। मेरी माँ ने न मुझे मारा, न पीटा। न गाली दी, न डाँटा बल्कि स्नेह से मेरे बाल सहलाती रही और मैं माँ के आँचल से लिपटा रोता रहा। माँ ने बस मुझे यही कहा-बेटा ! रो मत ! मेरे लिए तो आज खुशी का दिन है तू आज जिंदगी की परीक्षा में पास हो गया। तूने आज पाप को हरा दिया है। तेरे जैसे बालक का ये पापी कुछ नहीं बिगाड़ सकते।

2. मेरा भारत महान् ​

[2009A]

मेरा प्यारा देश भारत अपने अतीत में महान गौरवशाली इतिहास समेटे हुए हैं। इसके गर्भ में अनेक प्राचीन संस्कृतियाँ एवं मानव सभ्यता के क्रमिक विकास की गौरवपूर्ण गाथा है, जिससे हम भारतवासी अपनी अद्वितीय आन-बान-शान से विश्व में अग्रणी रहे हैं। भारत की संस्कृति की गणना विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में होती है। संसार को प्रायः सभी संस्कृतियों के नष्ट होने पर भी भारतीय संस्कृति

समय के अनेक झंझावातों और तूफानों के सामने अपनी उच्चता और महानता को अक्षुण्ण रखे हुए हैं। मानव संस्कृति के आदिम ग्रंथ ऋग्वेद की रचना का श्रेय इसी देश को प्राप्त है। इस देश के मनीषी आत्मा और परमात्मा की गुत्थियाँ सुलझानेवाले कोरे दार्शनिक ही नहीं थे, वरन् ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों की गहराई से खोज की। संगीतकला, चित्रकला, मूर्तिकला, स्थापत्यकला में भी हमने बेजोड़ (आश्चर्यजनक) उन्नति की। हमारे देश में उस समय की उच्चकोटि की नगरीय सभ्यता विकसित हो चुकी थी जिस समय संसार का अधिकांश भाग घुमंतू जीवन अपनाए हुए था। सिंधु घाटी की सभ्यता इसका ज्वलंत उदाहरण है। मेरा देश भारत प्रकृति की पुण्य लीलास्थली तथा विश्व का सिरमौर है। माँ भारती के मस्तक पर हिमालय मुकुट के समान, गले में गंगा तथा यमुना हार के समान और दक्षिण में भारत माता के चरणों का हिन्द महासागर निरंतर धोता रहता है। गंगा, यमुना, सतलज, व्यास, गोमती, कावेरी जैसी अनेक नदियों का यह देश अन्न के रूप में सोना उगलता है तथा केवल यहीं पर छः ऋतुएँ आती हैं।

अपने अंतर में संजोए अनेक प्राचीन संस्कृतियों का साक्षी हमारा देश समय-समय पर आने वाली विभिन्न संस्कृतियों, धर्म और सम्प्रदायों को अपने यहाँ आश्रय देता रहा है। यही कारण है कि यहाँ अनेकता में एकता का अद्वितीय उदाहरण मिलता है। विविध आस्थाओं, धार्मिक विश्वासों और सामाजिक जीवन-शैली की अनूठी मिसाल है, यह 'अनेकता में एकता'। मेरा देश भारत सामाजिक-धार्मिक अनेकता (विविधता) को एक सूत्र में पिरोये हैं।

उपरोक्त तथ्यों के संदर्भ में हमारे देश के विषय में निम्नांकित निष्कर्ष उभर कर सामने आते हैं –

  1. अनेक प्राचीन संस्कृतियों एवं मानव सभ्यता का केन्द्र।
  2. महान गौरवशाली इतिहास का भंडार।
  3. आध्यात्मिक, दार्शनिक तथा ज्ञानी-विज्ञानी विभूतियों एवं मनीषियों की कर्मभूमि ।
  4. अपूर्व प्राकृतिक शोभा, छः ऋतुओं एवं प्रचुर मात्रा में अन्न उत्पन्न करने वाली उर्वरा धरती।
  5. अनेकता में एकता के अनुपम उदाहरण का पावन एवं महापरम्पराओं वाला हमारा देश संसार में एकमात्र मिसाल है।

अपनी देश की गौरवमयी परम्पराओं तथा वैभवशाली इतिहास को अक्षुण्ण बनाने हेतु यही निश्चय करें –

जिएँ तो सदा इसी के लिए, यही अभिमान रहे, यह हर्ष।।
निछावर कर दें हम सर्वस्य, हमारा प्यारा भारतवर्ष।

तो निश्चित रूप से भारत, उन्नति के शिखर पर अग्रसर होता चला जाएगा।

3. पर्यटन का महत्व ​

[2009A]

पर्यटन का अर्थ है-घूमना, टहलना, दूर-दूर की यात्रा करना, दर्शनीय स्थानों तक जाना, धार्मिक स्थलों तक जाना, पहाड़ों, नदियों, समुद्र एवं प्राकृतिक स्थलों तक घूम आना। देश-विदेश तक घूमना भी पर्यटन के ही अंतर्गत आता है। कुछ लोग हमेशा देशाटन-विदेशाटन करते रहते हैं तो अन्य घर से निकलते ही नहीं। पर्यटन जिंदगी को हरा-भरा, प्रसन्नता-प्रफुल्लता भरा बनाता है। जिंदगी जीने का कुछ अर्थ समझ में आने लगता है। किसी ने ठीक ही लिखा है –

"सैर कर दुनिया की गाफिल,
जिन्दगानी फिर कहाँ ?
जिन्दगी गर रही तो
नौजवानी फिर कहाँ?"

अर्थात् पर्यटन हमें दुनिया भर का करना चाहिए। यह मनुष्य की जिंदगी बार-बार नहीं मिलती है। जिंदगी यदि बची रही तो जवानी, जोश घूमने का जोश शेष नहीं रहता है। डायबिटीज एवं हृदयरोग से ग्रस्त मानव पर्यटन करने में सक्षम नहीं रहता है। बीस वर्ष से पचास वर्ष तक की आयु पर्यटन के लिए उपयुक्त मानी गयी है। स्त्रियों के लिए यह उम्र चालीस वर्ष ही हो सकती है।

पर्यटन का मनुष्य जीवन में बड़ा महत्त्व हैं। पढ़ने-लिखने वाले लोगों के लिए यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। घूमने से अक्ल खुलती है। घूमने से दुनिया की विविधता देखते ही बनती है। मनुष्य, पशुओं का व्यवहार और प्रकृति का नजारा देखते ही बनता है। पुस्तकों में तो मात्र 25% सांसारिक ज्ञान ही मिलता है। पर्यटन से 75% आँखें खुलती हैं। सभ्य मानवों का सह व्यवहार और असभ्य मानवों के

जंगलीपन का अंतर देखते ही बनता हैं। पढ़े-लिखे लोगों में भी जंगली मिल ही जाते हैं।

  • शिक्षा का अर्थ है – व्यक्तित्व में सुधार।
  • शिक्षा का अर्थ है – व्यक्तित्व में परिवर्तन ।
  • शिक्षा का अर्थ है – गुणवत्ता में वृद्धि।
  • शिक्षा का अर्थ है – सामंजस्य की भावना का विकास।
  • शिक्षा का अर्थ है – पढ़ने की वैज्ञानिक पद्धति अर्जित करना।
  • शिक्षा का अर्थ है – पढ़ाने की कलापूर्ण विधि का उपयोग।
  • शिक्षा का अर्थ है – संघ का निर्माण।

यह सब गुण मनुष्य पर्यटन से आसानी से सीख जाता है। उसकी गुणवत्ता बढ़ जाती है और निर्गुणता समाप्त हो जाती है। पर्यटन किया व्यक्ति कभी भी गाली-गलौज नहीं करता है। कूप मंडूक हमेशा गुस्से में ही रहता है। पर्यटन से आँखें तृप्त हो जाती हैं। पर्यटन से बुद्धि उत्कृष्ट हो जाती है। पर्यटन से जीवन आनंदमय हो उठता है। जिसने पर्यटन नहीं किया वह जीवन के आनंद से वंचित रह गया।

भारत में पर्यटन के विकास की बड़ी संभावनाएँ मौजूद हैं। अभी तो लोग मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा तक ही घूमते हैं। कश्मीर देखने भी लोग पहुँच जाते हैं। भारतवर्ष में अनंत पर्यटन स्थल एवं दर्शनीय स्थल हैं। मौसम भी भिन्न-भिन्न तरह के यहाँ एक ही समय में मिल जाते हैं। अभी कुछ सम्पन्न वर्ग ही इसका फायदा उठाते हैं। सभी वर्ग के लोगों को घूमना चाहिए। सस्ती ट्रेनें हर जगह जाती हैं। महँगे हवाई जहाज हर जगह जाते हैं। सड़क हर जगह के लिए बनी हुई हैं। इन सुविधाओं का लाभ पर्यटन में रुचि रखने वालों को उठाना चाहिए। पर्यटन से जीवन बदल जाता है। पर्यटन से जीवन प्रफुल्ल-प्रसन्न हो उठता है।

सर्वाधिक पर्यटन का लाभ विकसित राष्ट्रों के नागरिक ही उठाते हैं। उनमें पर्यटन का जोश और जज्बा होता है। हाँ, उनकी जेबों में पैसे भी होते हैं। भारत में भी ये विदेशी पर्यटक लाखों की संख्या में आते हैं। मोक्ष की कला वे सीखते हैं। वे विभिन्न देशों की भाषाएँ भीं सीख जाते हैं।

बचपन में की गयी यात्राएँ शैक्षिक होती हैं। वयस्क का पर्यटन अनुभव होता है। पर्यटन अद्भुत यात्राएँ हैं। हम अद्भुत और आश्चर्यजनक स्थलों तक उड़कर पहुँच जाते हैं। हम घर का सुख छोड़कर निकल जाते हैं। अधिक समय और पैसे खर्च करते हैं। हमें एक पहाड़, एक समुद्र, एक नदी कम-से-कम अवश्य घूमना देखना चाहिए। मूर्ख केवल यात्राएँ करते हैं, बुद्धिमान लौटकर घर आ जाते हैं। घूमकर देखना महत्त्वपूर्ण है, न कि केवल कहना कि घूमने जा रहे हैं। एक अच्छा पर्यटक वह है जिसे मालूम नहीं कि उसे कहाँ जाना है, उससे भी अच्छा पर्यटक वह है जिसे वह मालूम नहीं कि वह कहाँ से आया है। मानव संसार की यात्राएँ अपनी खोज पूरी करने के लिए करता है और घर लौटकर उन्हें पूरी करता है। हम जिस देश में पर्यटन करने जा रहे हैं, उस देश की भाषा पहले ही सीख लेनी चाहिए। पहले लोग पर्यटन धर्म के लिए करते थे, अब पर्यटन ही उनका धर्म हो गया है। पर्यटन ज्यादा महत्त्वपूर्ण है, पहुँचने की तुलना में हमें केवल बिल्लियाँ गिनने के लिए पर्यटन नहीं करना चाहिए।

समासतः हम कह सकते हैं। पर्यटन का महत्त्व मनुष्य जीवन में बहुत है। चाहे सूचनाओं की अपेक्षा या शिक्षा की या मनोरंजन की, सभी हम पर्यटन से पाते हैं। वे देश जिंदा है जिन्होंने पर्यटन का महत्त्व समझा है। वे देश जिंदादिल है जिन्होंने पर्यटन किया है और वे देश मुर्दा हैं जिन्होंने पर्यटन नहीं किया। जिंदगी जिंदादिली के साथ जीने का नाम हैं। किसी ने ठीक ही लिखा है- जिंदगी जिंदादिली का नाम है। मुर्दादिल खाक जिया करते हैं।

4. मेरे प्रिय कवि ​

[2009A, 2012A, 2013A, 2014A, 2018A]

आधुनिक काल के हिंदी कवियों में मैथिलीशरण गुप्त का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनका जन्म चिरगाँव (जिला-झाँसी, उत्तर प्रदेश) में 1883 ई० में हुआ था। उनके पिता का नाम सेठ रामचरण था, जो एक धनसंपन्न वैष्णव थे। मैथिलीशरण गुप्त को काव्य-प्रतिभा पैतृक संपत्ति अथवा विरासत के रूप में प्राप्त हुई। आपके पिता श्री 'कनकलता' उपनाम से कविता किया करते थे। मैथिलीशरण गुप्त को बचपन से ही कविता करने का शौक था। प्रारंभ में वह ब्रजभाषा में कविता करते थे, परंतु बाद में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के

प्रभाववश खड़ी बोली में कविता करने लगे। गुप्तजी ने अपनी रचनाओं द्वारा इस आरोप को झुठला दिया कि खड़ी बोली अपनी खड़खड़ाहट के कारण कविता की भाषा नहीं बन सकती है। उनकी सरस कविताओं ने यह सिद्ध कर दिया कि ब्रजभाषा के समान खड़ी बोली में नी सरस एवं कर्णप्रिय कविता लिखीं जा सकती है। 1906 ई० से गुप्तजी की कविताएँ आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित मासिक पत्रिका 'सरस्वती' में प्रकाशित होने लगी थीं।

पूर्ण आयु एवं अनेक मान-सम्मान प्राप्त करने के उपरांत आप 1964 ई में स्वर्गवासी हुए।

गुप्तजी की प्रकाशित मौलिक रचनाओं की संख्या लगभग 52 है। इसके अलावा कई अनुवादित ग्रंथ भी हैं। आपकी प्रसिद्ध काव्य-कृतियाँ हैं– भारत- भारती, जयद्रथ-वध, साकेत, यशोधरा, पंचवटी, द्वापर, वैतालिक, अनघ, नहुष, सिद्धराज, विकट भट तथा विष्णुप्रिया।

राष्ट्रीय भावना और भारतीय संस्कृति के प्रति अविचल निष्ठा आपकी कविता की प्रमुख विशेषताएँ हैं। अपनी प्रथम रचना 'भारत-भारती' द्वारा उन्होंने देशवासियों का ध्यान भारत के अतीत के गौरव एवं वर्तमान की दुर्दशा की ओर आकृष्ट करके पराधीनता की बेड़ियों से मुक्त होने की प्रेरणा प्रदान की। उसके बाद 'वैतालिक' के गीतों द्वारा आपने एक सच्चे वैतालिक के रूप में भारतवासियों की मोहनिद्रा भंग की और उन्हें प्रगति की ओर उन्मुख किया। राष्ट्रीयता द्वारा समस्त रचनाओं के ओत-प्रोत होने के कारण 1936 ई० में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने गुप्तजी को राष्ट्रकवि की उपाधि से विभूषित किया।

गुप्तजी की काव्य-प्रतिभा की सबसे बड़ी विशेषता है-कालानुसार काव्य- सृजन की क्षमता अर्थात् उत्तरोत्तर बदलती हुई भावनाओं और काव्य-प्रणालियों को ग्रहण करते चलने की शक्ति। समाज के दलित, शोषित, पतित एवं निम्न वर्ग की समानता एवं प्रतिष्ठा के लिए गुप्तजी की पुकार सर्वोपरि है। नारी की महत्ता और उपेक्षा के प्रति गुप्तजी की दृष्टि सदा मार्मिक रही है। इसलिए 'द्वापर' में गुप्तजी ने नारी की महत्ता को प्रतिपादित किया है तथा 'यशोधरा' में उसकी दुर्दशा पर आँसू बहायें हैं –

"अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।"

गुप्तजी जगत् और जीवन के व्यक़्त क्षेत्र में महत्त्व और सौंदर्य का दर्शन करने 1. वाले तथा अपने प्रभु राम को लोक के बीच अधिष्ठित करने वाले कवि हैं। उन्होंने अपने विभिन्न काव्यों में भारत के अतीत का गौरवगान गाया है तथा पौराणिक एवं ऐतिहासिक विभूतियों का ही मुख्यतः अंकन किया है।

हिंदी के आधुनिक कवियों में गुप्तजी का क्षेत्र सबसे अधिक व्यापक एवं विस्तृत रहा है। उन्होंने अपने युग की लगभग सभी काव्य-धाराओं, शैलियों, धार्मिक, सांस्कृतिक समस्याओं तथा समस्त विषयों एवं काव्यरूपों को अपनाया है। इसी कारण उन्हें युग का प्रतिनिधि और राष्ट्रकवि कहा जाता है। उन्होंने काव्य के प्राचीन विषयों को द्विवेदीयुगीन नैतिकता का जामा पहनाकर नये मानववादी रूप में प्रतिष्ठित किया, राष्ट्रीय चेतना से अनुप्राणित होकर देश के अतीत का गौरवगान किया और देश की वर्तमान दुर्दशा पर क्षोभ, ग्लानि और आक्रोश प्रकट किया। गाँधीवाद का प्रभाव ग्रहण कर उन्होंने सांप्रदायिक एकता, सत्य और अहिंसा का प्रतिपादन किया। कवीन्द्र रवीन्द्र के मानवतावाद से प्रभावित हो करुणा, त्याग आदि के गीत गाये। कहने का तात्पर्य यह कि गुप्तजी के काव्य में हमें धर्म, समाज, राजनीति तथा साहित्य प्रत्येक प्रकार की युगानुकूलता के दर्शन होते हैं, इसलिए वे मेरे प्रिय कवि हैं।

5. शहरी जीवन ​

[2009A]

शहरी जीवन से तात्पर्य उस जीवन शैली से है जो जीवन की समस्त मूलभूत आवश्यकताओं को पूर्ण करने की क्षमता से युक्त हो। आकर्षक एवं विलासितापूर्ण जीवन के प्रति यह मानव की सहज एवं स्वाभाविक प्रवृत्ति है। शहरी जीवन इसका प्रतिनिधित्व करता है।

सभ्यता के आदिकाल से ही मानव द्वारा कबीलों तथा टोलों का निर्माण निरंतर होता रहा है। अधिक सुविधासंपन्न केन्द्रों का उत्तरोत्तर विकास होता रहा। कालांतर में इनमें इनके कबीले तथा केन्द्र नगरों में रूपांतरित हो गए। अधिकाधिक सुविधाओं का विकास किया गया।

शहर का वातावरण अत्यंत व्यस्त होता है। चौड़े राजपथ, तीव्र गति में दौड़ती कारें, रिक्शा, टमटम, ठेला इत्यादि विभिन्न प्रकार के वाहन, ऊँचे-ऊँचे मकान,

आकर्षक बाजार शहरी जीवन की विशेषता है। बैंक, डाकघर, सरकारी कार्यालय, शिक्षण संस्थान, यह सारी सुविधाएँ यहाँ उपलब्ध हैं।

शहरी जीवन में यदि एक ओर जीवन की अनेकानेक सुविधाओं की आपूर्ति होती है। आय प्राप्ति के अनेक साधन हैं, वहीं दूसरी ओर अनेक प्रकार की विकृतियाँ तथा असमानताएँ भी हैं। यदि हम इसकी तुलना ग्रामीण जीवन से करते हैं तो दोनों जीवन पद्धतियों में काफी अंतर है। शहरी जीवन कोलाहलपूर्ण है, प्रत्येक व्यक्ति मानसिक रूप से अशांत है, अपने निजी स्वार्थ में लिप्त है। शहरी वातावरण प्रदूषित है, शहर में निवास करने वाले अनेकों रोगों से आक्रांत हैं तथा मानसिक रूप से अशांत रहते हैं। ग्रामीण जीवन सात्विक है। जीवन में शांति तथा सौम्यता है, शुद्ध पर्यावरण उपलब्ध है। छल कपट तथा अन्य कुप्रवृत्तियों से प्रायः मुक्त जीवन ही ग्रामीण जीवन की विशेषता है। मानवीय संवेदनाएँ वहाँ सहज रूप से देखी जा सकती हैं।

यदि हम शहरी जीवन की विवेचना करते हैं तो इसमें निम्नांकित विशेषताएँ परिलक्षितं होती हैं।

शहरी जीवन के दोष – (i) प्रदूषित वातावरण, (ii) व्यस्त एवं अशांत जीवन, (iii) मानवीय संवेदना का अभाव, (iv) अपने निजी स्वार्थ की पूर्ति तथा सामाजिक दायित्व का अभाव, (v) भ्रष्टाचार, झूठ, कपट आदि का बोलवाला, (vi) स्वस्थ तथा नैतिक जीवन शैली का अभाव आदि।

दूसरी ओर शहरी जीवन राष्ट्र निर्माण की सुदृढ़ आधारशिला भी है। जैसे – (i) बड़े-बड़े उद्योग - धंधों, कल-कारखानें तथा व्यापार का केन्द्र, (ii) शिक्षण तथा ज्ञान-विज्ञान का केन्द्र, (iii) सुविधा एवं ऐश्वर्यपूर्ण जीवन की आधारशिला, (iv) जीवन के सभी क्षेत्रों की मूलभूत प्रगति का केन्द्र, आदि।

इस प्रकार शहरी जीवन की उपलब्धियों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि शहरी जीवन राष्ट्र की धड़कन है। शहरी जीवन की बुराइयों को हमें युद्ध स्तर पर मिटाना चाहिए। इस प्रकार शहरी जीवन एक आदर्श जीवन होगा।

6. यदि मैं प्रधानमंत्री हो जाऊँ ​

[2010A]

भारतीय शासन प्रणाली में प्रधानमंत्री की भूमिका उस केन्द्र की तरह है जिसके साथ सम्पूर्ण राष्ट्र की छवि प्रतिबिम्बित होती है। उसके स्वर तथा सोच में भारत की आत्मा अनुगूंजीत होती है। भारत का प्रधानमंत्री एक व्यक्ति नहीं, बल्कि सम्पूर्ण देश का केन्द्रीय शक्ति और भारतीय सभ्यता, संस्कृति तथा दर्शन का प्रतिनिधि होता है। वह भारतीय लोकतंत्र और अन्तर्राष्ट्रीयतावाद का प्रतीक, राष्ट्र के विकास, मजबूती तथा सामाजिक न्याय का नायक और राष्ट्रीय गौरव का आदर्श होता है।

भारतीय प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी राष्ट्र को व्यवस्था देने और राष्ट्र के उग्रवादी तथा राष्ट्रविरोधी शक्तियों की पहचान करवाना, उनके उत्पन्न होने के कारणों की खोज करना फिर उन्हें जड़ मूल से नष्ट करना है।

अगर मैं प्रधानमंत्री बन जाऊँ, तो देश की विशाल जनता के लिए कम-से-कम एक मूल सुविधा की उपलब्धि को सुनिश्चित करता है। ऐसी योजनाएँ तथा कार्यक्रम तैयार किए जाते, जो भारत की ग्रामीण जनता को रोजगार, भोजन, वस्त्र, आवास और शिक्षा की न्यूनतम आवश्यकता की पूर्ति को सुनिश्चित करते। इसके लिए वृहत् तथा ग्रामीण उद्योगों को एक दूसरे का पूरक बनाने, कृषि के विकास के लिए प्राथमिकता, योजनाओं के निर्माण को ज्वालामुखी तथा विकेन्द्रित ढाँचा देने का कालबद्ध कार्य योजना तैयार करवाता तथा उन्हें सख्ती से क्रियान्वित करता।

मेरे प्रधानमंत्री होने की स्थिति में कृषि, उद्योग और व्यापार को देश की आवश्यकता आधारित संतुलन के अन्तर्गत लाया जाता। देश का औद्योगीकरण तेजी से होता, कृषि को उद्योग का दर्जा देकर जीविकोपार्जन से आगे लाभप्रद क्षेत्र के रूप में परिणत किया जाता। मैं भारत में एक ऐसी श्रम-संस्कृति का सृजन करता जिसमें श्रम का सम्मान होता।

मेरे प्रधानमंत्री होने का मकसद जनजन को गरीबी दासता से मुक्त कराना होता। इसके लिए देश में उत्पादन साधनों का विकास विशाल पैमाने पर किया जाता। हर हाथ को काम तथा काम के अनुसार दाम मुहैया करना मेरे प्रधानमंत्री होने का पर्याय बना दिया जाता। देश में खेल संस्कृति का विकास करता और एक ऐसे वातावरण का निर्माण करता, जहाँ खेल खेलने के लिए होता।

अन्त में, मेरे प्रधानमंत्री बनने का अर्जी होता सुखी, समृद्ध, समुन्नत और शक्तिशाली भारत जिसमें सबके विकास के समान अवसर तथा सुविधाएँ उपलब्ध

होता, मेरे शासन में न तो उग्रवाद का अस्तित्व होता और न भ्रष्टाचारी प्रशासन की आँखों के तारे होते, नारियाँ नहीं सतायी जातीं और न ही उन्हें दहेज के लिए जलाया जाता, न ही दूध के लिए कोई बच्चा तरसता, न ही भूख से किसी की जान जाती। सर्वेभवन्तु सुखिनः का राज्य मेरे प्रधानमंत्री का लक्ष्य होता।

7. मेरे सपनों का भारत ​

[2010A]

अर्थ – मेरे सपनों का भारत से तात्पर्य है-मेरी कल्पना का भारत। मैं कैसा भारत चाहता हूँ, कौन-कौन-से सुखद परिवर्तन चाहता हूँ, कौन-कौन-से दोषों का उन्मूलन चाहता हूँ। यही इस निबंध का आशय है। यहाँ 'सपना' का अर्थ 'नींद में देखा हुआ स्वप्न' नहीं, बल्कि 'सोच-समझकर की गई इच्छा' है।

नेतृत्व संबंधी स्वप्न – यद्यपि सपने सच नहीं होते, तो भी उनका महत्त्व आवश्यक है। मैं जब भी भारत के भविष्य पर विचार करता हूँ तो मेरी दृष्टि सर्वप्रथम अपने देश के नेतृत्व पर जाती है। मैं कल्पना करता हूँ कि मेरे भारत का नेतृत्व अत्यंत तेजस्वी होगा। वह चाणक्य या राम के समान प्रजा का हितरक्षक होगा। वह अपने त्यागमय व्यवहार के बल पर जनता में आदर्श की प्रतिष्ठा करेगा। वह प्रधानमंत्री बनकर भी संयम की जीवन जिएगा। 'जासु राज प्रिय दुखारी। सो नृप अवस नरक अधिकारी।'- यह उसका आदर्श होगा। उसके राज्य में सबको न्याय मिलेगा। सभी नागरिक अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार विकास का अवसर पा सकेंगे। सरकारी नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद, जातिवाद, प्रांतवाद बिलकुल न होगा। केवल योग्य व्यक्ति चुने जाएँगे। प्रतिभा का पूरा सम्मान होगा। विश्वविद्यालयों के पदक प्राप्त छात्रों को स्वयमेव नियुक्ति मिलेगी। सरकारी अफसरशाही पर शासन के दंड का भय होगा। अतः वे चरित्रवान, ईमानदार और कर्मठ होंगे। भ्रष्टाचार का नामोनिशान मिट जाएगा। छात्र परीक्षा में नकल करने की बात भी मन में न लाएँगे। वे उत्तीर्ण होने के लिए घोर परिश्रम करेंगे। इसलिए विश्वविद्यालयों में स्पर्द्धा, प्रतियोगिता और स्वाध्याय का वातावरण होगा। नित्य वाद-विवाद, भाषण, चर्चाएँ, प्रदर्शनियाँ लगेंगी। तब इस मिट्टी का आम आदमी ईमानदार प्रक्रिया से गुजर कर उच्चतम पद को प्राप्त कर सकेगा। लक्ष्मी पर सरस्वती का कड़ा पहरा होगा। विद्वानों का खूब सम्मान होगा। पैसा धक्के खाता फिरेगा। तब न डिग्रियाँ बिकेंगी, न नियुक्तियाँ बिकेंगी और न विधायक-सांसद बिकेंगे। गबन, घपले, घोटाले केवल इतिहास में पढ़ाए जाएँगे।

समृद्ध जन-जीवन – मैं कल्पना करता हूँ कि भारत का सामाजिक और आर्थिक जीवन सुख-समृद्ध होगा। यद्यपि जाति-भेद, वर्ग-भेद और पद-भेद बने रहेंगे, तो भी उसमें परस्पर संघर्ष न होगा। ऊँची जाति के लोग नीची जाति के लोगों के विकास और उत्थान का मार्ग प्रशस्त करेंगे। अमीर गरीबों के साथ सहयोग का व्यवहार करेंगे। अधिकारी और सेवक में युद्ध न होगा। समूचा देश उन्नति के पथ पर अग्रसर होता दिखाई देगा। देश में कोई भूखा न सोएगा। कोई बालक अनपढ़ न रहेगा। लोगों के जीवन में खुशहाली होगी। उनके पास टी० वी०, फ्रीज, स्कूटर-कार जैसे साधन सुलभ होंगे। घर-घर में टेलीफोन होगा। मकान साफ-सुथरे और स्वच्छ होंगे। उनके वस्त्र परिधान आदि रुचिपूर्ण होंगे।

मैं समझता हूँ कि निकट भविष्य में भारत परिवहन, संचार और ऊर्जा के क्षेत्र में अद्भूत उन्नति करेगा। सड़कें जगह-जगह से ऊँची-नीची नहीं होंगी। रेलें द्रुतगति से चलेंगी। बिजली इंजन और मेट्रो रेलों का जाल बिछा जाएगा। तब यात्रा द्रुत और सुखद बन जाएगी। हवाई टैक्सियों का तीव्र विकास होगा। ऊर्जा के क्षेत्र में विश्व मुँह ताकने वाला भारत अब विश्व का अग्रणी देश होगा। भारत सौर ऊर्जा का सिरमौर होगा। जिस प्रकार अरब देशों ने पेट्रोल से अथाह धनराशि अर्जित की है, उसी तरह भारत ऊर्जा के द्वारा अरबों-खरबों की विदेशी मुद्रा कमाएगा। यहाँ की बसें, कारें, स्कूटरों, साइकिलें, घर की बिजलियाँ और यहाँ तक कि रसोई का तवा भी सौर ऊर्जा से गर्म होगा।

पारिवारिक संबंध – मेरा सपना है कि मेरे देश की परिवार व्यवस्था न टूटे। माँ-पुत्र, भाई-बहन, मामा-भांजा, चाचा-भतीजा, देवर-भाभी, दादा-पोता आदि के मधुर रिश्ते बने रहें। पति-पत्नी के संबंध अक्षुण्ण बने रहें। परंतु इस दिशा में मेरे सपने टूटने लगते हैं। मुझे लगता है, चाहकर भी ये आपसी संबंध बन न सकेंगे। अब पारिवारिक संबंधों की मधुरता की बजाय मैत्री संबंधों में अधिक सरसता होगी। सीमित परिवारों के कारण भरे-पूरे रिश्ते नहीं रहेंगे। इसलिए आदमी अकेला-दर-अकेला होता चला जाएगा। प्रगति की चाह में मनुष्य अपने व्यवसाय को प्रेम करने लगेगा, प्रियजनों को नहीं। व्यावसायिकता पारिवारिक संबंधों में बिखराव ला देगी।

आने वाले समय में मनुष्य की स्थिति विचित्र त्रास से भरी होगी। एक ओर सड़कों पर कंधा रगड़ती भीड़ होगी, दूसरी तरफ वह अकेला होगा। चाहकर भी मैं भारत में भीड़ को घटता नहीं देख पाता। भारत इतनी विस्फोटक स्थिति में पहुँच चुका है कि वर्तमान जनसंख्या का भविष्य भयानक प्रतीत होता है। यद्यपि लोगों के पास धन भी होगा, साधन भी होंगे, परंतु साँस लेने के लिए खुला वातावरण और पाँव रखने के लिए जमीन की कमी होगी। तब लोग बहुमंजिली इमारतों की शरण में जाएँगे। अतः जीवन में कृत्रिमता और लाचारी बढ़ेगी।

धार्मिक कट्टरता – मैं चाहता हूँ कि भारतवर्ष धार्मिक कट्टरता से मुक्त हो। शिक्षा के विकास के साथ-साथ निश्चय ही धार्मिक मतांधता कम होगी, परंतु नाश नहीं होगा। धार्मिकता की जड़ें यहाँ बहुत गहरी हैं। इसलिए मेरी कल्पना है कि धीरे-धीरे यहाँ धार्मिक सौहार्द्र का वातावरण बढ़ेगा, आपसी समझ बढ़ेगी। लोग राजनीतिज्ञों की कुचालों को समझेंगे। इसलिए परस्पर टकराव की स्थितियों से बचाव होता रहेगा।

व्यापार में वृद्धि – भारत इक्कीसवीं शताब्दी में विश्व की महान व्यापारिक शक्तियों में गिना जाएगा। यहाँ की भू-गर्भित संपदाओं का कुशलतापूर्वक उपयोग किया जाएगा। परिणामस्वरूप विश्व व्यापार में भारत की सम्माननीय भूमिका होगी। विज्ञान के क्षेत्र में भी भारत एक महाशक्ति बन जाएगा। सर्वाधिक गौरव की बात यह होगी कि शक्तिशाली होते हुए भी भारत विश्व-शांति का अग्रणी शांतिदूत बना रहेगा।

8. भ्रष्टाचार का दानव ​

[2010A, 2017A]

भ्रष्ट + आचार = भ्रष्टाचार। आज शासन और समाज पर इतना हावी हो गया है कि इससे मुक्ति पाना असम्भव प्रतीत हो रहा है। स्वतंत्रता के बाद भ्रष्टाचार का बोलबाला निरन्तर बढ़ता गया और हमारे शासन और समाज में यह रोग इतना व्यापक हो गया है कि इसका इलाज निकट भविष्य में सम्भव नहीं दिखता। स्वतंत्रता के पहले भ्रष्टाचार मात्र समाज में और वह भी संकुचित सीमा से व्याप्त था, किन्तु स्वतंत्रता के बाद प्रशासन तंत्र में इसकी इतनी वृद्धि हो गयी कि पूरा प्रशासनिक ढाँचा भ्रष्टाचार पर स्थिर हो गया। आये दिन समाचारपत्रों में भ्रष्टाचार संबंधी खबरें भरी रहती हैं। अमुक नेता पर भ्रष्टाचार का गम्भीर अभियोग, अमुक मंत्री के भ्रष्टाचार का भंडाफोड़, शासकीय दल के नेता ने भ्रष्टाचार का परिचय दिया आदि। विधान-सभाओं और लोकसभा में भी विरोधी दल के सदस्य शासकों के भ्रष्टाचार की गुहार मचाते हैं। अप्रकट रूप में भ्रष्टाचार इतना स्पष्ट और व्यापक हो गया है कि शासन वर्ग भी इससे इनकार नहीं कर सकता। एक बार बिहार के मुख्यमंत्री को भी कहना पड़ा था कि भ्रष्टाचार हमारा राष्ट्रीय अंग बन गया है।

अब शासक वर्ग भ्रष्टाचार में बुरी तरह लिप्त हैं। मंत्रीगण घूस या चन्दा लिये बिना काम नहीं करते। अपने भाई-भतीजे को ठेका देते हैं, उन्हें ऊँचे-ऊँचे ओहदे देकर लाभान्वित करते हैं, ठेकेदार से मोटी रकम ऐंठते हैं। जब शासक वर्ग का यह हाल है तो ऑफिसर वर्ग का क्या कहना, जिसे नैतिकता और आदर्श से कुछ लेना-देना नहीं है। वे मनमानी करने, घूस बटोरने के लिए पहले ही बदनाम हैं; अतः भ्रष्टाचार की बहती गंगा में हाथ धोने से वे बाज क्यों आएँ। जब उनका बॉस ही भ्रष्टाचार में बुरी तरह लिप्त है तो उन्हें तो भ्रष्टाचार करने या फैलाने में पूरी सुविधा प्राप्त है।

एक चपरासी की बहाली के लिए मोटी रकम माँगने और लेने में उसे भय क्यों लगे। नौकरी लेनी है तो घूस दो, सप्लाई करनी है तो घूस दो। बल्कि घूस की जगह अब कमीशन चला है, परसेंटेज (प्रतिशत) 20%, 25%, 30%। ठेका लेने के लिए पहले ठेकेदार को तय कर देना पड़ता है कि साहब का इतना प्रतिशत और ऑफिस का इतना प्रतिशत। किसी सरकारी विभाग में किसी चीज की सप्लाई का ऑर्डर या रुपये का एलॉटमेण्ट तभी कराया जाता है जब सप्लायर यानी आपूर्तिकर्ता परसेंटेज देना तन कर देता है। पहले चाय-पान के नाम पर किरानी को खुश कर दिया जाता था, किन्तु अब स्पष्टतः परसेंटेज तय किया जाता है और दुगुनी-तिगुनी दाम बढ़ाकर सप्लाई की जाती है। पहले डर-डरकर भ्रष्टाचार किया जाता था। भ्रष्टाचारी ऑफिसर किरानी या मंत्री ऊँगली पर इने-गिने होते थे, किन्तु अब ईमानदार किरानी, ऑफिसर और मंत्री दीपक से ढूँढने पर मुश्किल से मिलते हैं। जो ईमानदार हैं भी यदि वे भ्रष्टाचार में शामिल नहीं होते तो उनकी बंदी कर दी जाती है, उन्हें सस्पेंड कर दिया जाता है अथवा उनके कार्यक्रम को ठीक से कार्यान्वित नहीं किया जाता है।

शासन में तो पूरी तरह भ्रष्टाचार व्याप्त आये दिन छूरेबाजी, लूट, राहजनी, बलात्कार आदि की घटनाएँ होती हैं। खाद्य पदार्थों में सेठ-व्यापारियों द्वारा तेजी से मिलावट की जा रही है, मगर देखने वाला कोई नहीं है। सेक्स स्कैण्डल का कहना क्या-वेश्यावृत्ति, शराबखोरी, जुआबाजी, जमीन हड़प, पत्नी हड़प आदि खबरों से समाचार-पत्र भरा रहता है।

भ्रष्टाचार का उन्मूलन आज सम्भव नहीं दीखता है। जबतक शासनतंत्र से भ्रष्टाचार का उन्मूलन नहीं होगा तबतक मंत्रियों का चरित्र निर्मल नहीं होगा, जबतक नेताओं में राष्ट्रीयता नहीं होगा, तबतक चरित्र का निर्माण न होगा तबतक न तो शासन से ही भ्रष्टाचार जायेगा और न समाज से ही। जितने बड़े गुण्डे, चोर, भ्रष्टाचारी, अनपढ़ तथा असामाजिक तत्त्व हैं, वे सब अब चुनाव में खड़े होकर मंत्री बनने के लिए प्रयास करते हैं और उन्हें सफलता भी मिलती है। इस प्रकार शासनतंत्र पर ऐसे अवांछित वर्ग का प्रभुत्व हो गया है और निकट भविष्य में राष्ट्रीय चरित्र का एक भी व्यक्ति शासक रूप में नजर नहीं आएगा। अतः भ्रष्टाचार के सहयोग का उन्मूलन असंभव है। जबतक हमारे देश में कोई क्रांतिकारी सरकार सत्ता में स्थापित नहीं होती है तबतक भ्रष्टाचार का किसी के लिए रोकना लोहे के चने चबाना है। अभी तो सभी चोर-चोर मौसेरे भाई बने हुए हैं। भ्रष्टाचारियों के मिली भगत से शासन और समाज का संचालन हो रहा है। बिल्ली के हाथ में दही का मटका है। फिर शिकायत किससे ? आवश्यकता है कि हम वैयक्तिक जीवन में अधिक-से-अधिक नैतिक बनें।

9. राष्ट्रीय जीवन में समाचार पत्रों का महत्त्व ​

[2010A]

देश-विदेश की खबरें पहुँचाने वाले साधन को समाचार पत्र कहते हैं। देश या विदेश में होने वाली प्रतिदिन की घटनाओं का परिचय हमें समाचारपत्रों से बड़ी आसानी से, कम-से-कम खर्च में हो जाती है। दूसरे देशों में, कल क्या हुआ या आज क्या हो रहा है, इन सारी बातों का ज्ञान हमें समाचारपत्रों से ही होता है। अतः समाचार-पत्र आज एक बड़ी शक्ति है जिसके बिना हमारा ज्ञान अधूरा है।

कहा जाता है कि समाचार पत्र का जन्म सबसे पहले चीन में ही हुआ था, क्योंकि छपाई का काम पहले-पहल वहीं आरंभ हुआ। कुछ लोग समाचारपत्र की जन्मभूमि इटली के रोम शहर को बतलाते हैं। आज से चार सौ वर्ष पहले इटली के वेनिस नगर में समाचारपत्र का जन्म हुआ था। सत्रहवीं शताब्दी में इसका प्रचार सारे यूरोप में हो चुका था। भारत में समाचारपत्र का श्रीगणेश अठारहवीं शताब्दी में यहाँ के शासक अंग्रेजों द्वारा हुआ। फिर देखते ही देखते सारे भारत में इसकी बाढ़ सी आ गयी। इस समय भारत की भिन्न-भिन्न भाषाओं में ग्यारह सौ के लगभग दैनिक और लगभग छः हजार साप्ताहिक पत्र छपते हैं। इनमें सबसे अधिक पत्र हिन्दी में ही प्रकाशित होते हैं। इनकी संख्या 367 है। अंग्रेजी में कुल 105 दैनिक समाचारपत्र छपते हैं। साप्ताहिक पत्रों में भी सबसे अधिक संख्या हिन्दी की है। हिन्दी में 235, अंग्रेजी में 290 और बाकी अन्यान्य भाषाओं में।

समाचार-पत्र एक बड़ी शक्ति है। इससे बड़े-बड़े नेता भी घबराते हैं। यह कभी-कभी बड़ी-बड़ी सरकारों को भी उखाड़ फेंकता है। कभी जनता में क्रांति की लहर फैलाता और अच्छी सरकार की स्थापना में मदद भी करता है। समाचारपत्र एक योग्य शिक्षा का भी काम करता है। यह हमें घर बैठे देश-विदेश की बातें बतलाता है। हमारी भलाई के नये-नये सुझाव देता है और हमारा व्यावहारिक ज्ञान विकसित करता है। इतना ही नहीं समाचारपत्र व्यापारियों और नौकरी की खोज करने वालों का भी मित्र है। व्यापारी घर बैठे ही समाचारपत्रों में अपने माल का विज्ञापन देकर लाभ उठाते हैं। इसी तरह पढ़े-लिखे बेकारों को इस बात का पता चलता है कि कहाँ किस प्रकार की नौकरी की जगह खाली हुई है। वस्तुतः समाचार-पत्र हमारे ज्ञान का विकास करता है। हमारे दैनिक जीवन की आवश्यकताएँ भी पूरी करता है। आज हर शिक्षित घर में इसका होना अनिवार्य हो गया है। बड़े-बड़े नगरों में लोग बिस्तर से उठते ही पहले अखबार या समाचारपत्र पढ़ते हैं। यही कारण है कि कुछ लोग इसके बिना रह नहीं सकते।

समाचार-पत्र कई तरह का होता है- दैनिक, साप्ताहिक, मासिक, पाक्षिक इत्यादि। इन सबों में दैनिक पत्र का प्रसार सबसे ज्यादा है और इसकी कीमत भी कम रखी जाती है। मासिक पत्रों में साहित्य से संबंध रखने वाली बातें अधिक रहा करती हैं। साप्ताहिक पत्रों में सप्ताह भर के समाचारों की चर्चा सम्मिलित की जाती है। दैनिक पत्रों का सीधा संबंध जन-जीवन से रहता है।

समाचार के महत्त्व के साथ ही सम्पादकों का दायित्व भी बढ़ गया है। एक अच्छा सम्पादक जीवन को अच्छे मार्ग पर ले जाता है ताकि जनता सुखी हो। भारत

में समाचारपत्रों का काफी विकास हुआ है और क्रमशः होता जा रहा है। अतः हमारे देश में समाचारपत्र का भविष्य सुन्दर और उज्ज्वल है।

समाचार-पत्रों पर सरकार का नियंत्रण कानूनी ढंग से पहले काफी अधिक था। सरकार के खिलाफ छापे गये समाचारों के लिए समाचारपत्र दण्डित किया जाता था। लेकिन सरकार को सतर्क करने के लिए उसकी खामी और खूबियों को उजागर करना आवश्यक हो जाता है। जनतंत्र में उसको जनता के सामने वास्तविक स्थिति रखने की आजादी मिलनी ही चाहिए। इधर कुछ दिनों से समाचारपत्रों पर अंकुश लगाने की बात सरकार सोच रही थी, लेकिन, जनता की आवाज ने उसे ऐसा करने से रोक दिया।

खासकर संकटकालीन स्थिति में जब जनता के सारे मौलिक अधिकार समाप्त हो जाते हैं, उसी प्रकार अखबार की स्वतंत्रता भी काफी कम हो जाती है। अखबार को उन्हीं समाचारों को छापना पड़ता है जो सरकार चाहती है। अखबार के प्रत्येक समाचार को सरकार के कर्मचारी देखकर छापने की अनुमति देते हैं। ऐसे समाचार जो सरकार के लिए घातक होते हैं, नहीं छापने दिये जाते हैं। किसी भी व्यक्ति के चरित्र हनन संबंधी समाचारों के लिए अखबार पर मुकदमे चलाये जाते हैं और अखबार से संबद्ध अधिकारी जो इस समाचार को अंतिम रूप से छापने की अनुमति देते हैं, उन्हें सजा तक मिलती है।

अपने राज्य से भी पहले कुछ अखबार निकलते थे, जिनमें आर्यावर्त और इण्डियन नेशन प्रमुख स्थान बनाये हुए थे। अब हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स तथा यइम्स ऑफ इण्डिया ने इनका स्थान ग्रहण कर लिया है। आरंभ में प्रदीप, सर्चलाइट, नवराष्ट्र, राष्ट्रवाणी आदि दैनिक पत्र छपते थे। लेकिन अब इनका प्रकाशन स्थगित हो गया है। इधर कई दैनिक तथा साप्ताहिकं पत्र निकलने लगे हैं।

10. आतंकवाद : विश्व के भयानक भयानक खतरा ​

[2010A, 2016A, 2026A]

आतंकवाद नागरिकों, सशस्त्र सैनिकों या राज्य के विरुद्ध विभ्रांत लोगों द्वारा अपने वांछित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रयोग किया जाने वाला बलपूर्वक एवं गैर-कानूनी तरीका है। आतंकवादी वर्तमान शासन व्यवस्था एवं शांति को उखाड़ फेंकने एवं वाछित राजनैतिक परिवर्तन के लिए विस्फोट, अपहरण, आक्रमण, हत्याएँ, भयादोहन जैसे हिंसात्मक आपराधिक गतिविधियों का सहारा लेते हैं। आतंकवाद को परिभाषित करना मुश्किल है, लेकिन कहा जा सकता है कि,

  1. यह कुछ खास लोगों द्वारा नियोजित ढंग से किया जाने वाला हिंसात्मक कार्रवाई है।
  2. यह वर्तमान शासन व्यवस्था को चुनौती देने के लिए राजनीति प्रेरित हिंसा है।
  3. यह अपनी अनुचित माँगों को मनवाने के लिए मानसिक दबाव बनाने का एक हथियार है एवं इसका निशाना कोई भी हो सकता है-नागरिक, कोई समुदाय, सैनिक, सरकार या राज्य।

आतंकवादी सदैव गैर-कानूनी, अमानवीय एवं निंदनीय कृत्य करते हैं। इसका उदय मुख्य रूप से पिछली शताब्दी में हुआ लेकिन पिछले दो से तीन दशकों में यह अत्यंत ही भयावह हो चुका है। कुछ देशों द्वारा प्रायोजित आतंकवाद आज भूमंडलीय रूप ले चुका है, जिसका ज्वलंत उदाहरण 11 सितंबर, 2001 को अमेरिका को न्यूयार्क में स्थित विश्व व्यापार केंद्र की दो बड़ी इमारतों पर आतंकवादी हमला है। आज के दौर में सूचना प्रौद्योगिकी के प्रसार के कारण आतंकवाद और भी घातक बनता जा रहा है। आतंकवादियों द्वारा रासायनिक, जैविक, नाभिकीय अस्त्रों एवं प्रक्षेपणों जैसे विध्वंसकों को प्राप्त करना या उनका विकास विश्व के लिए एक महान विपदा बन गयी है।

वर्तमान आतंकवाद का सबसे विभत्स, घृणित एवं भयानक पहलू यह है कि इनमें अधिकतर लोग धर्म और पंथ से प्रेरित हैं। ये धर्मांध लोग विश्व स्तर पर सांप्रदायिक हिंसा तथा घृणा फैलाकर संसार को सांप्रदायिक आधार पर बाँट देने पर तुले हैं। आतंकवाद शासन तथा व्यवस्था दोनों के लिए एक गंभीर समस्या है. जो समाज को विघटन की ओर ले जा रहा है-हत्या, यातना, लूटपाट, फिरौती आदि घटनाएँ आतंक और भय का वातावरण पैदा करती हैं। आतंकवादी आतंक तथा भय पैदा करने के लिए स्त्रियों, बच्चों एवं नागरिकों को मौत के घाट उतार देते हैं। कई आतंकवादी गुटों के पारस्परिक संबंध तथा गठबंधन के कारण देश में काला धन आता है जिससे गैर-कानूनी व्यापार को बढ़ावा मिलता है। आतंकवाद नशीली दवाओं के व्यापार का पर्याय बन चुका है। कई आतंकवादी समूह व्यापारियों एवं

धनी लोगों से नियमित रूप से धनराशियाँ वसूलते हैं जिसके कारण ऐसे क्षेत्रों से पूँजी का पलायन हो जाता है और उस क्षेत्र का आर्थिक विकास रुक जाता है। इस तरह आतंकवाद पूँजी और जनता को बिखेरने का काम कर रहे हैं।

हमारे देश में भी तथाकथित आतंकवादी एवं विद्रोही गुटों की अमानवीय कृत्यों ने अर्थव्यवस्था एवं विकास को क्रूरतापूर्वक प्रभावित किया है। यह हमारे देश के लोकतंत्र एवं संप्रभुता के लिए बहुत ही गंभीर खतरा है। हमारे देश में आतंकवाद कई रूपों में देखने को मिलता है। चीनी क्रांति से प्रेरित 1967 ई० में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी नामक स्थान से शुरू हुआ नक्सलवादी आतंकवाद, जो 1970 के दशक में बिहार, आंध्र प्रदेश, केरल, उड़ीसा एवं त्रिपुरा में फैल गया। इन नक्सलवादी संगठनों में एक प्रसिद्ध संगठन 'पीपुल्स वार' है जिसका प्रभाव मुख्यतः आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं उड़ीसा में है एवं दूसरा संगठन 'माओवादी साम्यवादी केंद्र (एम.सी.सी.) है, जो बिहार एवं झारखंड में सक्रिय है। इसी तरह के माओवादी आंदोलन नेपाल में भी चल रहे हैं, जिनका प्रभाव प० बंगाल एवं सिक्किम में देखने को मिलता है। उत्तर-पूर्व में भूटान, चीन तथा बांग्लादेश से लगती सीमाओं पर के राज्यों में भी कई आतंकवादी गतिविधियाँ चल रही हैं, जो पृथकतावादी आंदोलन का रूप ले चुकी हैं। नागालैंड जो नागालैंड मणिपुर, उत्तरी अरुणाचल प्रदेश एवं म्यांमार में सक्रिय हैं, अन्य कई आतंकवादी संगठनों के साथ मिलकर (मणिपुर, असम, अरुणाचल प्रदेश तथा म्यांमार के कुछ क्षेत्र को मिलाकर) एक वृहत् नागालैंड की माँग कर रहे हैं।"

त्रिपुरा में कुछ जनजातीय संगठनों द्वारा गैर-जनजातीय लोगों के निष्कासन की माँग, दूसरे आतंकवादी गतिविधियों द्वारा मिजोरम में ग्रेटर मिजोरम की माँग तथा असम में आतंक मचानेवाले कुछ संगठनों से हमारे देश की शांति एवं संप्रभुता पर गहरा संकट है।

1980 के दशक में पंजाब में खालिस्तान की माँग एवं उसके लिए की गई आतंकी गतिविधियाँ आज भी भुलाये नहीं भूलती।

इनके साथ-साथ पाकिस्तान द्वारा काश्मीर में प्रायोजित आतंकवाद भी हमारे देश के लिए बड़ी चिंता की बात है। जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। 13 दिसंबर, 2001 को भारतीय संसद पर किया गया भयानक हमला इसका एक उदाहरण है।

कुल मिलाकर कहें तो आतंकवाद मानवीय मूल्यों की पूर्णतया अवहेलना करता है। यह विश्व क्षैतिज पर तेजी से उभर रहा एक बदनुमा दाग है जिसे नेस्तनाबूद नहीं किया गया तो मानवता के विरुद्ध यह कालिमा बढ़ती ही जाएगी। इसलिए हमारा देश संकल्पित है कि वह सभी जगहों पर सभी प्रकार के आतंकवाद का विरोध करेगा। इस संग्राम में इंदिरा गाँधी एवं राजीव गाँधी की कुर्बानी हमें एवं हमारी आनेवाली पीढ़ियों को आतंकवाद के विरुद्ध लड़ने के लिए सदैव प्रेरित करती रहेगी।

11. पर्यावरण संरक्षण ​

[2011A]

मनुष्य को यह शक्ति प्रदान की गयी है कि वह कुछ नयी चीजों का आविष्कार कर सके, ताकि उसके सुख-संसाधन बढ़ सके। लेकिन अब तक यह देखा गया है कि वह आविष्कार आविष्कार नहीं बन पाया है, वह ध्वंस और विनाश का उपकरण मात्र बनकर रह गया है। जंगली जानवरों को मनुष्यों ने मारा और पर्यावरण को बुरी तरह प्रदूषित किया। धरती को मनुष्यों ने दरिद्र बनाया और प्रतिदिन उसे कुरूप किया। बीसवीं शताब्दी में मनुष्य ने धरती को बहुत नुकसान पहुँचाया, उतना जितना इसके पहले की शताब्दियों में भी उसने नहीं पहुँचाया था। संसार में अब क्या बचेगा ? केवल कंकरीट, पत्थर के मकान और सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों के टायर। मनुष्य तो दुःखी ही रहेगा-'सब्बं दुखं'।

पर्यावरण का अर्थ है धरती के ऊपर घेरनवाला वातावरण-परिवेश। हवा प्रदूषित, पानी प्रदूषित और ध्वनि प्रदूषण ने धरती को हिला कर रख दिया है। हमें पर्यावरण की चेतना का संचार करना होगा। "पर्यावरण चेतना का अर्थ है कि लोग यह समझें कि कुदरत या प्रकृति के साथ संगति रखने में ही सुख है, विसंगति तो वेदना और विभीषिका को जन्म देती है। वन होंगे, तो वर्षा होगी, भूमि का कटाव रुकेगा, रेगिस्तान के पाँव बँधे जायेंगे, धरती की उर्वरा शक्ति बढ़ेगी और हमें अरबों-खरबों रुपयों की नैसर्गिक सम्पदा मिलती रहेगी।

चार दशक पूर्व पृथ्वी के उष्ण कटिबंधीय वर्षा से वनों का चुका था। वनों का यह विनाश धड़ल्ले से होता जा रहा है। 1 3 भाग नष्ट हो

दशक पूर्व के आँकड़ा के अनुसार प्रतिवर्ष एक लाख सत्तर हजार वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र समाप्त हो रहे हैं; सात लाख हेक्टेयर भूमि रेगिस्तान में बदल रही है और पानी ? पानी की दुर्दशा तो यह है कि करोड़ों गैलन दूषित जल नदियों-झीलों के अस्तित्व का क्षरण, हवा में घुलता प्रदूषण का जहर, आण्विक रिएक्टरों की दुर्घटनाएँ और प्राकृतिक खनिजों और संसाधनों के बेरहम दोहन एवं शोषण आखिर हमें कहाँ ले जाएँगें ? ये धुआँ उगलती फैक्टरियाँ, जहरीले रसायनों का पौधों पर छिड़काव, ओजोन परत की क्षति और रेडियो एक्टिव धूलकण ये सृष्टि को कहाँतक सुरक्षित रहने देंगे ?"

पर्यावरण की सुरक्षा के लिए पूरी दुनिया के लोगों को पहले एकमत होना होगा। सभी को यह चाहना होगा कि पर्यावरण प्रदूषित न हो। पर्यावरण शुद्ध करने के लिए कुछ उपायों पर उन्हें अमल करना होगा। पहले जंगलों के काटे जाने पर पूरी रोक लगानी होगी। पेड़ हवा को शुद्ध करते हैं। पेड़ बाढ़ आने से रोकते हैं। पेड़ वर्षा कराते हैं। पेड़ अनावृष्टि जैसी विपदा से धरती और धरती के लोगों को बचाते हैं। पेड़ वर्षा के चक्र को नियमित एवं संयमित करते हैं। पेड़ मरुभूमि के विस्तार को रोकते हैं। पेड़ ऑक्सीजन छोड़ते और कार्बन डाइऑक्साइड लेते हैं। पेड़ धरती को ठंडा रखते हैं। पेड़ धरती को गर्मी को कम एवं नियंत्रित करते' हैं।

दूसरे, ऊर्जा की खपत हमें कम करनी होगी। प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त ऊर्जा का हमें इस्तेमाल करना होगा। सूर्य से प्राप्त ऊर्जा का हमें इस्तेमाल करना होगा। पवन से प्राप्त ऊर्जा का हमें इस्तेमाल करना होगा। बिजली की खपत हमें कम करनी होगी।

तृतीयतः हमें मोबाइल का इस्तेमाल कम करना होगा। चतुर्थतः फ्रीज, एयर कंडीशनर का इस्तेमाल हमें कम करना होगा। इससे ऑक्सीजन एवं ओजोन का क्षरण रुकेगा।

वन्य प्राणियों के जीवन पर पर्यावरण प्रदूषण का असर पड़ा। पेड़ एवं जंगल कट जाने से जंगली जानवर-बाघ, चीता, सिंह इत्यादि शहरों की ओर भागते हैं जहाँ उनका शिकार हो जाता है। प्रत्येक राष्ट्र को पर्यावरण, वनों एवं वन्य प्राणियों की रक्षा करने की पूरी कोशिश करनी होगी। वस्तुतः यदि वन न हों तो जीव जंतुओं की कल्पना ही नहीं की जा सकती। वन्य प्राणियों के रक्षण के लिए वन की उपयोगिता बनी रहेगी।

12. महँगाई ​

[2011A, 2013A, 2019A, 2022A]

निरन्तर बढ़ती महँगाई ने आम आदमी को आज तबाह कर रख दिया है। समाज में एकदम नीचे तबके के आर्थिक दृष्टि से बेहद कमजोर लोगों का जीना दूभर हो गया है। वे सुबह खाते हैं तो शाम की चिन्ता सताती है और दूसरे दिन फाकेमस्ती का भय सताता है। और-तो-और, अच्छे मध्यमवर्गीय परिवारों का हाल यह है कि पारिवारिक खर्चे के बजट की चादर सब जगह छोटी पड़ रही है और किसी का सर उसके बाहर निकल रहा है तो कहीं किसी का पेट ही उघरता जा रहा है। चीजों का उत्पादन तो बढ़ता नहीं, पर पैसों का मूल्य घटता जा रहा है। आम आदमी किंकर्तव्यविमूढ़ है कि वह अपनी जिन्दगी की गाड़ी को खींचे तो कैसे खींचे।

हमारी सरकार महँगाई पर रोक लगा देने के दावे करती है। वह टी० वी० से प्रतिदिन के स्थिर या कमते मूल्यों की घोषणा करती है। घोषणाओं के वे स्वर आसमान में मँडराते रहते हैं और धरती पर उपभोक्ता-सामग्रियों के मूल्य आसमान की ओर चढ़ते रहते हैं वैसे यह एक सच्चाई है. कि महँगाई केवल हमलोगों के देश में ही नहीं बढ़ी है, सारे विश्व में बढ़ी है। हाँ, हमारे देश में आय के मुकाबले महँगाई कहीं ज्यादा बढ़ी है।

इस महँगाई के पीछे अनेक कारण सक्रिय हैं। महँगाई का एक बड़ा कारण समाज में फैला हुआ काला धन और उत्पादनों का कम होना है। हमारे देश की आबादी जिस रफ्तार से बढ़ी है, उस रफ्तार से हमारे देश में उपभोक्ता-सामग्रियों का उत्पादन नहीं बढ़ा है जबकि उनका उत्पादन-व्यय काफी बढ़ गया है। ऐसी हालत में ये सामग्रियाँ स्वभावतः महँगे मूल्यों पर बाजार में आती है। दूसरी ओर आय की मंद वृद्धि के कारण उपभोक्ताओं की क्रय-शक्ति बहुत कम हो गयी है। फिर भी महँगी चीजें सस्ती नहीं हो पातीं; कारण दो नम्बर का फालतू पैसा रखने वाले लोग उन्हें खरीद लेते हैं और पूरे समाज में अर्थ-व्यवस्था का यह दोहरा चक्र चलता रहता है।

अपने देश में महँगाई को भड़काने में मुद्रास्फीति की गहरी भूमिका है। आज उत्पादित सामग्री और मृदा की आपूर्ति का संतुलन बेहद बिगड़ गया है।

बढ़ती महँगाई के और भी कई कारण हैं। उदाहरण के लिए, यातायात के साधनों का अभाव, मुनाफाखोरी के लिए छिपाकर अन्न भण्डार का जमा किया जाना और बाजार में उनका कृत्रिम अभाव, उपभोक्ता-सामग्रियों के मूल्यों पर अनेक प्रकार के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष करों का दबाव आदि ऐसे ही कारण हैं।

अब मूल्यों पर नियंत्रण पाने के लिए हमारी सरकार को काफी सावधानी और गम्भीरता से कदम उठाना होगा। उसे उत्पादन वृद्धि को प्रोत्साहन देना होगा और उपभोक्ताओं की क्रय-शक्ति बढ़ानी होगी। मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति और सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार को कुचलना होगा तथा करों के संबंध में अधिक उदार एवं व्यावहारिक नीतियाँ निर्धारित करनी होंगी। मुद्रास्फीति एवं काले धन पर तो जितना जल्द अंकुश लगाया जा सके, राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए वह उतना ही स्वास्थ्यकर सिद्ध होगा।

13. बेरोजगारी ​

[2011A, 2019A, 2024A]

भारत बेरोजगारी की विकट समस्या से जूझ रहा है। बेरोजगारी की समस्या कितनी विकराल होती जा रही है, इसका कुछ-कुछ अंदाजा देश के विभिन्न नियोजनालयों में निबंधित बेरोजगारों की संख्या से लगाया जा सकता है। यदि किसी कार्यालय में पाँच-दस पद रिक्त होते हैं तो उसके लिए हजारों-हजार उम्मीदवार अपने-अपने भाग्य की आजमाइश करते हैं।

नौ पंचवर्षीय योजनाओं के पूरा हो जाने पर भी कुछ प्रतिशत रोजगार की प्राप्ति भी संभव नहीं हो सकी है। प्रत्येक पंचवर्षीय योजना में बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर पैदा किए गए पर प्रतिवर्ष काम की तलाश करनेवाले लोगों की संख्या में वृद्धि होने के कारण रोजगार के ये अवसर कम पड़ते गए। यही कारण है कि भारत में आज बेकारी की समस्या ने महती विकट परिस्थिति उत्पन्न कर दी है। बेकारी की समस्या ने पढ़े-लिखे युवकों को गलत रास्ते पर ढकेला है। मेरी दृष्टि में राजनीतिक अपराधीकरण में बेरोजगारी का बहुत बड़ा हाथ है। अपहरण, जालसाजी, चोरी, डकैती तथा घूसखोरी जैसी कुप्रवृत्तियों को, बेरोजगारी से जोड़ा जा सकता है।

बेरोजगारी मुख्यतः दो प्रकार की होती है-पूर्ण बेरोजगारी तथा अर्द्धबेरोजगारी।

किसान और गाँव के मजदूर अर्द्धबेरोजगार होते हैं। बेरोजगारी के मुख्य कारण हैं-औद्योगीकरण की धीमी गति, देहातों में घटते रोजगार, गैर-कृषि क्षेत्र में कम रोजगार के अवसर, उत्पादन में पुराने तरीकों के स्थान पर नई तकनीकों को न. अपनाया जाना, जनसंख्या में लगातार वृद्धि एवं प्रकृति का प्रकोप। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में बेरोजगारी दूर करने के लिए लघु एवं कुटीर उद्योग-धंधों के विकास की ही आवश्यकता है। केन्द्रीय सरकार की आर्थिक नीति के कारण विदेशी पूँजी निवेश बढ़ा है। विदेशी कंपनियाँ भारत में उद्योग-धंधा स्थापित कर रही है। देखिए, इससे इस समस्या के समाधान में कितनी मदद मिलती है।

अर्थशास्त्रियों ने आँकड़ों के आधार पर यह सिद्ध किया है कि भारत में प्रतिवर्ष लगभग साठ लाख लोग बेरोजगार होते जा रहे हैं। रोजगार का अर्थ नौकरी ही नहीं है, हमें रोजगार के लिए कल्पनाशील और उद्यमी होना होगा। बैंकों से हमें ऋण की सुविधा प्राप्त है। ऋण लेकर हम अपना रोजगार प्रारंभ कर सकते हैं। यदि हम शिक्षित होकर कोई रोजगार करते हैं तो समाज हमें प्रतिष्ठा ही देगा, अनादर नहीं। शिक्षा को व्यावहारिकता के साथ जोड़कर हम इस समस्या के निदान की दिशा में अच्छी शुरुआत कर सकते हैं।

14. बिहार में शिक्षा ​

[2011A, 2022A, 2023A]

शिक्षा, समाज की एक पीढ़ी द्वारा अपने से निचली पीढ़ी को अपने ज्ञान के हस्तांतरण का प्रयास है। इस विचार से शिक्षा एक संस्था के रूप में काम करती है, जो व्यक्ति विशेष को समाज से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है तथा समाज की संस्कृति की निरंतरता को बनाए रखती है। बच्चा शिक्षा द्वारा समाज के आधारभूत नियमों, व्यवस्थाओं, समाज के प्रतिमानों एवं मूल्यों को सीखता है। बच्चा समाज से तभी जुड़ पाता है जब वह उस समाज विशेष के इतिहास से रूबरू होता है।

शिक्षा व्यक्ति की अंतर्निहित क्षमता तथा उसके व्यक्तित्व का विकसित करने वाली प्रक्रिया है। यही प्रक्रिया उसे समाज में एक वयस्क की भूमिका निभाने के

लिए समाजीकृत करती है तथा समाज के सदस्य एवं एक जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए व्यक्ति को आवश्यक ज्ञान तथा कौशल उपलब्ध कराती है। शिक्षा शब्द संस्कृत भाषा की 'शिक्ष' धातु में 'अ' प्रत्यय लगाने से बना है। 'शिक्ष' का अर्थ है सीखना और सिखाना। 'शिक्षा' शब्द का अर्थ हुआ सीखने-सिखाने की क्रिया।

यद्यपि 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में बिहार की शिक्षा दर लगभग तिगुनी होकर राज्य की जनसंख्या के करीब 48 प्रतिशत तक पहुँच गई है, फिर भी यह देश के अन्य राज्यों की शिक्षा दर की तुलना में काफी नीचे है। महिला साक्षरता दर (33-57%) की तुलना में पुरुष साक्षरता दर (60.32%) लगभग दुगुनी है। 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को शिक्षित करना राज्य का प्रधान लक्ष्य है। इनमें से लगभग 90 प्रतिशत बच्चे प्राथमिक स्कूलों में दाखिला लेने के योग्य हैं, लेकिन इनमें से बहुत कम ही माध्यमिक स्तर तक पहुँच पाते हैं, क्योंकि इनकी आर्थिक आवश्यकताएँ इन्हें काम करने के लिए बाध्य करती हैं। व्यावसायिक और तकनीकी शिक्षण संस्थाएँ सरकारी विभागों द्वारा सहायता प्राप्त हैं। बिहार के उच्च शिक्षण संस्थानों में पटना स्थित प्राचीन व महत्त्वपूर्ण पटना विश्वविद्यालयय मुजफ्फरपुर में बी० आर० ए० बिहार विश्वविद्यालय और भागलपुर स्थित तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय शामिल हैं। बाद के दोनों शिक्षण संस्थान विभिन्न विषयों में स्नातक स्तर के पाठ्यक्रम संचालित करते हैं और इनसे अनेक महाविद्यालय संबद्ध हैं। द पटना स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स में विशिष्ट विषयों के शिक्षा दी जाती है।

प्राचीन काल में बिहार शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। शिक्षा का प्रमुख केन्द्र नालन्दा विश्वविद्यालय, विक्रमशिला विश्वविद्यालय, वर्जासन विश्वविद्यालय एवं ओदन्तपुरी विश्वविद्यालय थे। बिहार में शिक्षा मध्यकाल से प्रारम्भ हुई थी। इस समय अधिकांशतः मुस्लिम ही उच्च शिक्षा ग्रहण करते थे। शिक्षा का माध्यम फारसी था किंतु कहीं संस्कृत के भी शिक्षण संस्थान थे। अजीमाबाद (पटना) बिहार में फारसी का सबसे बड़ा केन्द्र था। बिहार के प्रसिद्ध विद्वानों में कघजी गुलाम मुजफ्फर थे। आधुनिक शिक्षा का प्रारम्भ 1835 ई० में लॉर्ड विलियम बैंटिक द्वारा किया गया। शिक्षा का माध्यम संस्कृत-फारसी के साथ अंग्रेजी भी था लेकिन अंग्रेजी भाषा की सर्व प्रमुखता थी। पूर्णिया के बिहार शरीफ तथा छपरा में एक अंग्रेजी शिक्षा केन्द्र की स्थापना की गई।

15. छात्र और राजनीति ​

[2012A, 2013A, 2014A, 2019A]

यह सवाल आज काफी चर्चित हो चुका है कि छात्रों की सक्रिय राजनीति में भाग लेना चाहिए या नहीं ? वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर विचार करने पर यह साफ जाहिर होता है कि आज की राजनीति रचनात्मक पहलू का विकास करने में पूर्णतया असफल सिद्ध हो रही है। आज की राजनीति केवल आलोचना के संकुचित दायरे तक ही सिमटकर रह गई है। राजनैतिक कुचक्र के दलदल में फँसा हुआ राष्ट्र साँसे मुश्किल की ले रहा है। जनसाधारण के मनोबल को भी विकसित करना नितांत आवश्यक है, क्योंकि यदि जनता आत्मनिर्भर नहीं होगी, उसमें नैतिक साहस का विकास नहीं हो सकेगा। आज व्यावहारिकता से परे संकीर्ण मनोवृत्तियों की राजनीति बढ़ने लगी है। ऐसी राजनीति में छात्रों का सक्रिय भाग लेना सर्वथा अनुचित ही समझा जाना चाहिए; क्योंकि छात्रावस्था में विद्यार्जन के लिए जिस कड़ी तपस्या की आवश्यकता होती है, उसमें इससे भारी व्यवधान उपस्थित होता है और छात्रों के भावी जीवन में जिस नैतिकता और स्वस्थ नागरिकता की अपेक्षा की जाती है, वह मात्र अपेक्षा ही रह जाती है।

स्वतंत्रता के पश्चात् देश का राजनीतिक वातावरण साफ-सुथरा तथा उन्नत होना चाहिए था, लेकिन दलीय शासन-व्यवस्था एवं राजनीति ने जो विषैला तथा घृणित वातावरण निर्मित किया उससे भारत के उज्ज्वल तथा मंगलमय भविष्य के लिए तो खतरा नजर आता ही है, साथ में लज्जा से भी मस्तक नत हो जाता है। स्वार्थलोलुप नेता अपनी दुरंगी चालों में फँसाकर छात्रों का कितना अहित तथा अनर्थ कर रहे हैं, इसका ठीक-ठीक मूल्यांकन करना कोई आसान कार्य नहीं है। छात्रों की बुद्धि भी पूर्णरूपेण विकसित नहीं होती है, परिणामस्वरूप वे इन राजनीतिक खिलाड़ियों के दाव-पेंचों को समझ सकने में प्रायः असफल सिद्ध होते हैं। प्रत्येक राजनीतिक दल अपने अनैतिक तथा घृणित मनसूबों को आदर्श तथा सेवा का ऐसा मुलम्मा चढ़ाकर समाज के समक्ष प्रस्तुत करते हैं, जिसे बड़े-से-बड़े व्यक्ति भी ठीक से समझ नहीं पाते हैं, तो फिर अल्प तथा अविकसित बुद्धिवाले छात्र उसकी तह तक कैसे पहुँच सकते हैं ?

अगर हम कहें कि छात्रों को राजनीति में सक्रिय हिस्सा नहीं लेना चाहिए, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक गतिविधियों के प्रति वे सर्वथा उदासीन हों। उन्हें तो विश्व में घटित होने वाली राजनीतिक घटनाओं की क्रिया तथा प्रतिक्रिया का सम्यक् अध्ययन होना ही चाहिए। इसके साथ ही अपने देश में प्रचलित राजनीतिक दलों की गतिविधियों तथा उससे उत्पन्न परिस्थितियों का भी सम्यक् बोध होना नितांत आवश्यक है। आज के छात्र ही कल के नागरिक होंगे, उन्हीं के कंधों पर राष्ट्र का बोझ आएगा; अतः उन्हें भविष्य में उपयुक्त नागरिक बनने के लिए राजनीतिक गतिविधियों का सम्यक् ज्ञान अपेक्षित है, क्योंकि इस ज्ञान के माध्यम से ही वे देश के भाग्य तथा भविष्य को उज्ज्वल बना सकते हैं। जब छौत्र अपनी बुद्धि की परिपक्वावस्था में पहुँच जाएँ तो ऐसी हालत में वह स्वयं इसका निर्णय कर सकते हैं कि राजनीति में सक्रिय हिस्सा लेना उनके लिए हितकर है या अहितकर।

राजनीति के विषय में सम्यक् जानकारी रखना एक अलग बात है तथा किसी राजनीतिक दल के कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से शामिल होना दूसरी बात है। हम इस बात के विरोधी नहीं है कि राजनीति विषयक विचारमालाओं तथा गोष्ठियों का विद्यालयों के प्रांगणों में आयोजित किया जाए तथा छात्रों को इसमें अधिक-से-अधिक विचार व्यक्त करने का अवसर प्रदान किया जाये। लेकिन हम इस पक्ष के विरोधी अवश्य हैं, जहाँ राजनीति वैचारिक रूप में नहीं बल्कि दलीय स्वार्थभावना से छात्रों पर हावी हो रही है। विद्यार्थियों के अतिरिक्त कार्य क्षमता का विकास राजनीति के धरातल पर नहीं, अपितु सांस्कृतिक क्रियाकलाप के पटल पर ही सुविधापूर्वक किया जा सकता है। अनुशासन विद्यालय का जीवन होता है और राजनीति उस जीवन के बाधक तत्त्व बने हुए हैं। इसलिए यह कहना बड़ा ही स्वाभाविक हो जाता है कि छात्र राजनीति की समझ से पूर्ण तो बनें, लेकिन दलगत राजनीति से दूर रहकर ही। और इस जीवन के पश्चात् जब वे ज्ञान की समृद्धि एवं राजनीतिक दक्षता हासिल कर व्यावहारिक जीवन में प्रवेश करेंगे तो निश्चित रूप से देश का भविष्य बदलेगा, समाज का कल्याण हो सकेगा, नया जागरण और नया विहान हो पायेगा।

16. वसंत ऋतु ​

[2012A, 2013A, 2017A, 2019A, 2022A]

जिसके आगमन के समाचार से ही मन प्राणी की क्यारी लहलहा उठती है, अंतरात्मा की डाली मुस्कुरा उठती है-वह ऋतुओं का राजा वसंत। ऋतुराज का आविर्भाव होते ही सर्वत्र स्वर्गिक माधुरी का प्याला छलकता दिखता है; वातावरण दुग्धवल हास्य के झोंके से अनुगूंजीत होता दिखता है। उदास निराश पहाड़ियों का सुहाग जग उठता है और ये लाल चूनर पहन नई नवेली दुल्हनों सी सजी दिखती है। वृक्ष अपने तन से पुराने पत्तों के जीर्ण वस्त्र को त्याग, नवीन कोपलों का परिधान धारण कर नवजीवन की अंगड़ाइयाँ लेते दिखते हैं। गुलाब के फूल में अटकनेवाली भौरे खिली कलियों का आमंत्रण पाकर गुनगुनाना आरंभ करते हैं। न तो मन का विद्युत मारनेवाला शीत है और न नागिन की तरह जिह्वाएँ खोलने वाली लू की लपटों की आशंका ही। एक हलका गुलाबी जाड़ा तन-मन में गजब स्फूर्ति भरनेवाला। न तो शीत निश्चिर के कठोर स्पर्श का उत्पीड़न और न ग्रीष्म दैत्य का उत्तप्त अत्याचार कि यामिनी प्रमादिनी हो गई है, उषा मधुरहासिनी। पादप पन्नों के आन्तधिसरों सोया संगीत जग उठता है। पारे सी परदर्शी नदियाँ मोटापा दूर होने के कारण जैसे किसी के आगमन से नाचने लगती है और तब लगता है-वसंत सचमुच वसंत है, जिसमें आनंद का ही वास है। इसलिए तो भगवान श्रीकृष्ण ने अपने श्रीमुख से अपने को ऋतुनां कुसुमाकर (ऋतुओं में मैं वसंत हूँ) कहकर इसकी महत्ता सिद्ध की थी।

ऋतुराज वसंत के आते ही प्रकृति रानी नई वेशभूषा, नई विच्छिति में उपस्थित होती है। उसके परिधान में रंग-बिरंगे फूल टँके होते हैं। उसके स्वागत के लिए अतिकुल वाद्यवादन करते दौड़ पड़ते हैं, शिखसमूह कीर्तन करते दिख पड़ते हैं। चंपा उसके मस्तक पर छत्र धारण करता है। आम्रमंजरियाँ उसके मुकुट हैं। पक्षीसमूह उसका अभिषेक मंत्र पढ़ता है। सुंदरता निशान धारण करता है। पाटल के पास उसके तरकस हैं। अशोक के पत्ते ही बाण। प्लाश के पुष्प उसके धनुष हैं। लबंगलता उसकी प्रत्यंचा। मधुमक्षिकाओं की विशाल सेना सजाकर राजा वसंत ने शिशिर की पूरी सेना को परास्त कर दिया है।

खेतों में दूर-दूर गेहूँ के गोरे बालों पर रूपसी तितलियाँ बलखा रही हैं-तीसी के मरकती तथा सरसों के पूखराजी फूलों पर भ्रमरों की पंक्ति मँडराती है। मालती

लताओं को मतवाले भौरे चूम रहे हैं और उनकी कलियाँ मंद-मंद पवन के हिंडोले पर झूल रही हैं। कहीं सुग्गे की चोंच के समान टेसू के फूल खिलते हैं, तो कहीं हल्दी के रंग के बनेर की फूल। रूई के फाहे की तरह कुंद कलियाँ आम्रमंजरियों से इत्र की गंध करनेवाली भीनी-भीनी महक, दिलफरेब चाँदनी मस्तानी काकली गंधमाती हवा, उन्मादक गूंजार कष्ट भरे जीवन के लिए अनोखे रसायन हैं। ऐसी भनमोहक ऋतु में गौतम बुद्ध का कथन 'सर्व दुःख दुखम् सर्व क्षणिक क्षणिकम् मिथ्यावंचन' प्रतीत होता है। लगता है, जीवन में केवल आनंद का ही पारावार लहरा रहा है, सम्मोहन का साम्राज्य और अनुराग का ऐश्वर्य ही पग-पग पर लूट रहा है, उन्मुक्त यौवन की रसवंती धारा मूल किनारा तोड़ रही है, उच्छल उत्साह की सरिता उमड़ चली है। सचमुच वसंती सुषमा की एक बाग की चितवन पर लाख-लाख स्वर्गिक सुख न्योछावर है।

संसार के प्रसिद्ध कवियों ने इसी ऋतु को सर्वाधिक पसंद किया और । अक्षरबद्ध कर अक्षर बना दिया। श्लोकबद्ध कर पुण्यश्लोक कर दिया। महाकवियों ने आत्मा-परमात्मा या नायक-नायिकाओं का प्रेम-मिलन कराया, तो इसी हृदयावर्जक ऋतु में। जयदेव ने राधा कृष्ण का मिलन कराया, तो गोस्वामी तुलसीदास ने राम-सीता का मिलन उस जनक की पुष्पवाटिका में इसी ऋतु में कराया, जहाँ वसंत ऋतु लुभाकर रह गई थी। त्रिपुरसुर की विनाश के लिए जब कामदेव ने योगिराज शंकर की समाधि भंग करना चाहा था तब ऐसे वसंत की सहायता लेनी पड़ी। क्या वाल्मीकि, क्या कालिदास, क्या सूरदास, क्या तुलसीदास, क्या पद्माकर, क्या विद्यापति, क्या पंत, क्या रवीन्द्रनाथ ठाकुर, क्या सूर्यकांत त्रिपाठी, 'निराला' सभी ने वसंत पर कविताएँ लिखी हैं। अंग्रेजी के महान कवि शेक्सपीयर, मिल्टन, टेनीसन, ब्राउनिंग, स्विनबर्न, थामसन सबने वसंत का गुणगान अपनी कविताओं में किया है।

वसंत प्रतीक है आनंद का, उल्लास का, रूप और सौंदर्य का, मौज और मस्ती का, जवानी और रवानी का, स्फूर्ति और संचेतना का, किन्तु क्या पृथ्वी के सभी प्राणियों के मन में इस संजीवन वसंत में भी आनंद और उल्लास की स्त्रोस्विनी उमड़ पड़ती है ? कदापि नहीं। तभी हमें डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी के वैयक्तिक निबंध 'वसंत आ गया' की पंक्ति याद आती है। "वसंत आता नहीं ले आया जाता है।" यदि हम भी रूढ़ियों, अंधविश्वासों, कुसंस्कारों के जीर्ण-शीर्ण पत्रों को त्याग नवीनता और प्रगतिशीलता के नूतन सिपियों से शृंगार कर सकें, तो सचमुच वसंत हमारे जीवन में वर्ष में केवल एक बार ही नहीं, वरन् बार-बार लहराता रहेगा। इसमें संदेह नहीं।

वास्तव में, ऋतुराज वसंत मानसिक आनंद तो प्रदान करती ही है, शारीरिक दृष्टि से शरीर के लिए स्वास्थ्यवर्द्धक है। यह जीवन में नई इच्छाओं या उमंगों का सार करता है। वसंत ऋतु पशु-पक्षी, फल-फूल मानव मात्र को नवीन उत्साह तथा नवजीवन प्रदान करता है।

17. विज्ञान : वरदान या अभिशाप ​

[2012A, 2013A]

आज विज्ञान के महत्त्व को, उसकी उपादेयता को नकारा नहीं जा सकता है। चाहे वह घर का रसोईघर हो या समर-भूमि; विज्ञान के चमत्कार तथा प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। प्रकृति पर विज्ञान की विजय-यह एक किंवदंती नहीं, एक प्रत्यक्ष सत्य है। चन्द्रमा पर मनुष्य का अभियान, ट्यूब बेबी, रॉकेट, अणुबम आदि विज्ञान की उत्कृष्ट देन हैं। सैकड़ों-हजारों मील लम्बी दूरियाँ भी मनुष्य पैदल ही तय करता था। आज वायुयान के सहारे हम कुछ ही घंटों में भारत से लंदन पहुँच जाते हैं। कभी चन्द्रमा-यात्रा की बात कोरी कल्पना समझी जाती थी, परन्तु जब चन्द मानव चन्द्रमा की सतह पर उतरे तो सम्पूर्ण विश्व दाँतों तले ऊँगलियाँ दबाकर रह गया। आज जीवन का कोई भी पक्ष ऐसा नहीं है जहाँ विज्ञान की किरणें नहीं पहुँची हों।

विज्ञान हमारे लिए वरदान सिद्ध हुआ है। इसकी उपयोगिता जीवन के हर क्षेत्र में सिद्ध है। क्षण-क्षण, पल-पल हम विज्ञान के चमत्कारों का नजारा देखते हैं, संबंधित कहानियाँ सुनते हैं। कुछ महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों का संकेत करके हम उसके महत्त्व की उपादेयता का सहज अनुभव कर सकते हैं। विज्ञान के अद्भुत चमत्कारों ने एक नयी क्रान्ति पैदा कर दी है, एक नया अध्याय जोड़ दिया है।

आवागमन के क्षेत्र में विज्ञान की उपलब्धियाँ विशिष्ट एवं विलक्षण हैं। आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व एक जगह से दूसरी जगह जाना गहन समस्या थी।

आज विज्ञान के कारण इस क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए हैं। रेलगाड़ियाँ, मोटरकार, बसें, वायुयान आदि इतनी तेज सवारियाँ निकल आयी हैं कि बातों-ही-बातों

में हम लम्बी-लम्बी दूरियाँ तय कर लेते हैं। तार, टेलिफोन, वायरलेस आदि यंत्रों के आविष्कार के कारण हम घर बैठे मुम्बई, कोलकाता, लंदन में रहनेवाले लोगों से बातें कर लेते हैं। नदी, समुद्र, पहाड़ आज हमारे आवागमन के मार्ग में किसी प्रकार का अवरोध उत्पन्न नहीं कर सकते।

चिकित्सा के क्षेत्र में विज्ञान की उपलब्धियों ने संजीवनी बूटी का काम किया है। पुराने जमाने में छोटी-छोटी बीमारी के कारण लोगों की मृत्यु हो जाती थी।

आज शायद ही ऐसा कोई रोग है, जिसकी दवा सुलभ नहीं है जिसका निदान संभव नहीं है। क्या यह विलक्षण चमत्कार नहीं है कि विश्व से चेचक, प्लेग, मलेरिया आदि रोगों का उन्मूलन हो गया ? आज बड़े-बड़े असाध्य रोगों की भी अच्छी एवं प्रभावकारी औषधियाँ निकल गयी हैं। दिन-प्रतिदिन नये-नये प्रयोग हो रहे हैं, नये-नये उपकरण एवं नयी-नयी जीवनरक्षक औषधियाँ निकल रही हैं। मनुष्य का हृदय विकृत या क्षतिग्रस्त हो जाने पर उसे बदल दिया जा सकता है और मनुष्य को नयी जिन्दगी दी जा सकती है ? अंधे को आँखों की रोशनी, विकलांगों के विकृत अंगों में सुधार, दिल और दिमाग में परिवर्तन वैज्ञानिक चमत्कारों की ही देन हैं।

आवागमन या चिकित्सा ही नहीं, प्रायः सभी क्षेत्रों में विज्ञान की बड़ी-बड़ी उपलब्धियाँ सामने आयी हैं। चन्द्रमा पर मानव की विजय से लेकर पाठशालाओं एवं शयनकक्षों में आराम एवं सुख-सुविधाओं की सारी चीजों की व्यवस्था विज्ञान के ही चमत्कार हैं। रेडियो, सिनेमा, टेलिविजन, वीडियो आदि सारी-की-सारी चीजें विज्ञान की ही देन हैं। कम्प्यूटर ने एक नये युग की शुरूआत की है।

प्रत्येक वस्तु के दो पक्ष होते हैं-श्वेत और श्याम। विज्ञान भी इसका अपवाद नहीं है। विज्ञान यदि वरदान है तो अभिशाप भी वना है। विज्ञान ने यदि हमारे अधरों पर मुस्कुराहट विखेरी है तो इसने हमारी आँखों में अश्रुकण भी संजोये हैं। विज्ञान ने परमाणु बम तथा अनेक गैसों, हथियारों एवं शस्त्रों का आविष्कार किया है, जा मानव समुदाय का समूल विनाश करते हैं। हिरोशिमा और नागासाकी पर मानवता के ध्वंस का तांडव नृत्य क्या हम भूल पाये हैं ? स्वयं बमवर्षक जहाज के चालका ने पश्चाताप किया है।

आज बड़े-बड़े देश परमाणु-शक्ति की खोज इसलिए नहीं कर रहे हैं कि उनका प्रयोग मनुष्य के कल्याण एवं शान्तिपूर्ण प्रयोजनों के लिए किया जायेगा, वरन् उनका प्रयोग मानवता को ध्वस्त करने के लिए किया जायेगा। संहारक अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण पर सभी देश अपनी बजट राशि में वृद्धि कर रहे हैं। बड़े-बड़े देश एवं महाशक्तियाँ इन्हीं संहारक हथियारों के बलबूते पर छोटे तथा कमजोर देश पर अपना आधिपत्य बनाये रखना चाहती हैं।

इन बमों के विस्फोट से निकली विषैली गैसों के कारण वातावरण दूषित हो गया है, अनेकानेक बीमारियाँ फैल रही हैं। विशेषज्ञों का कथन है कि यदि इसी प्रकार ये विषैली गैसें वातावरण को दूषित करती रहीं तो आनेवाले बच्चे शारीरिक एवं मानसिक रूप से विकृत होंगे। मशीन के अधिकाधिक आविष्कार के कारण बेकारी की समस्या बढ़ती जा रही है। जहाँ मशीनों का अधिक उपयोग हो रहा है, वहाँ मनुष्य बेकार होते जा रहे हैं।

विज्ञान एक वरदान भी है और एक अभिशाप भी। विज्ञान अपने-आप में न तो अभिशाप है और न वरदान। विज्ञान का वरदान होना या अभिशाप होना वैज्ञानिकों और राजनीतिज्ञों पर निर्भर करता है। सबसे मूल बात यह है कि हम इसका प्रयोग किस प्रकार तथा किसलिए करते हैं।

यदि हम विज्ञान का प्रयोग मानव-कल्याण के लिए करते हैं तो हमारे लिए सबसे बड़ा वरदान है और यदि हम इसका प्रयोग नर-संहार के लिए करते हैं तो यह मानव-जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है।

18. नक्सलवाद की समस्या ​

[2014A]

नक्सलवाद भारतवर्ष के प्रगतिशीलों का एक हिंसा भरा आंदोलन है। यह एक प्रगतिशील आंदोलन है। यह भारतवर्ष में बराबरी की माँग करता है। जब सरकार समता नहीं ला पायी तो नवयुवकों ने हथियार उठा लिया। यह वाद घनियों का धन छीन लेने में विश्वास करता है। यह अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए हिंसा का प्रयोग औचित्यपूर्ण मानता है। यह सत्ता में भी भागीदारी चाहता है। यह भारत के गरीबों का एक प्रभावशाली आंदोलन है। यह मार्क्सवाद के वसूल पर चलता है।

राजनीतिक आंदोलन – यह एक राजनीतिक आंदोलन है। सभी प्रगतिशील पाटियों का इसे समर्थन प्राप्त है। यह भारत के 80% गरीब लोगों की उन्नति और विकास का समर्थक आंदोलन है। यह भूमिहीनों को भूमि दिलाने का पक्षधर आंदोलन है। यह समाज में सबकी बराबरी का पक्षधर है।

स्वरूप – इसका स्वरूप क्रांतिकारी है। यह शोषण का विरोध करता है। यह शोषकों का विरोध करता है। हिंसा को नक्सलवाद अपना हथियार मानता है। यह पूरे भारतवर्ष में फैला हुआ है। यह पूँजीपतियों, उद्योगपतियों एवं व्यापारियों को अपना दुश्मन मानता है। हिंसा का सहारा लेना छोड़ दे, तो सभी ऐसे प्रगतिशील आंदोलन का समर्थन करेंगे। यह पूरे भारतवर्ष में फैला आंदोलन है। यह नवयुवकों - का आंदोलन है। भारत की सरकार इस आंदोलन से डरती है। बिहार सरकार ने भी इसके विरुद्ध कदम उठाने में हिचकिचाती है। भारत सरकार नक्सलियों को मारने में सेना का सहारा लेने में हिचकिचाती है। यह आंदोलन बिहार, उत्तर प्रदेश, । पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, आन्ध्र प्रदेश, केरल, झारखंड, महाराष्ट्र इत्यादि राज्यों में अपनी जड़े मजबूत कर चुका है। अन्य राज्यों में इस आंदोलन ने अपनी पहुँच बना ली है। 1960 ई. में इसे नक्सली आंदोलन कहा गया। 1969 में मार्क्सवादी 'पार्टी का गठन हुआ।

उद्देश्य – नक्सलवादी आंदोलन के तीन उद्देश्य थे-खेत जोतने वालों को खेत का मालिकाना हक मिले, विदेशी पूँजी का देश से खात्मा हो तथा वर्ग और जाति के विरुद्ध संघर्ष छेड़ा जाय। इसकी नई-नई शाखाएँ बन गयीं-पीपुल्स वार ग्रुप (सीतारमैया, आन्ध्र प्रदेश), माओवादी कम्युनिस्ट सेन्टर (कन्हाई चटर्जी, पश्चिम बंगाल), माओवादी (मुथ्पाला लक्ष्मण उर्फ गणपति, बिहार) और रिवोल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट (उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखण्ड)। नक्सली हिंसा के कारण हजारों मौतें पूरे देश में हो चुकी है।

सरकारी विरोध – सरकार हिंसा का विरोध हिंसा के सहारे कर रही है। सरकार नक्सलियों और आधारभूत ढाँचे एवं सहायक प्रणाली के विरुद्ध एक समन्वित प्रभावी पुलिस कार्यवाही को प्रभावी बनाने के लिए समुन्नत सूचना संग्रहण और साझा तंत्र का निर्माण कर इस आंदोलन को समूल नष्ट कर देना चाहती है। सरकार रोजगार बढ़ाकर, प्रभावित क्षेत्र में सड़क निर्माण कर, कृषि का विकास कर नक्सलियों को समाज की मूलधारा में शामिल करना चाहती है। नक्सलियों से सरकार बातचीत भी करती रहती है और उनका नाश भी करती रहती है। इसलिए नक्सली सरकार से बातचीत के धोखे में नहीं पड़ते हैं।

निष्कर्षतः नक्सलवाद आंदोलन हिंसा संवलित होने के कारण दबती-उगती-जीवित होती चल रही है। यह आंदोलन कभी मरेगा नहीं। लेकिन, यह भी उतना ही सत्य है कि जनतंत्र में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं। यदि लोगों को जीवनयापन के साधन मुहैया हो जायें तो यह आंदोलन स्वतः दम तोड़ देगा। हाँ, पूँजीपतियों को भी अपना अत्याचार, शोषण बंद करना होगा।

19. आपके प्रिय लेखक ​

[2014A]

हिन्दी के कथा-सम्राट प्रेमचंद का जन्म लमही (उत्तर प्रदेश) में 1880 ई० में हुआ था। उनके घर का वातावरण किसानों का-सा और जीवन-स्तर निम्न-मध्यवर्ग का था। डॉ० लक्ष्मीसागर वाष्र्णेय ने लिखा है कि बाल्यावस्था से ही प्रेमचंद को न केवल कृषक-पोषित होने के कारण जीवन की कठिनाइयों का भी अनुभव हुआ और विपत्तियों को झेलने की भी उन्हें शक्ति मिली। अपनी अपूर्ण अभिलाषाओं और दरिद्र-जीवन को लेकर वे आगे बढ़े। उनकी प्रारंभिक शिक्षा उर्दू के माध्यम से हुई थी। अपनी तेरह वर्ष की उम्र तक उन्होंने उर्दू के प्रायः प्रमुख कहानीकारों की कथा-रचनाओं को पढ़ डाला था। रतननाथ सरशार, मिर्जा रुसवा और मौलाना शरद की रचनाओं को उन्होंने बड़े चाव से पढ़ा था। हिन्दी में 'प्रेमचंद' के नाम से लिखने के पहले वे उर्दू में 'नवाबराय' के नाम से कहानियाँ लिखा करते थे। उनकी देशभक्तिपूर्ण उर्दू कहानियों का पहला संग्रह 'सोजे वतन' 1907 ई० में छपा था। दरिद्रता से जूझते हुए उन्होंने 1910 ई० में इंटर और 1919 ई० में बी० ए० की परीक्षाएँ पास कीं। उनकी जीविका का प्रधान साधन अध्यापन था जिसके सिलसिले में वे गोरखपुर, कानपुर, बनारस और बस्ती में अध्यापक-जीवन जीते रहे। उनकी नियुक्ति सब-इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल के रूप में भी हुई थी। किन्तु, बाद में स्वतंत्र लेखन और संपादन को ही उन्होंने अपनी जीविका का आधार बनाया।

उनकी प्रमुख कथा-रचनाएँ निम्नलिखित हैं –

  • उपन्यास – सेवासदन, प्रेमाश्रम, निर्मला, रंगभूमि, कायाकल्प, गबन, कर्मभूमि और गोदान; उनकी अंतिम औपन्यासिक कृति 'मंगलसूत्र' है जो अपूर्ण है।
  • कहानी – संग्रह-सप्तसरोज, नवनिधि, प्रेमपूर्णिमा, बड़े घर की बेटी, लाल फीता, नमक का दारोगा, प्रेमपचीसी, प्रेमप्रसून, प्रेम-द्वादशी, प्रेम-प्रतिमा आदि। प्रेमचंद ने लगभग तीन सौ कहानियाँ लिखी हैं, जो आठ खंडों में 'मानसरोवर' नाम से एकत्र प्रकाशित हैं।

प्रेमचंदजी को पारिवारिक निर्धनता और विषमता के दुर्व्यवहारों का दंश झेलना पड़ा था। उन्होंने आसपास के निम्न एवं निम्न मध्यवर्गीय गवई जीवन को बहुत निकट से देखा था और यह भी देखा था कि जमींदारों, महाजनों तथा उनके कारिंदों के द्वारा निरीह और अनपढ़ जनता का किस तरह छल और अत्याचार से भरा हुआ शोषण किया जाता है। उनकी लेखनी ने इन सब का जीवंत चित्रण किया। इसलिए ठीक ही कहा जाता है कि प्रेमचंद मूलतः ग्राम-जीवन के चित्रकार हैं। ग्राम-जीवन की सरलता और जटिलता, संपन्नता और विपन्नता, मूर्खता और धूर्तता, बेबसी और ज्यादती-सब कुछ अपनी पूरी सच्चाई के साथ इन कहानियों में चित्रित है। ग्रामीण जीवन का ऐसा कोई भी कोना नहीं जिसे प्रेमचंद न झाँक आए हों। सचमुच, "उनका कथा-साहित्य भारतीय राष्ट्रीय जीवन का एक सटीक काव्य है और तत्कालीन उत्तर भारत का सवाक् चित्र।" प्रो० केसरी कुमार ने उनकी कहानियों को निम्नलिखित तीन वर्गों में बाँटा है –

  • (क) लेखकीय-मान्यता-प्रतिपादक
  • (ख) चरित्र-चित्रण-प्रधान
  • (ग) सामाजिक-समस्या-प्रधान

उनकी कहानियों के पहले वर्ग के अंतर्गत 'बड़े घर की बेटी' और 'नशा' कहानियों को, दूसरे वर्ग के अंतर्गत 'नमक का दारोगा', 'बूढ़ी काकी' और 'आत्माराम' को तथा तीसरे वर्ग के अंतर्गत 'अँधेर' और 'शतरंज के खिलाड़ी' के उदाहरण-रूप में रखा जा सकता है। प्रेमचंद की प्रारंभिक हिन्दी कहानियाँ आदर्शप्रधान थीं। कालान्तर में वे आदर्शोन्मुख यथार्थवादी और अंत में नितांत यथार्थवादी हो गई। अंतिम दौर की अपनी कहानियों में प्रेमचंद अपने पाठकों का परिचय सामाजिक यथार्थ से कराकर हट जाते हैं। उनकी ओर से कोई समाधान प्रत्यक्षतः प्रस्तावित नहीं होता। प्रो० केसरी कुमार ने लिखा है कि प्रेमचंद की कहानी चाहे जिस श्रेणी की हो, उसकी सबसे बड़ी विशेषता उसका मनोवैज्ञानिक आधार है। प्रेमचंदजी सिद्धांत रूप से मानते थे कि वही कहानी सर्वोत्कृष्ट होती है जिसका आधार मनोवैज्ञानिक होता है। इस मनोवैज्ञानिक आधार के कारण प्रेमचंद की कहानियाँ उस रेशमी वस्त्र की तरह हो जाती है जिसके भिन्न-भिन्न पहलुओं से चमक निकलती रहती है।

20. दूर्गापुजा ​

[2014A]

भारत में शक्ति और ऐश्वर्य की पूजा अति प्राचीनकाल से चली आ रही है। शास्त्रबल के साथ ही भारतवासियों ने शस्त्रबल को भी अधिक महत्त्व दिया है। यही कारण है कि देवी दुर्गा की आराधना भारतवासी प्राचीनकाल से ही करते चले आ रहे हैं।

दुर्गापूजा को विजयादशमी के नाम से भी पुकारा जाता है। इसके भी कई कारण हैं। इस दशमी की तिथि को विजया अर्थात् महाशक्ति की विधिपूर्वक आराधना एवं अनुष्ठान किया जाता है, इस कारण इसे विजयादशमी कहा जाता है। यह भी कहा जाता है कि इस तिथि को भगवान श्रीराम ने देवी दुर्गा की आराधना करके आततायी रावण पर विजय प्राप्त की थी और इसी कारण यह तिथि विजयादशमी के नाम से विख्यात हुई। एक अन्य मान्यता के अनुसार, यदि दशमी को श्रद्धापूर्वक देवी की आराधना की जाये तो जीवन में जय अवश्यंभावी होती है। यह भी मान्यता है कि महाविद्याओं एवं इन्द्रियों की संख्या 10 है। माता की आराधना इन दसों महाविधाओं एवं इन्द्रियों पर अधिकार करने के लिए की जाती है। दुर्गापुजा को 'दशहरा' के नाम से भी पुकारा जाता है, क्योंकि इसी दिन दसमुख (रावण) का संहार किया गया था और उसके द्वारा उत्पन्न किये गये कष्टों का हरण किया गया था।

माता दुर्गा के पूजने का विशेष महत्त्व है। कहा जाता है कि माँ दुर्गा समस्त राष्ट्र-भक्ति की प्रतीक है। अपने साधकों के हेतु वह सबकुछ करने को तैयार रहती है। वह सवृत्तियों में लगे हुए लोगों को कल्याण करनेवाली हैं। वे मनुष्यों के द्वारा ही नहीं बल्कि देवताओं के द्वारा भी वंदनीय हैं।

दुर्गापूजा महोत्सव भारत में अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है। औपचारिक रूप से यह उत्सव आश्विन मास की दूसरी प्रतिपदा से दशमी तक मनाया जाता हैं। भारत के विभिन्न भागों में दूर्गापूजा का आयोजन विभिन्न ढंग से होता है। न केवल भारत अपितु विदेशों में भी जहाँ भारतीय मूल के निवासी हैं, वहाँ दुर्गापूजा का आयोजन हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

भाँ दुर्गा शक्ति की प्रतीक है। वह कष्टों को हरनेवाली और पापों का नाश करनेवाली हैं। महामोह, अविद्या और अज्ञान के बादलों को छिन्न-भिन्न करके वे विद्या और ज्ञान का प्रकाश फैलानेवाली हैं।

21. ईद ​

[2014A]

मानव जीवन में पर्व त्योहार महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। क्योंकि यह पर्व अथवा त्योहार हमें समरस बनने की प्रेरणा देता है। इस अवसर पर हम भेदभाव भूल आनंद सागर में गोता लगाने लगते हैं। इसी कारण लोग पर्व त्योहार काफी प्रसन्नता से मनाते हैं।

'ईद' मुसलमानों के लिए सबसे बड़ा आनंद-पर्व है। जिस प्रकार होली हिंदुओं का मौज-मस्ती का त्योहार है, उसी प्रकार ईद मुसलमानों का पर्व है। 'ईद' शब्द का अर्थ होता है-खुशी।

सामयिक स्थिति परिवर्तन। मुसलमानों का महीना हमारे चैत-बैसाख या अंग्रेजों के जनवरी-फरवरी से भिन्न होता है। हिंदू सूर्यमास मानते हैं जबकि मुसलमान चंद्रमास। उनके बारह महीनों में 'रमजान' का महीना बड़ा ही पवित्र माना जाता है। इस महीने में मुसलमान रोजा रखते हैं अर्थात् दिनभर उपवास करते हैं। इस्लाम की चार पाबंदियाँ हैं- (क) नमाज, (ख) रोजा (उपवास), (ग) जकात अर्थात् दान तथा (घ) हज। जब रमजान का महीना पूरा हो जाता है, तब उसके अगले महीने 'शव्वाल' की पहली तिथि को ईद का त्योहार मनाया जाता है। इसे 'ईद-उल-फितर' भी कहते हैं।

ईद के दिन लोग सबेरे ईदगाहों में जाते हैं और चार सिजदों में नमाज अदा करते हैं। नमाज के बाद इमाम खुतबा पढ़ते हैं तथा 'फित्रा' का महत्त्व बताते हैं। खुतबा के बाद ईदगाह में एकत्रित लोग आपस में गले मिलते हैं और आंतरिक प्रेम की वर्षा करते हैं। इस दृश्य से ऐसा प्रतीत होता है कि मनुष्य मनुष्य के बीच वैमनस्य की कोई दीवार न हो। सारी दुश्मनी ईद की घड़ी में खत्म हो जाती है। लोगों के बीच एक नया रिश्ता या प्रेम-संबंध आरंभ हो जाता है।

इस दिन लोग अपने मित्रों, संबंधियों तथा पड़ोसियों को दावत देते हैं। सभी एक-दूसरे को ईद मुबारक, ईद मुबारक कहकर मुबारकबाद देते हैं। घर आए मेहमानों को सेवई तथा मिठाइयों से मुँह मीठा किया जाता है। लोग अपने वस्त्रों पर इत्र लगाते हैं। इत्र लगाना मुसलमानों का सुन्नत है।

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि ईद खुशी तो लाती ही है, साथ-साथ साधना अर्थात् परिश्रम करने की प्रेरणा भी देती है।

भारतवर्ष में विभिन्न जातियों के त्योहारों की संख्या अनंत है। ईद और दशहरा का अपना विशिष्ट महत्त्व है। भारतवर्ष में मुसलमान और हिंदू दो बड़े धर्मों के मतावलंबी रहते हैं। यदि दोनों त्योहार खुशीपूर्वक मनाए जाएँ और दोनों धर्मों के लोग मेल से रहें तो 2020 तक भारतवर्ष एक विश्व शक्ति बन जाएगा।

ईद पर हम ईर्ष्या का भाव भूलकर लोगों से गले मिलते हैं। उन्हें सेवई, लच्छा, दूध, खीर, मीठी सेवई और अन्य रंग-बिरंगी मिठाइयाँ खिलाते हैं। लोग छोटों को - बख्शीश नगद रुपए देते हैं। बच्चों में खुशी की लहर दौड़ती रहती है। ईद का दिन बार-बार आए सभी यही मनोकामना करते हैं।

22. प्राकृतिक आपदा की त्रासदी ​

[2014A]

प्राकृतिक आपदा प्रकृति प्रदत्त विपत्ति है। पहले अतिवृष्टि और अनावृष्टि ही प्राकृतिक आपदा थी। अब समुद्र में उठने वाली लहरों-भवरों के कारण बड़ा-बड़ा तूफान आ जाती है। इसके कारण अनंत वर्षा होने लगती है। बादल फट पड़ते हैं। बर्फ की फूलझरी छूटने लगती है। समुद्र का पानी धरती पर कई-कई बाँस ऊपर चढ़ आता है। झोपड़ियाँ एवं छोटे मकान बहने लगते हैं। बड़े-बड़े मकान गिरने लगते हैं। मनुष्य एवं जीव-जंतु पानी में बहने लगते हैं। उखड़े मकानों के अंदर दबने लगते हैं। चारों आर त्राहि-त्राहि मच जाती है। कौन कहाँ कैसे प्रकृति के आक्रोश की चपेट में आ जाएगा कहना मुश्किल है।

प्राकृतिक आपदाओं से लाभ कम और हानि अधिक होती है। मनुष्य को उनसे बचने का उपाय ढूँढ़ना होगा। सरकारों को भी आपदा से निपटने के लिए आगे आना होगा। मनुष्यों को भी संगठन बनाकर विपत्तिग्रस्त लोगों की रक्षा में आगे आना होगा।

सूखा से बचने के लिए, अनावृष्टि से बचने के लिए उपाय करने होंगे। सिंचाई की सुविधा का विस्तार करना होगा। अनाज की सुरक्षित भंडारण करना होगा। नदियों को दूसरी नदियों से जोड़ना होगा। जल भंडारण के लिए उपाय करने होंगे।

बाढ़ आने पर भी बड़ी विपत्ति आ जाती है। धरती के बड़े भू-भाग पर जल ही जल दिखाई पड़ने लगता है। लोग एवं जीव-जंतु डूबने-उतराने लगते हैं। फसल बह जाती है। भंडारित अनाज डूब जाते हैं। खाने-पीने को कुछ नहीं बचता है। बीमारी फैलने लगती है। दवा दारु की कमी हो जाती है।

सूनामी दक्षिण भारत में आई थी। अनन्त पानी तूफान के साथ समुद्री किनारों पर चढ़ आया। हजारों लोगों की मौत हो गयी। लाखों मकान ढह गए। मछुआरे पानी की चपेट में आकर बह गए। भयंकर तूफान और वर्षा का सामना दक्षिण भारतीय लोगों ने किया।

पिछले वर्ष उत्तराखण्ड में बादल फट पड़े। तूफानी वर्षा हुई। उत्तराखण्ड के मंदिर बद्रीनाथ, केदारनाथ पानी की चपेट में आ गए। तीर्थयात्री काल के गाल में चले गए। महीनों लोग पहाड़ों पर घिरे रहे। वर्षा में भींगते रहे। कुछ तो पानी में बह गए। कुछ को हेलीकॉप्टर से सेना ने बचाया। एक बड़ा पुनर्निर्माण का काम इस क्षेत्र में करना होगा।

उड़ीसा में घिनाले का तूफान आया। अनंत वर्षा आयी। गरीबी और भूखमरी से पहले से ग्रस्त जनता तबाह हो गयी। पूरे भारतवर्ष पर इस तूफानी वर्षा का असर हुआ। भँवर कमजोर पड़ने पर राहत मिली।

भूकंप भी प्राकृतिक विपदा है। उत्तराखण्ड में यह अक्सर आया करता है। पूरे भारत की धरती कब, कहाँ, कैसे डोल जाएगी इसका ठिकाना नहीं है। भूकंपरोधी मकान भी नहीं बने हैं। खतरा बड़े पैमाने पर भी हो सकता है।

जाड़ा भी इस वर्ष ज्यादा अवधि तक पड़ा। कश्मीर, गुलमर्ग, शिमला में बर्फ के फुहारे तीन माह तक पड़ते रहे। लोग ठंढक से तबाह हुए। मौसम अब अपना चरित्र बदल रहा है। गर्मी ज्यादा तो ठंढक भी ज्यादा पड़ने लगी है। अमेरिका, चीन,

जापान में भी बर्फवारी खूब हुई। लू भी प्राकृतिक विपत्ति ही है। भारत में गर्मी अधिक पड़ती है। एक-एक दिन में वाराणसी में तीन-तीन सौ लाशे लू की चपेट में गयीं। लोग मरने लगे। पीने का पानी ठीक से नहीं मिला। गरीबी के कारण खाना पूरी नहीं मिला। लू लपेट ले गयी।

पहले प्राकृतिक विपत्ति के रूप में प्लेग, हैजा एवं पोलियो जैसी बीमारियाँ लोगों को लपेट ले जाती थी। मलेरिया, कालाजार, हृदयरोग, डायबीटीज इत्यादि बीमारियाँ जान लेती रही है। सर्पदंश एवं अन्य प्राकृतिक विपत्तियाँ मनुष्य का जीना मुहाल कर देती है।

प्राकृतिक विपदाओं से बचने के लिए सरकारों को उपाय करने होंगे। लोगों को ट्रेनिंग देनी होगी। सामाजिक स्तर भी लोगों को जाग्रत करना होगा। शिक्षा के प्रसार से रक्षा के उपाय निकालने होंगे। व्यक्तिगत स्तर पर भी सचेत होना होगा। संकट आने की पूर्व सूचना उपग्रहों के मार्फत् लोगों को देनी होगी। तभी आधी जानें बचायी जा सकती है। आधी जानें घटनोत्तर सेवा कार्य से बचायी जा सकती है।

समासतः प्राकृतिक विपदा से बचने के लिए सरकार एवं जनता दोनों को सचेत रहना होगा।

23. होली ​

[2015A]

होली भारतवासियों का एक सांस्कृतिक त्योहार है। यह पर्व एक साथ ही मौज-मस्ती, रवानी-जवानी, रंगीली अलमस्ती की याद दिलाता है। यह पर्व भारतीय संस्कृति की एक पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ है। हिरण्यकशिपु नामक एक महाबली दानवराज था, जो अपने को सृष्टिकर्ता ईश्वर से भी श्रेष्ठ मानता था। उसका पुत्र प्रह्लाद ईश्वर-भक्त था। उसकी बहन होलिका को अग्निदेव नहीं जला सकते थे, ऐसा उसको वरदान था। हिरण्यकशिपु ने होलिका की गोद में प्रह्लाद को बैठाकर जिंदा जलाने का प्रयास किया। ईश्वर की महिमा अपरम्पार है। होलिका वरदान रहते हुए भी जल गई, परंतु ईश्वर-भक्त प्रह्लाद का बाल-बाँका नहीं हो सका।।

इस प्रकार, नास्तिकता पर आस्तिकता की, बुराई पर भलाई की, पाश्विकता पर देवत्व की विजय हुई। बाद में ईश्वर ने नृसिंहावतार धारण कर आततायी हिरण्यकशिपु का नाश किया। दूसरी कथा के अनुसार जब भगवान श्रीकृष्ण ने दुष्टों का दमन कर गोप बालाओं के साथ रासलीला रचाया, तब होली पर्व का प्रचलन हुआ। इस त्योहार के पीछे जो भी गाथा रही हो, इतना निश्चित है कि हर्षोल्लास का यह पर्व दुराग्रह पर सत्याग्रह की विजय का प्रतीक है। यह आनंद एवं उत्साह का महोत्सव है।

ऋतुराज वसंत के आगमन की तिथि फाल्गुनी पूर्णिमा पर नयी भावनाओं एवं नयी उमंगों को लानेवाला होली का त्योहार है। वसंतोत्सव का यह पर्व बड़ी धूमधाम

से मनाया जाता है। गेहूँ तथा चने की गदराई फसलों को देखकर किसान फूले नहीं समाते। लोग घूम-घूम कर टोलियाँ बनाकर फाग गाते हैं। होली के दिन सुगंधित अबीर एवं गुलाल का छिड़काव होता है तथा पिचकारियों से रंग के फव्वारे छूटते हैं। धनी-निर्धन, सुखिया-दुखिया, ऊँच-नीच, स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध सभी भेदभाव को भूलकर होली का आनंद उठाते हैं। मिठाइयाँ बाँट कर लोग स्नेह व्यक्त करते हैं तथा परस्पर प्रीतिभोज का आयोजन होता है।

दीपावली ज्योति का पर्व है और होली प्रीति तथा प्रेम का। यह पर्व हमें वैमनस्य, ईर्ष्या, द्वेष को भूलने तथा परस्पर प्रेम, स्नेह एवं एकता की भावना के साथ रहने का संदेश देता है। कुछ लोग अज्ञानतावश दूसरों पर कीचड़ उछालते हैं, पत्थर फेंकते हैं, अश्लील नारे लगाते हैं, गाली-गलौज करते हैं, तो कुछ लोग गाँजा, भाँग, चरस, ताड़ी-शराब आदि का व्यवहार कर वर्गगत, जातिगत एवं संप्रदायगत विद्वेष उत्पन्न कर होली के महत्त्व को विकृत कर देते हैं। होली भारत की सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक है और यह हमें प्रेम, स्नेह, भ्रातृत्व तथा एकता का पाठ पढ़ाता है। अतः हमें असामाजिक प्रवृत्तियों तथा शर्मनाक आचरण से दूर रहना चाहिए।

24. चुनाव ​

[2015A, 2016A, 2021A]

जनतंत्र में चुनाव, अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है। राजतंत्र में राजा का राज चलता है। तानाशाही में तानाशाह की तूती बोलती है। प्रजातंत्र में प्रजा ही राजा का मालिक होती है। प्रजा ही राजा को चुनती है। अतः चुनावी प्रक्रिया का पारदर्शी होना अति आवश्यक है।

प्रजातंत्र में अब ऐसा पाया जाता है कि एक बार सत्तारूढ़ हुआ आदमी अपनी जड़ें इतनी गहरी कर लेता है कि वह राजतंत्र जैसा ही व्यवहार करने लगता है। पारदर्शी शासन चलाए, तो वह उचित है। लेकिन वह मनमानी करने लगता है। वह राजकोष को व्यक्तिगत कोष समझने लगता है। लूट-पाट मचा देता है। घोटाले की श्रृंखला बनने लगती है। महँगाई बढ़ने लगती है। जनता पिसने लगती है। उद्योगपति क्रमशः धनी होने लगते हैं। उपभोक्ता मरने-पिसने लगती हैं। देश का जनाजा निकल जाता है। पाकिस्तान घुड़कने लगता है। चीन और अमेरिका अपने उत्पादों का बिक्री केंद्र भारत को समझते हैं ये तीनों भारत का खून चूसते हैं। भारत के संस्कृति को विकसित करना इनका उद्देश्य है। समय रहते यदि भारत की आँखें नहीं खुली तो भारत दुनिया के नक्शे से गायब भी हो सकता है।

हमने अपने चुनावों और चुनाव-प्रक्रिया द्वारा देश के जनतंत्र को नहीं बचाया तो और भी बुरे दिन आ सकते हैं। मजदूरों का शोषण बढ़ सकता है। गरीब को जीने का हक छिन सकता है। किसान आत्महत्या पर उतारू हो सकता है।

चुनाव प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए। नेता यदि बेईमान हो जाय तो उससे सत्ता छीन लेनी चाहिए। जब से भारत के इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन है तब से मतदान पारदर्शी हुआ है।

चुनावों में पैसे पानी की तरह बहाए जा रहे हैं। यह खतरनाक संकेत है। इससे भारत को अपनी चुनाव प्रक्रिया को बचाए रखना होगा। आप पार्टी अपने को ईमानदार और बाकी सबको बेईमान कहती है। वह भी विदेशी पैसे के बल पर फड़क रही है। हमारे एम० एल० ए० और एम० पी० यदि अपराधी नहीं होंगे तभी भारत का प्रजातंत्र पटरी पर चल सकता है।

एक कड़ा लोकपाल विधेयक लाने में सबको नानी मरती है, चुनाव प्रक्रिया यदि पारदर्शी होगी तो भारत की जनता सही जनप्रतिनिधियों का चुनाव कर पाएगी। जनता की राय का महत्त्व बढ़ना चाहिए और पैसे के बल पर एम॰ पी॰ बने लोगों को खदेड़ना चाहिए। इससे प्रजातंत्र के अंदर की तानाशाही भी पनाह माँगेगी। प्रजातंत्र से जनता को लाभ-ही-लाभ है। मीडिया को भी सशक्त होना होगा।

चुनाव प्रक्रिया यदि पारदर्शी हो गयी तो लोगों के बीच बैमनस्य भी मिट जाएगा। जातीयता का प्रचार कम हो जाएगा। धर्मों का आपसी वैमनस्य भी नहीं फैलेगा। अनन्त राशि का चुनावी खर्च हमें रोकना होगा। चुनावों के बाद महँगाई बढ़ जाती है। चुनावों के बाद आपसी संघर्ष भी बढ़ जाता है। इस पर शुद्ध चुनाव ही रोक लगाने में समर्थ हो सकेंगे। चोर नेताओं का चुनाव रुक सकेगा। चुनाव के बाद वे घोटाले रुक सकेंगे। प्रजातंत्र की सीमाएँ सामने न आकर उसकी विशेषताएँ प्रकाश में आएँगी।

समासतः हम कह सकते हैं कि साफ-सुथरे, पारदर्शी चुनाव और चुनाव प्रक्रिया ही भारत की रक्षा कर सकेगी –

'कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी'
'दुश्मन रहा है दौरे जहाँ हमारा।'

25. महिला सशक्तिकरण ​

[2015A]

प्रस्तावना - इस सृष्टि के दोनों रूपों को निरंतर चलने रहने हेतु सृष्टी ने सभी जीवधारियों में नर और मादा बनाए और तदनुरूप शरीर गठन किया। दोनों के परस्पर सहयोग से ही जीवन की गाड़ी सरलता और सुगमता से चलती रहती है। दोनों ही गाड़ी के दो समान ऊँचाई के पहिए हैं। कोई कम ज्यादा नहीं। दोनों के ही कर्तव्य, अधिकार, कार्यक्षेत्र सुनिश्चित है और वैसे ही स्वभाव प्रदान किए हैं, सृष्टी ने नारी कोमल, दयालु, संकोची, सेवाभावी है तो पुरुष कठोर एवं अधिक परिश्रमी है।

समाज में नारी का स्थान – भारतीय दर्शन, संस्कृति, परम्पराओं में नारी को पुरुषों से भी ऊँचा स्थान दिया गया है 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता !' नारी देवी है, वह माँ भी है, बहन भी है और पुत्री भी। पर स्त्री को माता कहा गया है 'मातृवत् परदारेषु'। इतने उच्च स्थान पर भारतीय वाड्मय में नारी का बखान किया गया है जबकि पाश्चात्य देशों में मात्र उसे उपभोग की वस्तु अथवा सुविधा की साझीदार माना गया है।

प्राचीन काल में नारी शिक्षित विदुषी, कर्तव्यपरायण होती थी। ज्ञान विज्ञान, अध्यात्म, लोकाचार किसी भी क्षेत्र में पुरुष से कम नहीं थी। मार्गी, अपाला, अरुन्धती आदि तो प्रवीण थी ही सावित्री जैसी भी थीं जो साक्षात यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस लाई थी। ऋषि आलय हो या राजमहल, कंगाल हो या धनवान, नारी सर्वत्र ही पूज्य थी।

नारी का महत्व – मध्य काल आते-आते नारी का स्थान पुरुषों की स्वार्थपरता काम-लोलुपता आदि के कारण न केवल गिर गया बल्कि उसके अधिकारों पर कुठाराघात होने लगा। कार्यक्षेत्र सीमित हो गया, नारी को गंदे कपड़े की तरह बदला जाने लगा। साहित्यकार भी नारी को दोषों की खान के रूप में देखने लगे। एक अंग्रेजी नाटककार ने तो यहाँ तक कहा कि 'फ्राइल्टी थी नेम इस वुमन.' (व्यभिचार, दुर्बलता ! तेरा नाम ही औरत है) विदेशियों की काम-लोलुप निगाहों से बचने के लिए पर्दा प्रथा प्रारंभ हुयी। नारी घर की चारदीवारी में कैद हो गयी तथा शिक्षा के प्रति भी नारी को निरूत्साहित किया गया।

नारी जागरण व नारी शिक्षा हेतु प्रयास – आधुनिक काल आते-आते जहाँ नारी को पैरों की जूती समझा जाता था अनेक अत्याचार उन पर होते थे, वहाँ अब नारी जागरण, नारी स्वतंत्रता का बिगुल बज उठा। स्वामी दयानंद के आर्य समाज ने नारी शिक्षा का मंत्र फूंका। राजा राममोहन राय ने सती प्रथा रुकवाई। महात्मा गाँधी ने नारी उत्थान का नारा दिया। अनेक समाजसेवी व्यक्तियों ने पतित अबलाओं, अपहृताओं और वेश्याओं का उद्धार किया। सरकार ने भी संविधान द्वारा नारी को शिक्षा प्राप्त करने, नौकरी करने आदि के समान अधिकार और अवसर प्रदान किए हैं। महिला सुधार हेतु नारी निकेतन खोल दिए गए हैं। आज की नारी डॉक्टरी, इंजीनियरिंग, अध्यायान लिपिकीय कार्य आदि क्षेत्रों में तो काम कर ही रही है, पुलिस रक्षा के क्षेत्र में भी उच्च पदस्थ हैं। पूर्व में प्रतिभा देवी सिंह पाटिल (राष्ट्रपति), किरण बेदी, बछेंद्रीपाल (पर्वतारोहण में) अपना उच्च स्थान प्राप्त कर चुकी हैं। दहेज प्रथा को भी समाप्त करने के लिए कानून पारित किया जा चुका है। किंतु समाज ने उसे अभी पूर्णरूपेण नहीं अपनाया है। अतः आए दिन बहुओं को जलाने, घर से बाहर करने की घटनाएँ देखने-सुनने को मिलती रहती है।

उपसंहार – यद्यपि सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थाओं एवं समाजसेवी व्यक्तियों द्वारा महिला उत्थान के लिए अनेक प्रयास किए जा रहे हैं और किए जाते रहेंगे तथापि जब तक समाज जागरूक नहीं होगा और नारियों के प्रति असहिष्णुता का दृष्टिकोण नहीं त्यागा जाएगा तबतक पर्याप्त सफलता नहीं मिलेगी। आज आवश्यकता है कि पुरुष समाज अपने दृष्टिकोण को बदले, नारी को सच्चे हृदय से ऊपर उठाकर समकक्ष लाने का प्रयास करे और उसकी प्रगति में अड़ंगे डालने से बाज आए। साथ ही नारियों का भी दायित्व है कि वे अपने दायित्व और पारिवारिक जीवन को स्वच्छ और सफल बनाते हुए अपने त्याग सहिष्णुता लज्जा आदि दैवीय गुणों को न त्यागे। वरन् सेवाव्रती कर्तव्यपरायण बनी रहे। बरसाती नदी जो अपने कूलों को तोड़ती-फोड़ती ऊछंखल गति से बहती है उसकी भाँति अमर्यादित न हो जाएँ। तभी वह अपने उच्च महत्वपूर्ण स्थान को पुनः प्राप्त कर सकेंगी।

26. भूकंप ​

[2015A]

भूकम्प अर्थात् भूमि का कम्पन। पृथ्वी का अपनी धुरी पर हिलना डुलना, कम्पन करना भूकम्प या भूचाल कहलाता है। सामान्यतः भूमि अपनी धुरी पर

हिलती है तो उससे भूकम्प नहीं आते मगर जब धरती के नीचे सब कुछ अधिक पैमाने पर होता है तो पृथ्वी का ऊपरी हिस्सा बुरी तरह प्रभावित होता है। भूकम्प की तीव्रता पर निर्भर करता है कि नुकसान या विनाश कितना होगा ? हम सबने अपने जीवन में एक या उससे अधिक बार भूकम्प के झटके महसूस किए हैं। जब सभी भूकम्प का कोई हल्का-सा झटका आता है, तो हम डर जाते हैं और अपने-अपने घरों से बाहर आ जाते हैं। सब कुछ हिलने लगता है और कुछ ही क्षणों में सामान्य हो जाता है। मगर तेज भूकम्प आने पर कुछ भी बाकी नहीं बचता। गगनचुम्बी इमारतें, भवन सब ढर्रा कर गिर पड़ते हैं, मिट्टी के ढेर में बदल जाते हैं। लोग घरों के अन्दर दब जाते हैं। चारों ओर हाहाकार मच जाता है। परिवार के परिवार, शहर के शहर कब्रगाह बन जाते हैं। लोग जिन्दा दफन हो जाते हैं। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी सब पृथ्वी के गर्त में समा जाते हैं।

भूकंप के उत्पन्न होने का प्रारंभिक बिन्दु केन्द्र या हाईपो सेंटर कहलाता है। शब्द अधिकेन्द्र का अर्थ है, भूमि के स्तर पर ठीक इसके ऊपर का बिन्दु के मामले में, बहुत से भूकंप प्लेट सीमा से दूर उत्पन्न होते हैं और विरूपण के व्यापक क्षेत्र में विकसित तनाव से सम्बंधित होते हैं, यह विरूपण दोष क्षेत्र में प्रमुख अनियमितताओं के कारण होते हैं। भूकंप ऐसे ही एक क्षेत्र में अंध दबाव गति से सम्बंधित था। एक अन्य उदाहरण है अरब और यूरेशियन प्लेट के बीच तिर्यक अभिकेंद्रित प्लेट सीमा जहाँ यह जाग्रोस पहाड़ों के पश्चिमोत्तर हिस्से से होकर जाती है। इस प्लेट सीमा से सम्बंधित विरूपण, एक बड़े पश्चिम-दक्षिण सीमा के लम्बवत लगभग शुद्ध दबाव गति तथा वास्तविक प्लेट सीमा के नजदीक हाल ही में हुए मुख्य दोष के किनारे हुए लगभग शुद्ध स्ट्रीक स्लिप गति में विभाजित है। इसका प्रदर्शन भूकंप की केन्द्रीय क्रियाविधि के द्वारा किया जाता है।

झटके और भूमि का फटना भूकंप के मुख्य प्रभाव हैं, जो मुख्य रूप से इमारतों व अन्य कठोर संरचनाओं कम या अधिक गंभीर नुकसान पहुँचती है। स्थानीय प्रभाव की गंभीरता भूकंप के परिमाण के जटिल संयोजन पर, भूकेंद्र से दूरी पर और स्थानीय भू-वैज्ञानिक एवं भू-आकारिकीय स्थितियों पर निर्भर करती है, जो तरंग के प्रसार कम या अधिक कर सकती है। भूमि के झटकों को भूमि त्वरण से नापा जाता है। विशिष्ट भू-वैज्ञानिक, भू-आकारिकीय और भू-संरचनात्मक लक्षण भू-सतह पर उच्च स्तरीय झटके पैदा कर सकते हैं, यहाँ तक कि कम तीव्रता के भूकंप भी ऐसा करने में सक्षम हैं। यह प्रभाव स्थानीय प्रवर्धन कहलाता है। यह मुख्यतः कठोर गहरी मृदा से सतही कोमल मृदा तक भूकम्पीय गति के स्थानांतरण के कारण है और भूकंपीय उर्जा के केन्द्रीकरण का प्रभाव जमावों कि प्रारूपिक ज्यामितीय सेटिंग करता है।

26 जनवरी 2001 में महाराष्ट्र एवं गुजरात में बहुत भयंकर भूकम्प आया था, जिसमें हजारों लोग मर गये थे। अक्टूबर 2004 में कश्मीर और पाकिस्तान में आया भूकम्प और भी ज्यादा विनाशकारी था। हम कल्पना में भूकम्प पीड़ितों के दुःखों का अनुमान नहीं लगा सकते। किन्तु दूरदर्शन पर देखकर और समाचार-पत्र पढ़ कर हमें ज्ञात होता है कि उनके साथ क्या घटित हुआ ? सब अपने परिवारों से बिछुड़ जाते हैं। घर-बार, धन-दौलत सब कुछ समाप्त हो जाता है। भूखे-प्यासे लोग, आकाश के नीचे, ओढ़ने पहनने को कुछ नहीं होता, सुख-सुविधा कुछ भी नहीं होती, यह सोच कर ही दिल दहल जाता है। जापान में प्रायः भूकम्प आते रहते हैं । अतः वहाँ लकड़ी के मकान बनाये जाते हैं, जिससे जान माल का नुकसान कम हो। भूकम्प के समय पीड़ितों की सहायता करने के लिये सरकारी तथा गैर-सरकारी संस्थायें सामने आती हैं। ऐसे समय पीड़ित लोगों को वास्तविक राहत व सहायता की जरूरत रहती है।

हमें प्रकृति के इस विनाशकारी रूप का सामना कभी भी हो सकता है। अतः भूकम्प के समय अपना बचाव कैसे करें सभी को पता होना चाहिये एवं इमारत बनाने से पूर्व भूकम्प से बचने के लिये किये जाने वाले उपाय कर लेने चाहिये।

27. मोबाइल ​

[2016A, 2021A, 2023A]

मोबाइल समाचारों के लेन-देन के लिए बना एक यंत्र है जो पाँच सौ रुपए से एक लाख रुपए तक में मिलता है। इससे समाचारों के आदान-प्रदान में आसानी होती है। जब चाहा, जिससे चाहा, जितनी देर तक चाहा बतियाते रहे। चाहे वह संसार के किसी कोने में क्यों न हो। चित्रों को भेजना, लिखित समाचार भेजना, चित्रों के मार्फत खेल खेलना, जोड़ना-घटाना सब आसान हो गया है। परंतु इससे हानियाँ भी हैं। इन पर हमारा ध्यान नहीं जाता।

आजकल मोबाइल 2जी, 3जी, 4जी से चित्रों का भी प्रसारण आसान हो गया है। इंटरनेट की सारी सुविधाएँ मोबाइल पर उपलब्ध हैं। चरित्र-पतन करने वाले चित्र इस पर आते रहते हैं। मनुष्य की यह कमजोरी है कि वह चरित्र के उत्थान पर उतना ध्यान नहीं देता जितना चरित्र के पतन के लिए जिम्मेवार चित्रों, घटनाओं और प्रक्रियाओं पर देता है। छात्र-छात्राओं को तो बड़ा आनंद आता है। लेकिन घाटा कहाँ और कैसे हो रहा है, इसका तो जैसे उन्हें बोध ही नहीं। चरित्र-निर्माण की तो उन्हें जरूरत ही नहीं। उत्तम-से-उत्तम अंक लाने की तो उन्हें जरूरत ही नहीं। अपराध के क्षेत्र में प्रवेश करते उन्हें देर नहीं लगती। मोबाइल मानसिक संतुलन खोने में सहयोगी भी हो सकता है।

अक्सर देखा जाता है कि लोग मोबाइल पर चिल्ला-चिल्लाकर बातें करते रहते हैं। बगल में कोई बीमार है या उसे उसकी बातों में कोई रुचि नहीं है, फिर भी उसे सुनना ही पड़ता है। अधिक बतियाने से झगड़ा-झंझट भी मोबाइल पर ही शुरू हो जाता है। मोबाइल पर कम-से-कम बातें बतियाना तो लोग जानते ही नहीं। संक्षेपीकरण तो उन्होंने सीखा नहीं, हाँ पल्लवन करना वे जानते हैं। बड़बड़ाना, चिल्लाना और यहाँ तक कि गाली-गलौज और धमकियाँ तो लोग मोबाइल पर ही दे डालते हैं।

मोबाइल ध्वनि प्रदूषण में बड़ा सहयोगी यंत्र है। संसार में शोर की मात्रा पहले ही कम नहीं थी। पर अब मोबाइल की घंटियाँ हर जगह अपना बेसुरा संगीत सुनाती रहती है। अब तो गाने के कैसेट भी मोबाइल पर ही बजने लगे हैं- 'झंडू बाम हुई' 'फेवीकोल से' 'जलेबी बाई' 'कोलाबेरी, कोलाबेरी, कोलाबेरी'। मोबाइल के ध्वनि तरंगों से हृदयाघात भी हो सकता है। शरीर के अन्य तंत्रों में भी इसका प्रभाव स्वास्थ्यवर्द्धक नहीं कहा जा सकता है। छोटे बच्चों का तो निधन भी हो जा सकता है, लोग कान से बहरे भी मोबाइल के सहयोग से हो जाते हैं।

संसार शांति चाहता है। पर मोबाइल उन्हें अशांत कर देता है। आप पूरब जा रहे हैं। संदेश आता है पश्चिम जाएँ। आप अशांत हो उठते हैं। स्कूल कॉलेजों में तो इनकी बहार ही देखी जाती है। गोरे तो गोरे, काले कलूटे भी इस यंत्र का फायदा उठा ही लेते हैं। लंबे तो उठाते ही हैं, नाटे भी नहीं चुकते। महँगे-महँगे मोबाइल से बतियाना तो अब फैशन ही हो गया है। अच्छी-बुरी स्थिति के भी फोटो खींच लिए जाते हैं। फिर शुरू हो जाती है ब्लैकमेलिंग। पढ़ाई के लिए एकाग्रता जरूरी है। लेकिन मोबाइल ने एकाग्रता भंग कर रखा है।

मोबाइल ने मनुष्य को फिजूलखर्ची के गड्ढे में ढकेल दिया है। महँगे मोबाइल सेट तो महँगे हैं ही, सस्ते भी दो हजार से कम में नहीं मिलते। निम्न वित्तवर्ग के लोग खर्चों से कराहते पहले से ही थे, अब मोबाइल ने तो उनकी जेब ही काट ली है। मोबाइल फैशन का प्रतीक बन गया है। फिर रिचार्ज कराने के लफड़े से मुक्ति नहीं मिलती दिखाई देती है। अरे हाँ, अब तो मोबाइल की चोरी भी हो रही है। स्टेशन पर जेबकतरे इसके लिए खड़े रहते हैं। छोटे-छोटे कम उम्र के बच्चे पाकिटमारी कर मोबाइल बेचते देखे जा सकते हैं।

मोबाइल से एक हानि और है। इसने पत्र लेखन कला को नष्ट कर दिया है। अब पत्र नहीं आते। डाकिया नहीं आता। दूर-दराज के लिखित समाचार नहीं आते। आता है दाँत निपोरते हुए मोबाइल।

हाँ, अब अपराधी भी मोबाइल से धमकी देने लगे हैं। वे वैज्ञानिक चोरी करने लगे हैं। वे मूर्ख क्यों बने रहें ?

निष्कर्षतः मोबाइल से हानियाँ और लाभ दोनों है। ये भी सच है कि आज के युग में बिना मोबाइल के एक पल भी लोगों को काम नहीं चल सकता है। पुरी दुनिया ठप पड़ जाएगी। ये हमलोगों पर निर्भर करता है कि मोबाइल का उपयोग किस रूप में करें।

28. प्रदूषण ​

[2016A, 2017A]

मनुष्य पर्यावरण की उपज होता है अर्थात् मानव जीवन को पर्यावरण की परिस्थितियाँ व्यापक रूप से प्रभावित करती हैं। मनुष्य को एक 'संतुलित पर्यावरण' की स्थापना करनी चाहिए। लेकिन आज के इस हर क्षण बदलते युग में 'असंतुलित पर्यावरण' की स्थापना हो रही है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण है- 'प्रदूषण'।

प्रदूषण वास्तव में जलवायु या भूमि के भौतिक रासायनिक और जैविक गुणों में कोई भी अवांछनीय परिवर्तन है जिससे मनुष्य, अन्य जीवों, औद्योगिक प्रक्रियाओं सांस्कृतिक तत्वों तथा प्राकृतिक संसाधनों को हानि पहुँचती है। प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है-विश्व की बढ़ती जनसंख्या। विश्व की बढ़ती जनसंख्या के कारण

ही आज पेड़ काटे जा रहे हैं जो प्रदूषण का सबसे मुख्य कारण है। वृक्षों का वातावरण को संतुलित रखने में बहुत बड़ा योगदान है।

प्रदूषण कई प्रकार के हो सकते हैं जैसे वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण आदि।

वायु प्रदूषण सबसे अधिक व्यापक और हानिकारक है। वायुमण्डल में सभी तरह के गैसों की मात्रा निश्चित रहती है और अधिकांशतः ऑक्सीजन और नाइट्रोजन होती है। श्वसन, अपघटन और सक्रिय ज्वालामुखियों से उत्पन्न गैसों के अतिरिक्त हानिकारक गैसों की सर्वाधिक मात्रा मनुष्य के कार्य-कलाप से उत्पन्न होती है। इनमें लकड़ी, कोयले, खनिज तेल तथा कार्बनिक पदार्थों के ज्वलन का सर्वाधिक योगदान है।

औद्योगिक संस्थानों से निकलने वाली सल्फाइड ऑक्साइड गैस तथा हाइड्रोजन सल्फाइड गैस आकाश में जाकर वर्षा से मिल जाती हैं और 'अम्ल वर्षा' का निर्माण करती हैं जो धरती पर पहुँचकर बहुत हानि पहुँचाते हैं। मनुष्यों को इससे चर्म रोग होने की आशंका होती है और पौधों में खाना बनाने वाले 'क्लोरोप्लास्ट' को हानि पहुँचती है। इन रासायनिक पदार्थों से धरती की मिट्टी को भी हानि पहुँचती है। मिट्टी में रासायनिक खाद दी जाती है। मनुष्य को वायु प्रदूषण के कारण कई तरह की एलर्जी उत्पन्न होती है। अन्य प्रभावों से फेफड़ों के रोग होते हैं।

जल सभी प्राणियों के लिए अनिवार्य वस्तु है। पेड़-पौधे भी आवश्यक तत्त्व जल से ही घुली अवस्था में ग्रहण करते हैं। जल में अनेक कार्बनिक, अकार्बनिक पदार्थ, खनिज तत्त्व व गैसें घुली होती हैं। यदि इन तत्त्वों की मात्रा आवश्यकता से अधिक हो जाती है तो जल हानिकारक हो जाता है और इस जल को हम प्रदूषित कहते हैं। पीने योग्य जल का प्रदूषण रोग उत्पन्न करने वाले जीवाणु-विषाणु, कल-कारखानों से निकले हुए वर्जित पदार्थ, कीटनाशक पदार्थ व रासायनिक खाद से हो सकता है। ऐसे जल के उपयोग से पीलिया, आँतों के रोग व अन्य संक्रामक रोग हो जाते हैं। महानगरों में भारी मात्रा में गंदे पदार्थ नदियों के पानी में प्रवाहित किये जाते हैं, जिससे इन नदियों का जल प्रदूषित होकर हानिकारक बनता जा रहा है।

महानगरों में अनेक प्रकार के वाहन, लाउडस्पीकर, बाजे एवं औद्योगिक संस्थानों की मशीनों के शोर ने ध्वनि प्रदूषण को जन्म दिया है। ध्वनि प्रदूषण से न केवल मनुष्य श्रवणशक्ति का हास होता है, वरन् उसके मस्तिष्क पर भी इसका घातक प्रभाव पड़ता है। परमाणु शक्ति उत्पादन व नाभिकीय विखण्डन ने वायु, जल व ध्वनि तीनों प्रदूषणों को काफी विस्तार दे दिया है।

इस प्रकार से हम देखते हैं कि आधुनिक युग में प्रदूषण की समस्या अत्यधिक भयंकर रूप धारण करती जा रही है। यदि इस समस्या का निराकरण समय रहते न किया गया, तो एक दिन ऐसा आयेगा, जबकि प्रदूषण की समस्या सम्पूर्ण मानव जाति को निगल जायेगी।

अतः प्रदूषण से बचने के लिए निम्नलिखित उपायों पर अमल करना आवश्यक है –

  1. वृक्षारोपण का कार्यक्रम तेजी से चलाया जाना चाहिए।
  2. वनों के विनाश पर रोक लगनी चाहिए।
  3. वर्जित पदार्थों के निष्कासन के लिए कोई दूर स्थान पर व्यवस्था करनी चाहिए।
  4. लाउडस्पीकरों का उपयोग कम होना चाहिए।

प्रदूषण से मुक्ति के लिए पूरी धरती के लोगों को सहमत होकर प्रयास करना होगा।

29. मेरी प्रिय पुस्तक ​

[2017A]

मेरी प्रिय पुस्तक 'रामचरितमानस' है। 'रामचरितमानस' को तुलसीदास के द्वादश प्रामाणिक ग्रंथ रत्नों की माला का सुमेरू कहा जा सकता है। इसके प्रतिपाद्य को स्पष्ट करते हुए स्वयं तुलसीदास ने लिखा है –

"एहि महु अदि मध्य अवसाना। प्रभु प्रतिपद्य राम भगवान।"

इस महाकाव्य की भाषा साहित्यिक अवधी है जिसे कवि ने अपने युग की 'राष्ट्रभाषा का-सा प्रशस्त रूप दिया है। यह भारत को राष्ट्रीय गौरव प्रदान करने वाली विश्व-विश्रुत एक अमूल्य कृति है। पूर्ण मानवता और मानव-जीवन की प्रत्येक दशा का उद्घाटन मानस में हुआ है। मनुष्य जीवन का ऐसा कोई पहलू नहीं जो यहाँ न उपस्थित किया गया हो। मानव प्रकृति के जितने अधिक रूपों के साथ

गोस्वामीजी के हृदय का रागात्मक सामंजस्य हम देखते हैं, उतना अधिक हिन्दी भाषा के और किसी कवि के हृदय का नहीं। यदि कहीं सौंदर्य है तो प्रफुल्लता, शक्ति है तो प्रणति, शील है तो हर्षपुलक, गुण है तो आदर, पाप है तो घृणा, अत्याचार है तो क्रोध, अलौकिकता है तो विस्मय, पाखंड हैं तो कूढ़न, शोक है तो करुणा, आनंदोत्सव है तो उल्लास, उपकार है तो कृतज्ञता, महत्त्व है तो दीनता तुलसीदास के हृदय में बिंब प्रतिबिंब भाव से विद्यमान हैं।

मानव-जीवन के सर्वांगीण चित्र के साथ मर्यादा का अपरिमित प्रतिष्ठापन में भी 'मानस' बेजोड़ है। इसके अंतर्गत वर्णन, चरित्रांकन, संस्कृति-निरूपण, रस-योजना, भावचित्रण या पारस्परिक व्यवहार आदि से संबंधित सभी बातों में मर्यादा का कुशल निर्वाह मिलता है। इसी प्रकार, बहुविध समन्वय की जैसी प्रशस्त भावना यहाँ विद्यमान है, वैसी शायद ही कहीं दिखाई पड़े। सच्चे मानस-सेवी और प्रेमी को सगुण-निर्गुण के प्रति अभेद्य दृष्टि प्राप्त होती है; उसे कर्म, ज्ञान और भक्ति सभी में एक-दूसरे के सहायक प्रतीत होते हैं। वह जीवन-मुक्ति और विदेह-मुक्ति का मर्म समझा जाता है। शैव, शाक्त, वैष्णव या किसी अन्य सम्प्रदाय-विशेष के प्रति उसकी आस्था बनी रहती है और सबमें परम तत्त्व की एकता देखता है। किसी से उसका विरोध नहीं है। वह वर्णाश्रम धर्म और मानवता का अनुयायी बना रहता हैं। व्यक्ति, परिवार और समाज सभी के उत्कर्ष का आकांक्षी होता है, पर विशेष महत्त्व लोकधर्म को देता है। वेद-शास्त्र और लोक व्यवहार में अवरोध दृष्टि रखता है। भोग और त्याग दोनों के औचित्य को समझता है। लोक व्यवस्था के बीच राम राज्य का दर्शन करना चाहता है। इन सभी विचारों की उपलब्धि को 'मानस' में समाविष्ट व्यापक, समन्वय की प्रेरणा का सुभग फल ही समझना चाहिए। इसके अतिरिक्त 'मानस' में समन्वय की और भी अनेक दिशाएँ हैं, जिनमें काव्य के भाव-पक्ष तथा कला-पक्ष का समन्वय, काव्य के प्रतिमानों का समन्वय, स्वानुभूति और बाह्यार्थ का समन्वय, काव्य और अध्यात्म का समन्वय तथा संस्कृतियों का समन्वय विशेष उल्लेखनीय है।

तुलसीदास जी में कवि की कारयित्री प्रतिभा, भक्त के निष्काम हृदय और समाज सुधारक की लोक-मंगल की भावना का अपूर्व समन्वय निर्विवाद है। उन्होंने अपने पृथुल अनुभव, सूक्ष्म अन्वेषण और गंभीर शास्त्रज्ञान के सहारे दिव्य-शक्ति की प्रेरणा से कवित्व धर्म और भक्ति की त्रिवेणी 'मानस' के रूप में प्रवाहित करके अपने समन्वय साधना की रश्मियों से समाज के अंधकार को दूर किया। भारत आधुनिकता के वशीकरण से विमोहित हो सकता है, पर भारतीय 'मानस' के रहते स्वप्न में भी धूमिल नहीं होगी। सौंदर्य, उदात्त चेतना और नैतिकता को जागरित करने वाला मानस से बढ़कर दूसरा कोई अन्य महाकाव्य नहीं मिलेगा। 'रामचरितमानस' संपूर्ण भारतीय जनमानस की नानाविध प्रवृत्तियों को रेखांकित करने वाला एक ऐसा महाकाव्य है जिसकी प्रासंगिकता सभी कालों में विद्यमान रहेगी।

30. छात्र और अनुशासन ​

[2017A, 2018A, 2024A]

किसी भी देश का स्वर्णिम भविष्य वहाँ के विद्यार्थियों पर ही निर्भर करता है। जिस देश के विद्यार्थी गुमराह हो जायँ, उसे भगवान भी नहीं बचा सकता। कारण स्पष्ट है जो आज विद्यार्थी हैं वे ही कल सयाने होकर घर-परिवार का भार संभालते हैं, देश का नेतृत्व ग्रहण करते हैं।

देश-विदेश का इतिहास सामने है। तुर्की का नव-निर्माण किया मुस्तफा कमाल ने। आधुनिक रूस को जन्म दिया लेनिन ने। चीन को साम्राज्यवादी चंगुल से छुड़ा उसे स्वतंत्रता-पथ पर आगे बढ़ाया माओ-त्से-तुंग ने। ये सभी विद्यार्थी जीवन में ही अनुशासित थे। इसीलिए अपर्ने देशवासियों में ये अनुशासन की भावना भर सके। महात्मा गाँधी हमारे 'बापू' थे। हम उन्हें 'राष्ट्रपिता' भी कहते हैं। उनके एक इशारे पर राष्ट्र पर मर मिटने को तैयार हो जाते थे। उन्होंने हमारे स्वतंत्रता आन्दोलन का नेतृत्व किया। पर, कभी भी अनुशासन की रास ढीली न होने दी। अपने विद्यार्थी जीवन में ही उन्होंने अनुशासन की जो डगर पकड़ी, उसी पर वे स्वतंत्रता सेनानियों को भी ले गये। और, अनुशासन की शक्ति उनकी एक बड़ी शक्ति बन गयी। देश में छोटे-बड़े नेता तो अनेक होते हैं, पर जो अनुशासन का महत्व प्रारंभ से समझते आये हैं और जिनमें दूसरों को अनुशासन की कड़ी में बाँधने की क्षमता रहती है वे ही देश के लिए कुछ कर पाते हैं।

अनुशासन का अर्थ और कुछ बन्धनों को स्वीकार कर उनके द्वारा शासित होना। ये बंधन समाज या सरकार के भी हो सकते हैं। विद्यालय के कुछ खास नियम हैं। ये नियम विद्यार्थियों के लाभ के दृष्टि से नही बनाये गये हैं। जो विद्यार्थी

इन नियमों का पालन नहीं करता, वह अपनी बर्बादी का कारण स्वयं बनता है। जो समय पर विद्यालय नहीं जायेगा। शिक्षक जो कुछ पढ़ाता है उसे वह ध्यान से नहीं सुनेगा; शिक्षकों द्वारा दिये गये 'टास्क' को जो पूरा करके नहीं लायेगा, वह किसी दूसरे की नहीं, स्वयं अपना अहित करेगा। भले ही विद्यार्थी परीक्षा में गलत उपायों का अवलम्बन कर 'पास' कर जाय, पर उसकी यह चरित्रहीन आंगे उसके लिए बहुत खतरनाक बन जाती है। जो गुरुजनों का आदर नहीं करता, 'डिग्री' भले ही वह किसी तरह हासिल कर ले, पर विद्या की शक्ति उसके पास भी कभी नहीं आ पाती।

एक नियम बनाया गया है कि सड़क पर हम बाईं ओर चलें। इससे हम दुर्घटना से बचते हैं। इसी तरह विद्यालय के एवं समाज के कुछ नियम हैं; सरकार के कुछ नियम हैं। जो विद्यार्थी विद्यालय के नियमों का पालन नहीं करते, वे सही अर्थ में विद्या नहीं ग्रहण कर पाते। जो सामाजिक नियमों का पालन नहीं करते, अर्थात् जो अपने से बड़ों को उचित सम्मान एवं छोटे को स्नेह नहीं देते, जो दूसरों की माँ-बहनों को अपनी माँ-बहनों की तरह नहीं देखते उनमें चारित्रिक उच्छृंखलता आ जाती है।

सबसे ऊपर है विवेक का बन्धन। जो विवेक के बंधन को स्वीकार करेगा वह कभी गलत काम करेगा ही नहीं। विवेक ही विद्या की शक्ति है। अतः विद्यार्थी युदि अपने जीवन को अपने परिवार एवं देश का उन्नत बनाना चाहता है तो उन्हें प्रारंभसे ही अपने-आप में विवेक-बुद्धि जाग्रत करनी होगी।

अनुशासन का चरित्र-निर्माण में बहुत बड़ा हाथ है और सही अर्थ में शिक्षित वही है जो चरित्रनिष्ठ है जिसे भले-बुरे का ज्ञान है, भले ही उसने किताबें न पढ़ी हों। अतः विद्यार्थी याद रखे, अनुशासन को खोकर वे चरित्र को खो देंगे। फिर तो । जानवर की तरह अपना पेट भले ही भर लें, जीवन में 'कुछ' न कर सकेंगे।

31. दहेज प्रथा ​

[2018A]

आज दहेज की प्रथा को देश भर में बुरा माना जाता है। इसके कारण कई दुर्घटनाएँ हो जाती हैं, कितने ही घर बर्बाद हो जाते हैं। आत्महत्याएँ भी होती देखी गई हैं। नित्य-प्रति तेल डालकर बहुओं द्वारा अपने-आपको आग लगाने की घटनाएँ भी समाचार-पत्रों में पढ़ी जाती है। पति एवं सास-ससुर भी बहुओं को जला देते या हत्याएँ कर देते हैं। इसलिए दहेज प्रथा को आज कुरीति माना जाने लगा है। भारतीय सामाजिक जीवन में अनेक अच्छे गुण हैं, परन्तु कतिय बुरी रीतियाँ भी उसमें घुन की भाँति लगी हुई है। इनमें एक रीति दहेज प्रथा की भी है। विवाह के साथ ही पुत्री को दिए जाने वाले सामन को दहेज कहते हैं। इस दहेज में आभूषण, कार, वाशिंग मशीन, फ्रीज, ए०सी०, स्मार्ट टी०वी० आदि की बात ही क्या है, हजारों रुपया नकद भी दिया जाता है। इस दहेज को पुत्री की स्वस्थ शरीर, सौन्दर्य और सुशीलता के साथ ही जीवन को सुविधा देने वाला माना जाता है। दहेज प्रथा का उल्लेख मनु स्मृति में ही प्राप्त हो जाता है, जबकि वस्त्राभूषण युक्त कन्या के विवाह की चर्चा की गई है। गौएँ तथा अन्य वाहन आदि देने का उल्लेख मनुस्मृति में किया गया है। समाज में जीवनोपयोगी सामग्री देने का वर्ण भी यह कि माता-पिता अपनी कन्या को दान देते समय यह सोचते थे कि वस्त्रादि सहित कन्या को कुछ समान दे देने से उसका जीवन सुविधापूर्वक चलता रहेगा और कन्या को भाईयों के समान भागीदार है, चाहे वह अचल सम्पत्ति नहीं लेती थी परन्तु विवाह के काल में उसे यथाशक्ति धन, पदार्थ आदि दिया जाता था, ताकि वह सुविधा से जीवन व्यतीत करके और इसके पश्चात् भी उसे जीवन भर सामान मिलता रहता था। घर भर में उसका सम्मान हमेशा बना रहता था। पुत्री जब भी पिता के घर आती थी, उसे अवश्य ही वस्त्रादि दिया जाता था। इस प्रथा के दुष्परिणामों से भारत के मध्ययुगीन इतिहास अनेक घटनाएँ भरी पड़ी थी। धनी और निर्धन व्यक्तियों को दहेज देने और न देने की स्थिति में दोनों में कष्ट सहने पड़ते हैं। धनियों से दहेज न दे सकने से दुःख भोगना पड़ रहा है। समय के चक्र में इस सामाजिक उपयोगिता की प्रथा ने धीरे-धीरे अपना बुरा रूप धारण करना आरंभ कर दिया और लोगों ने अपनी कन्याओं का विवाह करने के लिए भरपूर धन दने की प्रथा चला दी। इस प्रथा को खराब करने का आरंभ धनी वर्ग से ही हुआ है क्योंकि धनियों को धन की चिन्ता नहीं होती। वे अपनी लड़कियों के लिए लड़का खरीदने की शक्ति रखते हैं। इसलिए दहेज प्रथा ने जघन्य बुरा रूप धारण कर लिया और समाज में यह कुरीति-सी बन गई है। अब इसका निवारण दुष्कर हो रहा है। नौकरी-पेशा या निर्धनों को इस प्रथा से अधिक कष्ट पहुँचता है। अब तो बहुधा लड़के को बैंक का एक चैक मान लिया जाता है कि जब लड़की वाले आयें तो उनकी खाल

खींचकर पैसा इकट्ठा कर लिया जाए ताकि लड़की का विवाह कर देने के साथ ही उसका पिता बेचारा कर्ज से दब जाये।

दहेज प्रथा को सर्वथा बंद नहीं किया जाना चाहिए परन्तु कानून बनाकर एक निश्चित मात्रा तक दहेज देना चाहिए। अब तो पुत्री को पुत्र का पिता की सम्पति में समान भाग स्वीकार किया गया है। इसलिए भी दहेज को कानूनी रूप दिया जाना चाहिए और लड़कों को माता-पिता द्वारा मनमानी धन दहेज में लेने पर प्रतिबंध लग जाना चाहिए। जो लोग दहेज में मनमानी करें उन्हें दण्ड देकर इस दिशा में सुधार करना चाहिए। दहेज प्रथा को भारतीय समाज के माथे पर कलंक के रूप में नहीं रहने देना चाहिए।

32. नशा मुक्ति ​

[2018A, 2022A, 2024A]

नशा सेवन मनुष्य की वे बुरी आदतें हैं जो दिमाग को शिथिल कर देती है। नशा मनुष्य को भूल भुलैया की दुनिया की सैर कराती है। नशा थोड़ी देर के लिए मनुष्य को तनाव रहित कर देती है। नशा चाय, कॉफी और कोको से भी होती है। सिगरेट-पान, मारफीन-पान, मदिरापान, ब्राउन सुगर पान, गुटका पान, हीरोइन पान, तम्बाकू पान, चरस-पान, अफीम-पान डेमैरोल-पान, स्मैक पान, गाँजा पान और ड्रग पान नशा के देने वाले अन्य सहयोगी पर खतरनाक पेय पदार्थ हैं। एल एस डी विस्मृति लाकर आकाश में उड़ाती है। कोकीन का प्रयोग लोग वर्ष-दर-वर्ष करते रहते हैं। नशे में नशेड़ी चूमना चाहते हैं, भले ही मरना क्यों न पड़े। नशे में लोग पागलों का-सा व्यवहार करने लगते हैं। वे हिस्टीरिया रोगी की तरह बेहोश होने लगते हैं। वे स्पर्श-सुख के लिए छटपटाने लगते हैं। नशा-सेवन कहीं से भी प्रशंसनीय नहीं है, फिर भी दुनिया शराब पीती ही रहती है।

एक रिपोर्ट के अनुसार 2030 तक तम्बाकू से हर साल 80 लाख की मौत तक आँकड़ा पहुँच जाएगा। तम्बाकू सेवन से होने वाले रोगों के कारण विश्व में हर साल लगभग 60 लाख लोगों की मौत होती है। इनमें 6 लाख से ज्यादा लोग सेकेंड हँड स्मोकर (सिगरेट पियक्कड़) होते हैं। दुनिया में 1 अरब लोग तम्बाकू का सेवन करते हैं। तम्बाकू के कारण मौत के घाट उतरनेवालों में 80% आबादी लोअर और मिडिल इनकम वाले देशों की होगी। 4 हजार से ज्यादा केमिकल्स स्मोकिंग टवैकों में होते हैं, इनमें से 250 से ज्यादा बेहद खतरनाक होते हैं और 50 से ज्यादा कैंसर कारक होते हैं। भारत में विश्व में तम्बाकू की खपत का दूसरा बड़ा देश है। विश्व में तम्बाकू के कारण जान गँवाने वाली आबादी का छठवाँ हिस्सा भारत में है। 53.5 प्रतिशत भारतीय तम्बाकू सेवन करने वालों में पाए गए जिसमें पुरुषों की संख्या महिलाओं से ज्यादा है। भारत में तम्बाकू सेवन के कारण हर साल आठ से नौ लाख लोगों की मौत होती है।

नशा मनुष्य को बर्बाद कर देती है। नशा नशेड़ी के शरीर को नष्ट और दिमाग को भ्रष्ट कर देती है। लोग इससे यह लाभ समझते हैं कि वे प्रेयसी को ज्यादा संतुष्टि दे सकेंगे। लोग यह समझते हैं कि वे थोड़ी देर के लिए तनाव रहित हो जाते हैं। लोग यह समझते हैं कि वे मांसाहारी भोजन अच्छी तरह पचा सकेंगे। लोग यह समझते हैं कि रोमांस का आनंद वे ज्यादा उठा सकेंगे। लोग समझते हैं कि वे स्वस्थ हो सकेंगे। लेकिन बात ठीक इसके उल्टी ही होती है। हर नशा करने वाला इसे छोड़ना चाहता है, लेकिन वह एक बार चपेट में आने के बाद छोड़ नहीं पाता है। फिर लोग नशा-सेवन करते ही क्यों हैं ? दुर्जनों का संग साथ होने पर या आदतों की मजबूरी के कारण ? तात्कालिक मन की शांति भले मिल जाय, दीर्घकालीन तो घाटा ही घाटा है। समाज की विषमता को नशा सेवन से दूर नहीं किया जा सकता। अमीरी-गरीबी की खाई भी नशा सेवन से दूर नहीं हो पाती।

नशा सेवन से हानि ही हानि है। नशा सेवन से शरीर की नसें कमजोर हो जाती हैं। नशा सेवन से पारिवारिक शांति भंग हो जाती है। पारिवारिक कलह बढ़ जाता है। पैसे की कमी होने लगती है। दारिद्रय बढ़ जाता है। परिवार से बाहर जब पियक्कड़ निकलता है तो सामाजिक कलह पैदा होने लगता है। झगड़ा-झंझट होने लगता है। नशा पीकर नशेड़ी शूटर का भी धंधा अपनाने को मजबूर हो जाता है। नशा सेवन से अंततः राष्ट्र का नुकसान होता है। नशा सामग्री का पैसा आतंकवादियों को चला जाता है। इस पैसे से वे भारत पर चढ़ाई करते हैं। नशा सेवन से अंतर्राष्ट्रीय शांति में खलल पड़ने लगता है। नशा सेवकों की आर्थिक प्रगति रुक जाती है। उनका दिमाग विनाश की ओर जाने लगता है। निर्माण की बात उन्हें उल्टी जान पड़ती है। नशा सेवक मानसिक रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं। नशा के अभाव में वे पागल हो जाते हैं। शराब से कैंसर होता है लीवर गल जाता है। किडनी फेल होने लगती है। हृदय कमजोर होकर फेल कर जाता है। स्मरण शक्ति विलुप्त होने

लगती है। अंत में चोरी, पॉकेटमारी, डकैती जैसे बुरे कर्म करने पड़ते हैं। एक । चम्मच पीना लाभदायक है। लेकिन नशा और अधिक नशे की माँग करता है और मनुष्य धीरे-धीरे उसकी गिरफ्त में आ जाता है। नशा सेवन पूरी मनुष्य जाति की मानवता को नष्ट कर देती है।

मादक पदार्थ यदि उपलब्ध ही न हों तो नशा सेवन पर रोक लग सकती है। लेकिन यह तो मुनाफे का धंधा है। यह धंधा राजनीतिज्ञों को भी पसंद है। सरकार को इससे टैक्स ज्यादा मिलता है। अतः यह धंधा रुक नहीं पाता है। नशा सेवन किसी-किसी देश में सामाजिक रूप से स्वीकृत है। यह उनकी रईसी की पहचान है। इसलिए नशे का सेवन बढ़ता ही जाता है। संसार में नशेड़ी-गंजेड़ी-शराबी ज्यादा हैं और इसे रोकने वाले कम हैं। अतः यह धंधा बढ़ता ही जाता है।

नशा सेवन सभी उपभोक्ताओं को अपराधी बनाता है। यह एक सामाजिक अपराध है। नशा सेवन से समाज की शक्ति भंग हो जाती है। व्यक्ति, समाज और देश उपद्रव ग्रस्त होने लगता है। अतः इस सामाजिक अपराध से देश को बचाना आवश्यक है। नशाबंदी के पक्ष में सभी को आगे आना होगा।

नशाबंदी परिवार, समाज देश और विदेश की रक्षा कर सकती है। अतः इसे अपनाना होगा।

33. पर्यावरण ​

[2018A, 2019A, 2021A, 2022A, 2025A]

मनुष्य को यह शक्ति प्रदान की गयी है कि वह कुछ नयी चीजों का आविष्कार कर सके, ताकि उसके सुख-संसाधन बढ़ सके। लेकिन अब तक यह देखा गया है कि वह आविष्कार आविष्कार नहीं बन पाया है, वह ध्वंस और विनाश का उपकरण मात्र बनकर रह गया है। जंगली जानवरों को मनुष्यों ने मारा और पर्यावरण को बुरी तरह प्रदूषित किया। धरती को मनुष्यों ने दरिद्र बनाया और प्रतिदिन उसे कुरूप किया। बीसवीं शताब्दी में मनुष्य ने धरती को बहुत नुकसान पहुँचाया, उतना जितना इसके पहले की शताब्दियों में भी उसने नहीं पहुँचाया था। संसार में अब क्या बचेगा ? केवल कंकरीट, पत्थर के मकान और सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों के टायर। मनुष्य तो दुःखी ही रहेगा-'सब्बं दुखं'।

पर्यावरण का अर्थ है धरती के ऊपर घेरनेवाला वातावरण-परिवेश। हवा प्रदूषित, पानी प्रदूषित और ध्वनि प्रदूषण ने धरती को हिला कर रख दिया है। हमें पर्यावरण की चेतना का संचार करना होगा। "पर्यावरण चेतना का अर्थ है कि लोग यह समझें कि कुदरत या प्रकृति के साथ संगति रखने में ही सुख है, विसंगति तो वेदना और विभीषिका को जन्म देती है। वन होंगे, तो वर्षा होगी, भूमि का कटाव रुकेगा, रेगिस्तान के पाँव बँधे जायेंगे, धरती की उर्वरा शक्ति बढ़ेगी और हमें अरबों-खरबों रुपयों की नैसर्गिक सम्पदा मिलती रहेगी।

1 चार दशक पूर्व पृथ्वी के उष्ण कटिबंधीय वर्षा से वनों का भाग नष्ट हो 3

चुका था। वनों का यह विनाश धड़ल्ले से होता जा रहा है।

दशक पूर्व के आँकड़ा के अनुसार प्रतिवर्ष एक लाख सत्तर हजार वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र समाप्त हो रहे हैं; सात लाख हेक्टेयर भूमि रेगिस्तान में बदल रही है और पानी ? पानी की दुर्दशा तो यह है कि करोड़ों गैलन दूषित जल नदियों-झीलों के अस्तित्व का क्षरण, हवा में घुलता प्रदूषण का जहर, आण्विक रिएक्टरों की दुर्घटनाएँ और प्राकृतिक खनिजों और संसाधनों के बेरहम दोहन एवं शोषण आखिर हमें कहाँ ले जाएँगें ? ये धुआँ उगलती फैक्टरियाँ, जहरीले रसायनों का पौधों पर छिड़काव, ओजोन परत की क्षति और रेडियो एक्टिव धूलकण-ये सृष्टि को कहाँतक सुरक्षित रहने देंगे ?"

पर्यावरण की सुरक्षा के लिए पूरी दुनिया के लोगों को पहले एकमत होना होगा। सभी को यह चाहना होगा कि पर्यावरण प्रदूषित न हो। पर्यावरण शुद्ध करने के लिए कुछ उपायों पर उन्हें अमल करना होगा। पहले जंगलों के काटे जाने पर पूरी रोक लगानी होगी। पेड़ हवा को शुद्ध करते हैं। पेड़ बाढ़ आने से रोकते हैं।। पेड़ वर्षा कराते हैं। पेड़ अनावृष्टि जैसी विपदा से धरती और धरती के लोगों को बचाते हैं। पेड़ वर्षा के चक्र को नियमित एवं संयमित करते हैं। पेड़ मरुभूमि के विस्तार को रोकते हैं। पेड़ ऑक्सीजन छोड़ते और कार्बन डाइऑक्साइड लेते हैं। पेड़ धरती को ठंडा रखते हैं। पेड़ धरती को गर्मी को कम एवं नियंत्रित करते हैं।

दूसरे, ऊर्जा की खपत हमें कम करनी होगी। प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त ऊर्जा का हमें इस्तेमाल करना होगा। सूर्य से प्राप्त ऊर्जा का हमें इस्तेमाल करना होगा।

पवन से प्राप्त ऊर्जा का हमें इस्तेमाल करना होगा। बिजली की खपत हमें कम करनी होगी।

तृतीयतः हमें, मोबाइल का इस्तेमाल कम करना होगा। चतुर्थतः फ्रीज, एयर कंडीशनर का इस्तेमाल हमें कम करना होगा। इससे ऑक्सीजन एवं ओजोन का क्षरण रुकेगा।

वन्य प्राणियों के जीवन पर पर्यावरण प्रदूषण का असर पड़ा। पेड़ एवं जंगल कट जाने से जंगली जानवर बाघ, चीता, सिंह इत्यादि शहरों की ओर भागते हैं जहाँ उनका शिकार हो जाता है। प्रत्येक राष्ट्र को पर्यावरण, वनों एवं वन्य प्राणियों की रक्षा करने की पूरी कोशिश करनी होगी। वस्तुतः यदि वन न हों तो जीव जंतुओं की कल्पना ही नहीं की जा सकती। वन्य प्राणियों के रक्षण के लिए वन की उपयोगिता बनी रहेगी।

34. हिन्दी हैं हम ​

[2019A]

भारत में रहनेवाला हर एक नागरिक अपने मुल्क की मिट्टी से जुड़ा हुआ है उसे भारत के किसी कोने में रहने का हक है पूरे भारत में हर जगह हर तरह की भाषा पाई जाती है अलग-अलग विचार आहार विहार भाषा लेकिन सबकी संस्कृति एक है। एक सोच जो हमारे देश के गौरव को और बढ़ाती है। हमारे स्वतंत्र भारत का स्वपन है कि समस्त भारत धर्मनिरपेक्ष हो। परन्तु कुछ लोग हैं ऐसे जो हमारे ही देश की सोच को तोड़ना चाहते हैं। धिक्कार उस देशद्रोहियों पर जो हमारे अपनो को दूर करना चाहते हैं।

हमें चाहिए की हमारे देश में, हमारे मन में नफरत की आग फैलाने वाले इन शरारती तत्वों से हमारे देश को हमारी प्यारे देशवासियों को बचाए रखे। देश के हर कोने-कोने में यह अहसास दिलाये किं की हर हाल में हम आपके साथ हैं। कोई बाहरी ताकत हमें कमजोर बनाना चाहता है। हमारी एकता को मिटाकर हमारी ताकत को खोखला करने का दिवा स्वपन्न देख रहा है। मेरे प्यारे देशवासियों संकट के समय हमें हमारे भाई बहनों को विश्वास दिलाना होगा, हर पल उनके साथ रहकर उनकी सुरक्षा का जिम्मा उठाना होगा। हमारी कौमी एकता को ललकार कर कोई हमें ठेस पहुँचाने का साहस न करे, हमारी संस्कृति हमारे संस्कार मिलजुलकर रहने की शिक्षा देती है। जिओ और जीने दो का सन्देश देती है प्यार करना सिखाती है, नफरत का हमारे सर्वधर्म समभाव से कोई नाता नहीं।

हम सब भारतवासी एक थे और एक हैं और सदा एक रहेंगे। हमारी एकता के आगे कोई शैतानी शक्ति नहीं टिक पाएगी।

35. ग्राम पंचायत ​

[2019A]

भारत की अधिकतर जनसंख्या गाँवों में रहती है और जिस प्रकार एक राज्य के लिए राज्य सरकार है और नगरों के लिए नगर पालिका है वैसे ही गाँवों के लिए ग्राम पंचायत को बनाया गया है। ग्राम पंचायत लगभग हर गाँव में है और यह गाँव में होने वाली गतिविधियों पर नजर रखती है और उनके विकास के लिए कार्य करती है। किसी भी गाँव के सभी व्यस्क मिलकर ग्राम सभा का निर्माण करते हैं और वहीं सब मिलकर कार्य करने वाले लोगों को चुनते हैं। ग्राम पंचायत में पंचो का चुनाव किया जाता है और वही पंच मिलकर सरपंच को चुनते हैं और ग्राम पंचायत का निर्माण करते हैं। ग्राम पंचायत को गाँव के लोगों के हित के लिए कार्य करना होता है। वह दो प्रकार से कार्य होती है। एक होते है अनिवार्य कार्य और दूसरे होते हैं एच्छिक कार्य। अनिवार्य कार्यों के अंतर्गत गाँव में पानी, बिजली आदि की व्यवस्था करना है। पढ़ने के लिए स्कूल कॉलेज खोलना है। लोगों को रोजगार दिलाना है। ऐच्छिक कार्यों के अंतर्गत कुँए आदि बनवाना आता है और वह यह सिर्फ अपनी मर्जी से करते हैं। ग्राम पंचायत को कार्य करने के लिए पैसों की जरूरत होती है जो कि उन्हें लोगों से कर जमा करके प्राप्त होता है या फिर सरकार के द्वारा दिया जाता है। सरकार द्वारा दी गई राशि को वो जनता के कल्याण के लिए प्रयोग करते हैं। ग्राम पंचायत में भी आजकल बहुत सारी कमियाँ आने लगी है। - सालों से जो लोग सरपंच बनता है जिससे कि बाकी लोगों को मौका नही मिलता सरकार के धन का भी सही तरह से प्रयोग नही किया जाता है। लोग उन्हें अपनी निजी कार्यों के लिए प्रयोग करते हैं। हर बार पंचायती राज किसी एक जाति या जमींदार के हाथ में चला जाता है। ग्राम पंचायत का संगठन ग्रामीण कल्याण के लिए किया गया है। इसलिए हमें इसके सदस्यों का चयन सुझ बुझ के साथ करना चाहिए। हमें इसके लिए कर्मठ और ईमानदार व्यक्तियों का चयन करना चाहिए। कुछ साल बाद चुनाव होने चाहिए। जिससे कि दोबारा से इसके सदस्यों का चयन

किया जा सके। कभी-कभी आमदनी के अभाव में भी पंचायतें अपना काम अच्छे से नहीं कर पाते हैं। ग्राम पंचायत को सहकारी खेती और सहकारी बैंक आदि खोलने चाहिए। लोगों को भी चाहिए कि वो सोच समझकर ही गाँव के कल्याण के लिए अच्छे सदस्यों का चयन करें।

36. छात्र जीवन ​

[2020A, 2023A]

छात्र का जीवन मनुष्य जीवन की आधारशिला है। उसे आरम्भ में जिस प्रकार की शिक्षा मिलेगी, जिस प्रकार का उसका वातावरण होगा, वह उसी के अनुसार इलेगा। उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए उसका छात्र जीवन आदर्श होना चाहिए। शिक्षाविहीन व्यक्ति पशु के समान है। पशुत्व से मनुष्यता तक पहुँचने के लिए हर उच्च आदर्श उसको प्रदान करना माता-पिता, समाज तथा सरकार का कर्तव्य है। छात्र का जीवन तपस्या का जीवन है। इस जीवन में ही वह शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक गुणों का विकास करता है। जीवन के आरम्भ में यदि वह अनुशासन के नियमों का पालन करता है, तो उसका जीवन अवश्य सुखमय होगा। अतः आदर्श विद्यार्थी बनने के लिए उसके अन्दर आज्ञा पालन, अनुशासन एवं सद्बुद्धि अवश्य होनी चाहिए।

माता-पिता, गुरुजनों और अपने से बड़े व्यक्तियों का सम्मान करना तथा उनकी आज्ञा के अनुसार चलना अच्छे छात्र का कर्तव्य है। छात्र को एकाग्रचित होकर विद्या का अध्ययन करना चाहिए। उसे हर स्थान पर संयम से काम करना चाहिए। कक्षा अथवा छात्रावास में, खेल के मैदान में अथवा भोजन के स्थान पर उसके संयम की परीक्षा होती है। उसका जीवन नियमित होना चाहिए। उसे जिज्ञासु होना चाहिए। प्रत्येक नई चीज को सीखने का उसे चाव होना चाहिए।

आदर्श विद्यार्थी को सादा जीवन तथा उच्च विचार के सिद्धान्त का पालन करना चाहिए। उसे अपने साथियों के साथ मित्रता का व्यवहार करना चाहिए। पढ़ने के साथ-साथ अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए उसे एक अच्छा खिलाड़ी होना चाहिए। आदर्श विद्यार्थी को मधुरभाषी, स्वावलंबी तथा सदाचारी होना चाहिए। उसे किसी के साथ झूठ, छल-कपट का व्यवहार नहीं करना चाहिए। उसे समय और धन का मूल्य समझना चाहिए। आदर्श विद्यार्थी को कठोरता से अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। परीक्षा में केवल अपनी मेहनत के बल पर उत्तीर्ण होना चाहिए।

छात्र या विद्यार्थी राष्ट्र की संपत्ति है। देश की उन्नति उन्हीं पर निर्भर है। यही कारण है कि इन्हें देश का कर्णधार भी कहा जाता है। छात्र जीवन में कुछ कर डालने की भावना ही उनमें जोश भरती रहती है। इस जोश को कम करने के लिए अनुभव की आवश्यकता होती है। अब तक देश के जितने भी महान नेता हुए हैं वे सब अपनी छात्र अवस्था से ही बनने शुरू हो गये थे। छात्रों में सामर्थ्य होती है यदि उसका उचित मार्गदर्शन कर दिया जाए तो वे निश्चित ही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेते हैं। माता जीजाबाई के उपदेशों का ही फल था कि साधनहीन शिवाजी ने देखते-देखते एक साम्राज्य का निर्माण कर डाला। गुरु गोविन्द सिंह ने खालसा पंथ की नींव डाली, महात्मा गाँधी और जवाहरलाल नेहरू भी छात्र अवस्था से ही देश सेवा में जुट गये।

छात्र जीवन किसी भी मनुष्य के जीवन की नींव होता है। यदि नींव अभी से मजबूत होगी तो भविष्य भी सुरक्षित तथा सुदृढ़ होगा। यह कहने से अभिप्राय है कि छात्र को अपने इस समय में इतनी अधिक मेहनत कर लेनी चाहिए कि फिर भविष्य में उसे कष्ट न भोगना पड़े। जो बालक छात्र जीवन मौज-मस्ती में गुजार देता है उसे आजीवन परिश्रम करना पड़ता है। इसलिए छात्रों को समय का सदुपयोग करते हुए कड़ी मेहनत कर अपने भविष्य के जीवन को सुरक्षित बनाने का प्रयत्न करना चाहिए।

37. दीपावली ​

[2020A]

दीपावली मेरा प्रिय पर्व है। दीपावली भारत का एक अति प्राचीन त्योहार है। यह हमारे देश में बड़े उत्साह के साथ मनायी जाती है। सभी जातियों, धर्मों और सम्प्रदायों के लोग भेदभाव भुलाकर इस उत्सव का आयोजन किसी-न-किसी रूप में करते हैं। भारत में दीपावली को एक महान राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक पर्व माना जाता है।

दीपावली के आरम्भ की अनेक पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं। सर्वाधिक प्रचलित कथा के अनुसार श्री रामचन्द्र जब चौदह वर्षों के वनवास के बाद रावण को मारकर सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे तब सभी जगह खुशी से दीप जलाये गये थे। उसी विजय की स्मृति में यह दीपावली हर वर्ष मनाई जाने लगी।

कथा चाहे जो भी हो, एक बात बिल्कुल साफ है कि दिवाली हर वर्ष भारतवासियों को जीवन का नया संदेश देने आती है कि सत्य की जीत और असत्य की हार एक-न-एक दिन अवश्य होती है। यह हमारे जीवन का अन्धकार दूर कर फुलझड़ियों की तरह नया प्रकाश बिखेरती है। हम अपने अन्दर नवीनता का अनुभव करते हैं।

दीवाली आने के पहले से ही लोग अपने-अपने घरों की सफाई, पुताई-रंगाई आरम्भ कर देते हैं। छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, सभी तरह के लोग दीवाली के स्वागत की तैयारी में लग जाते हैं। किसी शुभ कार्य का आरम्भ भी दीवाली के दिन ही किया जाता है। दिवाली आती है कार्तिक अमावस्या की रात में। मकान की छतों, छज्जों और मुंडेरों पर दीपों की माला सजायी जाती है। बच्चे पटाखे और रंग-बिरंगी फुलझड़ियाँ छोड़ते हैं। हर जगह रोशनी ही रोशनी दिखाई देती है। रोशनी की इस जगमगाहट में सबके चेहरों पर खुशी की लहर छा जाती है। लोग बाजार की रोशनी और सजावट देखने घर से बाहर निकलते हैं। मिठाइयाँ खाते-खिलाते रात के कुछ घंटे बीत जाते हैं। व्यापारी और सेठ, साहूकार रात में धन की देवी लक्ष्मी की पूजा बड़े धूम-धाम से करते हैं। लोग नये-नये कपड़े और बर्तन खरीदते हैं।

दीवाली का धार्मिक महत्त्व तो है ही इसका सामाजिक महत्त्व भी कम नहीं है। वर्षा ऋतु के बाद मकानों की मरम्मत और उसकी पुताई, खिड़कियों और दरवाजों की रंगाई, पास-पड़ोस की सफाई हमारे यहाँ इसी दीवाली के उपलक्ष्य में होती है। साल में एक बार ऐसा करना आवश्यक समझा जाता है। इस प्रकार सारी गंदगी दूर हो जाती है। दीवाली हमारे जीवन में नवीन प्रकाश बिखेरती है। हमारे आस-पास के वातावरण को पवित्र बनाती है। यह हमें भाईचारे, सहयोग, सुख और शान्ति का संदेश देती है।

दीपावली का यह त्योहार भारत के हर राज्य में मनाया जाता है। इसे खासकर हिन्दू और सिक्ख लोग नियमित रूप से मनाते हैं। पड़ोसी देश नेपाल, पाकिस्तान और बंगला देश में भी यह पर्व मनाया जाता है। विदेशों में मॉरीशस में तो यह पर्व भारत जैसा ही होता है। दीपावली के एक दिन पूर्व धनतेरस होता है, इस दिन धनी, गरीब सब कुछ-न-कुछ बर्तन अवश्य खरीदते हैं। इस दिन पुराने बर्तनों की भी अदला-बदली होती है। घरेलू उपयोग के कुछ-न-कुछ सामान इस दिन खरीदना अनिवार्य हो जाता है। इस दिन व्यापारी अपना नया बही-खाता आरम्भ करते हैं। पुराने खातों का हिसाब नये खातों में लाते हैं तथा अपनी गद्दी के निकट दीवार में शुभ-लाभ लिखकर गणेश और लक्ष्मी की नयी प्रतिमा को प्रतिष्ठित करते हैं।

38. शिक्षक दिवस ​

[2020A, 2023A]

समाज को सही दिशा देने में शिक्षक की अहम् भूमिका होती है। वह देश के भावी नागरिकों अर्थात् बच्चों के व्यक्तित्व संवारने के साथ-साथ उन्हें शिक्षित भी करता है। इसलिए शिक्षकों द्वारा किये गये श्रेष्ठ कार्यों का मूल्यांकन कर उन्हें सम्मानित करने का दिन ही शिक्षक दिवस कहलाता है। हांलाकि डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन जो कि 1962 से 1967 तक भारत के राष्ट्रपति भी रहे। उनके जन्म दिवस के अवसर पर ही शिक्षक दिवस मनाया जाता है। वे संस्कृतज्ञ, दार्शनिक होने के साथ-साथ शिक्षा शास्त्री भी थे। राष्ट्रपति बनने से पूर्व वे शिक्षा क्षेत्र से ही सम्बद्ध थे। 1920 से 1921 तक उन्हें कलकत्ता विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के किंग जॉर्ज पंचम पद को सुशोभित किया। 1939 से 1948 तक वे विश्वविख्यात काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के उपकुलपति पद पर रहे। राष्ट्रपति बनने के बाद जब उनका जन्म दिवस सार्वजनिक रूप से आयोजित करना चाहा तो उन्होंने जीवन का अधिकतर समय शिक्षक रहने के नाते इस दिवस को शिक्षकों का सम्मान करने हेतु शिक्षक दिवस मनाने की बात कही। उस समय से प्रतिवर्ष यह दिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।

शिक्षकों द्वारा किये गये श्रेष्ठ कार्यों का मूल्यांकन कर उन्हें सम्मानित करने का भी यही दिन है। इस दिन स्कूलों कॉलेजों में शिक्षक का कार्य छात्र खुद ही संभालतें हैं। इस दिन राज्य सरकारों द्वारा अपने स्तर पर शिक्षण के प्रति समर्पित और छात्र-छात्राओं के प्रति अनुराग रखने वाले शिक्षकों को सम्मानित किया जाता है। शिक्षक राष्ट्र निर्माण में मददगार साबित होते हैं वहीं वे राष्ट्रीय संस्कृति के संरक्षक भी हैं। वे बालकों में सुसंस्कार तो डालते ही हैं उनके अज्ञानता रूपी अंधकार को दूर कर उन्हें देश का श्रेष्ठ नागरिक बनाने का दायित्व भी वहन करते हैं। शिक्षक राष्ट्र के बालकों को न केवल साक्षर ही बनाते हैं बल्कि अपने उपदेश द्वारा उनके ज्ञान का तीसरा नेत्र भी खोलते हैं। वे बालकों में हित-अहित, भला-बुरा

सोचने की शक्ति उत्पन्न करते हैं। इस तरह वे राष्ट्र के समग्र विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

शिक्षक उस दीपक के समान हैं जो अपनी ज्ञान ज्योति से बालकों को प्रकाशमान करते हैं। महर्षि अरविन्द ने अपनी एक पुस्तक जिसका शीर्षक 'महर्षि अरविन्द के विचार' में शिक्षक के संबंध में लिखा है अध्यापक राष्ट्र की संस्कृति के माली होते हैं वे संस्कार की जड़ों में खाद देते हैं। और अपने श्रम से उन्हें सींच-सींच कर महाप्राण शक्तियाँ बनाते हैं। इटली के एक उपन्यासकार ने शिक्षक के बारे में कहा है कि शिक्षक उस मोमबत्ती के समान है जो स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देती है। संत कबीर ने तो गुरु को ईश्वर से भी बड़ा माना है। उन्होंने गुरु को ईश्वर से बड़ा मानते हुए कहा है कि-

गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागू पाय। बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय ।।

शिक्षक को आदर देना समाज और राष्ट्र में उनकी कीर्ति को फैलाना केन्द्र व राज्य सरकारों का कर्तव्य ही नहीं दायित्व भी है। इस दायित्व को पूरा करने का शिक्षक दिवस एक अच्छा दिन है।

गुरु से आशीर्वाद लेने की भारत की अत्यंत प्राचीन परिपाटी है। आषाढ़ माह में पड़ने वाली पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा या व्यास पूर्णिमा नाम इसी के निमित्त दिया गया है। स्कूलों-कॉलेजों के अतिरिक्त सरकार की ओर से भी इस दिन समारोह आयोजित किये जाते हैं। दिल्ली सरकार द्वारा आयोजित एक बड़े समारोह में राजधानी के स्कूलों से चयनित श्रेष्ठ शिक्षकों को सम्मानित किया जाता है। इसके अलावा स्थानीय निकायों मसलन दिल्ली नगर निगम, नई दिल्ली नगर पालिको परिषद्, दिल्ली छावनी परिषद् द्वारा भी समारोह आयोजित कर अपने अधीन आने वाले स्कूलों के श्रेष्ठ शिक्षकों को सम्मानित किया जाता है।

39. स्वच्छ भारत अभियान ​

[2020A, 2024A]

स्वच्छ भारत अभियान एक देशव्यापी स्वच्छता अभियान है जिसका उद्देश्य देश भर में लोगों को स्वच्छता को लेकर जागरूक करना है, महात्मा गाँधी ने सर्वप्रथम देश को अपने आस-पास को स्वच्छ बनाए रखने की शिक्षा दी थी, इसलिए भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने महात्मा गाँधी की 145वीं जयंती पर 2 अक्टूबर, 2014 को स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत की थी।

इस अभियान का मुख्य उद्देश्य भारत में सार्वजनिक शौचालयों को बनवाकर लोगों को खुले में शौच करने से रोकना है जिससे खुले में फैल रही गन्दगी से मुक्ति मिल सके। स्वच्छ भारत मिशन का लक्ष्य 2019 तक 1.2 करोड़ शौचालयों को बनवाकर देश को शौच मुक्त भारत घोषित करना है। गाँवों में धुआँ-युक्त वातावरण को समाप्त करने हेतु उज्ज्वला योजना द्वारा गैस का कनेक्शन भी दिया जा रहा है। हर प्रकार से भारत को प्रदूषण मुक्त करने का उद्देश्य है।

इसलिए हर साल 2 अक्टूबर को सभी स्कूलों तथा कार्यालयों में स्वच्छ भारत अभियान के लिए. कार्यक्रम रखे जाते हैं और इस दिन विद्यार्थियों को स्वच्छ रहने तथा अपने आस-पास की स्वच्छता बनाये रखने की शिक्षा दी जाती है।

इस अभियान को सफल बनाने के लिए सरकार ने साफ शहरों की सूची भी जारी करने की घोषणा की थी जिससे यह पता चलता है कि कौन-सा शहर सफाई में कितनी प्रगति कर रहा है। स्वच्छता में भगवान् का वास होता है अतः हम सभी को मिलजुल कर यह कोशिश करना चाहिए कि हम अपने मोहल्ले, गली तथा गाँव की सफाई में अपना पूरा योगदान दें।

40. पुस्तकालय ​

[2020A, 2023A]

पुस्तकालय प्रज्ञा की पावन प्रभाव है। 'पुस्तकालय' का अर्थ होता है 'पुस्तकों का घर' यानी वह स्थल जहाँ बहुत सारी पुस्तकें हों और जिन्हें कुछ नियमित पढ़नेवाले हों। आजकल ऐसे पुस्तकालय अच्छे शहरों के हर मुहल्ले में मिलते हैं, कस्बों और बड़े गाँवों में भी अवश्य होते हैं। अब तो इनका विस्तार गाँव-गाँव में किया जा रहा है। पुस्तकालय प्रायः सार्वजनिक भी होते हैं; वैसे, बहुत-से प्रबुद्ध नागरिक निजी पुस्तकालय भी रखते हैं। इधर सरकार द्वारा चल पुस्तकालयों की भी व्यवस्था की गई है। लोगों की अध्ययन में रुचि एवं सामर्थ्य के अनुरूप किसी केन्द्रीय स्थल पर ऐसे भवन का चुनाव कर लिया जाता है, जिसमें कम-से-कम तीन या और अधिक कमरे हों। उनमें एक कमरा, जो प्रायः और कमरों से छोटा और किनारे पर आगे की ओर होता है, पुस्तकालय के कार्यालय का काम करता है। शेष कमरों में लोहे की या लकड़ी की, उनकी क्षमता के मुताबिक, आलमारियाँ

सजी होती हैं। इनमें पुस्तके अक्षरानुक्रम से सजाई जाती है। कई बार इनका विषयवार वर्गीकरण भी कर दिया जाता है कुछ आलमारियों में खानों के सामने (आगे की ओर) शीशे लगे रहते हैं जिनसे अन्दर रखी किताबें साफ दिखती है।

पुस्तकालय के कार्यालय में उसकी देखरेख के लिए निर्धारित या नियुक्त पदाधिकारी बैठां करते हैं। एक दो कर्मचारी ऐसे भी होते हैं जो पुस्तकें निकालकर दिया करते हैं या पुस्तकालय के बाहर जाने या पुनः लौटाई जाने वाली पुस्तकों को रजिस्टर में दर्ज किया करते हैं। अच्छे पुस्तकालयों में एक सार्वजनिक अध्ययनकक्ष होता है, जहाँ बीच में ऊँचे चौड़े टेबुल सजे होते हैं और उनके दोनों ओर बैठकर पढ़ने के लिए कुर्सियाँ या बेंच। बीच के टेबुलों पर प्रायः पत्र-पत्रिकाएँ रखी होती है। ये पत्र-पत्रिकाएँ विभिन्न प्रकार की दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक बगैरह होती है। ये विभिन्न स्थलों से प्रकाशित होती है और पुस्तकालय सचिव द्वारा चन्दे भेजकर वहाँ से मँगवाई जाती है। अच्छे पुस्कालयों में मनोरंजन के कुछ सामान जुटाए जाते हैं, यद्यपि उनके चयन में सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। ग्रामीण पुस्तकालयों में, जहाँ अधिकांश सदस्य गरीब होते हैं; वहाँ रखे जाने वाले रेडियो का बड़ा महत्व होता है। सदस्य उससे अपने राज्य, देश एवं पूरे विश्व की खबरें सुनते हैं; उससे होनेवाले साहित्यिक महत्व के प्रसारणों का आनन्द लेते हैं और अपना मनोरंजन भी करते हैं।

पुस्तकालय वस्तुतः ज्ञान के घर हैं। वहाँ सदस्य ज्ञानार्जन के लिए जाते हैं। इसी उद्देश्य से वहाँ पुस्तकें निर्गत करते और घर ले जाकर पढ़ा करते हैं। पर यह उद्देश्य भलीभाँती तभी पुरा हो सकता है जब पुस्तकालय के पदाधिकारी पढ़े-लिखे एवं शालीन रुचि से सम्पन्न हों; वे विभिन्न विषयों की अच्छी पुस्तकों का चुनाव करें और हलकी, भोंडी, अश्लील पुस्तकों से अपने पुस्तकालय को बचाए रखें। कारण, क्या शहर और क्या गाँव, ऐसे पुस्तकालय सर्वत्र भरे पड़े हैं, जहाँ पुस्तकों के नाम पर अश्लील और जासूसी कथा-पुस्तकों का अंबार लगा रहता है, अन्य सुपाठ्य सामग्री कुछ भी नहीं होती। पुस्तकालयों को जहाँ राष्ट्र के सांस्कृतिक गौरव से परिचय प्राप्त करने का केन्द्र बनाया जाना चाहिए वहाँ उनके माध्यम से ही राष्ट्रीय भावना का प्रचार-प्रसार भी होते रहना चाहिए। ऐसा होने में ही पुस्तकालयों की महती सार्थकता है।

41. शराबबंदी ​

[2020A]

बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने 26 नवंबर, 2015 को 1 अप्रैल, 2016 से शराब मुक्ति का ऐलान किया। लेकिन पूरी तरह बिहार में 5 अप्रैल, 2016 को नीतीश कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके घोषणा किया कि होटलों, बारों, दुकानों एवं अन्य सभी जगहों में शराब का सेवन करना वैध नहीं होगा। ऐसा करने पर जिम्मेवार व्यक्ति को सजा का प्रावधान है। यह सामाजिक दृष्टिकोण से बहुत ही सराहनीय कदम है। खासकर महिलाएँ एवं बच्चों ने इस ऐतिहासिक कदम का स्वागत किया है।

आज हमारे सामनें एक सबसे बड़ी सामाजिक समस्या पैदा हो रही है, युवाओं के नशे का शिकार होना। जो कल के होने वाले देश के जांबाज कर्णधार हैं आज वही सबसे ज्यादा नशे के शिकार हैं। जिनको देश की उन्नति में अपनी ऊर्जा लगानी थी वो आज अपनी अनमोल शारीरिक और मानसिक ऊर्जा चोरी, लूट-पाट और मर्डर जैसी सामाजिक कुरीतियों में नष्ट कर रहे हैं। आज का 90 प्रतिशत युवा नशे का शिकार हैं।

हालांकि शराब आपको खुशी की भावना और होश दे सकता है और अंततः नशे के दौरान मूर्च्छा, एक व्यक्ति का रक्तचाप, नाड़ी, संचार और नर्वस सिस्टम के रूप में और श्वसन में कमी आती है। यदि आप थके हुए हैं और शराब पीते है, तब यह और भी हानिकारक हो सकता है और यह आपकी मौत का कारण भी बन सकता है। इससे शरीर की बीमारी बढ़ जाती है और बीमारी से लड़ने की क्षमता कमजोर पड़ जाती है। शराब में अवशोषण और खून में पोषक पदार्थों की कमी हो जाती है। नशे की आदत के कारण कई और बुरे रोगों से ग्रस्त हो सकते हैं तथा इसकी लत अधिक हो जाने के कारण आपको गुर्दे का कैंसर तथा आपको मौत का सामना भी करना पड़ सकता है। भारी शराब की सेवन पर प्रतिकूल अपने शरीर में हर अंग को प्रभावित कर सकता है। वहाँ एक बहुत ही बीमारियों और विकारों भारी पीने के साथ जुड़ा की लंबी सूची है जिनमें से गुप्तांगों से खून का बहाव, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, हैपेटाइटिस, पेट, मुख, स्तत्र, जिगर आदि का कैंसर, रक्ताल्पता, अस्थिमज्जा दमन, अल्सर, अग्नाशयी, यौन रोग, नींद का न आना।

शराब सेवन करने वाले व्यक्ति का पारिवारिक जीवन भी नष्ट हो जाता है। । वह शराब पीकर अपनी पत्नी और बच्चों के साथ हिंसा का व्यवहार करता है। नशे के हालत में वह कभी-कभी अपनी पत्नी और बच्चों का मर्डर तक कर देता है। अतः शराब मुक्ति से समाज का पूर्ण विकास होता है।

42. हमारे पावन पर्व ​

[2021A]

भारत को त्योहारों का देश कहा जाता है। भारतीय त्योहार मुख्य रूप से फसलों के त्योहार हैं। इसका कारण है, भारत का कृषि प्रधान देश होता। लगभग सभी त्योहार धर्मों से संबंधित हैं। भारत अनेक धर्मों का देश है। यहाँ हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख, पारसी, ईसाई और इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग रहते हैं। सभी धर्मो को मानने वालों को अपने-अपने धर्म पालन और त्योहार मनाने की स्वतंत्रता है। इसलिए धार्मिक त्योहार भी विविधता लिए हुए हैं। इनसे एक-दूसरे के धर्मों को जानकर अच्छे मनुष्य बनने का भाव जागृत होता है। दशहरा, दीपावली, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, रामनवमी, ईद, मुहर्रम, गुरु पर्व, क्रिसमस, महावीर जयंती आदि धार्मिक त्योहार हैं।

होली भारतवासियों का एक सांस्कृतिक त्योहार है। ऋतुराज वसंत के आगमन की तिथि फाल्गुनी पूर्णिमा पर नयी भावनाओं एवं नयी उमंगों को लानेवाला होली का त्योहार है। वसंतोत्सव का यह पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व एक साथ ही मौज-मस्ती, रवानी-जवानी, रंगीली अलमस्ती की याद दिलाता है। यह पर्व भारतीय संस्कृति की एक पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ है। हिरण्यकशिपु नामक एक महाबली दानवराज था, जो अपने को सृष्टिकर्ता ईश्वर से भी श्रेष्ठ मानता था। उसका पुत्र प्रह्लाद ईश्वर-भक्त था। उसकी बहन होलिका को अग्निदेव नहीं जला सकते थे, ऐसा उसको वरदान था। हिरण्यकशिपु ने होलिका की गोद में प्रह्लाद को बैठाकर जिंदा जलाने का प्रयास किया। ईश्वर की महिमा अपरम्पार है। होलिका वरदान रहते हुए भी जल गई, परंतु ईश्वर-भक्त प्रह्लाद का बाल-बाँका नहीं हो सका।

इस प्रकार, नास्तिकता पर आस्तिकता की, बुराई पर अच्छाई की, पाश्विकता पर देवत्व की विजय हुई। बाद में ईश्वर ने नृसिंहावतार धारण कर आततायी हिरण्यकशिपु का नाश किया। दूसरी कथा के अनुसार जब भगवान श्रीकृष्ण ने दुष्टों का दमन कर गोप बालाओं के साथ रासलीला रचाया, तब होली पर्व का प्रचलन हुआ। इस त्योहार के पीछे जो भी गाथा रही हो, इतना निश्चित है कि हर्षोल्लास का यह पर्व दुराग्रह पर सत्याग्रह की विजय का प्रतीक है। यह आनंद एवं उत्साह का महोत्सव है।

भारत में शक्ति और ऐश्वर्य की पूजा अति प्राचीनकाल से चली आ रही है। शास्त्रबल के साथ ही भारतवासियों ने शस्त्रबल को भी अधिक महत्त्व दिया है। यही कारण है कि देवी दुर्गा की आराधना भारतवासी प्राचीनकाल से ही करते चले आ रहे हैं।

दुर्गापूजा को विजयादशमी के नाम से भी पुकारा जाता है। इसके भी कई कारण हैं। इस दशमी की तिथि को विजया अर्थात् महाशक्ति की विधिपूर्वक आराधना एवं अनुष्ठान किया जाता है, इस कारण इसे विजयादशमी कहा जाता है। यह भी कहा जाता है कि इस तिथि को भगवान श्रीराम ने देवी दुर्गा की आराधना करके आततायी रावण पर विजय प्राप्त की थी और इसी कारण यह तिथि विजयादशमी के नाम से विख्यात हुई। एक अन्य मान्यता के अनुसार, यदि दशमी को श्रद्धापूर्वक देवी की आराधना की जाये तो जीवन में जय अवश्यंभावी होती है। यह भी मान्यता है कि महाविद्याओं एवं इन्द्रियों की संख्या 10 है। माता की आराधना इन दसों महाविधाओं एवं इन्द्रियों पर अधिकार करने के लिए की जाती है। दुर्गापुजा को 'दशहरा' के नाम से भी पुकारा जाता है, क्योंकि इसी दिन दसमुख (रावण) का संहार किया गया था और उसके द्वारा उत्पन्न किये गये कष्टों का हरण किया गया था।

दुर्गापूजा महोत्सव भारत में अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है। औपचारिक रूप से यह उत्सव आश्विन मास की दूसरी प्रतिपदा से दशमी तक मनाया जाता है। भारत के विभिन्न भागों में दूर्गापूजा का आयोजन विभिन्न ढंग से होता है। न केवल भारत अपितु विदेशों में भी जहाँ भारतीय मूल के निवासी हैं, वहाँ दुर्गापूजा का आयोजन हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

भारत में दीपावली को एक महान राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक पर्व माना जाता है। दीपावली के आरम्भ की अनेक पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं। सर्वाधिक प्रचलित

कथा के अनुसार श्री रामचन्द्र जब चौदह वर्षों के वनवास के बाद रावण को मारकर सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे तब सभी जगह खुशी से दीप जलाये गये थे। उसी विजय की स्मृति में यह दीपावली हर वर्ष मनाई जाने लगी। कथा चाहे जो भी हो, एक बात बिल्कुल साफ है कि दीवाली हर वर्ष भारतवासियों को जीवन का नया संदेश देने आती है कि सत्य की जीत और असत्य की हार एक-न-एक दिन अवश्य होती है। यह हमारे जीवन का अन्धकार दूर कर फुलझड़ियों की तरह नया प्रकाश बिखेरती है। हम अपने अन्दर नवीनता का अनुभव करते हैं।

'ईद' मुसलमानों के लिए सबसे बड़ा आनंद-पर्व है। जिस प्रकार होली हिंदुओं का मौज-मस्ती का त्योहार है, उसी प्रकार ईद मुसलमानों का पर्व है। 'ईद' शब्द का अर्थ होता है-खुशी।

ईद के दिन लोग सबेरे ईदगाहों में जाते हैं और चार सिजदों में नमाज अदा करते हैं। नमाज के बाद इमाम खुतबा पढ़ते हैं तथा 'फित्रा' का महत्त्व बताते हैं। खुतबा के बाद ईदगाह में एकत्रित लोग आपस में गले मिलते हैं और आंतरिक प्रेम की वर्षा करते हैं। इस दृश्य से ऐसा प्रतीत होता है कि मनुष्य-मनुष्य के बीच वैमनस्य की कोई दीवार न हो। सारी दुश्मनी ईद की घड़ी में खत्म हो जाती है। लोगों के बीच एक नया रिश्ता या प्रेम-संबंध आरंभ हो जाता है।

43. कोरोना वायरस ​

[2021A]

कोरोना वायरस (COVID-19) क्या है – विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना का नाम कोविड-19 (COVID-19) रखा है, जहाँ 'CO' का अर्थ है कोरोना (Corona), 'VI' का अर्थ है वायरस (Virus), 'D' का अर्थ है डिसिस (Disease) और '19' का अर्थ है साल 2019 यानी जिस वर्ष यह बीमारी पैदा हुई। इस वायरस का सबसे पहले चीन के 'वुहान' प्रान्त में देखा गया जो धीरे-धीरे पूरे विश्व में फैल चुका है।

इसकी उत्पत्ति कहाँ से हुई – कोरोना की उत्पत्ति सबसे पहले 1930 में एक मुर्गी में हुई थी और इसने मुर्गी के श्वसन प्रणाली को प्रभावित किया था और आगे चलक 1940 में कई अन्य जानवरों में भी पाया गया। इसके बाद सन् 1960 में एक व्यक्ति में पाया गया जिसे सर्दी की शिकायत थी। इन सब के बाद वर्ष 2019 में इसे दुबारा इसका विकराल रूप चीन में देखा गया जो अब धीरे-धीरे पूरे विश्व में फैलता जा रहा है।

कोरोना के लक्षण –

  1. बुखार,
  2. सर्दी और खासी,
  3. गले में खराश,
  4. शरीर में थकान,
  5. सांस लेने में दिक्कत (सबसे प्रमुख),
  6. मांसपेशियों में जकड़न,
  7. लंबे

समय तक थकान ।

इसकी सक्रियता निम्न प्रकार के वर्ग आयु समूह पर अधिक है।

आयु मृत्यु दर :——— :——-: 0-19 वर्ष 0.2%
20-29 वर्ष 0.09%
30-39 वर्ष 0.18%
60-70 वर्ष 5.0%
80 से अधिक 18%

खुद को कोरोना से कैसे बचाएं – कोरोना का संक्रमण बड़ी आसानी से फैल जाता है और इसकी अब तक कोई दवा नहीं मिली है, इसलिये इसे बहुत घातक रोग की श्रेणी में रखा गया है। कोरोना के मामले दिन प्रतिदिन पूरी दुनिया में बढ़ते जा रहे हैं। WHO ने इसे महामारी घोषित कर दिया है।

इतिहास इस बात का गवाह है कि हर 100 वर्ष पर दुनिया में कोई न कोई महामारी जरूर आती है और इससे बचने का सबसे अच्छा उपाय बचाव है।

कुछ ऐसे कदम जो आप निजी तौर पर ले सकते हैं, जिससे आप खुद को इससे बचा सकते हैं –

  1. हमेशा अपने हाथ धोएं।
  2. अपने मुह को बार-बार न छुएं।
  3. सबसे 5 से 6 फीट की दूरी बना कर चलें या रहें।
  4. बहुत आवश्यक न हो तो घर से बाहर न जाएं।
  5. सार्वजनिक स्थानों पर जैसे कि मॉल, बाजार आदि जगहों पर न जाएं।
  6. अपने रोग प्रतिरोधक क्षमता को बेहतर करें।
  7. लोगों से हाथ न मिलाएँ।
  8. मास्क लगाना उस व्यक्ति के लिये आवश्यक होता है जो कोरोना से ग्रसित होता है, परंतु कई बार संक्रमित व्यक्ति को पता ही नहीं होता की उसे कोरोना है, इसलिये अपनी सुरक्षा अपने हाथों में। मास्क अवश्य लगाएं।
  9. रेलगाड़ी, बस आदि से यात्रा करने से बचें।
  10. कम से कम 20 सेकेंड तक साबुन से हाथ धोना न भूलें।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड और नेशनल हेल्थ सर्विस (एनएचएस) से प्राप्त सूचना के आधार पर हम आपको कोरोना वायरस से बचाव के तरीके बता रहे हैं। एयरपोर्ट पर यात्रियों की स्क्रीनिंग हो या फिर लैब में लोगों की जांच, सरकार ने कोरोना वायरस से निपटने के लिए कई तरह की तैयारी की है। इसके अलावा किसी भी तरह की अफवाह से बचने, खुद की सुरक्षा के लिए कुछ निर्देश जारी किए हैं जिससे कि कोरोना वायरस से निपटा जा सकता है।

लगभग 18 साल पहले सार्स वायरस से भी ऐसा ही खतरा बना था। 2002-03 में सार्स की वजह से पूरी दुनिया में 700 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। पूरी दुनिया में हजारों लोग इससे संक्रमित हुए थे। इसका असर आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ा था। कोरोना वायरस के बारे में अभी तक इस तरह के कोई प्रमाण नहीं मिले हैं कि कोरोना वायरस पार्सल, चिट्ठियों या खाने के जरिए फैलता है। कोरोना वायरस जैसे वायरस शरीर के बाहर बहुत ज्यादा समय तक जिंदा नहीं रह सकते।

कोरोना वायरस को लेकर लोगों में एक अलग ही बेचैनी देखने को मिली है। मेडिकल स्टोर्स में मास्क और सैनेटाइजर की कमी हो गई है, क्योंकि लोग तेजी से इन्हें खरीदने के लिए दौड़ रहे हैं। परन्तु सैनेटाइजर का उपयोग तभी करना चाहिए जब आप ऐसे स्थान पर है जहां पानी की सुविधा नहीं हैं या बार-बार हाथ धोना संभव नहीं है। इसके अलावा बहुत महंगे मास्क पहनना जरूरी नहीं है। इसके लिए घर पर बने मास्क, तौलिया या रूमाल से भी अपने मुंह को ढक सकते हैं।

क्या कोरोना वायरस से मृत्यु निश्चित होती है– नहीं जरूरी नहीं की आपको यदि कोरोना है तो अब बचने की कोई उम्मीद नहीं है। सच यह है कि जितनी जल्दी आपको इसका पता लगता है अपने नजदीकी अस्पताल जरूर जाएँ, क्योंकि इसका उपचार घर पर मुमकिन नहीं है और बाकी परिवार वाले भी संक्रमित हो सकते हैं।

निष्कर्ष – सतर्क रहें, स्वच्छ रहें, स्वस्थ्य रहें और कोरोना को समाप्त करने के लिए सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करें। इससे पहले भी कई महामारी आई हैं, जिन पर हमने पूरी तरह से विजय हासिल की है और इसी तरह कोरोना को भी हम साथ मिलकर हराएंगे। दूसरों के चक्कर में पड़ने से अच्छा है अपनी रक्षा करें, यही काफी है।

44. आरक्षण नीति ​

[2021A]

सामान्यतः सामाजिक न्याय का अर्थ सभी को समान सुविधा, समान शिक्षा तथा क्षमताओं के विकास और सत्ता में भागीदारी के लिए समान अवसर उपलब्ध कराना है। कहने का तात्पर्य है कि सभी लोगों को भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा तथा विकास का समान अवसर उपलब्ध कराना ही सामाजिक न्याय का लक्ष्य है। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति को आर्थिक अवसर तथा राजनीतिक अधिकारों की समानता, प्रत्येक को अपनी क्षमताओं के विकास के लिए सक्षम बनाना ही सामाजिक न्याय का मुख्य अभिप्राय है। भारत का संविधान अपने लक्ष्यों में इस विचार को समाहित किये हुए है, परन्तु भारतीय सन्दर्भ में सामाजिक न्याय का अर्थ यहीं तक सीमित नहीं है। इसका लक्ष्य आर्थिक तथा राजनीतिक समानता के साथ सदियों से चली आ रही अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था को ध्वस्त कर एक नये सत्तापूर्ण समाज की रचना करना है। महात्मा फूले के शब्दों में, सामाजिक न्याय, सामाजिक औचित्य को कहते हैं। समाज में औचित्य तभी संभव है जब अवसर की समानता हो तथा जाति-आधारित समाज-व्यवस्था को समाप्त करना और पूर्व की सामाजिक व्यवस्था समाप्त करके एक नये समतापूर्ण समाज की रचना की जाए।

आधुनिक काल में न्यायपूर्ण सामाजिक तथा राष्ट्रीय जीवन के निर्माण के लिए विकासतंत्र में प्रतियोगिता के दौर से विरत पिछड़ों को अवसर उपलब्ध कराने की व्यवस्था को आरक्षण कहा जाता है। इसका उद्देश्य अन्यायपूर्ण, जाति-आधारित समाज-व्यवस्था को समाप्त करना और पूर्व की सामाजिक व्यवस्था की बदौलत विकास के दौर में पिछड़ गये तथा दलित समूह को विकास का अवसर उपलब्ध कराना है। इस प्रकार, आरक्षण वर्ण, लिंग तथा जातीय उत्पीड़न के खिलाफ एक

सशक्त राजकीय व्यवस्था बन कर सामने आयेगा। सामान्यतः आरक्षण की अवधारणा सामान्य सामाजिक न्याय से अलग किसी विशेष वर्ग, जाति, समाज या क्षेत्र के विकास तथा सुरक्षा के विशेष उपबंध से जुड़ी है। भारत में आरक्षण के अन्तर्गत पिछड़ी तथा दलित जातियों के विकास के लिए राजकीय व्यवस्था द्वारा नौकरी, शिक्षा तथा वित्तीय व्यवस्था में विशेष अवसर उपलब्ध कराया जाता है। इस उपबंध को सामाजिक न्याय स्थापित करने तथा समतामूलक समाज का निर्माण करने के रास्ते में एक कारगर उपाय माना गया है। इस प्रकार, आरक्षण सामाजिक न्याय का पूरक बनकर सामने आया है।

1990 में बी० पी० सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किया। इसके द्वारा केन्द्रीय सरकार की नौकरियों में पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण देने का प्रावधान लागू हुआ। इस कदम की तीखी प्रतिक्रिया हुई और उत्तर भारत में आरक्षण विरोधी ज्वाला भड़क उठी। पिछड़ों को आरक्षण देने के प्रावधान को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमे दायर हुए। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकारी अध्यादेश के कार्यान्वयन पर रोक लगा दी। बाद में मुख्य न्यायाधीश एम० एच० कानिया की अध्यक्षता में सर्वोच्च न्यायालय की नौ सदस्यीय खंडपीठ ने एक ऐतिहासिक निर्णय दिया। इसमें सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण देने की व्यवस्था को वैध करार दिया गया, लेकिन खंडपीठ ने आर्थिक आधार पर ऊँची जाति के कमजोर लोगों के लिए 10% अतिरिक्त आरक्षण देने के प्रावधान को असंवैधानिक करार दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में माना कि पदोन्नति के मामले में आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता। साथ ही असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर 50% से अधिक आरक्षण की व्यवस्था नहीं की जा सकती। खंडपीठ ने सामाजिक न्याय के दर्शन के औचित्य को मानते हुए यह भी निर्णय दिया कि पिछड़ी जातियों के सम्पन्न और दबंग लोगों के पुत्र-पुत्रियों को आरक्षण का लाभ देना उचित नहीं है। इसके लिए क्रीमीलेयर की पहचान कराने और उनको आरक्षण से वंचित करने का सुझाव दिया गया। यह निर्णय सामाजिक न्याय को विस्तार देने के मामले में एक ऐतिहासिक कदम सिद्ध हुआ, क्योंकि सीधे आरक्षण की व्यवस्था करने से पिछड़ी जातियों के मध्य नवब्राह्मणवाद का उदय होने तथा आरक्षण का लाभ मुट्ठीभर साधन-सम्पन्न लोगों द्वारा हड़प लिये जाने का खतरा उत्पन्न हो गया था।

22 फरवरी, 1993 को क्रीमीलेयर की पहचान के लिए पटना उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायमूर्ति रामानंद प्रसाद की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया। प्रसाद आयोग ने पिछड़ी जातियों में अगड़ों की पहचान के लिए कुछ मानदंड निर्धारित किये हैं। उसके अनुसार, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, संघ एवं राज्य लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्य, मुख्य चुनाव आयुक्त, महालेखाकार जैसे सांविधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों के परिवारों को आरक्षण की सुविधा प्राप्त नहीं होगी। राज्यपाल, मंत्री, सांसद एवं विधायकों के पद पर आसीन व्यक्तियों के लिए पद के मानदंड की बजाय आय एवं संपदा का मानदंड लागू होगा। सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़ी जातियों से आय समूह 'ए' तथा अखिल भारतीय केन्द्रीय सेवाओं और राज्य सेवाओं में सीधे चयन से भर्ती हुए प्रथम श्रेणी के पदाधिकारियों के बच्चों को आरक्षण की सुविधा से वंचित कर दिया गया है। लेकिन ऐसी सेवाओं में कार्यरत पति-पत्नी दोनों के निधन होने की स्थिति में उनके बच्चों को आरक्षण देने की सिफारिश की गयी है। दूसरी तरफ, इस वर्ग के अधिकारियों से विवाह करनेवाली पिछड़ी जाति की महिलाओं को आरक्षण की सुविधा का पात्र माना गया है। साथ ही कुम्हार, धोबी, नाई जैसी पुश्तैनी पेशा में लगे लोगों को आय तथा संपत्ति की सीमा से अलग रखा गया है, यानी उन्हें आरक्षण का हकदार माना गया है। प्रसाद आयोग ने एक लाख रुपये वार्षिक आयवाले लोगों को पिछड़े वर्ग के अन्तर्गत आरक्षण प्राप्त करने का हकदार नहीं माना है।

इस प्रकार, प्रसाद आयोग ने पिछड़ी जातियों के अगड़ों को आरक्षण की सुविधा से वंचित कर सामाजिक न्याय को विस्तार देने का ऐतिहासिक कार्य किया है। फिर भी, आज के राजनीतिक तथा सामाजिक बनावट में पिछड़े वर्ग के अगड़े गरीबों के हक को हड़प नहीं लेंगे, इसकी संभावना कम दिखती है। जब तक कानून व्यवस्था को न्यायपूर्ण नहीं बनाया जाता है और जालसाजी कर पिछड़ा होने का प्रमाणपत्र प्रस्तुत करनेवालों के लिए कड़े तथा द्रुत सजा की व्यवस्था नहीं की जाती है, तबतक गरीबों तक सामाजिक न्याय को पहुँचाने में सफलता नहीं मिल सकती।

ऐसी स्थिति में आरक्षण एक ब्राह्मणवादी व्यवस्था के स्थान पर दूसरे नवब्राह्मणवाद को जन्म देने का कारक बनकर रह जायगा।

हाल के वर्षों में भारत में सामाजिक न्याय को व्यवस्था देने और लोगों का जीवन-स्तर उन्नत बनाने के कार्यों का विस्तार हुआ है। इसके लिए आरक्षण एक सशक्त प्रावधान के रूप में सामने आया है, लेकिन आरक्षण की सीमा सरकारी नौकरियों तक जाकर खत्म हो जाती है। अतः, सम्पूर्ण समाज के लिए सामाजिक न्याय की स्थापना के लक्ष्यों को प्राप्त करने में आरक्षण की भूमिका सीमित है। जबतक आर्थिक प्रगति द्वारा प्राप्त सुविधाओं का समुचित वितरण तथा न्यायोचित उपभोग की व्यवस्था नहीं की जाती तबतक सामाजिक न्याय को सुनिश्चित नहीं बनाया जा सकता है।

45. छठ पर्व ​

[2022A]

बिहार के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह शुभ पर्व हिन्दू कैलेंडर के अनुसार कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की छठी को मनाया जाता है। बिहार में छठ का त्योहार सूर्य उपासना के लिए सबसे पवित्र पर्व माना गया हैं। यह पर्व हर साल दो बार आता है। पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कर्तिक में। इस पर्व को डाला छठ के नाम से भी जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि सच्चे मन से की गई पूजा से सभी प्रकार की मनोकामनाएँ पूर्ण होती है। यह पर्व पति की लम्बी आयु और संतान प्राप्ति के लिए मनाया जाता है। छठ पूजा व्रत बड़ी ही निष्ठा से रखा जाता है। यह पर्व चार दिनों तक किया जाता है। इस व्रत के पहले दिन महिलाएँ सेंधा नमक, कद्दू की सब्जी, चने की दाल और रोटी के साथ भोजन करती है। इसके अगले दिन व्रत शुरू होता है। महिलाएँ अन्न जल को त्याग कर दिन भर व्रत रखती है। और शाम को गन्ने के रस या गुड़ में बने हुए चावल की खीर को प्रसाद के रूप में लेना होता है। तीसरे दिन सूर्य षष्ठी वाले दिन व्रत रखकर शाम के वक्त, डूबते हुए सूरज को अर्घ्य देने के लिए पूजा की सामग्री को बाँस के डलिया में रखकर घाट पर ले जाया जाता है। सूर्य को अर्ध्य करने के पश्चात् सारी सामग्री घर में रख देनी चाहिए और रात के समय छठी माता की व्रत कथा सुननी चाहिए। चौथे दिन सुबह सूर्य निकलने से पहले घाट पर पहुँच जाना चाहिए। घाट से लौटने के बाद प्रसाद को सभी के बीच बाँटना चाहिए और स्वयं प्रसाद खाकर व्रत खोलना चाहिए। एक मान्यता के अनुसार छठ पूजा का पर्व महाभारतकाल में कुंती द्वारा सूर्य देव की आराधना एवं पौत्र कर्ण के जन्म से माना जाता है। एक और कथा के मुताबिक जब लंका विजय पश्चात् राम राज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को प्रभू राम और सीता ने व्रत रखा था और सूर्य देव की आराधना की थी।

46. प्राकृतिक संसाधन ​

[2023A]

प्राकृतिक संसाधनों के बिना मानव जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है, और इन संसाधनों के कारण ही इस ग्रह पर जीवन का कोई भी रूप आराम से टिका हुआ है। प्राकृतिक संसाधन कुछ भी और सब कुछ है जो प्रकृति से प्राप्त होता है और हमारे द्वारा उपयोग किया जाता है, मौलिक हवा, पानी और सूरज की रोशनी से लेकर जीवाश्म ईंधन, खनिज, लकड़ी, आदि जैसे कार्बनिक तत्वों तक भी।

प्राकृतिक संसाधन जो जीवित जीवों से प्राप्त होते हैं या अंततः जीवित जीवों के कारण बनते हैं, जैविक तत्व कहलाते हैं, जैसे जंगल, पक्षी, जानवर, मछलियाँ या अन्य समुद्री जीव, जीवाश्म ईंधन (क्योंकि वे कार्बनिक पदार्थों के क्षय के कारण बनते हैं) आदि। प्राकृतिक संसाधन जो प्रकृति के निर्जीव तत्वों को संदर्भित करते हैं, अजैविक संसाधन कहलाते हैं। अजैविक संसाधनों के उदाहरण सूर्य का प्रकाश, हवा, ज्वार, मिट्टी, खनिज आदि हैं।

प्राकृतिक तत्व दुनिया भर में हर जगह मौजूद हैं लेकिन समान रूप से वितरित नहीं हैं। मनुष्य ने कुशल तरीके सीखे हैं जिससे वे अपने लाभ के लिए अपने क्षेत्र में मौजूद प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कर सकते हैं। भारत की तरह विभिन्न प्रकार की मिट्टी और आर्द्र मौसम ने कृषि के समृद्ध विकास की अनुमति दी है। समुद्र से घिरे देश के क्षेत्रों ने अंततः मछली पकड़ने में उन्नत कौशल विकसित किया।

हम अपने प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग कैसे करते हैं। इसके कुछ उदाहरण हैं। पीने के पानी का उपयोग और हाइड्रो इलेक्ट्रिक पावर का उत्पादन, पौधों की वृद्धि के लिए धूप आवश्यक है और हमें गर्मी और विटामिन भी प्रदान करते हैं। पौधे हमारे ऑक्सीजन और भोजन का प्राथमिक स्त्रोत हैं। कोयला है बिजली उत्पादन और वाहनों आदि के लिए ईंधन के रूप में उपयोग किया जाता है।

व्यापार और वाणिज्य के साथ वैश्वीकरण आया और अब हम उन तरीकों को खोजने के लिए गतिशील रूप से विकसित हो रहे हैं जिनमें हम बेहतर सेवा के लिए उत्पाद बनाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करने के तरीकों को संशोधित कर सकते हैं। लेकिन हमें यह याद रखना होगा कि हमारे पारिस्थितिकी तंत्र में सभी संसाधन असीमित रूप से मौजूद नहीं हैं। यदि हम इन संसाधनों की खपत के बारे में सावधान नहीं हैं, तो वे अंततः समाप्त हो जाएंगे, तो हमारे पास उनके बिना जीवित रहने का कोई विकल्प नहीं हो सकता है।

सौर, पवन, पनबिजली, भूतापीय और बायोमास जैसे संसाधनों को नवीकरणीय संसाधन कहा जाता है क्योंकि वे दुनिया में प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं और प्रकृति में स्व-पूर्ति कर रहे हैं। और जीवाश्म ईंधन, लोहा, मीठे पानी, कोयला, परमाणु तत्व आदि जैसे संसाधन जिन्हें बनने में लाखों साल लगे और अंततः नष्ट हो सकते हैं (पुनः उत्पन्न नहीं किए जा सकते) गैर-नवीकरणीय संसाधन कहलाते हैं।

इसलिए, संसाधनों को संरक्षित करना आवश्यक है ताकि वे भविष्य में हमारे और हमारी आने वाली पीढ़ी के उपयोग और लाभ के लिए उपस्थित हो सकें। सभी को प्राकृतिक संसाधनों को जानने की जरूरत है क्योंकि हमारा अस्तित्व उन पर निर्भर करता है। हमें इन संसाधनों की अनुपस्थिति के खतरनाक प्रभाव के बारे में लोगों को शिक्षित करने और जागरूक करने की भी आवश्यकता है। हमें प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के तरीकों का प्रचार और अभ्यास करना चाहिए।

47. राष्ट्र-निर्माण और नारी ​

[2024A]

किसी भी राष्ट्र के निर्माण में उस राष्ट्र की आधी आबादी अर्थात् स्त्री की भूमिका की महत्ता से इनकार नहीं किया जा सकता। आधी आबादी यदि किसी भी कारण से निष्क्रिय रहती है, तो उस राष्ट्र या समाज की समुचित एवं उल्लेखनीय प्रगति की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हमारे यहाँ शास्त्रों में कहा गया है कि 'यत्र नार्यस्तु पूजयंते रमंते तत्र देवताः' अर्थात् जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहाँ देवताओं का वास होता है।

भारत की कुल जनसंख्या में लगभग 39% कार्यशील जनसंख्या है, जिसमें लगभग एक-चौथाई महिलाएँ हैं। कृषि प्रधान भारत देश में कृषि कार्य में सक्रिय भूमिका अदा करते हुए स्त्रियाँ प्रारम्भ से ही अर्थव्यवस्था का आधार रही हैं, लेकिन पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की आर्थिक गतिविधियों को हमेशा से ही उचित रूप से मूल्यांकित नहीं किया गया है। आधुनिक युग में समाज सुधारकों के प्रयासों एवं शिक्षा के प्रसार ने महिलाओं की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार लाना प्रारम्भ किया, जिसका परिणाम राष्ट्र का समुचित प्रगति के पथ पर निरन्तर अग्रसर होने के रूप में सामने आया है।

आज स्त्रियों ने अनेक सामाजिक एवं आर्थिक कठिनाइयों को पार करते हुए नई बुलन्दियों को छुआ है। घर की जिम्मेदारियाँ तो वे सदियों से निभाती आ रही हैं, अब उन्होंने स्वयं को बाहर की दुनिया में भी दृढ़ता से स्थापित किया है। चिकित्सा का क्षेत्र हो या इन्जीनियरिंग का, सिविल सेवा का क्षेत्र हो या बैंक का, पुलिस हो या फौज, वैज्ञानिक हो या व्यवसायी, प्रत्येक क्षेत्र में अनेक महत्वपूर्ण पदों पर स्त्रियाँ आज सम्मान के साथ आसीन हैं।

मैरी कॉम, किरण बेदी, कल्पना चावला, मीरा नायर, मीरा कुमार, मलाला यूसफजई, मेनका गाँधी, बछेन्द्री पाल, संतोष यादव, सानिया मिर्जा, सायना नेहवाल, पीटी उषा, कर्णम मल्लेश्वरी आदि की क्षमता एवं प्रदर्शन को भुलाया नहीं जा सकता। आज नारी पुरुषों के कन्धे-से-कन्धा मिलाकर आगे बढ़ रही हैं और देश को आगे बढ़ा रही हैं। सुभाषचन्द्र बोस ने कहा भी है –

"ऐसा कोई भी कार्य नहीं, जो हमारी महिलाएँ नहीं कर सकतीं और ऐसा कोई भी त्याग और पीड़ा नहीं है, जो वे सहन नहीं कर सकतीं।"

यद्यपि महिलाओं ने अनेक क्षेत्रों में प्रगति की है, परन्तु महिलाओं को अभी बहुत कुछ करना शेष है। आज भी स्त्री की उपेक्षा का सिलसिला उसके जन्म के साथ ही शुरू हो जाता है। पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना के कारण हमें हर स्तर पर उनकी दशा सुधारने के लिए प्रयास करने चाहिए। आज भी अधिकांश भारतीय स्त्रियाँ वेतनभोगी होते हुए भी आर्थिक दृष्टि से पुरुषों पर आश्रित बनी हुई हैं। सिर्फ कानूनी प्रावधान ही महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि लोगों की मनोवृत्ति में परिवर्तन लाने की भी अत्यन्त आवश्यकता है। आवश्यकता इस बात की भी है कि भारतीय समाज महिलाओं को उनका उपयुक्त स्थान दिलाने के लिए कटिबद्ध हो। उनकी मेधा एवं ऊर्जा का भरपूर उपयोग हो तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनके साथ समानता का व्यवहार हो।

48. साहित्य और समाज ​

[2024A]

साहित्य और समाजशास्त्र के बीच एक गहरा संबंध है। साहित्य न केवल एक जगह से दूसरी जगह या एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाता है, बल्कि यहः। समाज के मनोवैज्ञानिक और सामाजिक मूल्यों को उजागर करने में भी मदद करता है। साहित्य न केवल हमारी सोच और विचार को प्रभावित करता है, बल्कि इसका व्यापक प्रभाव समाज में भी दिखाई देता है।

साहित्य समाज के विचारों, भावनाओं और समस्याओं का प्रतिबिम्ब है। यह समाज के आधारभूत संरचनाओं को छूने में सक्षम होता है और व्यक्तियों के अंतर्मन की गहराईयों तक पहुँचने में सहायता करता है। साहित्य के माध्यम से लेखक अपनी विचारधारा, समस्याएँ और विचारों को साझा करता है, जिससे उनके पाठक और समाज के लोगों को ज्ञान, समझ और प्रेरणा प्राप्त होती है।

साहित्य उच्च समाजशास्त्र के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है। यह मानवीय व्यवहार, मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाएँ, सामाजिक न्याय, समाज संरचना, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय अवस्था और उपयोगी नीतियों के सम्बन्ध में अद्वितीय ज्ञान प्रदान करता है। साहित्य के माध्यम से हम समाज की समस्याओं का आकलन करते हैं और इसके समाधान के लिए नए दृष्टिकोण और समाधान प्रस्ताव प्रस्तुत करते हैं।

साहित्य से हमें समाज में सामंजस्य और एकजुटता का अनुभव होता है। यह भाषा, साहित्यिक रचनाओं, कविताओं, नाटकों और उपन्यासों के माध्यम से होता है। यह साहित्य का खजाना है जो हमें साझा मूल्यों, आदर्शों और धार्मिकता की ओर ले जाता है। साहित्य समाज को समग्रता में बाँधता है और हमें एक साथ रहने और प्रगति करने की प्रेरणा देता है।

इस प्रकार, साहित्य और समाज के बीच गहरा सम्बन्ध है। साहित्य समाज के मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आधारभूत मूल्यों को उजागर करता है और समाज को साझा मूल्यों के साथ समृद्ध और विकसित बनाने में सहायता करता है। साहित्य समाज की आवश्यकताओं का प्रतिबिम्ब होता है और हमें सामाजिक सुधार और प्रगति के मार्ग में प्रेरित करता है। इसलिए, हमें साहित्य को महत्वपूर्ण रूप से समझना चाहिए और इसका समाजी और मानसिक विकास पर गहरा प्रभाव मान्य करना चाहिए।

49. जनसंख्या वृद्धि की समस्या ​

[2025A]

पूरी दुनिया की जनसंख्या समय के साथ तैजी से बढ़ रही है, जो वैश्विक चिंता का विषय बनती जा रही है। नवीनतम आँकड़ों के अनुसार, दुनिया की जनसंख्या 800 करोड़ का आँकड़ा पार कर चुका है। इस वृद्धि की दर दुनिया के आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक विकास को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। हालाँकि, सभी देशों में जनसंख्या वृद्धि की दर समान नहीं है। कुछ देशों में जनसंख्या वृद्धि की दर अत्यधिक है, जबकि कई देशों में यह मध्यम या बहुत कम है।

जनसंख्या वृद्धि कई चुनौतियों को जन्म देती है। उच्च जनसंख्या वृद्धि वाले देश, विशेषकर विकासशील देश, जनसंख्या विस्फोट के कारण गरीबी, बेरोजगारी, ताजे पानी की कमी, भोजन की कमी, शिक्षा की कमी और संसाधनों की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। दूसरी ओर, कम जनसंख्या वृद्धि वाले देशों में जनशक्ति की कमी होती है, जो उनके विकास में बाधक बनती है।

जब जनसंख्या वृद्धि अधिक होती है, तो इसके परिणामस्वरूप प्राकृतिक संसाधनों की खपत भी बढ़ जाती है। बाजार में बिकने वाली हर चीज की माँग में वृद्धि होती है, जबकि आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन जनसंख्या वृद्धि के अनुपात में नहीं हो पाता है। इससे बेरोजगाराी में वृद्धि होती है और कई बार युवा अवैध तरीकों की ओर गुमराह हो जाते हैं।

अधिक जनसंख्या के कारण शिक्षा, स्वास्थ्य, सिंचाई, उत्पादन और पानी जैसी आवश्यकताओं पर खर्च बढ़ जाता है। कई लोग अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दिला पाते, जिससे उनके भविष्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए सख्त उपायों की आवश्यकता है, ताकि हम प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग कर सकें और भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक स्थिर और सुरक्षित पर्यावरण प्रदान कर सकें।

जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए हमें प्रभावी नीतियों और कार्यक्रमों की आवश्यकता है। इसमें परिवार नियोजन, शिक्षा का प्रसार, महिलाओं को सशक्त बनाना और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच को बढ़ावा देना शामिल है।

जनसंख्या वृद्धि को संतुलित रखकर ही हम दुनिया के आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय स्थायित्व को सुनिश्चित कर सकते हैं।

50. समय का महत्त्व ​

[2025A]

जो मनुष्य समय को ध्यान में रखकर अथवा पहचानकर अपना काम करता है तथा भविष्य का प्रारूप तैयार करता है, वही मनुष्य जीवन में सफल होता है। हर व्यक्ति समय की महत्ता को न उचित मूल्य दे पाता है, और न ही समय को परख पाता है। व्यक्ति को समय की महत्ता को कभी भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

फ्रैंकलिन का कथन है-'तुम्हे अपने जीवन से प्रेम है, तो समय को व्यर्थ मत गँवाओं क्योंकि जीवन इसी से बना है।' समय को नष्ट करना जीवन को नष्ट करना है। समय ही जीवन है। ईश्वर एक बार एक ही क्षण देता है और दूसरा क्षण देने से पहले उसको छीन लेता है।

समय के सदुपयोग का अर्थ है-उचित अवसर पर उचित कार्य पूरा कर लेना। जो लोग आज का काम कल पर और कल का काम परसों पर टालते रहते हैं वे एक प्रकार से अपने लिए जंजाल खड़ा करते चले जाते हैं। मरण को टालते-टालते एक दिन सचमुच मरण आ ही जाता है। जो व्यक्ति उपयुक्त समय पर कार्य नहीं करता, वह समय को नष्ट करता है। एक दिन ऐसा आता है, जबकि समय उसको नष्ट कर देता है। जो छात्र पढ़ने के समय नहीं पढ़ते, वे परिणाम आने पर रोते हैं।

समय रूकता नहीं है। जिसे उसका उपयोग उठाना है, उसे तैयार होकर इसके आने की अग्रिम प्रतीक्षा करनी चाहिए। जो समय के निकल जाने पर उसके पीछे दौड़ते हैं, वे जिंदगी में सदा घिसटते-पिटते रहते हैं। समय सम्मान माँगता है। इसलिए कबीर ने कहा है-

काल करै सौ आज कर, आज करै सो अब। पल में परलय होयगा, बहुरि करेगा कब।

जो समय का सम्मान करना जानते हैं, वह अपनी शक्ति को कई गुना बढ़ा लेते हैं। यदि सभी गाड़ियाँ अपने निश्चित समय से चलने लगे तो देश में कितनी कार्यकुशलता बढ़ जाएगी। यदि कार्यालय के कार्य ठीक समय पर संपन्न हो जाएँ, कर्मचारी समय के पाबंद हो तो सब कार्य सुविधा से हो सकेंगे। यदि रोगी को ठीक समय पर दवाई न मिले तो उसकी मौत भी हो सकती है। अतः हमें समय की . गंभीरता को समझना चाहिए।

51. स्वतंत्रता दिवस ​

[2025A, 2026A]

15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश साम्राज्य से भारत की स्वतंत्रता को याद करने के लिये राष्ट्रीय अवकाश के रूप में इस दिन हर साल भारत के लोगों द्वारा स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। इस दिन भारत के उन महान नेताओं को श्रद्धांजलि दी जाती है जिनके नेतृत्व में भारत के लोग सदा के लिये आजाद हुए।

15 अगस्त के दिन को लोग अपने-अपने अंदाज में मनाते हैं कोई मित्रों और परिवारों के साथ इस दिन को यादगार बनाता है तो कोई देशभक्ति गानों और फिल्मों को देख झूमता है साथ ही कई ऐसे भी होते हैं जो इस दिन कई कार्यक्रमों में हिस्सा लेकर तथा विभिन्न माध्यमों के द्वारा स्वतंत्रता दिवस के महत्व को प्रचारित-प्रसारित करते हैं।

15 अगस्त, 1947 स्वतंत्रता की प्राप्ति के बाद जवाहर लाल नेहरू भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने जिन्होंने दिल्ली के लाल किले पर भारतीय झंडा फहराने के बाद भारतीयों को संबाधित किया। इसी प्रथा को आने वाले दूसरे प्रधानमंत्रीयों ने भी आगे बढ़ाया जहाँ झंडारोहण, परेड तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि हर साल इसी दिन आयोजित होते हैं। कई लोग इस पर्व को अपने वस्त्रों पर, घर तथा वाहनों पर झंडा लगा कर मनाते हैं।

15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि को अपने भाषण "ट्रिस्ट वीद डेस्टिनी", के साथ पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत की आजादी की घोषणा की। साथ ही उन्होंने अपने भाषण में कहा कि, वर्षों की गुलामी के बाद ये वो समय है जब हम अपना संकल्प निभाएंगे और अपने दुर्भाग्य का अंत करेंगे।

भारत एक ऐसा देश है जहाँ करोड़ों लोग विभिन्न धर्म, परंपरा, और संस्कृति के एक साथ रहते हैं और स्वतंत्रता दिवस के इस उत्सव को पूरी खुशी के साथ मनाते हैं। इस दिन, भारतीय होने के नाते, हमें गर्व करना चाहिये और ये वादा करना चाहिये कि हम किसी भी प्रकार के आक्रमण या अपमान से अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिये सदा देशभक्ति से पूर्ण और ईमानदार रहेंगे।

52. खेल का महत्त्व ​

[2025]

महर्षि चरक ने शरीर (स्वास्थ्य) को धर्म, अर्थ काम और मोक्ष का मूल आधार माना है। कालिदास ने भी कहा है-"शरीरमाद्य खलु धर्म-साधनम्" अर्थात् शरीर ही सब धर्मो के आचरण का प्रथम साधन है। शरीर स्वस्थ होगा तो सभी धर्म साधे जा सकते हैं। आज समय में परिवर्तन आ गया है। आज बच्चे उस स्कूल में पढ़ना चाहते हैं जहाँ खेल-खेल में शिक्षा देने का प्रबंध होता है। आज के युग ने खेल के महत्व को स्वीकार किया है। लोग खिलाड़ी होने में गौरव का अनुभव करते हैं। खेल कैरियर के साथ जुड़ गया है। किसी ने ठीक ही कहा है-'पहला सुख नीरोगी काया'। स्वस्थ शरीर ईश्वर का वरदान है। अतः स्वास्थ्य प्राप्ति के अनेक उपायों में खेलकूद का महत्व किसी से कम नहीं है। जीवन तभी पूर्ण होता है जब उसका सर्वांगीण विकास हो। शिक्षा. से बुद्धि का विकास होता है तो खेलों से शरीर का।

स्वामी विवेकानंद के अनुसार 'स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का निवास होता है। शारीरिक और मानसिक बल में सुंदर और उपयुक्त संतुलन बनाए रखने का एक मात्र साधन है-'खेल मनुष्य के शारीरिक विकास के तो सर्वस्वीकृत तथा सर्वमान्य साधक है, साथ ही खेल के मैदान में हम अनुशासन, संगठन, आज्ञा-पालन, साहस, आत्मविश्वास तथा एकाग्रचित्तता जैसे गुणों को भी प्राप्त करते हैं। जो व्यक्ति अपने में इन गुणों का विकास कर लेता है, वह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विजय-प्राप्त कर लेता है।

प्राचीनकाल में कुश्ती, कबड्डी आदि कुछ ही खेलकूद प्रचलित थे। जबकि आज अनेक प्रकार के खेलकूद प्रचलित हैं। इन्हें देशी और विदेशी दो श्रेणियों में रखा जा सकता है। देशी खेलकूद पूरी तरह से भारतीय हैं। इनमें कबड्डी, शतरंज, चौपड़ आदि प्रमुख हैं। जबकि विदेशी खेलकूद में क्रिकेट, हॉकी आदि हैं। ये खेल दो प्रकार के हो सकते हैं-आउटडोर तथा इनडोर। आउटडोर वे खेल हैं जो घर के बाहर किसी मैदान में ही खेले जा सकते हैं, जैसे-पोलो, टेनिस, हॉकी, आदि तथा इनडोर वे खेलकूद हैं जिन्हें हम घर में खेल सकते हैं, जैसे-शतरंज, कैरम, टेबिल-टेनिस आदि।

खेलों से अनेक लाभ हैं। इनसे स्वास्थ्य के साथ-साथ स्वस्थ मनोरंजन भी होता है। खेलों से शरीर चुस्त रहता है, बुद्धि का विकास होता है। सहयोग, मित्रता, मेलजोल, अनुशासन की भावना आदि गुण खेलों में भाग लने से अपने आप आ जाते हैं। खेलकूद में भाग लेने से खिलाड़ियों में खेल भावना का विकास होता है। खेलों से मनुष्य का चरित्र ऊँचा उठता है। खेल के मैदान में ही अनुशासन का पाठ पढ़ाया जाता है।

आज देश-विदेश में अनेक स्तरों पर खेलों का आयोजन किया जात है। राष्ट्रीय, एशियाई और ओलंपिक खेलों का नियमित आयोजन होता है। आज भारत के युवाओं को अपनी रुचि के खेलों में भाग लेना चाहिए। इससे वे स्वास्थ्य प्राप्ति के साथ-साथ अपने देश का नाम भी उज्ज्वल कर सकते हैं।

53. बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ ​

[2025A]

"बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" एक महत्वपूर्ण सामाजिक अभियान है जो लड़कियों के जीवन में गुणवत्तापूर्ण परिवर्तन लाने का प्रयास करता है। इस अभियान का मूल उद्देश्य लड़कियों तक शिक्षा की पहुँच सुनिश्चित करना है। शिक्षा लड्कियों को सशक्त बनाती है, उन्हें उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करती है और उन्हें अपने जीवन का निर्णय स्वयं लेने की क्षमता प्रदान करती है।

इसके साथ ही, अभियान लड़कियों के अधिकारों को बढ़ाने पर भी जोर देता है। यह उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और समानता के अधिकार प्रदान करने के साथ-साथ समाज में उनकी स्थिति को मजबूत करने का प्रयास करता है। लड़कियों के लिए शिक्षा की सुगमता उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

अभियान का एक और महत्वपूर्ण पहलू लड़कियों को सुरक्षा प्रदान करना है। सुरक्षा के बिना, शिक्षा तक पहुँच और अधिकारों का विस्तार अधूरा है। सुरक्षित वातावरण न केवल लड़कियों को शिक्षा ग्रहण करने के लिए उत्साहित करता है, बल्कि उन्हें समाज में एक सक्रिय और सम्मानित नागरिक बनने की संभावना भी प्रदान करता है।

समाज में महिलाओं के समान अधिकार और अवसरों को सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने कन्या बचाओ कदम उठाया है। लड़कियाँ वर्षों से भारत में कई तरह के अपराधों और भेदभावों से पीड़ित है। इनमें सबसे भयानक अपराध कन्या

भ्रूण हत्या है। बेटी बचाओ अभियान सरकार द्वारा स्त्री भ्रूण के लिंग चयनात्मक गर्भपात के साथ ही बालिकाओं के खिलाफ अन्य अपराधों को समाप्त करने के लिए शुरू किया गया है। बिना महिला साक्षरता के, बेटी बचाओ योजना को सफल नहीं बनाया जा सकता है। इसके साथ ही हमें इस विषय में लोगों को अधिक जागरूक करने की आवश्यकता है ताकि लोगों को लैंगिक असमानता, लड़कियों की शिक्षा, परिवार नियोजन जैसी चीजों के विषय में समझाया जा सके क्योंकि जब लोग जागरूक और समझदार होंगे तभी इस प्रकार की योजनाएँ सफल हो पाएगी।

54. जल का महत्व ​

[2026A]

जल जीवन का आधार है। पृथ्वी पर सभी जीवों के लिए जल अनिवार्य है। मानव, पशु और पौधों का जीवन जल के बिना असंभव है। यह न केवल पीने के लिए आवश्यक है, बल्कि कृषि, उद्योग, ऊर्जा उत्पादन, परिवहन, स्वास्थ्य और स्वच्छता के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। हमारी नदियाँ, तालाब, झीलें और भूमिगत जल जीवन की धारा हैं। जल के बिना फसलें नहीं उग सकतीं, जीव-जंतु जीवित नहीं रह सकते, और मानव जीवन संकट में आ जाता है।

जल का महत्व केवल भौतिक जीवन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य, आर्थिक विकास और सामाजिक जीवन से भी जुड़ा है। स्वच्छ जल की उपलब्धता से रोगों की रोकथाम होती है। जल का नियमित और संतुलित उपयोग कृषि उत्पादन और उद्योगों की वृद्धि में सहायक है। बिजली उत्पादन और सिंचाई के लिए जल की पर्याप्त मात्रा अत्यंत आवश्यक है। यह न केवल आज की पीढ़ी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी जीवन की निरंतरता सुनिश्चित करता है।

हालांकि, आज जल संकट एक गंभीर वैश्विक समस्या बन गया है। बढ़ती जनसंख्या, औद्योगिकीकरण, अंधाधुंध निर्माण और नदियों का अत्यधिक दोहन जल की कमी और प्रदूषण के मुख्य कारण हैं। कई क्षेत्रों में लोग पीने के पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। नदियाँ, झीलें और जलाशय प्रदूषित हो चुके हैं। भूमिगत जल स्तर लगातार घट रहा है। यदि जल संरक्षण की दिशा में तत्काल कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में पानी की कमी मानव जीवन और कृषि दोनों के लिए खतरा बन सकती है।

जल संकट से निपटने के लिए हमें जल संरक्षण को अपनी प्राथमिकता बनाना होगा। वर्षा जल संचयन, नदियों और तालाबों की सफाई, जल का पुनः उपयोग, पाइपलाइन प्रणाली की मरम्मत और घरेलू जल की बचत इसके महत्वपूर्ण उपाय हैं। इसके अलावा, वृक्षारोपण, जल प्रदूषण रोकने के लिए उद्योगों का कड़ा नियंत्रण और जल स्रोतों का उचित प्रबंधन भी आवश्यक है। प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह जल की बर्बादी न करे और इसे सुरक्षित रखने में योगदान दे।

जल का महत्व हमारी संस्कृति और इतिहास में भी देखा जा सकता है। नदियों को जीवनदायिनी कहा गया है। भारत में गंगा, यमुना, नर्मदा जैसी नदियाँ न केवल जल स्रोत हैं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं। नदी तटों पर शहरों और कृषि भूमि का विकास हुआ है। जल के महत्व को समझकर ही मानव समाज ने नदियों और जलाशयों के संरक्षण के लिए कई उपाय किए हैं।

आज जल की कमी केवल ग्रामीण या शहरी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। यह वैश्विक समस्या बन गई है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, आने वाले समय में दुनिया के कई हिस्सों में पानी की कमी गंभीर संकट उत्पन्न कर सकती है। इसलिए जल संरक्षण और इसके महत्व के प्रति जागरूकता फैलाना आवश्यक है। बच्चों को स्कूलों में जल के महत्व के बारे में शिक्षित करना, लोगों को पानी बचाने के उपाय बताना और सरकारी नीतियों के माध्यम से जल संरक्षण को बढ़ावा देना समाज की जिम्मेदारी है।

अंततः कहा जा सकता है कि जल केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं है, बल्कि जीवन की अनिवार्यता है। इसे बचाना और संरक्षित करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है। यदि हम जल का महत्व समझें और इसका उचित उपयोग करें, तो न केवल आज के जीवन को सुरक्षित करेंगे, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित और स्वस्थ वातावरण सुनिश्चित करेंगे। जल संरक्षण से ही मानव जीवन और पृथ्वी की स्थिरता संभव है।

55. शिक्षा का उद्देश्य ​

[2026A]

शिक्षा मानव जीवन का आधार और समाज का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। यह केवल किताबी ज्ञान देने तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्ति को सोचने, समझने, निर्णय लेने और सही दिशा में जीवन जीने की क्षमता प्रदान करती है। शिक्षा का

उद्देश्य व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास, सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना और । राष्ट्र सेवा की प्रेरणा देना भी है। शिक्षा समाज और राष्ट्र के विकास में भी मुख्य भूमिका निभाती है।

शिक्षा का पहला उद्देश्य व्यक्ति में ज्ञान और समझ का विकास करना है। ज्ञान के माध्यम से व्यक्ति अपने आस-पास की दुनिया को समझ सकता है और उसके साथ सामंजस्य स्थापित कर सकता है। यह अनुभव और शिक्षा के संयोजन से जीवन की जटिलताओं को समझने और हल करने में मदद करती है। उदाहरण के लिए, विज्ञान और गणित का ज्ञान हमें प्राकृतिक घटनाओं को समझने और समस्याओं का समाधान निकालने में सक्षम बनाता है।

दूसरा उद्देश्य व्यक्तित्व निर्माण है। शिक्षा व्यक्ति में आत्मविश्वास, अनुशासन, नैतिकता और सामाजिक संवेदनशीलता विकसित करती है। यह उसे जिम्मेदार नागरिक बनाती है, जो अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति जागरूक और उत्तरदायी होता है। एक शिक्षित व्यक्ति समाज में सहयोग, समानता और न्याय के मूल्यों को अपनाता है। इस प्रकार शिक्षा केवल ज्ञान अर्जित करने का साधन नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण का भी माध्यम है।

तीसरा उद्देश्य समाज और राष्ट्र की उन्नति में योगदान देना है। शिक्षा समाज में समानता और विकास लाने का सबसे प्रभावी उपाय है। यह गरीबी और अज्ञानता को कम करने में मदद करती है। शिक्षित व्यक्ति विज्ञान, कला, उद्योग और प्रशासन में दक्ष होता है और राष्ट्र की प्रगति में योगदान देता है। शिक्षा के माध्यम से समाज में सोच का विस्तार होता है और लोग नई-नई उपलब्धियों को हासिल करने में सक्षम होते हैं।

शिक्षा का चौथा उद्देश्य रचनात्मकता और सृजनात्मक क्षमता का विकास करना है। यह केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं रहती, बल्कि व्यक्ति को कला, साहित्य, विज्ञान, संगीत और तकनीक के क्षेत्र में नवाचार करने के लिए प्रेरित करती है। शिक्षा युवा पीढ़ी में नए विचारों और समाधान ढूँढने की क्षमता पैदा करती है। उदाहरण के लिए, वैज्ञानिक अनुसंधान, साहित्यिक रचनाएँ और तकनीकी आविष्कार शिक्षा के परिणामस्वरूप ही संभव हुए हैं।

इसके अलावा, शिक्षा व्यक्तिगत और सामाजिक समस्याओं के समाधान में भी सहायक है। यह हमें पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य, स्वच्छता और नैतिक मूल्यों के प्रति जागरूक बनाती है। शिक्षित समाज में अपराध और अज्ञानता कम होती है और लोग सहिष्णुता, सहयोग और भाईचारे का पालन करते हैं।

अंततः, शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी या करियर के लिए तैयारी नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति को समाज और राष्ट्र के लिए उपयोगी बनाना है। यह व्यक्ति और समाज के बीच संतुलन स्थापित करती है। शिक्षा की सहायता से व्यक्ति अपने जीवन को सफल, संतुलित और अर्थपूर्ण बना सकता है।

इस प्रकार, शिक्षा का उद्देश्य बहुआयामी और व्यापक है। यह ज्ञान, व्यक्तित्व, नैतिकता, सामाजिक उत्तरदायित्व और रचनात्मक क्षमता के विकास के माध्यम से मानव जीवन और समाज को संपन्न बनाती है। शिक्षित व्यक्ति न केवल अपने लिए, बल्कि समाज और राष्ट्र के लिए भी प्रेरणा और शक्ति का स्रोत बनता है। इसलिए शिक्षा का महत्व अत्यंत महान है और इसे जीवन में सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

56. पर्यटन का शौक ​

[2026A]

पर्यटन आज के जीवन में मनोरंजन और ज्ञान का प्रमुख स्रोत बन गया है। यह केवल यात्रा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्ति के अनुभव, सोच और दृष्टिकोण का विस्तार भी करता है। पर्यटन लोगों को नई जगहों, संस्कृति, इतिहास और प्राकृतिक सौंदर्य का अनुभव कराता है। इसके माध्यम से व्यक्ति न केवल मनोरंजन पाता है, बल्कि ज्ञान और अनुभव की नई दृष्टि भी विकसित करता है।

पर्यटन का शौक लोगों को जीवन में उत्साह और आनंद देता है। यात्रा करने से व्यक्ति अपने रोजमर्रा के तनाव और मानसिक दबाव से मुक्त होता है। पहाड़ों, समुद्र तटों, झरनों और राष्ट्रीय उद्यानों की यात्रा से न केवल प्राकृतिक सुंदरता का आनंद मिलता है, बल्कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में भी सुधार होता है। पर्यटन शौकियों के लिए यह अनुभव शिक्षा और व्यक्तिगत विकास का भी माध्यम बन जाता है।

पर्यटन न केवल व्यक्तिगत विकास में सहायक है, बल्कि यह स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत बनाता है। यात्रा करने वाले पर्यटक होटल, परिवहन, शिल्प और हस्तकला जैसे क्षेत्रों में रोजगार उत्पन्न करते हैं। यह छोटे व्यवसायों और

स्थानीय कारीगरों के लिए अवसर प्रदान करता है। साथ ही पर्यटन के माध्यम से विभिन्न संस्कृतियों और परंपराओं का आदान-प्रदान भी होता है, जिससे समाज में आपसी समझ और सौहार्द बढ़ता है।

पर्यटन का शौक व्यक्ति में साहस, धैर्य और सहनशीलता का विकास करता है। यात्रा के दौरान व्यक्ति नई परिस्थितियों और चुनौतियों का सामना करता है। उदाहरण के लिए, पहाड़ों की यात्रा, जंगल सफारी, लंबी दूरी की ट्रेकिंग आदि से न केवल शारीरिक शक्ति बढ़ती है, बल्कि मानसिक दृढ़ता और आत्मविश्वास भी मजबूत होता है। ऐसे अनुभव व्यक्ति के व्यक्तित्व को और समृद्ध बनाते हैं।

भारत, अपने विविध सांस्कृतिक और प्राकृतिक संसाधनों के कारण, पर्यटन के लिए एक प्रमुख देश है। यहाँ हिमालय की चोटियाँ, गोवा और केरल के समुद्र तट, राजस्थान के महल और किले, उत्तराखंड और कर्नाटक के राष्ट्रीय उद्यान पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। ऐतिहासिक स्थल, मंदिर, मस्जिदें और संग्रहालय भी पर्यटन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसे स्थल न केवल मनोरंजन प्रदान करते हैं, बल्कि इतिहास और संस्कृति के बारे में भी ज्ञान देते हैं।

पर्यटन का शौक केवल मनोरंजन या यात्रा तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। यह पर्यावरण के प्रति जागरूकता और जिम्मेदारी भी सिखाता है। पर्यटक प्राकृतिक स्थलों और ऐतिहासिक स्मारकों की सुरक्षा और संरक्षण में योगदान देते हैं। जिम्मेदार पर्यटन से पर्यावरण संतुलित रहता है और भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक और सांस्कृतिक संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है।

अंततः, पर्यटन का शौक व्यक्ति को नई चीजें सीखने, अनुभव करने और जीवन का आनंद लेने का अवसर देता है। यह मनोरंजन, शिक्षा और व्यक्तिगत विकास का माध्यम है। साथ ही, यह स्थानीय अर्थव्यवस्था और समाज के विकास में भी योगदान करता है। इसलिए यात्रा और पर्यटन का शौक एक आवश्यक और लाभकारी गतिविधि है, जिसे जीवन में अपनाना चाहिए।

57. जलवायु परिवर्तन का पर्यावरण पर प्रभाव ​

[2026A]
जलवायु परिवर्तन आज के समय की सबसे बड़ी वैश्विक समस्या है। यह पृथ्वी के वातावरण में लंबे समय तक होने वाले बदलाव को कहते हैं, जो मुख्य रूप से मानव गतिविधियों और कुछ प्राकृतिक कारणों से उत्पन्न होते हैं। औद्योगिकीकरण, वाहनों से होने वाला प्रदूषण, ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन, जंगलों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन जलवायु परिवर्तन के मुख्य कारण हैं। इसका प्रभाव पर्यावरण, मानव जीवन, जीव-जंतु और समग्र पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर रूप से पड़ता है।

जलवायु परिवर्तन के कारण सबसे स्पष्ट प्रभाव ग्लोबल वार्मिंग है। पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है, जिससे ग्लेशियर और बर्फ के पहाड़ पिघल रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप समुद्र का स्तर बढ़ रहा है, जिससे तटीय क्षेत्रों में बाढ़ और भूमि क्षरण की समस्या उत्पन्न हो रही है। इसके अलावा, अत्यधिक गर्मी और सूखा कृषि को प्रभावित कर रहे हैं, जिससे खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ रही है।

जलवायु परिवर्तन से मौसम में असामान्य बदलाव भी देखे जा रहे हैं। भारी वर्षा, बाढ़, तूफान, सूखा और अत्यधिक ठंड जैसी आपदाएँ बढ़ रही हैं। ये प्राकृतिक आपदाएँ न केवल मानव जीवन को प्रभावित करती हैं, बल्कि वन्य जीवन और जीव-जंतुओं के आवास को भी खतरे में डालती हैं। इसके अलावा, वनों की कटाई और जंगलों की आग से जैव विविधता कम हो रही है। कई पौधे और जानवर विलुप्त होने के कगार पर हैं।

मानव स्वास्थ्य पर भी जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभाव दिखाई देते हैं। गर्मी की लहरें, प्रदूषण और पानी की कमी से विभिन्न बीमारियाँ बढ़ रही हैं। बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर लोगों पर इसका प्रभाव अधिक होता है। इसके साथ ही, पानी की कमी और खाद्य असुरक्षा समाज में सामाजिक तनाव और असमानता भी बढ़ा रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन का पर्यावरण पर दीर्घकालिक प्रभाव भी चिंताजनक है। समुद्र के जीव, मछलियाँ और समुद्री पारिस्थितिकी खतरे में हैं। ग्लेशियर के पिघलने से नदियों और जल स्रोतों में बदलाव आ रहा है। यह कृषि, उद्योग और जल जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। इसके परिणामस्वरूप वैश्विक स्तर पर मानव जीवन और प्राकृतिक जीवन दोनों खतरे में हैं।

इस समस्या से निपटने के लिए कई उपाय किए जा सकते हैं। प्रदूषण कम करना, ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करना, हरियाली बढ़ाना, स्वच्छ

ऊर्जा का उपयोग करना और संसाधनों का संतुलित उपयोग करना आवश्यक है। सरकारें और अंतरराष्ट्रीय संगठन जैसे संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन को रोकने और पर्यावरण संरक्षण के लिए कई कार्यक्रम चला रहे हैं। इसके अलावा, व्यक्तिगत स्तर पर भी जागरूकता और छोटे-छोटे कदम, जैसे ऊर्जा की बचत, पेड़ लगाना और कचरा प्रबंधन, प्रभावी साबित हो सकते हैं।

अंततः कहा जा सकता है कि जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरण की समस्या नहीं है, बल्कि मानव जीवन और पृथ्वी के भविष्य के लिए भी गंभीर खतरा है। इसके प्रभाव को कम करने के लिए वैश्विक और व्यक्तिगत स्तर पर सतत प्रयास आवश्यक हैं। यदि हम आज जागरूक होकर जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण नहीं लाते, तो आने वाली पीढ़ियाँ गंभीर समस्याओं का सामना करेंगी। इसलिए पर्यावरण संरक्षण, हरियाली, स्वच्छ ऊर्जा और सतत जीवन शैली अपनाना आज की प्राथमिक आवश्यकता है।

Bihar Board Class 12 Arts PYQ ​

1. राष्ट्रीय एकता ​

[2024A,2013A]

भारतवर्ष की एकता उसकी विविधताओं में छिपी हुई है। इस कथन की प्रमाणि किता इस तथ्य को देख कर मानी जा सकती है कि भारत की एकता और विविध ताएँ दोनों ही स्पष्ट रूप से प्रकट होती है।

भारत में जलवायु तथा क्षेत्रीय सुविधाओं के कारण लोगों के खान-पान तथा वेश-भूषा में भी अंतर देखने को मिलता है। विविधता एक महत्वपूर्ण पहलू देश में विभिन्न भाषाओं का होना है जिससे हम अक्सर परस्पर अजनबी महसूस करते हैं।

विविधता का सबसे बड़ा लक्षण देश में अनेक भाषाओं का होना है, जिनके कारण हम परस्पर परदेशी के समान हो जाते हैं।

राष्ट्रीय एकता में पहले यह बाधा थी कि पहाड़ों और नदियों को लाँघना अत्यधिक कठिन था, परंतु अब प्राकृतिक बाधाएँ विज्ञान की उन्नति के कारण समाप्त हो गयी हैं। हमारी एकता आज इतनी विशाल हो गयी है जितनी विशाल पहले कभी नहीं थी।

हमारी एकता का दूसरा प्रमाण है कि उत्तर या दक्षिण, चाहे जहाँ भी चले जायें, हमें एक ही संस्कृति के मंदिर, एक ही स्वभाव, दृष्टिकोण तथा धार्मिक विश्वासों के लोग दिखाई देंगे। भाषा की दीवार टूटते ही उत्तर तथा दक्षिण के लोगों में कोई भेद नहीं दिखाई देगा। वास्तव में भाषा की दीवार होते हुए भी हम एक हैं। हम एक ही धर्म के अनुयायी तथा समान संस्कृति के भागीदार हैं। हमने इकट्ठे ही आजादी की लड़ाई लड़ी तथा हमारी संसद और हमारा शासन-विधान भी एक है।

2. सह-शिक्षा ​

[2013A]

'सहशिक्षा' का अर्थ है- लड़के-लड़कियों का एक ही शिक्षा-संस्थान में साथ-साथ पढ़ना। भारत में सहशिक्षा का विचार अभी नया है। महानगरों में तो गत कई दशकों से महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में सहशिक्षा का प्रचलन हैं, परंतु छोटे कस्बों और नगरों में अभी अलग-अलग शिक्षण-संस्थाएँ हैं।

दोनों के व्यक्तित्व का विकास एक-दूसरे को गहराई से समझने से ही हो सकता है। दोनों के निकट आने से दोनों की आपसी समझ बढ़ती है। सह-शिक्षा से स्वाभाविक विकास होता है। अलग-अलग रहने के कारण लड़का और लड़की में जो मिथ्या आकर्षण होता है, वह सहशिक्षा के माध्यम से दूर हो जाता है। दोनों एक-दूसरे को जानते-पहचानते हैं। इसलिए दोनों के मनों में विपरीत लिंग के प्रति ग्रंथि का जन्म नहीं होता, बल्कि उनके मन सुलझे हुए, सरल तथा सहज हो जाते हैं। सहशिक्षा से नर और नारी दोनों की समानता का बोध होता है। दोनों में स्वस्थ स्पर्द्धा की भावना विकसित होती है। सहशिक्षा से लड़के-लड़कियों का व्यवहार शिष्ट और साफ-सुथरा हो जाता है।

आजकल चलचित्र, दूरदर्शन, विज्ञापन आदि को सुनकर युवा-मन इतना जिज्ञासु हो जाता है कि उनका नर-नारी विषयक प्रशिक्षण होना अनिवार्य है। सहशिक्षा उनके चरित्र में दृढ़ता लाने की अच्छी प्रयोगशाला सिद्ध हो सकती है। आवश्यकता है उचित दिशा-दर्शन की। यह निश्चित है कि सहशिक्षा से निष्कलंक निकला हुआ व्यक्तित्व पृथक् व्यवस्था से निकले छात्र से अधिक तेजस्वी और चरित्र-संपन्न होगा।

3. मेरा प्रिय विषय ​

[2013A]

सभी विषयों में गणित मेरा पसंदीदा विषय है। मुझे हमेशा गणित सीखने में दिलचस्पी है क्योंकि मुझे इसमें सर्वश्रेष्ठ अंक मिलते हैं। मुझे गणित अवधारणाओं, बुनियादी गणित प्रक्रियाओं, सूत्रों, संख्या गणनाओं और ज्यामितीय आंकड़ों के बारे में सब कुछ सीखना अच्छा लगता है।

हमारे स्कूल में उमाकान्त सर गणित के शिक्षक हैं। वे बहुत ही मनोरंजक तरीके से गणित पढ़ाते हैं। उनकी वजह से मैंने पिछले कुछ परीक्षाओं में अच्छे अंक प्राप्त किए हैं। गणित को हल करने से मेरा आत्मविश्वास बहुत बढ़ा है।

जिस प्रकार गणित में उदाहरण को सूत्र द्वारा हल किया जाता है, उसी प्रकार हम अपने दैनिक जीवन की समस्याओं के तर्क को जानकर और नैतिक नियमों का उपयोग करके हल कर सकते हैं। गणित ने मुझमें समस्या समाधान कौशल विकसित किया है। हम अपने दैनिक जीवन में अपने आस-पास कई गणितीय लेन-देन देखते हैं। गणित हमारे लिए उपयोगी है ताकि हम इस तरह के लेन-देन में ठगे न जाएं। हम कई जगहों जैसे- बैंक, स्कूल, दुकानों, औद्योगिक संगठनों में गणित का उपयोग करते हैं।

मैंने हर साल गणित में पहला स्थान हासिल किया है। वर्तमान में स्कूल में हमें अध्ययन के रूप में गणित के प्रत्येक पाठ के आधार पर गृहकार्य दिया जाता है। मैं कभी-कभी दूसरे विषय का अध्ययन करने में असफल हो जाता हूँ, लेकिन मैं गणित का अध्ययन करने में कभी असफल नहीं होता।

मैं भविष्य में भी संपूर्ण रूप से गणित का अध्ययन करना चाहूंगा। मैं एक गणित शिक्षक के रूप में अपना भविष्य बनाना चाहता हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि इस सपने के लिए मेरा परिवार मेरा साथ देगा। उसके लिए मैं इस समय बहुत ही एकाग्रता के साथ गणित का अध्ययन कर रहा हूँ।

4. वसंत ऋतु ​

[2013A]

वसंत ऋतु को ऋतुराज कहा जाता है। फाल्गुन महीने में वसन्त का आगमन होता है। इस ऋतु में प्रकृति में हरियाली छा जाती है। फूल खिल उठते हैं। मोर नाचने लगते हैं। पेड़ों एवं लताओं पर पत्ते हरे-भरे होने लगते हैं और फूल खिल जाते हैं।

वसन्त ऋतु में प्रकृति की सुन्दरता देखते ही बनती है। सरसों के पीले-पीले फूलों से खेत पीले फूलों से खेत पीले नजर आने लगते हैं। पलाश के लाल-लाल फूल खिल उठते हैं। आमों के पेड़ों पर मंजरियाँ लग जाती हैं। हवा के झोंके बार-बार उठते-गिरते रहते हैं। तितलियाँ उड़ने लगती हैं। पक्षियों की चहचहाट शुरू हो जाती है। कोयल की कू-कू की आवाज में प्रकृति का मधुर संगीत सुनाई पड़ती है। चारों तरफ उमंग-ही-उमंग दिखाई पड़ता है। स्त्रियाँ भी पीले वस्त्र धारण कर लेती हैं। मानव नाच उठता है, प्रकृति नाच उठती है, स्त्रियाँ भी आन्तरिक रूप से प्रफुल्ल नजर आने लगती हैं।

वसन्त ऋतु की सुन्दरता आकर्षित करती है। सभी उल्लासित नजर आते हैं। ऋतुराज वसन्त उमंग के साथ जीने का संदेश हमें देता है।

5. इंटरनेट और छात्र ​

[2014A]

आधुनिक युग में इंटरनेट का महत्त्व समय-समय पर बढ़ता जा रहा है, और इसका प्रभाव छात्र जीवन पर भी गहरा है। इंटरनेट ने छात्रों के लिए जानकारी की समुद्र में पहुँच प्रदान की है, जहाँ वे विश्व के किसी भी कोने की जानकारी, समाचार, अध्ययन सामग्री आदि को आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।

आज के छात्र इंटरनेट का उपयोग न केवल अध्ययन से संबंधित सामग्री खोजने में करते हैं, बल्कि उनके सामाजिक और मानसिक विकास में भी यह एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। ऑनलाइन ट्यूटोरियल्स, वेबिनार और वीडियो लेक्चर्स से छात्र अपनी शिक्षा में नई ऊँचाइयों को छूने का प्रयास कर रहे हैं।

हालांकि, इसके साथ ही इंटरनेट के कुछ नकारात्मक पहलुओं का सामना भी करना पड़ रहा है। अधिक ऑनलाइन समय और सोशल मीडिया की अत्यधिक उपयोग वहज से मानसिक तनाव और अवसाद जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। इसलिए, छात्रों को इंटरनेट का संवेदनशील और संतुलित उपयोग करना चाहिए ताकि वे इसके फायदे उठा सकें और नकारात्मक प्रभाव से बच सकें।

6. चुनाव प्रक्रिया ​

[2014A,2024A]

चुनाव या निर्वाचन लोकतंत्र का एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसके द्वारा जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है।

भारत एक लोकतांत्रिक देश है। यहाँ जनता का राज है। भारत की आबादी लगभग 140 करोड़ है। 140 करोड़ देशवासियों के भलाई को ध्यान में रखकर ही लोग सही प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं। जो संसद या विधानसभा में बैठकर जनता के हित के संबंध में निर्णय लें।

जनतंत्र में जनता के मतदान द्वारा सरकार का गठन किया जाता है। इस चुनी हुई सरकार में जनता के प्रतिनिधि होते हैं। ये देश और जनता की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए नीति का निर्धारण करते हैं। प्रत्येक सरकार के गठन के लिए चुनाव, निर्वाचन आयोग के द्वारा कराया जाता है। चुनाव में सरकार के कोष से करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। चुनाव लड़ने वाले तथा कथित नेता भी अनंत रुपये प्रचार में खर्च करते है। ये जो जनता है, वो सबकुछ जानती है। लोकसभा और विधानसभा का चुनाव प्रत्यक्ष मतदान द्वारा होता है। राज्यसभा और विधानपरिषद् का चुनाव अप्रत्यक्ष चुनाव द्वारा होता है।

भारत में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए 25 जनवरी, 1950 को 'निर्वाचन आयोग' की स्थापना हुई। यह एक स्वतंत्र संस्था है, जो भारत के सभी प्रकार के चुनाव कराने का अधिकार रखती है।

भारतीय संविधान के भाग-15 में अनुच्छेद-324 से अनुच्छेद 329 तक निर्वाचन की व्याख्या की गयी है।

निष्कर्षतः चुनाव निष्पक्ष तरीके से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष मतदान द्वारा सम्पन्न होते हैं। प्रजातंत्र में निष्पक्ष चुनाव आवश्यक प्रतीत होते हैं। जनता का शिक्षित होना भी आवश्यक प्रतीत होता है। ईमानदार राजनेताओं का चुनाव करना जनता का नैतिक कर्त्तव्य है।

7. लोकपाल बिल ​

[2014A]

भारत, विश्व के सबसे बड़े प्रजातांत्रिक देशों में से एक है, जहाँ प्रजातंत्र के तत्वों का पालन अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस प्रजातंत्र में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार मुक्त शासन की स्थायी अपेक्षा होती है। लोकपाल विधेयक भारत में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत कदम के रूप में पेश किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य भ्रष्टाचार को निरर्थक बनाना है। स्वीडन में स्थापित की गई निरीक्षण प्रणाली से लोकपाल प्रणाली का उद्भव 18वीं सदी में हुआ और वर्तमान में यह 120 से अधिक देशों में स्वीकृत है। भारतीय संस्कृति और मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए यहाँ भी एक प्रभावशाली, पारदर्शी और सख्त लोकपाल संस्था की समय-समय पर जरूरत पड़ती है। इस संस्था को प्रभावी बनाने के लिए उसके अधिकारों और जिम्मेदारियों को स्थायी रूप से स्थापित करना, साथ ही सामाजिक जागरुकता बढ़ाना भी महत्वपूर्ण है।

8. कृषि-क्रांति ​

[2015A,2016A]

क्रांति परिस्थितियों में आमूल-चूल परिवर्तन ला देती है। कृषि क्रांति कृषि के क्षेत्र में ऐसा परिवर्तन ला देती है। जिससे पैदावार दूनी-चौगुनी-आठगुनी हो उठती है। लोगों का अन्न-संकट दूर हो जाता है और अन्नमय कोश भरने से प्राणमय कोश जीवित-जीवंत हो उठता है। यह आखिर कैसे सम्भव है? विज्ञान के उपयोग से कृषि-क्रांति सम्भव हो पाती है। दूसरा कोई शार्ट कट रास्ता नहीं है।

भारत में भी कृषि क्रांति आयी। ट्रैक्टर एवं ट्रेलर का प्रयोग हुआ। वैज्ञानिक सिंचाई की व्यवस्था की गयी। रासायनिक खादों का इस्तेमाल हुआ और उन्नत बीजों के इस्तेमाल से भारत में कृषि क्रांति आयी। भारत में इसे हरित क्रांति भी कहा गया। श्वेत क्रांति ने भी भारत को दूध का निर्यातक देश बनाया।

भारत आज अनाजों और खाद्य पदार्थों की दृष्टि से आत्मनिर्भर बन गया। लाल बहादुर शास्त्री ने 'जय जवान जय किसान' का नारा लगाया और इसे जमीन पर घटित कर दिखाया। अटल बिहारी वाजपेयी ने 'जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान' का नारा दिया और इसे घटित कर कृषि क्रांति सफल कर दी।

अब दालों, तेलहन, ईख और हरे चारे का उत्पादन भी बढ़ गया है। हमें इनका आयात नहीं करना पड़ता। किसानों ने कृषि क्रांति लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। वैज्ञानिक अनुसंधानों, वैज्ञानिक कृषियंत्रों एवं रासायनिक खादों ने कृषि क्रांति को सहज बना दिया। बीज भी उन्नत किस्म के आ रहे हैं। अब मछली क्रांति भी होने वाली है। दुग्ध-क्रांति भी हो रही है।

कृषि क्रांति से कुछ हानि भी हुई है। खेत खाद के बिना काम नहीं करते। निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि कृषि क्रांति ने भारत को आत्मनिर्भर एवं निर्यातक देश कृषि क्षेत्र में बनाया है। इस गति को हमें बरकरार रखना है। तभी भारत विकसित राष्ट्र कहलाएगा। अभी हमें 60% अन्न उत्पादन और बढ़ाना है, जिससे आनेवाली पीढ़ियों को कभी संकट का सामना न करना पड़े।

9. कम्प्यूटर और इंटरनेट ​

[2015A,2016A]

आज का युग विज्ञान का युग है। एक-से-एक नए आविष्कार मानव जीवन को प्रभावित कर रहे हैं। उन्हीं में से कंप्यूटर और इंटरनेट है। कंप्यूटर को इंटरनेट से अलग कर नहीं देखा जा सकता है। एक दूसरे के बिना दोनों अधूरा है।

आज बैंकों, सरकारों एवं जन-प्रतिष्ठानों एवं सभी प्रकार के बड़े कार्यालयों

में कंप्यूटर का उपयोग हो रहा है। कार्यालयों में सूचना की उपलब्धता एवं कार्य

दोनों तेजी से एवं वैज्ञानिक ढंग से हो रहे हैं। प्रगति की रफ्तार तीव्र हो गयी है। कंप्यूटर कोई गलती नहीं करता है। मानव मस्तिष्क का कार्य यह शुद्धतम रूप में करता है। इस बात की आशंका बढ़ गयी है कि कहीं मानव मस्तिष्क कंप्यूटर का दास न बन जाए।

कंप्यूटर मशीन के पाँच भाग होते हैं- स्मरण खंड, नियंत्रण खंड, इनपुट खंड और आउटपुट खंड। सूचनाएँ कंप्यूटर में भरी जाती हैं। कंप्यूटर की भाषा पृथक् होती है। उसी भाषा में सामग्री डालकर अपेक्षित परिवर्तन किया जाता है। स्मरण खंड में पूर्व डाली गयी सामग्री रहती है। आवश्यकता पड़ने पर इसे मुद्रित कर निकाला जा सकता है।

विश्वविद्यालयों एवं लोक सेवा आयोगों के परीक्षाफल भी यह संकलित एवं मुद्रित कर शीघ्रता से निकालता है ।

मानव यदि इसका उपयोग करता रहा तो यह उपयोगी सिद्ध होगा। लेकिन यह यंत्र है। मानव मस्तिष्क का यह स्थानापन्न नहीं बन सकता। मानवीय संवेदनशीलता और सहानुभूति यह नहीं प्रदान कर सकता। लेकिन रंगीन पेंटिंग निकालने में इसका जोड़ नहीं। डॉक्टर भी अब इन कंप्यूटरों का प्रयोग कर रहे हैं।

इस तरह कंप्यूटर मानव के लिए एक अत्यंत उपयोगी संयंत्र है। इसके उपयोग से देश भी तेजी से तरक्की कर रहा है।

समासतः कम्प्यूटर और इंटरनेट की मदद से हम पूरे विश्व की सूचनाओं और मनोरंजन का लाभ क्षण में ही उठा सकते हैं। अब दुनिया तेजी से बदल गयी है।

10. छात्र और अनुशासन ​

[2015A,2016A]

सृष्टि का समस्त कार्य एक निश्चित नियंत्रण या 'अनुशासन' के अधीन चल रहा है। अनुशासन शब्द का अर्थ ही शासन (आदेश या नियंत्रण) के अनुसार चलना है। अनुशासन एक व्यापक तत्त्व है, जो जीवन के सभी क्षेत्रों को अपने में समा लेता है। इसके अभाव में जीवन व्यवस्थित रीति से नहीं चल सकता।

यद्यपि जीवन में पग-पग पर अनुशासन का बड़ा भारी महत्त्व है, तथापि विद्यार्थी-जीवन में इसकी सबसे अधिक आवश्यकता होती है। विद्यार्थी को अपने भावी जीवन के निर्माण की तैयारी करनी होती है, जो बड़ी कठोर साधना है। इसके लिए विद्यार्थी का अनुशासित जीवन व्यतीत करना अनिवार्य है। अनुशासन में रहनेवाला बालक ही देश का सभ्य नागरिक बन सकता है।

आज छात्रों की अनुशासनहीनता देश के लिए एक ज्वलंत समस्या है। विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय में उदण्डता दिखाना, शिक्षकों का अपमान करना और परीक्षा में नकल करना और कराना, बसों, रेलों में बिना टिकट यात्रा करना अनुशासनहीनता के उदाहरण हैं। अतः विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण के लिए नैतिक शिक्षा पर विशेष बल दिया जाना चाहिए।

यदि आज के छात्र, जो देश के भावी कर्णधार हैं, अपने को अनुशासित रखने में सफल हो सकें तो इसमें उनका अपना भी कल्याण होगा तथा वे समाज व राष्ट्र का भी कल्याण कर सकेंगे। अनुशासन की नींव पर ही सफलता प्राप्त की जा सकती है। अनुशासित होकर ही जीवन में सुख, शांति और ऐश्वर्य की उपलब्धि प्राप्त की जा सकती है।

11. आरक्षण और सामाजिक न्याय ​

[2017A]

आरक्षण एक सामाजिक उपाय है जिसका मुख्य उद्देश्य समाज में उन वर्गों को समर्थन प्रदान करना है जो पिछले कई वर्षों से पिछड़े हैं। भारतीय संविधान ने इंसे स्वीकार किया ताकि समाज में समानता और न्याय की भावना को प्रोत्साहित किया जा सके।

आरक्षण से आशा है कि उन समुदायों को समाज में उनकी योग्यता और क्षमताओं के अनुसार समर्थन और मानकीकरण मिल सके, जो पिछले कई वर्षों से पिछड़े हैं।

आरक्षण पर विचारधारा के अनुसार विभिन्न दृष्टिकोण हैं। कुछ लोग इसे समाज में समानता की ओर बढ़ते कदम के रूप में देखते हैं, जबकि दूसरों का मानना है कि इसे पुनः मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

आरक्षण की व्यवस्था का समाज में क्या प्रभाव है, यह समझना महत्वपूर्ण है। इस पर विचार करते समय हमें यह समझना चाहिए कि इसका उद्देश्य समाज में समानता और न्याय सुनिश्चित करना है।

आरक्षण और सामाजिक न्याय के मुद्दे पर चर्चा करते समय यह जरूरी है कि हम उदार दृष्टिकोण से उसे देखें और समाज में समानता और न्याय के मूल्यों को समझें।

12. बिहार में शराबबंदी कानून ​

[2017A]

बिहार में शराबबंदी एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा है। इसका प्रमुख उद्देश्य समाज में शराब संबंधित समस्याओं जैसे कि पारिवारिक हिंसा, सामाजिक दुष्प्रभाव और अन्य संबंधित चुनौतियों को कम करना है। इसी परिपेक्ष्य में 1 अप्रैल, 2016 में बिहार सरकार द्वारा शराबबंदी कानून सख्ती से लागू किया गया। सरकार के इस निर्णय से प्रदेश की महिलाएँ, वृद्ध, बच्चे, सुशिक्षित एवं सभ्य लोगों को नशाखोरी से बड़ी राहत हुई। इससे लोगों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार हुआ और कई पारिवारिक तंत्र में स्थिरता आई है। फिर भी, इस परिस्थिति में कुछ चुनौतियाँ भी हैं। अवैध शराब का व्यापार बढ़ गया है, जिससे कि समाज में अन्य समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। इसके अलावा, राज्य सरकार को राजस्व की हानि भी हो रही है। शराबबंदी का मुख्य उद्देश्य समाज में सामाजिक संरचना को सुधारना है। इससे समाज में नैतिकता और समझदारी की बढ़ोतरी हुई है। अगर इसे सही तरीके से लागू किया जाए तो यह एक बेहतर भविष्य की ओर मार्गदर्शन कर सकता है।

शराबबंदी से सरकारी राजस्व का घाटा तो हुआ है, लेकिन इससे पारिवारिक अपव्यय रूका है। गरीब लोग जिस पैसे को शराब में उड़ा जाते थे, उन्हें अब अपने बच्चों के वस्त्र, आहार एवं शिक्षा पर खर्च करेंगे। नशाबंदी से लोगों में नया संस्कार जन्म लेगा। लोगों में विवेक, सुविचार जन्म लेगा। सामाजिक सद्भाव का एक नया वातावरण तैयार होगा। सुसभ्य और सुसंस्कृत बिहार का निर्माण होगा। इस्लाम में शराब हराम है। हिन्दू धर्म शास्त्रों में भी मदिरापान वर्जित और प्रतिबंधित है। बौद्ध और जैन-धर्म में हिंसा और नशा पूर्णतः वर्जित है।

इसलिए, यह जरूरी है कि जनता, प्रशासन और सरकार मिलकर इसे सफल बनाएँ, ताकि बिहार में समाज में सुधार हो सके।

13. प्रदूषण अथवा प्रदूषण की समस्या ​

[2012A,2013A,2017A]

पर्यावरण मनुष्य की भौगोलिक एवं बौद्धिक उपज है। अर्थात् मानव जीवन को पर्यावरण की परिस्थितियाँ व्यापक रूप से प्रभावित करती हैं। मनुष्य को एक 'सन्तुलित पर्यावरण' की स्थापना करनी चाहिए। लेकिन आज के इस हर क्षण बदलते युग में 'असन्तुलित पर्यावरण' की स्थापना हो रही है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण है-'प्रदूषण'।

प्रदूषण वास्तव में जलवायु या भूमि के भौतिक रासायनिक और जैविक गुणों में कोई भी अवांछनीय परिवर्तन है जिससे मनुष्य, अन्य जीवों, औद्योगिक प्रक्रियाओं सांस्कृतिक तत्त्वों तथा प्राकृतिक संसाधनों को हानि पहुँचती है। प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है- विश्व की बढ़ती जनसंख्या। विश्व की बढ़ती जनसंख्या के कारण ही आज पेड़ काटे जा रहे हैं जो प्रदूषण का सबसे मुख्य कारण है। वृक्षों का वातावरण को संतुलित रखने में बहुत बड़ा योगदान है।

प्रदूषण कई प्रकार के हो सकते हैं जैसे- वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण आदि।

महानगरों में अनेक प्रकार के वाहन, लाउडस्पीकर, बाजे एवं औद्योगिक संस्थानों की मशीनों के शोर ने ध्वनि प्रदूषण को जन्म दिया है। ध्वनि प्रदूषण से न केवल मनुष्य श्रवणशक्ति का ह्रास होता है, वरन् उसके मस्तिष्क पर भी इसका घातक प्रभाव पड़ता है। परमाणु शक्ति उत्पादन व नाभिकीय विखण्डन ने वायु, जल व ध्वनि तीनों प्रदूषणों को काफी विस्तार दे दिया है।

14. गणतंत्र दिवस ​

[2025A, 2013A, 2017A]

प्रत्येक वर्ष 26 जनवरी को मनाया जाने वाला गणतंत्र दिवस भारत का एक महान राष्ट्रीय पर्व है। इसे पूरे भारतवासी पूरे उत्साह जोश और सम्मान के साथ मनाते हैं। यह किसी विशेष धर्म, जाति या सम्प्रदाय से न जुड़कर राष्ट्रीयता से जुड़ा है, इसलिए देश का प्रत्येक भारतवासी गणतंत्र दिवस को राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाता है। यह वह दिन है जब भारत में गणतंत्र और संविधान की स्थापना हुई थी।

गणतंत्र दिवस के अवसर पर स्वतंत्रता संग्राम की स्मृति ताजी हो जाती है। हमें यह याद हो जाता है कि किस तरह आजादी के दिवाने देशभक्तों के जीवन भर के संघर्षों के परिणाम स्वरूप 15 अगस्त, 1947 को हमारा देश आजाद हुआ और 26 जनवरी, 1950 को एक धर्मनिरपेक्ष, लोककल्याणकारी, सार्वभौमिक गणराज्य के रूप में उदय हुआ।

आजादी के पश्चात डॉ० भीमराव अम्बेदकर ने पहली बार संविधान की रूप रेखा संविधान सभा के समक्ष प्रस्तुत किया। कुछ संशोधनों के उपरांत नवंबर 1949 में इसे स्वीकार कर लिया। संविधान सभा के सभी सदस्य चाहते थे कि इसे ऐसे दिन पारित किया जाए जो देश के गौरव से जुड़ा हुआ दिन हो। तब सबकी सहमति से निर्णय लिया गया कि पूर्ण स्वराज दिवस (26 जनवरी) के दिन भारत का संविधान लागू किया जाए। इसलिए हमारी संसद ने 26 जनवरी, 1950 को पारित किया। इसके साथ ही भारत लोकतांत्रिक गणराज्य बना। तभी से 26 जनवरी को पूरे हर्षोल्लास के साथं भारतवासियों द्वारा गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

हमारे संविधान ने देश के प्रत्येक नागरिक को समान रूप से राजनैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक अधिकार दिये हैं। गणतंत्र दिवस का पर्व हमारे अंदर आत्मगौरव भरने तथा पूर्ण स्वतंत्रता की अनुभूति कराता है।

गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली के लाल किला पर झंडारोहण किया जाता है। राष्ट्रगान के बाद राजपथ पर भारतीय सेना द्वारा भव्य परेड का आयोजन होता है। भारत में आजादी के बाद 'विविधता में एकता' के अस्तित्व को दिखाने के लिए राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर पर झाँकियों का प्रदर्शन किया जाता है। इसके माध्यम से देश अपनी संस्कृति परम्परा और प्रगति को प्रदर्शित करते हैं।

गणतंत्र दिवस प्रत्येक भारतवासी के लिए महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय पर्व है। यह पर्व कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक गाँव-गाँव में, शहर-शहर में, घर-घर में उत्साह के साथ मनाया जाता है। देश के सारे स्कूलों, कॉलेजों, राजकीय संस्थानों से लेकर गाँव के चौपालों तक दिन भर उत्सव चलता रहता है। 'वन्दे मातरम' की सुमधुर ध्वनि सर्वत्र गुंजती रहती है। वास्तव में यह शुभ दिन भारत के लिए गौरवमय दिन है।

15. महँगाई ​

[2018A]

पिछले दो दशकों से महँगाई निरंतर बढ़ती जा रही है। विभिन्न वस्तुओं तुआओ के के मूल्य में अप्रत्याशित वृद्धि को देखकर आश्चर्य होता है। निरंतर बढ़ती हुई महँगाई भारत जैसे विकासशील देश के लिए निश्चित ही भयानक अभिशाप कहा जा सकता है।

बढ़ती हुई महँगाई का सर्वाधिक मुख्य कारण बढ़ती हुई जनसंख्या है। पिछले 50 वर्षों में हमारे देश की जनसंख्या लगभग तीन गुनी हो गई है। जनसंख्या की वृद्धि के अनुपात से विभिन्न वस्तुओं के उत्पादन में वृद्धि नहीं हुई। जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती है, वैसे-वैसे विभिन्न वस्तुओं की माँग में वृद्धि होती है। माँग के अनुपात में यदि वस्तुओं की पूर्ति में वृद्धि नहीं होती, तो महँगाई का बढ़ना स्वाभाविक ही है।

हमारे देश में निरंतर बढ़ता हुआ भ्रष्टाचार और अवांछित कार्य भी मूल्य वृद्धि का एक मुख्य कारण है। इन्हें पुनः निर्मित करने में पर्याप्त धनराशि व्यय होती है।

महँगाई पर नियंत्रण पाने के लिए सरकार को कठोर कदम उठाना चाहिए तथा जनता को भी सादगीपूर्ण जीवन-शैली में निष्ठा रखनी चाहिए। इसके अतिरिक्त आवश्यक पदार्थों के उत्पादन में पर्याप्त वृद्धि होनी चाहिए। ताकि आवश्यक वस्तुओं की पूर्ति में वृद्धि हो सके।

16. नशा उन्मूलन (नशा मुक्ति) ​

[2014A, 2018A]

कई लोगों का मानना है कि नशा तनाव को कम करता है और अस्थायी आनंद प्रदान करता है। धीरे-धीरे, यह आदत बन जाती है और उनके मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर प्रभाव डालती है। बुरी संगति भी अक्सर इसे बढ़ावा देती है, जो मनुष्य के मानस, स्वास्थ्य एवं संवेदना को मार देती है।

इस नशा से मुक्ति आवश्यक है। नशा मुक्ति से परिवार, समाज एवं देश में शान्ति का संचार सम्भव हो सकेगा। नशामुक्ति शैक्षिक प्रगति, उचित रोजगार, अवसरों का निर्माण और सामाजिक विकास में मदद करती है।

नशामुक्ति के लिए व्यक्तिगत व सामुदायिक स्तर पर कोशिश करनी होगी। - सरकारी प्रयास भी सार्थक हो सकेंगे। बिहार सरकार ने नशा-पर प्रतिबंध लगाया। सरकारी कदम भी महत्वपूर्ण हैं। लेकिन नशा मुक्ति सिर्फ कानूनी उपायों से ही पूरी नहीं हो सकती। इसके लिए देश, समाज एवं परिवार के वातावरण में भी सुधार की आवश्यकता है।

विभिन्न नशा मुक्ति केंद्रों को समर्थन करना भी महत्वपूर्ण है। यह संस्थाएँ नशे के शिकार व्यक्तियों को सहायता प्रदान करती हैं। यह सब मिलकर, नशा मुक्ति को बढ़ावा देकर, हमारे देश के सुखद भविष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।

17. युवा शक्ति ​

[2018A]

युवा वर्ग समाज की वह ऊर्जा है जिससे नई सोच, नवाचार और परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त होता है। युवा शक्ति का महत्व न केवल राष्ट्र निर्माण में है बल्कि न समाज के सभी क्षेत्रों में उसका अद्वितीय योगदान है।

युवा वर्ग अपनी उम्र और ऊर्जा के कारण ही नहीं बल्कि अपनी ताजगी, नवाचारप्रवृत्ति और साहसिकता के कारण भी महत्वपूर्ण है। इसी ऊर्जा, साहस और नवाचार की शक्ति के कारण युवा वर्ग नई तकनीकों, विज्ञान, शोध, कला, खेल, सामाजिक सेवा और अन्य क्षेत्रों में अपना योगदान देता है।

इसके साथ ही युवा वर्ग के पास वह अद्वितीय सोचने की क्षमता है जिससे वह समाज की मौजूदा समस्याओं के समाधान के लिए नई सोच और उपाय निकालता है। चाहे वह पारिस्थितिकी समस्या हो, सामाजिक असमानता हो या अन्य किसी भी प्रकार की समस्या हो, युवा वर्ग हमेशा उसके समाधान की दिशा में आगे बढ़ता है।

हालांकि, यह भी सत्य है कि युवा वर्ग को सही दिशा और मार्गदर्शन की भी आवश्यकता होती है। अगर उन्हें सही मार्गदर्शन नहीं मिलता तो उनकी ऊर्जा और साहस गलत दिशा में जा सकती है। इसलिए, समाज और राष्ट्र की जिम्मेदारी है कि वह युवा वर्ग को सही मार्गदर्शन दे और उन्हें सही दिशा में प्रोत्साहित करे।

अंततः, युवा शक्ति समाज और राष्ट्र के विकास में अद्वितीय योगदान देने वाली है। इसलिए, हमें इसे संजीवनी शक्ति की तरह देखना चाहिए और इसका सही उपयोग करना चाहिए। युवा वर्ग का सही मार्गदर्शन और प्रोत्साहन से ही हमारा समाज और राष्ट्र उच्च शिखरों पर पहुँच सकता है।

इसलिए, युवा शक्ति को सही दिशा देना, उन्हें प्रोत्साहित करना और उनकी क्षमताओं का सही उपयोग करना हम सभी की जिम्मेदारी बनती है।

18. आपका प्रिय कवि ​

[2017A,2018A]

मेरे प्रिय कवि राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर हैं। उनकी कविता राष्ट्रीय भावना का संचार करती हैं। उनकी कविता अन्याय सहने का विरोध करती है। उनकी कविता नारी के प्रति विनम्रता का भाव सिखलाती है। वे उस पुरुष को पूर्ण कहते हैं जिनमें नारियों की सी विनम्रता होती है। उनकी कविता कर्ण की विनम्रता और दानी स्वभाव की प्रशंसा करती है। उनकी कविता भारत की प्रशंसा करती है। इन्हीं कारणों से वे आज भी मेरे प्रिय कवि हैं।

दिनकर जी का जन्म 23 सितम्बर, 1908 ई० में हुआ था। उनका निधन 24 अप्रैल, 1974 में हुआ था। उनका जन्म स्थान सिमरिया, बेगूसराय, बिहार में हुआ था। उनकी माता का नाम मनरूप देवी और पिता रवि सिंह थे।

दिनकर जी की कृतियाँ हैं- 'प्रणभंग', रेणुका, हुंकार, 'रसवंती', कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, नीलकुसुम, उर्वशी, परशुराम की प्रतीक्षा, कोमलता और कवित्व और 'हारे को हरिनाम'।

दिनकर जी की गद्य कृतियाँ हैं- 'मिट्टी की ओर', अर्धनारीश्वर, 'संस्कृति के चार अध्याय', 'काव्य की भूमिका', 'वट पीपल', 'शुद्ध कविता की खोज' और 'दिनकर की डायरी'।

'संस्कृति के चार अध्याय' पर साहित्य अकादमी एवं 'उर्वशी' पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार उन्हें मिला था। दिनकर जी को पद्मभूषण की उपाधि भी मिली थी। वे राष्ट्रकवि माने जाते हैं।

दिनकर जी की कविता में ओज एवं पौरुष भरा हुआ था। हिन्दी एवं बिहार का यश दिनकर जी ने बढ़ाया। उनकी कविता का नमूना इस प्रकार है –

'जब तक मनुज मनुज का यह सुख भाग नहीं सम होगा, शमित न होगा कोलाहल, संघर्ष नहीं कम होगा।'

19. गंगा सफाई अभियान ​

[2019A]

गंगा भारत की एक बड़ी नदी है। यह गंगोत्री से निकलकर कलकत्ता में समुद्र में गंगा-सागर में जाकर मिल जाती है। यह अनेकानेक बड़े शहरों से होकर गुजरती है। यह प्रदूषित होती चली जा रही है। इसी की सफाई करना 'गंगा सफाई अभियान' का लक्ष्य है। गंगा के पानी को शुद्ध पारदर्शी एवं बैक्टीरिया-रहित बनाना इस सफाई अभियान का उद्देश्य है।

विभिन्न शहरों के कूड़े-कचरे इस नदी में फेंक दिए जाते हैं। सीवरेज का पानी, शौच का शुद्ध-अशुद्ध पानी इस नदी में अनवरत फेंका-डाला जा रहा है। शौच के पानी को शुद्ध 'करके इसमें डाला जा सकता है। मूर्तियाँ विसर्जन भी इस नदी में कर दिया जाता है। इसे रोकना होगा। नदी के किनारे शौच करने से भी रोकना होगा। कल-कारखानों के गन्दे पानी एवं जहरीले पानी को भी इस नदी में फेंके जाने से रोकना होगा। ज्यों-ज्यों भारत की जनसंख्या 140 करोड़ से आगे बढ़ रही है, त्यों-त्यों इसका पानी साफ रखना मुश्किल हो रहा है। पशुओं को इसी नदी में स्नान कराया जाता है। इसे भी बन्द करना होगा।

इस सफाई की चेतना का निर्माण कर गंगा सफाई अभियान को सफल बनाया जा सकता है। यह प्रत्येक भारतीयों का कर्त्तव्य है।

20. छठ पर्व ​

[2019A]

सूर्य की विधिवत पूजा बिहार में बड़े पैमाने पर होती है। यह पूजा छठ कहलाती है। यह पूरे भारत में फैल रही है।

दीपावली के छठे दिन षष्ठी व्रत के नाम से लोकप्रिय यह पर्व काफी कड़े व्रत और नियमों के साथ की जाती है। नियम में प्रवेश चौथे दिन, पाँचवें दिन लोहंडा, छठे दिन शाम के वक्त डूबते सूर्य को पहला अर्घ्य और सातवें दिन सुबह को उगते सूर्य को दूसरा और अंतिम अर्घ्य के साथ यह त्योहार सम्पन्न होता है। अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने के लिए सूर्य को नमस्कार करने का यह अनूठा पर्व आर्य और वैदिक संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए हुए हैं।

ऋग्वेद ने सूर्य को ईश्वर की सबसे खूबसूरत दूनिया कहते हुए सलाह दी है

कि इस दैविक सूर्य की संप्रभुता का हम आदर करें। भारत में कई सूर्य मंदिर है, जिनमें कोणार्क का सूर्य मंदिर मशहूर है।

वेदों में इसे एक पहिए वाले सुनहरे रथ पर सवार देवता कहा गया है, जिसे सात शक्तिशाली घोड़े पलक झपकते ही 364 लीग की रफ्तार से दौड़ा कर ले जाते। हैं। वह अपने रथ पर सवार होकर आसमान में घूमता रहता है और संसार की हर गतिविधि पर नजर रखता है। !

21. विज्ञान : वरदान या अभिशाप ​

[2019A]

ज्ञान की नियोजित पद्धति का नाम ही विज्ञान है। वैज्ञानिक आविष्कारों के पहले हम पौराणिक कथाओं में देवदूतों, परियों और इन्द्रजाल के करतबों की कहानी। सुना करते थे। चाँद और सितारों पर सैर करने के काल्पनिक आनन्द में खोए रहते थे। विज्ञान ने इस झूठे आनंद, झूठी खुशी को वास्तविक खुशी और आनंद में बदल दिया है।

प्रकृति ने हमें बाधाएँ दी हैं, पर विज्ञान ने उन बाधाओं को लांघने का रास्ता दिया है। यह विज्ञान का चमत्कार ही है कि हम लहरों से खेल सकते हैं, तूफानों से लड़ सकते हैं और उमड़ते हुए समुद्र को पार करने में सफल होते हैं। विज्ञान ने रेल, वायुयान, टेलिफोन, रेडियो, एयर कंडीशनर आदि देकर जहाँ

मनुष्य को सुविधाएँ दी हैं, वहीं यह भी प्रमाणित किया है कि आज की दुनिया इसकी मुट्ठी में है। बुद्धि की बदौलत कल्पना को सच्चाई में बदलने वाले विज्ञान ने जहाँ हमें सुविधाओं से लैस कर जीवन को आनंदमय बनाया है। वहीं मानव को विध्वंस की पीड़ा से कम आतंकित नहीं किया है। अणुयुग के बाद इलेक्ट्रॉनिक युग। के आगमन से आज का आदमी अपने को महान् शक्तिशाली मानता है। बारूद के ढेर पर बैठी हुई दुनिया जहाँ झूठे गर्व से अपनी शक्ति का एहसास कर फूली नहीं समाती, वहीं बारूद के ढेर में आग लगने की आशंका से मुक्त भी नहीं है। यह विज्ञान की ही देन है कि पूरी सृष्टि अणु-बम और हाइड्रोजन बम का आविष्कार कर विनाश के कगार पर खड़ी हो गई है।

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि विज्ञान बुद्धि द्वारा उत्पादित अपरिमित शक्ति, सुविधा और विनाश का नाम है। अतः हमें आवश्यकता के अनुरूप विज्ञान का उपयोग करना होगा।

22. दूरदर्शन ​

[2019A,2020A]

दूरदर्शन मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञान-प्रसार एवं प्रचार का महत्त्वपूर्ण साधन है। इसका मुख्य कारण यह है कि दूरदर्शन में श्रव्य एवं दृश्य दोनों ही साधनों की विशेषताओं का समावेश है। वह साहित्य, संगीत, नृत्य कला एवं विज्ञान को समन्वित रूप में प्रस्तुत करनेवाला उपकरण है। इसके आविष्कार ने जीवन को एक नया आयाम प्रदान किया है। भारत की लगभग 80 प्रतिशत जनता इस कौतूहलवर्द्धक उपकरण द्वारा लाभान्वित हो रही है।

उपयोगिता एवं प्रगति के इस दौर में दूरदर्शन मनोरंजन के नाम पर भोंडे और अश्लील चित्रों को प्रदर्शित करने में बाज नहीं आता। इन प्रसारणों को परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर देखने में ग्लानि का अनुभव करते हैं। इस प्रकार शील की मर्यादाएँ तोड़ने में दूरदर्शन प्रमुख साधन बन रहा है और सांस्कृतिक स्तर का क्षरण कर रहा है।

इसलिए आदर्श एवं काम्य स्थिति यह होगी कि दूरदर्शन के कार्यक्रमों का संयोजन इस प्रकार किया जाय कि कम-से-कम समय में अधिक-से-अधिक श्रेष्ठ प्रभाव उत्पन्न करने वाले कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाय।

इस प्रकार, दूरदर्शन का महत्त्वपूर्ण योगदान हमारे समाज में ज्ञान, सूचना और मनोरंजन के प्रसार में रहेगा।

23. विद्यालय-जीवन में खेल का महत्त्व ​

[2019A,2020A]

विद्यालय-जीवन में खेल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

मनुष्य जीवन एक सौ वर्षों के लिए है। वही मनुष्य सौ वर्ष जी सकता है, जो अपने शरीर को स्वस्थ रखता है। स्वास्थ्य ही धन है (हेल्थ इस वेल्थ) जो अपना स्वास्थ्य सुंदर, आकर्षक, गठीला और निरोग रखता है वही सौ वर्षों की आयु प्राप्त करता है। वही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति करता है।

स्वस्थ रहने के लिए व्यायाम और खेलकूद जरूरी है। जो खेलता-कूदता है, उसका शरीर स्वस्थ हो जाता है। उसे बीमारी नहीं होती है। कभी-कभी तो वह खेलकूद से भी पर्याप्त धन एवं मान कमा लेता है।

खेलकूद मानव जीवन के लिए आवश्यक है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन बसता है। स्वस्थ मन से ही मनुष्य संसार के तनाव झेल पाता है। खेलकूद व्यवहार में सामंजस्य लाते हैं। खेलकूद हार में दुखी और जीत में ज्यादा खुशी नहीं होने देते। ऐसा सबके साथ होता ही रहता है।

खेलकूद जीवन का उन्नयन करते हैं। हम अनुशासन सीखते हैं। जीत की भावना प्रबल होती है। खेल खेलने वाले का जीवन स्तर ऊँचा होता है। परिश्रम से तब हम जी नहीं चुराते। श्रम एवं जीत का महत्त्व जीवन में हम सीखते हैं।

खेल हमें मिलजुल कर रहना और खेलना सीखाते हैं। क्रिकेट हो या फुटबाल, बॉलीबाल हो या बैडमिण्टन सभी मिलजुल कर खेले जाते हैं। कबड्डी और खो-खो खेल भी अब प्रसिद्धि पा रहे हैं। टेनिस और टेबुल टेनिस भी परिश्रम की अपेक्षा रखते हैं।

खिलाड़ियों को अब सरकारी नौकरियाँ भी मिल रही हैं। वे विभिन्न संस्थाओं में जाकर नाम कमाते हैं। शिक्षण संस्थाओं में भी खेल शिक्षक एवं योग शिक्षक पाए जाते हैं। वे छात्रों को खेल सिखला कर स्वस्थ बनाते हैं।

मनुष्य जीवन में खेल का महत्त्व दिनानुदिन बढ़ता जा रहा है।

24. समाचार पत्र ​

[2020A]

समाचार-पत्र के नाम से ही इसका स्वरूप उभर कर सामने आ जाता है। इसे आम बोलचाल की भाषा में 'अखबार' कहते हैं, जिसका अभिप्राय है खबरों का खजाना। इन दोनों ही नामों से स्पष्ट हो जाता है कि समाचार-पत्र वह पत्र है, जिसमें कि विश्व की घटित घटनाओं का सूचना के रूप में विवरण प्रस्तुत किया जाये। आज के मानव जीवन में अखबार या समाचार-पत्रों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। जिस प्रकार वस्त्र और भोजन हमारे दैनिक जीवन की प्रमुख आवश्यकताएँ हैं, ठीक उसी प्रकार समाचार-पत्र भी आज हमारे जीवन के अभिन्न अंग बन गये हैं।

समाचार-पत्रों के कई रूप आज प्रचलित हैं। इसमें प्रमुख हैं- दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक एवं मासिक। परंतु, लोगों में दैनिक समाचार पत्रों के प्रति अधिक रुचि है, क्योंकि वे शीघ्रातिशीघ्र विश्व के अन्य देशों अथवा देश के अन्य भागों से अपने को जुड़ा हुआ देखना चाहते हैं। साप्ताहिक, पाक्षिक तथा मासिक पत्रों में समाचारों के अतिरिक्त अन्य उपयोगी सामग्री का भी प्रकाशन होता है। सामयिक विषयों पर सामग्री इन पत्र-पत्रिकाओं की प्रमुख विशेषता है।

समाचार-पत्रों के माध्यम से विश्व के देशों में बंधुत्व का भाव जागृत करने में बहुत सहायता मिली है। आज विश्व के विभिन्न देशों में जो निकटता बढ़ रही है, इसके मूल में समाचार पत्रों की भूमिका ही है।

समाचार-पत्र आधुनिक समाज के सच्चे साथी हैं। ये प्रजातंत्र तथा मानव-अधिकारों के सजग प्रहरी हैं। आज हम विश्वबंधुत्व की जिस भावना को हृदय में लेकर प्रगति के जिन सोपानों की ओर बढ़ रहे हैं, उनके निर्माण में समाचार-पत्रों का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है।

25. प्राकृतिक आपदा ​

[2024A,2020A]

प्रकृति के साथ छेड़-छाड़ प्राकृतिक आपदा लाती है। कभी तूफान (सेलान) तो कभी बर्फबारी, कभी बाढ़ तो कभी सूखा, कभी आगजनी तो कभी भूकम्प-कई तरह की प्राकृतिक विपदाएँ मनुष्य एवं राष्ट्र के जीवन में आती रहती हैं। इनका प्रकोप दुःखपूर्ण एवं त्रासदपूर्ण हुआ करता है। मनुष्य जीवन एवं पशु जीवन इससे प्रभावित होता है।

प्राकृतिक विपदा जन-जीवन को त्रासदीपूर्ण बना देती है। इससे लाभ कम एवं नुकसान ज्यादा होता है। मनुष्य मर जाते हैं। मनुष्य बाढ़ के पानी में डूब जाते हैं। सुनामी की लहरें तटीय जीवन को त्रस्त कर देती हैं।

बिहार में बाढ़, भूकम्प और दुर्घटनाओं की वजह से ज्यादा मौतें होती हैं। इन मौतों की मुख्य वजह अज्ञानता है। लोगों को आपदा से निपटने की जानकारी नहीं होती। अगर लोगों को यह जानकारी रहे, तो नुकसान को कम किया जा सकता है। आपदा आने के पहले और बाद में लोगों को क्या करना चाहिए, इसकी जानकारी पहले से हो, तो नुकसान को काफी कम किया जा सकता है।

भूकम्प आने पर अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए। अगर घर से बाहर न निकल सके, तो घर में ही मेज, कुर्सी, पलंग आदि का सहारा लेना चाहिए। इससे जान का नुकसान कम होगा।

प्राकृतिक विपदा को रोका तो नहीं जा सकता लेकिन इसके असर को कम जरूर किया जा सकता है। प्राकृतिक आपदा का सामना करनेवाली एक स्वयंसेवकों की टीम तैयार करनी होती है। बार-बार सैनिकों को इस काम में नहीं लगाया जा सकता। यह टीम पूर्व भविष्यवाणी के अनुसार काम करती है। सेलान का तूफान भुवनेश्वर के निकट आया था और पूरे भारत पर छा गया था। सुरक्षा टीम ने प्रशंसनीय कार्य किया। इसी तरह भूकम्प एवं बाढ़ से रक्षा के उपाय भी किए जा सकते हैं।

जापान में छोटे-छोटे बच्चे प्राकृतिक आपदा को लेकर इतने जागरूक हैं कि मौत न के बराबर होती है। वहाँ मॉक ड्रिल के जरिए समय-समय पर लोगों को चेतावनी दी जाती है।

समासतः हम कह सकते हैं कि प्राकृतिक विपदा की त्रासदी को मनुष्य संगठित एवं प्रशिक्षित होकर कम कर सकता है।

26. पुस्तकालय ​

[2020A]

पुस्तकालय का अर्थ है-पुस्तकों का घर। पुस्तकालय में पढ़ने के लिए अनन्त पुस्तकें रखी जाती हैं। इन पुस्तकों को पढ़कर देश और देश के लोग आगे बढ़ जाते हैं।

पुस्तकालय कई प्रकार के हो सकते हैं। स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय और सार्वजनिक स्थानों पर भी अच्छे-अच्छे पुस्तकालय होते हैं। कुछ पुस्तकालय लोग घरों में भी बनाकर रखते हैं, इसे व्यक्तिगत पुस्तकालय कहते हैं। कुछ पुस्तकालय सरकारें भी बनाती हैं, इसे राजकीय पुस्तकालय कहते हैं। आम जनता के लिए बनाए गए पुस्तकालय सार्वजनिक पुस्तकालय कहलाते हैं। चल-पुस्तकालय भी होते हैं।

पुस्तकालय से अनेक लाभ हैं। इससे ज्ञान की वृद्धि होती है। गरीब छात्रों की बड़ी मदद हो जाती है। पढ़े-लिखे लोगों से भेंट पुस्तकालय में होने से पाठकों की रुचि भी विकसित एवं परिष्कृत हो जाती है। पुस्तकों से मनोरंजन भी होता है। इससे समाज को बहुत लाभ होता है। देश भी उन्नत दिखाई पड़ने लगता।

पुस्तकें केवल ज्ञान का स्रोत नहीं होती हैं, बल्कि मनोरंजन का भी स्त्रोत हो सकती है। यह समाज में ज्ञान के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

27. सरस्वती पूजा ​

[2020A]

माँ सरस्वती विद्या, ज्ञान और कला की देवी है। सरस्वती पूजा के ख्याल से ही छात्र-छात्राओं में जोश का संचार हो जाता है। प्रत्येक शिक्षण संस्थाओं में विद्यार्थियों द्वारा पूरी तन्मयता के साथ सरस्वती पूजा का आयोजन किया जाता है। बड़े-बूढ़े भी बच्चों का पूरा सहयोग देते हैं।

सरस्वती पूजा माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है। यह जनवरी या फरवरी माह में आता है। इस पूजा में माँ सरस्वती की प्रतिमा एक या दो दिन के लिए बैठाई जाती है। छात्र-छात्राएँ सरस्वती पूजा के दिन सुबह-सुबह नहा-धोकर विद्यादायनी माँ सरस्वती की पूजा करते हैं और फिर प्रसाद ग्रहण करते हैं। इस पर्व को वसन्तोत्सव, वसंत पंचमी, श्री पंचमी भी कहा जाता है।

प्राचीन वाङ्मय में सरस्वती को वागाधिष्ठात्री देवी अर्थात् विद्या एवं बुद्धि का पर्याय माना गया है। कहा जाता है कि इनका वस्त्र शुभ्र अर्थात् उजला और धवल है जो सादगी एवं स्वच्छता का प्रतीक है। इनका वाहन हंस है जो दूध का दूध और पानी का पानी कर देने के विवेक का परिचायक है। इनके एक हाथ में पुस्तक है जो विश्व के समस्त ज्ञान के प्रकाश स्रोत का पर्याय है। इनके एक हाथ में वीणा है जो यह प्रेरणा देती है कि हमें अपने जीवन में ज्ञान के साथ-साथ संगीत एवं स्वस्थ मनोरंजन, आत्मा तक को पवित्र कर देने वाली झंकार की भी साधना करनी चाहिए।

सरस्वती पूजा का उत्सव पूरे भारत में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। विद्यार्थी वहाँ एकत्र होकर सामूहिक रूप से पूजा करते हैं। शिक्षण संस्थानों के अतिरिक्त गाँवों एवं मुहल्लों में भी सरस्वती पूजा अत्यन्त श्रद्धा से की जाती है। जगह-जगह पर माँ सरस्वती की प्रतिमाएँ स्थापित की जाती है। तोरणों एवं फूल पत्तियों से सजाकर माता की पूजा पूरी विधि-विधान से की जाती है। दिन भर पूजा एवं प्रसाद वितरण का दौर चलता रहता है। रात में लोग सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आनंद लेते हैं।

वसंत पंचमी में शताब्दियों से माता सरस्वती की पूजा होती आ रही है। यह एक सांस्कृतिक पर्व है। माता सरस्वती 'सत्यम', 'शिवम्', 'सुन्दरम्' के रूप में संसार में सुख, शांति और सौन्दर्य का सृजन करती है।

यह दिन संगीत, कला आदि के ज्ञान अर्जन का शुभारंभ करने के लिए उत्तम होता है। ऐसी भी मान्यता है कि इस दिन सरस्वती पूजा करने से देवी प्रसन्न होती है और भक्तों को ज्ञान, संगीत, कला आदि में निपुण होने का आशीष देती है।

28. भ्रष्टाचार ​

[2021A]

'भ्रष्टाचार का शाब्दिक अर्थ है-भ्रष्ट आचरण। अपने निहित स्वार्थ के कारण जब हमारा आचरण भ्रष्ट हो जाता है, तब भ्रष्टाचार का जन्म होता है। भ्रष्टाचार व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के लिए कलंक है। यह हमारी व्यवस्था को चौपट कर मानव समाज को पतनोन्मुख बनाता है। भ्रष्टाचार के विषदंश से आज का मानव-समाज पीड़ित है। यह भ्रष्टाचार आज एक वैश्विक समस्या बनकर हमें कलंकित कर रहा है।

भ्रष्टाचार के कई कारण हैं। हमारी भोगलिप्सा और ज्यादा-से-ज्यादा अर्थसंग्रह भ्रष्टाचार का मूल कारण है। वर्तमान समाज में हर आदमी ज्यादा-से-ज्यादा सुख और संपत्ति पाना चाहता है। इस प्यास की तृप्ति के लिए वह नैतिक और अनैतिक साधनों का प्रयोग कर समाज का शोषण करता है। भ्रष्टाचार शिक्षा, व्यापार, राजनीति खेलकूद और शासन-व्यवस्था सब जगह दिखाई देता है।

भ्रष्टाचार से बचने के लिए नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देना होगा। स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज, देश और विश्व की चिंता करनी होगी। भौतिक ऐश्वर्य और भोगवाद से हटकर समाज-सेवा और मानव-कल्याण की भावना जाग्रत करनी पड़ेगी। भ्रष्टाचार

का आधार स्वार्थ और धनलिप्सा होता है। हमें राष्ट्र के प्रति अपनी जवाबदेही पैदा करनी पड़ेगी। जबतक हमारे भीतर राष्ट्रसेवा और मानव कल्याण का भाव नहीं पैदा होगा, तबतक भ्रष्टाचार नहीं मिटेगा।

निस्संदेह भ्रष्टाचार समाज के लिए कलंक है। इस कलंक से मुक्ति के लिए आत्मानुशासन, जिम्मेदारी और वफादारी का भाव पैदा करना होगा। यह लड़ाई घर से शुरू करनी पड़ेगी और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जारी रखनी होगी।

29. वर्षा ऋतु. ​

[2018A,2021A]

भारतवर्ष की प्राकृतिक सुन्दरता विश्व में अनूठी है। भारत में छः ऋतुएँ आती हैं-ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर और वसंत। वर्षा का इनमें महत्त्वपूर्ण स्थान है।

वर्षा ऋतु का आगमन 15 जून से मानसूनी हवाएँ चलने पर होता है और यह सितम्बर तक चलती है। वर्षा से चारों ओर हरियाली फैल जाती है। गड्ढे-पोखरे, नदी-तालाब सब भर जाते हैं। जमीन के नीचे का पानी भी ऊपर आ जाता है। पीने के पानी की कमी दूर हो जाती है। मनुष्य, जानवर एवं पक्षियों का मन प्रसन्न हो जाता है। हृदय में प्रेम की फुहार फूटने लगती है। प्रचंड गर्मी के बाद सबको राहत मिलती है।

वर्षा ऋतु के दौरान, प्रकृति में एक नया जीवन देखने को मिलता है। आम के बागों में कोयल कुहू कुहू कूकने लगती है। सावन के गीत सुनाई पड़ने लगते हैं। मोर-पपीहे की ध्वनि बागों में गूंजने लगती है। मेंढक टर्र-टर्र टर्राने लगते हैं। चाँद की रोशनी वर्षा में धुल जाती है। जुगनू टिमटिमाने लगते हैं। इंद्रधनुष दिखाई पड़ने लगते हैं। प्रकृति की अद्भुत छटा देखते ही बनती है।

वर्षा में आम पककर मीठे हो जाते हैं। जामुन का कसैंधापन गायब हो जाता है। मक्के तैयार हो जाते हैं। अमरूद भी फलने लगता है। अच्छी वर्षा से फसलें भी अच्छी होती हैं।

वर्षा कभी अतिवृष्टि लाती है, तो कभी अनावृष्टि। अतिवृष्टि से बाढ़ आ जाती है। फसलें डूब जाती हैं। शहर भी डूबने-उतराने लगते हैं। अनावृष्टि से फसलें सूख जाती हैं। लोग तड़पने लगते हैं।

हालांकि, वर्षा ऋतु के कुछ पहलुएँ हमें सतर्क भी रखती हैं। अत्यधिक वर्षा के कारण बाढ़ की समस्या उत्पन्न हो सकती है, जो खेती और जीवन में परेशानी पैदा कर सकती है। वहीं, अनावृष्टि से फसलें सूख जाती हैं। वर्षा ऋतु में कई बीमारियाँ भी फैलती हैं जैसे कि सर्दी, खाँसी, बुखार, निमोनिया, काला ज्वर और मलेरिया। इसलिए इस ऋतु में स्वच्छता और स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

वर्षा ऋतु भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। यह हमारे देश की विविध ता और समृद्धि को प्रतिबिंबित करती है।

30. छात्र और राजनीति ​

[2021A]

छात्र जीवन का मुख्य उद्देश्य ज्ञान अर्जन करना होता है। छात्र विद्यालय या महाविद्यालय में अपनी रूचि के अनुसार विषयों का चयन करके अध्ययन करते हैं। उनमें से कुछ छात्र जो राजनीति में रूचि रखते हैं, वे इसे भी अपने अध्ययन के भाग के रूप में सम्मिलित करते हैं।

राजनीति और छात्र जीवन का संबंध इतिहास में गहरा और महत्वपूर्ण है। राजनीति की समझ छात्रों को समाज में अपनी भूमिका निभाने में मदद करती है, वहीं यह उन्हें विचारशील और सचेत नागरिक बनाने में भी सहायक होती है।

हालांकि, यह समझना महत्वपूर्ण है कि अध्ययन और राजनीति का संतुलन बनाए रखना चाहिए। अध्ययन के साथ-साथ राजनीति में सक्रिय रहना चुनौतियाँ उत्पन्न कर सकता है, लेकिन यह छात्रों के व्यक्तित्व विकास में महत्वपूर्ण हो सकता है।

विश्वास करना महत्वपूर्ण है कि समय से धर्म और संवेदनशीलता के साथ राजनीति करने वाले छात्र देश की नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं। ईमानदारी और समर्पण के साथ अपनी कर्तव्यों को निभाने वाले छात्र नेता देश को ऊंचाईयों तक पहुँचा सकते हैं।

इस प्रकार, छात्र जीवन और राजनीति एक दूसरे के पूरक होते हैं, और इन दोनों के सही रूप से संयोजन से ही सक्षम, संवेदनशील और सचेत नागरिक का निर्माण होता है।

31. साम्प्रदायिकता : एकता के लिए खतरा ​

[2021A]

समाज विभिन्न समूहों में होते हैं, जो एक अनोखी विविधता का प्रतीक हैं। ये समूह अपने-अपने विशेषताओं को सम्मानित करते हैं। सभी देशों में विभिन्न आबादी के समूह मौजूद होते हैं, जिसमें प्रमुखता और अल्पता दोनों प्रकार के समूह शामिल होते हैं। ये समूह अपनी पहचान और संस्कृति को मानते हैं। विविधता हमारे समाज और देश की समृद्धि का कारण बनती है। सामूहिक सौहार्द, सह-अस्तित्व और सह-योगी भावना महत्वपूर्ण हैं। समाजवाद से समाज और देश की समृद्धि और विकास में मदद मिलती है। विविधता से हमें नए आयाम और संभावनाएँ मिलती हैं।

सभी समूहों को समाज की प्रगति में सक्रिय भाग लेने के लिए प्रेरित करना चाहिए। आपसी सहयोग से, समाज और देश की समग्र विकास होती है। समाजवाद से समाजी स्थिरता और समन्वय बढ़ता है। सभी समूहों को अपने सहयोगी भाव को बढ़ावा देना चाहिए।

विविधता और एकता दोनों ही हमारे देश की शक्ति हैं। सभी धर्मों और समूहों के बीच सम्मान और सहयोग का भावना हमेशा बना रहना चाहिए। भारत में विभिन्न समूह एक-दूसरे की भिन्नताओं का सम्मान करते हैं और एक-दूसरे से सीखते हैं। ऐसा होने से ही सह-अस्तित्व की भावना कायम रहती है।

निष्कर्षतः राष्ट्रीय एकता के लिए सभी समूहों को एकता में विविधता का अद्वितीय आदान-प्रदान करना चाहिए। विविधता और समाजवाद एकता के लिए आवश्यक हैं। हर परिस्थिति में सामूहिक सौहार्द कायम रहना चाहिए। सभी समूह जब मिलकर काम करेंगे तो राष्ट्र मजबूत एवं सम्पन्न बनेगा।

32. स्वच्छता अभियान ​

[2018A,2021A]

स्वच्छता सफाई का दूसरा नाम है। भारतीय संस्कृति में स्वच्छता, पवित्रता, दिव्यता, शुचिता समायी हुई है। बिना स्वच्छता के आध्यात्मिक शुद्धि नहीं हो पाती है। बिना स्वच्छता के राष्ट्र भी दिव्य एवं उन्नतिशील नहीं बन पाता है। स्वच्छ शहरों से स्वच्छ राष्ट्र का निर्माण होता है। शहर स्मार्ट सिटी में रूपान्तरित-परिवर्तित हो जाते हैं। वैदिक काल से आज तक स्वच्छता पर भारतीय संस्कृति का बल रहता है। भारत में श्रीसम्पन्नता, विजय और विकास स्वच्छता के दरवाजे से ही प्रवेश करेंगे।

भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 2 अक्टूबर, 2014 से भारत स्वच्छता अभियान की शुरुआत की। यह अभियान लगातार चलेगा। गाँधीजी का सपना तभी साकार हो पाएगा। गाँवों में शौचालय की सुविधा मुहैय्या करायी जा रही है। शहरों में कचरे के उठाव पर भी ध्यान दिया जा रहा है। सड़कों पर भी नियमित रूप से झाड़ लग रहे हैं। यह अभियान जोर पकड़ चुका है। सभी नागरिकों को भी अपने शहर र्का साफ रखने की कोशिश करनी चाहिए। लोग इस अभियान से अवगत हो चुके हैं।

स्वच्छता का पालन करने से भारत स्वस्थ एवं समृद्ध बन सकता है। हम सभी को यह समझना चाहिए कि स्वच्छता हमारे व्यक्तिगत और सामुदायिक जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

33. आत्मनिर्भर भारत ​

[2022A]

आत्मनिर्भरता मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण तत्व है। यह आत्मसम्मान और स्वतंत्रता की भावना पैदा करती है। आत्मनिर्भर व्यक्ति और देश, दूसरों पर कम निर्भर होते हैं और अपने स्वयं के संसाधनों और क्षमताओं पर आधारित होते हैं।

आत्मनिर्भर भारत की तरफ कदम बढ़ाते हुए भारत ने कोरोना महामारी काल में निरोधक टीके को पूरे विश्व में वितरित किया। भारत भी टीका लगाने में आत्मनिर्भर बना। रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण विश्व में आर्थिक मंदी आयी। भारत इससे बचा रहा। भारत ने विश्व के बहुतेरे देशों को गेहूँ निर्यात किया। मोबाइल निर्माता देश बनने का भी गौरव भारत को मिला। खिलौना निर्माण में भी हम अब आत्मनिर्भर बन गए हैं, इसके अलावा अन्य क्षेत्रों में भी आत्मनिर्भर भारत के कई उदाहरण मिलते हैं।

आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए हमें विदेशी निर्यात बढ़ाना होगा और आयात

घटाना होगा। हमें सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को बढ़ावा देने में आयी बाधाओं

को दूर करना होगा। उत्पादकों को सस्ते दर पर ऋण उपलब्ध कराना होगा। हमें वकों को रोजगार मांगनेवाला न बनाकर रोजगार देनेवाला युवा शक्ति बनाना होगा। भारत आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था काफी मजबूत हो रही है। आत्मनिर्भरता न केवल देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा नही है, बल्कि राष्ट्र की वैश्विक पहचान को भी मजबूत कर रही है।

34. स्वतंत्रता दिवस ​

[2022A]

भारत 15 अगस्त, 1947 को आजाद हुआ। यह दिन भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। पहली बार भारतीय लोगों ने स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश में अपने आस्थाओं और आकांक्षाओं को स्वतंत्रता के साथ व्यक्त करने का अवसर पाया। इस दिन से, भारतीय लोग अपने आत्मनिर्भरता की भावना को उचाईयों पर ले गए हैं।

पिछले लगभग दौ सौ वर्षों तक, भारत पर अंग्रेजों का शासन था। इस आजादी को प्राप्त करने के लिए, अनेक भारतीयों ने अपनी क्षमता का पूरा उपयोग करते हुए संघर्ष किया। इनमें महात्मा गाँधी, सुभाष चन्द्र बोस, महर्षि अरविंद घोष और भगत सिंह जैसे नेताओं का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था।

स्वतंत्रता प्राप्ति की इस संघर्षमयी यात्रा के बाद, आज हमें गर्व है कि हम एक स्वतंत्र देश के नागरिक हैं। हर वर्ष, भारत में इस दिन को विशेष तरीके से मनाया जाता है। देश के प्रधानमंत्री लाल किले पर तिरंगा झंडा फहराते हैं। सभी शैक्षिक संस्थानों और सरकारी-गैर-सरकारी कार्यालयों में झंडा फहराने की परंपरा का पालन किया जाता है। इस दिन की गतिविधियों का सीधा प्रसारण रेडियो और दूरदर्शन पर किया जाता है।

स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान, कई नारे जनता के बीच प्रचलित हुए जैसे "स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है" और "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।"

निष्कर्षतः वर्षों की साधना के बाद प्राप्त स्वतंत्रता हमारी महान सम्पदा है। इसीलिए हम उत्साह और आनंद के साथ इसे मनाते हैं।

35. स्वास्थ्य ही धन है ​

[2022A]

"स्वास्थ्य ही धन है" - यह कहावत स्वास्थ्य के महत्व को स्पष्ट करती है। अच्छा स्वास्थ्य हमें जीवन की सभी चुनौतियों का सामना करने की क्षमता देता है। यह बात सच है कि अस्वस्थ व्यक्ति कठिनाइयों का सामना करने में संकट में पड़ सकता है, चाहे वह व्यक्तिगत, पारिवारिक या सामाजिक स्तर की हो।

आज के युग में, योगासनों का महत्व बढ़ता जा रहा है। विभिन्न योगासन जैसे कि धनुरासन, हलासन, सर्वागसन, प‌द्मासन आदि, मानसिक शक्ति को बढ़ाने के साथ-साथ शरीर को भी मजबूत बनाने में मदद करते हैं।

स्वास्थ्य सिर्फ शरीर में बीमारी का अभाव नहीं है, बल्यि यह शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्तर पर संतुलित होना भी है। स्वस्थ जीवन व्यतीत करने का अर्थ है कि हमारा शरीर और दिमाग दोनों सक्षम हों, और हमारे शारीरिक प्रणाली में गुणवत्ता हो। यह अवस्था ऐसी होती है जिसमें व्यक्ति मानसिक और शारीरिक तौर पर स्वस्थ हो, और उसकी शारीरिक स्थिति और बाहरी वातावरण के साथ अच्छा संबंध हो।

इसलिए, यह महत्वपूर्ण है कि हम अपने स्वास्थ्य को निरंतर रखें और उसका ध्यान रखें। आरोग्य ही हमारी असली सम्पत्ति है, जो हमें विभिन्न कठिनाइयों को सामना करने में सहायता करती है।

36. मेरी प्रिय पुस्तक ​

[2024A,2022A]

मेरा मानना है कि 'रामचरितमानस' एक अनुपम ग्रंथ है जिसने जीवन की सच्चाई और मानवीयता को अद्वितीय रूप से व्यक्त किया है। इसलिए, यह मेरी प्रिय पुस्तक है। इसे गोस्वामी जी ने हिंदी भाषा में लिखी है। यह ग्रंथ श्री राम और उनके परम भक्त हनुमान जी के विषय में लिखा गया है। रामचरितमानस का प्रमुख उद्देश्य भगवान राम की कथा को प्रस्तुत करना है, जिसके माध्यम से प्रेम, धर्म और आध्यात्मिकता के कर्म को समझाया जाता है।

रामचरितमानस का मुख्य पात्र भगवान श्री राम है, जो मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में जाना जाता है। इस ग्रंथ में उनके जीवन की घटनाओं का वर्णन किया गया है, जैसे उनका जन्म, बाल लीला, विवाह, वनवास, लंका यात्रा और राज्याभिषेक। रामायण की प्रसिद्ध कथा को रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने सुंदर रूप में प्रस्तुत किया है।

इस पुस्तक में भगवान राम के प्रेमी भक्त हनुमान जी का भी महत्व है। हनुमान जी अनंत भक्ति और भगवान राम के प्रति अनुराग को रामचरितमानस में प्रकट किया गया है। उनकी शक्ति, बुद्धि, विश्वास और प्रेम की कथा भी यहां प्रस्तुत है। हनुमान जी को रामचरितमानस का सबसे प्रमुख पात्र माना जाता है।

रामचरितमानस के मुख्य संदर्भ हिंदू संस्कृति, परंपरा और धर्म के प्रति प्रेम और श्रद्धा को दर्शाता है। इस ग्रंथ में प्रकृति, मोक्ष, पुनर्जन्म, करुणा, न्याय, धर्म और आध्यात्मिकता जैसे मूल्य विषयों पर भी विचार किया गया है। रामचरितमानस में प्रेम और भक्ति का महत्व बहुत उच्च है और यह एक आदर्शिक जीवन का मार्गदर्शन देता है।

रामचरितमानस की भाषा साधारण लोगों तक भी पहुंचने के कारण प्रसिद्ध है। इसमें संस्कृत, अवधि और ब्रज भाषा का मिश्रण है। तुलसीदास जी ने इस ग्रंथ को सरल भाषा में लिखा है, जिससे सभी लोगों को आसानी से समझाया जा सकता है।

37. बाढ़ की विभीषिका या बाढ़ ​

[2025A,2017A,2022A]

बाढ़ एक वह प्राकृतिक आपदा है जिसमें एक बड़े भू-भाग में चारों ओर पानी इकट्ठा हो जाता है। बाढ़ आने के विभिन्न कारण हो सकते हैं- अत्यधिक वर्षा होना, डैम या बाँध का टूट जाना या सुनामी का आना इत्यादि।

बाढ़ के कारण अपार जन-धन, पशु-धन की हानि होती है जिससे हजारों लोगों की जान चली जाती है। सभी प्रकार की फसलें नष्ट हो जाती हैं। वनस्पतियाँ डूब जाती हैं। पानी निकल जाने के बाद अनेक प्रकार की बीमारियाँ फैल जाती हैं।

बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है। बाँधों से एकाएक पानी छोड़े जाने के कारण भी एक बड़े भू-भाग में बाढ़ का पानी फैल जाता है। पर्वतीय क्षेत्रों में अनियंत्रित गतिविधियाँ भी भूस्खलन एवं बाढ़ ला देती हैं। अनियंत्रित वर्षा भी बाढ़ का कारण बन जाती है। नदियों के तलछट में बालू भर जाने के कारण नदियों का पानी बाढ़ का कारण बन जाता है।

बाढ़ से नुकसान-ही-नुकसान होता है। दिन में आयी बाढ़ से कुछ बचाएव हो सकता है लेकिन रात में आयी बाढ़ से नुकसान ज्यादा होता है। घरों का विनाश हो जाता है। आर्थिक नुकसान ज्यादा होता है। भयानक बीमारियों की बाढ़ जननी है।

बचाव हेतु हमें बाढ़ आने से पहले जरूरत का सामान एकत्रित कर लेना होता है। बाढ़ के प्रभावों को कम करने के लिए, हमें उचित तैयारी और बाढ़ की पूर्व सूचना की आवश्यकता होती है।

बाढ़ के समय दशा अत्यंत रोमांचकारी होती है। चारों ओर हृदय विदारक 'बचाओ-बचाओ' की ध्वनियाँ सुनाई देती हैं। खेती के लिए न पशु होते हैं और न भूमि। बाढ़ के बाद भूमि इस योग्य नहीं रहती कि उसमें अगली फसल पैदा की जा सके।

आखिर में, हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि बाढ़ों का जोखिम हमेशा रहता है और इसके विपरीत प्रभावों को सीमित करने के लिए हमें समयानुसार उपाय करने और तैयार रहने की आवश्यकता होती है। नियंत्रण और उत्तरदायित्वपूर्ण निर्णय लेने से हम प्रकृति के चुनौतियों का सामना कर सकते हैं।

38. पर्यावरण ​

[2015A,2016A, 2021A,2022A]

हमारे चारों तरफ का वह प्राकृतिक आवरण जो हमें सरलतापूर्वक जीवन यापन करने में सहायक होता है, पर्यावरण कहलाता है। पर्यावरण से हमें वे हर संसाधन उपलब्ध हो जाते हैं जो किसी सजीव प्राणी को जीने के लिए आवश्यक हैं। पर्यावरण ने हमें वायु, जल, खाद्य पदार्थ, अनुकूल वातावरण इत्यादि उपहार स्वरूप भेंट दिया है। हम सभी ने हमेशा से पर्यावरण के संसाधनों का भरपूर इस्तेमाल किया है और आज हमारे इतना विकास कर पाने के पीछे भी पर्यावरण का एक प्रमुख योगदान रहा है।

पर्यावरण के प्रमुख घटक हैं- वायुमंडल, जलमंडल तथा स्थल मंडल। वायु को हमें प्रदूषित होने से बचाना होगा। जल को शुद्ध रखकर प्रयोग में लाना होगा। स्थल को स्वच्छ रखना होगा। पर्यावरण के प्रति जागरूकता के लिए विश्व पर्यावरण दिवस हम 05 जून को हर वर्ष मनाते हैं और पर्यावरण को शुद्ध रखने की शपथ लेते हैं।

हमें यह समझना होगा कि मनुष्य और पर्यावरण एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। वैज्ञानिक प्रगति का उपयोग कर हमें प्रदुषण को कम करना होगा। वृक्षारोपण तथा संसाधनों का विवेकपूर्ण प्रयोग द्वारा हम पर्यावरण को स्वच्छ बना सकते हैं।

हवा, पानी, प्रकाश, भूमि, पेड़, जंगल और अन्य प्राकृतिक तत्त्व पर्यावरण के अन्तर्गत ही आते हैं। इनकी शुद्धि हमारे जीवन की रक्षा के लिए आवश्यक है। निष्कर्षतः पर्यावरण पर हमें स्थानीय एवं वैश्विक दोनों स्तर पर अनुकूल और अपेक्षित कदम उठाने होंगे।

39. हमारे प्रिय खेल ​

[2015A,2016A,2023A]

मेरा मनपसन्द खेल फुटबॉल है। फुटबाल जोर और ताकत से खेले जाने वाला खेल है।

फुटबॉल के खेल में खिलाड़ी खेल-खेल में ही जीवन के संघर्षों और उतार-चढ़ाव से भली-भाँति परिचित हो जाता है। खेल के आरम्भ से अन्त तक उसका मन आशा और निराशा के डोले पर झूलता रहता है। कभी विजय उसे सामने दिख पड़ती है, तो कभी आती हुई विजय झट आँखों से ओझल हो जाती है। पर, वह कभी निराश नहीं होता। निष्काम कर्मयोगी के समान अपने खेल में ही जुटा रहता है। स्पष्ट है कि ऐसा व्यक्ति जीवन के संघर्षों और उतार-चढ़ाव से भयभीत न होकर डटकर उनका सामना करेगा।

फुटबॉल खेल से सहयोग और दलीय अनुशासन की भावना प्रत्येक खिलाड़ी में स्वतः आ जाती है। इसके बिना खेल का चल सकना ही सम्भव नहीं है। खेल के मैदान में खिलाड़ी अपनी स्वतंत्र सत्ता को भूल जाता है। उसके सामने दल के सम्मान की रक्षा मुख्य ध्येय बन जाता है। खेल में किसी एक खिलाड़ी की जीत या हार नहीं होती, जीत या हार पूरी टीम की होती है। अपनी टीम से अलग खिलाड़ी का कोई अस्तित्व नहीं। सहयोग और अनुशासन की यह भावना 'क्लास रूम' से नहीं पैदा की जा सकती है।

फुटबॉल खेल के द्वारा विद्यार्थियों के जीवन में ऐसी भावना पनपायी जा सकती है जिसे अंग्रेजी में 'स्पोर्टसमेन्स स्पीरिट' कहते हैं। खेल के प्रारम्भ से अन्त तक खिलाड़ी - पूरी तन्मयता के साथ खेलता है। वहाँ की जय-पराजय को जीवन की जय-पराजय से भी अधिक सत्य मानकर अपनी टीम को विजय श्री दिलाने में वह अपनी पूरी शक्ति लगा देता है। क्षणभर के लिए वह ऐसा नहीं समझता कि वह खेल-खेल रहा है। पर, खेल खत्म होते ही वह अपनी जय-पराजय को भूलाकर अपने विरोधी-दल के सदस्यों से घनिष्ठ मित्रों की भाँति दिल खोलकर मिलता है। जीवन भी एक खेल का मैदान है। यहाँ भी सफलता पाने के लिए ऐसा ही 'स्पीरिट' की आवश्यकता है।

40. समय का महत्त्व ​

[2012A,2023A]

समय के महत्त्व को रेखांकित करते हुए किसी कवि ने ठीक ही लिखा है –

'कालि करै सो आज कर, आज करै सो अब।
पल में परलै होएगी, बहुरी करोगे कब ।।'

अर्थात् हमें शीघ्रता से समय रहते अपना काम पूरा कर लेना है अन्यथा हम मुँह ताकते ही रह जाएँगे। अँग्रेजी की एक प्रसिद्ध कहावत है, 'टाइम इस मनी' और वास्तविकता भी यही है कि समय धन से भी अधिक मूल्यवान है। परिश्रम द्वारा कमाया हुआ धन यदि नष्ट हो जाए तो उसे पुनः अर्जित किया जा सकता है, लेकिन एक बार बीता हुआ समय फिर दुबारा लौट कर नहीं आता। समय तो ईश्वर का अनुपम वरदान है, जिसे न बढ़ाया जा सकता है और न घटाया जा सकता है। मानव के जीवन का प्रत्येक क्षण अमूल्य है। यदि एक क्षण का भी दुरुपयोग होता है तो मानव सभ्यता का विकास-चक्र रुक जाता है। एक पल की शिथिलता जीवन भर का पश्चाताप बन जाती है।

समय का चूका हुआ व्यक्ति और डाल से चूका हुआ बंदर पुनः अपने अतीत को नहीं पा सकता और समय बीत जाने के बाद मनुष्य लाख कोशिश करे लेकिन; "अब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत ।"

सिसरो ने समय को 'सत्य का पथ प्रदर्शक' माना है। समय एक संपत्ति है। समय पर किया गया थोड़ा-सा कार्य मनुष्य को अनेक कठिनाइयों से बचा लेता है। मैसन का विचार है कि- स्वर्ण का प्रत्येक अंश जिस तरह मूल्यवान होता है, उसी प्रकार समय का प्रत्येक अंश मूल्यवान होता है। समय का सदुपयोग करना समय को बचाना है। जो समय को बचाता है, उसका सम्मान करता है, समय भी उस व्यक्ति को बचाता है, सम्मान देता है।

41. आपका प्रिय लेखक/मेरा प्रिय रचनाकार ​

[2025A,2024A,2023A,2017A]

मेरे प्रिय लेखक प्रेमचंद हैं। प्रेमचंद हिन्दी कथा-सहित्य के सम्राट माने जाते हैं। भारत के इस कथा-सम्राट का जन्म 31 जुलाई, 1880 ई० में तथा निधन 8 अक्टूबर, 1936 ई० में हुआ। उनके पिता का नाम मुंशी अजायब लाल था। बचपन में उनकी शिक्षा फारसी में हुई, फिर आठ साल बाद अंग्रेजी की शिक्षा मिलने लगी। बनारस के कॉलेजिएट स्कूल से इंट्रेंस पास किया। दुर्भाग्यवश उसी समय उनके पिता का निधन हो गया। पिता के निधन से परिवार की पूरी जिम्मेदारी प्रेमचंद पर ही आयी। इसी बीच उन्होंने जीवन को नजदीक से देखा-परखा और कुछ यथार्थ का सामना किया। उन्हीं अनुभवों ने उन्हें कहानियाँ लिखने की ओर प्रेरित किया। पहले उन्होंने उर्दू में कहानियाँ लिखी, बाद में फिर हिन्दी में आये। कहानियों के बाद उपन्यास-साहित्य की रचना करने लगे जिसमें जीवन की संपूर्ण गाथा को अंकित करने का प्रयास किया।

प्रेमचंद का साहित्य समकालीन संदर्भों की कसौटी पर खरा उतरता है। इसका कारण बहुत सीधा-सा है। प्रेमचंद ने जिस भारत का अपनी रचनाओं में चित्रण किया है, वह कमोबेश अब भी वही है। कफन, पूस की रात, ठाकुर का कुआँ, सवा सेर गेहूँ आदि कहानियों में गरीबी में पिसते जिन लाखों गरीबों का सशक्त चित्रण किया गया है, वे अभी भी बिल्कुल वैसे ही हैं। गाँवों में जमींदार, साहू, पटवारी तथा गाँव की दुर्व्यवस्था के जिम्मेदार दूसरे छोटे अफसरों द्वारा क्रूर शोषण वाली व्यवस्था अभी भी मूलतः वही है जिसका प्रेमचंद ने अपनी दर्जनों कहानियों और 'गोदान' तथा प्रारंभिक उपन्यास 'प्रेमाश्रम' में विविधतापूर्वक चित्रण किया है। गाँधीजी के हृदय-परिवर्तन के सिद्धांत को अपनाने से हालाँकि उनकी रचनाओं में आदर्श का रंग गहरा हो गया है, पर वे सभी स्थितियाँ अब भी लगभग वैसी ही हैं। छोटे किसान को कंगाल बना दिया जाना, अपनी जमीन छोड़कर उसका मेहनत-मजदूरी करने बाहर जाना, वह चाहे कारखाने में मजदूर हो या घरेलू नौकर, उसका मन इस कदर पीछे ही भटकता रह जाता है कि मरने के बाद उसकी रूह जमीन के उस छोटे-से टुकड़े पर ही मँडराती रहती है, जो कभी उसकी थी और जिसे वह अपने पास रख नहीं सका। उनके अन्य उपन्यास हैं-निर्मला, सेवासदन, रंगभूमि, कर्मभूमि आदि। प्रेमचंद ने लगभग 350 कहानियों की रचना की है, जिनमें सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक शोषण के चित्रण की स्पष्ट झलक मिलती है।

इसीलिए प्रेमचंद आज भी प्रासंगिक हैं और जबतक कथा-साहित्य है, तब तक प्रासंगिक ही बने रहेंगे। उनकी रचनाओं में एक अद्भुत चुम्बकीय तत्त्व है जो सहज ही पाठकों को अपनी ओर आकर्षित किये बिना नहीं रहता। यही कारण है कि प्रेमचंद मेरे प्रिय रचनाकार हैं।

42. हमारे त्योहार ​

[2023A]

हमारे जीवन में त्योहार प्रसन्नता की भावना का संचार करते हैं। भारत विविधताओं से भरा देश है। विभिन्नताएँ अलग-अलग किस्म की हैं, दुर्लभ हैं और अद्भूत हैं। त्योहार आनन्द और उल्लास की छटा बिखेर देते हैं। कुछ त्योहार ऋतु और मौसम के अनुसार मनाए जाते हैं, तो कुछ सांस्कृतिक या किसी घटना विशेष से संबंधित होकर सम्पन्न होते हैं।

पर्व-त्योहारों का जाल हमारे देश में बिछा हुआ है। प्रत्येक दिन कोई-न-कोई त्योहोर आ ही जाता है। ये त्योहार एक ही वर्ग, जाति, सम्प्रदाय से ही संबंधित नहीं होते हैं, अपितु विभिन्न वर्गों, जातियों और सम्प्रदायों के द्वारा सम्पन्न और आयोजित होते रहते हैं। इन सभी प्रकार के त्योहारों का कुछ-न-कुछ विशिष्ट अर्थ

होता है। त्योहारों के महत्त्व में मानव की प्रकृति और दशा किसी-न-किसी रूप में अवश्य झलकती है।

हमारे पर्व त्योहारों का महत्त्व समाज और राष्ट्र की एकता, समृद्धि, प्रेम, मेल-मिलाप की दृष्टि से है। साम्प्रदायिकता एकता, धार्मिक समन्वय, सामाजिक समानता को हमारे भारतीय त्योहार समय-समय पर घटित होकर हमारे अंदर उत्पन्न करते रहते हैं। जातीय भेद-भावना और संकीर्णता के धुंध को अपने अपार उल्लास और आनंद के द्वारा छिन्न-भिन्न कर देते हैं। इन पर्वों में पवित्रता और सात्त्विकता की भावना उपलाती-अकुलाती रहती है।

हमारे प्रमुख त्योहार हैं- रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, दशहरा, दीपावली, होली, ईद, मुहर्रम, बकरीद, क्रिसमस, ओणम्, वैशाखी, रथ-यात्रा, 15 अगस्त, 26 जनवरी, 2 अक्टूबर, गुरु नानक जयंती, रविदास जयंती, आम्बेदकर जयंती, महावीर जयंती, बुद्ध पूर्णिमा तथा रामनवमी इत्यादि।

निष्कर्षतः हमारे पावन पर्व-त्योहारों का महत्त्व धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत अधिक है।

43. मोबाइल : आधुनिक यंत्र मानव ​

[2023A]

मोबाइल एक ऐसा यंत्र है जिससे एक जगह पर बैठे-बैठे दुनिया के किसी कोने में हम बातचीत आसानी से कर सकते हैं। संसार का सारा ज्ञान इस डिबिया में बंद है और जब चाहें और जब आवश्यकता हो हम उस ज्ञान को डिबिया के मार्फत मंगा कर अपनी ज्ञान पिपासा शांत कर सकते हैं। मोबाइल के मार्फत् हम व्यवसाय भी पूरे संसार में बातकर फैला सकते हैं। मोबाइल हमारा मनोरंजन करता है। मोबाइल खेल-कूद भी दिखलाता है। मोबाइल हमारी शिक्षा असान कर देता है। इसकी सहायत से हम जोड़-घटाव भी कर सकते हैं। संदेश पहुँचाना आसान हो गया है। इसकी सहायता से हम फोटो खींच सकते हैं और विडियो बना सकते हैं। यह कैलकुलेटर का भी काम करता है। इसे इंटरनेट से भी जोड़ सकते हैं। भटकने पर यह हमें रास्ता भी दिखलाता है। मोबाइल की सहायता से हम रुपए भेज और मँगवा सकते हैं। संगीत और गेम का भी आनंद उठा सकते हैं।

प्रश्न का दूसरा खंड पूछता है कि मोबाइल आधुनिक यंत्र-मानव कैसे हैं? यह एक ऐसा यंत्र है जो मानव के दिमाग की तरह काम कर सकता है। यह यंत्र मानववत् है। यह लगभग सभी कार्य करता है जो मनुष्य अपने दिमाग से कर सकता है। कुछ मायने में यह मनुष्य मस्तिक में भी बढ़कर है। यह ऐसा यंत्र है जो संसार भर की पुस्तकें हमारे सामने एक ही जगह पर बैठे-बैठे पहुँचा देता है। यह बातचीत के जरिए व्यवसाय भी सम्पन्न करने में मदद कर सकता है। मोबाइल एक यंत्र मानव कहा जा सकता है। मोबाइल मानव द्वारा बनाया गया यंत्र है। इस यंत्र या यंत्र मानव ने हमारी दुनिया और दुनिया में हमारी गतिविधियों को विस्तृत. कर दिया है। आधुनिक तो है ही।

मोबाइल आधुनिक यंत्र-मानव से कुछ हानियाँ भी है। इससे दुर्घटनाएँ भी घट रही है। रेडिएशन से हमारी शारीरिक नुकसान भी हो रहा है। हमारे नेत्र कमजोर हो रहे हैं। कान बहरे हो रहे हैं। एकाग्र केंद्रण समाप्ति की ओर बढ़ सकता है। इसकी लत पड़ जाती है। समय हमारा बर्बाद होने लगता है।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मोबाइल का हमलोग सदुपयोग करें और मोबाइल का इस्तेमाल कम-से-कम करें।

44. गंगा नदी ​

[2023A]

"हिन्दू धर्म के अनुसार गंगा नदी भारत की सबसे पवित्र नदी है। इसका प्रमाण हमारे वेदों एवं पुराणों में मिलता है। हमारे धर्मग्रंथों में इसकी पवित्रता का वर्णन किया गया है। इसकी कुल लंबाई 2525 किलोमीटर है तथा अधिकतम गहराई 31 मीटर है। यह भारत की सबसे लंबी नदी है। प्राचीन काल से इस नदी से लोगों की आस्था जुड़ी है।

हिमालय से निकलकर यह नदी पहले उत्तराखण्ड के हरिद्वार जिले में प्रवेश करती है। हरिद्वार में बारह साल पर कुंभ मेला लगता है। उस समय इस नदी में नहाने से लोगों के सारे पाप धुल जाते हैं। हमेशा यहाँ पर भजन-कीर्तन होता रहता है। इस नदी में साल के बारह महीने निरन्तर पानी का प्रवाह बना रहता है। गंगा नदी हिमालय से निकलकर भारत के कई राज्यों तथा बंग्लादेश से होकर बंगाल की खाड़ी में गिर जाती है। पश्चिम बंगाल में यह बहुत बड़ा डेल्टा बनाती है। जिसका नाम सुंदरवन डेल्टा है, जो भारत का सबसे बड़ा डेल्टा है। गंगा नदी में मछली, मगरमच्छ तथा सर्पों की कई प्रजातियाँ पायी जाती है, जिसमें बहुत ही दुर्लभ मीठे पानीवाली डाल्फिन पायी जाती है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि इस नदी में बैक्रियोफेज नामक विषाणु पाए जाते हैं। जो अन्य खतरनाक वायरस एवं जीवों को जिन्दा नहीं रहने देते। इसीलिए माना जाता है कि इस नदी का पानी खराब नहीं होता है। सरकार ने कई प्रकार का अभियान चलाया है ताकि यह प्रदूषित न हो। इस नदी पर अनेक प्रकार की परियोजना बनाई गई है जो जन-जन की जरूरतों जैसे सिंचाई, बिजली के माध्यम से पूरा करती है।"

बिहार में गंगा का पानी राजगीर तक लाया गया है। वाराणसी से डिब्रूगढ़ तक एक जलयान चलाया गया है जिससे घूमने के लिए 21 लाख प्रति व्यक्ति शुल्क लिया जाता है।

45. मोबाइल और इंटरनेट ​

[2024A]

मोबाइल एक ऐसा यंत्र है जिससे एक जगह पर बैठे-बैठे दुनिया के किसी कोने में हम बातचीत आसानी से कर सकते हैं। संसार का सारा ज्ञान इस डिबिया में बंद है और जब चाहें और जब आवश्यकता हो हम उस ज्ञान को डिबिया के मार्फत मंगा कर अपनी ज्ञान पिपासा शांत कर सकते हैं। मोबाइल के मार्फत् हम व्यवसाय भी पूरे संसार में बातकर फैला सकते हैं। मोबाइल हमारा मनोरंजन करता है। मोबाइल खेल-कूद भी दिखलाता है। मोबाइल हमारी शिक्षा असान कर देता है। इसकी सहायता से हम जोड-घटाव भी कर सकते हैं। संदेश पहुँचाना आसान हो गया है। इसकी सहायता से हम फोटो खींच सकते हैं और विडियों बना सकते हैं। यह कैलकुलेटर का भी काम करता है। इसे इंटरनेट से भी जोड़ सकते हैं। भटकने पर यह हमें रास्ता भी दिखलाता है। मोबाइल की सहायता से हम रुपए भेज और मँगवा सकते हैं। संगीत और गेम का भी आनंद उठा सकते हैं।

यह एक ऐसा यंत्र है जो मानव के दिमाग की तरह काम कर सकता है। यह यंत्र मानववत् है। यह लगभग सभी कार्य करता है जो मनुष्य अपने दिमाग से कर सकता है। कुछ मायने में यह मनुष्य मस्तिष्क से भी बढ़कर है। यह ऐसा यंत्र है जो संसार भर की पुस्तकें हमारे सामने एक ही जगह पर बैठे-बैठे पहुँचा देता है। यह बातचीत के जरिए व्यवसाय भी सम्पन्न करने में मदद कर सकता है। मोबाइल एक यंत्र मानव कहा जा सकता है। मोबाइल मानव द्वारा बनाया गया यंत्र है। इस यंत्र या यंत्र मानव ने हमारी दुनिया और दुनिया में हमारी गतिविधियों को विस्तृत कर दिया है। आधुनिक तो है ही। इस तरह कह सकते हैं कि मोबाइल और इंटरनेट का अन्योन्याश्रित संबंध है।

46. बढ़ती जनसंख्या ​

[2025A]

भारत में जनसंख्या वृद्धि एक गंभीर समस्या बन चुकी है। आजादी के समय देश की जनसंख्या लगभग 33 करोड़ थी, जो अब बढ़कर 140 करोड़ से अधिक हो चुकी है। यह तेजी से बढ़ती जनसंख्या देश के सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय संतुलन को प्रभावित कर रही है।

जनसंख्या बढ़ने के साथ-साथ रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति करना कठिन होता जा रहा है। शहरों में भीड़भाड़, झुग्गी-झोपड़ियों की बढ़ती संख्या, बेरोजगारी और कुपोषण जैसे अनेक संकट सामने आ रहे हैं। सरकारी योजनाओं और संसाधनों पर अत्यधिक दबाव पड़ रहा है। शिक्षा संस्थानों और अस्पतालों में भी पर्याप्त सुविधाएँ नहीं मिल पा रहीं।

हालाँकि, जनसंख्या को यदि सही रूप में विकसित किया जाए तो यह मानव संसाधन के रूप में देश की शक्ति बन सकती है। श्रमिक, सैनिक, शिक्षक, वैज्ञानिक और अन्य क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों की भरपूर उपलब्धता देश के विकास में सहायक हो सकती है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि सभी नागरिकों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर मिले।

यदि जनसंख्या पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो यह देश की प्रगति में बाधक बन सकती है। इसलिए जनसंख्या नियंत्रण के उपायों को बढ़ावा देना आवश्यक है। परिवार नियोजन, महिला शिक्षा, स्वास्थ्य जागरूकता और सरकारी योजनाओं को जन-जन तक पहुँचाना जरूरी है।

निष्कर्षतः, एक नियंत्रित और शिक्षित जनसंख्या ही राष्ट्र की सच्ची संपत्ति होती है।

47. पानी की बचत ​

[2025A]

पानी पृथ्वी पर जीवन के लिए सबसे आवश्यक संसाधनों में से एक है। चाहे मनुष्य हो, पशु-पक्षी हों या पेड़-पौधे - सभी के जीवन के लिए जल अनिवार्य है। पृथ्वी पर लगभग 71% भाग जल से ढका है, परंतु उसमें से केवल 2% जल ही पीने योग्य है, और यह भी धीरे-धीरे कम होता जा रहा है।

आज जल संकट एक गंभीर समस्या बन चुका है। बढ़ती जनसंख्या, शहरीकरण और जल का अंधाधुंध उपयोग जल स्तर को दिन-प्रतिदिन नीचे गिरा रहा है। आज जिन इलाकों में आसानी से पानी उपलब्ध है, वहाँ भी आने वाले वर्षों में पानी की 'भारी किल्लत हो सकती है। इस स्थिति को रोकने के लिए पानी की बचत आवश्यक हो गई है।

जल की एक-एक बूँद की कद्र करनी चाहिए। हमें नलों को खुला नहीं छोड़ना चाहिए, टपकते नलों की मरम्मत करानी चाहिए और वर्षा जल संचयन जैसे उपाय अपनाने चाहिए। पानी को सोच-समझकर और जरूरत के अनुसार ही उपयोग करना चाहिए।

पानी का संरक्षण केवल वर्तमान की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की भी जिम्मेदारी है। अगर हमने अभी कदम नहीं उठाए, तो भविष्य में स्थिति और भी भयावह हो सकती है, जहाँ पानी के लिए संघर्ष आम बात बन जाएगी।

निष्कर्षतः, "जल है तो जीवन है" केवल एक नारा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य की कुंजी है।

48. विद्यार्थी जीवन ​

[2025A]

विद्यार्थी जीवन मनुष्य के जीवन का सबसे अहम और आधारभूत चरण होता है। यह वह समय है जब व्यक्ति अपने भविष्य की नींव रखता है। इस अवस्था में जो विद्यार्थी अनुशासन, मेहनत और ईमानदारी के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं, वही जीवन में सफलता प्राप्त करते हैं।

विद्यार्थी का मुख्य कर्तव्य है अध्ययन करना और अच्छे संस्कार अपनाना। यह केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं होता, बल्कि जीवन जीने की कला, समय का सदुपयोग नैतिकता और जिम्मेदारी का भी अभ्यास इसी अवस्था में होता है। छात्र जीवन में सीख गए मूल्य ही व्यक्ति को भविष्य में एक अच्छा नागरिक बनाते हैं।

अनुशासन विद्यार्थी जीवन की रीढ़ होता है। एक अनुशासित छात्र ही आगे चलक डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, नेता या शिक्षक बनकर समाज और देश की सेवा कर सकत है। इस अवस्था में नियमित दिनचर्या, संयमित जीवनशैली और अच्छे व्यवहार का अभ्यास करना आवश्यक होता है।

इस जीवन में परिश्रम बहुत आवश्यक होता है। कहा गया है-"विद्या ददाति विनयं" अर्थात विद्या से विनम्रता आती है। छात्र को चाहिए कि वह अपने शिक्षकों और अभिभावक का आदर करे, सच्चाई और ईमानदारी से पढ़ाई करे तथा बुरी संगत और आदतों से दूर रहे

आज के विद्यार्थी ही कल के राष्ट्र निर्माता हैं। यदि वे अपने कर्तव्यों को समझें औ आत्मविकास पर ध्यान दें, तो वे न केवल अपने जीवन को सफल बना सकते हैं, बल्कि राष्ट्र के निर्माण में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं।

निष्कर्ष – विद्यार्थी जीवन एक तपस्वी जीवन है। यह त्याग, अनुशासन और अध्यय का समय है, जो जीवन को नई दिशा देता है और उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जाता है

As of August 2026, बोर्ड परीक्षाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए सबसे ज्यादा पसंदीदा और संभावित (Most Expected) टॉपिक्स की सूची नीचे दी गई है:

  • 🔥 ज्वलंत और सामाजिक मुद्दे:
    • भारत में बेरोजगारी की समस्या और समाधान।
    • डिजिटल इंडिया / ऑनलाइन शिक्षा: वरदान या अभिशाप।
    • आत्मनिर्भर भारत और हमारा संकल्प।
  • 🌿 प्रकृति और स्वास्थ्य:
    • ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विक ताप) का खतरा।
    • स्वास्थ्य ही धन है (Health is Wealth)।
  • 🎨 राष्ट्रीय और सांस्कृतिक विषय:
    • मेरा प्रिय कवि (तुलसीदास/प्रेमचंद) या मेरा प्रिय त्योहार।
    • छात्र और अनुशासन।

🏁 निष्कर्ष (Conclusion) ​

निबंध-लेखन केवल शब्दों को भरना नहीं बल्कि अपने विचारों को तराश कर परीक्षक के सामने परोसने की एक कला है। परीक्षा में पूरे अंक अर्जित करने के लिए रटने के बजाय विषय के मुख्य बिंदुओं की एक मानसिक रूपरेखा (माइंड मैप) तैयार करें, सुंदर कोटेशन्स का प्रयोग करें और 'उपसंहार' में हमेशा एक सकारात्मक व ऊर्जावान संदेश छोड़ें।

Join the Discussion

Show Comments

No comments

No comments yet.

Post a Comment

Popular Post

हिंदी व्याकरण Ch 1 Important Questions & PYQ नोट्स

1. भाषा 📙 Book Based Questions ⚡ Competitive exam 📋 Bihar Board - Class 12 2. वर्ण-विचार 📚 Books Based Questions ⚡ Competitive exam 📋 Bihar Board - Class 10 📋 Bihar Board - Class 10 PYQ 📋 Bihar Board - Class 12 📋 Bihar Board - Class 12 PYQ Bihar Board - Class 12 Arts PYQ 3. वर्तनी ⚡ Competitive exam 4. विराम-चिह्ना 📙 Book Based Questions ⚡ Competitive exam Bihar Board - Class 12 Arts PYQ 🏁 निष्कर्ष (Conclusion) 1. भाषा ​ 📙 Book Based Questions ​ प्रश्‍न 1 : हिन्दी भाषा का प्रादुर्भाव किस भाषा से हुआ? पालि संस्कृत अपभ्रंश प्राकृत उत्तर : सही विकल्प () है। प्रश्‍न 2 : भारतीय आर्य भाषाओं को कितनी भाषाओं में विभाजित किया गया है? तीन चार पाँच दो उत्तर : सही विकल्प () है। प्रश्‍न 3 : प्राचीन भारतीय आर्य भाषा के अन्तर्गत कौन-सी भाषा आती है? वैदिक संस्कृत लौकिक संस्कृत अवहट्ठ 'a' तथा 'b' दोनों उत्तर : सही विकल्प () है। प्रश्‍न 4 : बौद्ध साहित्य की रचना किस भाषा से हुई? संस्कृत प्राकृत पालि अपभ्रंश उत्तर : सही विकल्प () है। प्रश्‍न 5 : मध्यकालीन आर्य भाषा की तीसरी ...
By Guddu Kumar
Class 11 Chemistry Chapter 1 Important Questions Hindi

Class 11 Chemistry Chapter 1 Important Questions Hindi

JEE Main, NDA, CBSE, BSEB, UP, PYQ, Sample Questions, Model Paper Question द्रव्य के गुणधर्म और उनका मापन (Properties of Matter and their Measurement) मापन में अनिश्चितता (Uncertainty in Measurement) परमाणु द्रव्यमान और आण्विक द्रव्यमान (Atomic and Molecular Masses) मोल-संकल्पना और मोलर द्रव्यमान (Mole Concept and Molar Masses) प्रतिशत संघटन (Percentage Composition) स्टॉइकियोंमीट्री और स्टॉइकियोंमीट्रिक परिकलन (Stoichiometry and Stoichiometric Calculations) 📝 निष्कर्ष (Conclusion) द्रव्य के गुणधर्म और उनका मापन (Properties of Matter and their Measurement) ​ 1995 प्रश्‍न 1 : दाब के विमा समान है- बल प्रति इकाई आयतन ऊर्जा प्रति इकाई आयतन बल ऊर्जा उत्तर : सही विकल्प () है। मापन में अनिश्चितता (Uncertainty in Measurement) ​ 1998 प्रश्‍न 2 : 161 cm, 0.161 cm तथा 0.0161 cm के लिए सार्थक संख्याएँ हैं- क्रमशः 3, 4 और 5 क्रमशः 3, 4 और 4 क्रमशः 3, 3 और 4 क्रमशः 3, 3 और 3 उत्तर : सही विकल्प () है। 2014 प्रश्‍न 3 : समान द्रव्यमान में H₂, O₂ और मिथेन को एक आयतन V के पात्र में 27°C पर समान परिस्थि...
By Guddu Kumar

AvN Learn English

AvN Learn English

No blogs found in this list.

Share