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🕉️ Original Sanskrit Text
चतुर्दशः पाठः वणिजः कृपणता
कस्मिंश्चित् ग्रामे कश्चन् वणिक आसीत्। सः अतीव कृपणः। कदाचित् सः वाणिज्यनिमित्तं पार्श्वस्थं नगरं गतवान् आसीत्। तत्र वाणिज्यं समाप्य गृहं प्रत्यागतः सः यदा स्वस्य कोष्ठं पश्यति तदा तेन ज्ञातं यत् तत्र स्थापितः धनस्यूतः एव न आसीत्। तस्मिन् दिने वाणिज्यतः प्राप्तानि चतुस्सहस्ररूप्यकाणि तत्र आसन्। सः सम्यक् स्मृतवान् यत् ग्रामप्राप्तिपर्यन्तमपि कोषे स धनस्यूतः आसीदेव इति । अतः ग्रामे एव सः पतितः केनापि प्राप्तः स्यात् इति। सः ग्रामप्रमुखस्य समीपं गत्वा तं निवेदितवान् यत् एतद्विषये ग्रामे घोषणा करणीया इति।
तदनुसारं ग्रामे सडिण्डिमं घोषणा कारिता यत् 'यः तं धनस्यूतम् अन्विष्य आनीय ददाति तस्मै चतुश्शतं रूप्यकाणि पारितोषिकरूपेण दीयन्ते' इति।
संयोगेन काचित् वृद्धा तं धनस्यूतं प्राप्तवती आसीत्। किन्तु भीता सा चिन्तितवती यत् यदि एतं विचारम् अन्यान् वदामि तर्हि जनाः मया एव चौर्यं कृतम् इति चिन्तयन्ति इति। तदा एव सा घोषणां श्रुतवती। निश्चिन्तभावेन ग्रामप्रमुखस्य समीपं गत्वा तस्मै धनस्यूतं समर्पितवती। उक्तवती च यत् “देवालयतः आगमनमार्ग मया एषः धनस्यूतः प्राप्तः। मया अत्र किमस्ति इत्यपि न दृष्टम्। घोषणां श्रुत्वा झटिति आगतवती अस्मि । एतस्य स्वामिने एतं ददातु इति।
ग्रामप्रमुखः तस्याः सत्यनिष्ठया सन्तुष्टः अभवत्। सः वृद्धाम् अभिनन्द्य तं वणिजम् आनेतुं सेवकं प्रेषितवान्। एतां वार्ताः ज्ञात्वा नितरां सन्तुष्टः वणिक् धावन् एव तत्र आगतवान्।
तस्मै स्यूतं समर्पयन् ग्रामप्रमुखः अवदत्- “एषा महोदया धन्यवादार्हा। इदानीं भवदीयं कर्तव्यम् अस्ति यत् एतस्यै चतुश्शतरूप्यकाणि दातव्यानि इति।
एतत् श्रुत्वा कृपणः चिन्तितवान्- “मदीयं धनं प्राप्तमेव। तन्मध्ये चतुश्शतरूप्यकाणि कुतः दातव्यानि …..? केनापि उपायेन तानि अपि सञ्चिनोमि इति।
🌼 Simple Hindi Translation
चौदहवाँ पाठ: व्यापारी की कंजूसी
किसी गाँव में कोई एक व्यापारी (वणिक्) रहता था। वह बहुत अधिक कंजूस (कृपणः) था। एक बार वह व्यापार के सिलसिले में पास के शहर गया हुआ था। वहाँ व्यापार का काम समाप्त कर जब वह घर लौटा और अपने कमरे (कोष्ठम्) को देखा, तो उसे पता चला कि वहाँ रखा हुआ पैसों का थैला (धनस्यूतः) गायब था। उस दिन व्यापार से मिले चार हजार (4,000) रुपये उस थैले में थे। उसे अच्छी तरह याद था कि गाँव पहुँचने तक वह पैसों का थैला उसकी जेब (कोषः) में सुरक्षित था। इसलिए वह गाँव में ही कहीं गिर गया होगा और किसी को मिल गया होगा। उसने गाँव के मुखिया (ग्रामप्रमुख) के पास जाकर निवेदन किया कि इस बारे में गाँव में मुनादी (घोषणा) करवा दी जाए।
मुखिया के आदेशानुसार गाँव में ढोल पिटवाकर (सडिण्डिमम्) घोषणा करवाई गई कि— "जो कोई भी उस पैसों के थैले को ढूँढ़कर लाएगा, उसे पुरस्कार के रूप में चार सौ (400) रुपये दिए जाएँगे"।
संयोग से एक बूढ़ी औरत (वृद्धा) को वह पैसों का थैला मिला था। लेकिन वह डरी हुई थी और सोच रही थी कि यदि यह बात दूसरों को बताएगी, तो लोग सोचेंगे कि उसी ने चोरी की है। तभी उसने वह मुनादी सुनी। वह निश्चिंत होकर गाँव के मुखिया के पास गई और उन्हें वह पैसों का थैला सौंप दिया। उसने कहा— "मंदिर से लौटते समय रास्ते में मुझे यह पैसों का थैला मिला। मैंने यह भी नहीं देखा कि इसके अंदर क्या है। घोषणा सुनते ही मैं तुरंत यहाँ आ गई हूँ। इसके मालिक को यह थैला सौंप दीजिए"।
ग्राम प्रधान (मुखिया) उसकी ईमानदारी (सत्यनिष्ठा) से बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने उस वृद्ध महिला की सराहना की और व्यापारी को बुलाने के लिए एक सेवक भेजा। यह समाचार मिलते ही बहुत खुश हुआ व्यापारी दौड़ता हुआ वहाँ पहुँच गया।
उसे थैला सौंपते हुए मुखिया ने कहा— "ये महिला धन्यवाद की पात्र हैं। अब आपका यह कर्तव्य है कि इन्हें पुरस्कार के चार सौ रुपये दिए जाएँ"।
यह सुनकर उस कंजूस व्यापारी ने मन ही मन सोचा— "मेरा धन तो मुझे मिल ही गया है। अब इसके बीच में से चार सौ रुपये क्यों दिए जाएँ? किसी न किसी उपाय से मैं उन रुपयों को भी बचा (सञ्चिनोमी) लेता हूँ"।
📖 Word Meanings
- वणिक् — व्यापारी / बनिया
- कृपणः — बेहद कंजूस
- धनस्यूतः — धन का थैला / पैसों का बैग
- चतुस्सहस्र — चार हजार (4,000)
- सडिण्डिमम् — ढोल बजाकर / मुनादी करके
- पारितोषिकरूपेण — पुरस्कार या इनाम के तौर पर
- झटिति — तुरंत / शीघ्र
- चतुश्शतम् — चार सौ (400)
- सञ्चिनोमि — इकट्ठा कर लेता हूँ / बचा लेता हूँ
💡 Meaning and Simple Explanation
इस गद्यांश में एक लालची व्यापारी और एक अत्यंत ईमानदार निर्धन वृद्ध महिला का चरित्र दिखाया गया है। व्यापारी के चार हजार रुपये खो जाते हैं, जिसे ढूँढ़ने वाले को वह चार सौ रुपये इनाम देने का वादा करता है। एक बूढ़ी औरत को वह थैला मिलता है, जो बिना किसी लालच के उसे मुखिया को सौंप देती है। लेकिन जब पैसों को सुरक्षित पाकर व्यापारी का लालच दोबारा जाग जाता है, तो वह वादे के अनुसार इनाम की राशि देने से बचने के उपाय सोचने लगता है।
✨ Main Message
कंजूस और लोभी व्यक्ति का स्वभाव ऐसा होता है कि संकट टलते ही वह उपकार करने वाले के प्रति भी कृतघ्न हो जाता है और अपना धन बचाने के लिए कुटिल युक्तियाँ सोचने लगता है।
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🕉️ Original Sanskrit Text
तस्य मनसि एकः उपायः स्फुरितः। सः तं धनस्यूतं उद्धाट्य सर्वेषां पुरतः धनं गणितवान्। अनन्तरम् उक्तवान् यत्- अस्मिन् धनस्यूते चतुश्शताधिकचतुस्सहस्ररूप्यकाणि आसन्। इदानीं तु चतुस्सहस्ररूप्यकाणि एव सन्ति। अवश्यम् एतया वृद्धया एव तानि रूप्यकाणि स्वीकृतानि सन्ति। उपायनराशिं सा स्वयमेव स्वीकृतवती अस्ति इति।
वणिजः मिथ्यारोपेण हतप्रभा जाता सा वृद्धा। दुःखेन सा उक्तवती— "भोः, नाहम् असत्यं वदामि। धनस्यूतः न मया उद्घाटितः। यदि तत् धनं चोरणीयम् इति मम इच्छा स्यात् तर्हि किमर्थम् अत्र आगत्य धनस्यूतं दद्याम् ……….." इति।
ग्रामप्रमुखः ज्ञातवान् यत् 'अयं वणिक् न केवलं कृपणः, अपि तु असत्यवादी शठः अपि' इति। अतः सः किञ्चित् विचिन्त्य उक्तवान्- "भवता पूर्वमेव वक्तव्यम् आसीत् यत् धनस्यूते 4,400 रूप्यकाणि आसन् इति" इति।
वणिक् उक्तवान्- "अहं विस्मृतवान् तदा" इति। एतत् श्रुत्वा ग्रामप्रमुखः क्रोधेन— "एवं चेत् भवान् असस्य धनस्यूतस्य स्वामी नैव। अद्य एव ममापि धनस्यूतः नष्टः। तत्र तु 4000 रूप्यकाणि एव आसन्। अतः एषः मम एव धनस्यूतः" इति उक्त्वा तं धनस्यूतं स्वीकृतवान् ।
स्वीयया दुराशया प्राप्तमपि धनं पुनः हस्तच्युतं ज्ञात्वा सः लुब्ध वणिक् विलापम् अकरोत्।
🌼 Simple Hindi Translation
उसके दिमाग में एक तरकीब (उपाय) आई। उसने सबके सामने उस पैसों के थैले को खोला और रुपयों को गिना। इसके बाद वह झूठ बोलते हुए बोला— "इस थैले में चार हजार चार सौ (4,400) रुपये थे। लेकिन अभी इसमें केवल चार हजार रुपये ही हैं। निश्चित रूप से इस बुढ़िया ने ही वे चार सौ रुपये पहले ही निकाल लिए हैं। इसने अपनी पुरस्कार की राशि स्वयं ही ले ली है"।
व्यापारी के इस झूठे आरोप (मिथ्यारोपेण) से वह वृद्ध महिला सन्न (हतप्रभ) रह गई। उसने अत्यंत दुखी होकर कहा— "हे महानुभाव! मैं झूठ नहीं बोल रही हूँ। मैंने थैले को खोलकर भी नहीं देखा। यदि मेरी इच्छा इस धन को चुराने की होती, तो मैं खुद यहाँ आकर यह पैसों का थैला क्यों सौंपती?"
गाँव के बुद्धिमान मुखिया समझ गए कि यह व्यापारी न केवल महाकंजूस है, बल्कि झूठा और दुष्ट (शठः) भी है। इसलिए उन्होंने कुछ सोचकर चालाकी से कहा— "आपको यह बात पहले ही बतानी चाहिए थी कि थैले में 4,400 रुपये थे"।
व्यापारी ने अपनी चोरी छिपाने के लिए कहा— "मैं उस समय यह बताना भूल गया था"। यह सुनकर मुखिया ने क्रोध का नाटक करते हुए कहा— "यदि ऐसा है, तो आप इस थैले के असली मालिक हैं ही नहीं। आज ही मेरा भी एक पैसों का थैला खोया है, जिसमें ठीक 4,000 रुपये ही थे। इसलिए यह पैसों का थैला मेरा ही है"— ऐसा कहकर उन्होंने वह थैला अपने पास रख लिया।
अपने खुद के लालच (दुराशया) के कारण हाथ में आया हुआ धन भी दोबारा हाथ से निकल जाने (हस्तच्युतम्) पर वह लालची (लुब्धः) व्यापारी ज़ोर-ज़ोर से रोने और विलाप करने लगा।
📖 Word Meanings
- स्फुरितः — सूझा / दिमाग में आया
- मिथ्यारोपेण — झूठे लांछन या आरोप के द्वारा
- हतप्रभा — भौंचक्की / अवाक रह जाना
- शठः — धूर्त / चालाक / दुष्ट व्यक्ति
- हस्तच्युतम् — हाथ से फिसल जाना या निकल जाना
- लुब्धः — लोभी / लालची व्यक्ति
- विलापम् अकरोत् — रोने-बिलखने लगा
💡 Meaning and Simple Explanation
यह कहानी का सबसे मज़ेदार और शिक्षाप्रद मोड़ है। व्यापारी इनाम के 400 रुपये बचाने के लिए बुढ़िया पर चोरी का झूठा इल्जाम लगाता है कि थैले में पहले 4,400 रुपये थे। लेकिन मुखिया उसकी चालाकी को ताड़ जाते हैं और उसी के बुने हुए जाल में उसे फंसा देते हैं। वे कहते हैं कि चूँकि तुम्हारे थैले में 4,400 रुपये थे और इस थैले में सिर्फ 4,000 हैं, इसलिए यह थैला तुम्हारा नहीं बल्कि मेरा है। इस प्रकार व्यापारी का पूरा धन उसके अपने ही झूठ के कारण छिन जाता है।
✨ Main Message
अत्यधिक लालच और चालाकी का परिणाम हमेशा बुरा होता है; जो व्यक्ति दूसरों का हक मारने के लिए झूठ का सहारा लेता है, वह अपना सब कुछ गँवा बैठता है।
📝 Brief Summary
इस पाठ 'वणिजः कृपणता' में एक लालची व्यापारी और एक ईमानदार वृद्धा की कहानी है [0.1.20-0.1.21]। व्यापारी का 4,000 रुपयों का थैला खो जाने पर एक वृद्धा उसे लौटाती है [0.1.20-0.1.21]। इनाम के 400 रुपये बचाने के लिए व्यापारी झूठ बोलता है कि थैले में 4,400 रुपये थे और वृद्धा ने पैसे निकाल लिए हैं [0.1.20-0.1.21]। उसकी धूर्तता को भांपकर गाँव के मुखिया न्याय करते हुए कहते हैं कि तब यह थैला तुम्हारा नहीं है और वे पूरे 4,000 रुपये ज़ब्त कर लेते हैं, जिससे लालची व्यापारी को भारी नुकसान उठाना पड़ता है।
🌟 Overall Summary
यह कथा नीतिशास्त्र का एक बहुत सुंदर और व्यावहारिक पाठ पढ़ाती है [0.1.20-0.1.21]। पैसों से भरा थैला खो जाने पर एक गरीब बुढ़िया अपनी सत्यनिष्ठा का परिचय देते हुए उसे वापस कर देती है [0.1.20-0.1.21]। परंतु थैले का मालिक व्यापारी इतना कुटिल और कंजूस है कि वह पूर्व घोषित पुरस्कार की राशि देने से बचने के लिए उस बुढ़िया पर ही 400 रुपये चुराने का झूठा आरोप मढ़ देता है [0.1.20-0.1.21]। गाँव के चतुर प्रधान (मुखिया) इस अन्याय को सह नहीं पाते और व्यापारी के झूठ का उपयोग उसी के खिलाफ करके उसका पूरा थैला ज़ब्त कर लेते हैं। अंततः व्यापारी को अपनी कंजूसी और दुराशा के कारण अपने पूरे धन से हाथ धोना पड़ता है।
📌 Main Teachings
- अति लोभ का दुष्परिणाम (Greed leads to ruin): 'अति लोभो न कर्तव्यः'। व्यापारी यदि ईमानदारी से 400 रुपये पुरस्कार में दे देता, तो उसके 3,600 रुपये बच जाते, लेकिन 400 रुपये बचाने के चक्कर में उसने पूरे 4,000 रुपये गँवा दिए [0.1.20-0.1.21]।
- सत्य की विजय और चतुर न्याय: मुखिया का न्याय यह सिखाता है कि दुष्टों के साथ उन्हीं की भाषा (जैसे को तैसा) में व्यवहार करके ही न्याय की रक्षा की जा सकती है।
- ईमानदारी का महत्व: वृद्ध महिला ने डर और गरीबी के बावजूद लालच नहीं किया, जिससे उसकी सत्यनिष्ठा समाज के सामने प्रमाणित हुई [0.1.20-0.1.21]।
📚 Important Sanskrit Words
| Sanskrit Word | Simple Hindi Meaning |
|---|---|
वणिक | व्यापार करने वाला व्यक्ति / व्यापारी |
कृपणः | मक्खीचूस / अत्यधिक कंजूस |
धनस्यूतः | रुपयों का बैग या थैला |
सडिण्डिमम् | ढोल नगाड़े बजाकर मुनादी करवाना |
पारितोषिकम् | इनाम या पुरस्कार की राशि |
मिथ्यारोपः | किसी पर लगाया गया झूठा लांछन |
शठः | धूर्त, मक्कार या कपटी इंसान |
हस्तच्युतम् | हाथ से फिसलकर दूर हो जाना |
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