📜 Page 1
🕉️ Original Sanskrit Text
पञ्चमः पाठः संसारमोहः एकदा भगवान् नृसिंहः स्वस्य प्रियं भक्तं प्रह्लादम् अवदत्— 'किमपि वरं याचस्व' इति । तदा प्रह्लादः उक्तवान्- "भगवन्! संसारस्य एतान् दीनदुःखिनः जीवान् त्यक्त्वा अहम् एकाकी मुक्तः भवितुं न इच्छामि। कृपया भवान् एतान् सर्वान् अपि जीवान् स्वीकृत्य वैकुण्ठं प्रति गमनाय अनुमतिं ददातु" इति। भगवान् अवदत्- ये गन्तुं न इच्छन्ति तान् सर्वान् अपि जीवान् बलपूर्वकं वैकुण्ठं कथं नयेत् भवान् ? प्रह्लादः अवदत्- ईदृशः को भविष्यति यो वैकुण्ठं गन्तुं न इच्छेत् ? तर्हि त्वमेव सर्वान् पृष्ट्वा ये वैकुण्ठं गन्तुम् इच्छन्ति तान् स्वीकृत्य आगच्छ इति असूचयत् देवः। ततः प्रह्लादः प्रच्छनार्थं गतवान्।
🌼 Simple Hindi Translation
पाँचवाँ पाठ: संसार का मोह
एक बार भगवान नृसिंह ने अपने परम प्रिय भक्त प्रह्लाद से कहा— "कोई भी वरदान माँग लो"। तब प्रह्लाद बोले— "हे भगवन! संसार के इन दीन-दुःखी जीवों को छोड़कर मैं अकेले मोक्ष (मुक्त होना) नहीं चाहता। कृपा करके आप इन सभी जीवों को स्वीकार कर अपने साथ वैकुण्ठ ले जाने की अनुमति प्रदान करें"।
भगवान ने कहा— "जो जीव वैकुण्ठ जाना ही नहीं चाहते, आप उन सभी को ज़बरदस्ती (बलपूर्वक) वैकुण्ठ कैसे ले जा सकते हैं?"
प्रह्लाद ने आश्चर्य से कहा— "ऐसा कौन व्यक्ति होगा जो वैकुण्ठ (परम सुख का धाम) जाना नहीं चाहेगा?" तब भगवान ने उन्हें सुझाव दिया— "तो फिर तुम स्वयं ही सभी से पूछ लो और जो भी वैकुण्ठ चलने को तैयार हों, उन्हें अपने साथ लेकर यहाँ आओ"। इसके बाद प्रह्लाद सभी से पूछने (पूछताछ करने) के लिए निकल पड़े。
📖 Word Meanings
- याचस्व — माँग लो
- त्यक्त्वा — छोड़कर
- एकाकी — अकेले
- नयेत् — ले जा सकता है
- इच्छेत् — चाहेगा
- प्रच्छनार्थम् — पूछने के लिए
💡 Meaning and Simple Explanation
इस गद्यांश में भक्त प्रह्लाद की परम परोपकारी भावना और जीवों के प्रति उनकी करुणा को दिखाया गया है। जब भगवान उन्हें मनचाहा वरदान देने को कहते हैं, तो प्रह्लाद अपने लिए कुछ न माँगकर पूरे संसार के जीवों की मुक्ति का वर माँग लेते हैं। वे सोचते हैं कि वैकुण्ठ का नाम सुनकर सब दौड़े चले आएँगे, लेकिन भगवान अंतर्यामी हैं; वे जानते हैं कि जीव संसार के झूठे दुखों और सुखों के जाल में इस कदर फंसा है कि वह परम सत्य (ईश्वर धाम) को भी ठुकरा सकता है।
✨ Main Message
सच्चे भक्त केवल अपनी मुक्ति नहीं चाहते बल्कि संपूर्ण सृष्टि के कल्याण की कामना करते हैं, परंतु जीव सांसारिक मोह के कारण मोक्ष के मार्ग को पहचान नहीं पाता।
📜 Page 2
🕉️ Original Sanskrit Text
ब्राह्मणाः उक्तवन्तः इदानीं यजमानस्य यागः करणीयः अस्ति । किञ्च पुत्रः गुरुकुलं गतवान् अस्ति, यदा सः गुरुकुलतः आगमिष्यति तदा विवाहः कारणीयः अस्ति। अतः वयम् इदानीं वैकुण्ठं गन्तुं न अभिलषामः इति। परिव्राजकाः उक्तवन्तः- वयं तु मुक्ताः एव स्मः। किन्तु शिष्याणां तत्वज्ञानं न जातम् अस्ति। अतः ते उपदेष्टव्या सन्ति अस्माभिः इति। एवम् एव राजानः राज्यस्य विषये, वणिजः वाणिज्यविषये, सेवकाः गृहविषये च उक्तवन्तः। पशु-पक्षिणः अपि स्वस्य परिवारपोषणे रताः आसन्। एवं सर्वे अपि प्राणिनः प्रह्लादेन सह वैकुण्ठं प्रति गमनं तिरस्कृतवन्तः। यद्यपि वैकुण्ठं सर्वेऽपि इच्छन्ति स्म एव, तथापि झटिति गमनाय कोऽपि उद्युक्तः न आसीत्। प्रह्लादः अन्ते एकस्य वराहस्य समीपं गतवान्। तदा वराहः अपृच्छत् वैकुण्ठे किम् अस्ति ? इति। प्रह्लादः अवदत् तत्र अनन्तः आनन्दः अस्ति इति। वराहः पुनः अपृच्छत् मम भार्यां पृच्छतु, अहं तु एकाकी गन्तुं न इच्छामि। तदा प्रह्लादः अवदत् तर्हि तान् बालकान् च आदाय चलतु । वराहस्य पत्नी वैकुण्ठगमनप्रस्तावं श्रुत्वा पृष्टवती किं तत्र अस्माभिः भोजनं प्राप्यते ? प्रह्लादः अवदत् तत्र तु बुभुक्षा एव न भवति। अतः भोजनस्य समस्या नास्ति तत्र । तदा सूकरी अवदत् यत्र बुभुक्षा न भवति तत्र गत्वा वयं रुग्णाः एव भवेम । "तत्र कोऽपि कदापि रुग्णः न भवति" इति विवृतवान् प्रह्लादः । तदा सूकरी दृढस्वरेण अवदत्- "यत्र अस्माभिः भोजनं न प्राप्येत तं देशं वयं गन्तुं न इच्छामः"। प्रह्लादः निराशतां प्राप्य भगवतः समीपं गत्वा उक्तवान्- "भगवन्! सर्वेऽपि प्राणिनः स्वस्य एव कौटुम्बिकव्यापारे मग्नाः सन्ति। वैकुण्ठं गन्तुं कोऽपि उद्युक्तः नास्ति" ।
🌼 Simple Hindi Translation
जब प्रह्लाद पूछने गए, तो ब्राह्मणों ने कहा— "इस समय हमें यजमान का यज्ञ (याग) कराना है। इसके अलावा, हमारा बेटा गुरुकुल गया हुआ है, जब वह गुरुकुल से लौटकर आएगा तो उसका विवाह कराना है। इसलिए हम अभी वैकुण्ठ जाने की इच्छा नहीं रखते"।
संन्यासियों (परिव्राजक) ने कहा— "हम तो मुक्त ही हैं। लेकिन अभी हमारे शिष्यों को तत्त्वज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है। इसलिए हमें उन्हें उपदेश देना है"। इसी प्रकार राजाओं ने अपने राज्य के काम का, व्यापारियों ने अपने व्यापार का और नौकरों ने अपने घर के कामों का बहाना बनाया। पशु-पक्षी भी अपने परिवार के पालन-पोषण में लगे हुए थे। इस प्रकार सभी प्राणियों ने प्रह्लाद के साथ वैकुण्ठ जाने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। हालांकि वैकुण्ठ जाना तो सब चाहते थे, फिर भी तुरंत (झटपट) जाने के लिए कोई भी तैयार नहीं था।
प्रह्लाद अंत में एक सूअर (वराह) के पास गए। तब सूअर ने पूछा— "वैकुण्ठ में क्या है?" प्रह्लाद ने कहा— "वहाँ असीम (अनंत) आनंद है"। सूअर ने फिर कहा— "मेरी पत्नी से पूछिए, मैं अकेला नहीं जाना चाहता"। तब प्रह्लाद ने कहा— "तो फिर अपनी पत्नी और बच्चों को भी साथ लेकर चलो"।
सूअर की पत्नी (सूकरी) ने वैकुण्ठ जाने के प्रस्ताव को सुनकर पूछा— "क्या वहाँ हमें भोजन मिलेगा?" प्रह्लाद ने उत्तर दिया— "वहाँ तो भूख (बुभुक्षा) ही नहीं लगती, इसलिए भोजन की कोई समस्या ही नहीं है"। तब सूकरी बोली— "जहाँ भूख ही नहीं लगती, वहाँ जाकर तो हम बीमार (रुग्ण) ही हो जाएँगे"। प्रह्लाद ने स्पष्ट करते हुए कहा— "वहाँ कोई भी कभी बीमार नहीं होता है"। तब सूकरी ने कड़े स्वर में कहा— "जहाँ हमें भोजन ही न मिले, हम उस देश में जाना नहीं चाहते"।
अंततः प्रह्लाद निराश हो गए और भगवान के पास लौटकर बोले— "हे भगवन! सभी प्राणी अपने-अपने पारिवारिक और सांसारिक कार्यों (कौटुम्बिकव्यापार) में डूबे हुए हैं। वैकुण्ठ जाने के लिए कोई भी तैयार नहीं है"।
📖 Word Meanings
- अभिलषामः — इच्छा रखते हैं
- परिव्राजकाः — संन्यासी / घुमंतू साधु
- वणिजः — व्यापारी
- उद्युक्तः — तैयार / तत्पर
- वराहः / सूकरी — सूअर / सुअरनी
- बुभुक्षा — भूख
- रुग्णाः — बीमार
- कौटुम्बिकव्यापारे — पारिवारिक सुख-दुख के कार्यों में
💡 Meaning and Simple Explanation
यह भाग मानव और समस्त जीव-जगत के अज्ञान व मोह का सजीव चित्रण करता है। ब्राह्मण अपने बेटे की शादी और कर्मकांड में व्यस्त हैं, संन्यासियों को अपने गुरु होने का अहंकार व चिंता है, और आम इंसान व्यापार-नौकरी में फंसे हैं। हद तो तब हो जाती है जब वराह और सूकरी परम सुख (जहाँ न भूख है, न रोग) को अपनी तुच्छ शारीरिक आदतों (विष्ठा खाने या पेट भरने) के कारण ठुकरा देते हैं। जीव कष्ट झेलकर भी इस नश्वर और दुखों से भरी दुनिया में ही रहने को अपना सौभाग्य मानता है, यही 'संसार-मोह' की माया है。
✨ Main Message
सांसारिक मोह-माया का जाल इतना गहरा है कि जीव दुखों के दलदल में रहना स्वीकार कर लेता है, परंतु अपनी आदतों और कर्तव्यों के झूठे बहानों के कारण मुक्ति के परम सुख को भी छोड़ देता है।
📝 Brief Summary
इस पाठ 'संसारमोहः' में एक अत्यंत विचारणीय कथा दी गई है, जिसमें भक्त प्रह्लाद की प्रार्थना पर भगवान नृसिंह पूरे संसार को वैकुण्ठ ले जाने को तैयार हो जाते हैं। परंतु जब प्रह्लाद संसार के प्राणियों (मनुष्यों, ब्राह्मणों, संन्यासियों और यहाँ तक कि पशु-पक्षियों) के पास जाते हैं, तो हर कोई अपने वर्तमान सांसारिक कर्तव्यों, परिवार, व्यापार और तुच्छ शारीरिक सुखों के बहानों के कारण तुरंत मुक्ति पाने के अवसर को ठुकरा देता है।
🌟 Overall Summary
यह पाठ हमें अध्यात्म के एक बहुत बड़े सच से रूबरू कराता है [0.1.10-0.1.11]। भगवान नृसिंह द्वारा प्रह्लाद को वरदान देने की बात से शुरू हुई यह कहानी बताती है कि मोक्ष या ईश्वर की प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा खुद मनुष्य या जीव का अपनी नश्वर दुनिया से अत्यधिक जुड़ाव है [0.1.10-0.1.11]। संसार के सभी प्राणी यह तो कहते हैं कि वे वैकुण्ठ (स्वर्ग/ईश्वर धाम) जाना चाहते हैं, लेकिन जब तुरंत चलने का समय आता है, तो वे अपने परिवार के पालन-पोषण, धन कमाने, शादी-ब्याह और खाने-पीने के सुखों को छोड़ना नहीं चाहते। सूअर और सूकरी का संवाद इस बात का प्रतीक है कि अज्ञानी जीव को अपनी गंदगी और सांसारिक सीमाओं में ही सुख दिखाई देता है, और वह परम आनंद के दिव्य स्वरूप को समझ ही नहीं पाता।
📌 Main Teachings
- मोह ही बंधनों का कारण है: मनुष्य दुखों से छूटना तो चाहता है, लेकिन जिन चीज़ों (परिवार, धन, वासना) के कारण दुख मिलता है, उनका त्याग करने को कभी तैयार नहीं होता।
- कल पर टालने की आदत: आध्यात्मिक कल्याण और मुक्ति की बात को हर कोई 'कल' पर टाल देता है— "अभी बेटे की शादी करनी है", "अभी व्यापार देखना है", जबकि जीवन का कोई भरोसा नहीं है।
- अज्ञानता का सुख: कई बार जीव अपनी बुरी आदतों और सीमित सोच में इतना रम जाता है (जैसे सूकरी का भोजन न मिलने के डर से वैकुण्ठ को मना करना) कि वह बड़े और वास्तविक सुखों की कल्पना भी नहीं कर पाता।
📚 Important Sanskrit Words
| Sanskrit Word | Simple Hindi Meaning |
|---|---|
वरं याचस्व | वरदान माँगो |
संसारमोहः | सांसारिक वस्तुओं और रिश्तों से लगाव / अंधा प्रेम |
बलपूर्वकम् | ज़बरदस्ती / बल के प्रयोग से |
परिव्राजकाः | सन्यासी / साधु पुरुष |
झटिति | तुरंत / शीघ्र ही |
बुभुक्षा | भूख की इच्छा / भूख लगना |
रुग्णः | बीमार / अस्वस्थ |
उद्युक्तः | तैयार होना / आगे आना |
Join the Discussion