🌍 इकाई-1 (क): प्राकृतिक संसाधन : भूमि एवं मृदा संसाधन
① 🗺️ भारत में भूमि का भौतिक स्वरूप (Physical Form of Land in India)
भूमि एक मौलिक और सीमित संसाधन है, जिस पर हमारी सभी आर्थिक क्रियाएँ (कृषि, वानिकी, खनन, परिवहन) टिकी हैं। भारत भूमि संसाधन के मामले में समृद्ध है। इसके कुल भौगोलिक क्षेत्र को तीन मुख्य रूपों में बाँटा गया है:
- 🌾 मैदान (43%): कृषि एवं उद्योगों के विकास के लिए सर्वाधिक उपयोगी क्षेत्र है।
- 🏔️ पर्वत (30%): बारहमासी नदियों के प्रवाह को सुनिश्चित करता है, पर्यटन और पारिस्थितिकी संतुलन के लिए महत्वपूर्ण है।
- ⛰️ पठार (27%): यहाँ खनिज, जीवाश्म ईंधन और वन संपदा के विशाल कोष संचित हैं।
② 🌱 मृदा निर्माण : एक जीवंत-तंत्र (Soil Formation : A Living System)
- परिभाषा: पृथ्वी की सबसे ऊपरी पतली और असंगठित पदार्थों से निर्मित परत को मृदा (मिट्टी) कहते हैं। यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण नवीकरणीय प्राकृतिक संसाधन है।
- प्रक्रिया: यह अत्यंत धीमी और जटिल प्रक्रिया है। मात्र कुछ सेंटीमीटर गहरी मृदा के निर्माण में लाखों वर्ष लग जाते हैं।
- मृदा निर्माण के मुख्य कारक (Determinants): उच्चावच/धराकृति, मूल शैल/चट्टान, जलवायु, वनस्पति, जैव पदार्थ (ह्यूमस), खनिज कण और समय।
③ 🧪 भारत की मृदा के प्रमुख प्रकार एवं वितरण (Types and Distribution of Soil)
भारत के उच्चावच, जलवायु और वनस्पतियों की विविधता के कारण यहाँ 6 प्रमुख प्रकार की मृदाएँ पाई जाती हैं:
Ⓐ जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil)
- महत्व: यह भारत में विस्तृत रूप से फैली हुई सर्वाधिक उपजाऊ और महत्वपूर्ण मिट्टी है (लगभग 6.4 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र)।
- निर्माण: हिमालय की तीन मुख्य नदी प्रणालियों—सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र द्वारा लाए गए निक्षेपों से हुआ है। पूर्वी तटीय मैदान की महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी के डेल्टा भी इसी से बने हैं।
- रासायनिक गुण: इसमें पोटाश, फास्फोरस और चूना प्रचुर मात्रा में होते हैं, लेकिन नाइट्रोजन एवं जैव पदार्थों की कमी रहती है।
- फसलें: गन्ना, चावल, गेहूँ, मक्का, दलहन। यहाँ गहन कृषि होने के कारण जनसंख्या घनत्व भी ऊँचा है।
- 💡 आयु के आधार पर वर्गीकरण:
- बांगर (पुरानी जलोढ़): इसमें कंकड़ और बजरी की मात्रा अधिक होती है (कम उपजाऊ)।
- खादर (नवीन जलोढ़): इसमें महीन कण पाए जाते हैं और यह अत्यधिक उपजाऊ होती है।
🌟 परीक्षा का अचूक मंत्र (Exam Pointer) उत्तर बिहार में बालू प्रधान जलोढ़ मिट्टी को 'दियारा भूमि' कहा जाता है, जो मक्का की कृषि के लिए विश्व प्रसिद्ध है। (BSEB/BPSC में अक्सर पूछा जाता है)।
Ⓑ काली मृदा (Black Soil / Regur)
- अन्य नाम: इसे 'रेगुर मृदा' या 'काली कपासी मृदा' भी कहा जाता है।
- निर्माण: दक्कन के लावा प्रदेश में ज्वालामुखी के बेसाल्ट लावा के विघटन से हुआ है।
- क्षेत्र: महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु।
- विशेषता: इसमें नमी धारण करने की क्षमता अत्यधिक होती है। शुष्क मौसम में इसमें गहरी दरारें पड़ जाती हैं, जिससे वायु का अच्छा मिश्रण होता है। गीली होने पर यह चिपचिपी हो जाती है, इसलिए मॉनसून की पहली बौछार में ही इसकी जुताई आवश्यक है।
- फसल: कपास की खेती के लिए सर्वश्रेष्ठ (इसके अलावा गन्ना, प्याज, गेहूँ भी)।
Ⓒ लाल एवं पीली मृदा (Red and Yellow Soil)
- निर्माण: प्रायद्वीपीय पठार के पूर्वी एवं दक्षिणी हिस्से में कम वर्षा वाले क्षेत्रों में रवेदार आग्नेय चट्टानों (ग्रेनाइट, नीस) के विघटन से हुआ है।
- रंग का कारण: इसमें लौहांश (लोहे के अंश) की अधिकता के कारण इसका रंग लाल होता है, लेकिन जलयोजन (पानी मिलने) के बाद यह पीली दिखाई देती है।
- क्षेत्र: तमिलनाडु, कर्नाटक, गोवा, ओडिशा, छोटानागपुर पठार और मेघालय।
Ⓓ लैटेराइट मृदा (Laterite Soil)
- उत्पत्ति: ग्रीक शब्द 'Later' से हुई है, जिसका अर्थ होता है — 'ईंट'।
- परिस्थिति: यह उच्च तापमान और अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में तीव्र निक्षालन (Leaching) का परिणाम है।
- गुण: बैक्टीरिया नष्ट होने के कारण इसमें ह्यूमस नगण्य (ना के बराबर) होता है। सूखने पर यह ईंट की तरह अत्यंत कठोर हो जाती है।
- क्षेत्र: कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, ओडिशा और असम की पहाड़ियाँ।
- फसलें: खाद और उर्वरक डालकर यहाँ चाय, कहवा (कॉफी) और काजू (विशेषकर केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश में) की खेती की जाती है।
Ⓔ मरुस्थलीय मृदा (Arid / Desert Soil)
- क्षेत्र: पश्चिमी राजस्थान, सौराष्ट्र, कच्छ, पश्चिमी हरियाणा और दक्षिणी पंजाब।
- विशेषता: लंबी शुष्क ऋतु और कम वर्षा के कारण इसमें ह्यूमस और नमी का पूर्ण अभाव होता है। इसका रंग लाल या हल्का भूरा होता है। सिंचाई की व्यवस्था करके यहाँ कपास, चावल और गेहूँ उगाया जा सकता है।
Ⓕ पर्वतीय मृदा (Forest / Mountain Soil)
- क्षेत्र: पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों (जैसे हिमालय क्षेत्र) में जहाँ पर्याप्त वर्षा-वन पाए जाते हैं।
- विशेषता: यह एक अपरिपक्व और जटिल मृदा है। बर्फ से ढके (हिमाच्छादित) क्षेत्रों में अपरदन के कारण यह मिट्टी अम्लीय और ह्यूमस रहित हो जाती है। नदी घाटियों के निचले भागों और सोपानों में यह उपजाऊ होती है जहाँ फलों के बागान, चावल और आलू उगाए जाते हैं।
④ 📈 भारत में भू-उपयोग का स्वरूप (Land Use Pattern in India)
- कुल भौगोलिक क्षेत्र: भारत का कुल क्षेत्रफल 32.8 लाख वर्ग किलोमीटर है, लेकिन इसके मात्र 93% भाग के ही भू-उपयोग के आँकड़े उपलब्ध हैं। (जम्मू-कश्मीर में पाक-अधिकृत [PoK] और चीन-अधिकृत [Aksai Chin] क्षेत्रों का भू-उपयोग सर्वेक्षण नहीं हो पाया है)।
- पर्यावरण संतुलन की शर्त: राष्ट्रीय वन नीति (1952) के अनुसार देश के कम से कम 33% भूभाग पर वन होना अनिवार्य है, परंतु वर्तमान में मात्र लगभग 20% भाग पर ही वन का विस्तार है, जो चिंताजनक है।
- कृषि योग्य भूमि: वर्तमान में उपलब्ध कुल क्षेत्रफल का मात्र 54% भाग ही कृषि योग्य है।
- पंजाब और हरियाणा: यहाँ कुल भूमि के 80% भाग पर खेती होती है।
- अरुणाचल, मिजोरम, मणिपुर, अंडमान-निकोबार: यहाँ 10% से भी कम क्षेत्र में खेती होती है।
⑤ ⚠️ भू-निम्नीकरण और भू-क्षरण (Land Degradation & Soil Erosion)
- भू-क्षरण: मृदा का अपने स्थान से गतिशील जल, पवन या हिमानी द्वारा स्थानांतरित होना भू-क्षरण (मृदा अपरदन) कहलाता है।
- निम्नीकृत भूमि: भारत में लगभग 13 करोड़ हेक्टेयर भूमि निम्नीकृत (खराब) हो चुकी है।
- 56% क्षेत्र: जल द्वारा अपरदित है।
- 28% क्षेत्र: वनों के निम्नीकरण के अंतर्गत है।
- शेष क्षेत्र: लवणीय, क्षारीय और वायु द्वारा अपरदित है।
🔍 निम्नीकरण के प्रमुख मानवीय कारण (State-Wise Key Reasons) :
- अत्यधिक सिंचाई (Over-Irrigation): पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अधिक सिंचाई से जलाक्रांतता (Water Logging) की समस्या पैदा होती है, जिससे मिट्टी में लवणता और क्षारीयता बढ़ जाती है।
- खनन (Mining): झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में खनन के बाद खाइयों को खुला छोड़ देने के कारण भूमि का भारी निम्नीकरण हुआ है।
- वनोन्मूलन (Deforestation): ओडिशा में जंगलों की अंधाधुंध कटाई इसका मुख्य कारण है।
- अति-पशुचारण (Over-Grazing): गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में अत्यधिक पशुचारण से भूमि खराब हुई है।
- औद्योगिक अपशिष्ट: सीमेंट और मृदा बर्तन उद्योगों में चूना पत्थर/खड़िया पीसने से उड़ने वाली धूल जब जमीन पर जम जाती है, तो यह भूमि की जल अवशोषण क्षमता को नष्ट कर देती है।
⑥ 🛡️ भू-संरक्षण के प्रभावी उपाय (Soil Conservation Methods)
मानव की 95% से अधिक आवश्यकताओं की पूर्ति भूमि/मृदा द्वारा ही होती है, अतः इसका संरक्षण अनिवार्य है [0.1.26, 25]। इसके प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं:
- 🔄 फसल चक्रण (Crop Rotation): गेहूँ, कपास, मक्का आदि फसलों को लगातार उगाने से मिट्टी के पोषक तत्व कम हो जाते हैं। इसे बनाए रखने के लिए बीच में तिलहन और दलहन (लेगुमिनस) पौधों की खेती करनी चाहिए, जिससे मिट्टी में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण (Fixation) होता है।
- ⛰️ समोच्च जुताई (Contour Ploughing): पहाड़ी ढलानों पर वृत्ताकार रूप में जुताई करने से पानी का बहाव धीमा होता है और मृदा अपरदन रुकता है।
- 🌾 पट्टिका कृषि (Strip Farming): पवन अपरदन वाले मैदानी या शुष्क क्षेत्रों में फसलों के बीच में घास की पट्टियाँ उगाई जाती हैं, जो हवा के वेग को कम करती हैं।
- 🌳 वृक्षारोपण (Afforestation): यह मृदा संरक्षण की सबसे बड़ी और प्रभावी शर्त है, क्योंकि पेड़ की जड़ें मिट्टी को बांधकर रखती हैं और इनकी पत्तियाँ सड़कर ह्यूमस बनाती हैं।
- 🧪 रसायनों पर नियंत्रण: मेंढकों के प्रजनन को रोकने वाले 'ऐड्रिन' (Adrin) जैसे खतरनाक रसायनों के स्थान पर प्राकृतिक खाद और जैव-कीटनाशकों का उपयोग किया जाना चाहिए।
🎯 परीक्षा उपयोगी विशेष बिंदु (Exam High-Yield Pointers)
- रेगुर मिट्टी = काली मिट्टी = कपास के लिए सर्वोत्तम।
- दियारा भूमि = उत्तर बिहार की बालू प्रधान जलोढ़ भूमि जो मक्का के लिए प्रसिद्ध है।
- जलाक्रांतता (Water Logging) = पंजाब और हरियाणा में अत्यधिक सिंचाई के कारण मिट्टी का क्षारीय होना।
- ऐड्रिन (Adrin) = वह रसायन जो मेंढकों के प्रजनन चक्र को नष्ट कर कीटों की संख्या बढ़ाता है।
- राष्ट्रीय वन नीति (1952) = देश के 33% भूभाग पर वनों का लक्ष्य निर्धारित करने वाली नीति।
📌 निष्कर्ष (Conclusion)
भूमि और मृदा हमारे अस्तित्व का आधार स्तंभ हैं। आधुनिक युग में बढ़ती मानवीय लिप्सा, रासायनिक खादों के अत्यधिक प्रयोग और अनियोजित औद्योगिक विकास ने इस अमूल्य संपदा को संकट में डाल दिया है [0.1.25, 0.1.26, 25]। फसल चक्रण, समोच्च जुताई और व्यापक वृक्षारोपण जैसे वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर ही हम सतत विकास के लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं और भावी पीढ़ी के भविष्य को सुरक्षित रख सकते हैं [0.1.26, 25, 26]।
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