सप्तमः पाठः — भीष्म-प्रतिज्ञा (Bhishma's Vow)
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🕉️ Original Sanskrit Text
सप्तमः पाठः
भीष्म-प्रतिज्ञा
प्रथमं दृश्यम्
स्थानं राज-भवनम्
(उदासीनः चिन्तानिमग्नश्च देवव्रतः प्रविशति)
देवव्रतः — (स्वगतम्) अहो, न जाने केन कारणेन अद्य मे पितृचरणाः चिन्ताकुला उदासीनाश्च विलोक्यन्ते। किं तेषां काचित् शारीरिकी पीड़ा अथवा किमपि मानसिकं कष्टं वर्तते। तत् अमात्यसमीपे गत्वा पितुः शोककारणं पृच्छामि। पितुश्चिन्ताया अपनयनं तस्य प्रसादनं च पुत्रस्य प्रधानं कर्तव्यं भवति ।
पिता स्वर्गः पिता धर्मः पिता हि परमं तपः ।
पितरि प्रीतिमापन्ने प्रीयन्ते सर्वदेवताः ॥
धिक् तं सुतं यः पितुरीप्सितार्थं क्षमोऽपि सन्न प्रतिपादयेद् यः ।
जातेन किं तेन सुतेन कामं पितुर्न चिन्तां हि समुद्धरेव् यः ॥
द्वितीयं दृश्यम्
स्थानम्- अमात्यभवनम्
(आयान्तं भीष्मं दृष्ट्वा)
अमात्यः — अहो, राजकुमारः देवव्रतः। आगम्यताम्, अलक्रियतामासनमिदम्।
(देवव्रतः प्रणम्य उपविशति)
राजकुमार ! कुतो नाम एतस्मिन् असमये अत्र आगमनं भवतः ?
🌼 Simple Hindi Translation
सातवाँ पाठ
भीष्म-प्रतिज्ञा
पहला दृश्य
स्थान — राजभवन
(उदासीन और चिंता में डूबे हुए देवव्रत प्रवेश करते हैं)
देवव्रत — (अपने आप से / मन ही मन) अहो! न जाने किस कारण से आज मेरे पूज्य पिता जी चिंता से व्याकुल और उदासीन दिखाई दे रहे हैं। क्या उन्हें कोई शारीरिक पीड़ा है अथवा कोई मानसिक कष्ट है? तो फिर मैं मंत्री (अमात्य) के पास जाकर पिता जी के शोक का कारण पूछता हूँ। पिता की चिंता को दूर करना और उन्हें प्रसन्न करना पुत्र का सबसे पहला और प्रधान कर्तव्य होता है।
पिता ही स्वर्ग हैं, पिता ही धर्म हैं और पिता ही सबसे श्रेष्ठ तपस्या हैं। पिता के प्रसन्न होने पर सभी देवी-देवता प्रसन्न हो जाते हैं।
उस पुत्र को धिक्कार है जो समर्थ होते हुए भी पिता की इच्छित वस्तु (इच्छा) को पूरा नहीं करता। उस पुत्र के पैदा होने से क्या लाभ जो पिता की चिंता को दूर नहीं कर सकता?
दूसरा दृश्य
स्थान — मंत्री (अमात्य) का भवन
(आते हुए देवव्रत को देखकर)
मंत्री — अहो! राजकुमार देवव्रत। आइए, इस आसन को सुशोभित कीजिए।
(देवव्रत प्रणाम करके बैठते हैं)
राजकुमार! इस असमय (अचानक) आपका यहाँ कैसे आगमन हुआ?
📖 Word Meanings
| Sanskrit Word | Simple Hindi Meaning |
|---|---|
पितृचरणाः | पूज्य पिता जी |
अपनयनम् | दूर करना |
प्रसादनम् | प्रसन्न करना |
प्रीतिमापन्ने | प्रसन्न होने पर |
ईप्सितार्थम् | इच्छित अर्थ/इच्छा को |
समुद्धरेत् | दूर करता है / उद्धार करता है |
अमात्यः | मंत्री |
अलक्रियताम् | सुशोभित कीजिए |
💡 Meaning and Simple Explanation
इस दृश्य में राजकुमार देवव्रत (जिन्हें बाद में भीष्म कहा गया) अपने पिता राजा शन्तनु को बहुत उदास और चिंतित देखते हैं। एक आदर्श पुत्र होने के नाते वे पिता की इस व्याकुलता का कारण जानने के लिए व्याकुल हो उठते हैं। वे शास्त्रों के वचनों को याद करते हैं कि पिता ही सब कुछ हैं और जो पुत्र पिता के कष्ट को दूर नहीं कर सकता, उसका जीवन व्यर्थ है। इसलिए वे तुरंत राज्य के प्रधान मंत्री (अमात्य) के पास पहुँचते हैं।
✨ Main Message
माता-पिता की सेवा और उनकी मानसिक व शारीरिक चिंताओं को दूर करना ही एक संतान का सबसे पहला और सर्वोच्च धर्म है।
📝 Brief Summary
पहले दृश्य में देवव्रत अपने पिता शन्तनु की उदासीनता से चिंतित होकर अमात्य के पास जाते हैं। वे पितृभक्ति के श्रेष्ठ श्लोकों का स्मरण करते हुए कहते हैं कि समर्थ पुत्र वही है जो पिता के कष्टों का निवारण करे।
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🕉️ Original Sanskrit Text
देवव्रतः — अमात्यवर्याः। अद्य किमपि नूतनं वृत्तं दृष्ट्वा विस्मितमानसः तत्समाधानाय भवत्समीपं समुपागतोऽस्मि ।
अमात्यः — (साश्चर्यम्) तत् किमिति ?
देवव्रतः — विद्यमानेष्वपि समस्तेषु सुखसाधनेषु न जाने अद्य केन हेतुना मम पितृपादाः दुःखिताः चिन्ताकुलचेतसश्च प्रतीयन्ते। तदेतस्य कारणमहं ज्ञातुमिच्छामि, ज्ञात्वा च तस्य प्रतीकारं कर्तुमिच्छामि ।
अमात्यः — उचितमेवैतद् भवादृशानामार्यपुत्राणाम्।
देवव्रतः — तद् यदि भवन्तः एतस्य कारणं जानन्ति तर्हि तत्प्रकाशनेन अनुग्रहीतव्योऽस्मि ।
अमात्यः — राजकुमार! बाढं जानामि। एतस्य कारणं तु आर्यपुत्र एवास्ति ।
देवव्रतः — (साश्चर्यम्) अहमेव कारणम् ? हा धिक्। तत् कथमिव ? स्पष्टं निगद्यताम्।
अमात्यः — राजकुमार! एकस्मिन् दिने महाराजः वनाविहारखेलायां यमुनानदीतीरे परिभ्रमति स्म। तदानीं दूरादेव स्वशरीरसुगन्धेन निखिलमपि वनं सुवासयन्ती एका सत्यवती नाम्नी परमसुन्दरी धीवरराजकन्या तस्य अकस्मात् दृष्टिपथं गता । ततस्तस्या अद्भुतेन रूपेण विस्मयजनकेन सुगन्धेन च मुग्धो महाराजस्तया सह विवाहं कर्तुकामस्तस्याः पितरम् अयाचत।
देवव्रतः — ततस्तेन किं कथितम् ?
अमात्यः — ततस्तेन कथितम्- महाराज ! ईदृशः सम्बन्धः कस्य अप्रियो भविष्यति परन्तु अहं भवता सह सत्यवत्याः तदैव विवाहं करिष्यामि यदा भवदनन्तरं अस्याः एव पुत्रो राजा भविष्यति इति भवान् प्रतिज्ञां कुर्यात् ।
देवव्रतः — ततो महाराजः किम् अंवोचत्?
अमात्यः — ततो महाराजः किमपि उत्तरं न दत्तवान्। ततश्च आगत्य "कथं ज्येष्ठं पुत्रं विहाय सत्यवतीसुताय राज्यं देयम् प्रतिज्ञाऽभावे च कथं सत्यवती लभ्यते" इत्येव अहर्निशं चिन्तयति। इदमेव तस्य चिन्तायाः दुःखस्य च कारणं वर्तते।
देवव्रतः — महामात्य! यदि एतावन्मात्रमेव कारणं वर्तते तर्हि सर्वथा अकिञ्चित्करमेतत्। इदानीमेव अहं तस्य अपनयनाय उपायं करोमि ।
(प्रणम्य निष्क्रान्तः)
🌼 Simple Hindi Translation
Devavrata — हे श्रेष्ठ मंत्री जी! आज कुछ नया समाचार (व्यवहार) देखकर मेरा मन आश्चर्यचकित है और उसी के समाधान के लिए मैं आपके पास आया हूँ।
मंत्री — (आश्चर्य के साथ) वह क्या बात है?
देवव्रत — सभी प्रकार के सुख-साधन मौजूद होने पर भी न जाने किस कारण से आज मेरे पूज्य पिता जी दुखी और चिंता से व्याकुल मन वाले प्रतीत हो रहे हैं। मैं इसका कारण जानना चाहता हूँ और जानकर इसका समाधान (उपाय) करना चाहता हूँ।
मंत्री — आप जैसे श्रेष्ठ पुरुषों (आर्यपुत्रों) के लिए यह बिल्कुल उचित ही है।
देवव्रत — तो यदि आप इसका कारण जानते हैं, तो उसे बताकर मुझ पर कृपा करें।
मंत्री — राजकुमार! मैं अच्छी तरह जानता हूँ। इसका कारण तो स्वयं आप ही हैं।
देवव्रत — (आश्चर्य से) मैं ही कारण हूँ? हा धिक्कार है! वह कैसे? स्पष्ट कहिए।
मंत्री — राजकुमार! एक दिन महाराज वन-विहार की क्रीड़ा में यमुना नदी के तट पर घूम रहे थे। उसी समय, दूर से ही अपने शरीर की सुगंध से पूरे वन को महकाती हुई सत्यवती नाम की एक अत्यंत सुंदर केवटराज की पुत्री (धीवरराजकन्या) अचानक उनकी नजरों के सामने आई। तब उसके अद्भुत रूप और विस्मयकारी सुगंध पर मुग्ध होकर महाराज ने उसके साथ विवाह करने की इच्छा से उसके पिता से उसका हाथ माँगा।
देवव्रत — तब उसने (सत्यवती के पिता ने) क्या कहा?
मंत्री — तब उसने कहा— 'महाराज! ऐसा संबंध किसे प्रिय नहीं होगा, परंतु मैं आपके साथ सत्यवती का विवाह तभी करूँगा जब आप यह प्रतिज्ञा करें कि आपके बाद इसी का पुत्र राजा बनेगा।'
देवव्रत — तब महाराज ने क्या कहा?
मंत्री — तब महाराज ने कोई उत्तर नहीं दिया। और तब से वापस आकर वे रात-दिन (अहर्निशम्) यही सोच रहे हैं कि— "कैसे बड़े पुत्र (देवव्रत) को छोड़कर सत्यवती के पुत्र को राज्य दे दूँ, और प्रतिज्ञा के बिना सत्यवती कैसे प्राप्त हो?" यही उनकी चिंता और दुख का कारण है।
देवव्रत — महामात्य! यदि केवल इतना ही कारण है, तो यह बिल्कुल छोटी (तुच्छ) बात है। मैं अभी इसे दूर करने का उपाय करता हूँ।
(प्रणाम करके बाहर निकल जाते हैं)
📖 Word Meanings
| Sanskrit Word | Simple Hindi Meaning |
|---|---|
वृत्तम् | समाचार / घटना |
प्रतीकारम् | उपाय / समाधान |
बाढम् | हाँ / अच्छी तरह से |
धीवरराजकन्या | केवटराज (मछआरों के राजा) की पुत्री |
कर्तुकामः | करने की इच्छा रखने वाले |
अयाचत | माँगा |
अहर्निशम् | रात-दिन |
अकिञ्चित्करम् | तुच्छ / बहुत छोटी बात |
💡 Meaning and Simple Explanation
इस दृश्य में देवव्रत को पता चलता है कि उनके पिता की चिंता का कारण कोई बाहरी संकट नहीं, बल्कि उनका आंतरिक प्रेम और धर्मसंकट है। राजा शन्तनु सत्यवती से विवाह करना चाहते हैं, लेकिन सत्यवती के पिता की शर्त है कि देवव्रत का उत्तराधिकार छीनकर सत्यवती के पुत्र को दिया जाए। राजा अपने ज्येष्ठ और गुणी पुत्र देवव्रत के साथ ऐसा अन्याय नहीं करना चाहते, इसलिए वे घुट-घुट कर जी रहे हैं। देवव्रत बिना किसी हिचकिचाहट के कहते हैं कि पिता की खुशी के सामने राज्य का यह अधिकार बहुत छोटी बात है और वे खुद इसे सुलझाएंगे।
✨ Main Message
एक सच्चा और आज्ञाकारी पुत्र पिता के सुख के लिए अपने बड़े से बड़े अधिकारों (जैसे राज्य का उत्तराधिकार) को भी सहर्ष छोड़ने के लिए तत्पर रहता है।
📝 Brief Summary
मंत्री देवव्रत को बताते हैं कि राजा शन्तनु धीवरराज की पुत्री सत्यवती से विवाह करना चाहते हैं, परंतु धीवरराज की शर्त है कि सत्यवती का पुत्र ही राजा बने। देवव्रत इसे छोटी बात मानकर स्वयं धीवरराज से मिलने निकल पड़ते हैं।
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🕉️ Original Sanskrit Text
तृतीयं दृश्यम्
(वने धीवरराजस्य समीपे देवव्रतस्य गमनं भवति, धीवरः जलनिरीक्षण-परायणस्तिष्ठति )
धीवरः — (देवव्रतं दृष्ट्वा स्वगतम्) अहो तेजस्विता अस्य कुमारस्य। (प्रकटम्) कुमार ! भवतः परिचयम् आगमनकारणं च ज्ञातुमिच्छामि ।
देवव्रतः — दाशराज ! महाराजस्य शन्तनोः प्रियः पुत्रोऽहं देवव्रतनामा। इदं च मम आगमनकारणम्। अस्ति काचित् भवतो दुहिता सत्यवती नाम परमसुन्दरी।
धीवरः — आम्, अस्ति एका।
देवव्रतः — तया सह विवाहार्थम् अस्माकं तातपांदाः चिन्ताकुलाः सन्ति। तद् भवान् सत्यवतीप्रदानेन महाराजं चिन्तामुक्तं करोतु इति निवेदनं कर्तुम् अहं भवतः समीपमुपागतोऽस्मि ।
धीवरः — महाराजकुमार ! भवतः पितुश्चिन्ताया अपनयनस्य उपायस्तु भवतामेव हस्ते वर्तते।
देवव्रतः — तत् कथमिव ?
धीवरः — यतो हि महराजशन्तनोः पश्चात् सत्यवतीपुत्र एव यदा राज्याधिकारी भविष्यति तदैव अहं तस्या महाराजेन सह विवाहं करिष्यामि इति मे प्रतिज्ञा अस्ति। भवन्तश्च महाराजस्य ज्येष्ठपुत्रा इति धर्मत एव राज्या अधिकारिणः । तत् कथमहं सत्यवतीपुत्रस्य राज्यलाभं सम्भावयामि ? इयमेव सत्यवतीप्रदाने महती बाधा अस्ति।
देवव्रतः — सदार्यम् ! दाशराज! इयं काचिद् बाधा नास्ति। भवतः प्रतिज्ञापूरणाय अहं बद्धपरिकरोऽस्मि । महाराजानन्तरं सत्यवतीपुत्र एव राज्याधिकारी भविष्यति इत्यहं शतशः सर्वषां पुरस्तात् उद्घोषयाम। तद् भवान् निर्भयो भूत्वा विवाहाय कृतनिश्चयो भवतु।
धीवरः — सत्यमेतत्। नास्ति भवतः प्रतिज्ञायां मम संदेहलेशोऽपि। परन्तु भवदनन्तरं यदि भवतः कश्चित् पुत्रो भवत्प्रतिज्ञाभङ्ग कुर्यात् तर्हि सत्यवतीपुत्रस्य का गतिः भविष्यति ?
देवव्रतः — अस्तु नाम, इममपि भवतो भयं सन्देहं च अहं निवारयामि। सत्यवतीसूनुरेव राज्याधिकारी भविष्यति इति पूर्वमेव प्रतिज्ञातं मया। तथापि यदि ते मनसि एतादृशी आशङ्का वर्तते तर्हि पुनरपि अहं भीषणं प्रणं करोमि यत् अहं कदापि विवाहं न करिष्यामि, आजीवनं च अखण्डितं ब्रह्मचर्यव्रतं धारयिष्यामि।
🌼 Simple Hindi Translation
तीसरा दृश्य
(वने धीवरराजस्य समीपे देवव्रतस्य गमनं भवति, धीवरः जलनिरीक्षण-परायणस्तिष्ठति )
धीवरः — (देवव्रतं दृष्ट्वा स्वगतम्) अहो तेजस्विता अस्य कुमारस्य। (प्रकटम्) कुमार ! भवतः परिचयम् आगमनकारणं च ज्ञातुमिच्छामि ।
देवव्रतः — दाशराज ! महाराजस्य शन्तनोः प्रियः पुत्रोऽहं देवव्रतनामा। इदं च मम आगमनकारणम्। अस्ति काचित् भवतो दुहिता सत्यवती नाम परमसुन्दरी।
धीवरः — आम्, अस्ति एका।
देवव्रतः — तया सह विवाहार्थम् अस्माकं तातपांदाः चिन्ताकुलाः सन्ति। तद् भवान् सत्यवतीप्रदानेन महाराजं चिन्तामुक्तं करोतु इति निवेदनं कर्तुम् अहं भवतः समीपमुपागतोऽस्मि ।
धीवरः — महाराजकुमार ! भवतः पितुश्चिन्ताया अपनयनस्य उपायस्तु भवतामेव हस्ते वर्तते।
देवव्रतः — तत् कथमिव ?
धीवरः — यतो हि महराजशन्तनोः पश्चात् सत्यवतीपुत्र एव यदा राज्याधिकारी भविष्यति तदैव अहं तस्या महाराजेन सह विवाहं करिष्यामि इति मे प्रतिज्ञा अस्ति। भवन्तश्च महाराजस्य ज्येष्ठपुत्रा इति धर्मत एव राज्या अधिकारिणः । तत् कथमहं सत्यवतीपुत्रस्य राज्यलाभं सम्भावयामि ? इयमेव सत्यवतीप्रदाने महती बाधा अस्ति।
देवव्रतः — सदार्यम् ! दाशराज! इयं काचिद् बाधा नास्ति। भवतः प्रतिज्ञापूरणाय अहं बद्धपरिकरोऽस्मि । महाराजानन्तरं सत्यवतीपुत्र एव राज्याधिकारी भविष्यति इत्यहं शतशः सर्वषां पुरस्तात् उद्घोषयाम। तद् भवान् निर्भयो भूत्वा विवाहाय कृतनिश्चयो भवतु।
धीवरः — सत्यमेतत्। नास्ति भवतः प्रतिज्ञायां मम संदेहलेशोऽपि। परन्तु भवदनन्तरं यदि भवतः कश्चित् पुत्रो भवत्प्रतिज्ञाभङ्ग कुर्यात् तर्हि सत्यवतीपुत्रस्य का गतिः भविष्यति ?
देवव्रतः — अस्तु नाम, इममपि भवतो भयं सन्देहं च अहं निवारयामि। सत्यवतीसूनुरेव राज्याधिकारी भविष्यति इति पूर्वमेव प्रतिज्ञातं मया। तथापि यदि ते मनसि एतादृशी आशङ्का वर्तते तर्हि पुनरपि अहं भीषणं प्रणं करोमि यत् अहं कदापि विवाहं न करिष्यामि, आजीवनं च अखण्डितं ब्रह्मचर्यव्रतं धारयिष्यामि।
🌼 Simple Hindi Translationतीसरा दृश्य
(जंगल में धीवरराज के पास देवव्रत जाते हैं, धीवर जल को देखने में मग्न खड़ा है) धीवर — (देवव्रत को देखकर अपने मन में) अहो! इस कुमार की तेजस्विता तो देखो। (प्रकट रूप में) कुमार! मैं आपका परिचय और यहाँ आने का कारण जानना चाहता हूँ। देवव्रत — हे दाशराज (केवटराज)! मैं महाराज शन्तनु का प्रिय पुत्र देवव्रत हूँ। और मेरे यहाँ आने का कारण यह है कि आपकी सत्यवती नाम की एक अत्यंत सुंदर पुत्री है। धीवर — हाँ, है। देवव्रत — उसके साथ विवाह करने के लिए हमारे पूज्य पिता जी चिंता से व्याकुल हैं। इसलिए आप सत्यवती का कन्यादान करके महाराज को चिंतामुक्त करें, यही निवेदन करने मैं आपके पास आया हूँ। धीवर — महाराजकुमार! आपके पिता की चिंता दूर करने का उपाय तो स्वयं आपके ही हाथों में है। देवव्रत — वह कैसे? धीवर — क्योंकि मेरी यह प्रतिज्ञा है कि महाराज शन्तनु के बाद सत्यवती का पुत्र ही जब राज्य का उत्तराधिकारी बनेगा, तभी मैं उसका विवाह महाराज से करूँगा। और आप महाराज के बड़े पुत्र हैं, इसलिए धर्म के अनुसार आप ही राज्य के अधिकारी हैं। तो फिर मैं सत्यवती के पुत्र को राज्य मिलने की संभावना कैसे करूँ? यही सत्यवती को सौंपने में सबसे बड़ी बाधा है। देवव्रत — हे दाशराज! यह कोई बाधा नहीं है। आपकी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए मैं कमर कस चुका हूँ (बद्धपरिकर हूँ)। महाराज के बाद सत्यवती का पुत्र ही राजा बनेगा, यह मैं सबके सामने सौ-सौ बार घोषणा करता हूँ। इसलिए आप निडर होकर विवाह का निश्चय कीजिए। धीवर — यह सच है। आपकी प्रतिज्ञा पर मुझे रत्ती भर भी संदेह नहीं है। परंतु आपके बाद यदि आपका कोई पुत्र आपकी इस प्रतिज्ञा को तोड़ दे, तो सत्यवती के पुत्र की क्या गति (स्थिति) होगी? देवव्रत — ठीक है, मैं आपके इस डर और संदेह को भी दूर कर देता हूँ। सत्यवती का पुत्र ही राजा बनेगा, यह तो मैंने पहले ही प्रतिज्ञा कर ली है। फिर भी यदि आपके मन में ऐसी शंका है, तो मैं पुनः एक भीषण प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं कभी विवाह नहीं करूँगा और आजीवन अखंड ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करूँगा।
📖 Word Meanings
- दुहिता — पुत्री / बेटी
- तातपादाः — पूज्य पिता जी
- बद्धपरिकरः — कमर कस लेना / पूरी तरह तैयार होना
- पुरस्तात् — सामने / समक्ष
- संदेहलेशः — थोड़ा सा भी संदेह
- भीषणं प्रणम् — अत्यंत कठोर प्रतिज्ञा
- आजीवनम् — जीवन भर
💡 Meaning and Simple Explanation
देवव्रत स्वयं सत्यवती के पिता धीवरराज के पास जाते हैं और पिता के लिए उनका हाथ माँगते हैं। धीवरराज अपनी शर्त बताते हैं कि वे अपनी बेटी तभी देंगे जब उसका बेटा राजा बने। देवव्रत तुरंत अपना राज्य का अधिकार छोड़ देते हैं। लेकिन धीवरराज भविष्य की सुरक्षा को लेकर और अधिक सशंक हैं; वे कहते हैं कि कल को देवव्रत के बच्चे अधिकार मांग सकते हैं। पिता की प्रतिज्ञा और सुख को पूर्ण अकाट्य बनाने के लिए देवव्रत इतिहास का सबसे कठोर निर्णय लेते हैं—वे आजीवन अविवाहित रहने का भीषण संकल्प ले लेते हैं।
✨ Main Message
सच्ची प्रतिज्ञा और त्याग वह है जो आने वाली पीढ़ियों के संशय को भी समाप्त कर दे। देवव्रत का यह त्याग निःस्वार्थ प्रेम की पराकाष्ठा है।
📝 Brief Summary
देवव्रत धीवरराज के पास जाकर सत्यवती का हाथ माँगते हैं। धीवरराज द्वारा अपने भावी दौहित्र (नाती) के राज्य की सुरक्षा पर शंका करने पर, देवव्रत न केवल राज्य का त्याग करते हैं, बल्कि आजीवन विवाह न करने की भीषण प्रतिज्ञा भी ले लेते हैं।
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🕉️ Original Sanskrit Text
अद्य प्रभृति मे वाश ! ब्रह्मचर्यं भविष्यति । अपुत्रस्यापि मे लोका भविष्यन्त्यया दिवि ॥ अपि च- परित्यजेवं त्रैलोक्यं राज्यं वेवेषु या पुन । यद्वाऽप्यधिकमेताभ्यां न तु सत्यं कदाचन ।। त्यजेच्च पृथिवी गन्धम् आपश्च रसमात्मनः । ज्योतिस्तथा त्यजेद् रूपं वायुः स्पर्शगुणं त्यजेत् ॥ प्रभां समुत्सृजेदर्को धूमकेतुस्तथोष्मताम् त्यजेत् शब्दं तथाऽकाशः सोमः शीतांशुतां त्यजेत् ॥ विक्रमं वृत्रहा जह्यात् धर्मं जह्याच्च धर्मराट् । न त्वहं सत्यमुत्त्रष्टुं व्यवसेयं कथञ्चन ॥
(नेपथ्ये साधुवादः आकाशात् पुष्पवृष्टिश्च भवति) धीवरः — (बद्धाञ्जलिः) अहो राजकुमार ! धन्योऽसि, आदर्शपुत्रोऽसि। भवादृशैरेव पुत्रैः इयं भारतवसुन्धरा आत्मानं धन्यधन्यां मनुते। महानुभाव। गम्यतामिदानीम्। अचिरादेव अहं महाराजस्य मनोरथं पूरयामि।
🌼 Simple Hindi Translation
आज से लेकर मेरा यह ब्रह्मचर्य व्रत अटल रहेगा। पुत्र न होने पर भी (आकाश में/स्वर्ग में) मुझे उत्तम लोकों की प्राप्ति होगी।
और भी सुनो— मैं तीनों लोकों के राज्य को, या देवताओं के वैभव को, अथवा इनसे भी बढ़कर यदि कुछ हो तो उसे भी छोड़ सकता हूँ, लेकिन अपने सत्य (वचन) को कभी नहीं छोड़ सकता।
भले ही पृथ्वी अपनी सुगंध छोड़ दे, पानी अपने रस (स्वाद) का त्याग कर दे, अग्नि (ज्योति) अपना रूप छोड़ दे और वायु अपने स्पर्श के गुण को छोड़ दे;
सूर्य अपनी चमक (प्रभा) छोड़ दे, अग्नि (धूमकेतु) अपनी उष्णता (गर्मी) छोड़ दे, आकाश शब्द का त्याग कर दे और चंद्रमा अपनी शीतलता को छोड़ दे;
इंद्र (वृत्रहा) अपने पराक्रम को छोड़ दें और स्वयं यमराज (धर्मराट्) अपने धर्म का त्याग कर दें; परंतु मैं किसी भी प्रकार से अपने दिए हुए सत्य वचन का परित्याग करने का विचार कभी नहीं करूँगा।
(परदे के पीछे से / आकाश से 'साधु-साधु' की ध्वनि और पुष्पवर्षा होती है) धीवर — (हाथ जोड़कर) अहो राजकुमार! आप धन्य हैं, आप एक आदर्श पुत्र हैं। आप जैसे पुत्रों से ही यह भारत भूमि स्वयं को परम धन्य मानती है। हे महानुभाव! अब आप पधारिए। मैं बहुत जल्द ही महाराज की मनोकामना को पूर्ण करूँगा (सत्यवती को भेजूँगा)।
📖 Word Meanings
| Sanskrit Word | Simple Hindi Meaning |
|---|---|
अद्य प्रभृति | आज से लेकर |
दिवि | स्वर्ग में / आकाश में |
त्रैलोक्यम् | तीनों लोकों का |
अर्को | सूर्य |
शीतांशुताम् | शीतलता (चंद्रमा की किरणें) |
वृत्रहा | इंद्र (वृत्र नामक असुर का वध करने वाले) |
नेपथ्ये | परदे के पीछे से |
अचिरादेव | बहुत शीघ्र ही / तुरंत |
💡 Meaning and Simple Explanation
देवव्रत के मुख से निकले ये श्लोक उनकी अटल प्रतिज्ञा और सत्य के प्रति अगाध निष्ठा को दर्शाते हैं। वे कहते हैं कि प्रकृति के पाँचों तत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) और स्वयं बड़े-बड़े देवता (इंद्र, यमराज) अपने प्राकृतिक गुणों और धर्म को छोड़ सकते हैं, लेकिन देवव्रत अपने मुख से निकले वचन को कभी नहीं बदलेगा। उनकी इस अलौकिक पितृभक्ति और भीषण संकल्प को देखकर आकाश से देवता भी पुष्पों की वर्षा करते हैं और केवटराज नतमस्तक हो जाते हैं। इसी भीषण प्रतिज्ञा के कारण उनका नाम इतिहास में 'भीष्म' पड़ा।
✨ Main Message
सत्य और प्रतिज्ञा का पालन ही मनुष्य के चरित्र की सर्वोच्च कसौटी है। प्रकृति के नियम बदल सकते हैं, लेकिन एक महान पुरुष का वचन कभी नहीं बदलता।
📝 Brief Summary
देवव्रत श्लोकों के माध्यम से घोषणा करते हैं कि संपूर्ण प्रकृति भले ही अपने नियम बदल दे, पर वे अपनी प्रतिज्ञा से कभी पीछे नहीं हटेंगे। उनके इस अदम्य संकल्प को देखकर आकाश से पुष्पवर्षा होती है और धीवरराज आदरपूर्वक विवाह के लिए तैयार हो जाते हैं।
🌟 Overall Summary
यह संपूर्ण नाटक महाराज शन्तनु के जेष्ठ पुत्र राजकुमार देवव्रत की अनुपम पितृभक्ति और उनके द्वारा ली गई 'भीष्म-प्रतिज्ञा' के ऐतिहासिक प्रसंग को उजागर करता है। जब देवव्रत को पता चलता है कि उनके पिता सत्यवती से विवाह की इच्छा के कारण और धीवरराज की कठोर शर्तों के कारण मानसिक दुख झेल रहे हैं, तो वे स्वयं के सुख और राज्य के समस्त अधिकारों को तिलांजलि देने का निर्णय लेते हैं। वे न केवल अपने छोटे भाई (सत्यवती के पुत्र) के पक्ष में राज्य का परित्याग करते हैं, बल्कि धीवरराज के मन के अंतिम संशय को मिटाने के लिए आजीवन अखंड ब्रह्मचर्य का पालन करने का भीषण संकल्प लेते हैं। उनकी इस अलौकिक प्रतिज्ञा से चराचर जगत कांप उठता है, देवता पुष्पवर्षा करते हैं और वे इतिहास में 'भीष्म' के नाम से अमर हो जाते हैं।
📌 Main Teachings
- सर्वोच्च पितृभक्ति (Filial Piety): माता-पिता की इच्छा और मानसिक शांति के लिए संतान को अपने व्यक्तिगत सुखों और बड़े से बड़े पदों (जैसे हस्तिनापुर का सिंहासन) का त्याग करने में संकोच नहीं करना चाहिए।
- वचन और सत्य की अडिगता (Uncompromising Truth): एक बार जब धर्म और न्याय के मार्ग पर कोई प्रतिज्ञा ले ली जाए, तो संपूर्ण ब्रह्मांड की विपरीत परिस्थितियों में भी उस पर स्थिर रहना ही महानता है।
- स्वार्थहीन आचरण (Selflessness): समाज और परिवार में शांति व न्याय की स्थापना के लिए जब व्यक्ति अपने अधिकारों का स्वेच्छा से त्याग करता है, तो वह इतिहास में अमर और पूजनीय बन जाता है।
📚 Important Sanskrit Words
| Sanskrit Word | Simple Hindi Meaning |
|---|---|
अपनयनम् | किसी संकट या चिंता को दूर करना |
अहर्निशम् | दिन और रात निरंतर |
बद्धपरिकरः | किसी कार्य के लिए पूरी तरह कमर कस लेना |
भीषणं प्रणम् | अत्यंत कठोर और न टूटने वाली प्रतिज्ञा |
अद्य प्रभृति | आज के दिन से लेकर हमेशा के लिए |
अकिञ्चित्करम् | अत्यंत छोटी, नगण्य या तुच्छ बात |
वृत्रहा | देवराज इंद्र का एक नाम |
अचिरादेव | बिना किसी विलंभ के, बहुत जल्दी |
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