नलिन विलोचन शर्मा
नलिन विलोचन शर्मा का जन्म 18 फरवरी 1916 ई० में पटना के बदरघाट में हुआ। वे जन्मना भोजपुरी भाषी थे। वे दर्शन और संस्कृत के प्रख्यात विद्वान महामहोपाध्याय पं० रामावतार शर्मा के ज्येष्ठ पुत्र थे। माता का नाम रत्नावती शर्मा था। उनके व्यक्तित्व निर्माण में पिता के पांडित्य के साथ उनकी प्रगतिशील दृष्टि की भी बड़ी भूमिका थी। उनकी स्कूल की पढ़ाई पटना कॉलेजिएट स्कूल से हुई और पटना विश्वविद्यालय से उन्होंने संस्कृत और हिंदी में एम० ए० किया। वे हरप्रसाद दास जैन कॉलेज, आरा, राँची विश्वविद्यालय और अंत में पटना विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहे। सन् 1959 में वे पटना विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष हुए और मृत्युपर्यंत (12 सितंबर 1961 ई०) इस पद पर बने रहे।
हिंदी कविता में प्रपद्यवाद के प्रवर्तक और नई शैली के आलोचक नलिन जी की रचनाएँ इस प्रकार हैं - 'दृष्टिकोण', 'साहित्य का इतिहास दर्शन', 'मानदंड', 'हिंदी उपन्यास विशेषतः प्रेमचंद', 'साहित्य तत्त्व और आलोचना' आलोचनात्मक ग्रंथ; 'विष के दाँत' और सत्रह असंगृहीत पूर्व छोटी कहानियाँ - कहानी संग्रह; केसरी कुमार तथा नरेश के साथ काव्य संग्रह 'नकेन के प्रपद्य' और 'नकेन दो', 'सदल मिश्र ग्रंथावली', 'अयोध्या प्रसाद खत्री स्मारक ग्रंथ', 'संत परंपरा और साहित्य' आदि संपादित ग्रंथ हैं।
आलोचकों के अनुसार, प्रयोगवाद का वास्तविक प्रारंभ नलिन विलोचन शर्मा की कविताओं से हुआ और उनकी कहानियों में मनोवैज्ञानिकता के तत्त्व समग्रता से उभरकर आए। आलोचना में वे आधुनिक शैली के समर्थक थे। वे कथ्य, शिल्प, भाषा आदि सभी स्तरों पर नवीनता के आग्रही लेखक थे। उनमें प्रायः परंपरागत दृष्टि एवं शैली का निषेध तथा आधुनिक दृष्टि का समर्थन है। आलोचना की उनकी भाषा गठी हुई और संकेतात्मक है। उन्होंने अनेक पुराने शब्दों को नया जीवन दिया, जो आधुनिक साहित्य में पुनः प्रतिष्ठित हुए।
यह कहानी 'विष के दाँत तथा अन्य कहानियाँ' नामक कहानी संग्रह से ली गई है। यह कहानी मध्यवर्ग के अनेक अंतर्विरोधों को उजागर करती है। कहानी का जैसा ठोस सामाजिक संदर्भ है, वैसा ही स्पष्ट मनोवैज्ञानिक आशय भी। आर्थिक कारणों से मध्यवर्ग के भीतर ही एक ओर सेन साहब जैसों की एक श्रेणी उभरती है जो अपनी महत्वाकांक्षा और सफेदपोशी के भीतर लिंग भेद जैसे कुसंस्कार छिपाये हुए हैं तो दूसरी ओर गिरधर जैसे नौकरीपेशा निम्न मध्यवर्गीय व्यक्ति की श्रेणी है जो अनेक तरह की थोपी गयी बंदिशों के बीच भी अपने अस्तित्व को बहादुरी एवं साहस के साथ बचाये रखने के लिए संघर्षरत है। यह कहानी सामाजिक भेद-भाव, लिंग भेद, आक्रामक स्वार्थ की छाया में पलते हुए प्यार दुलार के कुपरिणामों को उभारती हुई सामाजिक समानता एवं मानवाधिकार की महत्त्वपूर्ण बानगी पेश करती है।
विष के दाँत
सेन साहब की नई मोटरकार बँगले के सामने बरसाती में खड़ी है काली चमकती हुई, स्ट्रीमल इंड; जैसे कोयल घोंसले में कि कब उड़ जाए। सेन साहब को इस कार पर नाज है बिलकुल नई मॉडल, साढ़े सात हजार में आई है। काला रंग, चमक ऐसी कि अपना मुँह देख लो। कहीं पर एक धब्बा दिख जाए तो क्लीनर और शोफर की शामत ही समझो। मेम साहब की सख्त ताकीद है कि खोखा खोखी गाड़ी के पास फटकने न पाएँ ।
लड़कियाँ तो पाँचों बड़ी सुशील हैं, पाँच-पाँच ठहरों और सो भी लड़कियाँ, तहजीब और तमीज की तो जीती-जागती मूरत ही हैं। मिस्टर और मिसेज सेन ने उन्हें क्या करना चाहिए, यह सिखाया हो या नहीं, क्या क्या नहीं करना चाहिए, इसकी उन्हें ऐसी तालीम दी है कि बस । लड़कियाँ क्या हैं, कठपुतलियाँ हैं और उनके माता-पिता को इस बात का गर्व है। वे कभी किसी चीज को तोड़ती-फोड़तों नहीं। वे दौड़ती हैं, और खेलती भी हैं, लेकिन सिर्फ शाम के वक्त, और चूँकि उन्हें सिखाया गया है कि ये बातें उनकी सेहत के लिए जरूरी हैं। वे ऐसी मुस्कराहट अपने होठों पर ला सकती हैं कि सोसाइटी की तारिकाएँ भी उनसे कुछ सीखना चाहें, तो सीख लें, पर उन्हें खिलखिलाकर किलकारी मारते हुए किसी ने सुना नहीं। सेन परिवार के मुलाकाती रश्क के साथ अपने शरारती बच्चों से खीझकर कहते हैं "एक तुम लोग हो, और मिसेज सेन की लड़कियाँ हैं। अबे, फूल का गमला तोड़ने के लिए बना है? तुम लोगों के मारे घर में कुछ भी तो नहीं रह सकता ।"
सो जहाँ तक सेन परिवार की लड़कियों का सवाल है, उनसे मोटर की चमक-दमक को कोई खास खतरा नहीं था। लेकिन खोखा भी तो है। खोखा जो एक ही है, सबसे छोटा है। खोखा नाउम्मीद बुढ़ापे की आँखों का तारा है - यह नहीं कि मिसेज सेन अपना और बुढ़ापे का कोई ताल्लुक किसी हालत में मानने को तैयार हों और सेन साहब तो सचमुच बूढ़े नहीं लगते। लेकिन मानने लगने की बात छोड़िए । हकीकत तो यह है कि खोखा का आविर्भाव तब जाकर हुआ था, जब उसकी कोई उम्मीद दोनों को बाकी नहीं रह गई थी। खोखा जीवन के नियम का अपवाद था और यह अस्वाभाविक नहीं था कि वह घर के नियमों का भी अपवाद हो। इस तरह मोटर को कोई खतरा हो सकता था तो खोखा से ही ।
बात ऐसी थी कि सीमा, रजनी, आलो, शेफाली, आरती पाँचों हुई तो ।…. उनके लिए घर में अलग नियम थे, दूसरी तरह की शिक्षा थी, और खोखा के लिए अलग, दूसरी। कहने के लिए तो सेनों का कहना था कि खोखा आखिर अपने बाप का बेटा ठहरा, उसे तो इंजीनियर होना है, अभी से उसमें इसके लक्षण दिखाई पड़ते थे, इसलिए ट्रेनिंग भी उसे वैसी ही दी जा रही थी। बात यह है कि खोखा के दुर्ललित स्वभाव के अनुसार ही सेनों ने सिद्धान्तों को भी बदल लिया था । अक्सर ऐसा होता है कि सेन परिवार के दोस्त आते हैं, भड़कीले ड्राइंग रूम में बैठते हैं और बातचीत के लिए विषय का अभाव होने पर चर्चा निकल पड़ती है कि किसका लड़का क्या करेगा। तब सेन साहय बड़ी मौलिकता और दूरदेशी के साथ फरमाते हैं कि वह तो अपने लड़के को अपने ढंग से ट्रेंड करेंगे, करेंगे क्या कर रहे हैं। आजकल की पढ़ाई-लिखाई तो फिजूल है, वह तो उसे अपनी तरह बिजनेसमैन इंजीनियर बनाना चाहते हैं। "अब देखिए न", सेन साहब कहते हैं, "खोखा पाँच साल का हो रहा है। लोग कहते हैं, उसे किंडरगार्टन स्कूल में भेज दो, लेकिन मैंने अभी यही इन्तजाम किया है कि कारखाने का बढ़ई मिस्त्री दो-एक घंटे के लिए आकर उसके साथ कुल ठीक-पीट किया करे । इससे बच्चे की उँगलियाँ अभी से औजारों से वाकिफ हो जाएँगी. हिन्दुस्तानी लोग यही नहीं समझते ।
एक दिन का बावाया है कि डाइंग रूम में सेन साहब के कुछ दोस्त बैठे गपशप कर रहे थे । उनमें एक साहब साधारण हैसियत के अखबारनवीस थे और सेनों के दूर के रिश्तेदार भी होते थे । साथ में उनका तड़का भी था, जो था तो खोछा से भी छोटा, पर बड़ा समझदार और होनहार मालूम पड़ता था। किसी ने उसकी कोई हरकत देखकर उसकी कुछ तारीफ कर दी और उन साहब से पूछा कि सच्चा स्कून तो जाता ही होगा? इसके पहले कि पत्रकार महोदय कुछ जवाब देते, संन साहब से शुरू किया में तो खोखा को इंजीनियर बनाने जा रहा हूँ, और वे ही बातें दुहराकर वे थकते नहीं थे । पत्रकार महोदय चुप मुस्कुराते रहे। जब उनसे फिर पूछा गया कि अपने बच्चे के विषय में उनका क्या ख्याल है, तब उन्होंने कहा, "में चाहता हूँ कि वह जॉटलमैन जरूर बने और जो कुछ बने, उसका काम है, उसे पूरी आजादी रहेगी।" सेन साहब इस उत्तर के शिष्ट और प्रच्छन्न व्यंग्य पर ऐंठकर रह गए ।
तभी बाहरे शोर-गुल सुनकर सेन साहब उठने लगे, तो उनके मित्रों ने भी जाने की इच्छा प्रकट की और उन्हीं के साथ बाहर आए। बाहर सेन साहब का शोफर एक औरत से उलझ रहा था । औरत के पास एक पाँच-छह साल का बच्चा खड़ा था, जिसे वह रोकने की कोशिश कर रही थी, क्योंकि बच्चाः चार बार शोफर की ओर झपटता था।
सेन साहच को देखकर औरत सहम गई। शोफर ने साहब की ओर बढ़कर अदब के साथ कहा, "देखिए साहब, मदन गाड़ी को छू रहा था, गाड़ी गन्दी हो जाती, मैंने मना किया तो लगा कहने- 'जा-जा' तो मैंने उसे पकड़कर अलग कर दिया, इस पर मुझको मारने दौड़ा। अब उसकी माँ भी आकर खाभखाह मुझसे उत्वा रही है ।" मदन की माँ कुछ कहना चाहती थी, लेकिन सेन साहब के सरे होठों को देखकर चुप रह गई। संन साहब ने बड़े संयत पर कठोर स्वर में कहा- "मदन की माँ, मदन को ले जाओ और देखना, वह फिर ऐसी हरकत न करे। मदन की माँ अपने बच्चे के बाएँ घुटने से निकलते हुए खून को पोंछती हुई चली गई। ड्राइवर ने शायद धकेल दिया था और वह गिर पड़ा था। लेकिन एक मामूली किरानी के बेटे को सेन साहब के ड्राइवर ने धक्का दे दिया और उसे चोट आ गई, तो आखिर ऐसी कौन-सी बात हो गई।
ठीक इसी वक्त मोटर के पीछे खट्-खर की आवाज सुनकर सेन साहब लपके, शोफर भी दौड़ा । और लोग सीढ़ियों से उतरकर अपनी-अपनी गाड़ियों की ओर चले। सभी ने देखा, सेन साहब खोखा को गोद में लेकर उसे हल्की मुस्कुराहट के साथ डाँट रहे हैं और मोटर की पिछली बत्ती का लाल शीशा चकनाचूर हो गया है। सेन साहब ने मित्रों को सम्बोधित करते हुए कहा, "देखा आपलोगों ने ? बड़ा शरारती हो गया, काशू। मोटर के पीछे हरदम पड़ा रहता है। उसके कल-पुर्जा में इसको अभी से इतनी दिलचस्पी है कि क्या बताऊँ !… शायद देखना चाह रहा था कि आखिर इस बत्ती के अन्दर है क्या ?"
सेन साहब खोखा को जमीन पर रखकर अपने दोस्तों के साथ उनकी कार की ओर चले । उन्होंने अपने मित्रों की भाव-भंगिमा देखी नहीं, देखते भो तो कुछ समझ पाते इसमें शक ही था। मिस्टर सिंह अपनी कार के पास पहुँचे और सेन साहब को नमस्कार कर दरवाजा खोलने के लिए बढ़े और फिर रुक गए। उनकी निगाह अचानक है। अगले चक्के पर गई थी । उन्होंने नजदीक जाकर देखा और परेशानी की हालत में खड़े हो गए। टायर बिलकुल बैठ गया था । शायद 'पंक्चर' हो गया था। सेन साहब भी आगे बढ़ आए और कुछ झिझकते हुए बोले, "कहीं ऐसा तो नहीं है कि काशू ने हवा निकाल दी हो । ड्राइवर, जरा दूसरे चवकों को भी देख लो और पंप ले आकर हवा भर दो; और हाँ कुर्सियाँ लॉन में लगवा दो, तब तक हम यहाँ बैठते हैं।"
ड्राइवर ने एक कार का चक्का लगाकर सूचना दी कि दूसरी ओर के पिछले चक्के की भी हवा निकाली हुई थी। 'काम तो काजू बाबू का ही मालूम पड़ता है, इधर ही खेल रहे थे' शोफर ने बताया और पंप लाने चिलायेगा।
मुकर्जी साहब की गाडी सकुशल थी और वह अपने और पत्रकार महोदय के परिवार के साथ चलते बने। सेन साहब और मिस्टर सिंह लॉन की कुर्सियों पर बैठकर बातें करते रहे। बातों के सिलसिले में ही सेन साहब ने बतलाया कि काशु ने इधर चक्कों से हवा निकालने की हिकमत जान ली थी और मौका मिलते ही शरारत कर गुजरता था। उनका अपना ख्याल था, उसकी इन हरकतों को देखकर तो यह साफ मालूम होता था कि इंजीनियरिंग में उसकी दिलचस्पी है। इसी तरह की दूसरी बेमतलन की बातें होती रहीं, जब तक कि चवकों में पंप नहीं हो गया और मिस्टर सिंह रुखसत नहीं हो गए ।
सेन साहब अन्दर लौटे तो बेयरा को, मदन के पिता गिरधरलाल को, जो उनकी फैक्टरी में किरानी था और अहाते के एक कोने में… आतटहाउस में रहता था, बुला लाने का हुक्म दिया। गिरधरलाल आया और सेन साहब के सामने सिर झुकाकर खड़ा हो गया, जैसे खून के जुर्म में कैदी जज के सामने खड़ा हो। सेन साहब ने उढी बेलौस आवाज में कहना शुरू किया, "देखो गिरधर, मदन आजकल बहुत शोख हो गया है। मैं तुम्हारी और उसकी भलाई चाहता हूँ। गाड़ी को गन्दा किया वह अलग, मना करने पर ड्राइवर को मारने दौड़ा और मेरे सामने भी डरने के बदले उसकी ओर झपटता रहा। ऐसे ही लड़के आगे चलकर गुण्डे, चोर और डाकू बनते हैं।" गिरधरलाल कभी-कभी 'जी' कह देता था। सेन साहब का भाषण जारी था, "उसकी हालत क्या होती है तुम जानते ही हो । उसे सँभालने की कोशिश करो। फिर ऐसी बात हुई, तो अच्छा नहीं होगा ! तुम जा सकते हो।"
उस रात गिरधरलाल के क्वार्टर से आते हुए मदन के चीत्कार से सेनों का आरामदेह शयनागार गूँज गया। आराम में खलल पड़ने से कुछ झुंझलाकर पिता सेन ने धर्मपत्नी से बड़ी समझदारी की बात कही, "गिरधर खुद समझदार आदमी है। उसकी बीवी ने ही लड़के को बिगाड़ दिया है। मदन की यही दवा है। मेरी तो तबीयत हुई थी कि कमबख्त की खाल उधेड़ दूँ। गिरधर ने ऐसी ही कड़ाई जारी रखी तो शायद ठीक हो जाए। 'स्पेयर द रॉड ऐण्ड स्प्वायल द चाइल्ड' ।"
माता सेन की नींद उचट गई थी। उन्हें मदन की कातर चिल्लाहट से ज्यादा अपने पति की बकबक पर खीझ आ रही थी लेकिन उन्होंने भी अपनी खीझ मदन पर ही उतारी, "कमबख्त कैसा कौए की तरह चिल्ला रहा है। भिखमंगा कहीं का । खोखा की बराबरी करता फिरता है।"
मदन का आर्त रुदन रुक गया था। खैरियत थी, उसकी सिसकियाँ सेनों के शयनागार तक नहीं पहुँच सकती थीं।
लेकिन दूसरे दिन तो बिलकुल बेढब मामला हो गया। शाम के वक्त खेलता-कूदता खोखा बंगले के अहाते की बगलवाली गली में जा निकला। वहाँ धूल में मदन पड़ोसियों के आवारागर्द छोकरों के साथ लट्टू नचा रहा था। खोखा ने देखा तो उसकी तबीयत मचल गई । हंस कौओं की जमात में शामिल होने के लिए ललक गया। लेकिन आदत से लाचार उसने बड़े रोब के साथ मदन से कहा, 'हमको लट्टू दो, हम भी खेलेगा। दूसरे लड़कों को कोई खास उज्र नहीं थी, वे खोखा को अपनी जमात में ले लेने के फायदों को नजरअन्दाज नहीं कर सकते थे। पर उनके अपमानित, प्रताड़ित लीडर मदन को यह वात कब मंजूर हो सकती थी ? उसने छूटते ही जवाब दिया- अबे भाग जा यहाँ से । बड़ा आया है लट्टू खेलनेवाला ! है भी लट्टू तेरे । जा, अपने बाबा की मोटर पर बैठ ।'
काशू तैश में आ गया । वह इसी उम्र में नौकरों पर, अपनी बहनों पर हाथ चला देता था और क्या मजाल कि उसे कोई कुछ कर दे। उसने आव देखा न ताव, मदन को एक मूँसा रसीद कर दिया ।
चोर-गुंडा-डाकू होनेवाला मदन भी कब माननेवाला था ! वह झट काशू पर टूट पड़ा । दूसरे लड़के जरा हटकर इस द्वन्द्व युद्ध का मजा लेने लगे। लेकिन यह लड़ाई हड्डी और मांस की, बंगले के पिल्ले और गली के कुत्ते की लड़ाई थी। अहाते में यही लड़ाई हुई रहती, तो काशू शेर हो जाता। वहाँ से तो एक मिनट बाद ही वह रोता हुआ जान लेकर भाग निकला। महल और झोपड़ीवालों की लड़ाई में अक्सर महलवाले ही जीतते हैं, पर उसी हालत में, जब दूसरे झोपड़ीवाले उनकी मदद अपने ही खिलाफ करते हैं। लेकिन बच्चों को इतनी अवल कहाँ ? उन्होंने न तो अपने दुर्दमनीय लीडर की मदद की, न अपने माता-पिता के मालिक के लाडले की ही । हाँ, लड़ाई खत्म हो जाने पर तुरन्त ही सहमते हुए वितर-बितर हो गए।
मदन घर नहीं लौटा। लेकिन जाता ही कहाँ ? आठ-नौ बजे तक इधर-उधर मारा-भारा फिरता रहा। फिर भूख लगी, तो गली के दरवाजे से आहिस्ता आहिस्ता घर में घुसा । उसके लिए मार खाना मामूली बात थी। डर था तो यही कि आज मार और दिनों से भी बुरी होगी। लेकिन उपाय ही क्या था। वह पहले रसोईघर में घुसा। माँ नहीं थी। बगल के सोनेवाले कमरे से बातचीत की आवाज आ रही थी। उसने इत्मीनान के साथ भर पेट खाना खाया। फिर दरवाजे के पास जाकर अन्दर की बातचीत सुनने की कोशिश करने लगा। उसे बड़ा ताज्जुब हुआ उसके बाबू गरज-तरज नहीं रहे थे ! उसकी अम्मा ने कोई बात पूछी, जिसे वह ठीक से सुन नहीं सका, तो उसके बाबू ने झल्लाकर कहा, "अरे भाई बतलाया तो, साहब ने सिर्फ यही कहा आज से तुम्हारी कोई जरूरत नहीं; कल से मकान छोड़ देना और अपनी तनख्वाह ऑफिस से ले लेना ।"…. मदन के काम की कोई बात नहीं हो रही थी, उसकी सजा की तजबीज होती रहती, तो सुनने की कोशिश भी करता वह ।
वह दबे पाँव बरामदे में रखी चारपाई की तरफ सोने के लिए चला, तो अँधेरे में उसका पैर लोटे से लग गया! लोटे की उन् उत् की आवाज सुनकर गिरधर बाहर निकल आया। मदन की अम्मा भी उसके साथ थी। सदन चौंककर घूमा और नार खाने की तैयारी में आ छाती को अपने हाथों से बाँधकर खड़ा हो गया। मदन अक्सर अपने पिता के हाथों पिटता था, बहुत पिटने पर रोता भी था, मगर बहादुरी के साथ ।
गिरधर निस्सहाय निष्ठुरता के साथ मदन की ओर बढ़ा। मदन ने अपने दाँत भींच लिए। गिरधर मदन के बिलकुल पास आ गया था कि अचानक वह ठिठक गया। उसके चेहरे से नाराजगी का बादल हट गया। उसने लपककर मदन को हाथों से उठा लिया। मदन हक्का-बक्का अपने पिता को देख रहा था। उसे याद नहीं, उसके पिता ने कब उसे इस तरह प्यार किया था, अगर कभी किया था तो गिरधर उसी बेपरवाही, उल्लास और गर्व के साथ बोल उठा, जो किसी के लिए भी नौकरी से निकाले जाने पर ही मुमकिन हो सकता है, 'शाबाश बेटा' । एक तेरा बाप है; और तूने तो, बे, खोखा वो दो-दो दाँत दोड़ डाले। हा हा हा हा !
बोध और अभ्यास
पाठ के साथ
कहानी के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए ।
सेन साहब के परिवार में बच्चों के पालन-पोषण में किए जा रहे लिंग आधारित भेद-भाव का अपने शब्दों में वर्णन कीजिए ।
खोखा किन मामलों में अपवाद था ?
सेन दंपती खोखा में कैसी संभावनाएँ देखते थे और उन संभावनाओं के लिए उन्होंने उसकी कैसी शिक्षा तय की थी ?
- सप्रसंग व्याख्या कीजिए
(क) लड़कियाँ क्या हैं, कठपुतलियाँ हैं और उनके माता-पिता को इस बात का गर्व है।
(ख) खोखा के दुर्ललित स्वभाव के अनुसार ही सेनों ने सिद्धांतों को भी बदल लिया था।
(ग) ऐसे ही लड़के आगे चलकर गुंडे, चोर और डाकू बनते हैं।
(घ) हंस कौओं की जमात में शामिल होने के लिए ललक गया ।
सेन साहब के और उनके मित्रों के बीच क्या बातचीत हुई और पत्रकार मित्र ने उन्हें किस तरह उत्तर दिया ?
मदन और ड्राइवर के बीच के विवाद के द्वारा कहानीकार क्या बताना चाहता है ?
काशू और मदन के बीच झगड़े का कारण क्या था ? इस प्रसंग के द्वारा लेखक क्या दिखाना चाहता है ?
'महल और झोपड़ी वालों की लड़ाई में अक्सर महल वाले ही जीतते हैं, पर उसी हालत में जब दूसरे झोपड़ी वाले उनकी मदद अपने ही खिलाफ करते हैं।' लेखक के इस कथन को कहानी से एक उदाहरण देकर पुष्ट कीजिए ।
रोज-रोज अपने बेटे मदन की पिटाई करने वाला गिरधर मदन द्वारा काशू की पिटाई करने पर उसे दंडित करने की बजाय अपनी छाती से क्यों लगा लेता है ?
सेन साहब, मदन, काशू और गिरधर का चरित्र-चित्रण करें।
आपकी दृष्टि में कहानी का नायक कौन है ? तर्कपूर्ण उत्तर दें।
आरंभ से ही कहानीकार का स्वर व्यंग्यपूर्ण है। ऐसे कुछ प्रमाण उपस्थित करें ।
'विष के दाँत' कहानी का सारांश लिखें ।
पाठ के आस-पास
एक साहित्यकार के रूप में नलिन विलोचन शर्मा के महत्त्व के बारे में अपने शिक्षक से जानकारी लें।
अपने शिक्षक की मदद से लेखक के पिता की रचनाओं की सूची तैयार करें और उनके बारे में जानकारी इकट्ठी करें।
बीएसटीबीपीसी-2015
भाषा की बात
- कहानी से मुहावरे चुनकर उनके स्वतंत्र वाक्य प्रयोग करें।
कहानी से विदेशज शब्द चुनें और उनका स्रोत निर्देश करें। 2.
कहानी से पाँच मिश्र वाक्य चुनें ।
वाक्य-भेद स्पष्ट कीजिए -
(क) इसके पहले कि पत्रकार महोदय कुछ जवाब देते, सेन साहब ने शुरू किया मैं तो खोखा को इंजीनियर बनाने जा रहा हूँ।
(ख) पत्रकार महोदय चुप मुस्कुराते रहे ।
(ग) 'ठीक इसी वक्त मोटर के पीछे खट-खट की आवाज सुनकर सेन साहब लपके, शोफर भी दौड़ा।
(घ) ड्राइवर, जरा दूसरे चक्कों को भी देख लो और पंप ले आकर हवा भर दो ।
शब्द निधि
बरसाती : पोर्टिको
वाकिफ : परिचित
नाज : गर्व, गुमान
वाकया : घटना
तहजीब : सभ्यता
हैसियत स्तर, प्रतिष्ठा, सामर्थ्य, औकात
शोफर : ड्राइवर
अखबारनवीस : पत्रकार
शायत : दुर्भाग्य
प्रच्छन्न : छिपा हुआ, गुप्त, अप्रकट
सख्न
:
कड़ा, कठोर
ताकीद : कोई बात जोर देकर कहना, चेतावनी
अदब : शिष्टता, सभ्यता
हिकमत : कौशल, योग्यता
खोखा-खोखी: बच्चा-बच्ची (बंगाली)
रुखसत. : विदाई
फटकना : निकट आना
बेलौस : निःस्वार्थ
तमीज : विवेक, बुद्धि, शिष्टता
बेयरा : खाना खिलाने वाला सेवक
तालीम : शिक्षा
चीत्कार : क्रंदन, आर्त्त होकर चीखना
सोसाइटी : शिष्ट समाज, भद्रलोक
शयनागार : शयनकक्ष, सोने का कमरा
- रश्क
- डाह करना
खलल : विघ्न, बाधा, व्यवधान
ताल्लुक : संबंध
कैंची : कला
हकीकत : सच्चाई, वास्तविकता
खैरियत कुशलक्षेम
आविर्भाव : उत्पत्ति, प्रकट होना
बेढब : बेतरीका, अनगढ़
दुर्ललित लाड़-प्यार में बिगड़ा हुआ
उज : आपत्ति
- ट्रेंड
- प्रशिक्षित
मजाल : ताकत, हिम्मत, साहस
दूरंदेशी : दूरदर्शिता, समझदारी
अक्ल बुद्धिम
फरमाना आग्रहपूर्वक कहना
दुर्दमनीय मुश्किल से जिसका दमन किया जा सके
- फिजूल
- फालतू, व्यर्थ
निष्ठुरता : क्रूर निर्ममता
13
Join the Discussion